बार-बार की आँधी, और समुद्र के बीच बसा एक नया नगर
कंस जरासंध का दामाद था, और दामाद के वध ने मगध-नरेश के भीतर एक ऐसी आग जला दी जो बुझने का नाम नहीं लेती थी। उसकी दोनों विधवा पुत्रियाँ रोती हुई पिता के पास पहुँचीं, और जरासंध ने प्रतिज्ञा कर ली कि वह यादवों को, और विशेषकर उस नीले युवक को, धरती से मिटा कर रहेगा। वह कोई साधारण शत्रु नहीं था; वह अपने युग का सबसे बलशाली सम्राट था, जिसकी सेना का कोई पार नहीं था।
उसने अपनी विशाल सेना ले कर मथुरा घेर ली। और फिर वह दौर शुरू हुआ जो वर्षों चला। जरासंध आता, मथुरा को घेरता, घमासान होता, और हर बार किसी न किसी तरह परास्त हो कर लौट जाता, केवल फिर लौट आने के लिए, और भी बड़ी सेना के साथ।
थका देने वाली जीत
यादव हर बार जीतते, पर यह जीत थकाने वाली थी। नगर की दीवारें बार-बार के आघात से जर्जर होने लगीं, खेत बार-बार रौंदे जाने लगे, और प्रजा बार-बार के घेरे से ऊबने और डरने लगी। हर जीत के बाद एक नई चढ़ाई की आशंका सिर पर मँडराती रहती।
कृष्ण ने एक गहरी बात समझ ली, कि कभी-कभी बार-बार जीतते रहने से अधिक बुद्धिमानी इसमें होती है कि लड़ाई का मैदान ही बदल दिया जाए। बल दिखाने से बड़ा है प्रजा का बचना; और एक थके हुए नगर को बार-बार रणभूमि बनाते रहना कोई असली जीत नहीं। उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जो ऊपर से पीछे हटना लगता था, पर भीतर से गहरी दूरदर्शिता थी।

पश्चिम की ओर
कृष्ण ने पूरे यादव-कुल को, स्त्री, बूढ़े, बच्चे, पशु, सब को ले कर पश्चिम की ओर प्रस्थान का निश्चय किया। यह आसान नहीं था; अपनी पुरानी भूमि, अपने पुरखों का नगर छोड़ना किसी के लिए सहज नहीं होता। पर कृष्ण जानते थे कि कुल का बचना ईंट-पत्थर के बचने से बड़ा है। एक लम्बी यात्रा के बाद वे दूर, पश्चिम के समुद्र-तट पर पहुँचे।
वहीं, समुद्र की गोद में, उन्होंने एक नया नगर बसाया, द्वारका। यह ऐसा दुर्ग था जिसे घेरना सहज नहीं था; इसके तीन ओर जल था, और जल स्वयं एक सुरक्षा-कवच जैसा था। कहते हैं समुद्र ने स्वयं पीछे हट कर भूमि दी, और दिव्य शिल्पी ने वहाँ मणियों-सा चमकता एक नगर खड़ा किया, ऊँचे प्रासाद, चौड़े मार्ग, उद्यान और सरोवर। जरासंध की पहुँच से दूर, उस अभेद्य नगर में, यादवों ने पहली बार वर्षों में चैन की साँस ली।
एक नए युग की नींव
द्वारका केवल एक नगर नहीं था; वह यादवों के जीवन का एक नया अध्याय थी। जहाँ मथुरा में हर दिन एक घेरे की आशंका रहती थी, वहाँ द्वारका में सुरक्षा थी, समृद्धि थी, और एक नई शुरुआत की सम्भावना। कृष्ण का यह निर्णय आगे चल कर बार-बार सही साबित होने वाला था।

और इसी नए नगर में, इन्हीं नए दिनों में, कृष्ण के जीवन की वे कथाएँ खुलने वाली थीं जो युद्ध की नहीं, सम्बन्धों की थीं, एक राजकुमारी का साहसी सन्देश, एक असुर के बंदीगृह से सोलह हज़ार स्त्रियों की मुक्ति, और बहुत कुछ। अगला प्रसंग उसी राजकुमारी का है, जिसने अपने जीवन का निर्णय स्वयं लिया।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 79 से 86; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।