पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग
राक्षसों के कुल में जन्मा एक पुरुष, जिसने ब्रह्मा से बस इतना माँगा था कि विपत्ति में उसकी बुद्धि धर्म पर टिकी रहे, पहली बार तब बोलता है जब सभा में एक दूत के वध की आज्ञा गूँज चुकी है; उसके बाद उसका हर प्रसंग उसी माँगे हुए वर का हिसाब है।
लंका की सभा, और सामने बँधा हुआ एक वानर खड़ा है जिसने अशोक-वाटिका उजाड़ दी है और राजा के बेटे अक्ष को मार डाला है। सुन्दरकाण्ड का सर्ग 52 विभीषण को उनके पहले शब्द तब देता है जब “वध की आज्ञा सभा में गूँजी, पर विभीषण ने सिर नहीं हिलाया।” वे क्रुद्ध बड़े भाई को देखते हैं, सामने खड़ी दूत-हत्या को देखते हैं, और हाथ जोड़कर कहते हैं, “राक्षसराज, मुझे क्षमा कीजिए और क्रोध छोड़िए; प्रसन्न होकर मेरी बात सुनिए। जो राजा उत्तम और अधम का भेद जानते हैं, वे दूत के प्राण नहीं लेते।” रावण का उत्तर एक वाक्य है, “पापी को मारने में पाप नहीं है।” विभीषण फिर मुँह खोलते हैं, “सन्त कहते हैं कि दूत किसी भी काल में, किसी भी स्थान पर वध के योग्य नहीं होता,” और शास्त्र के दूसरे दण्ड गिनाते हैं। भाई मान लेता है; दण्ड हनुमान की पूँछ पर उतरता है, और उसी पूँछ से उस रात लंका जलती है। काव्य में विभीषण का यह पहला दृश्य है: एक शत्रु के दूत के लिए अपने राजा के सामने खड़े होना।
उनके जन्म की कथा काव्य उत्तरकाण्ड के सर्ग 9 में सुनाता है। विश्रवा ने कैकसी से कहा था कि आप क्रूर राक्षसों को जन्म देंगी, और उनके अनुनय पर इतना जोड़ा था, “आपका जो आखिरी पुत्र होगा, वह धर्मनिष्ठ मन का होगा और हमारे कुल के अनुरूप।” दशग्रीव, कुम्भकर्ण और शूर्पणखा के बाद “कैकसी का आखिरी पुत्र हुआ धर्मात्मा विभीषण,” और “उस महान आत्मा के जन्म पर धरती पर फूल बरसे।” भाइयों के साथ गोकर्ण के तप में वे “पाँच हज़ार वर्ष एक पैर पर खड़े” रहे, और ब्रह्मा ने वर माँगने को कहा तो उन्होंने वह माँगा जो काव्य में और किसी ने नहीं माँगा: “भारी से भारी विपत्ति में भी हमारी बुद्धि धर्म पर टिकी रहे। ब्रह्मास्त्र का ज्ञान हमें बिना सिखाए अपने आप उग आए।” ब्रह्मा ने कहा, “राक्षसों के कुल में जन्म लेकर भी आपकी बुद्धि अधर्म की ओर नहीं झुकती, इसलिए हम आपको अमर करते हैं।” सर्ग 12 में रावण उनके लिए गन्धर्वराज शैलूष की पुत्री सरमा लाता है।
तीन बार सभा में, फिर आकाश में
युद्धकाण्ड के सर्ग 6 से 16 में, जली हुई लंका में, रावण अपने सुहृदों से मन्त्रणा माँगता है, और विभीषण वह कहते हैं जो सभा में कोई नहीं कह रहा: “राजन, सीता के रूप में यह कौन सा महासर्प किसने आपके गले में बाँध दिया है, जिसका वक्ष उसकी कुण्डली है, उसकी चिन्ता उसका विष, उसकी मीठी मुस्कान उसके पैने दाँत, और उसकी पाँच उँगलियाँ उसके पाँच फन?” “मैथिली दशरथ के बेटे को दे दी जाए।” प्रहस्त हँसता है कि मनुष्यों के एक राजा के बेटे से क्या भय; फिर भतीजा इन्द्रजित उठता है: चाचा “इस कुल के अकेले पुरुष हैं जिनमें सत्त्व, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज का नाम नहीं।” विभीषण उसे बच्चा कहते हैं, “आपकी बुद्धि अभी कच्ची है,” और तीसरी बार वही बात रखते हैं, “राजन, धन, रत्न, उत्तम आभूषण, दिव्य वस्त्र, विचित्र मणियाँ और देवी सीता राम को देकर हम सब यहाँ शोक से मुक्त होकर रहें।” तब रावण कुटुम्बियों पर पूरा भाषण देता है और अन्त में कहता है, “कुल को कलंक लगानेवाले, आपको धिक्कार है!” विभीषण गदा लेकर चार मन्त्रियों के साथ आकाश में उठते हैं और वहीं से कहते हैं, “बड़े भाई होने से आप मेरे लिए पिता के समान मान्य हैं, पर आप धर्म के मार्ग पर स्थिर नहीं; इसलिए आपका यह अपशब्द मैं सह नहीं सकता।” “सदा मीठा बोलनेवाले लोग सुलभ हैं; पर जो बात सुनने में अप्रिय हो और हित की हो, उसका कहनेवाला और सुननेवाला दोनों दुर्लभ हैं।” और विदा: “आपका कल्याण हो; मैं जाता हूँ। मेरे बिना सुखी रहिए।”
सर्ग 17 में वे घड़ी भर में समुद्र पार कर जाते हैं और उत्तरी तट के ऊपर आकाश में ठहर जाते हैं, नीचे पत्थर उठाए खड़ी वानर-सेना के सिर पर। वहीं से वे ऊँचे स्वर में कहते हैं, “रावण नाम का एक दुराचारी राक्षस है, जो राक्षसों का स्वामी है। मैं उसका छोटा भाई हूँ, विभीषण मेरा नाम है।” “उसने मुझे दास की तरह अपमानित किया और कड़वी बातें कहीं, तब मैं अपने पुत्रों और पत्नी को छोड़कर राघव की शरण आया हूँ।” नीचे सुग्रीव राम से कहते हैं कि यह रावण का गुप्तचर है, इसे बन्दी कीजिए, और राम सबसे उनका मत पूछते हैं। हनुमान कहते हैं, “इसके बोलते समय मुझे इसमें रत्ती भर दुर्भाव नहीं दीखा; इसका मुख भी प्रसन्न है।” राम का अपना मत है, “जो मित्र के भाव से मेरे पास आया है, उसे मैं किसी भी दशा में नहीं त्याग सकता।” सुग्रीव वह बात कहते हैं जो उस तट पर सबसे तीखी है, “जो अपने भाई को ऐसी विपत्ति में छोड़ आया, वह धरती पर किसे न छोड़ेगा?” और राम लक्ष्मण की ओर देखकर हल्के से मुस्कुराते हैं, “सुग्रीव, सब भाई भरत जैसे नहीं होते, न पिता के सब पुत्र मेरे जैसे, न सब मित्र आप जैसे।” फिर वह व्रत आता है, “जो एक बार भी ‘मैं आपका हूँ’ कहकर मेरी शरण आता है, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ,” और वह वाक्य, “वह विभीषण हो या स्वयं रावण।” विभीषण आकाश से उतरकर राम के चरणों में गिरते हैं: “लंका, मित्र और धन, सब मैंने छोड़ दिए; मेरा राज्य, मेरा जीवन और मेरे सुख अब आप ही में हैं।” राम उनसे राक्षसों का बल और दुर्बलता पूछते हैं, और वे अपने ही कुल का एक-एक नाम सौंप देते हैं। राम अपने तीन भाइयों की शपथ लेकर कहते हैं कि रावण को मारकर “मैं आपको लंका का राजा बनाऊँगा,” और उसी क्षण लक्ष्मण समुद्र का जल लाकर वानरों के बीच उनका अभिषेक कर देते हैं; लंका अभी समुद्र के उस पार है। उनकी पहली सलाह वही समुद्र है: “राजा राघव को समुद्र की शरण लेनी चाहिए। इस अथाह सागर को राजा सगर ने खुदवाया था।”
अपने ही कुल के विरुद्ध
युद्ध में वे राम की आँखें हैं। सर्ग 61 में पर्वत-सा कुम्भकर्ण आता है और राम पूछते हैं कि यह कौन है; विभीषण बताते हैं, “यह महर्षि विश्रवा का पुत्र, प्रतापी कुम्भकर्ण है।” सर्ग 86 में, जब राम शोक में उनकी बात सुन नहीं पाते, वे उसे दोहराते हैं: “रावण का पुत्र इन्द्रजित निकुम्भिला पहुँच चुका है; सुमित्रानन्दन लक्ष्मण एक विशाल सेना लेकर वहीं जाएँ और उसे मारें।” ब्रह्मा के वर में ही उसकी मृत्यु लिखी है, कि “निकुम्भिला नाम के वट-वृक्ष की जड़ तक पहुँचने से पहले” जो शत्रु उस पर चढ़ आए, वही उसे मारेगा। सर्ग 87 में वे लक्ष्मण को वह वट-वृक्ष दिखाते हैं, और इन्द्रजित की आँखें लक्ष्मण पर नहीं, चाचा पर टिकती हैं: “आप मेरे पिता के सगे भाई हैं, मेरे चाचा हैं। फिर अपने ही भतीजे से, जो आपके पुत्र-समान है, यह द्रोह क्यों?” “धर्म पर कलंक हैं आप।” विभीषण का उत्तर शान्त और कठोर है, “क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों के कुल में मैं जन्मा अवश्य, पर मेरा स्वभाव सत्त्व है, जो मनुष्यों का पहला गुण है; वह राक्षसों जैसा नहीं।” “इन्हीं दोषों के कारण मैंने अपने भाई को, जो आपके पिता हैं, छोड़ा। अब न यह लंका रहेगी, न आप, न आपके पिता।” सर्ग 101 में वे गदा से रावण के घोड़े मार गिराते हैं, और रावण “धधकते वज्र-सी एक जलती शक्ति विभीषण पर” फेंकता है; लक्ष्मण बीच में आते हैं, और वह शक्ति, जो मय की दी हुई थी, “उस राक्षस को छोड़कर” लक्ष्मण की छाती में उतरती है।
भाई के शव पर
सर्ग 109 में रावण धरती पर पड़ा है और विभीषण का “हृदय शोक के वेग से उमड़” पड़ता है। “भाई, आप विख्यात वीर थे, पराक्रमी, नीति में निपुण।” “मैंने जो भविष्य कहा था वही आप पर आ पड़ा, क्योंकि काम और मोह में डूबे आपको मेरी सलाह रुची नहीं।” राम उन्हें समझाते हैं कि रण में गिरा योद्धा शोक के योग्य नहीं, और तब वे भाई का पक्ष लेते हैं, “इसने याचकों को दान दिया, भोग भोगे, आश्रितों को पाला, मित्रों को धन दिया और शत्रुओं से वैर चुकाया। यह नित्य अग्निहोत्र करने वाला, बड़ा तपस्वी, वेदों का पूरा ज्ञाता और कर्मकाण्ड में कुशल था।” फिर सर्ग 111 में, जब राम संस्कार करने को कहते हैं, वही विभीषण मना कर देते हैं: “जिसने धर्म और सदाचार का मार्ग छोड़ दिया, जो क्रूर, निर्दय और असत्यवादी था, जिसने पराई स्त्रियों पर हाथ डाला, उसका संस्कार मैं नहीं कर सकता।” “सबका अहित चाहने वाला रावण भाई के वेश में मेरा शत्रु ही था।” राम कहते हैं, “वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है,” “यह जितना आपका है उतना ही मेरा भी,” और विभीषण “फुर्ती से अपने भाई के संस्कार में” लग जाते हैं: तीनों अग्नियाँ लंका से लाई जाती हैं, माल्यवान के साथ विधि होती है, और वे ही आग देते हैं। सर्ग 112 में राम लक्ष्मण से कहते हैं, “यह विभीषण हमसे प्रीति रखते हैं, हमारे भक्त हैं, और पहले भी हमारा उपकार कर चुके हैं; इन्हें लंका के सिंहासन पर अभिषिक्त कीजिए,” और भरी सभा में राक्षस और वानर, दोनों उन पर जल डालते हैं। उन्हीं के हाथ सीता को पालकी पर राम के पास लाते हैं, और राम सबके सामने कहते हैं, “सफल हुआ विभीषण का श्रम, जिन्होंने गुणहीन भाई को छोड़कर स्वयं मेरी शरण ली।” राम उन्हें लंका में रहने को कहते हैं, पर वे अयोध्या तक साथ जाते हैं और अभिषेक में चन्द्र-सा उजला चामर थामते हैं। उत्तरकाण्ड के अन्त में, जब सब राम के पीछे सरयू में जाने को खड़े हैं, राम उन्हें रोक लेते हैं: “जब तक सूर्य और चन्द्रमा हैं, जब तक यह मेदिनी टिकी है, और जब तक लोक में मेरी कथा है, तब तक यहाँ आपका राज्य रहे। मित्रता के नाते मैं आपको आज्ञा देता हूँ, इसे निभाइए; धर्म से प्रजा की रक्षा कीजिए, और इसका कोई उत्तर न दीजिए।” “ऐसा ही हो,” विभीषण कहते हैं।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ विभीषण किसी के लिए खड़े होते हैं, किसी को छोड़ते हैं, या किसी को मना करते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- शत्रु के दूत के लिए। लंका-दहन व वापसी में सुन्दरकाण्ड 52 पढ़िए, जहाँ वे भरी सभा में भाई से कहते हैं कि दूत वध के योग्य नहीं होता, और भाई मान लेता है। पूछिए: उस दिन उन्होंने दूत को बचाया, या अपने राजा को एक पाप से; और क्या उसी पूँछ से जली लंका उस बचाव का मोल थी?
- “सब भाई भरत जैसे नहीं होते।” विभीषण-शरणागति में युद्धकाण्ड 17 और 18 पर ठहरिए, जहाँ सुग्रीव पूछते हैं कि जो भाई को छोड़ आया वह किसे न छोड़ेगा, और राम अपने भाइयों का नाम लेकर उत्तर देते हैं। पूछिए: उस तट पर विभीषण किस भाई की कसौटी पर परखे गए, और किसकी कसौटी पर नहीं?
- जिसका संस्कार पहले मना किया। रावण-वध में युद्धकाण्ड 109 और 111 पढ़िए, जहाँ वे पहले भाई के गुण गिनाते हैं, फिर उसका दाह करने से मना करते हैं, और फिर स्वयं आग देते हैं। पूछिए: उन तीन घड़ियों में कौन सी घड़ी उनकी अपनी थी?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक छोटा भाई हाथ जोड़कर राजा से क्षमा माँगते हुए उसकी आज्ञा के विरुद्ध बोल रहा है। क्या वह हाथ जोड़ना अब विनय जैसा दिखता है, या उस आदत जैसा जो उन्हें समुद्र के ऊपर आकाश में ठहराए रखेगी?
इन्द्रजित का वध और रावण का रण-प्रस्थान · निकुम्भिला का वट-वृक्ष जो चाचा ने दिखाया, एक भतीजे का “धर्म पर कलंक”, और भाई की फेंकी हुई शक्ति जो लक्ष्मण ने ली।
अग्नि-परीक्षा, अयोध्या-वापसी, राज्याभिषेक · राक्षसों की सभा में समुद्र के जल से अभिषेक, पालकी पर सीता को लाना, और अयोध्या में थामा हुआ दूसरा चामर।
राम का स्वधाम-गमन · सरयू को जाते राम के सामने खड़ा एक मित्र, और वह आज्ञा जिसका कोई उत्तर नहीं देना था।
जिसकी बुद्धि विपत्ति में टिकी रही
पूरा पढ़िए तो वाल्मीकि के विभीषण ने जो एक वर माँगा था, काव्य उसी की परीक्षा उन्हें बार-बार देता है। भाइयों ने ब्रह्मा से अमरत्व और नींद माँगी; उन्होंने माँगा कि विपत्ति में बुद्धि धर्म पर टिकी रहे, और काव्य उन्हें हर बार उसी विपत्ति में खड़ा करता है जहाँ धर्म और कुल एक दूसरे के सामने आ जाते हैं। उन पर विश्वासघात का आरोप काव्य पूरी लम्बाई में बोलने देता है: सुग्रीव के मुख से समुद्र के तट पर, इन्द्रजित के मुख से निकुम्भिला के वट के नीचे, और स्वयं रावण के मुख से, “कुल को कलंक।” उत्तर में काव्य उन्हें कोई तर्क नहीं देता; राम को देता है, जो अपने ही भाइयों का नाम लेकर कहते हैं कि सब भाई भरत जैसे नहीं होते। विभीषण के अपने शब्द कम हैं, सीता लौटा दीजिए, दूत को न मारिए, यह वट-वृक्ष है, इसका संस्कार मैं नहीं कर सकता; और अन्तिम बार राम का कहा मानकर वे वही करते हैं जिससे मना किया था। जो राज्य उन्हें मिला, वह उन्होंने कभी माँगा नहीं; राम ने उसे समुद्र के इस पार, युद्ध से पहले दिया, और अपने जाने के दिन उसे उतना लम्बा कर दिया जितनी लम्बी उनकी अपनी कथा है। राक्षसों के कुल में जन्मे इस पुरुष को काव्य अन्त में वही पद देता है जो हनुमान को देता है: तब तक रहिए, जब तक यह कथा चलती है।
आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा
आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद, सातों काण्ड। इस प्रस्तुति के प्रसंग: सुन्दरकाण्ड 52 से 53; युद्धकाण्ड 6 से 19, 61, 86 से 87, 101, 109 से 112 और 127 से 130; उत्तरकाण्ड 9 से 12 और 108। इस प्रस्तुति का दायरा: सुन्दरकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक खींचा गया पात्र-चित्र; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की वाल्मीकि रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से, जो गीताप्रेस पाठ पर आधारित है।
सीमाएँ और पाठ-भेद: सुन्दरकाण्ड में सीता को ढाढ़स देने वाली राक्षसी सरमा और उत्तरकाण्ड 12 में विभीषण की पत्नी सरमा को यह परिचय एक नहीं मानता, क्योंकि इस पुस्तकालय की कड़ियाँ दोनों को जोड़ती नहीं। तुलसीदास के रामचरितमानस का विभीषण गीता, जिसमें राम रणभूमि में विभीषण को धर्म-रथ का उपदेश देते हैं, दूसरी कथा का पाठ है और केवल नामित है; उसका कोई प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाया गया।