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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 11
रावण का रण-प्रस्थान और धर्म का रथ
एक सुबह लङ्कापति स्वयं रथ सजाकर निकलता है। उसी सुबह विभीषण यह पूछ बैठते हैं कि बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के वह बलवान वीर जीता कैसे जायगा। उत्तर में रामचरितमानस का सबसे प्रसिद्ध रथ खड़ा हो जाता है।
कथा बीच से खुलती है। पहला ही शब्द है उन्हें, और वे कौन हैं यह इस प्रसंग में कहीं नहीं लिखा। जिन्हें समझाया जा रहा है, वे पिछले प्रसंग में खड़े हैं। यहाँ उस समझाइश का आख़िरी टुकड़ा बचा है, और उस पर कवि की एक टिप्पणी, जो इतनी सीधी है कि रामचरितमानस से निकलकर बोलचाल में जा बसी। उसके तुरन्त बाद रात कट जाती है, पौ फटती है, और यह काण्ड उस सुबह पर आ जाता है जिसकी ओर वह देर से बढ़ रहा था।
इस प्रसंग में युद्ध जल्दी शुरू नहीं होता। रावण रथ सजाता है, बाजे बजते हैं, सेना निकलती है, धूल से सूरज ढक जाता है, और इतने सब में पहली चोट कहीं नहीं पड़ती। जो आता है वह अपशकुनों की एक पूरी झड़ी है, और उसके बाद एक प्रश्न जो युद्ध की बात ही नहीं करता। फिर सेना चलती है, दोनों ओर की जोड़ियाँ भिड़ती हैं, और ठीक उसी क्षण कथा रुक जाती है। एक आदमी एक प्रश्न पूछता है, और उत्तर में जो खड़ा होता है वह पहियों और घोड़ों वाला रथ है, पर उसका एक भी पुर्ज़ा लोहे का नहीं है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यह प्रसंग उस फ़र्क़ को छिपाता नहीं। जिस धर्ममय रथ पर यह कथा जाकर ठहरती है, वह मानस का अपना है, और उसका पूरा ब्योरा उसी की गिनायी हुई तरतीब में आता है।
मैदान के दो किनारे
- रावण जो प्रसंग के पहले ही शब्द में दूसरों को ज्ञान समझा रहा है और थोड़ी ही देर में रथ सजाकर निकल चुका है।
- राम जो इस पूरे युद्ध-प्रस्थान के बीच बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के खड़े हैं। वे एक प्रश्न के उत्तर में रथ की परिभाषा ही बदल देते हैं।
- विभीषण जो अब राम के पक्ष में हैं, और जिनका प्रेम अधिक होने से उनके मन में वह सन्देह उठता है जिससे यह पूरा उपदेश निकलता है।
- अंगद और हनुमान जिनका नाम अन्त में उस ओर से आता है जिस ओर से रावण की ललकार का उत्तर दिया जा रहा है।
- शिव और पार्वती जिनकी आपसी बातचीत इस कथा को ढोकर लाती है। शिव यहाँ बता देते हैं कि वे स्वयं आकाश में उस भीड़ के साथ खड़े थे।
- रीछ और वानर जो सुबह होते ही चारों दरवाज़ों पर जा लगते हैं और जिनका एकमात्र हथियार नख, दाँत, पहाड़, पेड़ और एक नाम है।
उपदेश देना आसान है
पाठ यहाँ इतना ही दर्ज करता है कि रावण ने उन्हें ज्ञान का उपदेश दिया। जिसका चरित यह काण्ड अब तक खोलकर दिखा चुका है, उसके मुँह से ज्ञान की बात निकलना ठिठका देता है। भीतर सवाल उठता है कि क्या ऐसी बात ऐसे मुँह से निकलकर भी बात रहती है। कवि उस सवाल को लटकाये नहीं रखते। उसी साँस में वे उसका हिसाब चुका देते हैं, और वह हिसाब दो तरफ़ काटता है।
पहला वार बचाव की तरफ़ है: वह स्वयं नीच है, पर उसकी कही हुई बात शुभ और पवित्र है। कही हुई बात का मोल कहने वाले के आचरण से घट नहीं जाता। बात और बोलने वाला दो अलग चीज़ें हैं, और दोनों अलग-अलग तौली जाती हैं। इसीलिये आगे जो भी कहा जायगा, वह कहने वाले की साख पर नहीं, अपनी सच्चाई पर टिकेगा।
दूसरा वार उसके तुरन्त बाद है, और वही बात घर-घर तक पहुँची। दूसरों को उपदेश देने में निपुण बहुत हैं। जो उस उपदेश के अनुसार आचरण भी करते हों, वैसे लोग इतने नहीं हैं कि उनकी भीड़ बन सके। कवि यह नहीं कहते कि ऐसे लोग हैं ही नहीं। वे सिर्फ़ गिनती बताते हैं।
यह टिप्पणी वहाँ नहीं रखी गयी जहाँ कोई साधु सभा में उपदेश दे रहा हो। वह उस सुबह के मुहाने पर है जिस दिन यही उपदेश देने वाला रथ सजाकर निकलेगा। जो बात वह कह रहा था, वह उसे उतनी ही अच्छी तरह मालूम है जितनी किसी और को। कमी जानने में नहीं, उस जगह है जहाँ जानना पाँव तक उतरता है। आगे इसी प्रसंग में एक ऐसा रथ बनने वाला है जिसका हर पुर्ज़ा एक गुण है, और जिसे जान लेना काफ़ी नहीं, जिस पर चढ़ना पड़ता है।
रात बीत गयी, और चारों दरवाज़े भर गये
अगले ही पल रात कट जाती है: रात बीत गयी और पौ फट गयी। उजाले में पहला दृश्य लङ्का के बाहर का है। रीछ और वानर चारों दरवाज़ों पर जा लगे हैं, यानी नगर के चारों निकास एक साथ बन्द हैं। रावण अपने उत्तम योद्धाओं को बुलाता है।
उसका भाषण आदेश से नहीं, एक शर्त से शुरू होता है। रावण कहता है, “लड़ाई में शत्रु के सामने जिसका मन डाँवाडोल हो, वह अभी भाग जाय, यही अच्छा है। रण में जाकर मुँह मोड़ने में भलाई नहीं है।” वह अपने सैनिकों से साहस नहीं, साफ़ होने की माँग कर रहा है। यह एक सेनापति की बात है और इसमें कोई मूर्खता नहीं। रावण के सारे वाक्य मूर्खता के नहीं हैं। जो चीज़ टेढ़ी है, वह उसकी अक्ल नहीं, उसकी नाप है।
भाषण का दूसरा आधा उस नाप को खोल देता है। रावण कहता है, “मैंने अपनी भुजाओं के बल पर वैर बढ़ाया है, इसलिये जो शत्रु चढ़ आया है, उसका उत्तर मैं दूँगा।” पहली बात पूरी तरह सच है: यह वैर इसी ने, इसी के बाहुबल के भरोसे बढ़ाया। दूसरी बात में चूक है, इतनी महीन कि सुनने में वीरता लगती है। जिस बल के भरोसे वैर बढ़ाया गया था, उसी को उत्तर देने के लिये काफ़ी मान लिया गया है।
ऐसा कहकर उसने पवन के समान वेग वाला रथ सजाया, और सारे जुझाऊ बाजे बज उठे। सब अतुलनीय बल वाले वीर चल पड़े, मानो काजल की आँधी चली हो। रंग काला है, चाल आँधी की है, और काजल हवा में उड़कर सबसे पहले आँखों में पड़ता है। यह सेना देखने वालों की आँख पहले भरेगी, फिर उनका रास्ता रोकेगी।
ठीक उसी क्षण एक छोटी-सी बात सब कुछ पलट देती है। उस समय असंख्य अपशकुन होने लगे, पर वह उन्हें गिनता नहीं, क्योंकि भुजाओं के बल का बड़ा गर्व उसके भीतर बैठा है। इस बात की धुरी है: गिनता नहीं। अपशकुन हो रहे हैं, दिख भी रहे हैं। जो नहीं हो रहा, वह गिनती है। आँकड़ा मौजूद है, और वह उसे जोड़ने से इनकार कर रहा है।
जो शकुन गिने नहीं गये
अब कथा की चाल बदलती है, और चीज़ें एक के पीछे एक बिना रुके आती हैं। पर यहाँ जो आ रहा है वह लड़ाई नहीं है। अभी एक भी वार नहीं हुआ, एक भी बाण नहीं छूटा, और जो कुछ गिनाया जा रहा है, सब अपशकुन है। इस युद्ध का नतीजा उसके शुरू होने से पहले दर्ज किया जा रहा है।
अत्यन्त गर्व के कारण वह शकुन और अपशकुन का विचार ही नहीं करता, और उधर सूची चलती जाती है। हथियार हाथों से गिर रहे हैं। योद्धा रथों से गिर पड़ते हैं। घोड़े और हाथी साथ छोड़कर, चिग्घाड़ते हुए, भाग जा रहे हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं, और बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। सबसे अन्त में उल्लू हैं, जो ऐसे परम भयानक वचन बोल रहे हैं मानो काल के दूत हों और मृत्यु का सँदेशा सुना रहे हों।
इनमें से कोई चीज़ शत्रु ने नहीं भेजी है। हथियार अपने हैं और अपने हाथ से गिर रहे हैं। योद्धा अपने हैं और अपने रथ से गिर रहे हैं। घोड़े और हाथी अपने हैं और अपना साथ छोड़ रहे हैं। जो सेना बाहर से काजल की आँधी है, वह भीतर से बिखर रही है, और लङ्का के दरवाज़े पर अभी कोई पहुँचा भी नहीं।
इसके बाद इस कूच का पहला बड़ा ठहराव आता है। उसमें न कोई सेना है, न कोई नगर, न कोई हथियार। सिर्फ़ एक आदमी की चार पहचानें हैं और एक प्रश्न है।
जो जीवों के द्रोह में रत है, जो मोह के वश में है, जो राम से विमुख है, और जिसकी रति काम में है। उसे क्या कभी सपने में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और मन का विश्राम मिल सकता है? यह अभिशाप नहीं, प्रश्न है, और इसका उत्तर सुनने वाले के मन में अपने आप बन जाता है। सम्पत्ति बाहर की चीज़ है, शुभ शकुन बीच की, और मन का विश्राम भीतर की। बाहर से भीतर तक, तीनों जगह एक ही उत्तर है।
यह प्रश्न पहले की पहेली भी सुलझा देता है। अपशकुन हो रहे थे और वह उन्हें गिन नहीं रहा था। उत्तर यह है कि गिनने को था ही क्या। जिसकी बनावट ऐसी है, उसके लिये शुभ शकुन सपने में भी नहीं आता। अपशकुन कोई बाहरी सूचना नहीं थे। वे उसी बनावट की छाया थे।
चतुरंगिणी
प्रश्न ख़त्म होते ही दृश्य लौट आता है, और अब सेना सचमुच निकल पड़ती है। इस कूच की सूची भरी हुई है। उसे भरा हुआ दिखाना ही इसका काम है, क्योंकि आगे इसी भरेपन के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा किया जायगा जिसके पास कुछ भी नहीं है।
राक्षसों की अपार सेना चली। चतुरंगिणी सेना की बहुत-सी धाराएँ, यानी टुकड़ियाँ, हैं, और उनमें अनेकों प्रकार के वाहन, रथ और सवारियाँ हैं, बहुत-से रंगों की पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं। मतवाले हाथियों के झुंड ऐसे चले मानो पवन से प्रेरित होकर वर्षा के बादल चल रहे हों। रंग-बिरंगे बाने पहने वीरों के समूह हैं, जो युद्ध में शूर हैं और बहुत प्रकार की माया जानते हैं। माया यहाँ हथियारों की सूची में नहीं, योद्धाओं के परिचय में गिनी गयी है। वह उनके हाथ में पकड़ी हुई चीज़ नहीं, उनके होने का ढंग है।
अत्यन्त विचित्र वह फ़ौज ऐसी शोभा पा रही है मानो वीर वसन्त ने अपनी सेना सजायी हो। वसन्त का नाम रंगों के कारण आया है। पर उसके चलने से जो होता है वह कोमल बिलकुल नहीं: दिशाओं के हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे। जिन तीन चीज़ों को हिलना नहीं चाहिये, वे तीनों सिर्फ़ सेना के चलने से हिल रही हैं।
इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। फिर पवन थम गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े ऐसी घोर ध्वनि से बज रहे हैं जैसे प्रलय के बादल गरज रहे हों। भेरी, नफ़ीरी और शहनाई में मारू राग बज रहा है, जो योद्धाओं को सुख देता है। और इन सबके ऊपर एक और आवाज़ है: सब वीर सिंह की तरह नाद करते हैं और अपने-अपने बल और पौरुष का बखान करते हैं। बल अपना है, और उसका बखान भी अपना ही मुँह कर रहा है। यह ब्योरा आगे काम आयेगा।
अब रावण काम बाँटता है, और यह बँटवारा उसके पूरे चरित का नक़्शा है। वह कहता है, “हे उत्तम योद्धाओ, सुनिये, रीछ-वानरों के ठट्ट को मसल डालिये। और मैं दोनों राजकुमार भाइयों को मारूँगा।” लाखों की सेना एक तरफ़ और दो आदमी दूसरी तरफ़, और दूसरी तरफ़ के लिये वह अकेला। यह दंभ है, पर वह कठिन काम अपने लिये रख रहा है। ऐसा कहकर उसने सेना आगे बढ़ायी। इतनी बड़ी फ़ौज चलती नहीं, रेंगती है, जैसे कोई एक ही देह हो।
उधर यह ख़बर वानरों तक पहुँचती है, और वे राम की दुहाई देते हुए दौड़ते हैं। दोनों पक्षों के निकलने में यही फ़र्क़ है। एक तरफ़ हर योद्धा अपना बल बोलकर चला है। दूसरी तरफ़ कोई अपना नाम नहीं ले रहा, सब एक ही नाम की दुहाई दे रहे हैं। दुहाई आदमी तब देता है जब वह अपने बूते से बाहर की लड़ाई में उतर रहा हो। इसीलिये यह पूरी सेना एक शब्द से चलती है, बिना यह पूछे कि उसका अपना नाप कितना है।
वे विशाल और काल के समान कराल वानर-भालू दौड़े, मानो पंखवाले पर्वतों के समूह उड़ रहे हों, और वे अनेक रंगों के हैं। नख, दाँत, पहाड़ और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बलवान हैं और किसी की शङ्का नहीं मानते। अन्त में वे रावण रूपी मतवाले हाथी के लिये सिंह बने राम की जय बोलकर उनके सुन्दर यश का बखान करते हैं। दौड़ते हुए वे गा रहे हैं, और जो गा रहे हैं वह अपनी बहादुरी नहीं है।
दोनों चित्र आमने-सामने हैं। एक में लोहा है, रथ हैं, हाथी हैं, ध्वजाएँ हैं, और उनके भीतर हथियार हाथ से गिर रहे हैं। दूसरे में हथियार के नाम पर नख और दाँत हैं, ढोने के नाम पर अपनी ही टाँगें हैं, और उनके भीतर कोई दरार नहीं है। दोनों एक ही चाल में कहे गये हैं, इसलिये उनका अन्तर सुनायी दे जाता है। फिर कथा दोनों को एक जगह ले आती है।
दोनों ओर के योद्धा जय-जयकार करके, अपनी-अपनी जोड़ी पहचानकर, इधर राम का और उधर रावण का बखान करते हुए भिड़ गये। भिड़न्त अन्धाधुन्ध नहीं है। हर योद्धा अपने जोड़ का योद्धा पहचानकर उससे भिड़ रहा है, और यह तरतीब किसी सेनापति ने नहीं, लड़ने वालों ने आपस में पहचानकर बना ली है। और भिड़ने से ठीक पहले दोनों ओर से जो बोला जा रहा है, वह अपना नहीं, अपने स्वामी का नाम है।
बिना रथ के
और अब कथा मैदान से आँख हटा लेती है। भिड़न्त शुरू हो चुकी है, धूल उठी हुई है, दोनों ओर से नाम बोले जा रहे हैं। उसी शोर के बीच एक आदमी की निगाह दो चीज़ों पर पड़ती है और वहीं अटक जाती है। रावण रथ पर है। राम बिना रथ के हैं। इन दो टुकड़ों को एक साथ रखते ही वह सवाल खड़ा हो जाता है जिसका उत्तर आगे आता है।
देखकर विभीषण अधीर हो गये, और पाठ इसका कारण बताता है: प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया। सन्देह का कारण सन्देह नहीं, प्रेम है। जिसे किसी की चिन्ता नहीं, उसे डर भी नहीं लगता। डर वहीं उगता है जहाँ कुछ खोने को हो। विभीषण अपनी जान के लिये नहीं, दूसरे की जीत के लिये डर रहे हैं।
वे चरणों की वन्दना करके, स्नेह सहित, कहने लगते हैं। पहले प्रणाम, फिर प्रश्न। सन्देह छिपाया नहीं जाता, और विद्रोह भी नहीं बनाया जाता। वह उसी समय, बिना लाग-लपेट के सामने रख दिया जाता है। पूरे कूच और भिड़न्त में यही अकेला क्षण है जब कोई राम से उनकी तैयारी के बारे में सवाल करता है। सवाल करने वाला उन्हीं के पक्ष में खड़ा है।
विभीषण पूछते हैं, “हे नाथ, न रथ है, न देह की रक्षा करने वाला कवच है, और न पाँव में जूते ही हैं। वह बलवान वीर किस विधि से जीता जायगा?” रथ चढ़ने के लिये है, कवच बचने के लिये, और जूते ज़मीन पर पाँव टिकाने के लिये। यह दार्शनिक प्रश्न नहीं, वही प्रश्न है जो कोई भी समझदार आदमी मैदान के किनारे खड़ा होकर पूछेगा। और विभीषण रावण को बलवान वीर कह रहे हैं। शत्रु की ताक़त को वे रत्ती भर छोटा नहीं कर रहे। उनका डर इसलिये सच्चा है कि उनकी नाप सच्ची है।
उत्तर का पहला शब्द ही पूरा मिज़ाज तय कर देता है: सुनिये सखा। न डाँट, न आश्वासन, न किसी चमत्कार का वादा। पहले सम्बोधन, और सम्बोधन में मित्रता। राम कहते हैं, “जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है।” प्रश्न स्वीकार भी कर लिया गया और उलट भी दिया गया। रथ चाहिये, यह मान लिया गया, पर जिस रथ से जीत होती है वह वह नहीं है जिसकी ओर विभीषण इशारा कर रहे हैं।
धर्ममय रथ
अब जो आता है, वह रूपक की कसरत नहीं है। इसमें एक-एक पुर्ज़ा उसी जगह बैठाया गया है जहाँ असली रथ में वह होता है, और हर बार पुर्ज़े का काम और गुण का काम एक हो जाते हैं। उत्तर इसी में रखा है कि वह चीज़ रथ में करती क्या है।
राम बताते हैं कि शौर्य और धैर्य उस रथ के दो पहिये हैं। पहिये जोड़ी में ही चलते हैं। एक अकेला रह जाय तो रथ चलता नहीं, घूमता रह जाता है। शौर्य आगे बढ़ाता है और धैर्य टिकाये रखता है। सत्य और शील उसकी मज़बूत ध्वजा और पताका हैं। ध्वजा सबसे दूर से दिखती है, इसलिये इस रथ की पहचान सत्य और सदाचार है। बल, विवेक, दम और परहित, ये चार उसके घोड़े हैं, और वे क्षमा, दया और समता की डोरी से रथ में जुते हैं। शक्ति, बुद्धि, संयम और दूसरे का हित करने की चाह, ये चारों तभी एक दिशा में दौड़ते हैं जब क्षमा और समता की डोरी उन्हें बाँधे हो। डोरी खुल जाय, तो चारों अलग-अलग भाग जायँ और रथ वहीं खड़ा रह जाय।
ईश्वर का भजन ही चतुर सारथि है, और सारथि वह है जो तय करता है कि रथ जायगा किधर। पहिये कितने भी अच्छे हों और घोड़े कितने भी तेज़, दिशा सारथि के हाथ में है। वैराग्य ढाल है, जो वार को छू जाने देती है पर भीतर तक नहीं पहुँचने देती। सन्तोष तलवार है। जितनी चोटें आदमी खाता है, उनमें से अधिकतर उसे उसके अपने असन्तोष ने पहुँचायी हैं। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, और श्रेष्ठ विज्ञान वह कठिन धनुष है जिसे हर कोई चढ़ा नहीं सकता।
निर्मल और अचल मन तरकस के समान है। तरकस हिले नहीं और भीतर से साफ़ हो, वरना बाण निकलते समय अटक जाते हैं। और बाण हैं शम, यम और नियम, बहुत-से। पहिये दो हैं, घोड़े चार, ध्वजा एक, तलवार एक, पर बाण अनेक, क्योंकि संयम एक बार का काम नहीं, रोज़ चलाया जाने वाला हथियार है। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है, ठीक उसी चीज़ का उत्तर जिसकी कमी विभीषण ने गिनायी थी। और फिर पूरे रूपक पर मुहर: इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है।
राम कहते हैं, “हे सखा, ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो, उसके लिये जीतने को कहीं कोई शत्रु ही नहीं है।” इसमें जीत की बात नहीं, शत्रु के न रह जाने की बात है। यह नहीं कहा गया कि ऐसे रथ वाला हर शत्रु को जीत लेगा। कहा यह गया है कि उसके लिये जीतने लायक़ कोई शत्रु बचता ही नहीं। विभीषण ने पूछा था कि वह बलवान वीर कैसे जीता जायगा, और उत्तर में उस वीर का नाम तक नहीं लिया गया।
जो शत्रु मैदान पर नहीं है
अब राम इस रथ को उस मैदान से उठाकर बहुत आगे ले जाते हैं। अब तक लग रहा था कि इससे रावण जीता जायगा। अब पता चलता है कि रावण तो इस रथ का सबसे छोटा काम है।
राम कहते हैं, “हे धीरबुद्धि वाले सखा, सुनिये, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार जैसे महान और अजेय शत्रु को भी जीत सकता है।” यह शत्रु लङ्का में नहीं बैठा है। वह जन्म और मृत्यु का पूरा चक्र है, और राम उसे महान और अजेय कहते हैं। एक आदमी ने पूछा था कि सामने खड़ा बलवान कैसे हारेगा, और उत्तर में उसे वह शत्रु दिखा दिया गया जो सामने खड़ा ही नहीं है। इस पैमाने पर रथ, कवच और जूतों की कमी का सवाल अपने आप छोटा हो जाता है, बिना किसी को नीचा दिखाये।
राम के वचन सुनकर विभीषण हर्षित होकर उनके चरण पकड़ लेते हैं और कहते हैं, “आपने इसी बहाने मुझे उपदेश दे दिया।” उन्होंने युद्ध की चिन्ता में एक सवाल पूछा था और उन्हें जीवन भर का पाठ मिल गया, और वे पहचान भी लेते हैं कि उन्हें क्या मिला है। उपदेश वहीं पहुँचता है जहाँ लेने वाला उसे उपदेश मानकर लेता है।
यहाँ आकर प्रसंग की पहली बात गोल घूमकर पूरी हो जाती है। कथा इस बात से शुरू हुई थी कि उपदेश देने में निपुण बहुत हैं और उस पर चलने वाले घने नहीं। शुरुआत में उपदेश वह दे रहा था जो अपनी ही कही बात पर एक क़दम नहीं चला। बीचोंबीच उपदेश वे दे रहे हैं जो बिना रथ, बिना कवच और बिना जूतों के उसी मैदान में खड़े हैं जिसकी बात हो रही है। दोनों उपदेश शुभ हैं। फ़र्क़ यह है कि दूसरा उपदेश उस देह से निकल रहा है जो उसे उसी समय बरत रहा है। कथा यह बात समझाती नहीं, दोनों उपदेश एक ही प्रसंग के भीतर पास-पास रख देती है।
फिर कथा एक झटके में वापस मैदान पर ले आती है। उधर से रावण ललकार रहा है, इधर से अंगद और हनुमान। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामी की दुहाई देकर लड़ रहे हैं। बातचीत जितनी देर चली, लड़ाई उतनी देर चलती रही। लौटते ही जो शब्द सुनायी देता है, वह फिर दुहाई है, यानी किसी और का नाम लेकर लड़ना। इस मैदान में कोई अपने भरोसे नहीं लड़ रहा। दोनों तरफ़ लोग किसी और के नाम पर मर रहे हैं, और फ़र्क़ सिर्फ़ नाम का है।
आकाश से, और ज़मीन पर
लौटी हुई लड़ाई का पहला दृश्य ऊपर का है। ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़कर आकाश से यह रण देख रहे हैं। फिर शिव पार्वती से कहते हैं, “मैं भी उस समाज में था और राम की रण-रंग वाली लीला देख रहा था।” कथा सुनाने वाला वहीं भीड़ में खड़ा था, और वह यह बात बीच लड़ाई में, बिना किसी भूमिका के, कह देता है।
फिर ज़मीन। दोनों ओर के योद्धा रण-रस में मतवाले हो रहे हैं। नशा दोनों तरफ़ एक जैसा है। भेद तुरन्त आता है: वानर जीत रहे हैं, क्योंकि उन्हें राम का बल है। कुछ ही देर पहले राक्षस वीर अपना-अपना बल बखान रहे थे। यहाँ जिनका बल गिना जा रहा है, वे उसे अपना कहते ही नहीं।
आगे का ब्योरा निर्मम है। वे एक-दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक-दूसरे को मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं। मारते हैं, काटते हैं, पकड़ते हैं, पछाड़ते हैं, और सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं, और योद्धाओं को पैर पकड़कर ज़मीन पर पटक देते हैं। भालू राक्षस योद्धाओं को पृथ्वी में गाड़ देते हैं और ऊपर से बहुत-सी बालू डाल देते हैं। इस आख़िरी ब्योरे में जल्दी नहीं है। गाड़कर ऊपर से रेत डालने के लिये रुकना पड़ता है।
युद्ध में शत्रुओं के सामने खड़े वे वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों। और उसी शब्द को पकड़कर कथा आगे बढ़ती है।
क्रोधित काल के समान वे वानर शरीरों से बहते ख़ून में शोभा पा रहे हैं। वे बलवान वीर राक्षस सेना के योद्धाओं को मसलते हैं और मेघ की तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं, और लातों से पीस डालते हैं। वानर-भालू चिग्घाड़ते हैं और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँ। इन क्रियाओं में एक भी हथियार का नाम नहीं है: चपेट, दाँत और लात, बस। जिस सेना के सामने रथ, फरसे, त्रिशूल और कवच खड़े थे, उसके पास हाथ, मुँह और पाँव के सिवा कुछ नहीं है।
फिर दृश्य एक क़दम आगे बढ़ता है। वानर राक्षसों के गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर देते हैं। वे ऐसे दिखते हैं मानो प्रह्लाद के स्वामी नृसिंह अनेकों शरीर धारण करके युद्ध के आँगन में खेल रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो, ये घोर शब्द आकाश और पृथ्वी में भर गये हैं। अन्त में जय उन राम की बोली जाती है जो तिनके को वज्र कर देते हैं और वज्र को तिनका। यही इस कथा का पूरा गणित है: जिनके पास कुछ नहीं था वे ऊपर आ रहे हैं। और जिनके पास सब कुछ था उनके हथियार सुबह ही हाथ से गिर चुके थे।
जीत का सामान
दो रथ हैं, और उन्हीं पर सब कुछ टिका है। पहला रथ पवन के समान वेग वाला है। उसे सजाया जाता है, उस पर चढ़ा जाता है। उसके चलते ही हथियार हाथों से गिरने लगते हैं, योद्धा रथों से गिर पड़ते हैं और घोड़े साथ छोड़ देते हैं। दूसरा रथ बनाया नहीं जाता, गिनाया जाता है, और उसका एक भी पुर्ज़ा बाज़ार से नहीं आता। पहला रथ अपने मालिक को ढोता है। दूसरा अपने मालिक से बनता है। और पहले रथ पर सवार होकर जो निकला है, उसे दूसरे रथ की पूरी जानकारी है, क्योंकि प्रसंग के आरम्भ में ही वह दूसरों को यही ज्ञान समझा रहा था।
दूसरी बात गिनती की है, और दोनों बार वही आदमी उसमें चूकता है। पहली बार अपशकुन असंख्य होते हैं और वह उन्हें गिनता नहीं, क्योंकि भुजाओं का गर्व भीतर बैठा है। दूसरी बार वह गिनता है और ग़लत गिनता है, जब अपनी सेना को रीछ-वानरों के लिये और अपने को दो भाइयों के लिये बाँट देता है। कवि का प्रश्न इसी पर हाथ रख देता है कि ऐसे आदमी को शुभ शकुन सपने में भी नहीं मिलता, और इसका कारण भाग्य नहीं, बनावट बताया जाता है।
तीसरी बात नामों की है। राक्षस वीर सिंहनाद करके अपना-अपना बल और पौरुष बखानते हुए निकलते हैं। वानर दुहाई देते हुए दौड़ते हैं और दौड़ते-दौड़ते किसी और का यश गाते हैं। भिड़न्त के ठीक पहले दोनों ओर से अपने स्वामी का नाम बोला जाता है। और धर्ममय रथ का सारथि भी अपनी चतुराई नहीं, ईश्वर का भजन बताया गया है। सारथि वही है जो दिशा तय करता है।
कथा का नाप भी कुछ कहता है। एक पूरी चतुरंगिणी सेना का निकलना, हाथी, रथ, ध्वजाएँ, धूल से सूरज का ढक जाना और प्रलय जैसे नगाड़े, यह सब कुछ थोड़े में निपट जाता है। दोनों सेनाओं का भिड़ना एक ही वाक्य में आ जाता है। और जिस बातचीत में न कोई हथियार उठता है, न कोई चोट लगती है, उसे सबसे अधिक जगह मिलती है। वही हिस्सा लोगों की ज़बान पर चढ़ गया।
अन्त में चित्र दो आदमियों का बचता है, जो एक ही मैदान के दो किनारों पर खड़े हैं। एक के पास रथ है, कवच है, फरसे और त्रिशूल हैं, और चारों ओर अपार सेना है जिसके हथियार उसी के सामने हाथों से फिसल रहे हैं। दूसरे के पास न रथ है, न कवच, न पाँव में जूते, और उनसे पूछा भी जा चुका है कि इतने में जीता कैसे जायगा। वे उत्तर में कोई अस्त्र या चमत्कार नहीं दिखाते। एक रथ का ब्योरा देते हैं, पुर्ज़ा-पुर्ज़ा, और सखा कहकर बात ख़त्म कर देते हैं। जीत का सामान बाहर नहीं गिना जाता, और जिसके पास वह भीतर हो, उसके सामने जीतने लायक़ कुछ बचता ही नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 78 से 80, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।