कंस का भय और कृष्ण का जन्म
मथुरा का राजा कंस था। उग्रसेन का बेटा, मगर उग्रसेन को उसने ख़ुद ही जेल में डाल रखा था। अपने ही पिता को।
कंस की एक बहन थी, देवकी। बहुत प्यारी। उसने उसका विवाह अपने जिगरी दोस्त वसुदेव से करवाया। शादी के बाद, अपनी बहन को घर तक छोड़ने वो ख़ुद रथ चला रहा था।
रथ बीच रास्ते में चल रहा था। अचानक एक आकाशवाणी हुई।
”कंस, जिस बहन को तू इतने प्यार से ले जा रहा है, उसका आठवाँ पुत्र तेरा हत्यारा होगा।”
कंस ने रथ रोका। उसकी आँखों में एक पल को shock आया। फिर वो shock ग़ुस्से में बदला।
उसने तलवार निकाली। देवकी की तरफ़ बढ़ा।
वसुदेव ने उसे रोका।
”भाई, रुक! तू अपनी बहन को मारेगा? सोच, उसका कोई दोष नहीं। तू उसे क्यों मारता है?”
”उसके बच्चे मुझे मारेंगे।”
”तो बच्चों को मार, बहन को नहीं। मैं वचन देता हूँ, हर बच्चा तेरे हाथ सौंप दूँगा।”
कंस रुका। सोचा। यह बात ठीक थी। बहन को मारने से एक तरह का कलंक लगेगा। बच्चों को मारना easier था।
उसने तलवार नीचे की।
”ठीक है। पर एक शर्त। तुम दोनों मेरे कारागार में रहोगे।”
वसुदेव और देवकी को मथुरा के कारागार में डाल दिया गया।
वहाँ देवकी को पहला बच्चा हुआ। वसुदेव ने वचन निभाया, बच्चा कंस को दिया। कंस ने ज़मीन पर पटक के मार डाला।
दूसरा बच्चा भी ऐसे ही। तीसरा। चौथा। छठा। सातवाँ बच्चा एक miracle से बच गया, अलग कथा।
अब आठवाँ बच्चा होने वाला था।
कंस ने बाहर पहरा बढ़ा दिया। एक-एक दरवाज़े पर सैनिक। द्वार पर बड़े-बड़े ताले। और हर रोज़ देवकी को check करता था।
श्रावण मास। कृष्ण पक्ष। अष्टमी की रात।
बारिश हो रही थी। बहुत तेज़।
कारागार के अंदर देवकी थी। और एक बच्चा हुआ।
पर यह बच्चा अलग था।
उसने जन्म लेते ही चार-हाथों वाला रूप दिखाया। शंख, चक्र, गदा, पद्म। दिव्य चमक।
वसुदेव और देवकी के सामने वो अपना असली रूप था। फिर एक पल को वो रूप गया, और एक साधारण नवजात शिशु था।
आविवेश पुनश्चास्या मनःस्वान्तं समाविशत् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.2.18 का भाव)
इस तरह वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ में हरि ने प्रवेश किया, और फिर उनके मन में, उनकी अपनी चेतना के भीतर, समा गए। बाहर का जन्म और भीतर का प्रवेश, दोनों एक ही समय में।
उसी क्षण उसी रूप ने वसुदेव से कहा, ”पिताजी, मुझे अभी गोकुल ले जाइए, नंद बाबा के घर। वहाँ यशोदा को एक बेटी हुई है। उसे यहाँ ले आइए। बदल लीजिए।”
वसुदेव ने सिर हिलाया। पर वो कैसे जाते? वो खुद कारागार में थे।
मगर तभी कुछ हुआ।
उनकी ज़ंजीरें अपने आप खुलीं। दरवाज़े के ताले गिरे। पहरेदार सो गए, बिना किसी मंत्र के, बिना किसी जादू के। उनकी ख़ुद की आँखें भारी हो गईं।
वसुदेव ने बच्चे को एक टोकरी में रखा। टोकरी सिर पर रखी। बारिश से बचाने के लिए शेषनाग ने अपना फन ऊपर खोल लिया।
वसुदेव कारागार से बाहर निकले।
रास्ते में यमुना थी। बारिश से उफनती। पर उन्होंने पैर रखा, और यमुना ने रास्ता दिया। पानी दो हिस्सों में, बीच में सूखा रास्ता।
गोकुल पहुँचे। नंद का घर। यशोदा सोई थी, बच्ची उसके पास।
वसुदेव ने बच्चे को रखा, बच्ची को उठाया। यशोदा को कुछ पता नहीं चला। नींद इतनी गहरी थी कि उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसने लड़की को जन्म दिया था, लड़के को नहीं।
वसुदेव लौटे। यमुना फिर से उतरी। कारागार में वापस। बच्ची को अपने पास रखा। ज़ंजीरें फिर बंधीं। दरवाज़े बंद। पहरेदार जागे।
बच्ची ने रोना शुरू किया।
एक पहरेदार ने सुना। कंस को ख़बर भेजी। ”आठवाँ बच्चा हो गया है।”
कंस आया। नींद से उठा। आधी रात। बारिश में। तलवार लेकर।
देवकी ने उसके पैर पकड़े। ”भाई, यह तो लड़की है। तुझे लड़के से डर था। उसे छोड़ दे।”
कंस को रहम नहीं आया। उसने बच्ची को छीना। ज़मीन पर पटकने वाला था।
तभी बच्ची उसके हाथ से छूटी। हवा में उठी। अपना रूप बदला।
वो एक देवी थी। योगमाया। आठ हाथों वाली। शस्त्रों से सजी।
उसने कंस से कहा, ”कंस, जो तुझे मारेगा वो पहले ही जन्म ले चुका है, और कहीं और। तू मुझे मारने से अपने भाग्य नहीं बदल सकता।”
और वो ग़ायब हो गई।
कंस वहीं खड़ा रह गया। पागल हो गया।
”मेरा हत्यारा कहीं है। मुझे ढूँढना होगा।”
उसने अपने सब राक्षसों को बुलाया। हर तरफ़ भेजा। हर बच्चे को मारने का आदेश। पूतना, बकासुर, अघासुर, सब को।
और इधर, गोकुल में, यशोदा अपने नए ”बेटे” के पास सोई थी, बेखबर।
एक चरवाहे के घर में, एक राजा का बेटा, एक देव का अवतार, एक चोर-जैसा बच्चा, सोया हुआ था।
कृष्ण का जन्म पूरी भारतीय कल्पना में सबसे प्रिय दृश्यों में से एक है। हर साल जन्माष्टमी पर लाखों लोग इसे दोहराते हैं, मटकी फोड़ते हैं, झूले लगाते हैं, उपवास करते हैं।
पर कथा का असली drama कारागार में है। दो माँ-बाप अपने सात बच्चों को मरते देख चुके हैं। आठवें के लिए डर। पर इस आठवें ने जन्म लेते ही चार हाथों वाला रूप दिखाया, फिर साधारण रूप।
क्यों? क्योंकि उन्हें confirm करना था, यह कोई आम बच्चा नहीं है। पर साथ ही, बाहर निकलने के लिए उसे आम होना पड़ा। यह तरीक़ा है भागवतम् का। हर रूप का एक काम है।
और ध्यान दीजिए, ताले अपने आप खुले। पहरेदार अपने आप सोए। यमुना ख़ुद हटी। इस सब में एक pattern है। जब भीतर का divine प्रकट होने को तैयार होता है, तब बाहर की दीवारें अपने आप गिरती हैं। आपको हर ताला तोड़ने की ज़रूरत नहीं होती।
एक और बात। कंस ने जो बच्चे मारे, वो सात पहले के बच्चे थे। उनमें से छह को वो पटक कर मार चुका था। पर असली ”शत्रु” वो था जिसे वो नहीं मार पाया। यह एक quiet metaphor है। हम कितना भी सोच लें कि हम सब threats को मार दिया, असली threat वो होता है जिसे हमने नहीं देखा।