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कंस का भय और कृष्ण का जन्म

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कथा 09 · भागवतम् की कथाएँ

कंस का भय और कृष्ण का जन्म

जिस रात ताले अपने आप खुल गए
स्कन्ध 10, अध्याय 1-4

मथुरा का राजा कंस था। उग्रसेन का बेटा, मगर अपने ही पिता को उसने जेल में डाल रखा था। सगे पिता को।

कंस की एक चचेरी बहन थी, देवकी। उसने बड़े चाव से उसका विवाह अपने जिगरी दोस्त वसुदेव से करवाया। ब्याह के बाद बहन को ससुराल तक छोड़ने वह ख़ुद रथ हाँक रहा था, घोड़ों की पीठ पर हाथ रखकर, ख़ुशी से भरा हुआ।

रथ बीच रास्ते में था। अचानक आकाश से एक वाणी गूँजी।

आकाश-वाणी कंस को चेतावनी देती है कि देवकी की आठवीं संतान उसका काल बनेगी, और वह क्रोध में तलवार खींच लेता है।
आकाश-वाणी कंस को चेतावनी देती है कि देवकी की आठवीं संतान उसका काल बनेगी, और वह क्रोध में तलवार खींच लेता है।

“कंस, जिस बहन को आप इतने प्यार से लिए जा रहे हैं, उसी के आठवें गर्भ की संतान आपका काल होगी।”

कंस के हाथ की रास ढीली पड़ गई। एक पल को साँस रुकी, फिर वही ठंडक ग़ुस्से में पिघलकर बहने लगी।

उसने तलवार खींची और देवकी की ओर बढ़ा।

वसुदेव ने उसे रोका।

“भाई, ठहरिए! अपनी ही बहन को मारिएगा? सोचिए, इसका कोई दोष नहीं। इसे क्यों मारते हैं आप?”

“इसके बच्चे मुझे मारेंगे।”

कारागार में आधी रात, कंस के भय के बीच वसुदेव-देवकी के घर कृष्ण का जन्म हुआ।
कारागार में आधी रात, कंस के भय के बीच वसुदेव-देवकी के घर कृष्ण का जन्म हुआ।

“तो बच्चों को ले लीजिएगा, बहन को छोड़ दीजिए। मैं वचन देता हूँ, इसका हर बच्चा आपके हाथ में सौंप दूँगा।”

कंस ठिठका। बहन का ख़ून बहाने में एक कलंक था, जो उम्र भर पीछा करता। बच्चों को मार देना उससे आसान जान पड़ा।

उसने तलवार नीची कर ली।

“ठीक है। हर बच्चा मुझे सौंप दीजिएगा।” इतना कहकर वह शान्त हो गया और अपने घर लौट गया।

समय आने पर देवकी की पहली संतान हुई। वसुदेव अपना वचन निभाने उस नवजात को कंस के पास ले गए। भाई की इस सच्चाई पर कंस चकित रह गया, और बोला, मुझे तो आठवें से डर है, इस बालक से नहीं। इसे ले जाइए।

पर कुछ ही दिनों में देवर्षि नारद कंस के पास आए। उन्होंने उसे समझाया कि व्रज के नंद-वसुदेव आदि यदुवंशी, और देवकी समेत सारी स्त्रियाँ, असल में देवता हैं, और देवकी के गर्भ से स्वयं विष्णु उसका काल बनकर जन्म लेंगे। यह सुनते ही कंस के भीतर का भय जड़ तक उतर गया, और अब उसे हर संतान में अपना काल दिखने लगा। उसने वसुदेव और देवकी को हथकड़ी-बेड़ी से जकड़कर मथुरा के कारागार में डाल दिया, और जो पहला बालक उसने लौटाया था, उसे भी मँगवाकर ज़मीन पर पटक दिया।

दूसरी संतान भी वैसे ही गई। तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी। इस तरह देवकी के छह बालक एक-एक करके कंस के हाथों मारे गए। सातवें गर्भ को भगवान् की योगमाया ने एक रात रोहिणी की कोख में पहुँचा दिया, पर वह दूसरी कथा है।

अब आठवें का समय निकट था।

कंस ने पहरा कस दिया। हर दरवाज़े पर सैनिक, हर द्वार पर भारी ताले। और हर सुबह वह ख़ुद आकर देवकी को देख जाता, उसकी बढ़ती कोख पर नज़र गड़ाए।

कृष्ण पक्ष की अष्टमी, आधी रात, जब सब ग्रह-नक्षत्र शान्त और शुभ थे।

बाहर मूसलाधार बारिश थी। बिजली कड़कती, और कोठरी की सीली दीवारों पर पल भर को रोशनी काँप जाती।

उसी कालकोठरी में देवकी ने आठवीं संतान को जन्म दिया।

कालकोठरी में जन्म लेते ही शिशु ने चार भुजाओं वाला दिव्य रूप दिखाया, शंख चक्र गदा पद्म धारण किए।
कालकोठरी में जन्म लेते ही शिशु ने चार भुजाओं वाला दिव्य रूप दिखाया, शंख चक्र गदा पद्म धारण किए।

जन्म लेते ही उस शिशु ने अपना असली रूप दिखाया, चार भुजाओं वाला, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म। सारी कोठरी एक भीनी आभा से भर उठी, और एक पल को बारिश की आवाज़ भी कहीं पीछे छूट गई।

देवकी और वसुदेव हाथ जोड़े देखते रहे, साँस भूले हुए। फिर वह दीप्ति धीरे-धीरे सिमट गई, और उनकी गोद में एक नन्हा-सा रोता हुआ शिशु रह गया, गीली पलकों वाला, मुट्ठियाँ भींचे।

जाने से पहले उस दिव्य रूप ने वसुदेव से कहा, “पिताजी, मुझे अभी गोकुल पहुँचा दीजिए, नंद बाबा के घर। वहाँ यशोदा को आज ही एक बेटी हुई है। उसे यहाँ ले आइए, और मुझे वहाँ छोड़ आइए।”

वसुदेव ने सिर हिलाया। पर बाहर कैसे निकलते, वे ख़ुद तो ज़ंजीरों में बँधे थे।

तभी हाथों-पैरों की बेड़ियाँ अपने आप खुल गिरीं। द्वार के भारी ताले चुपचाप खुलकर लटक गए। पहरेदारों की पलकें भारी हुईं और वे जहाँ खड़े थे, वहीं नींद में डूब गए, बिना किसी मंत्र के, बिना किसी जादू के।

कंस के भय की छाया में हुए कृष्ण के जन्म की यह मंगलमय गाथा।
कंस के भय की छाया में हुए कृष्ण के जन्म की यह मंगलमय गाथा।

वसुदेव ने शिशु को एक सूप में रखा, सूप को सिर पर उठाया और बाहर के अँधेरे में पैर रखा। ऊपर से बरसती बारिश को रोकने के लिए शेषनाग ने अपना फन छतरी की तरह तान दिया।

रास्ते में यमुना पड़ी, बारिश से उफनती, फुफकारती हुई। वसुदेव ने एक पल ठिठककर पानी में पैर रखा। लहरें थम गईं, दो ओर हटकर खड़ी हो गईं, और बीच में एक गीली पगडंडी खुल गई। वसुदेव सिर पर सूप उठाए उस पार चलते रहे, पानी उनकी जाँघों तक आकर रुक जाता।

गोकुल पहुँचे। नंद का घर खुला पड़ा था, सारा कुल उत्सव की थकान में सोया हुआ। यशोदा भी गहरी नींद में थी, नवजात बच्ची उसके पहलू में।

वसुदेव ने अपने लाल को धीरे से उसके पास लिटाया और बच्ची को गोद में उठा लिया। यशोदा को कुछ ख़बर न हुई। उसकी नींद इतनी गहरी थी कि सुबह उसे यह भी याद न रहा कि उसने बेटी जनी थी या बेटा।

वसुदेव लौट पड़े। यमुना फिर अपनी जगह उतर आई। कारागार में पहुँचकर उन्होंने बच्ची को देवकी के पास रखा, बेड़ियाँ फिर अपने आप कलाइयों में कस गईं, द्वार बंद हुए, और पहरेदार जागे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

तभी बच्ची रो पड़ी।

एक पहरेदार ने सुना और कंस तक ख़बर दौड़ाई, “महाराज, आठवाँ बच्चा जन्म ले चुका है।”

कंस नींद से हड़बड़ाकर उठा। आधी रात, बारिश में भीगता, तलवार थामे वह कोठरी तक आया।

देवकी हाथ जोड़े, आँसुओं में डूबी, करुण स्वर में गिड़गिड़ाई। “भाई, यह तो बेटी है। आपको तो बेटे से डर था। यह बच्ची आपकी कन्या के समान है, इसे छोड़ दीजिए, मैं विनती करती हूँ।”

कंस को दया न आई। उसने बच्ची को देवकी की गोद से झपट लिया और पटकने को हाथ उठाया।

कंस के हाथ से बच्ची फिसलकर आकाश में उठी और अष्टभुजा योगमाया देवी के रूप में बदल गई।
कंस के हाथ से बच्ची फिसलकर आकाश में उठी और अष्टभुजा योगमाया देवी के रूप में बदल गई।

उसी पल बच्ची उसके हाथ से फिसली और हवा में जा उठी। वहीं उसका रूप बदल गया, आठ भुजाओं वाली एक देवी, हर हाथ में एक शस्त्र चमकता हुआ। योगमाया।

आकाश में टँगी वह देवी बोली, “कंस, जिसके हाथों आपकी मृत्यु लिखी है, वह कहीं और जन्म ले चुका है। मुझ निरपराध को मारकर आप अपना काल नहीं टाल सकते।”

इतना कहकर वह बिजली की तरह कहीं विलीन हो गई।

कंस वहीं जड़ हो गया, फिर भीतर ही भीतर कोई चीज़ टूट गई।

“मेरा काल कहीं साँस ले रहा है। मुझे उसे ढूँढ निकालना होगा।”

उसके चारों ओर तो पहले ही पूतना, बकासुर, अघासुर जैसे राक्षस उसके संगी-साथी थे, जो यदुवंशियों को सताते आए थे। अब वह उन्हीं के बल पर अपने उस अनदेखे शत्रु की टोह में जुट गया।

और उधर गोकुल में, यशोदा अपने नए लाल को पहलू में लिए सोई थी, इस सब से बेख़बर, यह जाने बिना कि किस ख़ज़ाने को उसने अपनी छाती से लगा रखा है।

एक चरवाहे के आँगन में, राजा का जना हुआ बेटा, सारी सृष्टि का स्वामी, एक ग्वालिन की गोद में दूध की गंध ओढ़े सो रहा था।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 1 से 4 तक की है। कंस की चेतावनी और देवकी के पुत्रों का वध (10.1), गर्भ में हरि का प्रवेश (10.2), अर्धरात्रि का जन्म और गोकुल-गमन (10.3), तथा योगमाया का कंस को धोखा देना (10.4), इसी क्रम में गीता प्रेस की वाचना चलती है।

जन्माष्टमी की रात श्रावण (पूर्णिमान्त गणना में भाद्रपद) कृष्ण-अष्टमी मानी जाती है। सूरदास से लेकर अनेक संत-कवियों ने इसी अर्धरात्रि की वर्षा, यमुना के बँटने और शेषनाग के फन को बार-बार गाया है।

दर्शन-दृष्टि

इस प्रसङ्ग की एक सूक्ष्म बात यह है कि जन्म से लेकर गोकुल-गमन तक का सारा अद्भुत क्रम, बेड़ियों का खुलना, यमुना का बँटना, शेषनाग का फन, और बच्चों की अदला-बदली, एक ही रात में घटता है। भागवत की यह ‘एक रात की कथा’ वाली शैली यहाँ अपने अत्यन्त सघन रूप में मिलती है।

दक्षिण की नृत्य-परम्पराओं में इसी रात को बार-बार रचा गया है। नारायण तीर्थ की ‘कृष्ण-लीला-तरङ्गिणी’ इसी जन्म और बाल-लीला को संगीत और नृत्य में बाँधती है, जिसे आज भी कूचिपुड़ी में गाया-नाचा जाता है।

कंस का भय इतना गहरा था कि उसने अपनी ही बहन के बच्चों को एक-एक करके मार डाला, और फिर भी जिससे डरता था उसे रोक न सका। जो प्राण भय से सिकुड़कर हर तरफ़ ताले और पहरे लगाता है, वह अनजाने में उसी द्वार को कस देता है जिससे उसका कल्याण आने को था। डर से बाँधी गई हर ज़ंजीर अंत में अपने ही हाथ में बँध जाती है।

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