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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 12
रावण की शक्ति, यज्ञ का भंग, और राम का धनुष उठाना
रावण स्वयं रथ पर चढ़ता है। ब्रह्मा की दी हुई शक्ति लक्ष्मण को गिराती है, हनुमान एक घूँसे में उत्तर देते हैं। लङ्का में एक यज्ञ बैठता है और टूट जाता है, और अन्त में राम स्वयं शार्ङ्ग उठाते हैं।
लङ्काकाण्ड यहाँ तक आते-आते एक खुली लड़ाई बन चुका है, जिसमें कहानी किसी एक नाम पर नहीं टिकी। कथा अब उसी भीड़ में से एक आदमी को अलग करके दिखाती है, लड़ता हुआ नहीं, देखता हुआ। रावण अपनी ही सेना को विचलित होते देखता है, और तब बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रथ पर चढ़ता है। आगे जो कुछ होता है, वह उसका अपने गिरते पक्ष को सँभालने का प्रयत्न है, और हर प्रयत्न पिछले से छोटा होता जाता है।
इस प्रसंग में वह तीन बार गिरता है और तीन बार उठता है, और हर बार उठकर किसी नयी चीज़ पर हाथ रखता है। पहली बार लक्ष्मण के बाणों से गिरकर उठता है और वह शक्ति चलाता है जो ब्रह्मा ने उसे दी थी। दूसरी बार हनुमान के एक घूँसे से गिरकर उठता है और सामने वाले की सराहना करने लगता है। तीसरी बार वह लङ्का में होश में आता है और यज्ञ पर बैठ जाता है। और जब यज्ञ भी टूट जाता है, तो अन्त में माया बचती है। पहले किसी का दिया हुआ अस्त्र, फिर एक विधि, फिर छल। रास्ता एक ही दिशा में जाता है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और दोनों जगह यह प्रसंग एक जैसा नहीं चलता। यहाँ शक्ति लगने के बाद लक्ष्मण को उठाने के लिये न कोई वैद्य बुलाया जाता है, न कोई ओषधि आती है। राम एक वाक्य कहते हैं और वे उठ बैठते हैं।
रणभूमि से यज्ञशाला तक
- रावण जो इस प्रसंग में तीन बार गिरता है, तीन बार उठता है, और हर बार पहले से छोटी चीज़ का सहारा लेता है।
- लक्ष्मण जो अपने दल को व्याकुल देखकर राम के चरणों पर सिर नवाकर निकलते हैं, और जिनकी छाती पर ब्रह्मा की दी हुई शक्ति आकर लगती है।
- हनुमान जो रावण का घूँसा घुटना टेककर सह जाते हैं, उत्तर में एक घूँसा देते हैं, और गिरे हुए लक्ष्मण को उठाकर राम के पास ले आते हैं।
- राम जो लड़ाई के बीच में एक वाक्य से भाई को उठा देते हैं, और अन्त में स्वयं जटाएँ बाँधकर शार्ङ्ग हाथ में लेते हैं।
- अंगद बालि के पुत्र, जो यज्ञ पर बैठे रावण को लात मारते हैं और जिनकी ओर वह आँख उठाकर भी नहीं देखता।
- विभीषण जो यज्ञ की ख़बर सबसे पहले पाते हैं, तुरंत राम तक पहुँचा देते हैं, और उसे तोड़ने की प्रार्थना करते हैं।
- देवता जो आकाश से युद्ध देखते हैं, फूल बरसाते हैं, और बीच में एक बार विनती करते हैं कि अब यह खेल बहुत हुआ।
- वानर और भालू जो भागते भी हैं और लङ्का के भीतर घुसकर रावण का यज्ञ तोड़ भी आते हैं।
बीस भुजाएँ और दस धनुष
कथा एक ऐसी क्रिया से शुरू होती है जो लड़ाई की नहीं है। रावण देखता है कि उसका अपना दल विचलित हो रहा है, और तभी रथ पर चढ़ता है। उसके शरीर का वर्णन नहीं है। दो गिनतियाँ हैं, बीस भुजाएँ और दस धनुष, और उतने से पूरा आदमी खड़ा हो जाता है। चलते समय वह जो बोलता है, वह ललकार नहीं है। वह अपने ही भागते सिपाहियों से कहा गया है, “लौटिये, लौटिये।” जिसे अपने लोगों को लौटाना पड़ रहा है, वह उन्हें गर्व के साथ लौटा रहा है।
फिर वह परम क्रुद्ध होकर दौड़ता है। वानर भागते नहीं, सामने आते हैं, हूह की हुंकार देते हुए। हाथों में वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर सब एक ही बार में उस पर डाल देते हैं। यह वही है जो भीड़ करती है जब उसके सामने एक ही आदमी हो और फेंकने को जो हाथ लगे वही हो।
पहाड़ उसके शरीर से टकराते हैं और तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। वह हिला ही नहीं। रथ रोपकर, यानी खम्भे की तरह गाड़कर, अचल खड़ा रहा। कथा यहाँ रावण को छोटा नहीं करती। जिस पर पूरे पहाड़ फेंके जा रहे हैं, वह अपनी जगह से एक अंगुल नहीं सरकता।
फिर वह मसलना शुरू करता है। इधर-उधर झपटता है, डपटता है, और वानर योद्धाओं को मसलने लगता है। तब वानर टूट जाते हैं: वानर और भालू भाग चलते हैं, और भागते हुए जो पुकार लगाते हैं उसमें एक सीढ़ी है। पहले वे अपने भीतर के दो बड़े नाम पुकारते हैं।
“हे अंगद, हे हनुमान, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।” ये दोनों नाम इसी सेना के भीतर के हैं। फिर सीढ़ी का दूसरा डंडा आता है। वानर पुकारते हैं, “रक्षा कीजिये, राम, रक्षा कीजिये। यह दुष्ट हमें काल की तरह खा रहा है।” काल शब्द आगे कई बार आयेगा और हर बार अपनी जगह बदलेगा। अभी वह रावण के लिये आया है। थोड़ी देर बाद वही शब्द राम के मुँह से लक्ष्मण के लिये आयेगा, और अन्त से पहले रावण स्वयं काल के वश बताया जायेगा।
अब वह दसों धनुषों पर बाण चढ़ाता है, जब सब वानर भाग चुके हैं। फिर क्रियाएँ बिना साँस लिये एक के पीछे एक आती हैं। इस प्रसंग में जहाँ हाथ का काम सबसे तेज़ है, वहाँ कथा की चाल भी सबसे तेज़ है।
बाण सर्प की तरह उड़कर लगते हैं। पृथ्वी, आकाश, दिशा और विदिशा, सब बाणों से भर गये हैं, और बीच में एक छोटा-सा प्रश्न है: वानर भागें तो कहाँ। तब जो पुकार उठती है, उसमें राम को करुणा का समुद्र, दुखियों का बन्धु और सेवकों का रक्षक कहकर पुकारा जाता है। जब कहीं जगह नहीं बचती, तब पुकारा जाने वाला नाम भी वही चुना जाता है जो काम का हो।
और लक्ष्मण ने भी अपनी सेना को देखा
अब कथा फिर उसी तरह शुरू होती है। पहले रावण ने अपने दल को विचलित होते देखा था। अब लक्ष्मण अपने दल को व्याकुल देखते हैं। दोनों एक ही चीज़ देखते हैं और उसी को देखकर निकल पड़ते हैं। फ़र्क़ एक ही बात में है। रावण गर्व करके चला था। लक्ष्मण कमर में तरकस कसकर, हाथ में धनुष लेकर, और राम के चरणों पर माथा नवाकर चलते हैं। निकलने से पहले एक अपने को बड़ा करता है, दूसरा झुकता है।
वहाँ पहुँचकर बात बहुत छोटी होती है। लक्ष्मण रावण को ललकारते हैं कि वानर-भालुओं को क्या मारता है, इधर देखे, वे उसके काल हैं। ललकार में उन्होंने वही शब्द चुना है जो अभी-अभी भागते वानरों ने रावण के लिये लिया था। रावण का उत्तर ललकार का उत्तर नहीं, एक शिकायत है।
रावण कहता है कि इसी पुत्र के घातक को वह ढूँढ़ता फिर रहा था, और आज इसे मारकर अपनी छाती ठंडी करेगा। रावण के लिये यह लड़ाई अब न राज्य की रह गयी है, न किसी और चीज़ की। वह उसके मारे गये पुत्र की हो गयी है। जो दस धनुष लेकर रथ पर चढ़ा था और अकेले पूरी सेना को भगा चुका था, वह यहाँ बदला लेने आया हुआ एक पिता है। यह बात उसके अपने शब्दों से खुलती है।
इसके बाद का हिस्सा हिसाब का है और बहुत तेज़ है। प्रचण्ड बाण छूटते हैं, लक्ष्मण उन सबके सैकड़ों टुकड़े कर देते हैं। रावण करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाता है, लक्ष्मण उन्हें तिल के बराबर करके काट देते हैं। फिर वे अपने बाण चलाते हैं, रथ तोड़ते हैं, सारथि को मार देते हैं। वे दसों मस्तकों में सौ-सौ बाण मारते हैं, जो सिरों में ऐसे पैठ जाते हैं जैसे पहाड़ की चोटियों में सर्प घुस रहे हों। फिर सौ बाण छाती में। रावण धरती पर गिरता है और उसे कुछ भी होश नहीं रहता।
यहीं से पहला उठना होता है। मूर्च्छा छूटती है, वह उठता है, और वह शक्ति चलाता है जो ब्रह्मा ने उसे दी थी। जिस चीज़ से लक्ष्मण गिरते हैं, वह रावण का बल नहीं। वह किसी और की दी हुई चीज़ है, जिसे वह उस घड़ी तक बचाकर रखे हुए था।
यह दृश्य दो हिस्सों में है, और दोनों आमने-सामने हैं। पहले हिस्से में शक्ति ठीक छाती पर लगती है और वीर लक्ष्मण व्याकुल होकर गिर पड़ते हैं। दूसरे में रावण उन्हें उठाने लगता है, और उठा नहीं पाता। उसके अतुलित बल की सारी महिमा वहीं धरी रह जाती है। जिस हाथ ने शक्ति फेंककर उन्हें गिराया था, वही उन्हें ज़मीन से उठा नहीं सकता।
उसी दृश्य में कारण भी है, गिनती की भाषा में। जिनके एक ही सिर पर ब्रह्माण्ड रूपी भवन धूल के एक कण के बराबर रखा है, उन्हें यह मूर्ख उठाना चाह रहा है। कथा बीस भुजाओं और दस धनुषों की गिनती से शुरू हुई थी। यहाँ दूसरी गिनती आती है, एक सिर और एक कण, और पहली गिनती उसके सामने किसी काम नहीं आती।
एक घूँसा, और उसके बाद सराहना
यह देखकर हनुमान कठोर वचन बोलते हुए दौड़ते हैं। वचन क्या थे, यह नहीं बताया गया। आते ही उन पर रावण का घूँसा पड़ता है, जो अत्यन्त भयङ्कर है।
हनुमान घुटना टेक देते हैं। गिरते नहीं। यहाँ दोनों बातें एक साथ हैं, कि चोट लगी और कि वह काफ़ी नहीं थी। फिर वे क्रोध से भरकर, सँभलकर उठते हैं और एक घूँसा मारते हैं, और रावण ऐसे गिरता है जैसे वज्र की मार से पहाड़ गिरा हो। एक घूँसा उधर से और एक इधर से। एक के बाद घुटना टिका, दूसरे के बाद पहाड़ गिरा।
और अब युद्ध के ठीक बीच एक ऐसी बात आती है जिसे पढ़कर रुकना पड़ता है।
मूर्च्छा टूटने पर रावण जागता है और हनुमान के बल की सराहना करने लगता है। शत्रु प्रशंसा कर रहा है, और वह प्रशंसा सच्ची है, किसी चाल का हिस्सा नहीं। उत्तर में हनुमान कहते हैं, “मेरे पौरुष को धिक्कार है, धिक्कार है, मुझे भी धिक्कार है, कि यह देवद्रोही अब भी जीता रह गया।” एक ही क्षण में दो आदमी हैं: एक गिरा हुआ जो सराह रहा है, और एक खड़ा हुआ जो अपने ही ऊपर लज्जित है।
यह क्षण रावण के बारे में भी कुछ कहता है। जो अभी-अभी अकेले पूरी वानर सेना को भगा चुका है, वह गिरकर उठते ही मान लेता है कि सामने वाला बलवान है। और यही आदमी थोड़ी देर बाद यज्ञ पर बैठकर आँख नहीं उठायेगा। वह देख भी ले, तो भी वही करता है जो पहले से तय है।
राम का एक वाक्य, और शक्ति का लौट जाना
फिर हनुमान लक्ष्मण को उठाकर राम के पास ले आते हैं, और बीच में एक छोटी-सी बात है: यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ। जिस शरीर को वह अपनी दसों भुजाओं से उठा नहीं पाया था, उसे एक वानर उठाकर लिये जा रहा है। आश्चर्य उसी को होता है जिसने ख़ुद कोशिश करके देख ली हो।
राम जो कहते हैं, वह न सान्त्वना है, न दवा। वह एक याद दिलाना है। राम कहते हैं, “भाई, हृदय में समझ लीजिये, आप काल के भी भक्षक और देवताओं के रक्षक हैं।” कुछ देर पहले भागते वानरों ने रावण को काल कहा था। अब वही शब्द उलटकर रखा गया है, और जिस पर शक्ति लगी है, उसी को बताया जा रहा है कि वह किसका भक्षक है। यहाँ कोई उपाय या विधि नहीं, एक पहचान बतायी जाती है।
वचन सुनते ही वे उठ बैठते हैं, और उसी क्षण वह कराल शक्ति आकाश को चली जाती है। उसे निकालना नहीं पड़ता, तोड़ना नहीं पड़ता, किसी से लाने को नहीं कहा जाता। जिस क्षण लक्ष्मण को याद आ जाता है कि वे कौन हैं, उस शक्ति के पास वहाँ ठहरने का कारण नहीं बचता। न कोई वैद्य आता है, न कोई ओषधि। एक वाक्य आता है।
उठकर वे बैठे नहीं रहते। धनुष-बाण लेकर दौड़ते हैं और बड़ी शीघ्रता से शत्रु के सामने आ पहुँचते हैं। आगे का हिस्सा तेज़ और छोटा है, और उसमें वही क्रम दुहराया गया है: रथ चूर-चूर, सारथि ढेर, और सौ बाणों से हृदय बिंधा हुआ। रावण धरती पर गिरता है, पहले से भी ज़्यादा व्याकुल। पहली बार वह अपने आप उठा था। इस बार दूसरा सारथि उसे रथ में डालकर तुरंत लङ्का ले जाता है। और लक्ष्मण लौटकर राम के चरणों में प्रणाम करते हैं।
जागकर जो यज्ञ पर बैठ गया
अब कथा जगह बदल देती है। वहाँ, लङ्का में, रावण मूर्च्छा से जागता है, और जागकर यज्ञ करने बैठ जाता है।
फिर कथा पूरी बात एक साथ रख देती है: राम से विरोध करके वह विजय चाहता है। और साथ में उसे तीन नाम मिलते हैं: मूर्ख, हठ के वश, और अत्यन्त अज्ञानी। यह वाक्य यज्ञ के ख़िलाफ़ नहीं, उस हिसाब के ख़िलाफ़ है। उसमें आदमी मान लेता है कि जो उसने अपने आचरण से खो दिया, वह किसी विधि से वापस लिया जा सकता है।
ख़बर सबसे पहले विभीषण को मिलती है, और वे तुरंत जाकर राम को सुनाते हैं: “यज्ञ सिद्ध हो गया तो वह अभागा सहज में नहीं मरेगा।” वे प्रार्थना करते हैं कि वानर योद्धा तुरंत भेजे जायँ, जो उसे तोड़ दें, जिससे रावण फिर युद्ध में आवे। प्रातःकाल होते ही राम वीरों को भेजते हैं, और हनुमान तथा अंगद आदि सब दौड़ पड़ते हैं।
वानर खेल-खेल में कूदकर लङ्का पर चढ़ जाते हैं और निर्भय होकर रावण के महल में घुस जाते हैं। परकोटा, नगर और महल, तीनों अब उनके लिये बीच में पड़ने वाली चीज़ें भर रह गये हैं। और भीतर जो दिखता है, उससे सब वानरों को बहुत क्रोध आता है।
अंगद ताना देते हैं, “रण से निर्लज्ज होकर घर भाग आया, और यहाँ आकर बगुले का ध्यान लगाये बैठा है।” बगुला पानी में एक टाँग पर देर तक बिलकुल स्थिर खड़ा रहता है, पर उसकी स्थिरता में कुछ भी शान्त नहीं होता। वह मछली की प्रतीक्षा है। जो बाहर से ध्यान दीखता है, वह भीतर से भूख है।
फिर अंगद लात मारते हैं, और रावण ने देखा तक नहीं: उस दुष्ट का मन स्वार्थ में लगा हुआ था। वह अपमान से इसलिये नहीं डिगता कि वह स्थिर है। वह इसलिये नहीं डिगता कि उसे उससे बड़ी कोई चीज़ चाहिये और वह उसी के लिये बैठा है। अंगद की लात एक परीक्षा बन जाती है, वह उस परीक्षा में पास हो जाता है, और उसका पास होना ही उसकी हार है।
यज्ञ का भंग
अब वानर वही करते हैं जो बिगड़ी हुई भीड़ करती है। वे दाँतों से पकड़ते हैं, लातों से मारते हैं, और घर की स्त्रियों को बाल पकड़कर बाहर घसीट लाते हैं, जो अत्यन्त दीन होकर पुकारने लगती हैं। जो दूसरे की स्त्री को हर लाया था, उसके अपने घर की स्त्रियाँ बालों से खींची जा रही हैं। कथा इस पर कुछ नहीं कहती। दृश्य रखकर आगे बढ़ जाती है।
यहाँ का क्रम देखने लायक़ है। लात पड़ने पर वह नहीं उठा, दाँत गड़ने पर नहीं उठा। वह तब उठा जब स्त्रियाँ पुकारने लगीं। उठकर वह काल के समान क्रोधित होता है और वानरों को पैर पकड़कर पटकता है, और इसी बीच वानर यज्ञ तोड़ डालते हैं। जिसके लिये वह अपमान सह रहा था, वह उसी क्षण चला जाता है जिस क्षण वह अपमान का उत्तर देने उठता है।
फिर वह बात आती है जिसमें रावण की हार पहली बार भीतर से बतायी जाती है: यह देखकर वह मन में हारने लगा। अब तक उसका गिरना बाहर से गिना जाता रहा था। यहाँ भीतर का हाल है, और जो वहाँ हुआ, वह किसी हथियार से नहीं हुआ।
वानर यज्ञ तोड़कर कुशल लौट आते हैं, और कथा रावण को उठाकर मैदान में खड़ा कर देती है।
वह जीने की आशा छोड़कर निकलता है। वह अब भी लड़ने जा रहा है, पर जीतने नहीं। यज्ञ वह आख़िरी चीज़ थी जिस पर जीवन की उम्मीद टिकी थी, और वह टूट चुकी है। इसके आगे जो कुछ होता है, वह एक ऐसे आदमी का किया हुआ है जो जानता है कि इसका अन्त क्या है।
गीध, डंका, और आग की ओर दौड़ते पतंगे
निकलते समय अपशकुन होने लगते हैं, और उनमें से एक सीधा है: गीध उड़-उड़कर उसके सिरों पर बैठने लगते हैं। जो पक्षी मरे हुए की प्रतीक्षा करता है, वह जीते हुए के सिर पर बैठ रहा है, और सिर एक नहीं, दस हैं। पर वह किसी को नहीं मानता, क्योंकि वह काल के वश है। यही शब्द थोड़ी देर पहले भागते वानरों ने डरकर उसी के लिये लिया था। अब वह लौटकर उसी पर बैठ गया है।
उसका आदेश एक वाक्य का है: युद्ध का डंका बजाया जाए। निशाचरों की अपार सेना चलती है, बहुत सारे हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल। और तुरंत बाद एक उपमा पूरी सेना को एक चित्र में समेट देती है।
वे दुष्ट राम के सामने ऐसे दौड़े जैसे पतंगों का समूह आग की ओर दौड़ता है। पतंगा आग से भागता नहीं, उसी की ओर जाता है, और उसे कोई धोखा भी नहीं दिया गया होता। रोशनी उसे खींचती है। उपमा यह नहीं कहती कि सेना मारी जायेगी। वह कहती है कि सेना अपने पैरों से जा रही है। और जो उसे ले जा रहा है, उसने स्वयं जीने की आशा छोड़ दी है।
देवताओं की विनती, और जटाएँ बाँधना
इसी बीच आकाश से देवता स्तुति करते हैं, और उनकी बात के दो हिस्से हैं। पहला उनका अपना दुख है। देवता कहते हैं, “इसने हमें दारुण विपत्ति दी है।” दूसरा हिस्सा वह है जिस पर सारी विनती टिकती है।
“अब इसे और न खेलाइये।” खेलाना देवताओं का अपना शब्द है, और उसमें उनकी समझ है कि यह युद्ध क्या है: बराबरी की लड़ाई नहीं, एक खेल जिसे जान-बूझकर लम्बा किया जा रहा है। और जो कारण वे अन्त में देते हैं, वह अपने दुख का नहीं: सीता बहुत ही दुखी हो रही हैं। विपत्ति उन्होंने अपनी गिनायी, पर विनती किसी और की पीड़ा पर टिकायी।
राम का उत्तर पहले चेहरे पर आता है: वे मुसकराते हैं। फिर उठकर बाण सुधारते हैं, और कथा लड़ाई के बीच रुककर उन्हें देखती है। मस्तक पर जटाओं का जूड़ा कसकर बँधा है और उसके बीच-बीच में फूल गुँथे हैं। नेत्र लाल हैं, शरीर बादल जैसा श्याम। कमर में फेंटा और तरकस कसा है, और हाथ में कठोर शार्ङ्ग।
यह एक आदमी के तैयार होने का चित्र है: बाल बाँधना, कमर कसना, धनुष उठाना। इसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है, और ठीक इसके बाद सब कुछ अलौकिक हो जाता है।
छाती पर ब्राह्मण के चरण का चिह्न है। फिर तुलसीदास अपना नाम लेते हैं। ज्यों ही राम धनुष-बाण हाथ में लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओं के हाथी, कच्छप, शेष, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत, सब डगमगा उठे। अभी बाण चला नहीं है, निशाना भी नहीं बना है। सिर्फ़ धनुष हाथ में घुमाया गया है। जो चीज़ें ब्रह्माण्ड को थामे हुए मानी जाती हैं, वे अपनी जगह पर हिल गयीं।
उसके बाद की बात देवताओं की है। शोभा देखकर वे हर्षित होकर अपार फूल बरसाते हैं और राम की जय जय जय पुकारते हैं। ये दो शब्द, जय जय, एक बार और आयेंगे, और तब वे आकाश से नहीं आयेंगे।
रुधिर की नदी
अब दोनों सेनाएँ भिड़ती हैं, और कथा एक के बाद एक चित्र बनाती है, शुरू के सारे आकाश के। निशाचरों की घनी सेना कसमसाती हुई आती है, और वानर योद्धा उसके सामने प्रलयकाल के बादलों के समूह की तरह चलते हैं। कृपाण और तलवारें बिजलियों की तरह चमकती हैं, हाथी, रथ और घोड़ों की चिग्घाड़ बादलों की गरज है। वानरों की पूँछें आकाश में इन्द्रधनुष की तरह छा जाती हैं, धूल जल की धारा की तरह उठती है, और बाण उसकी बूँदें हैं।
यह पूरी लड़ाई एक बरसात है। और जब राम क्रोध करके बाणों की झड़ी लगा देते हैं, तब वह बरसात ज़मीन पर उतर आती है। बाण लगते ही वीर चीत्कार करते हैं, चक्कर खा-खाकर जहाँ-तहाँ गिरते हैं, और उनके शरीरों से ख़ून ऐसे बहता है जैसे पहाड़ के भारी झरनों से पानी।
वहीं से वह नदी बनती है जिसका पूरा चित्र खींचा गया है। दोनों दल उस नदी के दोनों किनारे हैं, रथ उसकी रेत हैं और पहिये भँवर।
हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे और तरह-तरह की सवारियाँ उस नदी के जलजन्तु हैं, बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं, धनुष तरंगें हैं, और ढालें बहुत सारे कछुए। उपमा जितनी ठीक बैठती है, दृश्य उतना ही असह्य होता जाता है।
फिर वही नदी पूरी होती है। वीर ऐसे गिर रहे हैं मानो किनारे के पेड़ ढह रहे हों, और बहुत सारी मज्जा बह रही है, वही उसका फेन है। और अन्त में एक बात देखने वालों के बारे में: कायर इसे देखकर डरते हैं, और अच्छे योद्धाओं के मन को चैन मिलता है। एक ही दृश्य, दो तरह के लोग, और कथा कोई फ़ैसला नहीं सुनाती।
जो सिर ज़मीन पर पड़े जय बोलते हैं
इसके आगे लड़ाई किनारे हो गयी है और खाने वाले बीच में आ गये हैं। भूत, पिशाच, बैताल, बड़े-बड़े झोटिंग और शिवगण उस नदी में स्नान करते हैं। कौए और चीलें भुजाएँ लेकर उड़ती हैं और एक दूसरे से छीनकर खा जाती हैं। गीध किनारे बैठकर आँतें खींच रहे हैं, मानो कोई चित्त लगाये बंसी खेल रहा हो।
इसी बीच कोई कहता है कि इतनी सस्ती होने पर भी इन मूर्खों की दरिद्रता नहीं जाती। यह ठिठोली भूतों के मुँह में है। जहाँ आदमी के लिये कुछ नहीं बचा, वहाँ किसी और के लिये बहुतायत है। घायल योद्धा किनारे पड़े कराह रहे हैं, और कथा उनकी उपमा उन लोगों से देती है जिन्हें अन्त समय आधे जल में रखा जाता है।
योगिनियाँ खप्परों में भर-भरकर ख़ून जमा कर रही हैं, भूत-पिशाचों की स्त्रियाँ आकाश में नाच रही हैं। चामुण्डाएँ योद्धाओं की खोपड़ियों का करताल बजाकर नाना प्रकार से गा रही हैं। गीदड़ों के झुंड कट-कट शब्द करते हुए काटते हैं, खाते हैं, हुआँ-हुआँ करते हैं, और पेट भर जाने पर एक दूसरे को डाँटते हैं। करोड़ों धड़ बिना सिर के घूम रहे हैं।
और फिर वह बात, जिस पर यह हिस्सा बैठता है: ज़मीन पर पड़े हुए सिर जय जय बोल रहे हैं। ये वही दो शब्द हैं जो थोड़ी देर पहले फूल बरसाते देवताओं ने आकाश से कहे थे। ऊपर वे शब्द हर्ष के हैं। नीचे वे कटे हुए सिरों के मुँह में हैं, और वहाँ भी वही हैं।
आगे धड़ बिना सिर के दौड़ते हैं, पक्षी खोपड़ियों में उलझकर आपस में लड़ मरते हैं। राम के बल से दर्पित वानर राक्षसों के झुंडों को मसल डालते हैं। अन्त में राम के बाण-समूहों से मारे हुए योद्धा संग्राम के आँगन में सो रहे हैं। मैदान को आँगन कहा गया है और मरने को सोना, और इसी बात से यह सारा भयानक हिस्सा उतरकर शान्त हो जाता है।
मैं अकेला हूँ, और वानर बहुत हैं
और इस सबके बीच एक आदमी बैठा हिसाब लगा रहा है। प्रसंग का अन्त उसी हिसाब पर है, और वह हिसाब मैदान से नहीं, उसके हृदय के भीतर से आता है।
रावण हृदय में विचारता है, “राक्षसों का संहार हो गया। मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं। इसलिये अब अपार माया रचूँ।” जो आरम्भ में बीस भुजाओं और दस धनुषों के साथ निकला था, वह अन्त में गिनती करता है और एक पर पहुँचता है। और उसका निष्कर्ष लड़ना या लौटना नहीं, यह है कि अब जो है उसे छिपाना पड़ेगा और जो नहीं है उसे दिखाना पड़ेगा।
माया तब काम आती है जब सामने वाले को धोखे में रखना ही बचा हो। यही वह सीढ़ी है जिस पर यह आदमी शुरू से उतरता आया है: ब्रह्मा का दिया हुआ अस्त्र, फिर एक विधि, फिर जीने की आशा छोड़कर निकलना, और अब छल। अगला प्रसंग यहीं से उठता है।
अकेलेपन की गिनती
सोचने लायक़ जगह वह है जहाँ एक हारता हुआ आदमी लड़ाई छोड़कर घर लौटता है और यज्ञ पर बैठ जाता है। उसने विधि से बहुत कुछ पाया है। ब्रह्मा की दी हुई शक्ति उसी का प्रमाण है। इसलिये सब हाथ से जाने लगता है, तो वह उसी दरवाज़े पर लौटता है। कथा इसी पर उँगली रखती है: राम से विरोध करके वह विजय चाहता है।
इसका खंडन कोई तर्क नहीं करता। एक लात करती है, और उसके बाद एक छोटी-सी बात: उसने आँख उठाकर देखा तक नहीं। जो अपमान इसलिये सह लेता है कि उसे उससे बड़ी कोई चीज़ चाहिये, वह संयमी नहीं, और गहरा लोभी होता है। जिसके लिये वह बैठा रहा, वह भी नहीं बचा, और जिनके लिये वह उठा, उन्हें भी वह बचा नहीं सका।
कथा का दूसरा सिरा इसका उलटा है। लक्ष्मण गिरे हुए हैं, और उन्हें कोई विधि नहीं उठाती। एक वाक्य उठाता है, जो कोई नयी बात नहीं बताता, एक पुरानी बात याद दिलाता है। एक आदमी वह पाना चाह रहा है जो उसका कभी था ही नहीं, और दूसरे को वह याद दिलाना पड़ रहा है जो हमेशा से उसका है।
अन्त में जो चित्र बचता है, वह गीधों का है। रावण अभी जीवित है, रथ पर है, दसों सिर अपनी जगह हैं, और गीध उन्हीं सिरों पर बैठ रहे हैं। वह देखता भी है और चलता भी है, और कारण एक ही है: वह काल के वश है।
इसीलिये अन्त का वाक्य इतना ठंडा लगता है: “मैं अकेला हूँ।” यह वह कह रहा है जिसके पास अभी भी नगर है, महल है, माया है और दस सिर हैं। अकेलापन गिनती से नहीं आता, और आगे जो माया वह रचने जा रहा है, वह उसी अकेलेपन को ढकने का तरीक़ा है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 81 से 88, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।