Lulla Family

कंस का भय और कृष्ण का जन्म

कथा 09 · भागवतम् की कथाएँ

कंस का भय और कृष्ण का जन्म

जिस रात ताले अपने आप खुल गए
स्कन्ध 10, अध्याय 1-4

गंगा के तट पर शाम उतर रही थी। परीक्षित् ने हाथ जोड़कर पूछा, ”भगवन्, कल आपने उस बालक प्रह्लाद की बात कही, जो आग में भी नहीं डरा। मगर मेरे मन में एक और प्रश्न रह गया है। भगवान् जब इस धरती पर उतरते हैं, तो किसी राजमहल में, किसी उत्सव में क्यों नहीं? आप कहते हैं वे स्वयं भगवान् हैं। फिर उनका जन्म एक कारागार में, ज़ंजीरों और पहरों के बीच, क्यों हुआ?”

शुकदेव की आँखों में एक मुस्कान तैरी, जैसे यह प्रश्न उन्हें भीतर तक भिगो गया हो। ”राजन्, जहाँ अँधेरा परम सघन होता है, वहीं वे सब की नज़र बचाकर चुपके से उतर आते हैं। सुनिए, उस रात मथुरा में क्या हुआ था।”

मथुरा का राजा कंस था। उग्रसेन का बेटा, मगर अपने ही पिता को उसने जेल में डाल रखा था। सगे पिता को।

कंस की एक चचेरी बहन थी, देवकी। उसने बड़े चाव से उसका विवाह अपने जिगरी दोस्त वसुदेव से करवाया। ब्याह के बाद बहन को ससुराल तक छोड़ने वह ख़ुद रथ हाँक रहा था, घोड़ों की पीठ पर हाथ रखकर, ख़ुशी से भरा हुआ।

रथ बीच रास्ते में था। अचानक आकाश से एक वाणी गूँजी।

Rich painterly classical-Indian color illustration: on a Mathura road, King Kansa halts his ornate horse-drawn chariot as a glowing celestial voice (akashavani) descends from a storm-tinged sky; the reins slacken in his hand and his face turns from joy to dread, while his newly wed cousin-sister Devaki, in bridal red, sits beside her husband Vasudeva, the moment the omen is foretold.

”कंस, जिस बहन को आप इतने प्यार से लिए जा रहे हैं, उसी के आठवें गर्भ की संतान आपका काल होगी।”

कंस के हाथ की रास ढीली पड़ गई। एक पल को साँस रुकी, फिर वही ठंडक ग़ुस्से में पिघलकर बहने लगी।

उसने तलवार खींची और देवकी की ओर बढ़ा।

वसुदेव ने उसे रोका।

”भाई, ठहरिए! अपनी ही बहन को मारिएगा? सोचिए, इसका कोई दोष नहीं। इसे क्यों मारते हैं आप?”

”इसके बच्चे मुझे मारेंगे।”

Rich painterly classical-Indian color illustration: beside the chariot, noble Vasudeva with folded, pleading hands and earnest face vows to Kansa, shielding the trembling Devaki behind him; Kansa, sword half-drawn, hesitates and begins to lower the blade, his anger cooling into grim calculation, dramatic stormy dusk light.

”तो बच्चों को ले लीजिएगा, बहन को छोड़ दीजिए। मैं वचन देता हूँ, इसका हर बच्चा आपके हाथ में सौंप दूँगा।”

कंस ठिठका। बहन का ख़ून बहाने में एक कलंक था, जो उम्र भर पीछा करता। बच्चों को मार देना उससे आसान जान पड़ा।

उसने तलवार नीची कर ली।

”ठीक है। हर बच्चा मुझे सौंप दीजिएगा।” इतना कहकर वह शान्त हो गया और अपने घर लौट गया।

समय आने पर देवकी की पहली संतान हुई। वसुदेव अपना वचन निभाने उस नवजात को कंस के पास ले गए। भाई की इस सच्चाई पर कंस चकित रह गया, और बोला, मुझे तो आठवें से डर है, इस बालक से नहीं। इसे ले जाइए।

पर कुछ ही दिनों में देवर्षि नारद कंस के पास आए। उन्होंने उसे समझाया कि व्रज के नंद-वसुदेव आदि यदुवंशी, और देवकी समेत सारी स्त्रियाँ, असल में देवता हैं, और देवकी के गर्भ से स्वयं विष्णु उसका काल बनकर जन्म लेंगे। यह सुनते ही कंस के भीतर का भय जड़ तक उतर गया, और अब उसे हर संतान में अपना काल दिखने लगा। उसने वसुदेव और देवकी को हथकड़ी-बेड़ी से जकड़कर मथुरा के कारागार में डाल दिया, और जो पहला बालक उसने लौटाया था, उसे भी मँगवाकर ज़मीन पर पटक दिया।

दूसरी संतान भी वैसे ही गई। तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी। इस तरह देवकी के छह बालक एक-एक करके कंस के हाथों मारे गए। सातवें गर्भ को भगवान् की योगमाया ने एक रात रोहिणी की कोख में पहुँचा दिया, पर वह दूसरी कथा है।

अब आठवें का समय निकट था।

कंस ने पहरा कस दिया। हर दरवाज़े पर सैनिक, हर द्वार पर भारी ताले। और हर सुबह वह ख़ुद आकर देवकी को देख जाता, उसकी बढ़ती कोख पर नज़र गड़ाए।

कृष्ण पक्ष की अष्टमी, आधी रात, जब सब ग्रह-नक्षत्र शान्त और शुभ थे।

बाहर मूसलाधार बारिश थी। बिजली कड़कती, और कोठरी की सीली दीवारों पर पल भर को रोशनी काँप जाती।

उसी कालकोठरी में देवकी ने आठवीं संतान को जन्म दिया।

Rich painterly classical-Indian color illustration: inside a damp Mathura prison cell, the newborn reveals his true four-armed Vishnu form holding conch, discus, mace and lotus, radiating soft golden light that fills the chamber; chained Devaki and Vasudeva gaze in awe with folded hands, lightning glinting through a barred window in heavy rain.

जन्म लेते ही उस शिशु ने अपना असली रूप दिखाया, चार भुजाओं वाला, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म। सारी कोठरी एक भीनी आभा से भर उठी, और एक पल को बारिश की आवाज़ भी कहीं पीछे छूट गई।

देवकी और वसुदेव हाथ जोड़े देखते रहे, साँस भूले हुए। फिर वह दीप्ति धीरे-धीरे सिमट गई, और उनकी गोद में एक नन्हा-सा रोता हुआ शिशु रह गया, गीली पलकों वाला, मुट्ठियाँ भींचे।

जाने से पहले उस दिव्य रूप ने वसुदेव से कहा, ”पिताजी, मुझे अभी गोकुल पहुँचा दीजिए, नंद बाबा के घर। वहाँ यशोदा को आज ही एक बेटी हुई है। उसे यहाँ ले आइए, और मुझे वहाँ छोड़ आइए।”

वसुदेव ने सिर हिलाया। पर बाहर कैसे निकलते, वे ख़ुद तो ज़ंजीरों में बँधे थे।

तभी हाथों-पैरों की बेड़ियाँ अपने आप खुल गिरीं। द्वार के भारी ताले चुपचाप खुलकर लटक गए। पहरेदारों की पलकें भारी हुईं और वे जहाँ खड़े थे, वहीं नींद में डूब गए, बिना किसी मंत्र के, बिना किसी जादू के।

Rich painterly classical-Indian color illustration: in pouring midnight rain, Vasudeva walks through darkness balancing a winnowing basket (soop) on his head carrying the infant, while the many-hooded serpent Sheshanaga spreads its hoods like a canopy overhead to shield the child from the downpour, stormy sky and lightning behind.

वसुदेव ने शिशु को एक सूप में रखा, सूप को सिर पर उठाया और बाहर के अँधेरे में पैर रखा। ऊपर से बरसती बारिश को रोकने के लिए शेषनाग ने अपना फन छतरी की तरह तान दिया।

रास्ते में यमुना पड़ी, बारिश से उफनती, फुफकारती हुई। वसुदेव ने एक पल ठिठककर पानी में पैर रखा। लहरें थम गईं, दो ओर हटकर खड़ी हो गईं, और बीच में एक गीली पगडंडी खुल गई। वसुदेव सिर पर सूप उठाए उस पार चलते रहे, पानी उनकी जाँघों तक आकर रुक जाता।

गोकुल पहुँचे। नंद का घर खुला पड़ा था, सारा कुल उत्सव की थकान में सोया हुआ। यशोदा भी गहरी नींद में थी, नवजात बच्ची उसके पहलू में।

वसुदेव ने अपने लाल को धीरे से उसके पास लिटाया और बच्ची को गोद में उठा लिया। यशोदा को कुछ ख़बर न हुई। उसकी नींद इतनी गहरी थी कि सुबह उसे यह भी याद न रहा कि उसने बेटी जनी थी या बेटा।

वसुदेव लौट पड़े। यमुना फिर अपनी जगह उतर आई। कारागार में पहुँचकर उन्होंने बच्ची को देवकी के पास रखा, बेड़ियाँ फिर अपने आप कलाइयों में कस गईं, द्वार बंद हुए, और पहरेदार जागे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

तभी बच्ची रो पड़ी।

एक पहरेदार ने सुना और कंस तक ख़बर दौड़ाई, ”महाराज, आठवाँ बच्चा जन्म ले चुका है।”

कंस नींद से हड़बड़ाकर उठा। आधी रात, बारिश में भीगता, तलवार थामे वह कोठरी तक आया।

देवकी हाथ जोड़े, आँसुओं में डूबी, करुण स्वर में गिड़गिड़ाई। ”भाई, यह तो बेटी है। आपको तो बेटे से डर था। यह बच्ची आपकी कन्या के समान है, इसे छोड़ दीजिए, मैं विनती करती हूँ।”

कंस को दया न आई। उसने बच्ची को देवकी की गोद से झपट लिया और पटकने को हाथ उठाया।

Rich painterly classical-Indian color illustration: in the lamplit prison, the baby girl slips from Kansa's raised hands and rises into the air, transforming midair into the eight-armed goddess Yogamaya, each hand bearing a gleaming weapon; a shocked, frozen Kansa with sword recoils below as weeping Devaki and Vasudeva watch from their chains.

उसी पल बच्ची उसके हाथ से फिसली और हवा में जा उठी। वहीं उसका रूप बदल गया, आठ भुजाओं वाली एक देवी, हर हाथ में एक शस्त्र चमकता हुआ। योगमाया।

आकाश में टँगी वह देवी बोली, ”कंस, जिसके हाथों आपकी मृत्यु लिखी है, वह कहीं और जन्म ले चुका है। मुझ निरपराध को मारकर आप अपना काल नहीं टाल सकते।”

इतना कहकर वह बिजली की तरह कहीं विलीन हो गई।

कंस वहीं जड़ हो गया, फिर भीतर ही भीतर कोई चीज़ टूट गई।

”मेरा काल कहीं साँस ले रहा है। मुझे उसे ढूँढ निकालना होगा।”

उसके चारों ओर तो पहले ही पूतना, बकासुर, अघासुर जैसे राक्षस उसके संगी-साथी थे, जो यदुवंशियों को सताते आए थे। अब वह उन्हीं के बल पर अपने उस अनदेखे शत्रु की टोह में जुट गया।

और उधर गोकुल में, यशोदा अपने नए लाल को पहलू में लिए सोई थी, इस सब से बेख़बर, यह जाने बिना कि किस ख़ज़ाने को उसने अपनी छाती से लगा रखा है।

एक चरवाहे के आँगन में, राजा का जना हुआ बेटा, सारी सृष्टि का स्वामी, एक ग्वालिन की गोद में दूध की गंध ओढ़े सो रहा था।

शुकदेव कुछ देर चुप रहे। गंगा की लहरें किनारे की रेत को छूकर लौट रही थीं।

”देखा, राजन्,” वे बोले, ”जिसके एक संकल्प से सृष्टि चलती है, वह बाहर निकलने के लिए अपने ही पिता के सिर पर एक सूप में सवार हुआ। ज़ंजीरें उसने तोड़ीं नहीं, उन्हें झड़ जाने दिया। यमुना को उसने चीरा नहीं, उसने ख़ुद रास्ता दे दिया। भगवान् बल से नहीं आते, राजन्। वे प्रेम से आते हैं, और सारी दीवारें अपने आप झुक जाती हैं।”

परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”भगवन्, तो जिस कारागार से मैं अब तक डरता रहा, यह सात दिनों का घेरा, वह भी शायद कोई दीवार नहीं।”

शुकदेव ने उत्तर नहीं दिया, केवल मुस्कुराए। दूर कहीं एक पपीहा बोला, और साँझ का आख़िरी उजाला पानी पर काँपता रहा।

मन्थन

कृष्ण का जन्म इस देश की कल्पना के अत्यन्त प्यारे दृश्यों में एक है। हर बरस जन्माष्टमी की रात लाखों घरों में यही रात फिर जी उठती है, झूले पड़ते हैं, उपवास खुलते हैं।

पर इस कथा का धड़कता हुआ हृदय उस अँधेरी कोठरी में है। एक माँ और एक पिता अपने छह शिशुओं को अपनी ही आँखों के सामने मरते देख चुके हैं। आठवें का इंतज़ार उनके लिए डर का दूसरा नाम है। और वही आठवाँ जन्म लेते ही पहले अपना चतुर्भुज रूप दिखाता है, फिर सिमटकर एक रोता हुआ नवजात बन जाता है।

वह रूप देवकी और वसुदेव की उस आख़िरी रात की पीड़ा को सहलाने आया था, ताकि वे जान लें कि जो गोद में है वह कोई साधारण शिशु नहीं। और फिर वही सिमटना भी ज़रूरी था, क्योंकि उस फाटक से एक नवजात ही बाहर ले जाया जा सकता था, सृष्टि का स्वामी अपने पूरे ऐश्वर्य में नहीं।

बेड़ियाँ अपने आप झड़ गईं, पहरेदार अपने आप सो गए, यमुना अपने आप हट गई। भागवत बार-बार यही गाता है, कि जहाँ भीतर भगवान् उतरने को तैयार होते हैं, वहाँ बाहर की दीवारें टूटतीं नहीं, झुक जाती हैं।

और एक बात रह जाती है मन में। कंस ने जिन्हें पटककर मारा, वे बीते हुए शिशु थे, सामने का ख़तरा। जिससे उसकी सचमुच मृत्यु बँधी थी, वह उसके हाथ कभी न आया, गोकुल की किसी गोद में हँसता हुआ पल रहा था। जिस काल से हम सारी उम्र लड़ते हैं, वह प्रायः वहीं होता है जहाँ हमारी नज़र नहीं पहुँचती।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 1 से 4 तक की है। कंस की चेतावनी और देवकी के पुत्रों का वध (10.1), गर्भ में हरि का प्रवेश (10.2), अर्धरात्रि का जन्म और गोकुल-गमन (10.3), तथा योगमाया का कंस को धोखा देना (10.4), इसी क्रम में गीता प्रेस की वाचना चलती है।

जन्माष्टमी की रात श्रावण (पूर्णिमान्त गणना में भाद्रपद) कृष्ण-अष्टमी मानी जाती है। सूरदास से लेकर अनेक संत-कवियों ने इसी अर्धरात्रि की वर्षा, यमुना के बँटने और शेषनाग के फन को बार-बार गाया है।

दर्शन-दृष्टि

इस प्रसङ्ग की एक सूक्ष्म बात यह है कि जन्म से लेकर गोकुल-गमन तक का सारा अद्भुत क्रम, बेड़ियों का खुलना, यमुना का बँटना, शेषनाग का फन, और बच्चों की अदला-बदली, एक ही रात में घटता है। भागवत की यह ‘एक रात की कथा’ वाली शैली यहाँ अपने अत्यन्त सघन रूप में मिलती है।

दक्षिण की नृत्य-परम्पराओं में इसी रात को बार-बार रचा गया है। नारायण तीर्थ की ‘कृष्ण-लीला-तरङ्गिणी’ इसी जन्म और बाल-लीला को संगीत और नृत्य में बाँधती है, जिसे आज भी कूचिपुड़ी में गाया-नाचा जाता है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

कंस का भय इतना गहरा था कि उसने अपनी ही बहन के बच्चों को एक-एक करके मार डाला, और फिर भी जिससे डरता था उसे रोक न सका। जो प्राण भय से सिकुड़कर हर तरफ़ ताले और पहरे लगाता है, वह अनजाने में उसी द्वार को कस देता है जिससे उसका कल्याण आने को था। डर से बाँधी गई हर ज़ंजीर अंत में अपने ही हाथ में बँध जाती है।