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कंस-वध

कथा 28 · भागवतम् की कथाएँ

कंस-वध

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स्कन्ध 10, अध्याय 41-44

गंगा का जल उस सुबह कुछ ठहरा हुआ बह रहा था। परीक्षित् ने मुनि की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, कल आपने उस अक्रूर की बात कही, जिसने रथ की धूल में भी श्रीहरि के चरण-चिह्न देखे। पर मेरे मन में एक बात अटकी है। जो कंस वर्षों से इन्हीं की प्रतीक्षा में जागता रहा, जिसने इन्हीं के डर से अपनी बहन के छह शिशु पत्थर पर पटक दिए, उसका अंत कैसा हुआ? क्या उसे भी कोई गति मिली, या वह केवल एक राक्षस की तरह मारा गया?”

शुकदेव मुस्कुराए। उनकी आवाज़ धीमी और गहरी थी। ”राजन्, जिसने जीवन भर श्रीहरि का स्मरण द्वेष से ही किया, उसका भी स्मरण तो स्मरण ही था। सुनिए, कंस का अंत किस घड़ी आया।”

अक्रूर का रथ मथुरा की सीमा पर रुका। अक्रूर ने चाहा कि भगवान् पहले उनके घर पधारें, पर श्रीकृष्ण ने हँसकर कहा कि पहले नगर देख लें, फिर अवश्य आएँगे। कृष्ण और बलराम पहली बार मथुरा देख रहे थे, स्फटिकमणि के ऊँचे गोपुर, ताँबे-पीतल की चहारदीवारी, सोने के बड़े-बड़े फाटक।

शहर की हवा में एक ख़बर तैर रही थी। लोग छतों पर, गलियों में निकल आए। ”वही दोनों हैं। गोकुल के। जिनके आने की बात कंस सुनकर काँपता है।”

बच्चे, बूढ़े, औरतें, सब उस साँवले मुख को देखने को आँखें बिछाए खड़े थे।

रास्ते में एक धोबी मिला, जो कंस के वस्त्र रँगने का काम भी करता था, हाथ में धुले-रँगे नए वस्त्रों का गट्ठर। कृष्ण ने सहज भाव से कहा, ”भाई, इनमें से दो जोड़े हमें भी दे दीजिए, जो हमारे शरीर पर पूरे-पूरे आ जाएँ। हम परदेस से आए हैं।”

धोबी ने नाक-भौं सिकोड़ी। ”आगे बढ़िए, ग्वाल के लड़को। ये राजा कंस के वस्त्र हैं। जो राजा का धन यों माँगता है, राजकर्मचारी उसे पकड़ लेते हैं, मार डालते हैं। जीना हो तो आगे जाइए।”

Rich painterly classical-Indian color illustration on a Mathura street: the blue-skinned youth Krishna and fair-skinned Balarama beside the king's washerman, whom Krishna has just struck dead with a flick of his open hand; the washerman's head fallen from his body, freshly dyed colorful garments scattered in the dust, his servants fleeing in panic, the jeweled crystal city gates and onlooking townsfolk in the background.

कृष्ण ने हथेली के अग्रभाग से एक हलका वार किया। धोबी का सिर धड़ से अलग हो गिरा, रँगे हुए वस्त्र धूल में बिखर गए, और उसके सेवक गट्ठर वहीं छोड़कर भाग खड़े हुए।

कृष्ण और बलराम ने अपने-अपने रंग के वस्त्र चुने और पहन लिए, शेष में से बहुत-से अपने ग्वाल-बालों को बाँट दिए। मथुरा ने पहली बार देखा कि जिसके सामने यह नगर अकड़ता था, उसका घमंड कितनी जल्दी मिट्टी में मिल सकता है।

थोड़ा आगे एक दर्जी मिला। श्रीकृष्ण का अनुपम सौन्दर्य देखकर वह निहाल हो गया, और उसने रंग-बिरंगे वस्त्र दोनों भाइयों के शरीर पर ऐसे सजा दिए कि वे उत्सव का वेश धारण किए दो किशोर-से दीख पड़े। प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उसे धन-सम्पत्ति, बल और अपने सारूप्य का वर दिया।

वहाँ से आगे बढ़कर दोनों भाई सुदामा माली के घर पहुँचे। सुदामा उन्हें देखकर निहाल हो गए, उठकर चरणों में सिर रखा, और आसन पर बैठाकर सुगन्धित फूलों के हार पहनाए। श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उन्हें अचल भक्ति, समस्त प्राणियों के प्रति सौहार्द और घर-भर की समृद्धि का वर दिया।

थोड़ा आगे एक स्त्री खड़ी थी, हाथ में चन्दन और अंगराग का पात्र। उसका मुख तो सुन्दर था, पर शरीर तीन जगह से झुका हुआ, इसी से लोग उसे कुब्जा कहते। उसने उस साँवले युवक को देखा और उसकी साँस एक पल को थम गई।

”आप कौन हैं? ऐसा मुख तो मैंने आज तक नहीं देखा।”

”सुन्दरी, यह अंगराग किसके लिए है? थोड़ा हमें भी दीजिए। इस दान से आपका परम कल्याण होगा।”

उसने बताया कि वह कंस की दासी है, त्रिवक्रा नाम है, और चन्दन-अंगराग लगाने का काम करती है। फिर उसने अपना अत्यन्त गाढ़ा सुगन्धित अंगराग उठाकर दोनों के अंगों पर लगा दिया, बिना सोचे, बिना मोल-तोल किए।

Rich painterly classical-Indian color illustration: dark-blue Krishna pressing the hunchbacked maidservant Trivakra's feet with his own feet while lifting her chin with two fingers, her thrice-bent body straightening into a beautiful young woman holding a bowl of fragrant sandal-paste; Balarama beside him, a Mathura lane setting, devotion and wonder on her glowing face.

कृष्ण ने अपने चरणों से उसके पैर दबाए, दो अँगुलियों से उसकी ठोड़ी पकड़कर ज़रा-सा ऊपर उठाया, और उसका झुका हुआ शरीर सीधा हो गया। वर्षों की टेढ़ी रीढ़ एक छुअन में सहज हो आई, और वह रूप-गुण से सम्पन्न एक उत्तम युवती बन गई।

लज्जा और प्रेम से उसका मुख तप उठा। ”प्रभु, मेरे घर पधारिए। एक बार।”

कृष्ण ने हँसकर कहा, ”अपना काम पूरा करके अवश्य आएँगे। अभी एक काम बाकी है।”

आगे यज्ञशाला थी, जहाँ कंस का धनुर्यज्ञ होने को था। ऊँची दीवारें, पहरे पर सैनिक।

बीच में इन्द्रधनुष के समान एक विशाल धनुष रखा था, बहुमूल्य अलंकारों से सजा हुआ। कहते थे, इसे उठाना तो दूर, हिलाना भी किसी से न हुआ था।

Rich painterly classical-Indian color illustration inside Kamsa's sacrificial bow-hall: blue Krishna effortlessly lifting the single giant rainbow-hued ceremonial bow in his left hand, stringing it and snapping it in two; jeweled ornaments on the bow, high guarded walls, startled soldiers, Balarama nearby.

कृष्ण ने बाएँ हाथ से उसे खेल-ही-खेल में उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई, और एक ही झटके में बीच से तोड़ डाला।

उस टूटने की आवाज़ ऐसी गरजी कि आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ भर गईं। महल में बैठे कंस के सीने में वह आवाज़ काँटे की तरह उतर गई। धनुष के रक्षक टूट पड़े, ”पकड़ लो, बाँध लो, जाने न पावे,” पर कृष्ण और बलराम ने उन्हीं धनुष-खण्डों से उन्हें और कंस की भेजी सेना को वहीं ढेर कर दिया।

उस रात कंस को नींद नहीं आई। बहुत-से अपशकुन उसे दीखे, और उसका चित्त मृत्यु की आशंका से काँपता रहा।

दूसरे दिन सूर्योदय होते ही मल्ल-युद्ध का महोत्सव आरंभ हुआ।

कंस ने अपने अत्यन्त मतवाले हाथी कुवलयापीड़ को रंगभूमि के द्वार पर खड़ा करवा दिया। महावत को आदेश था, ”वे दोनों भीतर पाँव रखें, उससे पहले हाथी उन्हें रौंद डाले।”

कृष्ण और बलराम द्वार पर पहुँचे। हाथी ने चिंघाड़कर सूँड उठाई और कृष्ण की ओर झपटा।

Rich painterly classical-Indian color illustration at the arena gateway: blue Krishna having toppled the giant rut-maddened war-elephant Kuvalayapida, wrenching out its two tusks; the slain elephant and its fallen mahout in the dust, blood and ichor drops, Balarama beside; the two boys each shouldering a tusk.

कृष्ण उसके पैरों के बीच में जा छिपे, फिर पूँछ पकड़कर, जैसे गरुड़ साँप को घसीटता है, उसे खेल-ही-खेल में घसीटते रहे। वह पकड़ने को दायें झपटता तो वे बायें निकल जाते। फिर सामने आकर एक घूँसा जमाया, गिरने का अभिनय कर पाँव में आ गए, और जब क्रोध से अंधे हाथी ने दाँत धरती पर दे मारे, उन्हें पकड़कर एक झटके में उसे गिरा दिया। दोनों दाँत उखाड़ लिए, और उन्हीं दाँतों के प्रहार से कुवलयापीड़ और उसके महावत वहीं ढेर हो गए।

एक दाँत कृष्ण ने, एक बलराम ने कंधे पर रखा, और रक्त और मद की बूँदों से सने उसी रूप में रंगभूमि के भीतर चले गए।

भीतर अखाड़े में कंस के मल्ल जमे खड़े थे, चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल, वज्र के समान कठोर अंगों वाले।

एक ओर अभी किशोरावस्था के दो सुकुमार बालक। दूसरी ओर ये पर्वत जैसे विशालकाय मल्ल। देखने वालों का कलेजा मुँह को आ गया।

मथुरा की स्त्रियाँ टोलियाँ बनाकर सिसक उठीं। ”यहाँ राजा कंस के सभासद् बड़ा अन्याय कर रहे हैं। ये कोमल बालक इन वज्र जैसे पहलवानों से कैसे भिड़ेंगे? जहाँ अधर्म हो, वहाँ रुकना भी पाप है।”

चाणूर ने सामने आकर ललकारा, ”नन्दनन्दन, बलराम! महाराज आपका कौशल देखना चाहते हैं। आइए, हमसे भिड़िए।” कृष्ण ने शान्त स्वर में कहा, ”हम भी कंस की प्रजा हैं, उन्हें प्रसन्न करना ही चाहिए। आइए, आरंभ कीजिए।”

चाणूर गरजकर कृष्ण पर टूटा।

Rich painterly classical-Indian color illustration in the wrestling arena: blue Krishna gripping both arms of the mountainous wrestler Chanura, whirling him through the air and slamming him lifeless to the ground like a fallen Indra-banner; Balarama nearby, the towering rival wrestlers and a tiered crowd watching in alarm.

कृष्ण ने उसकी दोनों भुजाएँ पकड़ीं, अन्तरिक्ष में कई बार घुमाया, और पूरे बल से धरती पर पटक दिया। घुमाते समय ही चाणूर के प्राण निकल चुके थे, और वह इन्द्रध्वज के समान धराशायी हो गिरा।

मुष्टिक बलराम से जा भिड़ा। बलराम के एक तमाचे ने उसे आँधी में उखड़े वृक्ष-सा हिला दिया, और वह रक्त वमन करता हुआ गिर पड़ा।

फिर कूट को बलराम ने बायें हाथ के घूँसे से, शल को कृष्ण ने पैर की ठोकर से, और तोशल को चीरकर दो टुकड़ों में, एक के बाद एक उसी अखाड़े की धूल में सुला दिया।

पल भर में कंस के प्रमुख मल्ल अखाड़े की धूल में पड़े थे, और बचे हुए सब प्राण बचाने को भाग खड़े हुए।

अब ऊँचे मंच पर अकेला कंस बचा था, अपने सिंहासन से चिपका हुआ।

उसका मुख राख हो गया। वर्षों की वे सब चालें, वे सब पहरे, वह सारा डर जो उसने ओढ़ रखा था, उसी की आँखों के सामने भरभराकर गिर रहा था। उसने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि वसुदेव को मार डालो, गोपों का धन छीन लो, पर अब समय हाथ से निकल चुका था।

कृष्ण एक छलाँग में मंच पर जा पहुँचे। कंस ने भागने को ढाल और तलवार उठाई, पर श्रीहरि ने, जैसे गरुड़ साँप को पकड़ता है, उसे पकड़ लिया। कंस का मुकुट लुढ़ककर गिर पड़ा।

उन्होंने उसके केश पकड़े और उसे मंच से नीचे रंगभूमि में खींच लिया।

Rich painterly classical-Indian color illustration: blue Krishna having dragged Kamsa down by the hair from his high throne-platform into the arena dust, now leaping upon the tyrant's chest as Kamsa's life departs; the fallen crown rolling away, dropped shield and sword, the empty raised dais and shocked spectators behind.

कंस रंगभूमि की धूल में जा गिरा, और कृष्ण उसकी छाती पर कूद पड़े। उसी क्षण उसके प्राण निकल गए।

जिस मुख को वह जीवन भर भय से, घृणा से, हर साँस में याद करता रहा था, मरते समय उसे उसी रूप की प्राप्ति हुई। जिसने वर्षों श्रीहरि को बैरी मानकर भी एक क्षण के लिए भी न भुलाया, उसकी वह अटूट स्मृति अंत में उसे उन्हीं के सारूप्य तक ले आई, जो बड़े-बड़े तपस्वी योगियों को भी दुर्लभ है। वैर भी, जब इतना सघन हो जाए कि और कुछ याद न रहे, मुक्ति का द्वार बन जाता है।

कंस के आठ छोटे भाई, कंक और न्यग्रोध आदि, बदला लेने को झपटे, पर बलराम ने परिघ उठाकर उन्हें भी, जैसे सिंह पशुओं को, एक-एक कर शान्त कर दिया।

मथुरा के सिर से एक लंबा अँधेरा उठ गया। कंस और उसके भाइयों की स्त्रियाँ विलाप करती हुईं रंगभूमि में आ गिरीं। श्रीकृष्ण ने उन्हें ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी, और लोक-रीति के अनुसार मरने वालों का सब क्रिया-कर्म करवाया।

फिर कृष्ण और बलराम सीधे कारागार की ओर बढ़े।

वहाँ ज़ंजीरों में जकड़े देवकी और वसुदेव बैठे थे, वही माता-पिता जिन्होंने इन्हें जन्म दिया और जिनकी गोद इन्हें कभी न मिली।

इतने बरस बीत गए थे। दोनों के बाल पक चुके थे, हाथों में बेड़ियों के निशान, आँखों में लंबी रातों की थकान।

कृष्ण ने अपने हाथों से उनकी बेड़ियाँ खोलीं और सिर झुकाकर दोनों के चरण छुए।

”माँ। पिताजी।”

पर देवकी और वसुदेव अपने पुत्रों के प्रणाम पर भी उन्हें जगदीश्वर जानकर हृदय से न लगा सके। मन में एक झिझक उठ आई, यह सोचकर कि इन्हें अपना पुत्र समझें भी तो कैसे। वसुदेव कुछ कह न सके, बस हाथ उनके सिर की ओर बढ़ते-रुकते रहे।

कृष्ण ने कंस के बूढ़े पिता उग्रसेन को कारागार से निकाला और फिर से मथुरा के सिंहासन पर बैठा दिया, स्वयं राजा नहीं बने, यदुवंशी ही बने रहे।

उधर गोकुल में नंद और यशोदा की गोद सूनी रह गई। जिस लाला की आहट के लिए यशोदा का कान दिन-भर तरसता था, वह अब पत्थर के महल का हो चला था।

कथा यहाँ रुकी नहीं, आगे बहुत कुछ शेष था। पर एक लंबा अध्याय आज बंद हुआ, और मथुरा की हवा में बरसों बाद एक निडर साँस लौट आई।

मन्थन

शुकदेव क्षण भर रुके। परीक्षित् ने सिर झुकाए हुए ही पूछा, ”भगवन्, जो दृश्य आपने सुनाया, वह मेरे भीतर बैठ गया है। कंस ने जीवन भर इसी डर में साँस ली कि श्रीहरि उसे मारने आएँगे। और अंत में मारने वाले वही निकले। तो क्या उसका वह सारा भय व्यर्थ गया, या उसी भय ने उसे किसी अनजान ठौर पहुँचा दिया?”

शुकदेव की आवाज़ धीमी हुई। ”राजन्, स्मरण की कई राहें हैं। कोई प्रेम से याद करता है, कोई भय से, कोई बैर से। पर जो किसी एक भाव में डूबकर श्रीहरि को एक पल भी न भुला सके, उसका चित्त उन्हीं में रम जाता है। कंस सोते-जागते, खाते-पीते केवल कृष्ण का ही चिंतन करता रहा, बस उल्टी ओर से। मरते समय उसे जो सारूप्य प्राप्त हुआ, वह किसी योगी को भी दुर्लभ है।”

”देखिए, इन्होंने कंस को एक पल में निपटा दिया, कोई लंबा संग्राम नहीं हुआ। पर वध करना तो कभी इनका प्रयोजन था ही नहीं। प्रयोजन था उस भय को उठा लेना, जिसके नीचे मथुरा वर्षों दबी रही।”

”और एक बात पर मन ठहरता है, राजन्। सिंहासन इन्होंने जीता, पर उस पर बैठे नहीं। बूढ़े उग्रसेन को बैठाकर स्वयं चरणों में खड़े रहे। जो लेने को सब कुछ ले सकता था, उसने रखने को कुछ न रखा। यही उनका ढंग है।”

परीक्षित् कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, ”तो मृत्यु से डरना भी, यदि उसमें इन्हीं का स्मरण घुला हो, व्यर्थ नहीं।” शुकदेव ने केवल देखा, और कुछ न कहा। गंगा अपनी धारा में एक पत्ता बहाए लिए जा रही थी।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 41 से 44 तक की है। मथुरा-प्रवेश, धोबी, दर्जी और सुदामा माली, कुब्जा, धनुर्भंग, कुवलयापीड़ और मल्लों का वध, और अंत में कंस-वध, इसी क्रम में गीताप्रेस संस्करण में वर्णित है।

कंस की मुक्ति बैर-भक्ति का उदाहरण है, जैसे शिशुपाल और हिरण्यकशिपु की। भागवत निरंतर स्मरण को, चाहे वह द्वेष का ही क्यों न हो, गति का कारण मानता है। कंस के आठ भाइयों का तथा चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल मल्लों का उल्लेख अध्याय 44 में आता है। माता-पिता को हृदय से लगाने और उग्रसेन के राज्याभिषेक का प्रसंग अध्याय 45 में आगे आता है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

कंस ने जिस मृत्यु से बचने में सारा जीवन लगा दिया, वही उसके पास उसी रूप में आई जिससे वह डरता था। जिसका भय हम दिन-रात ओढ़े रहते हैं, वही हमारे भीतर का परम गहरा स्मरण बन जाता है, और कभी-कभी वही द्वार भी।