लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

लङ्काकाण्ड

तुलसीदासरामचरितमानसषष्ठ सोपान

इस काण्ड में दोनों ओर के योद्धा गिनती से बाहर हैं। फिर भी सारी कथा अन्त में दो व्यक्तियों के आमने-सामने आ जाने पर टिक जाती है।

रामचरितमानस का छठा सोपान युद्ध का काण्ड है, पर वह कभी केवल युद्ध नहीं रहता। बीच-बीच में कथा रुककर वह बात कह देती है जिसके लिये यह सारा आयोजन हुआ है। याद रहनेवाली पंक्तियाँ प्रायः तलवार के नहीं, ठहराव के क्षणों की हैं।

रावण की सभा में अंगद ने अपना पैर रोप दिया है, और इन्द्रजित समेत बड़े योद्धा उसे हिला नहीं पाते, जबकि दस सिर वाला रावण सिंहासन से देखता है।

यहाँ हर प्रसंग अपना पूरा पन्ना है। उसकी हिन्दी कथा गीता प्रेस के पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के सहारे लिखी गयी है।

प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए

  1. सेतु-बन्धदोहा 1 से 5
    समुद्र के किनारे पत्थर उठाये जा रहे हैं, और ठीक उसी साँस में यह तय हो रहा है कि कौन किसका भक्त है।
  2. मन्दोदरी की विनती और प्रहस्त की चेतावनीदोहा 6 से 10
    लंका में दो लोग रावण से वह बात कहते हैं जो सच है। एक उसके अपने महल में और एक उसकी भरी सभा में। और दोनों को उसी दिन लौटा दिया जाता है।
  3. सुवेल की रात, चन्द्रमा का दाग और अंगद का चलनादोहा 11 से 17
    समुद्र पार कर चुकी सेना एक पहाड़ की चोटी पर डेरा डालती है। युद्ध से पहले की उस रात राम अपने साथियों से पूछते हैं कि चन्द्रमा में जो कालापन दीखता है वह क्या है।
  4. अंगद रावण की सभा मेंदोहा 18 से 28
    बालि का बेटा राम का दूत बनकर अपने पिता के पुराने मित्र की सभा में जा बैठता है। प्रसंग भर दो आदमी सिर्फ़ बोलते हैं।
  5. अंगद का पाँव, और वह सभा जो उसे हिला न सकीदोहा 29 से 35
    रावण की भरी सभा में बालि का बेटा एक शर्त रखता है। वह अपना चरण ज़मीन पर रोप देता है। इन्द्रजीत से लेकर स्वयं रावण तक कोई उसे उठा नहीं पाता।
  6. युद्ध का आरम्भ और पहला दिनदोहा 36 से 45
    मन्दोदरी की आख़िरी विनती से लेकर लङ्का के परकोटे पर पहली चढ़ाई तक। और उस पहले दिन के अन्त तक जब दो वानर रावण के महल की छत गिराकर थके बिना लौट आते हैं।
  7. रात की माया, माल्यवान् की सीख और शक्ति का लगनादोहा 46 से 54
    साँझ ढलते ही राक्षस अँधेरा रच देते हैं। रावण को सच सुनानेवाला तीसरा आदमी, एक बूढ़ा मन्त्री, बाहर कर दिया जाता है। अगले दिन रावण का बेटा वह चला देता है जिससे लक्ष्मण का देह ज़मीन पर आ जाता है।
  8. औषधि, भरत का बाण और कुम्भकर्ण का जागनादोहा 55 से 64
    एक ही रात में दो आदमी बचाये जाते हैं। एक वैद्य की दवा से और एक राम के भाई के पहचान लेने से। और दोनों बचाव एक वानर की उड़ान पर टँगे हैं।
  9. कुम्भकर्ण-वधदोहा 65 से 71
    जागे हुए भाई का युद्ध और उसका अन्त, और उस अन्त में एक ऐसी बात जो लङ्काकाण्ड में बहुत कम लोगों के हिस्से आती है।
  10. मेघनाद की माया और उसका अन्तदोहा 72 से 77
    एक रात की डींग से लेकर एक मरते हुए आदमी के दो प्रश्नों तक। और बीच में वह लड़ाई जिसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि लड़ने वाला दिखता ही नहीं था।
  11. रावण का रण-प्रस्थान और धर्म का रथदोहा 78 से 80
    एक सुबह लङ्कापति स्वयं रथ सजाकर निकलता है। उसी सुबह विभीषण यह पूछ बैठते हैं कि बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के वह बलवान वीर जीता कैसे जायगा। उत्तर में रामचरितमानस का सबसे प्रसिद्ध रथ खड़ा हो जाता है।
  12. रावण की शक्ति, यज्ञ का भंग, और राम का धनुष उठानादोहा 81 से 88
    रावण स्वयं रथ पर चढ़ता है। ब्रह्मा की दी हुई शक्ति लक्ष्मण को गिराती है, हनुमान एक घूँसे में उत्तर देते हैं। लङ्का में एक यज्ञ बैठता है और टूट जाता है, और अन्त में राम स्वयं शार्ङ्ग उठाते हैं।
  13. माया, द्वन्द्व और विभीषणदोहा 89 से 95
    इन्द्र का रथ उतरता है, रावण माया फैलाता है। सारा मैदान दो आदमियों के बीच सिमट आता है। वहाँ सिर कटते हैं और फिर उग आते हैं।
  14. माया, कटकर उगते हुए सिर, त्रिजटा का उत्तर और इकतीस बाणदोहा 96 से 102
    एक माया जिससे कथा खुलती है। वे सिर और भुजाएँ जो कटकर फिर उग आती हैं, उसी रात अशोक वाटिका में त्रिजटा का दिया हुआ उत्तर। दूसरी माया, विभीषण का बताया हुआ भेद, और अन्त में कान तक खिंचा हुआ धनुष।
  15. रावण का वध, मन्दोदरी का विलाप, और लङ्का का तिलकदोहा 103 से 107
    इकतीस बाण अपना काम कर जाते हैं। सिर और भुजाएँ मन्दोदरी के आगे रखी जाती हैं। वही स्त्री जो काण्ड भर समझाती रही थी अन्त में राम को नमस्कार करती है। विभीषण भाई की क्रिया करके सिंहासन पाते हैं, और हनुमान लङ्का जाकर जानकी से आशीर्वाद लेकर लौटते हैं।
  16. जो जला वह प्रतिबिंब थादोहा 108 से 113
    लङ्कापति मारा जा चुका है और सीता पालकी पर बिठा दी गयी हैं। तभी श्रीराम कहते हैं कि पालकी रहने दीजिये, वे पैदल आयें, ताकि वानर उन्हें माता की तरह देख सकें। यहीं से कथा उस आग तक पहुँचती है जिसमें सीता नहीं, उनका प्रतिबिंब और दुनिया का लगाया हुआ कलंक जलता है।
  17. अमृत, शिव की विनती, और वह विदा जो पूरी नहीं हुईदोहा 114 से 121
    इन्द्र अमृत बरसाकर मरे हुए वानर-भालुओं को उठा देते हैं। शिव आकर विनती करते हैं, विभीषण अपना घर सौंपते हैं। राम सबको अपने-अपने घर जाने को कहते हैं और कोई नहीं जाता, और पुष्पक उत्तर की ओर मुड़ जाता है।

यह तुलसी का राम-चरित है, वाल्मीकि का नहीं

इस स्थल पर वाल्मीकि रामायण अलग से पूरी पढ़ी जा सकती है, और दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं होगा। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में अवधी में लिख रहे थे, वाल्मीकि उनसे बहुत पहले संस्कृत में। कई प्रसंग दोनों में हैं, पर उनका रंग, क्रम और कभी-कभी ब्योरा भी अलग है। जो यहाँ कहा गया है, वह मानस का कहा हुआ है।

आधार: श्रीरामचरितमानस, षष्ठ सोपान (लङ्काकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।