लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

रावण

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पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग

एक राक्षस जिसने ब्रह्मा से माँगे वर में मनुष्य को गिना ही नहीं, काव्य में पहली बार तब बोलता है जब एक मनुष्य उसके चौदह हज़ार राक्षस मार चुका है; उसके बाद का सब कुछ उसी छूटे हुए नाम का हिसाब है।

लंका का सभा-भवन, और सामने अकम्पन खड़ा है, जनस्थान से बचकर आया हुआ। अरण्यकाण्ड का सर्ग 31 रावण को उसके अपने पहले शब्द एक प्रश्न के रूप में देता है। अकम्पन ने बताया है कि दशरथ के एक तरुण पुत्र ने खर और दूषण को मार गिराया; “रावण फुफकार उठा, जैसे कोई काला नाग छेड़ दिया गया हो।” “बोलिए अकम्पन, क्या वह राम इन्द्र और सारे देवताओं को साथ लेकर जनस्थान आया था?” उत्तर यह है कि कोई देवता साथ नहीं था, और उस मनुष्य को रण में कोई नहीं जीत सकता; उसकी मृत्यु का एक ही उपाय है, “सीता के बिना राम किसी हाल जीवित नहीं रहेंगे।” रावण कुछ देर सोचता है। “कल प्रातः हम अकेले, केवल अपने सारथि के साथ जाएँगे, और वैदेही को प्रसन्न मन इस महानगरी में ले आएँगे।” मारीच के आश्रम में उसे सुनना पड़ता है, “सोए हुए उस सिंह को आप न जगाइए,” और वह लौट आता है। काव्य में रावण का यह पहला दृश्य है: एक प्रश्न, एक निश्चय, और एक बार लौट जाना।

उसका जन्म काव्य बहुत बाद में, उत्तरकाण्ड के सर्ग 9 में, अगस्त्य के मुख से सुनाता है। सुमाली की पुत्री कैकसी पिता की आज्ञा से विश्रवा के पास जाती है, उस भयावनी वेला में जब मुनि अग्निहोत्र कर रहे हैं, और मुनि कह देते हैं, “सुन्दरी, आप क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों को जन्म देंगी।” जो जन्मता है, उसके “दस सिर, बड़ी बड़ी दाढ़ें… बीस भुजाएँ” हैं; मेघ रक्त बरसाते हैं, और पिता नाम रखते हैं, “दस ग्रीवाओं के साथ जन्मा है, इसलिए दशग्रीव।” एक दिन कुबेर पुष्पक पर बैठे पिता से मिलने आते हैं, और माँ बेटे से कहती हैं, “बेटा, अपने भाई वैश्रवण को देखिए, तेज से कैसे भरे हैं। और फिर अपने को देखिए: भाई होकर, उनके बराबर होकर भी, कैसे दीन हैं।” उसी जलन से गोकर्ण का तप निकलता है: दस हज़ार वर्ष निराहार, हर हज़ार पर एक सिर अग्नि में, और दसवाँ काटने को हाथ उठा ही था कि ब्रह्मा सामने हैं। “हम अमरत्व माँगते हैं।” “पूर्ण अमरत्व आपके लिए सम्भव नहीं।” तब दूसरी माँग, “सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवता, इनमें से किसी के हाथों हमारी मृत्यु न हो,” और उसके पीछे वह वाक्य जो पूरे काव्य को चलाता है: “मनुष्य और उन जैसे प्राणियों को तो हम तिनका समझते हैं।” कुबेर लंका छोड़ देते हैं, दशग्रीव राजा बनता है, और वन में मय अपनी बेटी का हाथ उसके हाथ में रखते हैं, “इसका नाम मन्दोदरी है।”

जिसने सारे लोक को रुला दिया

सर्ग 16 में कुबेर को हराकर पुष्पक छीन चुका दशग्रीव एक पहाड़ पर रुक जाता है, क्योंकि विमान आगे नहीं बढ़ता। शिव के गण नन्दी कहते हैं, लौट जाइए, यहाँ शंकर विहार कर रहे हैं। “कौन है यह शंकर?” वानर जैसे मुख वाले नन्दी को देखकर वह ठहाका लगाता है, और शाप आता है: “आपने वानर-रूप में हमारा उपहास किया… इसलिए आपके कुल के नाश के लिए वानर जन्म लेंगे।” वह पहाड़ को ही उखाड़ने लगता है; महादेव पैर के अँगूठे से उसे दबा देते हैं, भुजाएँ नीचे पिस जाती हैं, और एक हज़ार वर्ष वह सामवेद के गीतों से शिव को मनाता है। प्रसन्न शिव कहते हैं, “पहाड़ के नीचे पिसते हुए आपने जो भयावनी चीख़ मारी, उससे डरकर तीनों लोकों के वासी रो उठे थे; इसलिए, राजन्, आपका नाम रावण होगा।” वह शिव से भी वही माँगता है जो ब्रह्मा से माँगा था, और वही छोड़ता है, “मनुष्यों को हम गिनते नहीं, प्रभु।” सर्ग 17 में हिमालय के वन में तप करती वेदवती उसे बताती हैं कि नारायण ही उनके पति हैं; वह उनके केश पकड़ लेता है। वे अग्नि में उतरती हैं, “आपके नाश के लिए हम फिर जन्म लेंगी,” और अगस्त्य राम को बताते हैं कि “हल की रेखा सीता कहलाती है; उसी से निकली, इसलिए मनुष्य उसे सीता कहते हैं।” सर्ग 19 में अयोध्या के अनरण्य रथ से गिरते हुए कहते हैं, “हमें काल ने गिराया है; आप तो मृत्यु के हाथ का एक निमित्त भर हैं,” और शाप देते हैं कि इसी कुल में “दशरथ के पुत्र जन्म लेंगे, राम नाम से; वही आपके प्राण हरेंगे।” सर्ग 26 में कैलास की रात रम्भा पर बल करने के बाद नलकूबर का शाप मिलता है कि अनिच्छुक स्त्री पर बल करते ही “उसी क्षण उसका सिर सात टुकड़ों में फट जाएगा,” और “दशग्रीव ने अनिच्छुक स्त्रियों के प्रति संगम का भाव त्याग दिया।”

एक मनुष्य, और एक तिनका

अरण्यकाण्ड के सर्ग 32 में शूर्पणखा कटा हुआ मुख लेकर भरी सभा में आती है, और रावण का पहला प्रश्न फिर वही है, “कौन है यह राम?” बहन के खींचे चित्र में सीता भी हैं, और सर्ग 35 में वह दूसरी बार मारीच के पास पहुँचता है। “तात मारीच, हमारी बात सुनिए। हम दुखी हैं।” “एक मनुष्य ने, पैदल, अपने जलते बाणों से चौदह हज़ार उग्र राक्षस काट डाले।” योजना यह है कि मारीच सोने का मृग बने, दोनों भाई दूर निकलें, और वह सीता को “वैसे ही सहज उठा ले जाएँगे जैसे राहु चाँद की चाँदनी हर लेता है।” सर्ग 46 से 49 में संन्यासी के भेस में आया रावण अपना परिचय देता है: “सीते, देवताओं, दानवों और मनुष्यों समेत सारा जगत् जिससे थर्राता है, वह राक्षसों का स्वामी रावण हम ही हैं।” सीता उसे गीदड़ कहती हैं जो सिंहनी चाहता है, और वह अपना बल गिनाता है, “वह मनुष्य राम रण में हमारी एक उँगली के बराबर भी नहीं।” फिर सौम्य रूप उतर जाता है, “दस मुख और बीस भुजाओं वाला महाकाय,” और “बाएँ हाथ से उसने कमलनयनी सीता के केश पकड़े, दाहिने से उनकी जाँघें।” आकाश में उड़ते रथ पर सीता उससे कहती हैं कि “अनाज के पकने की तरह कर्म के फल में भी समय अपना काम करता है।”

सुन्दरकाण्ड के सर्ग 10 में हनुमान उसे पहली बार सोता हुआ देखते हैं: “उस पलंग पर रावण सो रहा था।” फैली हुई दो भुजाओं पर “ऐरावत के दाँतों की नोक से लगे घावों के चिह्न थे, कन्धों का मांस इन्द्र के वज्र से चिरा था, और विष्णु के चक्र की चोट भी उन पर थी।” सर्ग 20 से 22 में वह अशोक-वाटिका में आता है और अपना मन खोलता है: “परस्त्री के पास जाना या बल से उसे हर ले जाना, यह राक्षसों का सदा का स्वधर्म रहा है,” पर “मैथिली, जब तक आप मुझे न चाहें, मैं आपको छूऊँगा नहीं।” सीता अपने और उसके बीच एक तिनका रखकर उत्तर देती हैं, और वह कहता है, “आप पर जो प्रेम उठा है, वही मेरे क्रोध को रोक रहा है।” फिर अवधि: “दो माह बीतने पर भी यदि आप मुझे पति न मानें, तो मेरे रसोइए मेरे सुबह के भोजन के लिए आपको टुकड़े-टुकड़े काट देंगे।” सर्ग 48 से 53 में बँधे हुए हनुमान को सामने देखकर उसके भीतर एक पुराना खटका जागता है, “कहीं यह स्वयं भगवान नन्दी तो नहीं… जिसने मुझे शाप दिया था?” दूत कहता है, “श्रीराम न देवता हैं, न यक्ष, न राक्षस; वे मनुष्य हैं,” और “मृत्यु का यह पाश, जो सीता के रूप में आपने अपने ही गले में डाल लिया है, उतार दीजिए।” रावण वध की आज्ञा देता है, “पापी को मारने में पाप नहीं है,” और विभीषण दूत-वध रोकते हैं।

अपने ही हाथ का लेखा

युद्धकाण्ड के सर्ग 6 से 16 में, जली हुई लंका में, वह सभा बुलाता है और कहता है, “मैं अपना स्वामी नहीं रहता, काम का दास हो जाता हूँ।” “मनुष्य से हमें कोई भय नहीं, तब भी विचार कर ही लेना चाहिए।” महापार्श्व सलाह देता है कि सीता को बल से भोग लीजिए, और तब रावण वह कहता है जो उसने किसी से नहीं कहा था: “महापार्श्व, मेरा एक रहस्य सुनिए।” पुंजिकस्थला के बाद ब्रह्मा ने कहा था कि बल से भोगी गई हर स्त्री पर “आपका सिर उसी क्षण सौ टुकड़े हो जाएगा,” और “उसी शाप के डर से मैं विदेहराज की पुत्री सीता को बल से अपनी सुन्दर शय्या पर नहीं चढ़ाता।” वाटिका की सारी मनुहार के पीछे एक शाप था। विभीषण पूछते हैं, “सीता के रूप में यह कौन सा महासर्प किसने आपके गले में बाँध दिया है,” और सीता लौटाने को कहते हैं; उत्तर है, “कुल को कलंक लगानेवाले, आपको धिक्कार है!” भाई गदा लेकर आकाश में उठते हैं और जाते-जाते कहते हैं, “जिनकी आयु पूरी हो चुकी, वे अन्त के समय सुहृदों की कही हित की बात ग्रहण नहीं करते।” नाना माल्यवान सन्धि कहते हैं, और उत्तर में वह अपना स्वभाव बता देता है: “हम टूटकर दो टुकड़े भले हो जाएँ, पर किसी के आगे झुकेंगे नहीं। यह हमारा जन्म का दोष है, और स्वभाव को लाँघना कठिन है।” सर्ग 59 में वह पहली बार रण में उतरता है और हारकर लौटता है, और सर्ग 60 में काव्य उसे अपना ही लेखा पढ़ते दिखाता है: “हमने जो परम तप किया था, वह सब व्यर्थ गया। हम, जो महेन्द्र के समान हैं, एक साधारण मनुष्य के हाथों हार गए।” “मनुष्यों से अभय माँगना हमें सूझा ही नहीं।” अनरण्य, वेदवती, नन्दी, रम्भा, उमा, एक-एक नाम वह स्वयं गिनाता है, “दिव्यदृष्टि वालों की वाणी कभी मिथ्या नहीं होती। यह जानकर भी शत्रु को जीतने का यत्न तो करना ही होगा।” जगाया हुआ कुम्भकर्ण सीता-हरण को पाप कहता है, और भाई का उत्तर है, “बुद्धिमान बीते हुए पर शोक नहीं करते; इस घड़ी जो करने योग्य है, बस उसी पर विचार हो।”

सर्ग 92 में इन्द्रजित की मृत्यु का समाचार आता है। “हाय वत्स!” “अकेले इन्द्रजित के बिना वनों समेत यह सारी पृथ्वी और तीनों लोक हमें सूने दिखते हैं।” शोक क्रोध बनता है और क्रोध एक निश्चय, “उस नीच क्षत्रिय राम की व्रतधारिणी वैदेही को हम आज समाप्त कर देंगे।” नंगी तलवार लिए वह वाटिका की ओर दौड़ता है, और मन्त्री सुपार्श्व के रोकने पर मान जाता है। सर्ग 102 से 108 के द्वैरथ युद्ध में “काकुत्स्थ को भरोसा था कि जीतेंगे, रावण को निश्चय था कि मरेगा।” राम सिर काटते हैं और सिर फिर उग आता है, सौ बार, कई दिन और रातें, जब तक मातलि याद नहीं दिलाते, “देवताओं ने इसके विनाश की जो घड़ी बताई थी, वह आ पहुँची है।” अगस्त्य का दिया ब्रह्मास्त्र उसका हृदय चीरकर धरती में समा जाता है, और वह रथ से यों गिरता है “जैसे इन्द्र के वज्र से मारा वृत्र गिरा था।” राम विभीषण से कहते हैं, “रावण तेज की कमी से नहीं मरा।” मन्दोदरी देह पर गिरकर कहती हैं कि यह किसी मनुष्य का काम नहीं, “सच यही है कि यह सत्य-पराक्रमी भगवान विष्णु ही थे,” और यह भी, “मैं बार-बार कहती रही कि राघव से वैर न कीजिए।” विभीषण संस्कार से मना करते हैं, यह “भाई के वेश में मेरा शत्रु ही था,” और तब राम का वह वाक्य आता है: “इसने लोगों को रुलाया, पर यह महामना और महाबली था।” “वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। हमारा प्रयोजन सिद्ध हुआ। अब इसका संस्कार कीजिए; यह जितना आपका है उतना ही मेरा भी।” उसकी तीनों अग्नियाँ लंका से लाई जाती हैं, और राक्षस “दक्षिण की ओर मुँह किए” शिविका उठाकर चलते हैं।

उसकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ रावण कुछ माँगता है, कुछ छिपाता है, या अपना ही लेखा पढ़ता है। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. जो वर में नहीं गिना गया। रावण-कुल का पूर्वचरित्र में उत्तरकाण्ड 10 पढ़िए, जहाँ वह देवताओं से लेकर नागों तक सबसे अभय माँगता है और मनुष्य को तिनका कहकर छोड़ देता है। पूछिए: उस दिन उसे किस बात का भय था, और किसका नहीं?
  2. शाप, जो मनुहार बनकर दिखा। विभीषण-शरणागति में युद्धकाण्ड 13 पर ठहरिए, जहाँ वह महापार्श्व को ब्रह्मा का शाप सुनाता है, और फिर अशोक-वाटिका का “जब तक आप मुझे न चाहें” दोबारा पढ़िए। पूछिए: उस वाक्य में संयम कितना था और भय कितना?
  3. “यह जितना आपका है उतना ही मेरा भी।” रावण-वध में युद्धकाण्ड 109 और 111 पढ़िए, जहाँ विभीषण संस्कार से मना करते हैं और राम उसे महामना कहते हैं। पूछिए: काव्य के भीतर उसकी मृत्यु किस नाम से दर्ज है, शाप के फल से, क्षत्रिय की गति से, या विष्णु के हाथों?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक राजा पूछ रहा है कि क्या वह मनुष्य देवताओं को साथ लेकर आया था। क्या वह प्रश्न अब घमण्ड जैसा दिखता है, या उस एक नाम की खोज जैसा, जो उसने वर माँगते समय छोड़ दिया था?

लंका-प्रवेश व नगर-दर्शन · रात की लंका में सोता हुआ राजा, और उसकी भुजाओं पर ऐरावत, वज्र और चक्र के पुराने निशान।

कुम्भकर्ण · जगाया गया भाई जो पहले सच कहता है और फिर लड़ने जाता है, और एक राजा जो कहता है कि बीते पर शोक नहीं।

इन्द्रजित का वध और रावण का रण-प्रस्थान · बेटे की मृत्यु पर सूनी पड़ी तीनों लोक, एक नंगी तलवार, और एक मन्त्री का रोकना।

जिसने अपना लेखा स्वयं पढ़ा

पूरा पढ़िए तो वाल्मीकि का रावण अपने ही वर से बँधा पुरुष है। ब्रह्मा के सामने उसने हर उस जाति का नाम लिया जिससे वह डरता था, और मनुष्य को तिनका कहकर छोड़ दिया; शिव के सामने उसने वही सूची दोहराई और वही छोड़ा। काव्य फिर एक-एक करके उसे वे नाम सुनाता है जो उसने नहीं गिने थे: नन्दी के मुख से वानर, अनरण्य के मुख से दशरथ का पुत्र। सबसे कठोर बात यह है कि युद्धकाण्ड के सर्ग 60 में वह यह सूची स्वयं पढ़ता है, एक-एक शाप का नाम लेकर, और उसके बाद भी लड़ने जाता है, क्योंकि झुकना उसके “जन्म का दोष” है। उसका एक ही संयम, सीता को न छूना, उसके अपने मुख से एक शाप का भय निकलता है। फिर भी काव्य उसके मरने पर दो स्वर रखता है: विभीषण का, जो उसे भाई के वेश में शत्रु कहते हैं, और राम का, जो उसे महामना कहते हैं और उसका संस्कार अपना भी बताते हैं। मन्दोदरी तीसरा स्वर जोड़ती हैं, कि उसे मारने वाला मनुष्य नहीं, विष्णु थे; और राम एक क्षत्रिय की तरह ही उसका दाह कराते हैं। जिसने मनुष्य को नहीं गिना, काव्य उसे एक मनुष्य के हाथों मारकर उसी मनुष्य के मुख से वीर कहलवाता है।

आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा

आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद, सातों काण्ड। इस प्रस्तुति के प्रसंग: अरण्यकाण्ड 31 से 49; सुन्दरकाण्ड 10, 20 से 22 और 48 से 53; युद्धकाण्ड 6 से 16, 35 से 36, 59 से 63, 92 और 102 से 111; उत्तरकाण्ड 9 से 12, 16 से 19 और 26। इस प्रस्तुति का दायरा: अरण्यकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक खींचा गया पात्र-चित्र; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की वाल्मीकि रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से, जो गीताप्रेस पाठ पर आधारित है।

सीमाएँ और पाठ-भेद: बल से भोगी गई स्त्री पर सिर फटने का शाप काव्य में दो बार दो तरह से है: उत्तरकाण्ड 26 में रम्भा के लिए नलकूबर का (सात टुकड़े), और युद्धकाण्ड 13 में रावण के अपने मुख से पुंजिकस्थला के लिए ब्रह्मा का (सौ टुकड़े); दोनों अपने-अपने प्रसंग में रखे गए हैं। तुलसीदास के रामचरितमानस का रावण दूसरी कथा का रावण है और केवल नामित है; उसका कोई प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाया गया।

रावण का यह चित्र अंग्रेज़ी में पढ़िए।

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