रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · रावण का रण-प्रस्थान और धर्म का रथ
रावण का रण-प्रस्थान और धर्म का रथ
जिस सुबह लङ्कापति स्वयं रथ सजाकर निकलता है, उसी सुबह विभीषण यह पूछ बैठते हैं कि बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के वह बलवान वीर जीता कैसे जायगा, और उत्तर में रामचरितमानस का सबसे प्रसिद्ध रथ खड़ा हो जाता है।
यह पन्ना बीच साँस से खुलता है। पहली चौपाई का पहला शब्द है तिन्हहि, यानी उन्हें, और वे कौन हैं यह इस पन्ने पर कहीं नहीं लिखा। जिन्हें समझाया जा रहा है, वे इससे पिछले प्रसंग में खड़े हैं। यहाँ उस समझाइश का सिर्फ़ आख़िरी टुकड़ा बचा है, और उस टुकड़े पर तुलसी की अपनी एक टिप्पणी, जो इतनी छोटी और इतनी सीधी है कि वह रामचरितमानस से निकलकर बोलचाल में जा बसी। उसके तुरन्त बाद रात कट जाती है, पौ फटती है, और यह काण्ड उस सुबह पर आ जाता है जिसकी ओर वह बहुत देर से बढ़ रहा था।
इस पन्ने की बनावट में एक बात बहुत साफ़ है। तुलसी युद्ध को जल्दी शुरू नहीं करते। लङ्कापति रथ सजाता है, बाजे बजते हैं, सेना निकलती है, धूल से सूरज ढक जाता है, और इतने सब में पहली चोट कहीं नहीं पड़ती। जो पड़ता है वह अपशकुनों का एक पूरा छन्द है, और उसके बाद एक दोहा जो युद्ध की बात ही नहीं करता। फिर सेना चलती है, दोनों ओर की जोड़ियाँ भिड़ती हैं, और ठीक उसी क्षण, जब पाठक लड़ाई का ब्योरा माँग रहा होता है, कविता रुक जाती है। एक आदमी एक प्रश्न पूछता है, और उत्तर में जो खड़ा होता है वह पहियों और घोड़ों वाला रथ है, पर उसका एक भी पुर्ज़ा लोहे का नहीं है। दोहा अठहत्तर से अस्सी तक की यह छोटी-सी दूरी इस काण्ड की सबसे ज़्यादा दोहरायी जाने वाली दूरी है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यह प्रसंग उस फ़र्क़ को छिपाता नहीं। जिस धर्ममय रथ पर यह पन्ना जाकर ठहरता है, वह तुलसी का अपना है, और उसका पूरा ब्योरा उन्हीं की गिनायी हुई तरतीब में यहाँ रखा गया है। इस पन्ने पर जो नाम है, जो संख्या है और जो क्रम है, वह सब इसी अवधी पाठ और इसी की हिन्दी टीका से लिया गया है, और कहीं से नहीं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- रावण लङ्कापति, जो इस पन्ने के पहले शब्द में दूसरों को ज्ञान समझा रहा है और चौथी चौपाई तक रथ सजाकर निकल चुका है।
- श्रीराम जो इस पूरे युद्ध-प्रस्थान के बीच बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के खड़े हैं, और एक प्रश्न के उत्तर में रथ की परिभाषा ही बदल देते हैं।
- विभीषण जो इस पन्ने पर श्रीराम के पक्ष में हैं, और जिनका प्रेम अधिक होने से उनके मन में वह सन्देह उठता है जिससे यह पूरा उपदेश निकलता है।
- अंगद और हनुमान जिनका नाम इस पन्ने के अन्तिम दोहे में उस ओर से आता है जिस ओर से रावण की ललकार का उत्तर दिया जा रहा है।
- शिव और उमा जिनकी आपसी बातचीत इस कथा को ढोकर लाती है, और जो यहाँ बता देते हैं कि वे स्वयं आकाश में उस भीड़ के साथ खड़े थे।
- रीछ और वानर जो सुबह होते ही चारों दरवाज़ों पर जा लगते हैं और जिनका एकमात्र हथियार नख, दाँत, पहाड़, पेड़ और एक नाम है।
उपदेश देना आसान है
पाठ यहाँ इतना ही दर्ज करता है कि रावण ने उन्हें ज्ञान का उपदेश दिया। यह अपने आप में ठिठका देने वाली बात है, क्योंकि जिस आदमी का चरित यह काण्ड अब तक खोलकर दिखा चुका है, उसके मुँह से ज्ञान की बात निकलना पढ़ने वाले को रोक देता है। भीतर से एक सवाल उठता है कि क्या ऐसी बात ऐसे मुँह से निकलकर भी बात रहती है। तुलसी उस सवाल को पहचानते हैं, और उसे लटकाये नहीं रखते। वे उसी चौपाई में, उसी साँस में, उसका हिसाब चुका देते हैं, और हिसाब चुकाने का उनका तरीक़ा दो तरफ़ काटता है।
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥
चौपाई १
पर उपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
पहला वार बचाव की तरफ़ है। आपुन मंद कथा सुभ पावन, यानी वह स्वयं नीच है, पर उसकी कही हुई बात शुभ और पवित्र है। कही हुई बात का मोल कहने वाले के आचरण से घट नहीं जाता, यह तुलसी बिना किसी हिचक के लिख देते हैं। यह उदारता नहीं है, यह नाप है। बात और बोलने वाला दो अलग चीज़ें हैं, और दोनों को अलग-अलग तौला जाता है। इसीलिये आगे जो कुछ भी इस पन्ने पर कहा जायगा, वह कहने वाले की साख पर नहीं, अपनी सच्चाई पर टिकेगा।
दूसरा वार आगे की दो पंक्तियों में है, और वही दो पंक्तियाँ इस चौपाई को घर-घर तक ले गयीं। दूसरों को उपदेश देने में निपुण बहुत हैं। जो उस उपदेश के अनुसार आचरण भी करते हों, वैसे लोग घनेरे नहीं हैं, यानी इतने नहीं हैं कि उनकी भीड़ बन सके। ध्यान दीजिये कि तुलसी यह नहीं कहते कि ऐसे लोग हैं ही नहीं। वे सिर्फ़ गिनती बताते हैं। एक तरफ़ बहुतायत है, दूसरी तरफ़ थोड़े लोग हैं, और इन दो शब्दों के बीच में पूरी दुनिया आ जाती है।
इस टिप्पणी की जगह पर ठहरिये। तुलसी इसे वहाँ नहीं रखते जहाँ कोई साधु सभा में उपदेश दे रहा हो। वे इसे ठीक उस सुबह के मुहाने पर रखते हैं जिस दिन यही उपदेश देने वाला रथ सजाकर निकलेगा। जो बात वह कह रहा था, वह उसे उतनी ही अच्छी तरह मालूम है जितनी किसी और को। कमी जानने में नहीं है। कमी उस जगह है जहाँ जानना पाँव तक उतरता है। और यही वह जगह है जिस पर यह पूरा पन्ना जाकर खड़ा होता है, क्योंकि इसी पन्ने पर आगे एक ऐसा रथ बनने वाला है जिसका हर पुर्ज़ा एक गुण है, और जिसे जान लेना काफ़ी नहीं, जिस पर चढ़ना पड़ता है।
सार: पन्ना रावण के दिये हुए ज्ञानोपदेश के आख़िरी टुकड़े से खुलता है। तुलसी कहते हैं कि वह स्वयं नीच है पर उसकी कही हुई बात शुभ और पवित्र है, और साथ ही यह भी कि उपदेश देने में निपुण बहुत हैं, उस पर चलने वाले घने नहीं।
रात बीत गयी, और चारों दरवाज़े भर गये
अगली ही पंक्ति में रात कट जाती है। निसा सिरानि भयउ भिनुसारा, रात बीत गयी और पौ फट गयी। और उस उजाले में जो पहला दृश्य दिखायी देता है वह लङ्का के भीतर का नहीं है, बाहर का है। रीछ और वानर चारों दरवाज़ों पर जा लगे हैं। यह वाक्य बहुत शान्त है और उसमें कोई ललकार नहीं, पर उसका अर्थ यह है कि नगर के चारों निकास एक साथ बन्द हैं। लङ्कापति के लिये अब सुबह का पहला काम सोचना नहीं, बोलना है। वह अपने उत्तम योद्धाओं को बुलाता है।
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा । लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा॥
चौपाई २
सुभट बोलाइ दसानन बोला । रन सन्मुख जा कर मन डोला॥
जो भाषण शुरू होता है वह आदेश से नहीं, एक शर्त से शुरू होता है, और यह अपने आप में ध्यान देने लायक़ है। लड़ाई में शत्रु के सामने जिसका मन डाँवाडोल हो, वह अभी भाग जाय, यही अच्छा है। रण से मुँह मोड़ लेने में कोई भलाई नहीं है, इसलिये जिसे मुड़ना हो वह पहले ही निकल जाय। लङ्कापति अपने सैनिकों से साहस नहीं माँग रहा, वह उनसे साफ़ होने की माँग कर रहा है। यह एक सेनापति की बात है और इसमें कहीं कोई मूर्खता नहीं है। रावण के सारे वाक्य मूर्खता के नहीं हैं, और तुलसी उन्हें कहीं भी बेवक़ूफ़ बनाकर नहीं दिखाते। जो चीज़ टेढ़ी है वह उसकी अक्ल नहीं, उसकी नाप है।
और उसी भाषण का दूसरा आधा हिस्सा उस नाप को खोल देता है। मैंने अपनी भुजाओं के बल पर वैर बढ़ाया है, इसलिये जो शत्रु चढ़ आया है उसका उत्तर मैं दूँगा। पहली बात पूरी तरह सच है। यह वैर किसी और ने नहीं बढ़ाया, इसी ने बढ़ाया, और इसी के बाहुबल के भरोसे बढ़ाया। दूसरी बात में चूक है, और चूक इतनी महीन है कि सुनने में वीरता जैसी लगती है। जिस बल के भरोसे वैर बढ़ाया गया था, उसी बल को उत्तर देने के लिये काफ़ी मान लिया गया है। जिसने हिसाब बिगाड़ा वही अब हिसाब बराबर करने चला है, और उसके पास जोड़ने-घटाने का वही एक तरीक़ा है जो अब तक चल आया है।
इसके बाद पाठ तेज़ी से आगे बढ़ता है। ऐसा कहकर उसने पवन के समान वेग वाला रथ सजाया, और सारे जुझाऊ बाजे बज उठे। सब अतुलनीय बल वाले वीर चल पड़े, और तुलसी उनके चलने की उपमा में जो रंग चुनते हैं वह काला है। मानो काजल की आँधी चली हो। इस उपमा में तीन चीज़ें एक साथ हैं। रंग काला है, चाल आँधी की है, और काजल हवा में उड़कर सबसे पहले आँखों में पड़ता है। जो सेना निकल रही है वह देखने वालों की आँख पहले भरेगी, फिर उनका रास्ता रोकेगी।
और ठीक उसी क्षण, जब यह पूरा दृश्य भव्य हो चला है, तुलसी एक छोटी-सी चौपाई डालकर सब कुछ पलट देते हैं। उस समय असंख्य अपशकुन होने लगे। पर वह उन्हें गिनता नहीं, क्योंकि भुजाओं के बल का बड़ा गर्व उसके भीतर बैठा है। इस पंक्ति की धुरी वह क्रिया है जिसे पढ़ते हुए आँख फिसल जाती है, गनइ न, गिनता नहीं। अपशकुन हो रहे हैं, यह पाठ मानता है। वे दिख भी रहे हैं, यह भी मानता है। जो नहीं हो रहा वह गिनती है। एक आदमी के पास आँकड़ा मौजूद है और वह उसे जोड़ने से इनकार कर रहा है, और यही इस पूरे काण्ड की सबसे बड़ी चूक है।
सार: रात बीतते ही रीछ-वानर चारों दरवाज़ों पर जा लगते हैं। रावण योद्धाओं को बुलाकर कहता है कि जिसका मन डोले वह अभी चला जाय, और अपने ही भुजबल पर बढ़ाये हुए वैर का उत्तर देने के लिये पवन-वेग वाला रथ सजाता है। उसी समय असंख्य अपशकुन होते हैं, जिन्हें वह गिनता नहीं।
जो शकुन गिने नहीं गये
और अब तुलसी वह करते हैं जो इस काण्ड में वे तभी करते हैं जब दृश्य को रफ़्तार चाहिये। वे चौपाई छोड़कर छन्द पर उतर आते हैं। छन्द की पंक्ति लम्बी है और उसके भीतर चीज़ें एक के पीछे एक बिना रुके आती हैं। पर यहाँ जो आ रहा है वह लड़ाई नहीं है। अभी एक भी वार नहीं हुआ, एक भी बाण नहीं छूटा, और तुलसी पूरा का पूरा छन्द सिर्फ़ अपशकुनों पर ख़र्च कर रहे हैं। यह एक कवि का फ़ैसला है और वह बिना कुछ कहे सब कह देता है, क्योंकि इस युद्ध का नतीजा उसके शुरू होने से पहले दर्ज किया जा रहा है।
अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते।
छन्द
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥
अत्यन्त गर्व के कारण वह शकुन और अपशकुन का विचार ही नहीं करता, और उधर सूची चलती चली जाती है। हथियार हाथों से गिर रहे हैं। योद्धा रथों से गिर पड़ते हैं। घोड़े और हाथी साथ छोड़कर, चिग्घाड़ते हुए, भाग जा रहे हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं और बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। और इसी छन्द की अन्तिम पंक्ति उल्लुओं की है, जो ऐसे परम भयावने वचन बोल रहे हैं मानो काल के दूत हों और मृत्यु का सँदेशा सुना रहे हों।
इस पूरी सूची में एक बात पर ध्यान जाना चाहिये। इनमें से कोई भी चीज़ शत्रु ने नहीं भेजी है। हथियार अपने हैं और अपने हाथ से गिर रहे हैं। योद्धा अपने हैं और अपने रथ से गिर रहे हैं। घोड़े और हाथी अपने हैं और अपना साथ छोड़ रहे हैं। जो सेना बाहर से देखने में काजल की आँधी है, वह भीतर से टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर रही है, और यह बिखराव किसी लड़ाई का नतीजा नहीं है। लङ्का के दरवाज़े पर अभी कोई नहीं पहुँचा। यह सब उस रास्ते पर हो रहा है जिस पर सेना अभी चल ही रही है।
और इसके बाद जो दोहा आता है, वह इस पन्ने का पहला बड़ा ठहराव है। पूरे युद्ध-प्रस्थान के बीचोंबीच तुलसी एक दोहा रखते हैं जिसमें न कोई सेना है, न कोई नगर, न कोई हथियार। उसमें सिर्फ़ एक आदमी की चार पहचानें हैं और एक प्रश्न है।
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।
दोहा ७८
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥ ७८॥
जो जीवों के द्रोह में रत है, जो मोह के वश में है, जो राम से विमुख है, और जिसकी रति काम में है, उसे क्या कभी सपने में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और मन का विश्राम मिल सकता है। यह वाक्य अभिशाप नहीं है, यह प्रश्न है, और प्रश्न होने से यह ज़्यादा कठोर हो जाता है, क्योंकि उत्तर पढ़ने वाले के मन में अपने आप बन जाता है। चार पहचानें गिनायी गयी हैं और तीनों वस्तुएँ जो नहीं मिल सकतीं, वे भी गिनायी गयी हैं। सम्पत्ति है, वह बाहर की चीज़ है। शुभ शकुन है, वह बीच की चीज़ है। और मन का विश्राम है, वह भीतर की चीज़ है। बाहर से भीतर तक, तीनों जगह एक ही उत्तर है।
इस दोहे का सबसे सुन्दर काम यह है कि यह पिछली चौपाई की पहेली सुलझा देता है। पिछली चौपाई में अपशकुन हो रहे थे और वह उन्हें गिन नहीं रहा था। यह दोहा कहता है कि गिनने को था ही क्या। जिस आदमी की बनावट ऐसी है, उसके लिये शुभ शकुन नाम की चीज़ सपने में भी नहीं आती। अपशकुन कोई बाहरी सूचना नहीं थे जिसे मानने या न मानने का विकल्प होता। वे उसी बनावट की छाया थे, और छाया को गिनकर भी कोई क्या करता।
सार: तुलसी युद्ध शुरू होने से पहले पूरा एक छन्द अपशकुनों पर लगाते हैं, जिसमें हथियार, योद्धा, घोड़े और हाथी सब अपना साथ छोड़ रहे हैं। दोहा अठहत्तर पूछता है कि जीवों से द्रोह करने वाले, मोहग्रस्त, रामविमुख और कामासक्त को सम्पत्ति, शुभ शकुन और मन का विश्राम सपने में भी कहाँ।
चतुरंगिणी
दोहा ख़त्म होते ही दृश्य लौट आता है, और अब सेना सचमुच निकल पड़ती है। तुलसी यहाँ एक सूची लिखते हैं, और सूची लिखते हुए वे कहीं कंजूसी नहीं करते। यह इस काण्ड का सबसे भरा हुआ कूच है और उसे भरा हुआ दिखाना ही इसका काम है, क्योंकि आगे चलकर इसी भरेपन के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा किया जायगा जिसके पास कुछ भी नहीं है।
चलेउ निसाचर कटकु अपारा । चतुरंगिनी अनी बहु धारा॥
चौपाई ३
बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥
राक्षसों की अपार सेना चली। चतुरंगिणी सेना की बहुत-सी धाराएँ हैं, यानी टुकड़ियाँ हैं, और उनमें अनेकों प्रकार के वाहन, रथ और सवारियाँ हैं। बहुत-से रंगों की पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं। मतवाले हाथियों के झुंड ऐसे चले मानो पवन से प्रेरित होकर वर्षा के बादल चल रहे हों। रंग-बिरंगे बाने पहने हुए वीरों के समूह हैं, जो युद्ध में शूर हैं और बहुत प्रकार की माया जानते हैं। यह आख़िरी ब्योरा छोटा है और गहरा है, क्योंकि माया को यहाँ हथियारों की सूची में नहीं गिना गया। उसे योद्धाओं के परिचय में रखा गया है, यानी वह किसी के हाथ में पकड़ी हुई चीज़ नहीं, उनके होने का ढंग है।
अत्यन्त विचित्र वह फ़ौज शोभा पा रही है, मानो वीर वसन्त ने अपनी सेना सजायी हो। इस उपमा में एक अजीब कोमलता है। वसन्त का नाम रंगों के कारण आया है, क्योंकि इतने रंग एक साथ और कहीं नहीं दिखते। पर उसी वसन्त के चलने से जो होता है, वह कोमल बिलकुल नहीं है। सेना के चलने से दिशाओं के हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे। जिन तीन चीज़ों को हिलना नहीं चाहिये, वे तीनों हिल रही हैं, और यह हिलना अभी किसी लड़ाई का नहीं, सिर्फ़ चलने का नतीजा है।
इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। फिर पवन थम गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े इतनी घोर ध्वनि से बज रहे हैं जैसे प्रलय के समय के बादल गरज रहे हों। भेरी, नफ़ीरी और शहनाई में मारू राग बज रहा है, वही राग जो योद्धाओं को सुख देता है। और इन सबके ऊपर एक और आवाज़ है। सब वीर सिंह की तरह नाद करते हैं और अपने-अपने बल और पौरुष का बखान करते हैं। यह आख़िरी ब्योरा इस पन्ने पर बहुत काम आयेगा, इसलिये इसे यहीं पकड़ रखिये। हर योद्धा अपना बल बोल रहा है। बल अपना है, और उसका बखान भी अपना ही मुँह कर रहा है।
कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा । मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा॥
चौपाई ४
हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई । अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई॥
और अब लङ्कापति काम बाँटता है, और बँटवारा उसके पूरे चरित का नक़्शा है। हे उत्तम योद्धाओ, सुनिये, रीछ-वानरों के ठट्ट को मसल डालिये। और मैं दोनों राजकुमार भाइयों को मारूँगा। लाखों की सेना एक तरफ़ और दो आदमी दूसरी तरफ़, और दूसरी तरफ़ अकेला वह खड़ा है। यह दंभ है, पर इसमें एक और चीज़ भी है जिसे देख लेना चाहिये। वह अपने हिस्से का काम छोटा नहीं रख रहा, वह सबसे कठिन काम अपने लिये रख रहा है। ऐसा कहकर उसने सेना को सामने की ओर रेंगा दिया, और यह क्रिया, रेंगाई, बहुत भारी है। इतनी बड़ी फ़ौज चलती नहीं, वह रेंगती है, जैसे कोई एक ही देह हो।
उधर यह ख़बर वानरों तक पहुँचती है, और उनके चलने का ढंग दूसरा है। जब सब वानरों ने यह ख़बर पायी, तब वे श्रीरघुवीर की दुहाई देते हुए दौड़े। दोनों पक्षों के निकलने में यही एक फ़र्क़ है और वह पूरा फ़र्क़ है। एक तरफ़ हर योद्धा अपना बल बोलकर चला है। दूसरी तरफ़ कोई अपना नाम नहीं ले रहा, सब एक ही नाम की दुहाई दे रहे हैं। और दुहाई देना कोई नारा लगाना नहीं है। दुहाई वह चीज़ है जो आदमी तब देता है जब वह अपने बूते से बाहर की लड़ाई में उतर रहा हो, और इसीलिये यह पूरी सेना एक शब्द से चलती है, बिना यह पूछे कि उसका अपना नाप कितना है।
धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।
छन्द
मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते॥
नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।
जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥
वे विशाल और काल के समान कराल वानर-भालू दौड़े, मानो पंखवाले पर्वतों के समूह उड़ रहे हों, और वे अनेक रंगों के हैं। नख, दाँत, पहाड़ और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बलवान हैं और किसी की शङ्का नहीं मानते। और अन्तिम पंक्ति वह है जिस पर यह छन्द जाकर बैठता है। रावणरूपी मतवाले हाथी के लिये जो सिंह हैं, उन श्रीराम की जय बोलकर वे उनके सुन्दर यश का बखान करते हैं। दौड़ते हुए वे गा रहे हैं, और जो गा रहे हैं वह अपनी बहादुरी नहीं है।
इन दो छन्दों को आमने-सामने रखकर देखिये। एक में लोहा है, रथ हैं, हाथी हैं, ध्वजाएँ हैं, और उन सबके भीतर हथियार हाथ से गिर रहे हैं। दूसरे में हथियार के नाम पर नख और दाँत हैं, ढोने के नाम पर अपनी ही टाँगें हैं, और उनके भीतर कोई दरार नहीं है। तुलसी ने दोनों को एक ही छन्द-चाल में लिखा है ताकि उनका अन्तर सुनायी दे जाय। और फिर दोहा आकर दोनों को एक जगह ले आता है।
दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।
दोहा ७९
भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥ ७९॥
दोनों ओर के योद्धा जय-जयकार करके, अपनी-अपनी जोड़ी पहचानकर, इधर श्रीराम का और उधर रावण का बखान करते हुए भिड़ गये। इस दोहे में सबसे सुन्दर शब्द है निज निज जोरी जानि। भिड़न्त अन्धाधुन्ध नहीं है। हर योद्धा अपने जोड़ का योद्धा पहचानकर उससे भिड़ रहा है। इस पूरे युद्ध में एक तरतीब है और वह तरतीब किसी सेनापति ने नहीं बनायी, लड़ने वालों ने आपस में पहचानकर बना ली है। और भिड़ने से ठीक पहले दोनों ओर से जो बोला जा रहा है वह अपना नाम नहीं है, अपने स्वामी का नाम है।
सार: राक्षसों की चतुरंगिणी सेना निकलती है, धूल से सूरज ढक जाता है, नगाड़े प्रलय के बादलों की तरह गरजते हैं और हर वीर अपना बल-पौरुष बखानता है। रावण कहता है कि रीछ-वानरों को आप मसलिये, दोनों भाइयों को मैं मारूँगा। वानर रघुवीर की दुहाई देते हुए दौड़ते हैं, और दोहा उन्यासी में दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी जोड़ी पहचानकर भिड़ जाते हैं।
बिना रथ के
और अब, ठीक उस क्षण जब पाठक लड़ाई का ब्योरा माँग रहा होता है, कविता मैदान से आँख हटा लेती है। भिड़न्त शुरू हो चुकी है, धूल उठी हुई है, दोनों ओर से नाम बोले जा रहे हैं, और उसी शोर के बीच एक आदमी की निगाह दो चीज़ों पर पड़ जाती है और वहीं अटक जाती है। रावण रथ पर है। रघुवीर बिना रथ के हैं। इन दो टुकड़ों को एक ही पंक्ति में रखकर तुलसी वह सवाल खड़ा कर देते हैं जिसका उत्तर इस काण्ड की सबसे ज़्यादा दोहरायी जाने वाली चीज़ बन गया।
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥
चौपाई ५
अधिक प्रीति मन भा संदेहा । बंदि चरन कह सहित सनेहा॥
देखकर विभीषण अधीर हो गये, यह पाठ कहता है, और फिर वह कारण बताता है जो इस पूरे प्रसंग को सँभाले हुए है। प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया। सन्देह का कारण सन्देह नहीं है, प्रेम है। यह बहुत बारीक बात है और तुलसी इसे बिना ज़ोर दिये रख देते हैं। जिसे किसी की चिन्ता नहीं, उसे डर भी नहीं लगता। डर वहीं उगता है जहाँ कुछ खोने को हो। और जो आदमी यहाँ डर रहा है, वह अपनी जान के लिये नहीं डर रहा, दूसरे की जीत के लिये डर रहा है।
और उनका करने का ढंग भी उतना ही ध्यान खींचता है। वे चरणों की वन्दना करके, स्नेह सहित, कहने लगते हैं। पहले प्रणाम, फिर प्रश्न। सन्देह को छिपाया नहीं जाता और उसे विद्रोह भी नहीं बनाया जाता। वह सामने रख दिया जाता है, उसी जगह, उसी समय, बिना किसी लाग-लपेट के। इस पन्ने पर यही अकेला क्षण है जब कोई श्रीराम से उनकी तैयारी के बारे में सवाल करता है, और सवाल करने वाला उन्हीं के पक्ष में खड़ा है।
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
चौपाई ६
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
हे नाथ, न रथ है, न देह की रक्षा करने वाला कवच है, और न पाँव में जूते ही हैं। वह बलवान वीर किस विधि से जीता जायगा। इस प्रश्न की तीन चीज़ें गिनने लायक़ हैं और तीनों बहुत ठोस हैं। रथ चढ़ने के लिये है, कवच बचने के लिये है, और जूते ज़मीन पर पाँव टिकाने के लिये हैं। यह कोई दार्शनिक प्रश्न नहीं है। यह वही प्रश्न है जो कोई भी समझदार आदमी मैदान के किनारे खड़ा होकर पूछेगा। और इसमें एक और चीज़ छिपी है, जिसे पढ़ते हुए निकल जाना आसान है। विभीषण रावण को बीर बलवाना कह रहे हैं। जिस शत्रु के सामने वे खड़े हैं, उसकी ताक़त को वे रत्ती भर छोटा नहीं कर रहे। उनका डर इसलिये सच्चा है कि उनकी नाप सच्ची है।
और उत्तर आता है, और उत्तर का पहला शब्द ही पूरा मिज़ाज तय कर देता है। सुनहु सखा, सुनिये सखा। न डाँट है, न आश्वासन, न कोई चमत्कार दिखाने का वादा। पहले सम्बोधन, और सम्बोधन में मित्रता। कृपानिधान कहते हैं कि जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है। स्यंदन, यानी रथ। एक ही वाक्य में प्रश्न स्वीकार भी कर लिया गया और उलट भी दिया गया। रथ चाहिये, यह बात मान ली गयी। पर जिस रथ से जीत होती है वह वह नहीं है जिसकी ओर विभीषण इशारा कर रहे हैं।
सार: रावण को रथ पर और श्रीराम को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो जाते हैं, और पाठ कहता है कि यह सन्देह अधिक प्रेम से उपजा है। वे चरण वन्दना करके पूछते हैं कि न रथ है, न कवच, न जूते, तो वह बलवान वीर कैसे जीता जायगा, और उत्तर मिलता है कि जिससे जय होती है वह रथ दूसरा ही है।
धर्ममय रथ
अब जो आता है वह रामचरितमानस के सबसे ज़्यादा दोहराये जाने वाले हिस्सों में है, और उसे जल्दी में नहीं पढ़ना चाहिये। यह कोई रूपक की कसरत नहीं है। इसमें एक-एक पुर्ज़ा उसी जगह बैठाया गया है जहाँ असली रथ में वह पुर्ज़ा होता है, और हर बार चुनाव इतना सटीक है कि पुर्ज़े का काम और गुण का काम एक हो जाते हैं। इसे पढ़ते हुए बार-बार यह पूछिये कि यह चीज़ रथ में करती क्या है, क्योंकि उत्तर उसी में रखा हुआ है।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
चौपाई ७
बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे॥
शौर्य और धैर्य उस रथ के दो पहिये हैं। पहिये दो ही होते हैं और वे जोड़ी में ही चलते हैं, इसलिये इनमें से एक अकेला रह जाय तो रथ चलता नहीं, घूमता रह जाता है। शौर्य आगे बढ़ाता है और धैर्य टिकाये रखता है। सत्य और शील उसकी मज़बूत ध्वजा और पताका हैं। ध्वजा वह चीज़ है जो सबसे ऊँची और सबसे दूर से दिखने वाली होती है, इसलिये जो सबसे पहले दिखायी दे वह सत्य और सदाचार हो, यही इस रथ की पहचान है। बल, विवेक, दम और परहित, ये चार उसके घोड़े हैं। और घोड़े रथ से जिस डोरी से बँधे हैं वह भी नाम लेकर बतायी गयी है, क्षमा, दया और समता। जिनके पास शक्ति है, बुद्धि है, संयम है और दूसरे का हित करने की चाह है, वे चारों तभी एक दिशा में दौड़ते हैं जब उन्हें क्षमा और समता की डोरी बाँधे हुए हो। खोल दीजिये, तो चारों अलग-अलग भाग जायँगे और रथ वहीं खड़ा रह जायगा।
ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
चौपाई ८
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
ईश्वर का भजन ही चतुर सारथि है। यह सबसे महत्त्व की नियुक्ति है, क्योंकि सारथि वह है जो तय करता है कि रथ जायगा किधर। पहिये कितने भी अच्छे हों और घोड़े कितने भी तेज़, दिशा सारथि के हाथ में है। वैराग्य ढाल है, क्योंकि ढाल का काम वार को छू जाने देना और भीतर तक न पहुँचने देना है। सन्तोष तलवार है, और यह उलटा लगता है जब तक यह याद न आ जाय कि जितनी चोटें आदमी खाता है, उनमें से अधिकतर उसे किसी और ने नहीं, उसके अपने असन्तोष ने पहुँचायी हैं। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, और श्रेष्ठ विज्ञान वह कठिन धनुष है जिसे हर कोई चढ़ा नहीं सकता।
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
चौपाई ९
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
निर्मल और अचल मन तरकस के समान है। तरकस वह है जिसमें बाण रखे जाते हैं, और उसका गुण यही है कि वह हिले नहीं और भीतर से साफ़ हो, वरना बाण निकलते समय अटक जाते हैं। और बाण कौन हैं, यह अगली ही साँस में बता दिया गया है। शम, यम और नियम, ये बहुत-से बाण हैं। यहाँ संख्या पर ध्यान दीजिये। पहिये दो हैं, घोड़े चार हैं, ध्वजा एक है, तलवार एक है, पर बाण अनेक हैं, क्योंकि संयम एक बार का काम नहीं है, वह रोज़ चलाया जाने वाला हथियार है। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है, और यह ठीक उसी चीज़ का उत्तर है जिसकी कमी विभीषण ने गिनायी थी। और फिर वह वाक्य आता है जो पूरे रूपक पर मुहर लगा देता है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥
चौपाई १०
हे सखा, ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो, उसके लिये जीतने को कहीं कोई शत्रु ही नहीं है। इस आधी चौपाई को दो बार पढ़िये, क्योंकि इसमें जीत की बात नहीं है। इसमें शत्रु के न रह जाने की बात है। यह नहीं कहा गया कि ऐसा रथ जिसके पास हो वह हर शत्रु को जीत लेगा। कहा यह गया है कि उसके लिये जीतने लायक़ कोई शत्रु बचता ही नहीं। जो लड़ाई जीती जाती है वह फिर भी लड़ाई रहती है। यहाँ लड़ाई का दर्जा ही गिर जाता है। और यही वह उत्तर है जो विभीषण के प्रश्न से बड़ा है, क्योंकि उन्होंने पूछा था कि वह बलवान वीर कैसे जीता जायगा, और उत्तर में उस वीर का नाम तक नहीं लिया गया।
सार: शौर्य और धैर्य पहिये, सत्य और शील ध्वजा-पताका, बल-विवेक-दम-परहित चार घोड़े, क्षमा-दया-समता की डोरी, ईश-भजन सारथि, वैराग्य ढाल, सन्तोष तलवार, दान फरसा, बुद्धि शक्ति, विज्ञान धनुष, निर्मल मन तरकस, शम-यम-नियम बाण और द्विज-गुरु का पूजन अभेद्य कवच। जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ हो, उसके लिये जीतने को कोई शत्रु ही नहीं बचता।
जो शत्रु मैदान पर नहीं है
और अब दोहा आता है, और दोहा इस रथ को उस मैदान से उठाकर बहुत आगे ले जाता है। अब तक रूपक का पैमाना यही लग रहा था कि इससे रावण जीता जायगा। दोहा बताता है कि रावण तो इस रथ का सबसे छोटा काम है।
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
दोहा ८० (क)
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥ ८० (क)॥
हे धीरबुद्धि वाले सखा, सुनिये, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार जैसे महान और अजेय शत्रु को भी जीत सकता है। यहाँ जिस शत्रु का नाम लिया गया है वह लङ्का में नहीं बैठा है, वह जन्म और मृत्यु का पूरा चक्र है, और उसे महा अजय कहा गया है, यानी वह जिसे जीता ही नहीं जा सकता। पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा उलटफेर यही है। एक आदमी ने पूछा था कि सामने खड़ा बलवान कैसे हारेगा, और उत्तर में उसे वह शत्रु दिखा दिया गया जो सामने खड़ा ही नहीं है। इस पैमाने पर रखकर देखिये तो रथ, कवच और जूतों की कमी का सवाल अपने आप छोटा हो जाता है, बिना किसी को नीचा दिखाये।
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
दोहा ८० (ख)
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥ ८० (ख)॥
प्रभु के वचन सुनकर विभीषण हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लेते हैं, और जो कहते हैं वह इस पन्ने का सबसे सुन्दर वाक्य है। हे कृपा और सुख के पुंज, आपने इसी बहाने मुझे उपदेश दे दिया। एहि मिस, यानी इसी बहाने। उन्होंने युद्ध की चिन्ता में एक सवाल पूछा था और उन्हें जीवन भर का पाठ मिल गया, और वे यह पहचान भी लेते हैं कि उन्हें क्या मिला है। यह पहचान लेना उतना ही बड़ा है जितना उत्तर का मिलना, क्योंकि उपदेश वहीं पहुँचता है जहाँ लेने वाला उसे उपदेश मानकर लेता है।
और अब इस पन्ने की पहली चौपाई पर लौटिये, क्योंकि यहाँ आकर वह गोल घूमकर पूरी हो जाती है। पन्ना इस बात से शुरू हुआ था कि उपदेश देने में निपुण बहुत हैं और उस पर चलने वाले घने नहीं। पन्ने की शुरुआत में उपदेश वह आदमी दे रहा था जो अपनी ही कही हुई बात पर एक क़दम नहीं चला। पन्ने के बीचोंबीच उपदेश वह दे रहे हैं जो बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के उसी मैदान में खड़े हैं जिसकी बात हो रही है। दोनों उपदेश शुभ हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि दूसरा उपदेश उस देह से निकल रहा है जो उसे उसी समय बरत रहा है। तुलसी ने यह बात कहीं समझायी नहीं। उन्होंने दो उपदेश एक ही पन्ने पर रख दिये और गिनती पढ़ने वाले पर छोड़ दी।
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।
दोहा ८० (ग)
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥ ८० (ग)॥
और तीसरा दोहा हमें एक झटके में वापस मैदान पर पटक देता है। उधर से दशकन्धर ललकार रहा है, इधर से अंगद और हनुमान। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामी की दुहाई देकर लड़ रहे हैं। बातचीत जितनी देर चली, लड़ाई उतनी देर चलती रही। तुलसी ने उसे रोका नहीं था, उन्होंने सिर्फ़ कैमरा घुमा लिया था। और लौटते ही जो शब्द सुनायी देता है वह फिर वही है, दुहाई, यानी किसी और का नाम लेकर लड़ना। इस पूरे पन्ने पर कोई अपने भरोसे नहीं लड़ रहा। दोनों तरफ़ लोग किसी और के नाम पर मर रहे हैं, और फ़र्क़ सिर्फ़ नाम का है।
सार: दोहा अस्सी के पहले भाग में बताया जाता है कि ऐसे दृढ़ रथ वाला वीर संसार जैसे महा अजेय शत्रु को भी जीत लेता है। विभीषण चरणकमल पकड़कर कहते हैं कि इसी बहाने उन्हें उपदेश मिल गया, और तीसरा भाग दृश्य लौटा देता है, जहाँ उधर रावण और इधर अंगद-हनुमान ललकार रहे हैं।
आकाश से, और ज़मीन पर
लौटी हुई लड़ाई का पहला दृश्य नीचे का नहीं, ऊपर का है। ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़कर आकाश से यह रण देख रहे हैं। और फिर वह पंक्ति आती है जो इस पूरे ग्रन्थ की बनावट खोल देती है। शिवजी उमा से कहते हैं कि वे स्वयं भी उसी समाज में थे और श्रीराम की रण-रंग वाली लीला देख रहे थे। जो कथा हम पढ़ रहे हैं, वह किसी दूर बैठे इतिहासकार की लिखी हुई नहीं है। उसे सुनाने वाला वहीं भीड़ में खड़ा था, और वह यह बात बीच लड़ाई में, बिना किसी भूमिका के, कह देता है।
और उसके बाद ज़मीन। दोनों ओर के योद्धा रण-रस में मतवाले हो रहे हैं, और तुलसी इस मतवालेपन में कोई भेद नहीं करते। नशा दोनों तरफ़ एक जैसा है। भेद अगली ही पंक्ति में आता है और वह बहुत सीधा है। वानर जयशील हैं, यानी जीत रहे हैं, और उसका कारण यह बताया गया है कि उन्हें श्रीराम का बल है। कुछ ही चौपाइयों पहले राक्षस वीर अपना-अपना बल बखान रहे थे। यहाँ जिनका बल गिना जा रहा है, वे उसे अपना कह ही नहीं रहे। यही वह हिसाब है जो इस पूरे पन्ने पर चुपचाप चल रहा है, और तुलसी उसे कभी ऊँची आवाज़ में नहीं बोलते।
इसके आगे का ब्योरा निर्मम है और उसे नरम करके नहीं लिखा गया। वे एक-दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक-दूसरे को मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं। मारते हैं, काटते हैं, पकड़ते हैं, पछाड़ते हैं, और सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं, और योद्धाओं को पैर पकड़कर ज़मीन पर पटक देते हैं। भालू राक्षस योद्धाओं को पृथ्वी में गाड़ देते हैं और ऊपर से बहुत-सी बालू डाल देते हैं। इस आख़िरी ब्योरे में एक ठंडापन है जो बाक़ी सबसे ज़्यादा डराता है, क्योंकि उसमें जल्दी नहीं है। मारना एक बात है। गाड़कर ऊपर से रेत डालना उसके बाद का काम है, और उसे करने के लिये रुकना पड़ता है।
युद्ध में शत्रुओं के सामने खड़े वे वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों। और उसी शब्द को पकड़कर तुलसी फिर छन्द पर उतर आते हैं, क्योंकि अब चौपाई की चाल इस दृश्य को ढो नहीं सकती।
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं।
छन्द
मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥
मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।
चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥॥ २॥
क्रोधित काल के समान वे वानर शरीरों से बहते हुए ख़ून में शोभा पा रहे हैं। वे बलवान वीर राक्षस सेना के योद्धाओं को मसलते हैं और मेघ की तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं, और लातों से पीस डालते हैं। वानर-भालू चिग्घाड़ते हैं और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँ। इस छन्द की क्रियाएँ गिनने लायक़ हैं, क्योंकि उनमें एक भी हथियार का नाम नहीं है। चपेट, दाँत और लात, बस इतना ही है। जिस सेना के सामने रथ, फरसे, त्रिशूल और कवच खड़े थे, उसके पास हाथ, मुँह और पाँव के सिवा कुछ नहीं है।
और इसी छन्द का दूसरा हिस्सा उसी दृश्य को एक क़दम और आगे ले जाता है। वानर राक्षसों के गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर देते हैं, और वे ऐसे दिखायी देते हैं मानो प्रह्लाद के स्वामी अनेकों शरीर धारण करके युद्ध के आँगन में खेल रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो, ये घोर शब्द आकाश और पृथ्वी में भर गये हैं। और उस हिस्से की अन्तिम पंक्ति उन्हीं श्रीराम की जय बोलती है जो तिनके को वज्र कर देते हैं और वज्र को तिनका। यह इस पन्ने का आख़िरी वाक्य है और वही इसका पूरा गणित है। जिनके पास कुछ नहीं था वे ऊपर आ रहे हैं, और जिनके पास सब कुछ था उनके हथियार सुबह ही हाथ से गिर चुके थे।
सार: देवता और मुनि विमानों पर चढ़कर युद्ध देख रहे हैं और शिव उमा से कहते हैं कि वे स्वयं भी वहीं थे। दोनों ओर के योद्धा रण-रस में मतवाले हैं, पर वानर जयशील हैं क्योंकि उन्हें श्रीराम का बल है, और छन्द में वे बिना किसी हथियार के, केवल चपेट, दाँत और लात से राक्षस सेना को मसल रहे हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो रथ हैं और उन्हीं दो पर सब कुछ टिका है। पहला रथ पवन के समान वेग वाला है, उसे सजाया जाता है, उस पर चढ़ा जाता है, और उसके चलते ही हथियार हाथों से गिरने लगते हैं, योद्धा उसी जैसे रथों से गिर पड़ते हैं और घोड़े साथ छोड़ देते हैं। दूसरा रथ बनाया नहीं जाता, गिनाया जाता है, और उसका एक भी पुर्ज़ा बाज़ार से नहीं आता। पहला रथ अपने मालिक को ढोता है। दूसरा रथ अपने मालिक से बनता है। और जो आदमी पहले रथ पर सवार होकर निकला है, उसे इस दूसरे रथ की पूरी जानकारी है, क्योंकि इसी पन्ने की पहली पंक्ति में वह दूसरों को यही ज्ञान समझा रहा था।
दूसरी बात गिनती की है। इस पन्ने पर गिनने की क्रिया दो बार आती है और दोनों बार वही आदमी उसमें चूकता है। पहली बार अपशकुन असंख्य होते हैं और वह उन्हें गिनता नहीं, क्योंकि भुजाओं का गर्व भीतर बैठा है। दूसरी बार वह गिनता है और ग़लत गिनता है, जब वह अपनी सेना को रीछ-वानरों के लिये और अपने को दो भाइयों के लिये बाँट देता है। जिस चीज़ को गिनना था वह छोड़ दी गयी और जिसे गिना गया उसका पैमाना ही ग़लत था। दोहा अठहत्तर इसी पर हाथ रख देता है कि ऐसे आदमी को शुभ शकुन सपने में भी नहीं मिलता, और शकुन न मिलने का कारण भाग्य नहीं, बनावट बताया जाता है।
और तीसरी बात नामों की है, जो इस पूरे पन्ने पर बिना रुके चलती रहती है। राक्षस वीर सिंहनाद करके अपना-अपना बल और पौरुष बखानते हुए निकलते हैं। वानर दुहाई देते हुए दौड़ते हैं और दौड़ते-दौड़ते किसी और का यश गाते हैं। भिड़न्त के ठीक पहले दोनों ओर से जो बोला जाता है वह अपना नाम नहीं, अपने स्वामी का नाम है। और जिस रथ पर यह पन्ना जाकर ठहरता है, उसका सारथि भी अपनी चतुराई नहीं, ईश्वर का भजन बताया गया है। सारथि वही होता है जो दिशा तय करता है, और यह पूरा प्रसंग बिना एक बार भी समझाये यही दिखाता चला जाता है कि दिशा किसके हाथ में रहे तो रथ कहाँ पहुँचता है।
इस प्रसंग को पढ़कर सबसे पहले तुलसी का नाप खटकता है, और वह खटकना अच्छा है। एक पूरी चतुरंगिणी सेना का निकलना, हाथी, रथ, ध्वजाएँ, धूल से सूरज का ढक जाना और प्रलय जैसे नगाड़े, यह सब मिलाकर कुछ चौपाइयों में निपट जाता है। दोनों सेनाओं का भिड़ना एक दोहे में आ जाता है। और जिस बातचीत में कोई हथियार नहीं उठता, कोई चोट नहीं लगती और मैदान पर एक क़दम भी नहीं बढ़ता, उसे पाँच चौपाइयाँ और एक पूरा दोहा मिलता है, और वही हिस्सा इस काण्ड से निकलकर लोगों की ज़बान पर चढ़ गया। जिस चीज़ पर तुलसी सबसे ज़्यादा समय लगाते हैं, वह प्रायः वह चीज़ नहीं होती जिससे कहानी आगे बढ़ती है। वह वह चीज़ होती है जिसके लिये कहानी लिखी गयी थी।
और जो चित्र अन्त में बचता है वह दो आदमियों का है, जो एक ही मैदान के दो किनारों पर खड़े हैं। एक के पास रथ है, कवच है, फरसे और त्रिशूल हैं, और उसके चारों ओर उसकी अपार सेना है जिसके हथियार उसी के सामने हाथों से फिसल रहे हैं। दूसरे के पास न रथ है, न कवच, न पाँव में जूते, और उससे यह पूछा भी जा चुका है कि इतने में जीता कैसे जायगा। वे उत्तर में कोई अस्त्र नहीं दिखाते, कोई चमत्कार नहीं करते। वे सिर्फ़ एक रथ का ब्योरा देते हैं, पुर्ज़ा-पुर्ज़ा, ठहरकर, जैसे किसी को गाड़ी दिखायी जा रही हो। और फिर सखा कहकर बात ख़त्म कर देते हैं। लङ्काकाण्ड का यह हिस्सा इतना ही कहता है कि जीत का सामान बाहर नहीं गिना जाता, और जिसके पास वह सामान भीतर हो, उसके सामने जीतने लायक़ कुछ बचता ही नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ७८ से ८०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।