
जनस्थान का रण थम चुका था, पर उसकी आँच लंका तक पहुँची। अकम्पन नामक राक्षस वहाँ से तीव्र वेग से निकला और लंका में प्रवेश कर रावण के सम्मुख जा खड़ा हुआ। उसने काँपते स्वर में कहा कि जनस्थान के असंख्य राक्षस मारे गए, खर भी रण में मारा गया, और वह किसी प्रकार जान बचाकर यहाँ तक आ पाया। यह सुनते ही दशग्रीव की आँखें क्रोध से रक्त (लाल) हो उठीं और वह मानो अपने तेज से अकम्पन को भस्म कर देने को उद्यत हो गया। उसने गरजकर पूछा कि किस मनुष्य ने, जिसका जीवन मानो समाप्त ही समझिए, उसके भयप्रद जनस्थान को उजाड़ डाला। उसने अभिमान से कहा कि उसे अप्रिय करके न इन्द्र को सुख मिल सकता है, न कुबेर को, न यम को, और न स्वयं विष्णु को; वह तो काल का भी काल है, अग्नि को भी जला सकता है, मृत्यु को भी मरणधर्म से जोड़ सकता है। इस गर्जना से अकम्पन भय से सहम गया, पर अभय का वचन पाकर उसने निःशंक होकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
अकम्पन की चेतावनी और सीता-हरण का परामर्श
अकम्पन ने बताया कि दशरथ का एक तरुण पुत्र है, राम नाम का, सिंह के समान गठा हुआ, चौड़े कंधों वाला, गोल और लम्बी भुजाओं वाला, श्याम वर्ण का, यशस्वी और अतुल्य बल-पराक्रम वाला। उसी ने जनस्थान में खर को दूषण सहित मार डाला। रावण ने पूछा कि क्या राम इन्द्र और समस्त देवताओं को साथ लेकर आया था। अकम्पन ने उत्तर दिया कि नहीं, कोई महान् देवता उसके साथ नहीं था; इस विषय में कोई शंका न कीजिए। राम के छोड़े हुए स्वर्णपंख वाले बाण पाँच मुख वाले सर्प बनकर राक्षसों को निगल गए। राक्षस भय से जिस-जिस ओर भागे, उस-उस ओर राम को ही अपने आगे खड़ा पाते थे। इसी प्रकार राम अकेले ही जनस्थान को उजाड़ गया।
रावण ने कहा कि वह स्वयं जनस्थान जाकर राम को लक्ष्मण सहित मार डालेगा। पर अकम्पन ने रोकते हुए कहा कि राम का बल-पौरुष कुछ और ही है। क्रुद्ध होने पर वह असाध्य है; अपने बाणों से भरी हुई नदी के वेग को रोक सकता है, तारों, ग्रहों और नक्षत्रों सहित आकाश के विस्तार को नीचे गिरा सकता है, डूबती पृथ्वी को ऊपर उठा सकता है, समुद्र की मर्यादा तोड़कर लोकों को डुबा सकता है, और लोकों को संहारकर फिर नई सृष्टि रच सकता है। उसने स्पष्ट कहा कि राम युद्ध में रावण से अथवा समस्त राक्षस-लोक से नहीं जीता जा सकता, जैसे पापी जनों को स्वर्ग नहीं मिलता। फिर उसने वध का एकमात्र उपाय बताया, यह कहकर कि एकाग्र मन से सुनिए।

अकम्पन ने कहा कि राम की पत्नी सीता संसार की परम उत्तम स्त्री है; पतली कमर वाली, सुडौल अंगों वाली, रत्नों से अलंकृत, यौवन में पूर्ण। न कोई देवी, न गन्धर्वी, न अप्सरा, न नागकन्या उसकी समानता कर सकती है, फिर मनुष्य-स्त्री की तो बात ही क्या। उसने परामर्श दिया कि महावन में राम को बहकाकर उसकी पत्नी का बलपूर्वक हरण कर लीजिए; सीता से रहित होकर राम जीवित ही नहीं रहेगा। रावण को यह बात रुच गई। कुछ देर विचार कर उसने कहा कि अच्छा, कल प्रातः वह अकेला अपने सारथि के साथ जाकर हर्षित होकर वैदेही को इस महानगरी में ले आएगा।
समझने की कुंजी (जनस्थान): जनस्थान दण्डकारण्य का वह भाग है जहाँ खर-दूषण के नेतृत्व में चौदह सहस्र राक्षस बसते थे। राम ने उन सबका अकेले संहार किया (पिछले सर्गों में), और यही समाचार लंका तक पहुँचकर इस पूरे प्रसंग का बीज बनता है।

यों कहकर रावण खच्चरों से जुते हुए, सूर्य के समान देदीप्यमान रथ पर चढ़कर समस्त दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ चल पड़ा। आकाश-मार्ग से जाता हुआ वह विशाल रथ मेघ के पीछे चन्द्रमा-सा शोभा पा रहा था। दूर एक आश्रम में पहुँचकर वह ताटका-पुत्र मारीच से मिला। मारीच ने उसका भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से अमानुषी (मनुष्यों के लिए अप्राप्य) सत्कार किया, आसन और जल देकर अर्घ्य दिया, और अर्थ से युक्त वाणी में पूछा कि हे राक्षसाधिप, आपके लोक में सब कुशल तो है। आप इतनी शीघ्रता से आए हैं, इससे मुझे आशंका होती है कि सब कुशल नहीं है।
सार: अकम्पन ने राम के संहार का समाचार दिया, युद्ध से रोका, और सीता-हरण को ही एकमात्र उपाय बताया। रावण इस परामर्श से मोहित होकर पहली बार मारीच के पास पहुँचा।
मारीच का प्रथम विरोध और रावण की वापसी
मारीच के पूछने पर रावण ने सारा वृत्तान्त कहा। तब वाणी में निपुण मारीच ने पूछा कि किस कर्म से, किसके द्वारा आप कुपथ (बुरे मार्ग) पर लगा दिए गए। जब आप सुख से सोए हुए थे, तब किसने आपके सिर पर मानो प्रहार किया। उसने रूपक में कहा कि राघवरूपी मतवाला गजराज, जिसकी विशुद्ध वंश में उत्पत्ति उसकी सूँड है, तेज मद है, और सुन्दर भुजाएँ दाँत हैं, युद्ध में आपके द्वारा सामना करने योग्य नहीं। वह नरसिंह, जिसके अंग और रोम रणभूमि में स्थित रहना ही है, जो राक्षसरूपी पशुओं का संहारक है, जिसके बाण ही उसके दाँत हैं और खड्ग ही तीक्ष्ण दन्त, सोता हुआ-सा होने पर भी आपके द्वारा जगाया न जाए। राम रूपी अथाह समुद्र, जिसमें धनुष ग्राह हैं, भुजबल कीचड़ है, बाण लहरें हैं, और घोर युद्ध ही जल है, उस अति भयानक पाताल-मुख में कूदना उचित नहीं। उसने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि प्रसन्न हो जाइए, लंका लौट जाइए, अपनी पत्नियों के मध्य सदा रमते रहिए, और राम को अपनी पत्नी के साथ वन में रमने दीजिए। मारीच के इस वचन से वह दशग्रीव रावण लंका लौट गया और अपने उत्तम भवन में प्रवेश कर गया।
एक उप-कथा: उधर शूर्पणखा ने राम द्वारा चौदह सहस्र राक्षसों, दूषण, खर और त्रिशिरा के मारे जाने का दृश्य देखा। यह दुष्कर कर्म देखकर वह अत्यन्त उद्विग्न होकर रावण-पालित लंका की ओर चल पड़ी। वह वहीं पहुँच रही थी जहाँ रावण अपने मन्त्रियों से घिरा, सूर्य-सा देदीप्यमान, स्वर्ण के परम आसन पर विराजमान था; पूर्व में रावण मारीच के समझाने से तो लौट आया था, पर शूर्पणखा का आगमन इस कथा को नया मोड़ देने वाला था।

शूर्पणखा ने उस भयानक राक्षसराज को देखा, जो देव-गन्धर्व-ऋषियों तक के लिए अजेय था, जिसके वक्ष पर देवासुर-संग्रामों में वज्र-अशनि और ऐरावत के दाँतों के घाव अंकित थे, जिसने भोगवती जाकर वासुकि को हराया था, तक्षक की प्रिया पत्नी को छीना था, कैलास पर कुबेर को जीतकर पुष्पक विमान हर लिया था, और जिसने ब्रह्मा के यज्ञ में अपने दस सिर आहुति-रूप में अर्पित कर देव-दानव-गन्धर्व-पिशाच-पतंग-नागों से अभय का वर पाया था (केवल मनुष्य से नहीं)। उसी क्रूर, सर्वलोक-भयंकर भाई को देखकर अंग-भंग की हुई शूर्पणखा भय से व्याकुल होती हुई, अपनी विकृति प्रदर्शित करती हुई, अत्यन्त कठोर वचन कहने को उद्यत हुई।
सार: मारीच ने पहली बार रावण को रूपकों से चेताकर लौटा दिया। पर ठीक उसी समय अंग-भंग की हुई शूर्पणखा लंका पहुँच गई, जो अब रावण को फिर भड़काएगी।
शूर्पणखा की भर्त्सना और राजनीति का उपदेश
दीन शूर्पणखा ने मन्त्रियों के मध्य कुपित होकर रावण से कठोर वचन कहे। उसने कहा कि काम-भोगों में आसक्त, स्वेच्छाचारी और निरंकुश आप उस घोर भय को नहीं देख रहे जो उत्पन्न हो चुका है। ग्राम्य भोगों में लिप्त, कामवृत्त और लोभी राजा को प्रजा श्मशान की अग्नि के समान सम्मान नहीं देती। जो राजा समय पर स्वयं अपने कार्य नहीं करता, वह राज्य और कार्यों सहित नष्ट हो जाता है। जिसने गुप्तचर नहीं रखे, जो प्रजा के लिए दुर्दर्श और परतन्त्र है, उसे लोग नदी के पंक की भाँति दूर से ही त्याग देते हैं।
उसने स्पष्ट कहा कि राजा वही चिरकाल टिकता है जो अप्रमत्त, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ और धर्मशील हो; जो आँखों से सोता हुआ भी नीतिरूपी नेत्र से जागता रहे, जिसका क्रोध और प्रसाद (दण्ड और पुरस्कार के रूप में) प्रकट हो। आप, हे रावण, इन गुणों से रहित हैं; तभी राक्षसों के इस महान् वध का समाचार आपके गुप्तचरों तक नहीं पहुँचा। उसने राजा को बार-बार सावधान किया कि गुप्तचर, कोष और नीति जिनके अधीन न हों, वे राजा साधारण जनों के समान हैं; और देश-काल का यथार्थ विभाजन न जानने वाला, गुण-दोष का निश्चय न करने वाला राजा शीघ्र ही राज्यविहीन होकर विपत्ति में पड़ता है। अपने इन दोषों को सुनकर, धन-दर्प-बल से सम्पन्न वह प्रसिद्ध रावण चिरकाल तक विचार करता रहा।
समझने की कुंजी (अवधारणा): वाल्मीकि यहाँ शूर्पणखा के मुख से एक पूरा राजनीति-शास्त्र कह जाते हैं। उसका वास्तविक उद्देश्य प्रतिशोध है, पर शब्द राजधर्म के हैं, गुप्तचर-व्यवस्था, इन्द्रिय-संयम और कृतज्ञता पर। यही इस प्रसंग का अद्भुत संयोजन है, कि प्रलोभन का बीज नीति की भाषा में बोया जाता है।
सार: शूर्पणखा ने राजनीति के कठोर वचनों से रावण को उसके दोष गिनाए और उसे चिन्ता में डाल दिया, पर अभी सीता का प्रलोभन शेष था।
शूर्पणखा का प्रलोभन और राम का स्वरूप

मन्त्रियों के मध्य कठोर वचन सुनकर कुपित रावण ने पूछा कि राम कौन है, उसका बल-रूप-पराक्रम कैसा है, और वह सुदुस्तर दण्डकारण्य में क्यों प्रविष्ट हुआ। किस आयुध से उसने राक्षसों को, खर-दूषण-त्रिशिरा को मार डाला। तब क्रोध से मूर्च्छित-सी शूर्पणखा ने राम का यथार्थ वर्णन आरम्भ किया। उसने कहा कि दीर्घबाहु, विशाल नेत्रों वाला, चीर और कृष्णमृगचर्म धारण किए दशरथपुत्र राम कन्दर्प (कामदेव) के समान रूप वाला है। इन्द्रधनुष-सा चमकता, स्वर्ण के छल्लों वाला धनुष खींचकर वह अति विषैले सर्पों जैसे देदीप्यमान नाराच (इस्पात के बाण) छोड़ता है। उसने कहा कि वह यह देख ही न सकी कि राम ने कब बाण उठाए, कब धनुष खींचा, और कब छोड़े; उसने केवल यही देखा कि राक्षस-सेना उसके बाणों की वृष्टि से वैसे ही नष्ट हो रही थी जैसे ओलों की वर्षा से उत्तम फसल। उस अकेले पैदल योद्धा ने डेढ़ मुहूर्त में चौदह सहस्र भीषण राक्षसों को, और खर-दूषण को मार डाला।
शूर्पणखा ने आगे कहा कि उसी ने ऋषियों को अभय दिया, दण्डक को सुरक्षित बना दिया। आत्मज्ञानी राम स्त्री-वध की आशंका से ही उसे अकेला छोड़ गया, अन्यथा वह भी न बचती। राम का भाई लक्ष्मण भी समान पराक्रमी, अनुरक्त और भक्त है, राम की दाहिनी भुजा और बाहर विचरता हुआ उसका प्राण ही है। फिर उसने सीता का वर्णन किया, राम की धर्मपत्नी, विशालाक्षी, पूर्णचन्द्र-सी मुख वाली, तपे हुए स्वर्ण की आभा वाली, लाल-ऊँचे नखों वाली, पतली कमर वाली जनकनन्दिनी। उसने कहा कि ऐसी रूपवती न कोई देवी देखी, न गन्धर्वी, न यक्षी, न किन्नरी; पृथ्वी पर ऐसी नारी उसने पहले कभी नहीं देखी। जिसकी सीता पत्नी हो और जो उसका हर्षित होकर आलिंगन करे, वह इन्द्र से भी अधिक सुखी होकर सब लोकों में जीवित रहता है।
उसने रावण को बहकाया कि सीता उसकी अनुरूप भार्या और वह उसका योग्य पति होगा। उसने कहा कि वह स्वयं उस विस्तीर्ण-जघन, पीन-उन्नत-पयोधर वाली वैदेही को रावण की पत्नी बनाने के लिए ले आने को उद्यत हुई थी, पर क्रूर लक्ष्मण ने उसे विकृत कर दिया। उसने कहा कि यदि रावण का मन उसे पत्नी बनाने को झुके, तो विजय के लिए उसका दाहिना चरण यहीं उठ जाए। राम और लक्ष्मण की दुर्बलता तथा अपने श्रेष्ठ बल को जानकर अनवद्यांगी सीता को पत्नी रूप में ग्रहण कीजिए। निःशंक होकर मेरा वचन मानिए, और आज ही अपना कर्तव्य निश्चित कीजिए।
समझने की कुंजी (संख्या): शूर्पणखा “डेढ़ मुहूर्त” में चौदह सहस्र राक्षसों के संहार की बात कहती है। एक मुहूर्त लगभग 48 आधुनिक मिनट का होता है; अतः डेढ़ मुहूर्त लगभग 72 मिनट, अर्थात् एक घण्टे से कुछ अधिक। इतने अल्प काल में अकेले राम का यह कर्म उसके पराक्रम की भयावहता को रेखांकित करता है।
सार: शूर्पणखा ने राम के अप्रतिम पराक्रम का यथार्थ वर्णन करते हुए भी सीता के अद्वितीय सौन्दर्य का ऐसा चित्र खींचा कि रावण का मन उसी ओर मुड़ गया।
रावण का पुनः मारीच के पास जाना
शूर्पणखा का रोमांचकारी वचन सुनकर रावण ने मन्त्रियों को विदा किया और कर्तव्य निश्चित कर अपने भवन से चल पड़ा। दोष-गुण और बलाबल का सम्यक् विचार कर, और “यही करना है” ऐसा दृढ़ निश्चय कर वह स्थिरबुद्धि होकर अपनी रमणीय यानशाला (रथशाला) में गया। वहाँ उसने गुप्त रूप से सारथि को आदेश दिया कि रथ जोता जाए। क्षण भर में सारथि ने उसका प्रिय उत्तम रथ जोत दिया। पिशाच के समान मुख वाले, स्वर्णाभूषणों से सजे खच्चरों से जुते, स्वर्णमय रत्नजड़ित, इच्छानुसार चलने वाले उस रथ पर चढ़कर कुबेर का छोटा भाई रावण समुद्र की ओर चला, और वह रथ मेघगर्जना-सा शब्द करता हुआ चला।

श्वेत चँवर और श्वेत छत्र से सुशोभित, स्निग्ध वैदूर्यमणि-सा चमकता, तपे स्वर्ण के आभूषणों वाला, दस ग्रीवा और बीस भुजाओं वाला, दस शिखरों वाले पर्वत-सा वह त्रिदशारि (देवशत्रु) और मुनीन्द्रघ्न (मुनिश्रेष्ठों का संहारक) रावण विद्युन्मण्डल और बगुलों की पंक्ति से युक्त मेघ-सा शोभा पा रहा था। वह वीर समुद्र-तट को देखता हुआ चला, जो पर्वतों से सजा, सहस्रों पुष्प-फल वाले वृक्षों से भरा, शीतल जल की कमलिनियों और यज्ञवेदियों वाले विशाल आश्रमों से अलंकृत था। केले के उपवन, नारियल, साल, ताल, तमाल और फूले हुए वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। ऋषि, नाग, सुपर्ण, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, चारण, वैखानस, वालखिल्य, मरीचिप आदि तपस्वी, अप्सराएँ, देवपत्नियाँ और अमृताशी देव-दानव-गण उस तट पर बसते थे। हंस, क्रौंच और सारस से भरा, वैदूर्य-सी श्यामल शिलाओं वाला वह तट समुद्र के स्पर्श से शीतल था।
आगे बढ़ता हुआ रावण चन्दन, अगुरु, तक्कोल आदि सुगन्धित वनों, तमाल के पुष्पों, मरिच की लताओं, तट पर सूखते मोतियों के ढेर, प्रवाल, स्वर्ण-रजत के शिखरों, और धन-धान्य से सम्पन्न नगरों को देखता गया। समुद्रतट पर एक समतल, मृदु-स्पर्शी वायु से सेवित, स्वर्ग-सा रमणीय स्थान देखा। वहाँ उसने मुनियों से घिरा हुआ, मेघ-सा एक न्यग्रोध (वट) वृक्ष देखा, जिसकी शाखाएँ सौ योजन तक फैली थीं।
एक उप-कथा: उसी वट की एक शाखा पर महाबली गरुड़ कभी एक हाथी और एक विशाल कछुए को भक्षण के लिए लेकर आ बैठे थे। उनके भार से वह पत्तों से भरी शाखा सहसा टूट पड़ी। उस शाखा पर वैखानस, माष, वालखिल्य, मरीचिप और धूम्र नामक परमर्षि बैठे थे। उन ऋषियों की रक्षा के लिए गरुड़ ने सौ योजन लम्बी उस टूटी शाखा को, हाथी-कछुए सहित, एक ही पंजे में उठा लिया, मांस को आकाश में ही खाया, और उसी शाखा से निषादों का देश नष्ट कर महामुनियों को मुक्त किया। इस हर्ष से उनका पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत लाने का निश्चय कर, लोहे का जाल तोड़कर और रत्नगृह भेदकर महेन्द्र-भवन से गुप्त रूप से अमृत हर लिया। उसी सुभद्र नामक वट को रावण ने देखा।

वह न्यग्रोध पार कर रावण समुद्र के पार पहुँचा और एकान्त, पवित्र, रमणीय वनान्तर में एक आश्रम देखा। वहाँ कृष्णमृगचर्म धारण किए, जटाओं का मण्डल बाँधे, नियताहारी मारीच नामक राक्षस को देखा। मारीच ने विधिपूर्वक रावण का सब प्रकार के अमानुषी पदार्थों से सत्कार किया, और भोजन-जल से स्वयं पूजा कर अर्थयुक्त वाणी में पूछा कि हे राक्षसेश्वर, लंका में सब कुशल तो है। आप किस प्रयोजन से इतनी शीघ्र फिर यहाँ आए हैं। यह पूछने पर महातेजस्वी और वाणी-कुशल रावण आगे यों बोला।
सार: रावण दूसरी बार रथ पर समुद्रपार जाकर मारीच के आश्रम पहुँचा। मार्ग में उसने वह विशाल वट देखा जिससे गरुड़ की कथा जुड़ी थी, और फिर मारीच के सम्मुख अपना प्रयोजन कहने को उद्यत हुआ।
रावण का प्रस्ताव और मारीच का भयाक्रान्त मुख
रावण ने कहा कि हे तात मारीच, मेरे वचन सुनिए; मैं आर्त (दुखी) हूँ और आर्त के लिए आप ही परम गति हैं। आप जनस्थान को जानते हैं, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, बहन शूर्पणखा, मांसभक्षी त्रिशिरा और अनेक शूर राक्षस मेरे आदेश से बसते थे और महावन में धर्माचारी मुनियों को सताते थे। वहाँ खर के अधीन चौदह सहस्र शूर राक्षस रहते थे। वे सब राम के साथ संग्राम में आ भिड़े, और राम ने बिना कोई कठोर वचन कहे, क्रोध से धनुष-बाण उठाकर रणभूमि में उन चौदह सहस्र उग्रतेजस्वी राक्षसों को अकेले पैदल मार डाला; खर मारा गया, दूषण गिरा, त्रिशिरा भी मरा, और दण्डक तपस्वियों के लिए सुरक्षित बन गया।
रावण ने राम को क्रुद्ध पिता द्वारा सपत्नीक निर्वासित, क्षत्रिय-कुल का कलंक, अशील, कठोर, मूर्ख, लोभी और अजितेन्द्रिय कहा (यह उसका दुष्ट आरोप था, जिसका खण्डन मारीच आगे करेगा)। उसने कहा कि वह बलपूर्वक देवकन्या-सी सीता को जनस्थान से ले आएगा, क्योंकि उसी की पत्नी के लिए लक्ष्मण ने उसकी बहन के कान-नाक काट डाले। उसने मारीच से सहायता माँगते हुए कहा कि आप मेरे सहायक बनिए; आप जैसे पार्श्व में हों तो मैं भाइयों सहित समस्त देवताओं की भी चिन्ता नहीं करता। पराक्रम, युद्ध और गर्व में आपके समान कोई नहीं, आप महान् शूर और मायाविद्या में निपुण हैं।
फिर रावण ने अपना कुटिल उपाय बताया, कि मारीच रजत-बिन्दुओं से चित्रित स्वर्णमृग बनकर राम के आश्रम में सीता के सामने विचरे। सीता उसे देखकर निश्चय ही राम और लक्ष्मण से कहेगी, “इसे पकड़ लीजिए।” जब दोनों आश्रम से दूर चले जाएँ, तब रावण एकान्त में सीता को वैसे ही सहज हर लेगा जैसे राहु चन्द्रमा की प्रभा को हर लेता है। तब पत्नी-हरण से दुर्बल राम पर वह विश्वस्त होकर सुखपूर्वक प्रहार करेगा।
महात्मा मारीच की राम-कथा सुनते ही उसका मुख सूख गया और वह अत्यन्त भयभीत हो गया। अपने सूखे ओठ चाटता हुआ, अनिमेष नेत्रों से वह मानो मृत-सा होकर रावण को देखने लगा। फिर त्रस्त और खिन्नचित्त, हाथ जोड़कर, राम के पराक्रम को जानने वाला मारीच रावण से वे हितकर वचन बोला, जो उसके अपने तथा रावण दोनों के हित में थे।
सार: रावण ने सहायता माँगते हुए स्वर्णमृग बनने का प्रस्ताव रखा और सीता-हरण की पूरी योजना कह सुनाई। राम का नाम सुनते ही मारीच भय से सूख गया और हितकर वचन कहने को तैयार हुआ।
मारीच का सत्य-वचन और राम की धर्ममय छवि
मारीच ने कहा कि हे राजन्, प्रिय बोलने वाले तो सदा सुलभ हैं, पर अप्रिय किन्तु हितकर कहने वाला और सुनने वाला दुर्लभ है। आपने गुप्तचर नहीं रखे और स्वयं चंचल हैं, इसी से महान् वीर्य-गुणों से उन्नत, महेन्द्र और वरुण के समान राम को नहीं जानते। फिर उसने आशीर्वाद-रूप में चिन्ता प्रकट की, कि समस्त राक्षसों का कल्याण हो, कुपित राम लोकों को राक्षसरहित न कर दे, जनकात्मजा आपके जीवन का अन्त करने को उत्पन्न न हुई हो, सीता के निमित्त महान् व्यसन न आ पड़े, और आप जैसे कामवृत्त-निरंकुश स्वामी को पाकर राक्षसों सहित लंका न नष्ट हो जाए।

उसने रावण के झूठे आरोपों का खण्डन किया। उसने कहा कि राम न पिता से त्यागा गया है, न उसने मर्यादा लाँघी, न वह लोभी है, न दुःशील, न क्षत्रिय-कुल का कलंक, न धर्म-गुणों से रहित। वह कौसल्या का आनन्दवर्धक है, प्राणियों के प्रति कठोर नहीं, सर्वभूतहित में रत है। केकयी द्वारा ठगे गए सत्यवादी पिता को देखकर, “मैं उन्हें सत्यवादी सिद्ध करूँगा” यह संकल्प कर वह धर्मात्मा राज्य और भोग छोड़कर दण्डकवन में आया। उसने कहा कि राम कठोर नहीं, अनजान नहीं, अजितेन्द्रिय नहीं; उस पर असत्य का कोई आरोप न सुना गया, न आपको ऐसा कहना चाहिए। राम साक्षात् विग्रहवान् धर्म है, साधु, सत्यपराक्रमी; जैसे इन्द्र देवताओं का, वैसे राम समस्त लोक का राजा है।
मारीच ने पूछा कि आप उसकी, अपने ही तेज से रक्षित वैदेही को बलपूर्वक कैसे हरना चाहते हैं, जैसे कोई सूर्य की प्रभा को हर ले। बाणरूपी ज्वालाओं, धनुष-खड्गरूपी ईंधन वाली, अनाधृष्य राम-अग्नि में सहसा प्रवेश न कीजिए। जिसकी राम धनुषरूपी मुख वाला, बाणरूपी किरणों वाला, अमर्षण और शत्रुसेना-संहारक मृत्यु-स्वरूप है, उस राम-अन्तक के निकट जाकर अपना दुर्लभ जीवन-सुख-राज्य मत त्यागिए। उसने कहा कि उस जनकात्मजा का तेज अप्रमेय (माप से परे) है, वन में राम के धनुष से रक्षित उस सीता को आप हर नहीं सकते। सिंह-सी छाती वाले उस नरसिंह की प्रिया, प्राणों से भी प्रिय और नित्य अनुव्रता सीता जलती हुई हुताशन की शिखा-सी अधर्षणीय है।
उसने प्रश्न किया कि इस व्यर्थ उद्यम से आपको क्या मिलेगा। यदि रण में राम ने आपको देख लिया, तो वही आपके जीवन का अन्त होगा। जीवन, सुख और सुदुर्लभ राज्य को चिरकाल भोगना चाहते हैं तो राम का अप्रिय मत कीजिए। उसने अन्त में कहा कि विभीषण आदि धर्मिष्ठ मन्त्रियों से मन्त्रणा कर, दोष-गुण और बलाबल तौलकर, अपना तथा राघव का बल यथार्थ जानकर, अपने हित का निश्चय कर ही क्षेम (कल्याण) का कार्य कीजिए। उसने विनयपूर्वक कहा कि कोसलराज के पुत्र से रण में आपका सामना उसे उचित नहीं जान पड़ता; आगे एक और हितकर, उचित और युक्त बात सुनिए।
सार: मारीच ने रावण के झूठे आरोपों का खण्डन कर राम को धर्म का साक्षात् रूप बताया, सीता को राम के तेज से रक्षित कहा, और रावण को हित-अहित तौलकर ही कुछ करने को समझाया।
मारीच का अपना अनुभव: राम के बाल-पराक्रम की गाथा
मारीच ने अपना ही अनुभव सुनाया। उसने कहा कि कभी पराक्रम के मद में, पर्वत-सा, सहस्र हाथियों के बल वाला, नील मेघ-सी आभा वाला, तपे स्वर्ण के कुण्डल और किरीट पहने, परिघ-आयुध लिए वह दण्डकारण्य में विचरता हुआ ऋषियों का मांस खाता और लोगों में भय फैलाता था। तब धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र ने, जो उससे भयभीत थे, स्वयं राजा दशरथ के पास जाकर कहा कि राम पर्व-काल में सावधान रहकर मेरी रक्षा करे; मारीच से मुझे घोर भय उत्पन्न हुआ है। दशरथ ने उत्तर दिया कि यह राघव अभी बारह वर्ष से कम का है और अस्त्र-विद्या भी नहीं सीखी; मेरी चतुरंगिणी सेना के साथ मैं स्वयं चलकर उस राक्षस को मार दूँगा। पर मुनि ने कहा कि राम के अतिरिक्त कोई बल उस राक्षस के लिए पर्याप्त नहीं; आप देवताओं के भी रक्षक रहे हैं, फिर भी मैं राम को ही ले जाऊँगा। वह बालक होकर भी महातेजस्वी और उसके निग्रह में समर्थ है। यों कहकर विश्वामित्र अत्यन्त प्रसन्न होकर राम को लेकर अपने आश्रम लौटे।
समझने की कुंजी (आयु का अन्तर): यहाँ मारीच राम की आयु “बारह वर्ष से कम” कहता है, जबकि बालकाण्ड में दशरथ ने उसे “पन्द्रह वर्ष से कम” कहा था। मूल पाठ में यह अन्तर रावण पर राम के तेज की भयावहता गहरी छापने के लिए मारीच द्वारा आयु घटाकर बताए जाने का संकेत है। यह वाल्मीकि-पाठ का अपना भीतरी सन्दर्भ है, बाद की किसी परम्परा का नहीं।

मारीच ने आगे कहा कि दण्डकारण्य में यज्ञ के लिए दीक्षित विश्वामित्र के पास राम अद्भुत धनुष टंकारता हुआ खड़ा हो गया, बिना मूँछ-दाढ़ी आए, श्याम, शुभ नेत्रों वाला, एकवस्त्रधारी, शिखा बाँधे, स्वर्णमाला पहने, अपने तेज से दण्डकारण्य को प्रकाशित करता हुआ, उदित बालचन्द्र-सा। तब मेघ-सा वह मारीच, ब्रह्मा का वर पाकर, दर्प से आश्रम में घुसा। राम ने उसे देखते ही सहसा आयुध उठा लिया और शान्ति से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी। मारीच ने मोहवश “यह तो बालक है” समझकर उसका तिरस्कार किया और विश्वामित्र की वेदी की ओर वेग से दौड़ा। तभी राम ने एक शत्रुनाशक तीक्ष्ण बाण छोड़ा, जिससे आहत होकर वह सौ योजन दूर समुद्र में जा गिरा। वीर राम ने उसे मारना नहीं चाहा, इसी से वह बच गया; पर बाण के वेग से चेतना खोकर गहरे समुद्र-जल में गिरा, और चिरकाल बाद होश पाकर लंका लौटा। अस्त्रविद्या में अनभ्यस्त उस बालक राम ने उसके साथी राक्षसों को मार डाला, वह स्वयं ही बच निकला।
मारीच ने कहा कि यदि मेरे रोकने पर भी आपने राम से विग्रह किया, तो शीघ्र ही घोर आपत्ति पाकर नष्ट हो जाएँगे; क्रीड़ा-उत्सव में रमने वाले राक्षसों को भी सन्ताप और अनर्थ देंगे। उसने भविष्य का चित्र खींचा, कि लंका मैथिली के कारण नष्ट हो जाएगी, राक्षस दिव्य चन्दन और आभूषणों सहित भूमि पर मारे पड़े दिखेंगे, हतशेष राक्षस स्त्रियों सहित दसों दिशाओं में भागेंगे, और लंका बाणजाल से घिरी, अग्निज्वालाओं से ढकी, भवन भस्म होते दिखेंगे। उसने स्मरण कराया कि परस्त्री-गमन से बढ़कर कोई महापाप नहीं; आपके अन्तःपुर में सहस्रों युवतियाँ हैं, अतः अपनी पत्नियों में निरत रहिए, कुल-राक्षस-मान-वृद्धि-राज्य और जीवन की रक्षा कीजिए। यदि चिरकाल भोग चाहते हैं तो राम का अप्रिय मत कीजिए; यदि अपने सुहृद् मेरे बहुत रोकने पर भी सीता को बलपूर्वक हर लाएँगे, तो बन्धु-बान्धव और सेना सहित राम के बाणों से प्राण खोकर यमलोक पहुँचेंगे।
सार: मारीच ने अपने बाल-राम से हुए घोर अनुभव की कथा सुनाई, जब बाणवेग से वह सौ योजन दूर समुद्र में जा गिरा था, और लंका के विनाश का चित्र खींचकर रावण को परस्त्री-हरण से रोका।
मारीच का दूसरा अनुभव और अन्तिम प्रार्थना
मारीच ने कहा कि उस संग्राम में किसी प्रकार छूटकर भी जो बाद में हुआ, वह भी सुनिए, जो असामान्य है। राम से वैसा व्यवहार पाकर भी अखिन्न होकर वह दो मृगरूपधारी राक्षसों के साथ फिर दण्डकवन में घुसा। दीप्त जिह्वा, बड़े दाँत और तीक्ष्ण सींगों वाला महाबली, मांसभक्षी महामृग बनकर वह वन में विचरता, अग्निहोत्रों, तीर्थों और चैत्यवृक्षों पर तपस्वियों को सताता, धर्माचारी तापसों को मारकर उनका रक्त पीता और मांस खाता रहा। रक्त के मद में चूर वह दण्डकवन में घूमता रहा। एक दिन धर्म-दूषक रूप में विचरते हुए उसने राम को पाया, जो तापस-धर्म ले चुके थे, साथ में महाभागा वैदेही और नियताहारी, सर्वभूतहित-रत महारथी लक्ष्मण थे।
मारीच ने कहा कि वनगत राम को तापस मात्र समझकर, पूर्व-वैर स्मरण कर, तीक्ष्ण-सींग वाला मृगरूप धारण कर वह अति-क्रुद्ध होकर, पुराना प्रहार याद कर, उसे मारने दौड़ा। राम ने महान् धनुष खींचकर गरुड़ और वायु के समान वेगवान् तीन तीक्ष्ण शत्रुनाशक बाण छोड़े। वज्र-सी आभा वाले, रक्तभक्षी, सन्नतपर्व (झुकी गाँठ वाले) वे तीनों भयानक बाण एक साथ उसकी ओर दौड़े। राम के पराक्रम को जानने वाला, पूर्व में भय देख चुका वह शठ उछलकर बच निकला, पर उसके दोनों साथी मारे गए, क्योंकि राम का बाण भागते हुए पर नहीं चलता।
उसने हृदय की दशा कही, कि राम के बाण से किसी प्रकार जीवन पाकर वह यहाँ प्रव्रजित होकर, समाहित होकर तापस-वृत्ति में लग गया। अब प्रत्येक वृक्ष में उसे चीर-कृष्णमृगचर्मधारी, धनुषधारी, पाशहस्त अन्तक-सा राम ही दिखता है। भयभीत होकर वह सहस्रों राम देखता है; यह सारा वन उसे राम-मय भासता है। एकान्त में भी राम ही दिखता है; स्वप्न में राम देखकर वह विचेतन-सा हो उठता है। “र” अक्षर से आरम्भ होने वाले नाम, जैसे रत्न और रथ भी, राम से त्रस्त उसे भय उपजाते हैं। उसने कहा कि वह राम के प्रभाव को जानता है; राम बलि और नमुचि तक को मार सकता है। अतः रावण राम से युद्ध करे या क्षमा (सन्धि), पर यदि मुझे जीवित देखना चाहता है तो मेरे सामने राम की चर्चा न करे।
मारीच ने अन्त में कहा कि संसार में अनेक धर्माचारी साधु दूसरों के अपराध से परिवार सहित नष्ट हो गए; इसी प्रकार वह भी दूसरे (अर्थात् रावण) के अपराध से नष्ट हो जाएगा। उसने स्पष्ट कहा कि आप अपना उचित कर्तव्य कीजिए, मैं आपका अनुगमन नहीं करूँगा। राम महातेजस्वी, महासत्त्व और महाबली है; वह तो समस्त राक्षस-लोक का अन्त करने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि शूर्पणखा के कारण मर्यादा लाँघने वाला खर राम के हाथों पहले ही मारा गया, तो सच बताइए, इसमें राम का क्या अपराध था। उसने चेताया कि बन्धु के हित की कामना से कहा गया यह वचन यदि नहीं मानेंगे, तो आज ही राम के सीधे जाने वाले बाणों से बन्धु-बान्धव सहित रण में प्राण त्याग देंगे।
सार: मारीच ने दूसरी बार राम से छूटने का अनुभव सुनाया, जिसने उसे ऐसा त्रस्त कर दिया कि उसे “र” अक्षर तक से भय लगता है। उसने रावण से साफ कहा कि वह उसका अनुगमन नहीं करेगा, और चेताया कि सीता-हरण राक्षस-लोक का अन्त ले आएगा।
रावण की भर्त्सना और बलपूर्वक आदेश
मारीच के उस उचित और युक्त वचन को रावण ने वैसे ही ग्रहण नहीं किया, जैसे मरना चाहने वाला औषध को नहीं लेता। काल से प्रेरित होकर उस पथ्य-हितकारी मारीच से रावण ने कठोर और अयुक्त वचन कहे। उसने कहा कि हे दुष्कुल मारीच, यह अयुक्त परामर्श मुझसे ऐसे कहा जा रहा है जैसे ऊसर भूमि में बोया गया निष्फल बीज। आपके वचनों से मैं मूर्ख, पापशील और विशेषतः मनुष्यमात्र राम से सीता-हरण के विग्रह से नहीं डिगाया जा सकता। जिसने स्त्री (केकयी) का निरर्थक वचन सुनकर सुहृद्-राज्य-माता-पिता छोड़ वन में चला आया और खर को मारा, उसी राम की, प्राणों से प्रिय सीता को मैं अवश्य आपके सम्मुख हर लाऊँगा। यह मेरा निश्चय है, जिसे इन्द्र सहित देवासुर भी नहीं बदल सकते।
रावण ने आगे कहा कि दोष-गुण, उपाय-अपाय और कार्य का निश्चय पूछने पर ही मन्त्री को हाथ जोड़कर परामर्श देना चाहिए, और राजा से अनुकूल, मृदु, शुभ और हितकर वचन ही उपचार से कहने चाहिए। मान चाहने वाला राजा अपमान-भरे, अनादरयुक्त हितकर वचन का भी अभिनन्दन नहीं करता। राजा पाँच रूप धारण करते हैं, अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण के; उष्णता, पराक्रम, सौम्यता, दण्ड और प्रसन्नता, ये सब महात्मा राजाओं में रहते हैं, अतः वे सर्वथा माननीय और पूज्य हैं। उसने मारीच पर आरोप लगाया कि धर्म न जानकर, केवल मोह में पड़कर, दुरात्मापन से वह अतिथि-रूप में आए राजा से ऐसे कठोर वचन कह रहा है। मैं आपसे गुण-दोष या अपना हित नहीं पूछता; मैंने जो कहा वही करना है। इस कार्य में आपको मेरी सहायता करनी ही होगी।

फिर उसने वही उपाय दोहराया, कि मारीच रजत-बिन्दुओं से चित्रित स्वर्णमृग बनकर राम-आश्रम में सीता के सामने विचरे, वैदेही को लुभाकर फिर इच्छानुसार चला जाए। माया से उपजे स्वर्णमृग को देखकर विस्मित मैथिली राम से शीघ्र कहेगी, “इसे ला दीजिए।” काकुत्स्थ दूर निकल जाए, तब राम के स्वर का अनुकरण कर “हा सीते! हा लक्ष्मण!” पुकारना। वह स्वर सुनकर सीता द्वारा प्रेरित सौमित्रि भी सौहार्दवश राम के पीछे दौड़ेगा। दोनों के दूर हो जाने पर मैं वैसे ही सीता को सहज हर लूँगा जैसे सहस्राक्ष इन्द्र शची को। उसने वचन दिया कि यों कर लेने पर मारीच इच्छानुसार जाए; वह उसे अपना आधा राज्य देगा। उसने कहा कि इस कार्य की वृद्धि के लिए आप शिव (कल्याणकारी) मार्ग से जाइए, मैं रथ पर आपके पीछे दण्डकवन आऊँगा; बिना युद्ध सीता पाकर, राघव को ठगकर, कृतकार्य होकर आपके साथ लंका लौटूँगा। उसने धमकी दी कि यदि यह न करेंगे, तो आज ही आपको मार डालूँगा; राजा का विरोध करने वाला कभी सुख नहीं पाता। राम के पास जाने में जीवन का संशय है, पर मुझसे विरोध में आज मृत्यु निश्चित है, इसे बुद्धि से तौलकर जो पथ्य हो, वही कीजिए।
सार: काल से प्रेरित रावण ने मारीच के हितकर वचन ठुकराकर उसे कठोर डाँट दी, और स्वर्णमृग बनने का आदेश देते हुए धमकी दी कि न मानने पर तुरन्त मार डालूँगा।
मारीच का काकतालीय भय और विवशता
राजा-सा प्रतिकूल आदेश पाकर निःशंक मारीच ने राक्षसाधिप से कठोर वचन कहे। उसने पूछा कि किस पापकर्मी ने आपको पुत्र, राज्य और मन्त्रियों सहित यह विनाश का परामर्श दिया। सुखी रहते हुए कौन पापी आपका अहित चाहता है। आपके दुर्बल शत्रु स्पष्ट चाहते हैं कि आप किसी बलवान् से घिरकर नष्ट हो जाएँ। उसने कहा कि वध-योग्य वे मन्त्री हैं जो आपको उन्मार्ग पर चढ़ते देखकर भी सब प्रकार से नहीं रोकते। कामवृत्त राजा को कुपथ पर चढ़ते देख सज्जन मन्त्रियों को सर्वथा रोकना चाहिए, पर आपको रोका नहीं गया। उसने कहा कि स्वामी की कृपा से ही मन्त्री धर्म-अर्थ-काम-यश पाते हैं, और स्वामी के दोष से प्रजा विपत्ति पाती है; धर्म और यश का मूल राजा है, अतः सब अवस्थाओं में राजा की रक्षा करनी चाहिए। पर तीक्ष्ण, अति-प्रतिकूल और अविनीत राजा से राज्य नहीं चलता।
मारीच ने कहा कि तीक्ष्ण-मन्त्रणा देने वाले मन्त्री राजा सहित वैसे ही दुःख भोगते हैं जैसे मन्द-सारथि के विषम मार्ग पर दौड़ते रथ टूट जाते हैं। प्रतिकूल और तीक्ष्ण स्वामी से रक्षित प्रजा वैसे नहीं बढ़ती जैसे गीदड़ से रक्षित भेड़ें। जिनका आप जैसा कठोर, दुर्बुद्धि, अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य नष्ट होंगे। उसने कहा कि यह काकतालीय (अनायास आ पड़ा) घोर संकट मुझ पर आ गया, फिर भी इसमें शोचनीय आप ही हैं, जो सेना सहित नष्ट होंगे। उसने कहा कि मुझे मारकर वह राम शीघ्र ही आपको भी मार डालेगा; पर इससे मैं कृतकृत्य रहूँगा, क्योंकि आपके हाथों मरने से शत्रु के हाथों मरना श्रेयस्कर है। मुझे राम के दर्शन से ही मरा हुआ समझिए, और सीता को हरते ही अपने को बन्धु-बान्धव सहित मरा जानिए। यदि मेरे साथ आश्रम से सीता ले आएँगे, तो न आप बचेंगे, न मैं, न लंका, न राक्षस। उसने कहा कि हितैषी मुझ द्वारा रोके जाने पर भी आप यह वचन नहीं सहते; क्योंकि जिनका आयुष्य समाप्त हो चुका है और जो मृत्यु के निकट हैं, वे सुहृदों के हित-वचन नहीं ग्रहण करते।
सार: मारीच ने अन्तिम बार राजनीति और स्नेह दोनों से रावण को रोका, यह जानते हुए भी कि वह दोनों ओर से मृत्यु में घिरा है, और रावण को सेना सहित विनाश की ओर बढ़ता हुआ देखा।
स्वर्णमृग का रूप और सीता की दृष्टि
यों कठोर वचन कहकर भी, राक्षसराज के भय से दीन मारीच ने कहा कि अच्छा, हम दोनों चलते हैं। उसने कहा कि यदि वह बाण-धनुष-खड्गधारी राम मुझे फिर देख लेगा, तो मेरा जीवन समाप्त ही है; राम पर पराक्रम कर कोई जीवित नहीं लौटता; आप तो यमदण्ड से मारे हुए के समान हैं। उसने व्यंग्य किया कि जब आप ऐसे दुरात्मा हैं तो मैं आपको रोकने को क्या कर सकता हूँ; जाता हूँ, आपका कल्याण हो। इस वचन से वह राक्षस अति हर्षित हुआ और मारीच को कसकर गले लगाकर बोला कि यह वचन शौर्य से युक्त है, अब आप मेरी इच्छा के वशवर्ती हैं; अब आप वही पहले वाले मारीच हैं, अभी तक तो कोई और ही राक्षस बने हुए थे। उसने कहा कि रत्नविभूषित यह विमान-सा रथ, जो पिशाच-मुख वाले खच्चरों से जुता है, शीघ्र मेरे साथ आरूढ़ कीजिए; वैदेही को लुभाकर इच्छानुसार चले जाना, और एकान्त होने पर मैं बलपूर्वक मैथिली सीता को ले आऊँगा।
ताटका-पुत्र ने “ऐसा ही हो” कहा। तब रावण और मारीच उस विमान-से रथ पर चढ़कर आश्रम-मण्डल से शीघ्र चले। मार्ग में नगर, वन, पर्वत, समस्त नदियाँ, राष्ट्र और नगर देखते हुए दण्डकारण्य पहुँचे, और फिर राघव का आश्रम देखा। स्वर्णभूषित रथ से उतरकर, मारीच का हाथ पकड़कर रावण ने कहा कि यह वह केले के वनों से घिरा राम-आश्रम का स्थान दिख रहा है; जिसके लिए हम आए हैं, वह कार्य शीघ्र कीजिए, हे सखे।

रावण का वचन सुनकर मारीच मृग बनकर आश्रम-द्वार पर विचरने लगा। उसने अद्भुत-दर्शन वाला महान् रूप धारण किया, मणि-से सींगों के अग्र, श्वेत-श्याम मुख, लाल कमल-सा मुख का ऊपरी भाग और नील कमल-सा नीचे का, इन्द्रनील-से कान, कुछ ऊँची ग्रीवा, इन्द्रनील-सा उदर, मधूक-पुष्प-से पार्श्व, कमल-केसर-सी आभा, वैदूर्य-से खुर, पतली पिण्डलियों वाला सुगठित शरीर, और इन्द्रधनुष-सी ऊपर उठी पूँछ। क्षण भर में वह राक्षस परमशोभन मृग बन गया, और सैकड़ों रजत-बिन्दुओं से चित्रित, प्रियदर्शन रूप धारण कर वृक्षों के कोमल अंकुर खाता हुआ विचरने लगा। केले के कुंज और कर्णिकार के वृक्षों के बीच, मन्द गति से, सीता को दिखाने के उद्देश्य से कमल-केसर-सी पीठ वाला वह महामृग शोभा पाता हुआ आश्रम के समीप सुखपूर्वक विचरता रहा।
वह रत्न-सा मृग कभी दूर जाकर लौट आता, कभी मुहूर्त भर जाकर शीघ्र फिर आता, कभी भूमि पर खेलता-सा बैठ जाता, कभी आश्रम-द्वार पर आकर मृग-यूथों में मिल जाता, और सीता का दर्शन चाहता हुआ मृगों के साथ फिर लौट आता। सीता के समीप आकर वह चित्र-विचित्र मण्डल बनाता घूमता। उसे देखकर, पास आकर, सूँघकर अन्य वनचर मृग दसों दिशाओं में भाग जाते। मृग-वध में रत होने पर भी वह राक्षस, अपना भाव छिपाने के लिए, उन वन्य मृगों का स्पर्श करते हुए भी उन्हें खाता नहीं था। उसी समय, शुभ नेत्रों वाली, रुचिर मुख वाली वैदेही, फूल चुनने में व्यग्र, कर्णिकार, अशोक और आम के वृक्षों के बीच पुष्प चुनती हुई इस ओर आ गई। वनवास के अयोग्य उस उत्तम स्त्री ने मुक्ता-मणि से चित्रित अंगों वाले उस रत्नमय मृग को देखा। विस्मय से प्रफुल्ल नेत्रों वाली उसने रजत-धातु-सी रोमावलि और सुन्दर दाँत-ओठ वाले उस मृग को स्नेह से देखा। अपनी प्रिया राम-दयिता को देखते हुए वह मायामृग भी मानो वन को दीप्त करता हुआ विचरने लगा। पहले कभी न देखे, नाना रत्नमय-से उस मृग को देखकर जनकात्मजा सीता परम विस्मय को प्राप्त हुई।
समझने की कुंजी (माया): मारीच का यह स्वर्णमृग कोई स्वाभाविक पशु नहीं, “माया” है, अर्थात् इच्छानुसार रचा गया छलरूप। वाल्मीकि इसे बार-बार “मायामय मृग” और “मायाविद् की माया” कहते हैं। यही इस कथा का केन्द्रीय छल है, जिससे राम को आश्रम से दूर खींचना और सीता को असुरक्षित करना सम्भव होता है।
सार: भयभीत किन्तु विवश मारीच रावण के साथ दण्डक पहुँचा और अद्भुत स्वर्णमृग का रूप धरकर आश्रम के समीप विचरने लगा, जिसे देखकर फूल चुनती सीता विस्मय में पड़ गई।
सीता का आग्रह और राम का प्रस्थान

स्वर्ण-रजत वर्ण के पार्श्वों वाले उस मृग को देखकर हर्षित, अनवद्यांगी, स्वर्ण-सी कान्ति वाली सीता ने आयुधधारी पति राम और लक्ष्मण को पुकारा। बार-बार बुलाते हुए वह उस मृग को ध्यान से देखती रही, और कहती रही कि हे आर्यपुत्र, अनुज सहित शीघ्र आइए। बुलाए जाने पर दोनों नरश्रेष्ठ राम-लक्ष्मण उस ओर देखते हुए उस मृग को देखने लगे। मृग को देखते ही शंकित लक्ष्मण बोले कि मुझे तो यह वही मारीच राक्षस लगता है, मृगरूप में। उन्होंने कहा कि कामरूपी इस पापी मायावी ने छल से अनेक राजाओं को मृगया में मार डाला है; यह उसकी माया है, गन्धर्व-नगर-सी। उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर ऐसा रत्न-चित्रित मृग नहीं होता; यह निःसन्देह माया है।
पर शुचिस्मिता सीता ने काकुत्स्थ लक्ष्मण की बात बीच में ही रोककर, हर्षित होकर, छल से हरी हुई चेतना वाली होकर मुसकराते हुए कहा कि हे आर्यपुत्र, यह सुन्दर मृग मेरा मन हर लेता है; इसे ला दीजिए, यह हमारी क्रीड़ा का साधन होगा। उसने कहा कि इस आश्रम के आसपास अनेक पवित्र-दर्शन मृग, चमर, सृमर, ऋक्ष, पृषत-समूह, वानर और किन्नर विचरते हैं, पर इसके समान तेज, सौम्यता और दीप्ति वाला मृग पहले कभी नहीं देखा। उसने कहा कि नाना वर्णों से चित्र-विचित्र, रत्न-सा यह मृग चन्द्र-सा वन को प्रकाशित करता शोभा पा रहा है; आश्चर्य है इसका रूप, अद्भुत है इसकी कान्ति और स्वर। उसने कहा कि यदि यह जीवित पकड़ में आ जाए तो विस्मयकारी अद्भुत कर्म होगा; वनवास पूर्ण होने और राज्य पाने पर अन्तःपुर की शोभा बनेगा, और भरत, आर्यपुत्र, सासों और स्वयं उसे विस्मित करेगा। यदि जीवित न पकड़ा जाए तो इसका चर्म ही रुचिर होगा; उस स्वर्णमय चर्म पर कोमल घास बिछाकर वह राम के साथ बैठना चाहती है। उसने कहा कि यह स्त्रियों के अयोग्य कामवृत्त है, पर इस मृग के रूप ने उसमें विस्मय उपजा दिया है।

स्वर्ण-रोम वाले, मणि-से सींगों वाले, उदित सूर्य-से वर्ण वाले, नक्षत्र-पथ-सी आभा वाले उस मृग को देखकर राम का मन भी विस्मय में पड़ा। सीता का वचन सुनकर और उस अद्भुत मृग को देखकर, उस रूप से लुभाए और सीता से प्रेरित राम हर्षित होकर भाई लक्ष्मण से बोले। उन्होंने कहा कि देखिए लक्ष्मण, वैदेही की यह उल्लसित स्पृहा (अभिलाषा); अपने उत्कृष्ट रूप के कारण ही यह मृग आज जीवित न बचेगा। नन्दन या चैत्ररथ वन में भी इसके समान मृग नहीं, फिर पृथ्वी पर कहाँ। राम ने इसकी रोमावलि, शंख-मोती-सी उदर-कान्ति, और जँभाई लेते समय मेघ से निकलती बिजली-सी जिह्वा का वर्णन किया।
राम ने कहा कि मांस और चर्म के लिए तथा विहार के लिए राजा महावन में मृगों को मारते हैं, और उद्यम से वन में मणि-रत्न-सुवर्ण के अनेक धातु एकत्र करते हैं; यही मनुष्यों का सार-धन है। पतली कमर वाली वैदेही इस मृगरत्न के परम उत्तम स्वर्णचर्म पर मेरे साथ बैठेगी; इसके समान कोमल स्पर्श न कादली, न प्रियकी, न प्रवेणी, न अविक का चर्म है। उन्होंने कहा कि आकाश में चलने वाला तारामृग और यह भूमि का मृग, दोनों दिव्य हैं। फिर उन्होंने स्थिर होकर कहा कि यदि यह वैसा ही है जैसा आप कहते हैं, अर्थात् राक्षस की माया, तो इसका वध मुझे करना ही चाहिए; क्योंकि इसी नृशंस, दुष्ट मारीच ने पहले वन में अनेक मुनिपुंगवों और महाधनुर्धर राजाओं को सहसा प्रकट होकर मार डाला है, अतः यह मृग वध्य है।
एक उप-कथा: राम ने वातापि का दृष्टान्त दिया। पूर्वकाल में वातापि राक्षस तपस्वियों को छलकर, उनके उदर में जाकर ब्राह्मणों को वैसे ही मार डालता था जैसे खच्चरी का गर्भ खच्चरी का नाश करता है। एक बार लोभवश उसने तेजस्वी महामुनि अगस्त्य के पास उनका भक्ष्य बनकर पहुँचा। श्राद्ध की समाप्ति पर जब वह फिर राक्षस-रूप धरने को उद्यत हुआ, तब भगवान् अगस्त्य ने मुसकराकर कहा कि हे वातापि, अपने तेज के बल पर आपने अनेक द्विजश्रेष्ठों का तिरस्कार कर उन्हें पचा डाला, अतः उस पाप के फलस्वरूप मेरे द्वारा आप पच गए। राम ने कहा कि जो मुझ धर्मनित्य-जितेन्द्रिय का अपमान करता है, वह यह राक्षस भी वातापि की भाँति समाप्त हो जाएगा।

राम ने लक्ष्मण से कहा कि आप कवच धारण कर, सावधान होकर यहीं रहकर मैथिली की रक्षा कीजिए; हमारा भावी कार्य इसी पर निर्भर है। मैं इस मृग को मारूँगा या जीवित पकड़ूँगा। उन्होंने कहा कि वैदेही की मृगचर्म की स्पृहा देखिए; मैं शीघ्र मृग लाने जाता हूँ। यह मृग अपने श्रेष्ठ चर्म के कारण आज न बचेगा; आप आश्रम में सीता के साथ अप्रमत्त रहिए, जब तक मैं एक ही बाण से इस पृषत को मारकर, चर्म लेकर शीघ्र लौटता हूँ। उन्होंने अन्त में कहा कि अति बलवान् और बुद्धिमान् पक्षी जटायु के साथ रहकर, हे लक्ष्मण, प्रत्येक क्षण सब ओर से शंकित होकर मैथिली की रक्षा करना।
सार: लक्ष्मण के सचेत करने पर भी सीता ने हठ किया, और राम ने वातापि-अगस्त्य का दृष्टान्त देकर मृग को वध्य घोषित किया; लक्ष्मण को सीता की रक्षा सौंपकर वे मृग के पीछे चल पड़े।
मारीच का वध और मायावी पुकार
भाई लक्ष्मण को यों सावधान कर, महातेजस्वी राम ने स्वर्ण-मूठ वाला खड्ग कमर में बाँधा, तीन वलयों वाला अपना अलंकार-स्वरूप धनुष लिया, दो तरकश कसे, और उग्र पराक्रम से चल पड़े। राजेन्द्र राम को आता देख वह मृगश्रेष्ठ मारीच भय से कभी ओझल हो जाता, कभी फिर दिख जाता। खड्ग बाँधे, धनुष लिए राम उस स्थान की ओर दौड़े जहाँ वह मृग अपने रूप से आगे प्रकाश-सा फैलाता खड़ा था। महावन में बार-बार पीछे देखता हुआ वह दौड़ता, कभी उछलकर निकल जाता, कभी अत्यन्त समीप आकर राम को पकड़ने को लुभाता। कभी राम के बाण से बिंधने के भय से व्याकुल होकर आकाश में उछलता-सा, कभी वन की गहराइयों में टूटे बादलों से घिरे शरद्-चन्द्र-सा छिप जाता, कभी पास दिखता, कभी अगले ही क्षण दूर चमकता। दिखता और ओझल होता हुआ वह कुख्यात मारीच राम को आश्रम से बहुत दूर खींच ले गया।

उससे ठगा गया, विवश और मोहित राम कुपित हुआ, और अत्यन्त थककर एक वृक्ष की छाया में हरी घास पर खड़ा हुआ। वह मृगरूपधारी राक्षस उसे उन्मादित करता रहा, और अन्य मृगों से घिरकर पास ही दिख जाता। पकड़ने को उद्यत राम को देख वह फिर भागा और त्रास से ओझल हो गया। फिर दूर वृक्ष-समूह से निकला, तब महातेजस्वी राम ने उसे मारने का दृढ़ निश्चय किया। क्रुद्ध राघव ने सूर्य-किरण-सा देदीप्यमान, शत्रुमर्दन, ज्वलित बाण निकाला, उसे दृढ़ धनुष पर सन्धान कर, उसी मृग को लक्ष्य कर, बलपूर्वक धनुष खींचा, और फुफकारते सर्प-से, ब्रह्मा द्वारा निर्मित उस ज्वलित दीप्त अस्त्र को छोड़ा। वह उत्तम बाण बिजली-सा चमकता हुआ मृगरूप के शरीर को भेदकर मारीच के हृदय में जा घुसा। ताल-वृक्ष-सा ऊँचा उछलकर, अत्यन्त आहत वह मृग भूमि पर गिरा और भैरव नाद कर उठा; मरते समय मारीच ने वह कृत्रिम रूप त्याग दिया।
रावण का वचन स्मरण कर उस राक्षस ने सोचा कि किस उपाय से सीता लक्ष्मण को यहाँ भेजे और एकान्त होने पर रावण उसे हर ले। प्राप्त-काल जानकर उसने राघव के स्वर के समान स्वर में पुकारा, “हा सीते! हा लक्ष्मण!” उस अनुपम बाण से मर्म में बिंधा वह मारीच मृगरूप त्यागकर अपना विशाल राक्षस-रूप धरकर प्राण त्यागने लगा। भूमि पर गिरे, भयानक-दर्शन, रक्त-सने अंगों वाले, तड़पते उस राक्षस को देखकर राम लक्ष्मण के वचन स्मरण करते हुए मन ही मन सीता की ओर मुड़ गए। उन्होंने सोचा कि लक्ष्मण ने पहले ही जिसे कहा था, यह वही मारीच की माया थी; आज वह सत्य निकली और मैंने मारीच को मारा। यह राक्षस “हा सीते! हा लक्ष्मण!” के महान् स्वर से चिल्लाकर मरा है; इसे सुनकर सीता की क्या दशा होगी, और महाबाहु लक्ष्मण किस अवस्था में पड़ेगा। यों सोचकर धर्मात्मा राम के रोम (सीता के भविष्य की आशंका से) खड़े हो गए। उस मृगरूपी राक्षस को मारकर और उसका वह स्वर सुनकर विषाद से उपजा तीव्र भय राम को घेर बैठा। फिर एक अन्य पृषत (चितकबरे मृग) को मारकर, तापसों के योग्य आहार लेकर राम शीघ्रता से जनस्थान की ओर अपने आश्रम लौट चले।
सार: राम के एक ही बाण से मारीच मारा गया और उसने मृगरूप त्याग दिया; मरते-मरते उसने राम के स्वर में “हा सीते! हा लक्ष्मण!” पुकारकर अपना अन्तिम छल पूरा किया, जिससे राम का मन आशंका से भर उठा।
सीता का आग्रह और लक्ष्मण का प्रस्थान
वन में सुनी उस आर्त पुकार को अपने पति का-सा जानकर सीता ने लक्ष्मण से कहा कि जाइए, राघव का पता लगाइए; मेरा जीवन और हृदय यथास्थान नहीं रह रहे, मैंने किसी अत्यन्त आर्त के अत्यन्त ऊँचे स्वर में रोने की आवाज़ सुनी है। उसने कहा कि वन में आर्त-स्वर से रोते अपने भाई की रक्षा कीजिए; जैसे सिंहों के बीच गोवृष, वैसे राक्षसों के वश में पड़े, शरण चाहते अपने भाई की ओर शीघ्र दौड़िए। पर भाई की आज्ञा (सीता को अकेली न छोड़ने की) स्मरण कर, यों कहे जाने पर भी लक्ष्मण नहीं गया।
तब क्षुब्ध होकर जनकात्मजा ने उससे कहा कि हे सौमित्रि, आप भाई के मित्र-रूप में शत्रु हैं, जो इस अवस्था में भी भाई की सहायता को नहीं जाते; मेरे लिए आप राम को नष्ट होते देखना चाहते हैं। उसने कहा कि लोभवश मेरे लिए ही आप राघव का अनुगमन नहीं करते; मैं समझती हूँ कि आपको भाई का व्यसन प्रिय है और आपके मन में उसके प्रति स्नेह नहीं। उसने कहा कि महाद्युतिमान् राम को न देखकर भी आप निश्चिन्त खड़े हैं; जिसके नेतृत्व में आई, वही संकट में पड़ा हो तो यहाँ रहकर मेरा क्या होगा।
आँसुओं और शोक से भरी, मृगवधू-सी त्रस्त वैदेही से जितेन्द्रिय लक्ष्मण ने कहा कि हे वैदेही, आपके पति को नाग, असुर, गन्धर्व, देव, दैत्य या राक्षस नहीं जीत सकते; देव-मनुष्य, गन्धर्व, पक्षी, राक्षस, पिशाच, किन्नर, मृग और घोर दानवों में कोई ऐसा नहीं जो इन्द्र-तुल्य राम से रण में भिड़ सके; राम रण में अवध्य है, आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। उसने कहा कि राम के बिना मैं आपको वन में छोड़ने का साहस नहीं करता; उसका बल बलवानों की सेनाओं से, यहाँ तक कि ब्रह्मा-विष्णु-शिव सहित तीनों लोकों से भी अनिवार्य है; आपका हृदय शान्त हो, सन्ताप त्यागिए। उसने कहा कि श्रेष्ठ मृग को मारकर आपके पति शीघ्र लौटेंगे; स्पष्ट है कि वह न राम का स्वर था, न किसी देवता का। वह उस राक्षस की माया थी, आकाश में दिखते मायानगर-सी असत्य। उसने कहा कि हे वैदेही, आप महात्मा राम द्वारा मेरे पास न्यास (धरोहर) रखी गई हैं, मैं आपको अकेली छोड़ने का साहस नहीं करता। खर के वध और जनस्थान-संहार से इन राक्षसों ने हमें शत्रु बना लिया है; हिंसा को विहार समझने वाले राक्षस महावन में नाना स्वर बोलते हैं, अतः आप चिन्ता न कीजिए।
लक्ष्मण के यों कहने पर क्रुद्ध, रक्तनेत्र सीता ने सत्यवादी लक्ष्मण से कठोर वचन कहे। उसने कहा कि हे अनार्य, करुणाहीन, नृशंस, कुलकलंक, मैं समझती हूँ कि आपको राम का महान् व्यसन प्रिय है; राम का संकट देखकर ही आप ऐसे वचन बोलते हैं। उसने कहा कि आप जैसे नृशंस, सदा छिपकर विचरने वाले शत्रुओं में ऐसी पाप-वृत्ति आश्चर्य नहीं। उसने तीव्र आरोप लगाया कि आप बड़े दुष्ट हैं जो अकेले राम के पीछे वन में आए, मेरे लिए छिपे उद्देश्य से, अथवा भरत द्वारा भेजे गए। उसने कहा कि आपका या भरत का वह उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा; इन्दीवर-श्याम, कमलनयन राम को पति-रूप में पाकर मैं आप जैसे पृथग्जन (साधारण मनुष्य) की कैसे कामना करूँगी; आपके सामने ही मैं निःसन्देह प्राण त्याग दूँगी; राम के बिना मैं भूतल पर क्षण भर भी जीवित न रहूँगी।
रोमांचकारी कठोर वचन सुनकर जितेन्द्रिय लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मेरे लिए देवता हैं, मैं उत्तर देने का साहस नहीं करता। उसने कहा कि हे मैथिली, स्त्रियों का ऐसा अनुचित वचन कहना आश्चर्य नहीं, यही नारी-स्वभाव सब लोकों में देखा जाता है; धर्म से रहित, चपल, तीक्ष्ण और भेद डालने वाली स्त्रियाँ होती हैं। उसने कहा कि हे जनकात्मजे, तपे नाराच-से दोनों कानों के बीच धँसते आपके ये वचन मैं सह नहीं सकता; सब वनचर साक्षी होकर मेरे ये वचन सुनें कि न्याय कहने पर भी आपने मुझसे कठोर कहा। उसने कहा कि स्त्री-स्वभाव और दुष्ट प्रकृति से जो आप मुझ गुरु-वचन में स्थित को इस प्रकार शंकित करती हैं, और आज नष्ट होने को उद्यत हैं, उस आपको धिक्कार है। फिर उसने कहा कि मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ काकुत्स्थ हैं, आपका कल्याण हो, हे वराननी; आपकी रक्षा समस्त वनदेवता करें। मेरे सामने जो घोर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे मुझे शंका होती है कि राम के साथ लौटकर मैं आपको देख पाऊँगा या नहीं।

लक्ष्मण के यों कहने पर रोती हुई जनकात्मजा ने तीव्र आँसुओं में डूबी होकर कहा कि हे लक्ष्मण, राम के बिना मैं गोदावरी में प्रवेश कर जाऊँगी, या फाँसी लगा लूँगी, या किसी विषम (ऊँचे) स्थान से गिराकर अपना देह त्याग दूँगी; अथवा तीक्ष्ण विष पी लूँगी, या अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी, पर राघव के अतिरिक्त किसी पुरुष का स्पर्श कभी न करूँगी। यह कहकर शोक से भरी सीता दुःख से रोती हुई दोनों हाथों से अपना उदर पीटने लगी। आर्त-रूपा, रोती हुई उस विशालनेत्रा को देखकर खिन्न लक्ष्मण ने उसे आश्वासन दिया, पर सीता ने अपने उस देवर से कुछ भी न कहा। तब हाथ जोड़कर, कुछ झुककर सीता को नमस्कार कर, बार-बार मैथिली की ओर देखता हुआ आत्मवान् लक्ष्मण राम के समीप चला गया।
सार: मायावी पुकार सुनकर व्याकुल सीता ने लक्ष्मण को कठोर वचनों से ताड़ा; अन्ततः, उसके प्राण-त्याग की धमकी और अपशकुनों के बीच, लक्ष्मण विवश होकर राम की ओर चल पड़ा, सीता को अकेली छोड़कर।
रावण का परिव्राजक-वेश में आना

सीता के कठोर वचनों से कुपित राघवानुज लक्ष्मण, राम से मिलने को अत्यन्त उत्सुक, मानो शीघ्र ही चल पड़ा। तब अवसर पाकर परिव्राजक (भ्रमणशील संन्यासी) का रूप धरे दशग्रीव रावण वैदेही की ओर बढ़ा। स्वच्छ काषाय (गेरुआ) वस्त्र पहने, शिखाधारी, छत्र और उपानह (खड़ाऊँ) लिए, बाएँ कन्धे पर शुभ यष्टि (दण्ड) और कमण्डलु टाँगे, वह परिव्राजक-रूप में वैदेही के पास पहुँचा। दोनों भाइयों से रहित वन में सीता के पास वह अति-बलवान् रावण वैसे ही पहुँचा जैसे सूर्य-चन्द्र से रहित सन्ध्या को घोर अन्धकार घेर ले। उस उग्र पापकर्मा को देखकर जनस्थान के वृक्ष काँपना बन्द कर गए, वायु बहना रुक गई; रक्तनेत्र उसे देखती हुई शीघ्रगामिनी गोदावरी भी भय से मन्द बहने लगी। राम के दूर रहने का अवसर पाकर भिक्षु-रूप में रावण वैदेही के पास पहुँचा। शुभ-रूप में वह अशुभ रावण, पति का शोक करती वैदेही के पास वैसे ही गया जैसे शनैश्चर चित्रा-नक्षत्र के पास जाए, अथवा घास से ढका कुआँ अकस्मात् शुभ-रूप में दिखे।
राम की पत्नी, रुचिर दाँत-ओठ वाली, पूर्णचन्द्र-सी मुख वाली, पीत-कौशेय (पीला रेशमी वस्त्र) पहने, पर्णशाला में बैठी, आँसू-शोक से पीड़ित उस कमलनयना वैदेही के पास हर्षितचित्त रावण पहुँचा। उसे देखते ही कामबाण से बिंधा रावण, ब्राह्मण-घोष (वेदपाठ) उच्चारता हुआ, उस एकान्त में विनम्र वचन बोलने लगा। उसने उस त्रिलोक-श्रेष्ठ, कमलरहित लक्ष्मी-सी शोभा वाली स्त्री की प्रशंसा की। उसने कहा कि रजत-स्वर्ण-सी आभा वाली, पीत-कौशेय पहने, कमलिनी-सी शुभ कमल-माला धारण किए हे शुभानने, क्या आप ह्री हैं, श्री हैं, कीर्ति हैं, शुभ लक्ष्मी हैं, या अप्सरा, या भूति, या स्वेच्छाचारिणी रति। उसने उसके दाँतों, विशाल नेत्रों, जघन-ऊरु और अंगों की अनुचित स्तुति की (यह उसका कपट था), और कहा कि चारुस्मिते, चारुदति, चारुनेत्रे विलासिनी, आप मेरा मन वैसे ही हर लेती हैं जैसे जलधारा नदी का तट। उसने कहा कि न देवी, न गन्धर्वी, न यक्षी, न किन्नरी, न ऐसी मनुष्य-नारी मैंने भूतल पर पहले देखी; आपका रूप, सुकुमारता, यौवन और यह वन-वास मेरा चित्त मथ डालते हैं, अतः आप यहाँ से चली जाइए, आपका कल्याण हो, आपको यहाँ रहना उचित नहीं।

उसने कहा कि यह कामरूपी घोर राक्षसों का निवास है; आपके योग्य तो रमणीय प्रासाद-शिखर और नगर-उपवन हैं। उसने पूछा कि शाखामृग (वानर), सिंह, द्वीपी, व्याघ्र, वृक, ऋक्ष, तरक्षु और कंक यहाँ रहते हैं, इनसे आपको भय नहीं लगता; मद-भरे घोर हाथियों से इस महावन में अकेली रहकर आप कैसे नहीं डरतीं। आप कौन हैं, किसकी हैं, कहाँ से आई हैं, और किस कारण घोर राक्षस-सेवित दण्डक में अकेली विचरती हैं। महात्मा (इस छल-वेश में) रावण से यों प्रशंसित होकर, और उसे ब्राह्मण-वेश में आया देखकर, मैथिली ने उसका सब अतिथि-सत्कार किया। पहले आसन दिया, पाद्य से उसका स्वागत किया, और फिर उस सौम्य-दर्शन को कहा कि भोजन सिद्ध है। पात्र और कुसुम्भ (गेरुआ वस्त्र) धारण किए ब्राह्मण-वेश में आए को, ब्राह्मण-चिह्न देखकर उपेक्षा करने योग्य न मानकर, उसने ब्राह्मण की भाँति भोजन को निमन्त्रित किया। उसने कहा कि हे ब्राह्मण, यह बृसी (घास का आसन) है, इच्छानुसार बैठिए, यह पाद्य ग्रहण कीजिए; और यह आपके लिए तैयार उत्तम वनोत्पन्न अन्न यहीं निश्चिन्त होकर ग्रहण कीजिए।
पूर्ण निमन्त्रण-सूत्र बोलने वाली उस नरेन्द्र-पत्नी मैथिली को निमन्त्रित होकर देखते हुए रावण ने उसके बलपूर्वक हरण में अपना मन दृढ़ कर लिया, और इस प्रकार अपने ही वध को निमन्त्रण दे दिया। तब, मृगया से सुन्दर-वेश में लक्ष्मण सहित लौटते अपने पति की प्रतीक्षा करती सीता ने चारों ओर दृष्टि डाली, पर उस विशाल हरे-भरे वन में राम-लक्ष्मण को न देखा।
सार: लक्ष्मण के जाते ही रावण परिव्राजक-वेश में सीता के पास पहुँचा; प्रकृति तक भय से ठहर गई। कपट-स्तुति के बीच सीता ने उसे अतिथि मानकर सत्कार किया, पर पति-देवर को कहीं न पाकर सशंकित हुई।
सीता का परिचय और रावण का प्रस्ताव
हरण की इच्छा से परिव्राजक-वेश में पूछने पर वैदेही ने अपना परिचय स्वयं दिया। यह सोचकर कि ब्राह्मण और अतिथि होने से यह न बताने पर शाप दे सकता है, सीता मुहूर्त भर विचारकर बोली कि मैं महात्मा मिथिलापति जनक की पुत्री हूँ, सीता नाम से, राम की प्रिय महिषी (पटरानी); आपका कल्याण हो। उसने कहा कि बारह वर्ष इक्ष्वाकु-वंशियों के भवन में मानुषी भोग भोगते हुए, सब कामनाओं की समृद्धि के बीच मैं रही। तेरहवें वर्ष राजा ने मन्त्रियों सहित राम के अभिषेक का निश्चय किया। पर अभिषेक की तैयारी होते ही मेरी सास केकयी ने अपने पति से वर माँगा।
सीता ने कहा कि सुकृत (धर्म) की दुहाई से ससुर को बाँधकर केकयी ने सत्यसन्ध नृपश्रेष्ठ से दो वर माँगे, मेरे पति का प्रव्रजन (वनवास) और भरत का अभिषेक; और कहा कि यदि आज राम का अभिषेक हुआ तो वह न खाएगी, न सोएगी, न पिएगी, यही उसके जीवन का अन्त होगा। ससुर ने उसे लोभनीय पदार्थों से मनाया, पर उसने याचना न छोड़ी। उसने कहा कि उसके महातेजस्वी पति वनवास के समय पच्चीस वर्ष से अधिक के थे, और उसकी अपनी आयु जन्म से अठारह वर्ष गिनी जाती थी। राम सत्यवान्, शीलवान्, शुचि, विशालाक्ष, महाबाहु और सर्वभूतहित-रत हैं; फिर भी केकयी का प्रिय करने के लिए, स्वयं कामार्त पिता दशरथ ने राम का अभिषेक नहीं किया। अभिषेक के लिए पिता के पास आए राम से केकयी ने शीघ्र कहा कि आपके पिता की यह आज्ञा सुनिए, भरत को निष्कण्टक राज्य देना है और आपको चौदह वर्ष वन में रहना है; अतः वन को जाकर पिता को असत्य से बचाइए। राम ने निर्भय होकर “ऐसा ही हो” कहा और दृढ़व्रत होकर वैसा ही किया; वह सदा देते हैं, ग्रहण नहीं करते, सत्य बोलते हैं, असत्य नहीं।
सीता ने कहा कि राम का यह अनुपम व्रत है। उनका वीर्यवान् वैमात्र (सौतेला) भाई लक्ष्मण, नरश्रेष्ठ, रण में शत्रुहन्ता, राम का सहायक है। वह दृढ़व्रत, ब्रह्मचारी भाई धनुष लिए, मेरे और राम के साथ निर्वासन में चला। जटाधारी, तापस-रूप में, धर्मनित्य, दृढ़व्रत राम अनुज और मेरे साथ दण्डकारण्य में आए। केकयी के कारण राज्य से च्युत हम तीनों यहाँ अपने ओज से गम्भीर वन में विचरते हैं। उसने कहा कि हे द्विजश्रेष्ठ, मुहूर्त भर विश्राम कीजिए, यदि यहाँ रहना सम्भव हो; मेरे पति बहुत-से रुरु, गोधा और वराह मारकर, प्रचुर वन्य आहार लेकर शीघ्र आएँगे। फिर उसने पूछा कि अब आप यथार्थ अपना नाम, गोत्र और कुल बताइए, और यह भी कि हे द्विज, आप दण्डकारण्य में अकेले किसलिए विचरते हैं।

राम-पत्नी सीता के यों कहते ही महाबली राक्षसाधिप रावण ने तीव्र उत्तर दिया कि जिससे देव-असुर-मनुष्य सहित समस्त लोक भयभीत हैं, वह राक्षसगणेश्वर रावण मैं ही हूँ, हे सीते। उसने कहा कि स्वर्ण-सी आभा वाली, कौशेय पहने आपको देखकर मुझे अपनी पत्नियों में अब रति नहीं रहती; इधर-उधर से लाई अनेक उत्तम स्त्रियों में आप मेरी अग्रमहिषी (पटरानी) बनिए, आपका कल्याण हो। उसने कहा कि समुद्र के मध्य, पर्वत-शिखर पर बसी, सागर से घिरी लंका नाम की मेरी महानगरी है; वहाँ आप मेरे साथ वनों में विचरेंगी और इस वन-वास की स्पृहा न करेंगी। पाँच सहस्र सर्वाभरण-भूषित दासियाँ आपकी सेवा करेंगी, यदि आप मेरी भार्या बनेंगी।
समझने की कुंजी (आयु): सीता स्वयं बताती है कि वनवास के समय राम की आयु पच्चीस वर्ष से अधिक और उसकी अपनी आयु अठारह वर्ष थी। यह वाल्मीकि-पाठ की वही गणना है जो आगे की कथा के समय-क्रम को आधार देती है।
सार: सीता ने सरलता से अपना परिचय और वनवास का कारण कह सुनाया; तब रावण ने अपना असली नाम प्रकट कर उसे लंका की पटरानी बनने का प्रस्ताव दिया।
सीता की फटकार और रावण का बल-गर्व
यों कहने पर कुपित जनकात्मजा अनवद्यांगी सीता ने उस राक्षस का अनादर कर उत्तर दिया कि मैं महागिरि-सी अकम्प्य, महेन्द्र-सदृश, महोदधि-सी अक्षोभ्य अपने पति राम की अनुव्रता हूँ। सर्वलक्षण-सम्पन्न, न्यग्रोध-परिमण्डल (वट-सा विस्तृत), सत्यसन्ध, महाभाग, महाबाहु, सिंह-सी चाल वाले, सिंह-सी छाती वाले, पूर्णचन्द्र-सी मुख वाले, पृथु-यश राम की मैं अनुव्रता हूँ। उसने फटकारा कि आप गीदड़ होकर मुझ दुर्लभ सिंही को चाहते हैं; आप मुझे सूर्य की प्रभा-सा स्पर्श भी नहीं कर सकते। उसने कहा कि हे मन्दभाग्य, जो राघव की प्रिय भार्या को चाहते हैं, आप निश्चय ही अनेक स्वर्ण-वृक्ष देख रहे हैं (अर्थात् मृत्यु-निकट का अपशकुन)। उसने कहा कि भूखे, पराक्रमी, मृगशत्रु सिंह के मुख से दाँत निकालना चाहते हैं, आशीविष सर्प के मुख से दाढ़ निकालना चाहते हैं, मन्दर पर्वत हाथ से उठाना चाहते हैं, कालकूट विष पीकर सकुशल जाना चाहते हैं, सूई से आँख पोंछना और जिह्वा से उस्तरा चाटना चाहते हैं, जो राम की प्रिय भार्या को पाना चाहते हैं।
उसने आगे कहा कि गले में शिला बाँधकर समुद्र तैरना चाहते हैं, दोनों हाथों से सूर्य-चन्द्र छीनना चाहते हैं, जलती अग्नि को वस्त्र में लेकर ले जाना चाहते हैं, और लोहे की नोकवाली शूलों के अग्र पर चलना चाहते हैं, जो राम की सदृश भार्या को पाना चाहते हैं। उसने कहा कि वन में सिंह और गीदड़, झरने और समुद्र, अमृत और सौवीरक (खट्टा-कसैला पेय), स्वर्ण और सीसे जैसी हीन धातु, चन्दन और कीचड़, हाथी और बिलाव, गरुड़ और कौआ, मयूर और मद्गु (जल-पक्षी), हंस और गृध्र में जो अन्तर है, वही अन्तर दाशरथि राम और आप में है। उसने अन्त में कहा कि जब तक धनुष-बाण-हस्त, सहस्राक्ष-सम-प्रभाव राम जीवित है, तब तक आप मुझे हर भी ले जाएँ तो रोक न सकेंगे, जैसे मक्खी द्वारा निगला घी (अन्ततः उसी की मृत्यु बनता है)।

यों अति-तीखे वचन उस निशाचर से कहकर, जिसके मन में कोई दुष्ट भाव न था, वह कृशांगी सीता काँपती हुई व्यथित हो गई, वायु से हिलते केले के पौधे-सी। उसे काँपती देखकर मृत्यु-सम प्रभाव वाले रावण ने उसे डराने के लिए अपना कुल, बल, नाम और कर्म कह सुनाया।
उसने ललाट पर भौंह चढ़ाकर कहा कि हे वरवर्णिनी, आपका कल्याण हो; मैं विश्रवा-पुत्र कुबेर का सौतेला भाई दशग्रीव प्रतापवान् रावण हूँ, जिससे देव, गन्धर्व, पिशाच, पतंग और नाग सदा मृत्यु-सी भय से भागते हैं; जिसने किसी कारणवश सौतेले भाई कुबेर को द्वन्द्व में पराक्रम से जीत लिया था। उसने कहा कि मेरे भय से कुबेर अपना समृद्ध आवास छोड़कर कैलास पर रहता है; उसका पुष्पक नामक इच्छानुसार चलने वाला शुभ विमान मैंने पराक्रम से छीन लिया, जिससे मैं आकाश में विचरता हूँ। उसने कहा कि मुझे क्रुद्ध देखकर इन्द्र आदि देवता भयभीत होकर भाग जाते हैं; जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ वायु शंकित होकर मन्द बहती है, सूर्य भी भय से चन्द्र-सा शीतल हो जाता है, वृक्षों के पत्ते निश्चल और नदियों का जल स्तब्ध हो जाता है।
उसने अपनी लंका का वर्णन किया, समुद्र-पार, अमरावती-सी शुभ, घोर राक्षसों से भरी, श्वेत प्राकार से घिरी, स्वर्ण के भीतरी कक्ष और वैदूर्य के तोरण वाली, हाथी-घोड़े-रथों से व्याप्त, तूर्य-नादों से गुंजित, सर्वकाम-फल वृक्षों और उद्यानों से सजी। उसने कहा कि हे सीते, राजपुत्री, वहाँ आप मेरे साथ रहिए, मानुषी स्त्रियों को फिर स्मरण न करेंगी; मानुषी और दिव्य भोग भोगते हुए गतायु मनुष्य राम को न स्मरण करेंगी। उसने पूछा कि देवनमस्कृत देव कुबेर को राज्य से हटाकर, अपने प्रिय पुत्र भरत को राज्य पर बैठाकर पिता दशरथ द्वारा वन भेजे गए, मन्दवीर्य, भ्रष्टराज्य, गतचेतन तापस राम से आप क्या करेंगी, हे विशालाक्षी। स्वयं आए राक्षसपति मुझे चाहिए; मन्मथ-बाण से बिंधे मुझे ठुकराना आपको उचित नहीं; मुझे ठुकराकर आप वैसे ही पश्चात्ताप पाएँगी जैसे उर्वशी ने पुरूरवा को चरण से ठुकराकर पाया।
यों कहने पर क्रुद्ध, रक्तनेत्र वैदेही ने उस एकान्त में राक्षसाधिप से कठोर वचन कहे। उसने कहा कि सब देवों से वन्दित देव कुबेर को, अपने भाई को बहाना बनाकर आप कैसे यह अशुभ करना चाहते हैं। उसने कहा कि जिनका आप जैसा कठोर, दुर्बुद्धि, अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य नष्ट होंगे। उसने कहा कि इन्द्र की भार्या शची को हरकर भी जीवित रहना सम्भव है, पर राम की भार्या मुझे हरकर आप सकुशल न रहेंगे; पीयूष पीकर भी इन्द्र की अप्रतिरूपा शची को धर्षित कर चिरकाल जीवित रहना सम्भव हो, पर मुझ-सी को धर्षित कर आपको मोक्ष (छुटकारा) नहीं।
सार: सीता ने अपने पातिव्रत्य के बल पर रावण को सिंह-गीदड़ आदि अनेक उपमाओं से लज्जित किया; रावण ने अपना कुल, बल और लंका का गर्व बघारकर उसे डराना चाहा, पर सीता अडिग रही।
सीता का हरण और जटायु का दर्शन
सीता का वचन सुनकर प्रतापवान् दशग्रीव हाथ पर हाथ पटककर अपना विशाल रूप धरने लगा। वाणी-निपुण उसने मैथिली से फिर कहा कि उन्मत्त-सी आपने मेरे वीर्य-पराक्रम नहीं सुने जान पड़ता; आकाश में खड़ा होकर मैं भुजाओं से पृथ्वी उठा सकता हूँ, समुद्र को पी सकता हूँ, रण में मृत्यु को भी मार सकता हूँ; तीक्ष्ण बाणों से सूर्य को व्यथित और भूतल को विदीर्ण कर सकता हूँ; हे रूप-गर्व में उन्मत्त, कामरूपी मुझ कामरूपी को देखिए। यों कहते रावण की क्रुद्ध, अग्नि-सी आभा वाली आँखें श्याम कोरों में लाल होकर अग्नि-सी जलने लगीं।
तत्क्षण सौम्य रूप त्यागकर विश्रवा-पुत्र रावण ने अपना मूल, काल-सा भयानक रूप धर लिया। रक्तनेत्र, तपे स्वर्ण के आभूषणों वाला, महाक्रोध से भरा वह श्रीमान् रावण नील मेघ-सा दिखने लगा। परिव्राजक का वह छद्म त्यागकर महाकाय निशाचर दस मुख और बीस भुजाओं वाला हो गया। राक्षसाधिप रावण ने अपना स्वरूप धरकर, स्त्री-रत्न मैथिली को देखते हुए, लाल वस्त्र पहने खड़ा हो गया। श्याम केश-छोर वाली, वस्त्र-आभूषणों से युक्त, सूर्य-प्रभा-सी चमकती उस मैथिली से रावण बोला कि यदि तीनों लोकों में विख्यात पति चाहती हैं तो मेरी शरण आइए, हे वरारोहे; मैं आपके योग्य पति हूँ। चिरकाल मुझे भजिए, मैं आपका श्लाघ्य पति हूँ, मैं कभी आपका अप्रिय न करूँगा। मानुषी भाव त्यागिए, मुझमें भाव लगाइए; राज्यच्युत, असिद्धार्थ, परिमित-आयु राम में किन गुणों से अनुरक्त हैं, हे मूढ़े, पण्डित-मानिनी, जो स्त्री के वचन से राज्य और सुहृद् छोड़कर इस व्यालों से भरे वन में बसता है।

मैथिली से, जो सब के प्रति प्रिय बोलती और सब से प्रिय वचन पाने योग्य थी, यह कहकर, और पास जाकर, काम-मोहित दुष्टात्मा रावण ने सीता को वैसे ही पकड़ा जैसे बुध आकाश में रोहिणी को पकड़े। बाएँ हाथ से उसने कमलनयना सीता को केशों से पकड़ा, और दाहिने हाथ से ऊरुओं से। पर्वत-शिखर-से, तीक्ष्ण दाँत और महाभुज वाले, मृत्यु-से उस रावण को देखकर भयार्त वनदेवता भाग खड़े हुए। उसी समय पास ही रावण का वह प्रसिद्ध मायामय, खच्चरों से जुता, खर-स्वर वाला, स्वर्ण-अंग महान् रथ आ खड़ा हुआ। तब कठोर वचनों से सीता को धमकाकर, महान् नाद करता रावण उसे गोद में उठाकर रथ पर चढ़ा लाया।
रावण द्वारा पकड़े जाने पर यशस्विनी सीता दुःख से आर्त होकर वन में दूर गए राम को “राम!” कहकर ऊँचे स्वर से पुकारने लगी। न मिलने को इच्छुक, नागराज-वधू-सी तड़पती सीता को लेकर कामार्त रावण आकाश में उड़ गया। आकाश-मार्ग से हरी जाती सीता उन्मत्त-सी, भ्रान्तचित्त आतुरा-सी जोर से रो उठी। उसने पुकारा कि हे महाबाहु लक्ष्मण, अपने गुरु (बड़े भाई) के चित्त को प्रसन्न करने वाले, कामरूपी राक्षस द्वारा हरी जाती मुझे आप नहीं जानते। उसने राम को सम्बोधित कर कहा कि धर्म के लिए सुख-अर्थ और प्राण तक त्यागने वाले हे राघव, अधर्म से हरी जाती मुझे आप नहीं देखते। उसने रावण से कहा कि अविनीत के कर्म का फल तुरन्त नहीं दिखता, पर फसल के पकने की भाँति काल भी उसमें भाग लेता है; काल से चेतना नष्ट होने पर आपने यह कर्म किया है, अतः राम से जीवनान्त-कारी घोर व्यसन पाएँगे।
उसने कहा कि अब केकयी बन्धु-बान्धवों सहित सकाम (इच्छापूर्ण) हुई, जो मैं धर्मकाम यशस्वी की धर्मपत्नी हरी जा रही हूँ। फिर उसने जनस्थान के फूले हुए कर्णिकार वृक्षों को सम्बोधित कर कहा कि राम से शीघ्र कहना कि रावण सीता को हर रहा है। हंस-सारस से गुंजित गोदावरी नदी को वन्दन कर उसने कहा कि शीघ्र राम से कहना कि रावण सीता को हर रहा है। इस वन के नाना-वृक्ष-वासी देवताओं को नमस्कार कर उसने प्रार्थना की कि मेरे पति से मेरे हरण की बात कहना। फिर उसने इस वन के मृग-पक्षियों की समस्त सत्त्व-जातियों की शरण लेकर कहा कि पति से कहना कि उनकी प्राणों से प्रिय सीता विवश होकर रावण द्वारा हरी गई। उसने कहा कि महाबाहु, महाबली राम यह जानकर, परलोक तक से भी मुझे, यमहृता को भी, पराक्रम से लौटा लाएँगे।

यों करुण वचन विलाप करती, अत्यन्त दुःखी, आयतलोचना सीता ने वनस्पति (वृक्ष) पर बैठे गृध्र (गिद्ध) जटायु को देखा। रावण के वश में पड़ी सुश्रोणी सीता उसे ऊपर देखती हुई, भय से व्याकुल, दुःख से रुँधे स्वर से चिल्लाई कि हे आर्य जटायु, इस पापकर्मा राक्षसराज द्वारा अनाथ-सी निर्दयता से हरी जाती मुझे देखिए। उसने कहा कि यह क्रूर निशाचर आपके रोकने योग्य नहीं, क्योंकि यह सत्त्व और विजय-गर्व से भरा, आयुधधारी और दुर्बुद्धि है। फिर भी, हे जटायु, मेरा हरण और जो कुछ कहने योग्य हो, वह सब आप यथार्थ रूप में राम और लक्ष्मण से पूरा-पूरा कह दीजिए।
उधर उस समय सोया हुआ जटायु वह शब्द सुनकर जागा। उसने तुरन्त रावण को देखा और वैदेही को भी देखा। पर्वत-शिखर-सी आभा वाला, तीक्ष्ण चोंच वाला वह खगश्रेष्ठ श्रीमान् जटायु वृक्ष पर बैठे-बैठे ही रावण से शुभ वाणी बोलने को उद्यत हुआ।
सार: रावण ने अपना भयानक स्वरूप धरकर सीता को बलपूर्वक रथ पर उठा लिया और आकाश-मार्ग से उड़ चला; विलाप करती सीता ने वृक्षों, नदी, देवताओं और जीव-जन्तुओं से राम तक सन्देश पहुँचाने की पुकार की, और तभी उसकी दृष्टि वृक्ष पर बैठे गृध्रराज जटायु पर पड़ी, जो अब रावण को रोकने को उद्यत हुआ।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, अरण्यकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।