लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

कंस

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एक दूल्हे के रथ की रास दुल्हन के भाई के हाथ में है। श्रीमद्भागवत का दसवाँ स्कन्ध अपने पहले अध्याय में कंस को यहीं से उठाता है, मथुरा के राजा उग्रसेन के बड़े बेटे को, जो अपनी चचेरी बहन देवकी को प्रसन्न करने के लिए स्वयं उसके ब्याह के रथ की रास थामे उसे वसुदेव के घर पहुँचाने चला है। बारात आधी राह में है कि आकाश बोल पड़ता है। “मूर्ख कंस!” “जिस कन्या को आप इतने दुलार से उसके पति के घर पहुँचा रहे हैं, उसी के गर्भ की आठवीं संतान आपको मारेगी।” रास उसकी मुट्ठियों से फिसल जाती है, और एक साँस तक उसके भीतर कुछ नहीं हिलता। फिर वह देवकी को बालों से पकड़कर आसन से घसीट लेता है और ब्याह के ही दिन उसका सिर उतारने को तलवार उठा लेता है। कंस की सारी कथा इसी एक रास्ते पर है, जो वह दुलार से चला था और जिस पर उसने तलवार खींची।

छह शिशु

वसुदेव तलवार और दुल्हन के बीच आ खड़े होते हैं। वे कहते हैं कि यह कन्या असहाय है, इसे जीने दीजिए। “इसके बच्चे मेरी मृत्यु हैं।” तब वसुदेव वह प्रस्ताव रखते हैं जो धरती पर शायद ही कोई रखता: इसका हर बच्चा मैं अपने हाथों से आपके पास ले आऊँगा। कंस ठिठक जाता है; वह इस आदमी को उम्र भर से जानता है और इसने एक बार भी अपना वचन नहीं तोड़ा। “ठीक है।” “हर बच्चा, मेरे हाथों में।” जब वसुदेव पहला बेटा कीर्तिमान लाकर उसके हाथों में रख देते हैं, तो उस काम की सीधी दृढ़ता उसे रोक देती है। “लड़के को घर ले जाइए,” वह कहता है। “यह कभी था ही नहीं।” “मेरी मृत्यु आपके आठवें से आनी है; आठवें पर ही मेरी नज़र रहेगी।”

फिर नारद आते हैं, बिन बुलाए, और उसके आगे जो रखते हैं वह सिंहासन के नीचे की जमीन हिला देता है: व्रज के ग्वाले, वसुदेव का पूरा कुल, देवकी और यादव घर की स्त्रियाँ, ये सब मनुष्य की खाल में चलते देवता हैं, और देवकी के गर्भ से स्वयं विष्णु आ रहे हैं, कंस के लिए। इन शब्दों पर उसके भीतर कुछ पुराना करवट लेता है; एक बीते जन्म में वह महादैत्य कालनेमि था, और तब विष्णु के ही हाथ ने उसे काटा था। ऋषि के जाते ही वह देवकी और वसुदेव को बेड़ियों में डलवाकर कोठरी में बन्द कर देता है, जिस लड़के को छोड़ा था उसे मँगवाकर पाँवों से पकड़कर पत्थर पर दे मारता है, और अपने पिता उग्रसेन को भी कारागार में डालकर स्वयं राज करने लगता है। बरस पर बरस वह कोठरी एक जन्म सुनती है, और एक के बाद एक छह नन्हे बेटे कंस के हाथों मरते हैं।

हरिवंश इसी आरम्भ को दूसरी जगह से कहता है, और वहाँ आकाश की कोई वाणी नहीं, एक अतिथि है। नारद स्वर्ग से उतरकर मथुरा के उद्यान में ठहरते हैं, और वह अतिथि सत्कार का बदला सच से चुकाता है। “आपकी सबसे छोटी बहन देवकी, जो यहीं मथुरा में रहती हैं, उनके आठवें गर्भ की सन्तान आपकी मृत्यु होगी।” “कंस, उस देवाधिदेव के हाथों मरना, जैसा ठहराया गया है, आपके लिए यश की बात है।” नारद के जाते ही कंस मुँह खोलकर जोर से हँसता है। “सच में देवता नारद से खेल करते हैं, और उन्हें चीज़ों की कोई समझ नहीं।” “हम सिंहासन पर बैठे हों, सोए हों, उन्मत्त हों या मद में, इन्द्र समेत सारे देवता हमें रत्ती भर नहीं डरा सकते।” पर महल में पहुँचते ही उसका स्वर हँसी का नहीं रहता। “देवकी की सन्तानों को मिटाने के लिए आप सब सदा सजग रहिए।” हरिवंश में छह शिशु जन्मते ही शिला पर पटके जाते हैं, उस माँ की आँखों के सामने, और यही ग्रन्थ बताता है कि वे छह कालनेमि के पुत्र षड्गर्भ थे, जिन्हें हिरण्यकशिपु ने शाप दिया था कि आप देवकी की कोख से जन्मेंगे और कंस आपका वध करेगा।

वह आठवीं रात

भागवत में सातवाँ गर्भ रोहिणी की कोख में खींच लिया जाता है, और फिर आठवाँ आता है। कंस हर सुबह अपनी बहन को देखने आता है, और हर सुबह उसके चेहरे पर उस असह्य उजाले का कुछ और हिस्सा होता है; वह अपने से कहता है कि हरि इसके गर्भ में आ गए हैं, जैसे सिंह गुफा के भीतर। वह पहरा दुगुना कर देता है और प्रतीक्षा करता है, एक आदमी जो अपनी मृत्यु को पकते हुए देख रहा है। आठवीं रात देवकी जन्म देती हैं, बेड़ियाँ खुलती हैं, यमुना राह देती है, और वसुदेव यशोदा की नवजात बेटी को लाकर देवकी के पास लिटा देते हैं। बच्ची रोती है, और कंस नींद से लड़खड़ाकर उठता है और हाथ में नंगी तलवार लिए कोठरी के दरवाजे में डगमगाता खड़ा होता है। “भाई, इसे देखिए।” “लड़की है।” “आख़िरी मुझे छोड़ दीजिए।” उस कमरे में दया बची नहीं है। वह बच्ची के नन्हे पाँव मुट्ठी में पकड़कर उसे पत्थर पर दे मारने को झुलाता है, और झूले के बीच में ही लड़की उसकी पकड़ से निकल जाती है, और उनके सिरों के ऊपर एक आठ भुजाओं वाली देवी हवा पर खड़ी होकर तलवार वाले आदमी की ओर नीचे देखती है। “मूर्ख, मेरी मृत्यु से आपको क्या मिलेगा?” “जो आपका अन्त करेगा, वह जन्म ले चुका है।” “असहाय बच्चों को व्यर्थ मारना बन्द कीजिए।”

कंस देर तक बिना हिले खड़ा रहता है, और फिर उसके केन्द्र में कुछ ढह जाता है। वह अपने ही हाथों से देवकी और वसुदेव की बेड़ियाँ खोलता है और भीगे चेहरे के साथ उनके पैरों पर गिर पड़ता है। “बहन।” “भाई।” “मैं अपने ही परिवार को वैसे खाता रहा हूँ जैसे राक्षस अपने बच्चों को खाता है।” “लगता है, देवता भी झूठ बोलते हैं; मैंने आकाश की एक आवाज़ पर विश्वास किया, और स्वर्ग के शब्द पर अपनी बहन के बच्चों की हत्या की।” देवकी उसे क्षमा कर देती हैं। कंस अपने ही महल में अजनबी की तरह लौट जाता है। रात बीतती है, और सुबह को पश्चात्ताप की कोई ख़बर नहीं होती। वह अपने मन्त्रियों को, देवताओं से पुराने वैर वाले दैत्यों को, बुलाता है, और उनका उत्तर सीधा है: हर नगर, हर गाँव, हर गोप बस्ती में दस दिन से इधर और उधर के हर बच्चे को मार डालिए। कंस आदेश दे देता है। अगली कथा में वह पूतना को बुलाता है, “नगर हो, गाँव हो, या अहीरों की बस्ती, जहाँ कहीं कोई छोटा बच्चा मिले, उसे ढूँढिए।”

हरिवंश में इस रात वसुदेव बच्चे बदलकर स्वयं कंस को ख़बर देते हैं कि एक कन्या जन्मी है, और कंस वसुदेव के द्वार पर आकर नवजात को माँगता है। “कन्या जन्मी तो समझिए मारी ही गई।” वह उसे पैरों से पकड़कर घुमाता है और शिला पर दे मारता है, और शिला उसे नहीं तोड़ती; वह देवी नाचती और हँसती हुई आकाश में उठती है। “कंस, अपने ही नाश के लिए आपने हमें घुमा कर शिला पर पटका है।” “सो जब आपकी मृत्यु का समय आएगा और आपका शत्रु आप पर टूटेगा, तब हम अपने हाथों से आपका देह चीर कर आपका गरम लहू पिएँगी।” यहाँ भी कंस पर एक क्षण के लिए लज्जा उतरती है; वह एकान्त में सिर झुकाकर बहन से कहता है, “काल ही सबका शत्रु है, काल ही सबका नाश करता है, काल ही सब कुछ चलाता है; हम जैसे लोग तो बस उसके औज़ार हैं।” पर वह अपने घर क्रोध से भरा लौटता है, हृदय जलता हुआ। विष्णुपुराण इसी रात को अपने पाँचवें अंश के तीसरे अध्याय में कहता है, जहाँ यमुना वसुदेव के घुटनों तक रहती है और शिला पर पटकी गई कन्या आकाश में ठहरकर आठ भुजाओं का रूप लेती है। “कंस, मुझे पटककर आपको क्या मिला?” “जो आपका वध करेगा, वह जन्म ले चुका है।” भोजराज कंस खड़ा उन्हें जाते हुए देखता रह जाता है।

धनुर्यज्ञ

भागवत में उसके भेजे हुए सब मारे जा चुके हैं, और उसे ख़बर है कि कृष्ण और बलराम गोकुल में नन्द के घर पल रहे हैं। अब वह आखिरी चाल सोचता है, धनुर्यज्ञ का बहाना बनाकर दोनों भाइयों को मथुरा बुलाना और अपने अखाड़े में उन्हें मरवा देना, और इसके लिए वह उस आदमी को बुलाता है जिसका मन श्रीहरि में लगा रहता है, अक्रूर को। “अक्रूर, आप गोकुल जाइए।” “धनुर्यज्ञ का न्योता देकर कृष्ण और बलराम को मथुरा ले आइए।” “बाक़ी हम सँभाल लेंगे।” गोकुल में अक्रूर कृष्ण को सब कह सुनाते हैं, और यह भी कि नारद ने कंस को बता दिया है कि उस रात की कन्या यशोदा की बेटी थी; और दोनों भाई सुनकर हँस पड़ते हैं।

हरिवंश इस योजना के पीछे एक पूरी रात रखता है। व्रज की हर ख़बर पिछली से बुरी है, और मथुरा का राजा इन्द्रियों और मन से ऐसा सुन्न है कि मरे हुए जैसा दिखता है। नीरव आधी रात में वह अपने पिता और कुटुम्बियों को भवन में बुलाता है। “आप सब मेरी इच्छा पर चलते हैं, फिर मेरी इस उठती हुई विपत्ति की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?” “जब वह युद्ध के लिए मेरे सामने खड़ा होगा, तब मैं जान लूँगा कि वह मेरी मृत्यु है।” फिर वह भरी सभा में बूढ़े वसुदेव की ओर मुड़ता है और वर्षों का विष उन पर उँडेल देता है। “आपका बुढ़ापा किस काम का?” “आपने सोचा था कि कंस के मरने पर मेरा बेटा मथुरा पर राज करेगा।” वसुदेव समुद्र की तरह अडिग खड़े रहते हैं और कोई उत्तर नहीं देते, और वक्ताओं में श्रेष्ठ अन्धक उसी सभा में उससे कोमल पर कड़े शब्द कहते हैं। “आप जटा रखें, सिर मुँड़ाएँ, अपने को भोज कहें, यादव कहें या कंस, आपका सिर अपनी ही जगह रहेगा।” “आप हमारे कुल के शत्रु हैं; आज से हम आपसे अपना प्रेम हटा लेते हैं।” कंस एक शब्द कहे बिना अपने घर चला जाता है, और अक्रूर के चलने से पहले ही कृष्ण का वध कराने के लिए केशी के पास दूत भेज देता है।

अखाड़ा

भागवत में दोनों भाई मथुरा में घुसते हैं, और यज्ञशाला में कृष्ण उस धनुष को एक ही झटके में तोड़ देते हैं जिसे हिलाना भी किसी से नहीं हुआ था। “महल में बैठे कंस के सीने में वह आवाज़ काँटे की तरह उतर गई।” “उस रात कंस को नींद नहीं आई।” सुबह वह मतवाले हाथी कुवलयापीड़ को रंगभूमि के द्वार पर खड़ा करवा देता है, महावत को आदेश देकर, “वे दोनों भीतर पाँव रखें, उससे पहले हाथी उन्हें रौंद डाले।” हाथी के दाँत कृष्ण और बलराम के कंधों पर अखाड़े में आते हैं, और चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल एक एक करके उसी अखाड़े की धूल में सुला दिए जाते हैं। अब ऊँचे मंच पर अकेला कंस बचा है, अपने सिंहासन से चिपका हुआ। “उसका मुख राख हो गया।” वह सेवकों को आज्ञा देता है कि वसुदेव को मार डाला जाए, पर समय हाथ से निकल चुका है। कृष्ण एक छलाँग में मंच पर जा पहुँचते हैं। कंस ढाल और तलवार उठाता है, पर श्रीहरि उसे ऐसे पकड़ लेते हैं जैसे गरुड़ साँप को। “कंस का मुकुट लुढ़ककर गिर पड़ा।” वे उसके केश पकड़कर उसे मंच से नीचे रंगभूमि में खींच लेते हैं और उसकी छाती पर कूद पड़ते हैं, और उसी क्षण उसके प्राण निकल जाते हैं। भागवत इस अन्त पर अपनी एक बात कहता है। “वैर भी, जब इतना सघन हो जाए कि और कुछ याद न रहे, मुक्ति का द्वार बन जाता है।”

हरिवंश में उस अन्त से पहले एक रात है जिसमें कंस अकेले अपने कक्ष में चाणूर और मुष्टिक को बुलाता है, “पर उन्हें मारने में पूरी सावधानी रखिएगा, चंचल स्वभाव के बालक समझ कर उनकी उपेक्षा न कीजिएगा।” उसी रात वह अपने महावत को वह कथा सुनाता है जो नारद ने उसे बताई थी, कि वह उग्रसेन का क्षेत्रज पुत्र है, सौभ के दानवराज द्रुमिल ने उग्रसेन का रूप धरकर उसकी माता को छला था, और सब उसे छोड़ दें तो भी वह अपने ही बल से सिंहासन पर बना रहेगा। जब अखाड़े में कृष्ण चाणूर का बल सोख लेते हैं, तो मंच डोलते हैं और कंस के मुकुट से उसका सबसे बड़ा रत्न खिसककर गिर पड़ता है। उसके माथे का पसीना बहता है, और वह आज्ञा देता है, “वन में घूमने वाले इन दोनों पापी ग्वालों को अखाड़े से बाहर निकाल दिया जाए, हम इन्हें देखना नहीं चाहते;” कृष्ण मंच पर पहुँचकर उसके केश पकड़ते हैं और उसे अखाड़े में घसीटते ले चलते हैं, यहाँ तक कि उसके देह से रेत में एक खाई सी खिंच जाती है, और उसी घसीटने में उसके प्राण निकल जाते हैं। “वह न युद्ध में मरा, न किसी बाण ने उसका देह छुआ;” केशों से घसीटकर मारा गया कंस वीरों के मार्ग से हटा दिया जाता है। उसकी माँ बेटे का सिर गोद में रखकर बूढ़े उग्रसेन से कहती हैं कि जाइए, कृष्ण से कंस की अन्त्येष्टि की बात कीजिए, “वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है, शत्रु के मरते ही मिट जाता है; इस मृत देह ने क्या अपराध किया है?” सूर्य निकलने पर यादव कंस का देह यमुना के उत्तर तट पर ले जाते हैं और उसके भाई सुनामा के साथ उसे अग्नि देते हैं।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वह एक रथ की रास छोड़कर तलवार उठाता है, एक भरी सभा में अपने बहनोई पर विष उँडेलता है, और एक मंच पर अकेला रह जाता है। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. इसके बच्चे मेरी मृत्यु हैं। कंस का भय और कृष्ण का जन्म पढ़िए, ब्याह के रथ से उस सुबह तक जब पश्चात्ताप की कोई ख़बर नहीं होती। पूछिए: जो आदमी रात में बहन के पैरों पर गिरा था, वह सुबह सबको मार डालने का आदेश कैसे दे देता है?
  2. आपका बुढ़ापा किस काम का? अक्रूर और मथुरा की राह में आधी रात की सभा से केशी के पास दूत जाने तक पढ़िए। पूछिए: जिसे अन्धक भरी सभा में कुल का अभिशाप कहते हैं, वह उसी सभा से बिना एक शब्द कहे क्यों उठ जाता है?
  3. कंस का मुकुट लुढ़ककर गिर पड़ा। कंस वध में धनुष टूटने से कारागार की बेड़ियाँ खुलने तक पढ़िए। पूछिए: भागवत उसकी मृत्यु को वैर से मिली मुक्ति क्यों कहता है?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक भाई दुलार से अपनी बहन के रथ की रास थामे है। जो आवाज उसे मूर्ख कहकर पुकारती है, वह उसे मारने आई थी या बचाने?

पूतना · एक राक्षसी को आदेश, एक विष भरा स्तन, और वह पहली भेजी हुई मृत्यु जो गोकुल में राख हो गई।

कृष्ण जन्म, रात में यमुना के पार · घुटनों तक की यमुना, एक कन्या जो शिला से आकाश में ठहर गई, और भोजराज जो उसे जाते देखता रह गया।

हरिवंश का कंस वध · मुकुट से खिसकता रत्न, रेत में खिंची एक खाई, और एक माँ जो बेटे का सिर गोद में लिए अन्त्येष्टि माँगती है।

जो अपनी मृत्यु को पकते देखता रहा

कंस को दोनों ग्रन्थ एक ही आवाज से शुरू करते हैं, और दोनों में वह उस आवाज को मानता भी है और नहीं भी। भागवत में आकाश उसे मूर्ख कहता है और वह तलवार खींचता है; हरिवंश में एक अतिथि उसे यश की बात बताता है और वह हँसता है, और फिर महल में जाकर महीने गिनवाता है। दोनों ग्रन्थ उसे एक क्षण के लिए झुकने भी देते हैं, और दोनों में वह अगली सुबह वही आदमी है जो पहले था। भागवत उसके अन्त में अपनी बात रखता है, कि जिसने वर्षों श्रीहरि को बैरी मानकर भी एक क्षण के लिए न भुलाया, उसकी वह अटूट स्मृति उसे उन्हीं के सारूप्य तक ले आई; हरिवंश कुछ और रखता है, कि उसे कोई बाण नहीं छूता, वह केशों से घसीटकर मारा जाता है, और फिर उसकी माँ, उसके पिता और स्वयं कृष्ण उसके लिए वह सब कहते हैं जो एक मरे हुए राजा के लिए कहा जाता है। एक ग्रन्थ उसके भय को मुक्ति का द्वार कहता है, दूसरा उसकी देह को राजा की अन्त्येष्टि देता है, और दोनों में वही आदमी है जो हर सुबह अपनी बहन के चेहरे पर अपनी मृत्यु को पकते देखने आता था और उसे रोकने की हर राह पर एक ताला और लगा देता था।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का श्रीमद्भागवत; हरिवंश के लिए इस पुस्तकालय की कड़ियाँ, जो मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेजी पाठ पर आधारित हैं; विष्णुपुराण के लिए गीताप्रेस का संस्करण।

इस कथा का पाठ: ब्याह का रथ, आकाश की वाणी, वसुदेव का वचन, नारद, छह शिशु: भागवत, स्कन्ध 10, अध्याय 1। आठवीं रात, कन्या और योगमाया, पश्चात्ताप और मन्त्रियों की सलाह: अध्याय 3 से 4। पूतना को आदेश: अध्याय 6। अक्रूर को भेजना: अध्याय 36। गोकुल में अक्रूर का सब कह सुनाना और दोनों भाइयों की हँसी: अध्याय 39। धनुष, अखाड़ा और अन्त: अध्याय 42 से 44। उद्यान में नारद, कंस की हँसी, षड्गर्भ, कन्या और लज्जा: हरिवंश, कृष्ण जन्म। आधी रात की सभा, वसुदेव का अपमान, अन्धक, केशी: हरिवंश, अक्रूर और मथुरा की राह। चाणूर और मुष्टिक, क्षेत्रज जन्म, अखाड़ा, विलाप और अन्त्येष्टि: हरिवंश, कंस वध। घुटनों तक की यमुना और आठ भुजाओं वाली कन्या: विष्णुपुराण, अंश 5, अध्याय 3।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। भागवत, हरिवंश और विष्णुपुराण का कथन उसी के नाम से अलग रखा गया है; कंस के जन्म पर भागवत और हरिवंश एक सा नहीं कहते, और उसके अन्त को दोनों अपने अपने ब्योरों से कहते हैं। विष्णुपुराण की कड़ी केवल जन्म की रात तक है; उसका कंस वध इस पुस्तकालय में नहीं है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।