हरिवंश · धेनुक और प्रलम्ब

विष्णु पर्व · प्रसंग 11 · अध्याय 57 से 59

एक वन जिस पर गधे का पहरा था, और एक पीठ जो आकाश की ओर उठने लगी

ताड़ के मीठे फलों पर बैठे एक असुर का अन्त, और एक खेल के बीच एक भार बन कर बढ़ते राक्षस को थाम लेने की कथा, दो प्रसंग जिनमें बलराम का बल खुल कर सामने आता है

जैसे-जैसे कृष्ण और बलराम बड़े हुए, वे गायों के साथ दूर के वनों तक जाने लगे। ये वन सुन्दर थे, पर सब सुरक्षित नहीं थे; कुछ पर असुरों का पहरा था, जो कंस के भेजे या अपने ही मद में बैठे, उन भाइयों की ताक में रहते थे।

ऐसा ही एक वन था ताड़ का, जिसके वृक्ष मीठे, पके फलों से लदे रहते थे, पर जहाँ कोई जाने का साहस नहीं करता था। उस वन पर धेनुक नामक असुर का अधिकार था, जो गधे के रूप में रहता था, और जो भी उन फलों के पास फटकता, उसे दुलत्तियों से मार डालता। ग्वाले उन फलों को बस दूर से देखते, और मन मसोस कर रह जाते।


ताड़ के वन में

एक दिन ग्वालों ने उन फलों की चर्चा की, और कृष्ण तथा बलराम ने तय किया कि अब इस डर का अन्त होना चाहिए। बलराम वन में घुसे, और ताड़ के वृक्षों को इतने ज़ोर से हिलाया कि पके फल झड़-झड़ कर गिरने लगे। उस आवाज़ पर धेनुक भड़कता हुआ दौड़ा आया, रेंकता हुआ, दुलत्तियाँ झाड़ता हुआ, और सीधे बलराम पर झपटा।

बलराम ने उसकी दुलत्ती को थामा, उसकी पिछली टाँगें पकड़ीं, और उसे घुमा कर ताड़ के एक ऊँचे वृक्ष पर दे मारा। वह असुर वृक्ष समेत धराशायी हुआ, और उसके साथी, जो उसी रूप में वहाँ रहते थे, उन्हें भी दोनों भाइयों ने एक-एक कर समाप्त कर दिया। वह वन मुक्त हो गया, और उस दिन पहली बार ग्वालों ने वहाँ के मीठे फल बिना डर के खाए।


खेल में छिपा एक राक्षस

एक और दिन, दोनों भाई अपने सखाओं के साथ एक खेल खेल रहे थे, जिसमें हारने वाले को जीतने वाले को अपनी पीठ पर बैठा कर एक निश्चित दूरी तक ले जाना होता था। उसी भीड़ में, एक ग्वाले का रूप धर कर, प्रलम्ब नामक असुर घुस आया था, इस ताक में कि किसी एक को पीठ पर बैठा कर उड़ा ले जाए और मार डाले।

खेल में प्रलम्ब के पाले बलराम आए, और उसे उन्हें अपनी पीठ पर ले जाना था। प्रलम्ब ने यही चाहा था। उसने बलराम को पीठ पर बैठाया, और चलते-चलते अपना रूप बढ़ाने लगा, और तेज़, और ऊँचा, और आकाश की ओर उठने लगा, ताकि उन्हें दूर ले जा कर समाप्त कर दे।


एक प्रहार

बलराम ने पहले तो खेल समझा, पर जब वह असुर आकाश की ओर बढ़ने लगा और उसका असली, विकराल रूप खुलने लगा, तब वे समझ गए कि यह कोई सखा नहीं, एक राक्षस है जो उन्हें ले उड़ा है। एक पल को बलराम को भी अपना भार बढ़ता-सा लगा, मानो चिन्ता ने पकड़ा हो; पर अगले ही क्षण उन्होंने अपने भीतर के उस अपार बल को जगाया।

बलराम ने अपनी मुट्ठी तानी, और प्रलम्ब के सिर पर एक ऐसा प्रहार किया कि वह विशाल असुर वहीं, आकाश में ही, चकनाचूर हो गया, और धरती पर आ गिरा। बलराम सुरक्षित नीचे उतर आए, और सखा उन्हें घेर कर खड़े हो गए, विस्मय और हर्ष से भरे। इन प्रसंगों में यह साफ़ हुआ कि अवतार अकेला नहीं आया था; उसके साथ वह श्वेत अंश भी था, बलराम, जिसका बल हर बड़े संकट में ढाल बन कर खड़ा होता। और अब वृन्दावन के सिर पर एक और बड़ा संकट मँडरा रहा था, इस बार किसी असुर का नहीं, स्वयं देवराज इन्द्र का।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 57 से 59; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।