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रावण की शक्ति, यज्ञ का भंग, और राम का धनुष उठाना

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · रावण की शक्ति, यज्ञ का भंग, और राम का धनुष उठाना

रावण की शक्ति, यज्ञ का भंग, और राम का धनुष उठाना

दोहा इक्यासी से अठासी तक: रावण स्वयं रथ पर चढ़ता है, ब्रह्मा की दी हुई शक्ति लक्ष्मण को गिराती है, हनुमान एक घूँसे में उत्तर देते हैं, लङ्का में एक यज्ञ बैठता है और टूट जाता है, और अन्त में राम स्वयं शार्ङ्ग उठाते हैं।

लङ्काकाण्ड यहाँ तक आते-आते एक खुली लड़ाई बन चुका है, जिसमें दोनों ओर के योद्धा भिड़ रहे हैं और कहानी किसी एक नाम पर नहीं टिकी है। इस पन्ने का पहला दोहा उसी भीड़ में से एक आदमी को अलग करके दिखाता है, और वह आदमी लड़ता हुआ नहीं दिखाया जाता। वह देखता हुआ दिखाया जाता है। रावण अपनी ही सेना को विचलित होते देखता है, और तब बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रथ पर चढ़ता है। इस पूरे प्रसंग की चाल इसी एक क्रिया से बँधी हुई है। आगे जो कुछ होता है वह सब उसी आदमी का अपने गिरते हुए पक्ष को सँभालने का प्रयत्न है, और हर प्रयत्न पिछले से छोटा होता जाता है।

तीन बार वह इस पन्ने पर गिरता है और तीन बार उठता है, और हर बार उठकर वह किसी नयी चीज़ पर हाथ रखता है। पहली बार लक्ष्मण के बाणों से गिरकर उठता है और वह शक्ति चलाता है जो ब्रह्मा ने उसे दी थी। दूसरी बार हनुमान के एक घूँसे से गिरकर उठता है और सामने वाले की सराहना करने लगता है। तीसरी बार वह लङ्का में होश में आता है और यज्ञ पर बैठ जाता है। और जब वह यज्ञ भी टूट जाता है, तो आख़िरी दोहे में जो बचता है वह माया है। पहले किसी का दिया हुआ अस्त्र, फिर एक विधि, फिर छल। रास्ता एक ही दिशा में जाता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और दोनों जगह यह प्रसंग एक जैसा नहीं चलता। यहाँ शक्ति लगने के बाद लक्ष्मण को उठाने के लिये न कोई वैद्य बुलाया जाता है, न कोई ओषधि आती है। राम एक वाक्य कहते हैं और वे उठ बैठते हैं। इस पन्ने पर जो नाम है, जो संख्या है और जो क्रम है, वह इसी अवधी पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका से लिया गया है, और कहीं से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • रावण लङ्कापति, जो इस पन्ने पर तीन बार गिरता है, तीन बार उठता है, और हर बार पहले से छोटी चीज़ का सहारा लेता है।
  • लक्ष्मण जो अपने दल को व्याकुल देखकर राम के चरणों पर सिर नवाकर निकलते हैं, और जिनकी छाती पर ब्रह्मा की दी हुई शक्ति आकर लगती है।
  • हनुमान पवनपुत्र, जो रावण का घूँसा घुटना टेककर सह जाते हैं, उत्तर में एक घूँसा देते हैं, और गिरे हुए लक्ष्मण को उठाकर राम के पास ले आते हैं।
  • राम जो इस पन्ने के बीच में एक वाक्य से भाई को उठा देते हैं, और अन्त में स्वयं जटाएँ बाँधकर शार्ङ्ग हाथ में लेते हैं।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो यज्ञ पर बैठे रावण को लात मारते हैं और जिनकी ओर वह आँख उठाकर भी नहीं देखता।
  • विभीषण जो यज्ञ की ख़बर सबसे पहले पाते हैं, तुरंत राम तक पहुँचा देते हैं, और उसे तोड़ने की प्रार्थना करते हैं।
  • देवता जो आकाश से युद्ध देखते हैं, फूल बरसाते हैं, और बीच में एक बार विनती करते हैं कि अब यह खेल बहुत हुआ।
  • वानर और भालू जो इस पन्ने पर भागते भी हैं और लङ्का के भीतर घुसकर रावण का यज्ञ तोड़ भी आते हैं।

बीस भुजाएँ और दस धनुष

पहला दोहा एक ऐसी क्रिया से शुरू होता है जो लड़ाई की नहीं है। रावण देखता है। वह देखता है कि उसका अपना दल विचलित हो रहा है, और तभी रथ पर चढ़ता है। तुलसी उसके शरीर का वर्णन नहीं करते, दो गिनतियाँ रख देते हैं, बीस भुजाएँ और दस धनुष, और उतने से पूरा आदमी खड़ा हो जाता है। और चलते समय वह जो शब्द बोलता है वह ललकार नहीं है। वह अपने ही भागते हुए सिपाहियों से कहा गया है, लौटो, लौटो। तुलसी इसके साथ एक शब्द और जोड़ देते हैं, दाप, यानी गर्व। जिस आदमी को अपने लोगों को लौटाना पड़ रहा है, वह उन्हें गर्व के साथ लौटा रहा है।

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥ ८१॥

दोहा ८१

इसके बाद वह दौड़ता है, परम क्रुद्ध। और यहाँ तुलसी वानरों को भागते हुए नहीं दिखाते। वे सामने आते हैं, हूह की हुंकार देते हुए, और हाथों में वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर सब एक ही साथ उस पर डाल देते हैं। एकहिं बारा, एक ही बार में। यह कोई सोची-समझी रचना नहीं है। यह वही है जो भीड़ करती है जब उसके सामने एक ही आदमी हो और फेंकने को जो हाथ लगे वही हो।

पहाड़ उसके शरीर से टकराते हैं और तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। और फिर वह पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा हिस्सा टिका हुआ है। वह हिला ही नहीं। रथ रोपकर अचल खड़ा रहा। रोपना वह क्रिया है जो खम्भे के साथ आती है, गाड़ देना। तुलसी यहाँ रावण को छोटा नहीं करते। वे उसे वही चित्र देते हैं जिसका हक़ उसे है, एक आदमी जिस पर पूरे पहाड़ फेंके जा रहे हैं और जो अपनी जगह से एक अंगुल नहीं सरकता।

फिर वह मसलना शुरू करता है। इधर-उधर झपटता है, डपटता है, और वानर योद्धाओं को मसलने लगता है। और तब वानर टूट जाते हैं। वानर और भालू भाग चलते हैं, और भागते हुए जो पुकार लगाते हैं उसमें एक सीढ़ी है। पहले वे अपने भीतर के सबसे बड़े दो नाम पुकारते हैं।

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा॥
चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना॥

चौपाई १

त्राहि त्राहि, अंगद, हनुमान। ये दोनों नाम इसी सेना के भीतर के हैं। और अगली ही पंक्ति में सीढ़ी का दूसरा डंडा आता है, पाहि पाहि रघुबीर गोसाईं, और उसके साथ वह कारण जो डर को नाप देता है। यह दुष्ट हमें काल की तरह खा रहा है। काल शब्द इस पन्ने पर कई बार आयेगा और हर बार अपनी जगह बदलेगा। अभी वह रावण के लिये आया है। थोड़ी देर बाद वही शब्द राम के मुँह से लक्ष्मण के लिये आयेगा, और अन्त से पहले रावण स्वयं काल के वश बताया जायेगा।

और अब वह दसों धनुषों पर बाण चढ़ाता है। ध्यान देने लायक़ यह है कि वह बाण तब चढ़ाता है जब सब वानर भाग चुके हैं। फिर छन्द आता है, और छन्द की पंक्ति चौपाई से लम्बी होती है, उसमें क्रियाएँ बिना साँस लिये एक के पीछे एक आती हैं। इस पन्ने पर जहाँ-जहाँ हाथ का काम सबसे तेज़ है, वहाँ-वहाँ तुलसी छन्द पर उतर आते हैं।

संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।
रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं॥
भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।
रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥

छन्द

बाण सर्प की तरह उड़कर लगते हैं। पृथ्वी, आकाश, दिशा और विदिशा, सब बाणों से भर गये हैं, और बीच में एक छोटा-सा प्रश्न रख दिया गया है, वानर भागें तो कहाँ। भागने की जगह ख़त्म हो जाना ही इस छन्द का विषय है। और तब जो पुकार उठती है उसमें चार नाम हैं और चारों काम बताते हैं: करुणा का समुद्र, दुखियों का बन्धु, सेवकों का रक्षक, हरनेवाला। जब कहीं जगह नहीं बचती, तब पुकारा जाने वाला नाम भी वही चुना जाता है जो काम का हो।

सार: अपनी सेना को विचलित देखकर रावण बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रथ पर चढ़ता है। वानर पहाड़ फेंकते हैं, जो उसके शरीर पर टूटकर बिखर जाते हैं, और वह अपनी जगह से नहीं हिलता। फिर वह वानरों को मसलने लगता है, वे अंगद और हनुमान को पुकारते हुए भाग चलते हैं, और दसों धनुषों से छूटे बाण धरती और आकाश भर देते हैं।

और लक्ष्मण ने भी अपनी सेना को देखा

अगला दोहा पहले दोहे की तरह ही शुरू होता है, और यही इस पन्ने की सबसे साफ़ बात है। दोहा इक्यासी में रावण ने अपने दल को बिचलत देखा था। दोहा बयासी में लक्ष्मण अपने दल को बिकल देखते हैं। दोनों आदमी एक ही चीज़ देखते हैं और दोनों उसी को देखकर निकल पड़ते हैं। फ़र्क़ आधी पंक्ति में रखा हुआ है। रावण गर्व करके चला था। लक्ष्मण कमर में तरकस कसकर, हाथ में धनुष लेकर, और राम के चरणों पर माथा नवाकर चलते हैं। निकलने से पहले एक आदमी अपने को बड़ा करता है और दूसरा झुकता है।

निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥ ८२॥

दोहा ८२

और वहाँ पहुँचकर जो बात होती है वह बहुत छोटी है। लक्ष्मण पूछते हैं कि इन वानर-भालुओं को क्या मार रहा है, और कहते हैं कि इधर देख ले, मैं इसका काल हूँ। यह ललकार है, और ललकार में उन्होंने वही शब्द चुना है जो अभी-अभी भागते हुए वानरों ने रावण के लिये इस्तेमाल किया था। रावण का उत्तर ललकार का उत्तर नहीं है। वह एक शिकायत है।

रे खल का मारसि कपि भालू । मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥
खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥

चौपाई २

सुतघाती। पुत्र का घातक। रावण के लिये यह लड़ाई अब न राज्य की रह गयी है, न किसी और चीज़ की। वह उसके मारे गये पुत्र की हो गयी है, और वह कहता है कि इसी को वह ढूँढ़ता फिर रहा था और आज इसे मारकर अपनी छाती ठंडी करेगा। जो आदमी दस धनुष लेकर रथ पर चढ़ा था और अकेले पूरी सेना को भगा चुका था, वह यहाँ बदला लेने आया हुआ एक पिता है। तुलसी उसका क़द यहाँ धीरे-धीरे घटाते हैं, और घटाने का तरीक़ा यह है कि उसकी अपनी कही हुई बात ज्यों की त्यों रख दी जाती है।

इसके बाद की दो चौपाइयाँ हिसाब की हैं और बहुत तेज़ हैं। प्रचण्ड बाण छूटते हैं, लक्ष्मण उन सबके सैकड़ों टुकड़े कर देते हैं। रावण करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाता है, लक्ष्मण उन्हें तिल के बराबर करके काट देते हैं। फिर वे अपने बाण चलाते हैं, रथ तोड़ते हैं, सारथि को मार देते हैं, और दसों मस्तकों में सौ-सौ बाण मारते हैं, जो सिरों में ऐसे पैठ जाते हैं जैसे पहाड़ की चोटियों में सर्प घुस रहे हों। फिर सौ बाण छाती में। रावण धरती पर गिरता है और उसे कुछ भी होश नहीं रहता।

और यहीं से वह पहला उठना होता है। मूर्च्छा छूटती है, वह उठता है, और वह शक्ति चलाता है जो ब्रह्मा ने उसे दी थी। यह ध्यान रखने की बात है कि जिस चीज़ से लक्ष्मण गिरते हैं वह रावण का बल नहीं है। वह किसी और की दी हुई चीज़ है, जो उसके पास रखी थी और जिसे वह उस घड़ी तक बचाकर रखे हुए था।

सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।
पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥
ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।
तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥

छन्द

छन्द दो हिस्सों में टूटता है और दोनों आमने-सामने रखे हुए हैं। पहले हिस्से में शक्ति ठीक छाती पर लगती है और वीर लक्ष्मण व्याकुल होकर गिर पड़ते हैं। दूसरे हिस्से में रावण उन्हें उठाने लगता है, और उठा नहीं पाता। उसके अतुलित बल की सारी महिमा वहीं धरी रह जाती है। जिस हाथ ने अभी एक शक्ति फेंककर उन्हें गिराया था, वही हाथ उन्हें ज़मीन से उठा नहीं सकता।

और उसी छन्द में तुलसी कारण भी बता देते हैं, और कारण गिनती की भाषा में देते हैं। जिनके एक ही सिर पर ब्रह्माण्ड रूपी भवन धूल के एक कण के बराबर रखा हुआ है, उन्हें यह मूर्ख उठाना चाह रहा है। पन्ना बीस भुजाओं और दस धनुषों की गिनती से शुरू हुआ था। यहाँ दूसरी गिनती आती है, एक सिर और एक कण, और पहली गिनती उसके सामने किसी काम नहीं आती।

सार: लक्ष्मण अपने दल को व्याकुल देखकर राम के चरणों पर माथा नवाकर निकलते हैं। रावण उन्हें पुत्र का घातक कहकर भिड़ता है, लक्ष्मण उसका रथ तोड़कर सारथि को मारते हैं और दसों सिरों तथा छाती में सौ-सौ बाण मारते हैं। मूर्च्छा से उठकर रावण ब्रह्मा की दी हुई शक्ति चलाता है, जो लक्ष्मण को गिरा देती है, पर गिरे हुए लक्ष्मण को वह उठा नहीं पाता।

एक घूँसा, और उसके बाद सराहना

यह देखकर पवनपुत्र दौड़ते हैं, और तुलसी लिखते हैं कि वे कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। वचन क्या थे, यह नहीं बताया गया। और आते ही उन पर रावण का घूँसा पड़ता है, जिसे दोहे में अत्यन्त भयङ्कर कहा गया है। इस पूरे पन्ने पर यह इकलौता वार है जो किसी अस्त्र से नहीं किया जाता।

हनुमान घुटना टेक देते हैं। वे गिरते नहीं। यह आधी पंक्ति बहुत नाप-तौलकर लिखी गयी है, क्योंकि उसमें दोनों बातें एक साथ हैं, कि चोट लगी और कि वह काफ़ी नहीं थी। फिर वे क्रोध से भरकर, सँभलकर उठते हैं और एक घूँसा मारते हैं। रावण ऐसे गिरता है जैसे वज्र की मार से पहाड़ गिरा हो। हिसाब बराबर है, एक घूँसा उधर से और एक इधर से, और अन्तर सिर्फ़ इतना है कि एक के बाद घुटना टिका और दूसरे के बाद पहाड़ गिरा।

और अब इस पन्ने की सबसे अनोखी बात आती है, जो युद्ध के ठीक बीच में रखी हुई है और जिसे पढ़कर रुकना पड़ता है।

मुरुछा गै बहोरि सो जागा । कपि बल बिपुल सराहन लागा॥
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही । जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही॥

चौपाई ३

मूर्च्छा टूटने पर वह जागता है और हनुमान के बल की सराहना करने लगता है। शत्रु प्रशंसा कर रहा है, और वह प्रशंसा सच्ची है, किसी चाल का हिस्सा नहीं है। और जिसकी प्रशंसा हो रही है, उसका उत्तर धिक्कार है। हनुमान अपने पौरुष को धिक्कारते हैं और अपने को भी, इस बात पर कि यह देवद्रोही अब भी जीता रह गया। एक ही चौपाई में दो आदमी हैं, एक गिरा हुआ जो सराह रहा है और एक खड़ा हुआ जो अपने ही ऊपर लज्जित है। तुलसी इसमें कोई टिप्पणी नहीं जोड़ते।

यह चौपाई हनुमान के बारे में जितना कहती है, उतना ही रावण के बारे में कहती है। जो आदमी अभी-अभी अकेले पूरी वानर सेना को भगा चुका है, वह गिरकर उठते ही सबसे पहले वही काम करता है जो अहंकार को सबसे भारी पड़ता है। वह मान लेता है कि सामने वाला बलवान है। और यही आदमी थोड़ी देर बाद यज्ञ पर बैठकर आँख नहीं उठायेगा। तुलसी उसे अन्धा नहीं बनाते। वे उसे ऐसा बनाते हैं जो देख भी ले तो भी वही करे जो पहले से तय है।

सार: हनुमान कठोर वचन बोलते हुए दौड़ते हैं और रावण का भयङ्कर घूँसा घुटना टेककर सह जाते हैं। उत्तर में उनका एक घूँसा रावण को वज्र से गिरे पहाड़ की तरह गिरा देता है। होश आने पर रावण उनके बल की सराहना करने लगता है, और हनुमान अपने पौरुष को इसलिये धिक्कारते हैं कि वह देवद्रोही अब भी जीवित है।

राम का एक वाक्य, और शक्ति का लौट जाना

इसके बाद हनुमान लक्ष्मण को उठाकर राम के पास ले आते हैं, और तुलसी बीच में एक छोटी-सी बात रख देते हैं: यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ। जिस शरीर को वह अपनी दसों भुजाओं से उठा नहीं पाया था, उसे एक वानर उठाकर लिये जा रहा है। आश्चर्य उसी को होता है जिसने ख़ुद कोशिश करके देख ली हो।

अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो । देखि दसानन बिसमय पायो॥
कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥

चौपाई ४

राम जो कहते हैं वह न सान्त्वना है, न दवा। वह एक याद दिलाना है। वे कहते हैं कि हृदय में समझ लें भाई, वे स्वयं काल के भी भक्षक हैं और देवताओं के रक्षक। कुछ देर पहले भागते हुए वानरों ने रावण को काल कहा था। अब वही शब्द उलटकर रख दिया गया है, और जिस पर शक्ति लगी है उसी को बताया जा रहा है कि वह किसका भक्षक है। तुलसी यहाँ कोई उपाय नहीं बताते, कोई विधि नहीं बताते। वे एक पहचान बताते हैं।

सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥
पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥

चौपाई ५

वचन सुनते ही वे उठ बैठते हैं। और उसी आधी पंक्ति में वह कराल शक्ति आकाश को चली जाती है। उसे निकालना नहीं पड़ता, तोड़ना नहीं पड़ता, किसी से लाने को नहीं कहा जाता। जिस क्षण लक्ष्मण को यह याद आ जाता है कि वे कौन हैं, उसी क्षण उस शक्ति के पास वहाँ ठहरने का कोई कारण नहीं बचता। इस पन्ने पर लक्ष्मण को उठाने के लिये न कोई वैद्य आता है, न कोई ओषधि। एक वाक्य आता है।

और उठकर वे बैठे नहीं रहते। धनुष-बाण लेकर दौड़ते हैं और बड़ी शीघ्रता से शत्रु के सामने आ पहुँचते हैं। इसके आगे का छन्द इस पन्ने की सबसे तेज़ चीज़ है और सबसे कम समय लेता है। लक्ष्मण फिर उसी क्रम से चलते हैं, रथ चूर-चूर, सारथि ढेर, और सौ बाणों से हृदय बिंधा हुआ। रावण धरती पर गिरता है, पहले से भी ज़्यादा व्याकुल। तब दूसरा सारथि उसे रथ में डालकर तुरंत लङ्का ले जाता है। और प्रताप के पुंज लक्ष्मण लौटकर प्रभु के चरणों में प्रणाम करते हैं।

इस पूरे हिस्से में वही क्रम दो बार दुहराया गया है। रथ टूटा, सारथि मरा, बाण छाती में गये, आदमी गिरा। पहली बार वह गिरकर अपने आप उठता है और शक्ति चला देता है। दूसरी बार उसे उठाने वाला कोई नहीं होता, उसे उठाकर ले जाना पड़ता है। यही इस पन्ने का बीच है। यहाँ तक रावण अपने पैरों से युद्ध छोड़कर नहीं गया था।

सार: हनुमान गिरे हुए लक्ष्मण को राम के पास ले आते हैं और रावण यह देखकर चकित रह जाता है। राम उन्हें याद दिलाते हैं कि वे काल के भी भक्षक और देवताओं के रक्षक हैं, और वचन सुनते ही वे उठ बैठते हैं तथा शक्ति आकाश को लौट जाती है। लौटकर लक्ष्मण रावण का रथ और सारथि फिर नष्ट करते हैं, और दूसरा सारथि उसे बेसुध लङ्का ले जाता है।

जागकर जो यज्ञ पर बैठ गया

अगला दोहा जगह बदल देता है। वहाँ, लङ्का में, रावण मूर्च्छा से जागता है, और जागकर वह जो करता है वह इस पूरे पन्ने पर सबसे अप्रत्याशित है। वह यज्ञ करने बैठ जाता है।

उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥ ८४॥

दोहा ८४

दोहे की दूसरी पंक्ति में तुलसी पूरी बात एक साथ रख देते हैं। राम से विरोध करके वह विजय चाहता है। और तीन शब्द उसके साथ लगे हुए हैं, सठ, हठ बस, अति अग्य। मूर्ख, हठ के वश, और अत्यन्त अज्ञानी। यह वाक्य यज्ञ के ख़िलाफ़ नहीं है। यह उस हिसाब के ख़िलाफ़ है जिसमें आदमी मान लेता है कि जो उसने अपने आचरण से खो दिया, वह किसी विधि से वापस लिया जा सकता है। वह लड़ाई हार रहा है, इसलिये विधि की ओर जा रहा है, और विधि से ठीक वही माँग रहा है जिसका दावा उसने अपने ही हाथों छोड़ दिया था।

ख़बर सबसे पहले विभीषण को मिलती है और वे तुरंत जाकर राम को सुना देते हैं। उनके कहने में एक शर्त रखी हुई है: यज्ञ सिद्ध हो गया तो वह अभागा सहज में नहीं मरेगा। इसलिये वे प्रार्थना करते हैं कि वानर योद्धा तुरंत भेजे जायँ, जो उसे तोड़ दें, जिससे रावण फिर युद्ध में आवे। प्रातःकाल होते ही राम वीरों को भेजते हैं और हनुमान तथा अंगद आदि सब दौड़ पड़ते हैं।

और तुलसी यहाँ जो शब्द चुनते हैं वह इस पूरे हिस्से का स्वर तय कर देता है। कौतुक। वानर खेल-खेल में कूदकर लङ्का पर चढ़ जाते हैं और निर्भय होकर रावण के महल में घुस जाते हैं। परकोटा, नगर और महल, तीनों उनके लिये अब बीच में पड़ने वाली चीज़ें भर रह गये हैं। और भीतर जो दिखता है, उससे सब वानरों को बहुत क्रोध आता है।

रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा॥
अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता॥

चौपाई ६

अंगद का ताना दो हिस्सों का है। रण से निर्लज्ज होकर घर भाग आया, और यहाँ आकर बगुले का ध्यान लगाये बैठा है। बक ध्यान इस पन्ने का सबसे निर्दय चित्र है। बगुला पानी में एक टाँग पर देर तक खड़ा रहता है और बिलकुल स्थिर रहता है, पर उसकी स्थिरता में कुछ भी शान्त नहीं होता। वह मछली की प्रतीक्षा है। जो बाहर से ध्यान दीखता है, वह भीतर से भूख है।

फिर अंगद लात मारते हैं। और अगली आधी पंक्ति वह जगह है जहाँ यह प्रसंग अपनी असली बात कहता है। उसने देखा तक नहीं। उस दुष्ट का मन स्वार्थ में लगा हुआ था। यह आदमी अपमान से नहीं डिगता, और इसलिये नहीं कि वह स्थिर है, बल्कि इसलिये कि उसे उससे बड़ी कोई चीज़ चाहिये और वह उसी के लिये बैठा है। अंगद की लात एक परीक्षा बन जाती है, वह उस परीक्षा में पास हो जाता है, और उसका पास होना ही उसकी सबसे बड़ी हार है।

सार: लङ्का में होश आने पर रावण यज्ञ करने बैठ जाता है, क्योंकि वह राम से विरोध करते हुए भी विजय चाहता है। विभीषण ख़बर पाकर राम को बताते हैं कि यज्ञ सिद्ध हुआ तो वह सहज में नहीं मरेगा, और सुबह होते ही वानर भेजे जाते हैं। वे खेल-खेल में लङ्का पर चढ़कर महल में घुस जाते हैं, अंगद लात मारते हैं, और रावण आँख तक नहीं उठाता।

यज्ञ का भंग

अब वानर वही करते हैं जो बिगड़ी हुई भीड़ करती है। वे दाँतों से पकड़ते हैं, लातों से मारते हैं, और फिर वह करते हैं जिसे तुलसी छिपाते नहीं। वे घर की स्त्रियों को बाल पकड़कर बाहर घसीट लाते हैं, और वे अत्यन्त दीन होकर पुकारने लगती हैं। जो आदमी दूसरे की स्त्री को हर लाया था, उसके अपने घर की स्त्रियाँ बालों से खींची जा रही हैं। तुलसी इस पर एक शब्द भी नहीं कहते। वे दृश्य रखकर आगे बढ़ जाते हैं।

नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं।
धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं॥
तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।
एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई॥

छन्द

छन्द का क्रम पढ़ने लायक़ है। लात पड़ने पर वह नहीं उठा। दाँत गड़ने पर वह नहीं उठा। वह तब उठा जब स्त्रियाँ पुकारने लगीं। और उठकर वह काल के समान क्रोधित होता है, वानरों को पैर पकड़कर पटकता है, और ठीक इसी बीच में वानर यज्ञ तोड़ डालते हैं। जिस चीज़ के लिये वह अपमान सह रहा था, वह उसी क्षण चली जाती है जिस क्षण वह उस अपमान का उत्तर देने उठता है।

और उसके बाद वह पंक्ति आती है जिसमें रावण की हार पहली बार भीतर से बतायी जाती है। यह देखकर वह मन में हारने लगा। अब तक इस पन्ने पर उसका गिरना बाहर से गिना जाता रहा है, कितने बाण लगे, कौन गिरा, किसे उठाकर ले जाना पड़ा। यहाँ पहली बार तुलसी भीतर झाँककर बताते हैं कि वहाँ क्या हुआ, और जो वहाँ हुआ वह किसी हथियार से नहीं हुआ।

वानर यज्ञ तोड़कर कुशल लौट आते हैं, और उनके लौटते ही अगला दोहा उस आदमी को उठाकर मैदान में खड़ा कर देता है।

जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।
चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन कै आस॥ ८५॥

दोहा ८५

जीने की आशा छोड़कर। यह इस पन्ने की सबसे भारी आधी पंक्ति है। वह अब भी लड़ने जा रहा है, पर वह जीतने नहीं जा रहा। यज्ञ ही वह आख़िरी चीज़ थी जिस पर जीवन की उम्मीद टिकी हुई थी, और वह टूट चुकी है। इसके आगे इस पन्ने पर जो कुछ होता है, वह सब एक ऐसे आदमी का किया हुआ है जो जानता है कि इसका अन्त क्या है।

सार: वानर रावण को दाँतों और लातों से मारते हैं और उसके घर की स्त्रियों को बाल पकड़कर बाहर घसीट लाते हैं। उनकी पुकार सुनकर वह उठता है और वानरों को पटकने लगता है, और इसी बीच यज्ञ टूट जाता है, जिसे देखकर वह मन ही मन हारने लगता है। वानर कुशल लौट आते हैं और रावण जीने की आशा छोड़कर युद्ध को चलता है।

गीध, डंका, और आग की ओर दौड़ते पतंगे

निकलते समय अपशकुन होने लगते हैं, और तुलसी उनमें से एक चुनते हैं जो सबसे सीधा है। गीध उड़-उड़कर उसके सिरों पर बैठने लगते हैं। जो पक्षी मरे हुए की प्रतीक्षा करता है, वह जीते हुए के सिर पर बैठ रहा है, और वह सिर एक नहीं, दस हैं। इससे साफ़ शकुन नहीं हो सकता था। पर वह किसी को नहीं मानता, क्योंकि वह काल के वश है। यही वह शब्द है जो थोड़ी देर पहले भागते हुए वानरों ने डरकर उसी के लिये इस्तेमाल किया था। अब वह शब्द लौटकर उसी पर बैठ गया है।

और उसका आदेश एक ही पंक्ति का है। युद्ध का डंका बजाओ। निशाचरों की अपार सेना चलती है, बहुत सारे हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल। और उसके तुरंत बाद वह उपमा आती है जो पूरी सेना को एक चित्र में समेट देती है।

चली तमीचर अनी अपारा । बहु गज रथ पदाति असवारा॥
प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें । सलभ समूह अनल कहँ जैसें॥

चौपाई ७

पतंगों का समूह जैसे आग की ओर दौड़ता है। पतंगा आग से भागता नहीं, वह उसी की ओर जाता है, और उसे कोई धोखा भी नहीं दिया गया होता। रोशनी उसे खींचती है और वह चला जाता है। तुलसी ने यहाँ यह नहीं कहा कि सेना मारी जायेगी। उन्होंने यह कहा है कि वह अपने पैरों से जा रही है। और अभी-अभी दोहे में यह भी बता दिया गया था कि जो उसे ले जा रहा है, उसने स्वयं जीने की आशा छोड़ दी है।

सार: निकलते समय गीध उसके सिरों पर बैठने लगते हैं, पर काल के वश होने के कारण वह किसी अपशकुन को नहीं मानता और युद्ध का डंका बजवा देता है। हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सहित अपार निशाचर सेना चलती है, और तुलसी उसे आग की ओर दौड़ते पतंगों के समूह जैसा बताते हैं।

देवताओं की विनती, और जटाएँ बाँधना

इसी बीच आकाश से देवता स्तुति करते हैं, और उनकी बात दो हिस्सों की है। पहला हिस्सा उनका अपना दुख है, इसने हमें दारुण विपत्ति दी है। दूसरा हिस्सा वह है जिस पर सारी विनती जाकर टिक जाती है।

इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही । दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही॥
अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही॥

चौपाई ८

अब इसे और न खेलाइये। यह शब्द देवताओं ने चुना है, खेलाना, और उसमें उनकी अपनी समझ रखी हुई है कि यह युद्ध क्या है। उनके लिये यह बराबरी की लड़ाई नहीं है, यह एक खेल है जिसे जान-बूझकर लम्बा किया जा रहा है। और जो कारण वे अन्त में देते हैं, वह अपने दुख का नहीं है। वे कहते हैं कि जानकी बहुत ही दुखी हो रही हैं। देवताओं ने अपनी विपत्ति पहले गिनायी, पर विनती जिस पर टिकायी वह किसी और की पीड़ा है।

राम का उत्तर पहले चेहरे पर आता है। वे मुसकराते हैं। फिर उठकर बाण सुधारते हैं। और इसके बाद तुलसी वह करते हैं जो वे लड़ाई के बीच में शायद ही करते हैं, वे रुककर देखने लगते हैं। मस्तक पर जटाओं का जूड़ा कसकर बाँधा हुआ है और उसके बीच-बीच में फूल गुँथे हुए शोभित हैं। लाल नेत्र, बादल जैसा श्याम शरीर, सारे लोकों की आँखों को सुख देने वाला। कमर में फेंटा और तरकस कसा हुआ, और हाथ में कठोर शार्ङ्ग।

यह पूरा चित्र एक आदमी के तैयार होने का चित्र है। बाल बाँधना, कमर कसना, धनुष उठाना। इसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है, और ठीक इसी के बाद छन्द आता है, जहाँ सब कुछ अलौकिक हो जाता है।

सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।
भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥
कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥

छन्द

छाती पर ब्राह्मण के चरण का चिह्न है, और फिर तुलसीदास अपना नाम लेकर वह वाक्य कहते हैं जो इस पन्ने का सबसे बड़ा वाक्य है। ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथ में लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओं के हाथी, कच्छप, शेष, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत, सब डगमगा उठे। अभी बाण चला नहीं है। अभी निशाना भी नहीं बना है। सिर्फ़ धनुष हाथ में घुमाया गया है, और जो चीज़ें पूरे ब्रह्माण्ड को थामे हुए मानी जाती हैं, वे अपनी जगह पर हिल गयीं।

और उसके बाद का दोहा देवताओं का है। शोभा देखकर वे हर्षित होकर अपार फूल बरसाते हैं और जय जय जय पुकारते हैं, करुणानिधि की, छबि बल और गुण के धाम की। ये दो शब्द, जय जय, याद रखने लायक़ हैं। वे इस पन्ने पर एक बार और आयेंगे, और तब वे आकाश से नहीं आयेंगे।

सार: देवता विनती करते हैं कि अब इस राक्षस को और न खेलाया जाय, क्योंकि जानकी बहुत दुखी हो रही हैं। राम मुसकराकर उठते हैं, जटाओं का जूड़ा बाँधते हैं, तरकस कसते हैं और शार्ङ्ग हाथ में लेते हैं। धनुष-बाण हाथ में फिराते ही ब्रह्माण्ड, दिग्गज, कच्छप, शेष, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत डगमगा उठते हैं, और देवता फूल बरसाकर जय-जयकार करते हैं।

रुधिर की नदी

अब दोनों सेनाएँ भिड़ती हैं, और तुलसी का ढंग यहाँ बदल जाता है। वे किसी एक द्वन्द्व का हाल नहीं लिखते। वे चित्र बनाते हैं, एक के बाद एक, और शुरू के सारे चित्र आकाश के हैं। निशाचरों की घनी सेना कसमसाती हुई आती है, वानर योद्धा उसके सामने ऐसे चलते हैं जैसे प्रलयकाल के बादलों के समूह। कृपाण और तलवारें ऐसे चमकती हैं मानो दसों दिशाओं में बिजलियाँ। हाथी, रथ और घोड़ों की कठोर चिग्घाड़ ऐसी जैसे भयंकर बादल गरज रहे हों। वानरों की पूँछें आकाश में छा जाती हैं मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उगे हों। धूल ऐसी उठती है जैसे जल की धारा, और बाण उसकी बूँदें हैं।

यानी पूरी लड़ाई एक बरसात की तरह बाँधी गयी है, बादल, बिजली, गरज, इन्द्रधनुष और बूँदें। और जब राम क्रोध करके बाणों की झड़ी लगा देते हैं, तब वह बरसात ज़मीन पर उतर आती है। बाण लगते ही वीर चीत्कार करते हैं, चक्कर खा-खाकर जहाँ-तहाँ गिरते हैं, और उनके शरीरों से ख़ून ऐसे बहता है जैसे पहाड़ के भारी झरनों से पानी। पानी की सारी उपमाएँ अब एक ही जगह जाकर मिलती हैं।

और वहीं से वह नदी बनती है जिस पर तुलसी एक पूरा छन्द ख़र्च करते हैं। यह इस पन्ने का सबसे ठंडे मन से लिखा हुआ हिस्सा है। दोनों दल उस नदी के दोनों किनारे हैं, रथ उसकी रेत हैं और पहिये भँवर।

कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।
जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने॥

छन्द

सामान पूरा गिना दिया गया है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे और तरह-तरह की सवारियाँ उस नदी के जलजन्तु हैं, बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं, धनुष तरंगें हैं और ढालें बहुत सारे कछुए। यह वर्णन सुन्दर बनाने के लिये नहीं किया गया। उपमा जितनी ठीक बैठती जाती है, दृश्य उतना ही असह्य होता जाता है, क्योंकि हर चीज़ जो इस नदी में डाली जा रही है वह असल में किसी न किसी के काम की चीज़ थी।

दोहा सत्तासी उसी नदी को पूरा करता है और अन्त में एक बात कहता है जो लड़ाई के बारे में नहीं, देखने वालों के बारे में है। वीर ऐसे गिर रहे हैं मानो किनारे के पेड़ ढह रहे हों, और बहुत सारी मज्जा बह रही है, वही उसका फेन है। कायर इसे देखकर डरते हैं, और वहीं अच्छे योद्धाओं के मन को चैन मिलता है। एक ही दृश्य, और दो तरह के लोग, और तुलसी दोनों को बिना कोई फ़ैसला सुनाये लिख देते हैं।

सार: लड़ाई पहले आकाश की उपमाओं में बाँधी जाती है, बादल, बिजली, इन्द्रधनुष और बूँदों की तरह गिरते बाण। राम की बाण-झड़ी से घायल होकर वीर गिरते हैं और रुधिर की नदी बह चलती है, जिसके दोनों किनारे दोनों दल हैं, रथ रेत हैं और पहिये भँवर। दोहा सत्तासी कहता है कि उसी दृश्य से कायर डरते हैं और अच्छे योद्धाओं को चैन मिलता है।

जो सिर ज़मीन पर पड़े जय बोलते हैं

इसके आगे जो आता है उसे युद्ध का वर्णन कहना ठीक नहीं होगा। वहाँ अब लड़ाई किनारे हो गयी है और खाने वाले बीच में आ गये हैं। भूत, पिशाच, बैताल, बड़े-बड़े झोटिंग और शिवगण उस नदी में स्नान करते हैं। कौए और चीलें भुजाएँ लेकर उड़ती हैं और एक दूसरे से छीनकर खा जाती हैं। गीध किनारे बैठकर आँतें खींच रहे हैं, और तुलसी उस पर जो उपमा रखते हैं वह ठिठका देती है, मानो कोई चित्त लगाये बंसी खेल रहा हो।

और इसी बीच वह एक पंक्ति आती है जो इस पूरे हिस्से में अकेली पड़ी हुई है। कोई कहता है कि इतनी सस्ती होने पर भी इन मूर्खों की दरिद्रता नहीं जाती। यह ठिठोली है, और यह ठिठोली भूतों के मुँह में रखी गयी है। जिस जगह आदमी के लिये कुछ नहीं बचा, वहाँ किसी और के लिये बहुतायत है, और वह उस बहुतायत पर हँस भी रहा है। घायल योद्धा किनारे पड़े कराह रहे हैं, और उन्हें देखकर तुलसी को वे लोग याद आते हैं जिन्हें अन्त समय आधे जल में रखा जाता है।

योगिनियाँ खप्परों में भर-भरकर ख़ून जमा कर रही हैं, भूत-पिशाचों की स्त्रियाँ आकाश में नाच रही हैं, और चामुण्डाएँ योद्धाओं की खोपड़ियों का करताल बजाकर नाना प्रकार से गा रही हैं। गीदड़ों के झुंड कट-कट शब्द करते हुए काटते हैं, खाते हैं, हुआँ-हुआँ करते हैं, और पेट भर जाने पर एक दूसरे को डाँटते हैं। करोड़ों धड़ बिना सिर के घूम रहे हैं।

और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा हिस्सा जाकर बैठता है। ज़मीन पर पड़े हुए सिर जय जय बोल रहे हैं। ये वही दो शब्द हैं जो थोड़ी देर पहले फूल बरसाते हुए देवताओं ने आकाश से कहे थे। तुलसी दोनों जगह एक ही शब्द रखते हैं और बताते कुछ नहीं। ऊपर वे शब्द हर्ष के हैं। नीचे वे कटे हुए सिरों के मुँह में हैं, और वहाँ भी वही हैं।

आगे के छन्द में धड़ बिना सिर के दौड़ते हैं, पक्षी खोपड़ियों में उलझकर आपस में लड़ मरते हैं, और राम के बल से दर्पित वानर राक्षसों के झुंडों को मसल डालते हैं। और उस छन्द की आख़िरी पंक्ति में जो शब्द चुना गया है वह सोना है। राम के बाण-समूहों से मारे हुए योद्धा संग्राम के आँगन में सो रहे हैं। मैदान को आँगन कहा गया है और मरने को सोना, और इसी एक पंक्ति से यह सारा भयानक हिस्सा उतरकर शान्त हो जाता है।

सार: नदी के किनारे भूत, पिशाच, बैताल और शिवगण स्नान करते हैं, कौए और चीलें भुजाएँ छीनकर खाती हैं, योगिनियाँ खप्पर भरती हैं और चामुण्डाएँ खोपड़ियों का करताल बजाती हैं। करोड़ों धड़ बिना सिर के दौड़ते हैं और ज़मीन पर पड़े सिर जय जय बोलते हैं, वही दो शब्द जो अभी देवताओं ने आकाश से कहे थे।

मैं अकेला हूँ, और वानर बहुत हैं

और इस सबके बीच में एक आदमी बैठा हिसाब लगा रहा है। पन्ने का आख़िरी दोहा उसी हिसाब का है, और वह लड़ाई के मैदान से नहीं, उसके हृदय के भीतर से आता है।

रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार।
मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥ ८८॥

दोहा ८८

राक्षसों का संहार हो गया। मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं। इसलिये अब अपार माया रचूँ। इन तीन वाक्यों में इस पन्ने की पूरी यात्रा उलटकर रखी हुई है। जो आदमी दोहा इक्यासी में बीस भुजाओं और दस धनुषों के साथ निकला था, वह दोहा अठासी में गिनती करता है और एक पर पहुँचता है। और उसका निष्कर्ष यह नहीं है कि लड़ूँ या लौटूँ। उसका निष्कर्ष यह है कि अब जो है उसे छिपाना पड़ेगा और जो नहीं है उसे दिखाना पड़ेगा।

माया वही चीज़ है जो तब काम आती है जब सामने वाले को धोखे में रखना ही बचा हो। और यही वह सीढ़ी है जिस पर यह आदमी पूरे पन्ने में उतरता आया है। पहले ब्रह्मा का दिया हुआ अस्त्र, फिर एक विधि, फिर जीने की आशा छोड़कर निकलना, और अब छल। तुलसी अगला प्रसंग यहीं से उठाते हैं, और यह दोहा उसका दरवाज़ा है।

सार: राक्षसों का संहार देखकर रावण हृदय में विचारता है कि वह अकेला है और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिये अब अपार माया रचे। पन्ना बीस भुजाओं की गिनती से शुरू होकर एक की गिनती पर आकर रुकता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर सबसे ज़्यादा सोचने लायक़ जगह वह नहीं है जहाँ शक्ति चलती है, न वह जहाँ घूँसा पड़ता है। वह जगह है जहाँ एक हारता हुआ आदमी लड़ाई छोड़कर घर लौटता है और यज्ञ पर बैठ जाता है। वह विधि जानता है। उसने विधि से बहुत कुछ पाया भी है, और ब्रह्मा की दी हुई वह शक्ति जो अभी-अभी उसके हाथ से छूटी है, उसी का प्रमाण है। इसलिये जब सब हाथ से जाने लगता है तो वह उसी दरवाज़े पर लौटता है जहाँ से पहले मिल चुका है। दोहा चौरासी की दूसरी पंक्ति ठीक इसी पर उँगली रखती है, कि राम से विरोध करके वह विजय चाहता है।

और तुलसी इसका खंडन किसी तर्क से नहीं करते। वे एक लात रखते हैं और उसके बाद आधी पंक्ति। उसने आँख उठाकर देखा तक नहीं। जो आदमी अपमान इसलिये सह लेता है कि उसे उससे बड़ी कोई चीज़ चाहिये, वह संयमी नहीं होता, वह और गहरा लोभी होता है। और अन्त यह है कि जिसके लिये वह बैठा रहा वह भी नहीं बचा, और जिनके लिये वह उठा उन्हें भी वह बचा नहीं सका।

इस पन्ने का दूसरा सिरा इससे ठीक उलटा है। लक्ष्मण गिरे हुए हैं और उन्हें कोई विधि नहीं उठाती। उन्हें एक वाक्य उठाता है, और वह वाक्य कोई नयी बात नहीं बताता, वह एक पुरानी बात याद दिलाता है। एक आदमी वह पाना चाह रहा है जो उसका कभी था ही नहीं, और दूसरे को वह याद दिलाना पड़ रहा है जो हमेशा से उसका है। पूरा प्रसंग इन्हीं दोनों के बीच में खड़ा हुआ है।

और जो एक चित्र सबसे अन्त में बचता है, वह न शक्ति का है, न यज्ञ का। वह गीधों का है। रावण अभी जीवित है, रथ पर है, दसों सिर अपनी जगह हैं, और गीध उड़-उड़कर उन्हीं सिरों पर बैठ रहे हैं। उसे यह दिखता है। वह देखता भी है और चलता भी है। तुलसी ने इसके लिये जो कारण लिखा है वह डर नहीं है और मूर्खता भी नहीं। वह एक ही शब्द है, कालबस। जो हो चुका होता है, आदमी उसके बाद भी चलता रहता है, बस अब उसका चलना किसी और के हिसाब में लिखा जाता है।

और इसीलिये आख़िरी दोहे का वह वाक्य इतना ठंडा लगता है। मैं अकेला हूँ। यह बात वह आदमी कह रहा है जिसके पास अभी भी नगर है, महल है, माया है और दस सिर हैं। अकेलापन गिनती से नहीं आता। वह उस दिन आता है जब चारों ओर देखने पर कोई ऐसा नहीं मिलता जो उसकी जगह पर होता तो वही करता जो वह कर रहा है। इस पन्ने पर रावण इसी अर्थ में अकेला हुआ है, और आगे जो माया वह रचने जा रहा है, वह उसी अकेलेपन को ढकने का तरीक़ा है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ८१ से ८८, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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