बलराम और प्रलम्ब
परीक्षित् देर तक चुप बैठे रहे, फिर मुनिवर शुकदेव की ओर मुड़े। ”भगवन्, आपकी कही हर कथा में श्रीकृष्ण ही सामने आते हैं। माखन भी वही चुराते हैं, कालिय को भी वही नाथते हैं। पर उनके साथ एक और भी रहता है, गोरा, बड़ा, हल चलाने वाला। वह बड़ा भाई कौन है, जो सदा छाया की तरह पास खड़ा रहता है और कभी आगे नहीं आता? क्या उसकी भी कोई अपनी घड़ी आई थी, जब वही नायक हुआ हो?”
शुकदेव की आँखों में हँसी उतर आई। ”आई थी, राजन्। और वह घड़ी एक खेल के बीच आई थी। बच्चों के एक ऐसे खेल में, जिसमें हारने वाला जीतने वाले को अपनी पीठ पर ढोता है। सुनिए, उस दिन गोरे बलराम ने अपनी पीठ पर क्या ढोया था।”
ग्रीष्म का समय था। शरीरधारियों को यह ऋतु बहुत प्रिय नहीं होती, पर वृन्दावन में जैसे किसी ने मौसम को रोक रखा था। वहाँ अब भी वसन्त की ही छटा छिटक रही थी। इसका कारण साफ़ था, उस वन में परम मधुर भगवान् श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गौरसुन्दर बलराम निवास करते थे, और जहाँ वे दोनों हों वहाँ ग्रीष्म ठहर नहीं सकता।
झरनों की झर-झर में झींगुरों की तीखी झंकार छिप जाती थी। उन झरनों से सदा-सर्वदा ठंडी फुहारें उड़तीं और पेड़ों के पत्तों पर बैठ जातीं, इसलिए हरियाली देखते ही बनती थी। नदी, सरोवर और झरनों की लहरों को छूकर जो हवा बहती, वह अपने साथ कह्लार और उत्पल आदि कमलों का पराग ले आती। उस शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा में वनवासियों को न दावाग्नि का ताप लगता, न सूर्य का घाम।
नदियों में अगाध जल भरा था। बड़ी-बड़ी लहरें उनके तटों को चूमतीं, उन्हें पखारतीं और स्वच्छ बना जातीं। इससे आस-पास की भूमि गीली बनी रहती, और सूर्य की अत्यन्त उग्र किरणें भी वहाँ की हरी-भरी घास को सुखा न पातीं। चारों ओर हरियाली छाई रहती।
उस वन में पेड़ों की पाँत-की-पाँत फूलों से लदी थीं। कहीं मोर कूक रहे थे, कहीं भौंरे गुंजार कर रहे थे, कहीं कोयल कुहक रही थी, कहीं सारस अपना अलग ही आलाप छेड़े हुए थे। ऐसा सुन्दर वन देखकर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गौरसुन्दर बलराम का मन विहार के लिए मचल उठा।

आगे-आगे गौएँ चलीं, पीछे-पीछे ग्वालबाल, और बीच में अपने बड़े भाई के साथ बाँसुरी बजाते श्रीकृष्ण। लड़कों ने अपने को ख़ूब सजाया था। किसी ने नए कोंपलों की माला पहनी, किसी ने मोरपंख खोंसे, किसी ने गेरू और दूसरी रंगीन धातु-मिट्टियों से अपने अंगों पर भाँति-भाँति की रेखाएँ खींच लीं।
फिर खेल शुरू हुए। कोई आनन्द में भरकर नाचने लगा, तो उसके साथ श्रीकृष्ण बाँसुरी बजा देते। कोई ताल ठोककर कुश्ती लड़ने लगा। कोई राग छेड़ देता, तो दोनों भाई हथेली से ताल देते, सींग आदि बजाते, और कभी ”वाह-वाह” कहकर उसकी प्रशंसा भी करते। परीक्षित्, जैसे कोई नट अपने नायक की प्रशंसा करता है, वैसे ही देवता तक ग्वालबालों का रूप धारण कर वहाँ आते और गोप-समाज में छिपकर बलराम और श्रीकृष्ण की स्तुति करते।
कभी दोनों भाई एक-दूसरे का हाथ पकड़कर कुम्हार के चाक की तरह घूमते, कभी एक-दूसरे से ऊँची छलाँग मारने की होड़ में कूदते, कभी ढेले फेंककर निशाना लगाते, कभी रस्साकशी में दो दल बँटकर खींचातानी करते, और कभी एक-दूसरे से कुश्ती लड़ते।
परीक्षित्, वे वही सब खेल खेलते थे जो साधारण बच्चे संसार में खेला करते हैं। मेढक की तरह फुदकते, एक-दूसरे का मुँह बनाकर हँसी उड़ाते, पेड़ की डाल से रस्सी बाँधकर झूला झूलते, कभी दो बालकों को खड़ा कराकर उनकी बाँहों के बल पर लटकते, और कभी किसी राजा की नक़ल उतारकर सब ठठा पड़ते।
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उसी वन में, उसी एक दिन, उनके बीच एक नया चेहरा आ मिला।
वह एक ग्वाले के भेस में था। हाथ में लाठी, कंधे पर कम्बल, चाल में वही लापरवाही जो वृन्दावन के लड़कों की पहचान थी। किसी ने उसे पहले देखा न था, पर खेल के बीच कौन यह पूछता है कि आप किसके बेटे हैं। वह आ खड़ा हुआ और खेल में घुल-मिल गया।
पर वह कोई ग्वाला न था। उसका नाम प्रलम्ब था, और वह एक असुर था। उसकी एक ही नीयत थी, मौक़ा पाकर श्रीकृष्ण और बलराम को, इन दोनों भाइयों को, खेल की भीड़ में से उठा ले जाना।
श्रीकृष्ण सर्वज्ञ हैं। उन्होंने उसे देखते ही पहचान लिया। पर उन्होंने न चौंककर सबको सावधान किया, न उसे झिड़का। उन्होंने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली, और मन-ही-मन सोचने लगे कि किस युक्ति से इसका वध किया जाए।
फिर ग्वालबालों में सब में बड़े खिलाड़ी, सब खेलों के आचार्य श्रीकृष्ण ने सब लड़कों को पास बुलाया। ”मेरे प्यारे मित्रो,” उन्होंने कहा, ”आज हम सब उचित रीति से दो दलों में बँट जाएँ, और फिर जी भरकर खेलें।”

लड़कों ने दोनों भाइयों को अपना नायक चुना। कुछ श्रीकृष्ण के साथी हो गए, कुछ बलराम के। खेल यह तय हुआ कि हारने वाला दल जीतने वाले को अपनी पीठ पर चढ़ाकर एक नियत स्थान तक ले जाएगा, उस दूर खड़े भाण्डीर नामक बरगद तक। जो जीते, वह सवार; जो हारे, वह सवारी। इस प्रकार पीठ पर चढ़ते-चढ़ाते वे सब उस भाण्डीर वट के पास जा पहुँचे।
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खेल चला। हार-जीत होती रही, और पीठें बदलती रहीं।
एक बार बलराम के दल वाले जीते। श्रीदामा, वृषभ और दूसरे लड़के सवार हुए, और श्रीकृष्ण के दल को उन्हें ढोना पड़ा। श्रीकृष्ण स्वयं हारे थे, इसलिए उन्होंने श्रीदामा को अपनी पीठ पर बैठा लिया। भद्रसेन ने वृषभ को उठाया। और प्रलम्ब के हिस्से में रोहिणीनन्दन बलराम आए।
यहीं असुर की चाल अटक गई।
उसने सोचा था श्रीकृष्ण को उठाएगा, पर श्रीकृष्ण उसे बहुत बलवान् जान पड़े, और मन में बैठ गया कि इन्हें न उठा सकूँगा। सो वह बलराम की ओर हो लिया। बलराम को पीठ पर चढ़ाया, और तभी उसके भीतर का छिपा हुआ असुर जाग उठा। उसने सोचा, बस अब यही घड़ी है। पीठ पर बलराम को लिए वह बहुत तेज़ी से भागा। नियत स्थान, वह भाण्डीर का बरगद, पीछे छूटता गया, और वह उससे भी आगे निकल गया।
बलराम पहले तो खेल के मज़े में चुप रहे। पीठ पर सवार, हवा कानों के पास से सरकती हुई, नीचे ज़मीन भागती हुई। पर जब बरगद पीछे रह गया और दौड़ रुकी नहीं, तब उन्होंने जाना कि यह खेल अब खेल नहीं रहा।
तभी एक और बात हुई। बलराम का बोझ बढ़ने लगा।

वे किसी बड़े भारी पर्वत के समान भारी होते चले गए। प्रलम्ब उन्हें लिए दूर तक न जा सका। उसकी वह तेज़ चाल, जिसके बल पर वह उड़ा जा रहा था, एक-एक डग पर सुस्त पड़ने लगी। फिर रुक गई। वह उस गौर बालक को लिए एक क़दम भी आगे न बढ़ा सका।
हारकर उसने अपना असली, स्वाभाविक दैत्य-रूप धर लिया।
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जो अभी एक ग्वाला बना था, वह अब आकाश को छूता एक काला दैत्य था। उसके काले शरीर पर सोने के गहने चमक रहे थे, और गौरसुन्दर बलराम को धारण किए हुए उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो बिजली से युक्त कोई काला बादल चन्द्रमा को अपने ऊपर धारण किए हो।
उसकी आँखें आग की तरह धधक रही थीं। दाढ़ें भौंहों तक पहुँची हुई थीं। लाल-लाल बाल इस तरह बिखरे थे जैसे आग की लपटें उठ रही हों। हाथों-पाँवों में कड़े, सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, और उन सबकी कान्ति से वह बड़ा अद्भुत लग रहा था। वह बलराम को लिए और भी ऊपर, आकाश-मार्ग से उड़ चला।
उस भयानक दैत्य को इतने वेग से आकाश में जाते देख बलराम पहले तो कुछ घबरा-से गए। पीठ के नीचे जो कंधा था, वह अब किसी मित्र का न था। नीचे वृन्दावन छोटा होता जा रहा था, और ऊपर केवल खुला आकाश।
पर वह घबराहट एक पल से ज़्यादा न ठहरी।
दूसरे ही क्षण बलराम को अपने स्वरूप की याद आ गई। याद आ गया कि वे कौन हैं, और किसके भाई हैं। भय जाता रहा, और उसकी जगह एक ठंडी समझ बैठ गई। उन्होंने सोचा, जैसे कोई चोर किसी का धन चुराकर ले जाय, वैसे ही यह शत्रु मुझे चुराकर आकाश-मार्ग से लिए जा रहा है।
फिर उन्होंने क्रोध किया।

जैसे किसी समय इन्द्र ने पर्वत पर वज्र चलाया था, वैसे ही बलराम ने अपना घूँसा कसा और उस असुर के सिर पर एक ही प्रहार में दे मारा।
एक ही घूँसा। और बस।
उसका सिर चूर-चूर हो गया। मुँह से ख़ून उगलता हुआ, चेतना खोता हुआ, एक बड़ा भयंकर शब्द करता हुआ वह दैत्य उसी समय प्राणहीन होकर धरती पर आ गिरा, ठीक वैसे ही जैसे इन्द्र के वज्र से मारा हुआ कोई पर्वत गिर पड़े। उसके गिरने से वन की धरती काँप उठी।
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नीचे खड़े ग्वालबाल अवाक रह गए थे।
उन्होंने अभी-अभी देखा था कि उनका एक साथी आकाश में एक राक्षस बन गया, और उसकी पीठ पर उनका गौर सखा अकेला बैठा था। उनकी साँस रुक गई थी। फिर उन्होंने वह घूँसा गिरते देखा, और राक्षस को धरती पर आते देखा, और बलराम को सकुशल नीचे उतरते देखा।
तब उनके आश्चर्य की सीमा न रही। ”साधु। साधु। बहुत अच्छा किया, बहुत अच्छा किया।” वे बार-बार यही कहने लगे। वे दौड़कर बलराम से लिपट गए, मानो कोई मरकर लौट आया हो। उनके मन में बड़े भाई के लिए शुभ कामनाएँ उमड़ पड़ीं, और वे प्रेम से विह्वल होकर उन्हें घेर खड़े हुए। सचमुच, बलराम इसके योग्य ही थे।
और ऊपर, जिन्हें यह पापी असुर बहुत दिनों से सता रहा था, वे देवता परम निश्चिन्त हुए। उन्होंने बलराम पर फूल बरसाए और ”बहुत अच्छा किया, बहुत अच्छा किया” कहकर उनकी प्रशंसा की।
उस दिन वृन्दावन ने जाना कि जो भाई सदा पीछे चलता है, जो बाँसुरी के पीछे ताल देता है, उसकी बाँह में भी वही बल है जिससे कभी पर्वत गिराए गए थे।
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इस कथा का एक छोटा-सा पिछला सिरा भी है, जो उसी वन में, उन्हीं दिनों का है।
जब लड़के खेल में डूबे थे, उनकी बकरियाँ, गायें और भैंसें चरती-चरती बहुत दूर निकल गई थीं। हरी-हरी घास के लोभ में वे एक गहन वन में घुस गईं, और एक वन से दूसरे वन होती हुई अन्त में मुंजाटवी नामक सरकंडों के वन में जा फँसीं। वहाँ गर्मी के ताप से और प्यास से व्याकुल होकर वे डकराने लगीं।
जब श्रीकृष्ण और बलराम आदि ग्वालबालों ने देखा कि पशुओं का कहीं पता-ठिकाना ही नहीं, तो उन्हें अपने खेल पर बड़ा पछतावा हुआ। वे खुरों के चिह्न और कटी हुई घास के सहारे गौओं का पता लगाते आगे बढ़े, और अन्त में उन्हें ढूँढ निकाला। तब अपनी मेघ-सी गम्भीर वाणी से उन्होंने गौओं को नाम ले-लेकर पुकारा, और गौएँ अपने नाम की ध्वनि सुनकर हर्षित होकर रँभाने लगीं।
पर तभी उस वन में चारों ओर अचानक दावाग्नि लग गई, और तेज़ आँधी उसे बढ़ाने लगी। आग की प्रचण्ड लपटें समस्त चराचर को भस्म करने को बढ़ीं। ग्वाल और गौएँ डर के मारे श्रीकृष्ण और बलराम की शरण में आ गए, जैसे मृत्यु के भय से डरे जीव भगवान् की शरण में आते हैं। ”हे कृष्ण। हे महाबली बलराम।” वे पुकार उठे, ”आप ही हमारे एकमात्र रक्षक और स्वामी हैं, हमें इससे बचा लीजिए।”
श्रीकृष्ण ने उनसे केवल इतना कहा, ”डरिए मत। आँखें मूँद लीजिए।”

उन्होंने आँखें मूँद लीं। और जब खोलीं, तो आग कहीं न थी। वे सब भाण्डीर के उसी बरगद के पास खड़े थे, सुरक्षित। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उस घोर आग को अपने मुँह से पी लिया था, और बच्चों को बस यह पता चला कि उनका सखा कोई साधारण बालक नहीं, कोई देवता है।
शुकदेव चुप हुए।
परीक्षित् कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, ”भगवन्, मुझे यह अच्छा लगा कि उस दिन श्रीकृष्ण पीछे रह गए और बड़े भाई को घड़ी मिली। पर एक बात पूछूँ। बलराम पहले घबरा गए थे। फिर दूसरे ही क्षण भय जाता रहा। वह क्या था, जिसने उनका डर ले लिया?”
”स्वरूप की याद, राजन्,” शुकदेव ने धीरे से कहा। ”असुर ऊपर उठा तो बलराम भी एक पल को वही थे जो हम सब होते हैं, अकेले, ऊँचाई पर, नीचे ज़मीन भागती हुई। पर अगले ही क्षण उन्हें याद आ गया कि वे कौन हैं। डर वहीं तक रहता है जहाँ तक हम भूले रहते हैं कि हम किसके हैं। याद आते ही घूँसा अपने आप उठ जाता है।”
परीक्षित् ने धीरे से सिर हिलाया। तक्षक की वह घड़ी अब भी आगे कहीं खड़ी थी, पर इस समय वह उनके मन में नहीं थी।
भागवतम् में बलराम प्रायः छाया की तरह रहते हैं। श्रीकृष्ण आगे, और वे पीछे। यह कथा उस छाया को एक बार पूरे प्रकाश में ला खड़ा करती है। यहाँ नायक श्रीकृष्ण नहीं, उनका बड़ा भाई है।
और ध्यान देने की बात यह है कि बलराम का बल तब तक काम न आया जब तक उन्हें यह याद न आया कि वे कौन हैं। पीठ पर ढोते समय वे साधारण खिलाड़ी थे। आकाश में उठते समय एक पल को घबराए हुए। पर जैसे ही स्वरूप की स्मृति लौटी, वही बाँह जो कुश्ती में ताल दे रही थी, पर्वत गिराने वाली बाँह हो गई।
प्रलम्ब की भूल भी छोटी न थी। वह श्रीकृष्ण को बलवान् जानकर डरा, और बलराम को हल्का समझकर उठा ले गया। संसार अक्सर यही करता है, जो सीधा-सादा पीछे खड़ा रहता है उसे हल्का आँक लेता है। प्रलम्ब को यह तब पता चला जब बोझ पर्वत हो गया और चाल रुक गई।
एक ही घूँसा। न शस्त्र, न मन्त्र, न कोई आडम्बर। जहाँ अपना स्वरूप याद हो, वहाँ इतना ही बहुत है।
साहित्यिक-संदर्भ
प्रलम्बासुर के वध की कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 18 में आती है, और गौओं तथा ग्वालों का दावानल से बचना उससे आगे अध्याय 19 में। यह उन थोड़ी-सी कथाओं में है जहाँ नायक श्रीकृष्ण नहीं, बल्कि बलराम हैं। बरगद का नाम भाण्डीर और असुर का नाम प्रलम्ब, दोनों गीताप्रेस-पाठ के अनुसार हैं। एक ही घूँसे का यह वध भागवतम् के अनेक बाल-लीला प्रसंगों में अत्यन्त संक्षिप्त और सर्वाधिक चकित कर देने वाला है।