कंस-वध
अक्रूर का रथ मथुरा पहुँचा।
कृष्ण और बलराम पहली बार मथुरा देख रहे थे। बड़ा शहर। महल। बाज़ार। ग़ज़ब का सब कुछ।
मथुरा के लोग बाहर निकल आए। ”वो आ गए। कंस को मारने वाले।”
बच्चे, औरतें, पुरुष, सब उन्हें देखने को।
रास्ते में पहली घटना। एक धोबी आ रहा था। उसके पास कंस के लिए नए कपड़े थे।
कृष्ण ने पूछा, ”भाई, क्या तुम हमें भी कुछ कपड़े दोगे? हम जंगल से आए हैं।”
धोबी हँसा। ”चल भाग। यह कंस के लिए हैं। तू कौन है, माँगने वाला?”
कृष्ण ने एक हलका सा हाथ चलाया।
धोबी मरा। कपड़े बिखर गए।
कृष्ण और बलराम ने कुछ कपड़े उठाए। पहने।
”मथुरा में पहला lesson, अहंकार चलेगा नहीं।”
आगे एक मालिन मिली। कुब्जा। उसकी पीठ टेढ़ी।
”भाई, तुम कौन हो? बहुत सुन्दर लग रहे हो।”
”मैं कृष्ण। कुछ माला है?”
उसने अपनी सबसे अच्छी मालाएँ दीं।
कृष्ण ने उसके बदले उसकी पीठ छुई। सीधी कर दी।
वो अब एक सुंदर युवती बन गई।
वो लाल-लाल हो गई। ”प्रभु, मेरे साथ चलिए।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, ”बाद में, अभी काम है।”
आगे, कंस का धनुर्यज्ञ। एक बड़ा arena। दीवारें ऊँची।
उन्होंने एक विशाल धनुष देखा। कंस का। ब्रह्मा-समय का। कोई उठा नहीं सकता था।
कृष्ण ने उसे उठाया। और तोड़ दिया।
आवाज़ इतनी ज़ोर की पूरी मथुरा हिल गई। कंस को महल में पता चल गया।
अगले दिन मल्ल-युद्ध की तैयारी।
कंस ने अपने सबसे बड़े हाथी कुवलयापीड़ को दरवाज़े पर रखा। ”कृष्ण-बलराम जब अंदर आएँ, हाथी रौंद देगा।”
कृष्ण-बलराम पहुँचे। हाथी ने सूँड उठाई।
कृष्ण ने सूँड पकड़ी। एक झटका। हाथी का बल टूटा। कृष्ण ने उसके दाँत निकाले। हाथी मरा।
वो उन दाँतों को कंधे पर रखकर अंदर गए।
अंदर पहलवान खड़े थे। चाणूर, मुष्टिक, शल। कंस के सब से बड़े मल्ल।
एक तरफ़ बच्चे, कृष्ण-बलराम। दूसरी तरफ़ ये विशालकाय पहलवान। यह कोई मल्ल-युद्ध नहीं था, मर्डर था।
मथुरा की औरतें यह देखकर रोने लगीं।
”ये बच्चे क्या करेंगे? कंस इन्हें मार देगा।”
मगर कृष्ण ने पहलवानों से कहा, ”चलिए, शुरू करिए।”
चाणूर कृष्ण पर टूटा।
कृष्ण ने उसको उठाया। हवा में घुमाया। ज़मीन पर पटका। मर गया।
मुष्टिक बलराम पर। बलराम ने उसकी छाती पर मुक्का मारा। उसका दिल फटा।
शल और तोशल। दोनों मारे गए।
एक पल में, कंस की सेना के सब से बड़े पहलवान, सब ज़मीन पर।
श्रीकृष्णो जगृहे केशेषु निशिते क्षणैः ॥
उसे, कंस को, जिसकी सेना उग्र थी और कर्म क्रूर, कृष्ण ने एक पल में बालों से पकड़ा।
अब बस कंस बचा था। ऊपर अपने सिंहासन पर।
उसका चेहरा सफ़ेद। उसने सब plans फेल होते देखे।
उसने भागने की कोशिश की। मगर देर हो चुकी।
कृष्ण एक छलाँग में उसके सिंहासन तक पहुँचे। मुकुट उसके सिर से गिरा।
उसके बाल पकड़े। उसे नीचे फेंका।
कंस गिरा। नीचे, अरena में। कृष्ण उस पर कूदे।
कुछ ही पल। कंस मर गया।
बाकी कौरव-समान कंस-भाइयों ने तलवारें निकालीं। बलराम ने उन्हें भी निपटा दिया।
मथुरा में अब कंस नहीं था।
कृष्ण और बलराम कारागार की तरफ़ बढ़े।
उन्होंने वहाँ देवकी और वसुदेव को देखा। अपने जैविक माँ-बाप।
बहुत सालों बाद। दोनों बूढ़े हो चुके थे। ज़ंजीरों में। थके हुए।
कृष्ण ने उनकी ज़ंजीरें खोलीं। उनके पैर छुए।
”माँ, पिताजी।”
देवकी रोते-रोते उन्हें गले लगा रही थी। वसुदेव चुप।
उन्होंने उग्रसेन को, कंस के पिता को, कारागार से निकाला। फिर से राजा बनाया।
कृष्ण और बलराम मथुरा के राजकुमार बन गए।
मगर गोकुल में, नंद-यशोदा का दिल टूट गया। उनका बेटा अब महल का था।
कथा यहाँ ख़त्म नहीं हुई। बहुत कुछ बाक़ी था। मगर एक अध्याय बंद हुआ। एक राक्षस-राजा का अंत। एक धर्म की वापसी।
कंस-वध भागवतम् का एक turning point है।
इस तक पूरी कथा बच्चे की लीलाओं की थी। माखन, गोपियाँ, बाँसुरी, पहाड़।
अब कुछ बदला। एक राजकुमार बन गया। राज-नीति शुरू हुई।
और एक interesting बात। कृष्ण ने कंस को आसानी से मारा। एक पल में। कोई epic battle नहीं।
क्यों? क्योंकि भागवतम् कह रहा है, अगर भगवान को सच में आना है, तो दुश्मन का कोई chance नहीं। जो बहुत बड़ी threat लगता है, वो भी एक झटके में निपट जाती है।
हमारी अपनी ज़िंदगी में भी, हम अक्सर बहुत डर लगाते हैं किसी situation का। और जब वो आती है, तो हम पाते हैं, असल में वो उतनी बड़ी नहीं थी जितनी हम सोचते थे।
और एक बात। मथुरा-वासी, जो कंस के नीचे डर में रहते थे, उन्हें अब एक नया राजा मिला। पर कृष्ण ने ख़ुद राज नहीं किया, उग्रसेन को बैठाया।
एक leader जो power लेता है, मगर title नहीं चाहता। यह भी एक quality है।