महेन्द्र पर्वत का शिखर। नीचे सौ योजन का समुद्र, जिसके उस पार लंका में जानकी बन्दिनी हैं। ऊपर खुला आकाश, और बीच में एक वानर, जो अभी अभी अपने भूले हुए बल की याद दिलाए जाने पर उठ खड़ा हुआ है। जामवन्त ने केवल इतना कहा था कि आप वायु के पुत्र हैं, आप कर सकते हैं। और बस, वह देह तनी, ग्रीवा ऊँची हुई, पैर धरती में ऐसे जमे कि पर्वत काँप उठा। छलाँग अभी लगी नहीं है। यही वह क्षण है जिसमें हनुमान सबसे अधिक हनुमान हैं, वह क्षण जब कोई अपने भीतर की नापी हुई सीमा को छोड़कर बिना नापे विश्वास पर पाँव रखता है।
वाल्मीकि की रामायण इस क्षण को जिस सादगी से कहती है, वह इस साइट के सुन्दरकाण्ड के पन्ने पर ज्यों की त्यों उतरी है, “दूसरों के लिए जो कर्म दुष्कर था, उसे बिना किसी सहारे के, अकेले ही पूरा करने को वे तत्पर थे।” कोई सेना नहीं, कोई सेतु नहीं, कोई दूसरा उपाय नहीं। एक अकेला संकल्प और खुला समुद्र।
पर हनुमान की कथा छलाँग से शुरू नहीं होती। वाल्मीकि की रामायण में उनका पहला दृश्य किष्किन्धा के पास का है, जहाँ ऋष्यमूक पर्वत से उतरकर वे भिक्षु का रूप धरे राम और लक्ष्मण से मिलने आते हैं। सुग्रीव ने भेजा था, डर कर, कि कहीं ये वाली के भेजे हुए तो नहीं। और उस पहली भेंट में ही राम लक्ष्मण से कहते हैं कि जिसने ऐसी वाणी बोली हो, जिसके व्याकरण में कहीं चूक न हो, जिसके मुख से एक भी शब्द व्यर्थ न गिरा हो, वह कोई साधारण दूत नहीं। हनुमान की पहली पहचान बल नहीं, वाणी है। यह बात याद रखने की है, क्योंकि आगे की सारी कथा में उनका बल हमेशा उनकी बुद्धि के पीछे चलता है, कभी आगे नहीं।
फिर समुद्र आता है। मैनाक पर्वत सोने के शिखर लेकर जल से उठता है, विश्राम का निमन्त्रण देता है, और हनुमान उसे हाथ से छूकर आगे बढ़ जाते हैं, काम पूरा हुए बिना रुकना उनके स्वभाव में नहीं। सुरसा राह रोककर मुँह फैलाती है, तो वे अपनी देह को छोटा करके उसके मुख में जाकर लौट आते हैं, परीक्षा का उत्तर बल से नहीं, लोच से देते हैं। और सिंहिका, जो छाया पकड़कर खींचती है, उसका अन्त वे भीतर घुसकर करते हैं। एक ही यात्रा में तीन बाधाएँ, और तीनों के लिए तीन अलग उपाय। यही सुन्दरकाण्ड का पहला पाठ है।
शिंशपा की छाँव से जलती पूँछ तक
लंका में हनुमान सबसे पहले जो करते हैं, वह है प्रतीक्षा। अशोक वाटिका की एक घनी शिंशपा पर छिपकर वे रात भर देखते रहते हैं, रावण का आना, उसकी धमकियाँ, राक्षसियों का घेरा, और उस सब के बीच शोक में डूबी सीता। वे कूद नहीं पड़ते। पहले धीरे से, पेड़ पर बैठे बैठे, राम की कथा गाते हैं, ताकि नीचे बैठी सीता चौंकें नहीं, पहले सुनें, फिर देखें। और जब सीता ऊपर देखती हैं, तो वाल्मीकि का वह चित्र आता है जो इस साइट के पन्ने पर ऐसे लिखा है कि हनुमान उन्हें दिखे “मानो पूर्व दिशा में उदित सूर्य हों”। जिस रात का अँधेरा सबसे गहरा था, उसी में सूर्य दीखा, और वह भी एक पेड़ की डाल पर।
मुद्रिका देकर, आश्वासन देकर, हनुमान चाहते तो लौट जाते। काम पूरा था। पर वे रुकते हैं, और यहीं उनका दूसरा रूप खुलता है। वन उजाड़ते हैं, किंकरों और जम्बुमाली को गिराते हैं, इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र में जान बूझकर बँधते हैं, क्योंकि रावण को आँख से देखना भी उनके काम का हिस्सा था। और जब उनकी पूँछ में आग लगाई जाती है, तो वही आग लंका के महलों की मुँडेरों पर फिरती है। जलती पूँछ लिए वह वानर उस रात लंका को यह बता गया कि जिसका दूत ऐसा है, उसका स्वामी कैसा होगा।
आगे युद्धकाण्ड में वे वही करते रहते हैं जो सबसे कठिन हो। लक्ष्मण मूर्च्छित होते हैं तो रातों रात हिमालय से संजीवनी वाला पूरा द्रोणगिरि उठा लाते हैं, जड़ी पहचानने में समय गँवाना उन्हें उचित नहीं लगा। और विजय के बाद, जब सबसे मीठा समाचार देने का अवसर आता है, तो राम उसे भी हनुमान को ही सौंपते हैं, अशोक वाटिका में जाकर सीता से कहना कि रावण मारा गया। जो पहला सन्देश ले गया था, वही अन्तिम भी ले गया।
और फिर सदियों बाद तुलसीदास आते हैं, जो अवधी में हनुमान चालीसा रचते हैं। वहाँ वही समुद्र, वही मुद्रिका, वही संजीवनी चालीस चौपाइयों में समा जाती है, और वह पाठ बन जाती है जिसे आज भी करोड़ों कण्ठ हर मंगलवार दोहराते हैं। वाल्मीकि के हनुमान कथा के नायक हैं, तुलसी के हनुमान घर घर के रक्षक। दोनों एक ही हैं, बस दर्शन का द्वार अलग है।
उनकी राह
हनुमान और राम की पहली भेंट · भिक्षु के वेश में वह पहला संवाद, जहाँ राम वाणी सुनकर ही पहचान जाते हैं कि यह दूत असाधारण है।
समुद्र-लंघन · मैनाक, सुरसा और सिंहिका, तीन बाधाएँ और तीन अलग उत्तर। सुन्दरकाण्ड की उड़ान यहीं से शुरू होती है।
अशोक-वाटिका और सीता-दर्शन · शिंशपा की डाल पर बैठी प्रतीक्षा, और वह मुद्रिका जो अँधेरे में भरोसा बनकर उतरी।
लंका-दहन · जलती पूँछ लिए एक वानर पूरी रावण-नगरी को उसकी पहली हार दिखा गया।
लक्ष्मण-मूर्च्छा और संजीवनी · जड़ी नहीं मिली तो पर्वत ही उठ आया। हनुमान का उत्तर हमेशा प्रश्न से बड़ा होता है।
विजय के बाद सीता को संदेश · सबसे कठिन काम जिसे मिला था, सबसे मीठा समाचार भी उसी के हिस्से आया।
हनुमान चालीसा · तुलसीदास की अवधी वाणी में वही पूरी गाथा, चालीस चौपाइयों का घर।
रामायण का मुख्य पृष्ठ · पूरी कथा एक जगह, बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक, जिसमें हनुमान की डोर बार बार चमकती है।
छलाँग से पहले का क्षण
हनुमान की कथा में हमें सबसे अधिक वह बात छूती है कि उनका बल शापवश उन्हें भूला हुआ था। क्षमता थी, पर स्मृति नहीं। किसी और को याद दिलाना पड़ा। हममें से अधिकतर लोग ठीक इसी दशा में जीते हैं, अपने सबसे बड़े सामर्थ्य को भूले हुए, किसी जामवन्त की प्रतीक्षा में। और दूसरी बात, हनुमान हर समस्या पर एक ही औज़ार नहीं चलाते। मैनाक के लिए विनम्रता, सुरसा के लिए चतुराई, सिंहिका के लिए प्रहार, सीता के लिए धीरज, रावण के लिए आग। जिसके पास केवल बल हो, वह बल का दास है, और जिसके पास बल के साथ यह विवेक हो कि कब कितना और किस रूप में, वही सेवक होकर भी कथा का केन्द्र बन जाता है। भय के बारे में हनुमान का उत्तर सीधा है, काम इतना बड़ा चुनिए कि डर छोटा दिखने लगे। और निष्ठा के बारे में उससे भी सीधा, अपना नाम हमेशा अपने काम से छोटा रखिए। लंका जलाकर लौटे वानर ने आकर बस इतना कहा था, देखी हुई सीता। सारा प्रताप एक वाक्य में समेटकर स्वामी के चरणों में रख देना, यही उनकी छलाँग से भी ऊँची बात है।