रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · रात की माया, माल्यवान् की सीख और शक्ति का लगना
रात की माया, माल्यवान् की सीख और शक्ति का लगना
साँझ ढलते ही राक्षस अँधेरा रच देते हैं, एक बूढ़ा मन्त्री लङ्कापति को तीसरी बार सच सुनाकर बाहर कर दिया जाता है, और अगले दिन रावण का बेटा वह चला देता है जिससे राम के छोटे भाई की देह ज़मीन पर आ जाती है।
पिछला प्रसंग दिन का था। मोर्चे बँधे थे, पहला दिन लड़ा जा चुका था, और अंगद तथा हनुमान शत्रु की पंक्तियों के भीतर तक घुसकर लौटे थे। यह पन्ना वहीं से उठता है, ठीक उस घड़ी में जब सूरज उतर रहा होता है। और यहीं से लड़ाई की क़िस्म बदल जाती है। दिन में जो चला था वह भुजाओं का था। रात में जो चलता है वह आँखों का है।
दोहा छियालीस से चौवन तक की यह कथा तीन बार अँधेरा करती है और तीन बार उजाला। पहली बार अँधेरा दो सेनापतियों की माया से होता है और एक बाण से कटता है। दूसरी बार लङ्का के भीतर एक बूढ़े मन्त्री की बात से उजाला होने को होता है और वह उजाला दरवाज़े से बाहर कर दिया जाता है। तीसरी बार धूल की वर्षा से ऐसा अँधेरा होता है कि आदमी अपना फैलाया हुआ हाथ न देख पाये, और वह भी एक ही बाण से कटता है। इन तीनों के बीच से होकर कथा उस जगह पहुँचती है जहाँ एक भाई की छाती में शक्ति लगती है और वह गिर पड़ता है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में मेघनाद है, दोनों में लक्ष्मण को शक्ति लगती है, पर माल्यवान् की यह पूरी सभा, रावण का उसे झिड़ककर निकालना, और उसी रात बेटे को गोद में बैठा लेना, इस पन्ने पर जिस क्रम में आते हैं वह तुलसी का अपना क्रम है। यहाँ जो कुछ कहा गया है, वह इसी अवधी पाठ की चौपाइयों और दोहों से लिया गया है और कहीं से नहीं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम जो इस पूरे पन्ने पर तीन बार हथियार उठाते हैं और तीनों बार वह काटने के लिये उठाते हैं जो शत्रु ने आँखों पर डाला था, न कि शत्रु को।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो क्रोध में भरे होने पर भी बाहर निकलने से पहले आज्ञा माँगते हैं, और जिनकी छाती इस पन्ने के अन्त में शक्ति लेती है।
- हनुमान पवनपुत्र, जो अँधेरे में सबसे पहले बुलाये जाते हैं और जिनसे मेघनाद एक बार भी सामने नहीं आता।
- अंगद बालि के पुत्र, जो हनुमान के साथ ही बुलाये जाते हैं और उन्हीं के साथ गरजते हैं।
- रावण लङ्कापति, जो इस रात पहली बार अपने मन्त्रियों से हिसाब कहता है और सलाह माँगता है, और फिर जो सलाह मिलती है उसे दरवाज़े से बाहर कर देता है।
- माल्यवान् रावण की माता का पिता और श्रेष्ठ मन्त्री, इस काण्ड का सबसे बूढ़ा आदमी, जो इस पन्ने पर आता है, सच कहता है, और फिर पूरे काण्ड में दोबारा नहीं आता।
- मेघनाद रावण का पुत्र, जिसे तुलसी घननाद भी कहते हैं, और जो इस पन्ने का सबसे हिसाबी योद्धा है।
- अकंपन और अतिकाय दो सेनापति, जो एक ही चौपाई में नाम लेकर आते हैं और रात का पहला अँधेरा रचते हैं।
- विभीषण लङ्का छोड़कर आ मिले हुए, जिनका नाम इस पन्ने पर केवल एक बार आता है, और वह भी मेघनाद की ललकार के भीतर।
साँझ, और प्रदोष का बल
पन्ना खुलता है दो लौटते हुए योद्धाओं से। अंगद और हनुमान प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाते हैं। तुलसी कहते हैं कि उन उत्तम योद्धाओं को देखकर रघुनाथ मन में प्रसन्न हुए, और फिर उन्होंने कृपा करके दोनों की ओर देखा, जिससे वे थकानरहित और परम सुखी हो गये। ध्यान दीजिये कि थकान कैसे उतरती है। न पानी से, न विश्राम से, न किसी औषधि से। देखने भर से। पूरे प्रसंग में यह क्रिया बार-बार लौटेगी, और हर बार उसका काम एक ही होगा।
और फिर वह वाक्य आता है जो पन्ना पलट देता है। दुश्मन की नज़र उन्हीं दो पर थी। जैसे ही यह जाना गया कि वे दोनों मैदान से हट गये हैं, बाक़ी भालू और वानर भी लौट पड़े। उसी घड़ी दूसरी चीज़ भी हट रही थी, यानी सूरज। राक्षसों को दोनों का इन्तज़ार था।
गए जानि अंगद हनुमाना । फिरे भालु मर्कट भट नाना॥
चौपाई १
जातुधान प्रदोष बल पाई । धाए करि दससीस दोहाई॥
अंगद और हनुमान को गया जानकर सब भालू और वानर वीर लौट पड़े। और राक्षसों ने प्रदोष का बल पाकर, रावण की दुहाई देते हुए, धावा बोल दिया। प्रदोष सूर्यास्त के ठीक बाद की वह घड़ी है जिससे रात शुरू होती है, और वह राक्षस का अपना समय है। तुलसी यहाँ बल शब्द लगाते हैं, यानी यह मनोबल की बात नहीं है। घड़ी बदलने से एक पूरी सेना की ताक़त सचमुच बढ़ जाती है। और दुहाई वह पुकार है जिसमें राजा का नाम एक ही साथ नारा भी है और अधिकार का दावा भी। वे अपने नाम से नहीं टूटते, अपने स्वामी के नाम से टूटते हैं।
वानर भागते नहीं। राक्षसों की सेना आती देखकर वे भी पलट पड़ते हैं, और योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ जाते हैं। तुलसी दोनों दलों को एक ही तराज़ू पर रखते हैं। दोनों प्रबल हैं, दोनों ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानता। राक्षस सब महावीर हैं और अत्यन्त काले हैं। वानर विशालकाय हैं और अनेक रंगों के हैं। यह एक चित्रकार की टिप्पणी है: एक ओर एक ही रंग की दीवार, दूसरी ओर हर रंग का रेला।
और फिर एक शब्द आता है जो इस पूरे पन्ने पर तीन बार, तीन अलग मुँहों में लौटेगा। तुलसी कहते हैं कि समान बल के ये योद्धा क्रोध करके लड़ते हैं और कौतुक भी करते हैं, यानी लड़ते हुए अपनी वीरता का तमाशा भी दिखाते हैं। अभी यह शब्द दोनों सेनाओं के लिये चल रहा है। थोड़ी देर में यही शब्द रावण के बेटे की प्रतिज्ञा में आयेगा, और उसके बाद यही शब्द उस आदमी के हाथ के लिये आयेगा जिसके सामने वह प्रतिज्ञा की गयी थी।
उपमा भी मौसम की है। दोनों दल ऐसे भिड़ते हैं मानो बरसात और शरद के बहुत से बादल हवा के धक्के से आपस में लड़ रहे हों। बादल का लड़ना दीखता तो बहुत बड़ा है, पर उससे ज़मीन पर कुछ तय नहीं होता। और ठीक इसी जगह, जहाँ कुछ तय नहीं हो रहा, दो नाम आते हैं जो इस काण्ड में यहीं एक बार आते हैं। सेनापति अकंपन और अतिकाय। उन्होंने अपनी सेना को विचलित होते देखा, और माया की।
सार: अंगद और हनुमान लौटकर चरणों में सिर नवाते हैं और राम की दृष्टि से उनकी थकान उतर जाती है। उन दोनों को हटा जानकर बाक़ी सेना भी लौटती है, और उसी समय साँझ उतरती है। प्रदोष का बल पाकर राक्षस रावण की दुहाई देते हुए टूट पड़ते हैं। दोनों दल बराबर के हैं, इसलिये कुछ तय नहीं होता, और अपनी सेना को डगमगाते देखकर सेनापति अकंपन तथा अतिकाय माया रच देते हैं।
निमिष भर में
माया का पहला काम बहुत सादा है। तुलसी कहते हैं कि पल भर में अत्यन्त अँधेरा हो गया, और खून, पत्थर तथा राख की वर्षा होने लगी। निमिष यानी पलक झपकने भर का समय। यहाँ कोई नया राक्षस नहीं उतरता, कोई नया अस्त्र नहीं चलता। जो चलाया गया है वह आँख के विरुद्ध चलाया गया है। और वर्षा तीन चीज़ों की है, और तीनों घिनौनी हैं, ताकि जो दीख नहीं रहा वह ऊपर से छू भी रहा हो।
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
दोहा ४६
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार॥ ४६॥
दसों दिशाओं में घना अँधेरा देखकर वानरों की सेना में खभार पड़ गया, यानी खलबली। और फिर दोहे की दूसरी पंक्ति आती है, जो इस पूरे दृश्य की असली चोट है। एक दूसरे को नहीं देख पाता, और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं। ध्यान दीजिये कि इस पंक्ति में एक भी घाव नहीं है। कोई मारा नहीं गया, कोई हारा नहीं। सेना सिर्फ़ यह भूल गयी कि वह सेना है। जिस क्षण एक सिपाही अपने बग़ल वाले को नहीं देख पाता, उसी क्षण लाखों की भीड़ लाखों अकेले आदमियों में बदल जाती है।
और वे करते क्या हैं। पुकारते हैं। अँधेरे में पड़ा हुआ आदमी सबसे पहले नाम लेकर आवाज़ लगाता है, इसलिये नहीं कि उससे रोशनी होगी, बल्कि इसलिये कि उत्तर आ जाये तो वह अकेला नहीं रहेगा। तुलसी ने पूरी सेना की हालत एक क्रिया में बाँध दी है, और वह क्रिया लड़ने की नहीं है।
हँसी, और एक अग्निबाण
उत्तर तीन क़दमों में आता है, और तीनों का क्रम देखने लायक़ है। पहला क़दम यह कि रघुनायक सब मरमु जान गये, यानी भेद, कि यह अँधेरा प्राकृतिक नहीं है और किसका रचा हुआ है। दूसरा क़दम यह कि उन्होंने अंगद और हनुमान को बुला लिया और सारे समाचार कहकर समझाये, और सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़ पड़े। ध्यान दीजिये कि बाण अभी नहीं चला है। पहले दो आदमी भेजे गये, और उन्हें बताया गया कि हो क्या रहा है। डर का आधा इलाज ख़बर है।
तीसरा क़दम इसके बाद आता है, और उसके साथ एक चीज़ आती है जिसकी युद्ध के मैदान में कोई ज़रूरत नहीं थी।
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥
चौपाई २
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं । ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥
फिर कृपालु ने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरन्त अग्निबाण चला दिया। प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रहा, जैसे ज्ञान के उदय होते ही सन्देह नहीं रह जाते। इस चौपाई में दो बातें ऐसी हैं जिन पर रुकना चाहिये। पहली, हँसी। जो आदमी अभी-अभी अपनी सेना को अँधेरे में चीख़ते सुन रहा था, वह धनुष उठाने से पहले हँसता है। वह हँसी ठिठोली नहीं है, वह उस आदमी की है जिसने देख लिया कि सामने वाले ने कितनी छोटी चीज़ को अपना सबसे बड़ा हथियार समझ रखा है।
दूसरी बात उपमा की जगह है। तुलसी उपमा बाण पर नहीं देते, उजाले पर देते हैं। वे यह नहीं कहते कि बाण ऐसा था जैसे बिजली। वे कहते हैं कि उजाला ऐसे हुआ जैसे ज्ञान के उदय होने पर सन्देह चले जाते हैं। और सन्देह कोई वस्तु नहीं है जिसे मारा जाये, वह केवल न दीखने का दूसरा नाम है। इसीलिये इस माया को काटने के लिये किसी को मारना नहीं पड़ा। दीया जल गया और कमरे का अँधेरा कहीं चला नहीं गया, वह था ही नहीं।
उजाला मिलते ही सेना पलट जाती है। भालू और वानर श्रम तथा भय दोनों से छूटकर, प्रसन्न होकर दौड़ते हैं। हनुमान और अंगद रण में गरजते हैं, और उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग खड़े होते हैं। भागते हुए योद्धाओं को वानर और भालू पकड़कर धरती पर पटकते हैं और अद्भुत करनी करते हैं। कुछ को पैर पकड़कर समुद्र में फेंक देते हैं, जहाँ मगर, साँप और मछलियाँ उन्हें पकड़-पकड़कर खा जाती हैं। रात का यह हिस्सा कुछ मारे गये, कुछ घायल, और कुछ भागकर किले पर चढ़ गये, इस हिसाब पर बन्द होता है, और रीछ तथा वानर शत्रुदल को डिगाकर गरज रहे हैं।
सार: अकंपन और अतिकाय की माया से पल भर में अँधेरा होता है और खून, पत्थर तथा राख बरसती है। वानर सेना में खलबली पड़ जाती है, कोई किसी को नहीं देख पाता, सब पुकारने लगते हैं। राम भेद जान लेते हैं, पहले अंगद और हनुमान को बुलाकर समाचार बताते हैं, फिर हँसकर अग्निबाण चलाते हैं। उजाला हो जाता है, राक्षस भागते हैं, और रात का पहला दौर वानरों के पक्ष में बन्द होता है।
उहाँ, यानी दीवार के उस पार
रात जानकर वानरों की चारों टुकड़ियाँ वहाँ लौट आती हैं जहाँ कोसलपति बैठे हैं, और उनके देखते ही सबकी थकान फिर उतर जाती है। यह उसी क्रिया की दूसरी आवृत्ति है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। और ठीक यहाँ तुलसी एक शब्द से दृश्य बदल देते हैं। उहाँ। यानी उधर, दीवार के उस पार।
उधर लङ्कापति ने मन्त्रियों को बुलाया है, और उसने वह काम किया है जो इस काण्ड में उसने अब तक एक बार भी नहीं किया था। उसने गिनती की। उसने सबके सामने नाम लेकर बताया कि कौन-कौन से उत्तम योद्धा मारे गये। और फिर एक वाक्य में हिसाब रख दिया कि वानरों ने आधी सेना का संहार कर दिया है। आधी। यह अपने ही दरबार में अपनी हार का आँकड़ा बोलना है।
उसके बाद वह पूछता है, और जल्दी पूछता है: शीघ्र बताइये, अब क्या विचार किया जाना चाहिये। यह प्रश्न सच्चा है। पिछले प्रसंग में उसने मन्दोदरी की विनती को हँसी में उड़ाया था और प्रहस्त की नीति पर झिड़क दिया था, पर उस समय उसकी सेना पूरी थी। अब सेना आधी है और वह पूछ रहा है। जो आगे होता है, वह इसीलिये इतना भारी है। आदमी ने सलाह माँगी, सलाह आयी, और आदमी ने उसे दरवाज़े से बाहर कर दिया।
माल्यवान्, जो रावण की माता का पिता था
सभा में से जो उठता है, उसका परिचय तुलसी दो पंक्तियों में पूरा कर देते हैं, और उन दो पंक्तियों में उम्र, रिश्ता और पद, तीनों आ जाते हैं।
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥
चौपाई ३
बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥
माल्यवान् नाम का एक अत्यन्त जरठ निशाचर था, यानी बहुत बूढ़ा। वह रावण की माता का पिता था, और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीति के वचन बोला: सुनिये तात, कुछ मेरी सीख भी सुन लीजिये। इन शब्दों में जो सबसे बड़ी बात है वह पद नहीं, रिश्ता है। रावण का नाना। यानी जो आदमी बोलने खड़ा हुआ है, वह इस सभा का इकलौता आदमी है जिसने लङ्कापति को गोद में खिलाया होगा।
और वह जिस शब्द से शुरू करता है वह तात है, जो बड़ा छोटे के लिये बोलता है, और जिसे मन्त्री अपने राजा के लिये नहीं बोलता। पहली ही पंक्ति में वह दरबार को छोड़कर घर में उतर आता है। और जो कहने जा रहा है उसे वह सलाह नहीं कहता, सिखावन कहता है, यानी सीख। मन्त्री सलाह देता है और उसे मानना या न मानना राजा का काम है। सीख वह चीज़ है जिसे बड़ा देता है और जिसका न मानना केवल भूल नहीं, बदतमीज़ी भी है।
उसकी दलील तीन क़दमों में चलती है, और तीनों क़दम उसके अपने मुँह से आते हैं। पहला क़दम वह है जिसे सभा का हर आदमी अपनी आँख से जाँच सकता है।
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥
चौपाई ४
बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥
जब से सीता हरकर लायी गयी हैं, तब से इतने अपशकुन हो रहे हैं कि गिनाये नहीं जा सकते। और जिनका यश वेद तथा पुराणों ने गाया है, उन राम से विमुख होकर आज तक किसी ने सुख नहीं पाया। ध्यान दीजिये कि यह बूढ़ा आदमी कहाँ से शुरू करता है। ईश्वर से नहीं। वह गली के शकुनों से शुरू करता है, उन चीज़ों से जो लङ्का का हर आदमी पिछले कई महीनों से देख रहा है और जिनके बारे में कोई ऊँची आवाज़ में नहीं बोल रहा। पहले वह उस पर उँगली रखता है जो सबको दीखता है, तब उस पर आता है जो नहीं दीखता।
दूसरा क़दम पहचान का है, और वह सबसे चतुर क़दम है, क्योंकि वह राक्षसों की अपनी याददाश्त में से उठाया गया है।
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।
दोहा ४८ (क)
जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥ ४८ (क)॥
जिन्होंने भाई हिरण्यकशिपु सहित हिरण्याक्ष को और बलवान् मधु तथा कैटभ को मारा था, वही कृपा के समुद्र भगवान् अवतार लेकर आये हैं। माल्यवान् कोई नयी बात नहीं बता रहा। वह उन नामों की सूची पढ़ रहा है जो इस कुल की अपनी पुरानी पराजयें हैं। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, मधु और कैटभ, ये सब वे लोग हैं जिनके बल का बखान लङ्का के भीतर बड़प्पन के साथ होता रहा होगा। बूढ़ा मन्त्री उसी बखान को पलट देता है: इन सबका अन्त एक ही हाथ से हुआ था, और वह हाथ इस समय समुद्र के उस पार बैठा है।
तीसरा क़दम आता है, और वह प्रश्न के रूप में आता है। जो स्वयं काल का रूप हैं, जो दुष्टों के वन को जला देने वाली अग्नि हैं, जो गुणों के घर और ज्ञान के घन हैं, और जिनकी सेवा शिव तथा ब्रह्मा तक करते हैं, उनसे भला बैर कैसा। पूरी सीख की आख़िरी बात एक सवाल है, और वह सवाल जीतने-हारने का नहीं है। वह यह पूछता है कि इस झगड़े का कोई अर्थ भी है या नहीं।
सार: रात होने पर वानर सेनाएँ राम के पास लौटती हैं और उनकी दृष्टि से थकान उतर जाती है। उधर लङ्का में रावण मन्त्रियों को बुलाकर मारे गये योद्धाओं का हिसाब देता है, कहता है कि आधी सेना कट चुकी है, और उपाय पूछता है। उसकी माता का पिता माल्यवान्, सबसे बूढ़ा मन्त्री, तीन क़दमों में उत्तर देता है: दीखते हुए अपशकुन, फिर राम की पहचान पुराने अवतारों से, और फिर यह प्रश्न कि जिनकी सेवा शिव और ब्रह्मा करते हैं उनसे बैर किस बात का।
तीसरी बार, तीसरा आदमी बाहर
और तब वह अपनी बात का निष्कर्ष रखता है, जो इस पूरे काण्ड में केवल एक ही वाक्य में कहा जा सकता था और तीन लोग उसे तीन बार कह चुके हैं।
परिहरि बयरु देहु बैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही॥
चौपाई ५
ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे॥
बैर छोड़कर वैदेही को लौटा दीजिये, और कृपानिधान परम स्नेही राम का भजन कीजिये। इसके बाद तुलसी एक ऐसा वाक्य लिखते हैं जिसमें उन्होंने पूरी प्रतिक्रिया एक उपमा में तौल दी है: वे वचन रावण को बाण की तरह लगे। सभा में कोई हथियार नहीं चला, पर लङ्कापति की देह में कुछ धँसा है, और तुलसी उसे उसी शब्द से नापते हैं जिससे वे मैदान की चोटें नापते आये हैं। सलाह घुसती है और चुभती है, ठीक इसलिये कि वह सच है।
और उत्तर आता है, और वह उत्तर अपमान का है, दलील का नहीं। वे कहते हैं: मुँह काला करके निकल जा, अभागे। पूरे भाषण में जितनी बातें कही गयी थीं, उनमें से एक का भी उत्तर नहीं दिया गया। शकुनों पर कुछ नहीं। अवतारों पर कुछ नहीं। आधी कटी हुई सेना पर कुछ नहीं। केवल बोलने वाले को हटा दिया गया।
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही । अब जनि नयन देखावसि मोही॥
चौपाई ६
तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥
आप बूढ़े हो गये, नहीं तो मार ही डालता। अब मेरी आँखों को अपना मुँह मत दिखाइयेगा। रावण अपनी हत्या की धमकी को भी एक तरह की उदारता की तरह पेश करता है, यानी यह अहसान गिनाता है कि उम्र देखकर छोड़ रहा है। और फिर चौपाई का दूसरा आधा हिस्सा दृश्य को बाहर से भीतर ले जाता है। माल्यवान् ने अपने मन में अनुमान किया कि अब इसे कृपानिधान राम मारना ही चाहते हैं।
यह पंक्ति बहुत शान्त है और बहुत निर्दय। बूढ़ा आदमी पलटकर बहस नहीं करता, गाली का जवाब नहीं देता, और अपने अपमान पर एक शब्द नहीं कहता। वह केवल निदान करता है। जिस आदमी को सच सुनना असम्भव हो गया हो, उसका फ़ैसला हो चुका होता है, और बाक़ी सब तारीख़ की बात है। इस काण्ड में यह तीसरा आदमी है जिसने लङ्कापति को सच कहा और तीसरा है जिसे बाहर कर दिया गया। पहले मन्दोदरी, फिर प्रहस्त, अब यह नाना। तुलसी इस पर एक भी टिप्पणी नहीं करते। तीनों बार उन्होंने बस इतना बताया है कि किसने कहा और कैसे गया।
सार: माल्यवान् कहता है कि बैर छोड़कर सीता लौटा दी जायें और राम का भजन किया जाये। वे वचन रावण को बाण की तरह लगते हैं और वह दलील का उत्तर दिये बिना उसे अभागा कहकर निकल जाने को कहता है, यह जोड़कर कि बुढ़ापे के कारण ही जान बख़्शी जा रही है। माल्यवान् बहस नहीं करता, केवल मन में यह तय करता है कि अब इसका अन्त राम के हाथों निश्चित है।
बेटे का वचन, और गोद
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥
चौपाई ७
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा । करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥
वह उठकर चला गया, और जाते-जाते कड़वी बातें कहता गया। तुलसी उसके लिये दुर्बादा शब्द रखते हैं। यह वही शब्द है जो थोड़ी देर बाद रावण के बेटे के लिये आयेगा, जब वह राम के सामने खड़ा होकर बकेगा। एक बूढ़ा आदमी अपने अपमान के बाद बड़बड़ाता हुआ निकलता है, और एक जवान आदमी अपनी ताक़त के नशे में वही करता है। तुलसी ने दोनों को एक ही शब्द दे दिया है और यह हमारे ऊपर छोड़ दिया है कि हम उनमें फ़र्क़ करें।
और उसी साँस में सभा का ख़ाली हुआ हिस्सा भर जाता है। तब मेघनाद क्रोध के साथ बोला: मेरा कौतुक कल सवेरे देख लीजियेगा, मैं बहुत कुछ करूँगा, थोड़ा क्या कहूँ। यह इस शब्द की दूसरी आवृत्ति है। थोड़ी देर पहले यह दोनों सेनाओं की वीरता के तमाशे के लिये आया था। अब यह एक आदमी की प्रतिज्ञा है, और उसमें एक अजीब बात है। वह यह नहीं कहता कि मैं जीतूँगा। वह कहता है कि आप देखियेगा। उसे जीत से ज़्यादा दर्शक चाहिये।
बाप पर इसका असर तत्काल होता है। पुत्र के वचन सुनकर रावण को भरोसा आ गया, और उसने प्रेम के साथ उसे गोद में बिठा लिया। यह वही कमरा है, वही सभा है और वही रात है जिसमें अभी-अभी उसने अपनी माता के पिता से कहा था कि आगे से मुझे मुँह मत दिखाइयेगा। एक बुज़ुर्ग को दरवाज़े से निकालने और एक जवान को गोद में बिठाने के बीच तुलसी ने कुछ नहीं रखा, न कोई अनुच्छेद, न कोई टिप्पणी। दोनों वाक्य लगभग सटे हुए हैं। जिस सलाह से डर लगता है वह बाहर कर दी जाती है और जिस सलाह से अच्छा लगता है वह गोद में बैठ जाती है, और आदमी को लगता है कि उसने सलाह ली।
विचार करते-करते सवेरा हो गया। और सवेरा होते ही पता चलता है कि दूसरा पक्ष विचार नहीं कर रहा था। वानर फिर चारों दरवाज़ों पर जा लगे हैं। उन्होंने क्रोध करके उस दुर्गम किले को घेर लिया, नगर में बहुत कोलाहल मच गया, और राक्षस तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े तथा किले के ऊपर से पहाड़ों की चोटियाँ ढहाने लगे।
इसके बाद तुलसी चौपाई छोड़कर छन्द में चले जाते हैं, और छन्द का काम यहाँ रफ़्तार बढ़ाना है। करोड़ों शिखर ढहाये गये, तरह-तरह के गोले चले, और वे ऐसे घहराते हैं जैसे बिजली गिरी हो, तथा योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलय के बादल हों। और फिर उसी छन्द में वह पंक्ति आती है जो वानरों के बारे में सबसे ज़्यादा बताती है। वे भिड़ते हैं, कट जाते हैं, उनकी देह जर्जर हो जाती है, और फिर भी वे लटते नहीं, यानी हिम्मत नहीं हारते। ऊपर से जो पहाड़ उन पर फेंके जा रहे थे, वही पहाड़ उठाकर वे उसी किले पर चला देते हैं, और राक्षस जो जहाँ है वहीं मारा जाता है। किला ऊँचाई का फ़ायदा दे रहा था, और वानरों ने उस ऊँचाई से गिरी हुई चीज़ को ही अपना गोला बना लिया।
सार: माल्यवान् कड़वी बातें कहता हुआ निकल जाता है। उसी सभा में मेघनाद क्रोध से प्रतिज्ञा करता है कि सवेरे उसका कौतुक देखा जाये, और रावण भरोसे में आकर उसे प्रेम से गोद में बिठा लेता है। विचार करते-करते सवेरा हो जाता है और वानर फिर चारों दरवाज़ों पर जुट जाते हैं, किले को घेर लेते हैं, और ऊपर से गिराये गये पहाड़ों को उठाकर उसी किले पर फेंकते हैं।
डंका बजाकर उतरना
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ।
दोहा ४९
उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥ ४९॥
मेघनाद ने कानों से यह सुना कि वानरों ने आकर फिर किले को घेर लिया है। तब वह वीर किले से उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला। इस दोहे में दो बातें हैं जो उसका पूरा चरित्र खोल देती हैं। पहली, वह ऊपर से नहीं लड़ता। किले पर चढ़े रहना उसके लिये सुलभ था, और उसने उतरना चुना। दूसरी, वह छिपकर नहीं आता। डंका बजाकर आता है, यानी अपने आने की घोषणा करके।
और आकर वह नाम पुकारता है। समस्त लोकों में प्रसिद्ध धनुर्धर, कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं। नल, नील, द्विविद, सुग्रीव कहाँ हैं। बल की सीमा अंगद और हनुमान कहाँ हैं। नामों का यह क्रम किसी हिसाब से रखा गया है, क्योंकि सबसे आख़िर में वह नाम आता है जिस पर उसका असली ग़ुस्सा है: भाई से द्रोह करने वाला विभीषण कहाँ है। और फिर प्रतिज्ञा, कि आज मैं सबको और उस दुष्ट को हठपूर्वक मारूँगा। पूरे काण्ड में विभीषण का नाम इस पन्ने पर केवल यहीं आता है, और वह भी उस आदमी के मुँह में जो उसका भतीजा है।
ऐसा कहकर उसने धनुष पर कठिन बाणों का सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके प्रत्यंचा को कान तक खींचा। फिर वह बाणों के समूह छोड़ने लगा, और तुलसी उसकी उपमा देते हैं कि मानो बहुत से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। साँप का दौड़ना ही तेज़ होता है, और उस पर पंख लगा देना उस तेज़ी को हवा में उठा देना है। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी देने लगे, और उस समय कोई उसके सामने न हो सका।
यहाँ तुलसी नुक़सान को नापने के लिये एक उलटा तरीक़ा अपनाते हैं। वे यह नहीं गिनाते कि कितने गिरे। वे कहते हैं कि रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले, सबको युद्ध की इच्छा भूल गयी, और रणभूमि में ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो, यानी जिसमें साँस के सिवा कुछ बचा हो। किसी को अपवाद न बचने देना, यह किसी संख्या से बड़ी बात है।
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर।
दोहा ५०
सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥ ५०॥
फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे और वानर वीर धरती पर गिर पड़े, और वह बलवान् तथा धीर मेघनाद सिंह की तरह नाद करके गरजा। इस दोहे में सबसे डरावनी चीज़ हिसाब है। दस-दस, यानी हर एक के लिये उतने ही। इतनी भीड़ में भी वह गिनकर मार रहा है, और यही उसका फ़र्क़ है। और दूसरी पंक्ति में तुलसी उसे धीर कहते हैं, यानी ठहरा हुआ। यह प्रशंसा नहीं है, यह चेतावनी है। जो शत्रु क्रोध में है वह ग़लती करेगा। जो शत्रु ठहरा हुआ है वह नहीं करेगा।
सार: मेघनाद किले से उतरकर डंका बजाकर सामने आता है, दोनों भाइयों, नल, नील, द्विविद, सुग्रीव, अंगद, हनुमान और अन्त में विभीषण को नाम लेकर ललकारता है, और कान तक प्रत्यंचा खींचकर बाणों की झड़ी लगा देता है। वानर भाग खड़े होते हैं, किसी में साँस भर बचती है, और वह हर एक को दस-दस बाण मारकर सिंहनाद करता है।
एक पहाड़, और एक मर्म
सारी सेना को बेहाल देखकर पवनपुत्र क्रोध में ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आ रहा हो। उन्होंने तुरन्त एक बहुत बड़ा पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े क्रोध से उसे मेघनाद पर छोड़ दिया। लङ्का में इस पहाड़ की कहानी पुरानी है। जिस नगर को इसी देह ने जलाया था, उसी के सामने यह देह फिर पहाड़ उठाये खड़ी है।
आवत देखि गयउ नभ सोई । रथ सारथी तुरग सब खोई॥
चौपाई ८
बार बार पचार हनुमाना । निकट न आव मरमु सो जाना॥
पहाड़ को आते देखकर वह आकाश में चढ़ गया, और उसके रथ, सारथी तथा घोड़े सब चूर हो गये। हनुमान उसे बार-बार ललकारते हैं, पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह मर्म जान चुका था। यह पूरे पन्ने पर मेघनाद के बारे में सबसे काम की पंक्ति है, और इसे ध्यान से पढ़ना चाहिये। वह डरा हुआ नहीं है, क्योंकि वह मैदान छोड़कर नहीं जाता। वह हारा हुआ भी नहीं है, क्योंकि वह अगले ही क्षण किसी और पर जा पड़ता है। वह बस इतना जानता है कि इस एक आदमी के सामने उसका कोई दाँव नहीं चलेगा।
तो वह हनुमान को छोड़कर सीधे रघुनाथ के पास पहुँचता है, और वहाँ दो काम करता है। पहला, अनेक प्रकार के दुर्वचन। दूसरा, अपने पास के सारे अस्त्र-शस्त्र और हथियार। और प्रभु ने, तुलसी कहते हैं, उन सबको खेल में ही काटकर अलग कर दिया। यह उस शब्द की तीसरी आवृत्ति है। पहले वह दोनों सेनाओं की वीरता का तमाशा था, फिर वह मेघनाद की रात भर की प्रतिज्ञा थी, और अब वह वही चीज़ है जो उस प्रतिज्ञा के सामने वाले हाथ के लिये सचमुच खेल भर है। मेघनाद ने कहा था कि सवेरे मेरा कौतुक देखियेगा, और सवेरा आया तो कौतुक किसी और का निकला।
अपना सारा शस्त्रागार कटता देखकर वह मूर्ख लज्जित हुआ और अनेक प्रकार की माया करने लगा। और यहाँ तुलसी जो उपमा देते हैं वह इस पूरे काण्ड की सबसे सटीक उपमाओं में है: जैसे कोई साँप का छोटा सा बच्चा हाथ में लेकर गरुड़ को डराये और उससे खेल करे। गरुड़ का भोजन ही साँप है। जिस चीज़ से डराया जा रहा है, वह उस डरने वाले का आहार है।
जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट।
दोहा ५१
ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥ ५१॥
जिनकी प्रबल माया के वश में शिव और ब्रह्मा तक, छोटे-बड़े सब हैं, उन्हीं को यह नीच बुद्धि वाला निशाचर अपनी माया दिखा रहा है। ध्यान दीजिये कि तुलसी क्या कहते हैं और क्या नहीं कहते। वे यह नहीं कहते कि मेघनाद की माया झूठी है या कमज़ोर है। वे उसकी मति को खोटा कहते हैं, यानी उसकी माप को। वह ताक़त में कम नहीं पड़ा, वह अन्दाज़े में कम पड़ा। इस आदमी की सारी कहानी इसी एक शब्द पर टिकी है।
दूसरा अँधेरा, और दूसरा बाण
अब वह वही करता है जो रात में उसकी सेना के सेनापतियों ने किया था, पर बहुत अधिक गन्दगी के साथ। आकाश में ऊँचे चढ़कर वह ढेरों अंगारे बरसाने लगा, और उधर धरती से पानी की धाराएँ फूट पड़ीं। अनेक प्रकार के पिशाच और पिशाचिनियाँ नाचते हुए मारो और काटो की आवाज़ लगाने लगे। वह कभी विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता, कभी ढेर सारे पत्थर फेंक देता।
और फिर उसने वह किया जो रात वाली माया का ही दूसरा रूप है। उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि आदमी को अपना ही फैलाया हुआ हाथ न सूझे। यह इस पन्ने का दूसरा अँधेरा है, और ध्यान देने की बात यह है कि दोनों बार शत्रु का असली निशाना देह नहीं, आँख है। वह जानता है कि इस सेना को तोड़ने का सबसे सस्ता तरीक़ा यह है कि उसे दिखना बन्द कर दिया जाये।
इस बार वानरों की हालत का हिसाब भी तुलसी लिख देते हैं। माया देखकर वे अकुला उठे, और उन्होंने अपने मन में यही जोड़ा कि इस हिसाब से तो सबका मरण आ बना। और इसके ठीक बाद वह वाक्य आता है जो इस पन्ने पर दूसरी बार आ रहा है। यह कौतुक देखकर राम मुसकराये, और उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं।
दोनों बातों को जोड़कर देखिये। हँसी पहली बार तब आयी थी जब सेना अँधेरे में चीख़ रही थी। मुसकान अब आयी है जब सेना अपने मरने का हिसाब लगा चुकी है। और दोनों बार मुसकान के बाद जो होता है वह सेना के लिये होता है, न कि शत्रु के विरुद्ध। तुलसी यह भी साफ़ कह देते हैं कि उन्होंने क्या जान लिया, और वह माया की गिनती नहीं है, वह डर की पहचान है।
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥
चौपाई ९
तब एक ही बाण से उन्होंने सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकार के समूह को हर लेता है। और उसके बाद, उसी चौपाई के दूसरे आधे हिस्से में, वे कृपा भरी दृष्टि से वानरों और भालुओं की ओर देखते हैं, जिससे वे इतने प्रबल हो जाते हैं कि रण में रोकने पर भी नहीं रुकते।
क्रम को उलटकर मत पढ़िये। बाण ने माया काटी, और दृष्टि ने डर काटा, और दोनों में दूसरा काम बाद में किया गया, अलग से किया गया, और उसी के लिये एक पूरी पंक्ति ख़र्च की गयी। माया चली जाती तो भी वह सेना डरी हुई खड़ी रहती, क्योंकि जो देख लिया गया है वह आँख से नहीं जाता। इस पन्ने पर हथियार बार-बार चलता है, पर सेना को लड़ने लायक़ हर बार देखने भर से किया जाता है, ठीक उसी क्रिया से जिससे पहली चौपाई में अंगद और हनुमान की थकान उतरी थी।
सार: हनुमान का फेंका पहाड़ मेघनाद का रथ, सारथी और घोड़े चूर कर देता है, पर वह उनके सामने नहीं आता क्योंकि वह उनका मर्म जान चुका है। राम के सामने जाकर वह गालियाँ और हथियार दोनों चलाता है, जिन्हें प्रभु खेल में काट देते हैं। तब वह आकाश से अंगारे, गन्दगी, पत्थर और अन्त में धूल बरसाकर अँधेरा कर देता है। वानर अपने मरने का हिसाब लगाने लगते हैं, राम मुसकराकर एक बाण से सारी माया काटते हैं और फिर दृष्टि से उनका डर उतारते हैं।
लक्ष्मण का चलना
आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।
दोहा ५२
लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥ ५२॥
राम से आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरों के साथ, हाथों में धनुष-बाण लिये लक्ष्मण क्रुद्ध होकर चले। शब्दों का क्रम देखिये। आज्ञा पहले आती है और क्रोध बाद में। इस पूरे पन्ने पर यह इकलौता आदमी है जो कहीं जाने से पहले किसी से पूछता है। मेघनाद ने अपने बाप को सूचना दी थी कि सवेरे देखियेगा। माल्यवान् को पूछने का मौक़ा नहीं मिला। और यह आदमी क्रोध से भरा हुआ है, हथियार हाथ में है, और फिर भी रुककर आज्ञा लेता है।
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥
चौपाई १०
इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥
उनके नेत्र छतज हैं, यानी रक्त के रंग के। छाती चौड़ी है, भुजाएँ विशाल हैं, और हिमालय जैसी उजली देह पर कुछ ललाई आ गयी है। यह क्रोध का चित्र है और बाहर से खींचा गया है। कोई यह नहीं कहता कि उन्हें ग़ुस्सा आया। यह बताया जाता है कि आँखें किस रंग की हो गयी हैं और बर्फ़ जैसे रंग के ऊपर कहाँ लाली उतर आयी है। और उसी चौपाई का दूसरा आधा हिस्सा दीवार के उस पार चला जाता है: इधर रावण ने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े।
फिर दोनों ओर से भिड़न्त है, और तुलसी उसे हथियारों की सूची से शुरू करते हैं। वानरों के पास पर्वत हैं, नख हैं और वृक्ष हैं, और वे राम की जय पुकारकर दौड़े। सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ गये, और तुलसी जोड़ते हैं कि इधर और उधर, दोनों तरफ़ जीतने की इच्छा कम नहीं थी। यह पूरे युद्ध-वर्णन की सबसे ईमानदार पंक्ति है। शत्रु भी उतना ही जीतना चाहता था।
वानर घूँसों और लातों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं, और मारकर फिर डाँटते भी हैं। और इसके बाद तुलसी एक पूरी पंक्ति के लिये कथा कहना छोड़ देते हैं और मैदान की अपनी आवाज़ लिख देते हैं, जिसमें कोई वाक्य नहीं है, केवल आदेश हैं: मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो, भुजा उखाड़ लो। ऐसी आवाज़ नवों खण्डों में भर गयी, और प्रचण्ड धड़ जहाँ-तहाँ दौड़ने लगे।
और ऊपर आकाश में देवताओं की भीड़ यह कौतुक देख रही है, और उन्हें कभी विषाद होता है और कभी आनन्द। तुलसी इसे बिना किसी नरमी के रखते हैं। जो ऊपर से देख रहे हैं, उनके लिये यह तमाशा है। नीचे जो खड़े हैं, उनके लिये यह दिन है।
उस दिन के अन्त का चित्र दोहे में है, और वह चित्र किसी योद्धा का नहीं है। खून गड्ढों में भर-भरकर जम गया है और उसके ऊपर धूल उड़कर पड़ रही है, और तुलसी कहते हैं कि यह ऐसा लगता है मानो अंगारों के ढेरों पर राख छा रही हो। अंगारा राख के नीचे बुझा हुआ नहीं होता, वह केवल ढँका होता है। युद्ध का दिन ख़त्म नहीं हुआ है, उस पर बस धूल पड़ गयी है।
सार: राम से आज्ञा लेकर लक्ष्मण अंगद आदि के साथ क्रोध में निकलते हैं, लाल आँखें और हिमालय जैसी देह पर उतरी हुई लाली के साथ। रावण भी बड़े योद्धा भेजता है। वानर पर्वत, नख और वृक्ष लेकर भिड़ते हैं, दोनों ओर जीत की इच्छा बराबर है, देवता आकाश से यह सब देखते हैं, और दिन खून से भरे गड्ढों और उन पर पड़ती धूल के चित्र पर बन्द होता है।
शक्ति
अगली चौपाई घायलों से शुरू होती है, और तुलसी उनके लिये जो उपमा चुनते हैं वह सुन्दर है और इसीलिये और भी चुभती है। घायल वीर ऐसे शोभित हैं जैसे फूले हुए पलास के पेड़। पलास का फूल इतना लाल होता है कि खिलने पर पूरा पेड़ जलता हुआ दीखता है। ख़ून से भरी हुई देहों के लिये यही उपमा रखी गयी है, और उसमें एक भी शब्द घृणा का नहीं है।
उसी चौपाई में दोनों योद्धा आमने-सामने आ जाते हैं। लक्ष्मण और मेघनाद, दोनों अत्यन्त क्रोध करके एक दूसरे से भिड़ते हैं। और अगली पंक्ति बताती है कि यह भिड़न्त कहाँ अटक गयी: कोई किसी को जीत नहीं सकता। इस पूरे पन्ने पर यह पहली जगह है जहाँ मेघनाद बराबरी पर रोका गया है।
और जहाँ बराबरी आती है, वहीं वह अपनी असली आदत पर लौटता है। तुलसी कहते हैं कि निशाचर छल, बल और अनीति करता है, यानी वह वहाँ से निकलने की कोशिश करता है जहाँ से नियम से निकला नहीं जा सकता। तब अनन्त को क्रोध आया और उन्होंने तुरन्त उसका रथ तोड़ डाला और सारथी को समाप्त कर दिया। ध्यान दीजिये कि यहाँ से तुलसी लक्ष्मण को उनके नाम से नहीं बुलाते। वे उन्हें अनन्त कहते हैं, और अगली ही पंक्ति में शेष कहते हैं।
शेष जी ने उस पर अनेक प्रकार से प्रहार किये, और राक्षस के प्राणमात्र शेष रह गये। और फिर इस पन्ने पर दूसरी बार कोई आदमी अपने मन के भीतर हिसाब लगाता है। रावण के पुत्र ने मन में अनुमान किया कि अब संकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे। पहला अनुमान माल्यवान् का था, जिसने भाँप लिया था कि अब इस कुल का अन्त राम के हाथों तय है। दोनों अनुमान सही हैं। फ़र्क़ यह है कि बूढ़ा आदमी अपना अनुमान लगाकर चुपचाप कमरे से निकल गया, और यह आदमी अपना अनुमान लगाकर हाथ बढ़ाता है।
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी । तेजपुंज लछिमन उर लागी॥
चौपाई ११
मुरुछा भई सक्ति के लागें । तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥
तब उसने वीरों का घात करने वाली शक्ति छोड़ी। वह तेज का पुंज लक्ष्मण की छाती में लगा। शक्ति के लगने से उन्हें मूर्च्छा आ गयी। और तब वह भय छोड़कर उनके निकट गया। पूरी चौपाई में सबसे ज़्यादा कहने वाला हिस्सा आख़िरी चार शब्द हैं, जिनमें बताया जाता है कि वह भय त्यागकर पास आया। यानी अब तक जो दूरी थी, वह डर की दूरी थी। तुलसी ने मेघनाद के डर को कहीं नाम लेकर नहीं कहा। उन्होंने उसे उस फ़ासले से नापा है जो वह सामने वाले से रखता आया था, और अब उस फ़ासले का कम होना ही उसका बयान है।
और वह पास आया किसलिये है, यह अगला दोहा बताता है, और यही इस पन्ने का अन्तिम चित्र है।
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
दोहा ५४
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ॥ ५४॥
मेघनाद के समान सौ करोड़ योद्धा उन्हें उठा रहे हैं, पर जगत् के आधार शेष जी उनसे कैसे उठें। तब वे लजाकर चले गये। वह मारने नहीं आया था, उठाकर ले जाने आया था, ताकि सवेरे उस डेरे को अपना आदमी ढूँढ़ने पर भी न मिले। यह उसकी बुद्धि का काम है, वैसा ही जैसा पहाड़ के सामने से हट जाना था। पर यहीं उसकी वह मति फिर खोटी पड़ती है जिसका नाम दोहा इक्यावन में लिया गया था। वह यह अन्दाज़ा ही नहीं लगा पाया कि वह उठा किसे रहा है।
जगदाधार। जिस पर जगत् टिका हुआ है। तुलसी ने पूरा उत्तर एक शब्द में रख दिया है, और वह उत्तर हथियार का नहीं, वज़न का है। सौ करोड़ हाथ लगे हुए हैं और ज़मीन से एक इंच नहीं उठता। जो नीचे पड़ा है वह कोई घायल आदमी नहीं है, वह वह चीज़ है जिसके ऊपर बाक़ी सब रखा हुआ है। और इसी वजह से यह पन्ना, जिसका अन्त एक भाई के गिरने पर होना था, असल में उन आदमियों पर बन्द होता है जो उसे उठा नहीं पाते और शर्मिन्दा होकर लौट जाते हैं।
सार: घायल योद्धा फूले हुए पलास जैसे दीखते हैं। लक्ष्मण और मेघनाद भिड़ते हैं और कोई किसी को जीत नहीं पाता, तब राक्षस छल और अनीति पर उतरता है और उसका रथ तथा सारथी तोड़ दिये जाते हैं। प्राण संकट में देखकर वह वीरघातिनी शक्ति छोड़ता है, जो लक्ष्मण की छाती में लगती है और उन्हें मूर्च्छा आ जाती है। मेघनाद उन्हें उठा ले जाने पास आता है, पर मेघनाद जैसे सौ करोड़ योद्धा भी जगत् के आधार को नहीं उठा पाते और लजाकर लौट जाते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर तीन आदमी हैं जिन्हें ठीक-ठीक पता है कि क्या होने वाला है, और तीनों का पता अलग-अलग तरीक़े से काम करता है। माल्यवान् को पता है कि यह युद्ध हारा जा चुका है, और वह यह बात दलील के साथ, क्रम के साथ और बिना ऊँची आवाज़ के रखता है, और निकाल दिया जाता है। मेघनाद को पता है कि वह हनुमान से नहीं जीत सकता, और वह इस जानकारी को छिपाकर रखता है और उससे बहुत दिन कमा लेता है। और रावण को भी सब पता है, क्योंकि उसने ख़ुद उस सभा में गिनकर बताया था कि आधी सेना कट चुकी है। फ़र्क़ यह है कि उसने अपनी जानकारी के साथ कुछ नहीं किया। उसने केवल यह तय किया कि वह किससे सुनेगा।
और यही वह जगह है जहाँ यह प्रसंग हमारी ओर मुड़ता है। लङ्कापति ने सलाह माँगी थी, और सच में माँगी थी। सलाह आयी भी। पर जब वह चुभी, तो उसने दलील का उत्तर नहीं दिया, बोलने वाले को हटा दिया। और उसी रात, उसी कमरे में, उसने उस आवाज़ को गोद में बिठा लिया जिससे अच्छा लगता था। तुलसी इन दोनों घटनाओं को इतना पास-पास रखते हैं कि उनके बीच साँस लेने की जगह भी नहीं बचती, और वे इस पर एक शब्द भी नहीं कहते। जिस आदमी के चारों ओर केवल वही लोग बचे हों जो उसे अच्छा लगने वाली बात कहते हैं, वह आदमी ख़बरों से नहीं, अपने कमरे से हारता है।
और दूसरी ओर एक और तरह की सभा है। वहाँ भी अँधेरा पड़ता है और दो बार पड़ता है। पर वहाँ हर बार पहले बताया जाता है कि हो क्या रहा है, फिर उजाला किया जाता है, और उसके बाद अलग से डर उतारा जाता है। बाण माया काटता है और दृष्टि डर काटती है, और तुलसी दोनों को कभी एक नहीं करते। इस पन्ने पर थकान तीन बार उतरती है और तीनों बार किसी औषधि से नहीं, देखे जाने से।
और सबसे आख़िर में वह आदमी है जो क्रोध में भरा हुआ, हथियार हाथ में लिये, जाने से पहले रुककर आज्ञा माँगता है। इस पूरे पन्ने पर किसी और ने किसी से कुछ नहीं पूछा। बाप ने बेटे की प्रतिज्ञा सुनी और मान ली, बेटे ने अपनी प्रतिज्ञा सुनायी और चल दिया, और जिस बूढ़े ने पूछे बिना सच कह दिया वह बाहर कर दिया गया। लक्ष्मण अकेले हैं जो पूछकर निकलते हैं, और वही हैं जो शाम तक ज़मीन पर हैं।
इसी वजह से यह प्रसंग यहाँ रुकता है और सँभलता नहीं। शक्ति लग चुकी है, मूर्च्छा आ चुकी है, और शत्रु उन्हें उठाने में हारकर लौट गया है। आगे क्या होता है, यह अगले प्रसंग की बात है। इस पन्ने के हाथ में जो आख़िरी शब्द है वह न विजय है न विलाप, वह एक वज़न है जिसे सौ करोड़ हाथ मिलकर भी नहीं उठा सके, और जिसका नाम तुलसी ने जगत् का आधार रखा है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ४६ से ५४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।