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रात की माया, माल्यवान् की सीख और शक्ति का लगना

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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 7

साँझ ढलते ही राक्षस अँधेरा रच देते हैं। रावण को सच सुनानेवाला तीसरा आदमी, एक बूढ़ा मन्त्री, बाहर कर दिया जाता है। अगले दिन रावण का बेटा वह चला देता है जिससे लक्ष्मण का देह ज़मीन पर आ जाता है।

पिछला प्रसंग दिन का था। मोर्चे बँधे थे, पहला दिन लड़ा जा चुका था, और अंगद तथा हनुमान शत्रु की पंक्तियों के भीतर तक घुसकर लौटे थे। कथा वहीं से उठती है, उस घड़ी में जब सूरज उतर रहा है, और यहीं से लड़ाई की क़िस्म बदल जाती है। दिन में जो चला था वह भुजाओं का था। रात में जो चलता है वह आँखों का है।

इस प्रसंग की कथा तीन बार अँधेरा करती है और तीन बार उजाला। पहला अँधेरा दो सेनापतियों की माया से होता है और एक बाण से कटता है। फिर लङ्का के भीतर एक बूढ़े मन्त्री की बात से उजाला होने को होता है, और वह उजाला दरवाज़े से बाहर कर दिया जाता है। तीसरी बार धूल की वर्षा से ऐसा अँधेरा होता है कि आदमी अपना फैलाया हाथ न देख पाये, और वह भी एक बाण से कटता है। इनके बीच से कथा वहाँ पहुँचती है जहाँ एक भाई की छाती में शक्ति लगती है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। मेघनाद और लक्ष्मण को शक्ति लगना दोनों में है। पर माल्यवान् की यह सभा, रावण का उसे झिड़ककर निकालना, और उसी रात बेटे को गोद में बिठा लेना। ये यहाँ जिस क्रम में आते हैं, वह मानस का अपना क्रम है।

डेरे में और दरबार में

  • राम जो इस प्रसंग में तीन बार हथियार उठाते हैं, और तीनों बार शत्रु को नहीं, वह काटने के लिये जो शत्रु ने आँखों पर डाला था।
  • लक्ष्मण छोटे भाई, जो क्रोध में भरे होने पर भी बाहर निकलने से पहले आज्ञा माँगते हैं, और जिनकी छाती अगले दिन शक्ति लेती है।
  • हनुमान जो अँधेरे में सबसे पहले बुलाये जाते हैं और जिनके सामने मेघनाद एक बार भी नहीं आता।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो हनुमान के साथ ही बुलाये जाते हैं और उन्हीं के साथ गरजते हैं।
  • रावण लङ्का का राजा, जो इस रात पहली बार मन्त्रियों को हिसाब देता है और सलाह माँगता है। फिर वह मिली हुई सलाह को दरवाज़े से बाहर कर देता है।
  • माल्यवान् रावण की माता का पिता और श्रेष्ठ मन्त्री, अत्यन्त बूढ़ा, जो इसी एक रात आता है, सच कहता है, और फिर पूरे काण्ड में दोबारा नहीं आता।
  • मेघनाद रावण का पुत्र, जिसे कथा घननाद भी कहती है, और जो इस रात और दिन का हिसाबी योद्धा है।
  • अकंपन और अतिकाय दो सेनापति, जो एक ही बार नाम लेकर आते हैं और रात का पहला अँधेरा रचते हैं।
  • विभीषण लङ्का छोड़कर आ मिले हुए, जिनका नाम इस प्रसंग में केवल एक बार आता है, और वह भी मेघनाद की ललकार के भीतर।

साँझ, और प्रदोष का बल

कथा दो लौटते योद्धाओं से खुलती है। अंगद और हनुमान राम के चरणों में सिर नवाते हैं। उन्हें देखकर राम मन में प्रसन्न हुए, और कृपा करके दोनों की ओर देखा, जिससे वे थकानरहित और परम सुखी हो गये। थकान न पानी से उतरती है, न विश्राम से, देखने भर से। यह क्रिया पूरे प्रसंग में लौटेगी।

और फिर पासा पलटता है। दुश्मन की नज़र उन्हीं दो पर थी। जैसे ही वे मैदान से हटे, बाक़ी भालू और वानर भी लौट पड़े, और उसी घड़ी सूरज भी हट रहा था। राक्षसों को दोनों का इन्तज़ार था।

अंगद और हनुमान को गया जानकर सब भालू और वानर वीर लौट पड़े। राक्षसों ने प्रदोष का बल पाकर, रावण की दुहाई देते हुए, धावा बोल दिया। प्रदोष सूर्यास्त के बाद की वह घड़ी है जिससे रात शुरू होती है, राक्षस का अपना समय। कथा उसे बल कहती है। घड़ी बदलने से सेना की ताक़त सचमुच बढ़ जाती है। और दुहाई में राजा का नाम नारा भी है और अधिकार का दावा भी।

वानर भागते नहीं। राक्षसों की सेना आती देखकर पलटते हैं, और योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ जाते हैं। दोनों दल प्रबल, दोनों ललकार-ललकारकर लड़ते, कोई हार नहीं मानता। राक्षस सब महावीर और अत्यन्त काले। वानर विशालकाय और अनेक रंगों के।

और एक शब्द आता है जो आगे तीन मुँहों में लौटेगा। समान बल के योद्धा क्रोध करके लड़ते हैं और कौतुक भी करते हैं, यानी लड़ते हुए वीरता का तमाशा भी दिखाते हैं। थोड़ी देर में यह शब्द रावण के बेटे की प्रतिज्ञा में आयेगा, और उसके बाद उस हाथ के लिये जिसके सामने वह प्रतिज्ञा की गयी थी।

दोनों दल ऐसे भिड़ते हैं मानो बरसात और शरद के बहुत-से बादल हवा के धक्के से लड़ रहे हों। बादलों का लड़ना दीखता बड़ा है, पर उससे ज़मीन पर कुछ तय नहीं होता। और यहीं दो नाम आते हैं जो इस काण्ड में एक ही बार आते हैं: सेनापति अकंपन और अतिकाय। अपनी सेना को विचलित होते देखकर उन्होंने माया की।

निमिष भर में

पल भर में अत्यन्त अँधेरा हो गया, और खून, पत्थर तथा राख की वर्षा होने लगी। न नया राक्षस, न नया अस्त्र। जो चलाया गया है वह आँख के विरुद्ध है, और ऊपर से तीन घिनौनी चीज़ें बरस रही हैं।

दसों दिशाओं में घना अँधेरा देखकर वानर सेना में खलबली पड़ गयी: एक दूसरे को नहीं देख पाता, और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं। इस दृश्य में एक भी घाव नहीं। सेना सिर्फ़ यह भूल गयी कि वह सेना है। जिस क्षण सिपाही अपने बग़ल वाले को नहीं देख पाता, लाखों की भीड़ लाखों अकेले आदमियों में बदल जाती है।

और वे पुकारते हैं। अँधेरे में आदमी नाम लेकर आवाज़ लगाता है, इसलिये नहीं कि रोशनी होगी, बल्कि इसलिये कि उत्तर आ जाय तो वह अकेला नहीं रहेगा।

हँसी, और एक अग्निबाण

उत्तर तीन क़दमों में आता है। पहला, राम सारा भेद जान गये: यह अँधेरा प्राकृतिक नहीं, और किसका रचा हुआ है। दूसरा, उन्होंने अंगद और हनुमान को बुलाकर सारे समाचार कहकर समझाये, और सुनते ही वे दोनों क्रोध करके दौड़ पड़े। बाण अभी नहीं चला। पहले दो आदमी भेजे गये, और उन्हें बताया गया कि हो क्या रहा है। डर का आधा इलाज ख़बर है।

तीसरा क़दम इसके बाद आता है, और उसके साथ एक चीज़ आती है जिसकी युद्ध के मैदान में कोई ज़रूरत नहीं थी।

फिर राम ने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरन्त अग्निबाण चला दिया। प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रहा, जैसे ज्ञान के उदय होते ही सन्देह नहीं रह जाते। जो अभी अपनी सेना को अँधेरे में चीख़ते सुन रहा था, वह धनुष उठाने से पहले हँसता है। यह उसकी हँसी है, जिसने देख लिया कि सामनेवाले ने कितनी छोटी चीज़ को बड़ा हथियार समझ रखा है।

और उपमा बाण पर नहीं, उजाले पर है: उजाला वैसे हुआ जैसे ज्ञान के उदय होने पर सन्देह चले जाते हैं। सन्देह कोई वस्तु नहीं जिसे मारा जाय। वह न दीखने का दूसरा नाम है। इसीलिये इस माया को काटने के लिये किसी को मारना नहीं पड़ा।

उजाला मिलते ही भालू और वानर श्रम और भय से छूटकर, प्रसन्न होकर दौड़ते हैं। हनुमान और अंगद रण में गरजते हैं, और उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग खड़े होते हैं। भागते योद्धाओं को वानर और भालू पकड़कर धरती पर पटकते हैं। कुछ को वे पैर पकड़कर समुद्र में फेंक देते हैं, जहाँ मगर, साँप और मछलियाँ उन्हें खा जाती हैं। कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर किले पर चढ़ गये, और रीछ तथा वानर शत्रुदल को डिगाकर गरज रहे हैं।

उधर, दीवार के उस पार

रात जानकर वानरों की चारों टुकड़ियाँ वहाँ लौट आती हैं जहाँ राम बैठे हैं, और उनके देखते ही सबकी थकान फिर उतर जाती है। यह उसी क्रिया की दूसरी आवृत्ति है जिससे यह साँझ शुरू हुई थी। और यहीं एक शब्द से दृश्य बदलता है: उधर, दीवार के उस पार।

उधर रावण ने मन्त्रियों को बुलाया है, और वह काम किया है जो इस काण्ड में अब तक एक बार भी नहीं किया था: उसने गिनती की। सबके सामने नाम लेकर बताया कि कौन-कौन से उत्तम योद्धा मारे गये, और फिर एक वाक्य में हिसाब रख दिया: “वानरों ने आधी सेना का संहार कर दिया!” आधी। यह अपने ही दरबार में अपनी हार का आँकड़ा बोलना है।

और वह जल्दी पूछता है: “शीघ्र बताइये, अब क्या विचार करना चाहिये?” यह प्रश्न सच्चा है। पहले उसने मन्दोदरी की विनती हँसी में उड़ायी थी और प्रहस्त को झिड़क दिया था, पर तब सेना पूरी थी। अब सेना आधी है और वह पूछ रहा है। इसीलिये आगे की बात भारी है। सलाह माँगी गयी, सलाह आयी, और उसे दरवाज़े से बाहर कर दिया गया।

माल्यवान्, जो रावण की माता का पिता था

सभा में से जो उठता है, उसका परिचय थोड़े में पूरा हो जाता है: उम्र, रिश्ता और पद, तीनों।

माल्यवान् नाम का एक बहुत बूढ़ा निशाचर था, रावण की माता का पिता और श्रेष्ठ मन्त्री। वह अत्यन्त पवित्र नीति के वचन बोला: “तात, कुछ मेरी सीख भी सुनिये।” पद से बड़ा रिश्ता है: रावण का नाना, सभा का इकलौता आदमी जिसने रावण को गोद में खिलाया होगा।

तात बड़ा छोटे के लिये बोलता है, मन्त्री राजा के लिये नहीं। पहले ही वाक्य में वह दरबार छोड़कर घर में उतर आता है। और जो कहने जा रहा है उसे सलाह नहीं, सीख कहता है। सलाह मानना राजा की मरज़ी है। सीख का न मानना बदतमीज़ी भी है।

उसकी दलील तीन क़दमों में चलती है। पहला क़दम वह है जिसे सभा का हर आदमी अपनी आँख से जाँच सकता है।

“जब से आप सीता को हर लाये हैं, तब से इतने अपशकुन हो रहे हैं कि गिनाये नहीं जा सकते। जिनका यश वेद और पुराणों ने गाया है, उन राम से विमुख होकर आज तक किसी ने सुख नहीं पाया।” बूढ़ा आदमी ईश्वर से नहीं, गली के शकुनों से शुरू करता है, जिन्हें लङ्का का हर आदमी देखता आया है। पहले वह उस पर उँगली रखता है जो सबको दीखता है, तब उस पर जो नहीं दीखता।

दूसरा क़दम पहचान का है, और चतुर है, क्योंकि वह राक्षसों की अपनी याददाश्त से उठाया गया है।

“जिन्होंने भाई हिरण्यकशिपु सहित हिरण्याक्ष को और बलवान् मधु तथा कैटभ को मारा था, वही कृपा के समुद्र भगवान् अवतार लेकर आये हैं।” ये नाम इस कुल की अपनी पुरानी पराजयें हैं, जिनके बल का बखान लङ्का में होता रहा होगा। बूढ़ा मन्त्री उसी बखान को पलट देता है: इन सबका अन्त एक ही हाथ से हुआ था, और वह हाथ इस समय समुद्र के उस पार बैठा है।

तीसरा क़दम प्रश्न के रूप में आता है: “वे स्वयं काल का रूप हैं, दुष्टों के वन को जला देनेवाली अग्नि हैं, गुणों के घर और ज्ञान के घन हैं। उनकी सेवा शिव और ब्रह्मा तक करते हैं। उनसे भला बैर कैसा?” सीख की आख़िरी बात एक सवाल है, और वह जीतने-हारने का नहीं। वह पूछता है कि इस झगड़े का कोई अर्थ भी है या नहीं।

तीसरी बार, तीसरा आदमी बाहर

और तब वह अपनी बात का निष्कर्ष रखता है, जो एक ही वाक्य में कहा जा सकता था, और उसे कहनेवाला वह इस काण्ड का तीसरा आदमी है।

“बैर छोड़कर सीता को लौटा दीजिये, और परम स्नेही राम का भजन कीजिये।” वे वचन रावण को बाण की तरह लगे। सभा में कोई हथियार नहीं चला, पर उसके भीतर कुछ धँसा है, और उसे उसी शब्द से नापा गया है जिससे मैदान की चोटें नापी जाती हैं। सलाह चुभती है, ठीक इसलिये कि वह सच है।

उत्तर अपमान का है, दलील का नहीं: “अभागे, मुँह काला करके निकल जाइये!” भाषण की एक भी बात का उत्तर नहीं दिया गया: शकुनों पर कुछ नहीं, अवतारों पर कुछ नहीं, आधी कटी सेना पर कुछ नहीं। केवल बोलनेवाले को हटा दिया गया।

“आप बूढ़े हो गये, नहीं तो मार ही डालता। अब मेरी आँखों को अपना मुँह मत दिखाइयेगा।” रावण हत्या की धमकी को भी उदारता की तरह पेश करता है, यह अहसान गिनाकर कि उम्र देखकर छोड़ रहा है। और फिर कथा दृश्य को भीतर ले जाती है: माल्यवान् ने मन में अनुमान किया कि अब इसे राम मारना ही चाहते हैं।

यह बात शान्त है और निर्दय। बूढ़ा न बहस करता है, न गाली का जवाब देता है। वह केवल निदान करता है: जिसके लिये सच सुनना असम्भव हो गया, उसका फ़ैसला हो चुका है। इस काण्ड में यह तीसरा आदमी है जिसने रावण को सच कहा और जिसे बाहर कर दिया गया: पहले मन्दोदरी, फिर प्रहस्त, अब यह नाना। तीनों बार कथा बस इतना बताती है कि किसने कहा और कैसे गया।

बेटे का वचन, और गोद

वह रावण को कड़वी बातें कहता हुआ उठकर चला गया। कथा उसकी बातों को दुर्वचन कहती है, वही शब्द जो थोड़ी देर बाद मेघनाद के लिये आयेगा, जब वह राम के सामने खड़ा होकर बकेगा। एक बूढ़ा अपमान के बाद बड़बड़ाता निकलता है, एक जवान ताक़त के नशे में। दोनों को एक ही शब्द मिला है।

और सभा का ख़ाली हुआ हिस्सा तुरन्त भर जाता है। तब मेघनाद क्रोध के साथ बोला, “मेरा कौतुक कल सवेरे देखियेगा। मैं बहुत कुछ करूँगा। थोड़ा क्या कहूँ।” उस शब्द की यह दूसरी आवृत्ति है, और इसमें एक अजीब बात है: वह नहीं कहता कि वह जीतेगा। वह कहता है, “आप देखियेगा।” उसे जीत से ज़्यादा दर्शक चाहिये।

पुत्र के वचन सुनकर रावण को भरोसा आ गया, और उसने प्रेम के साथ उसे गोद में बिठा लिया। यह वही रात और वही सभा है जिसमें अभी उसने अपनी माता के पिता से कहा था कि आगे से मुँह मत दिखाइयेगा, और दोनों वाक्य सटे हुए हैं। जिस सलाह से डर लगता है वह बाहर कर दी जाती है, जिससे अच्छा लगता है वह गोद में बैठ जाती है। आदमी को लगता है कि उसने सलाह ली।

विचार करते-करते सवेरा हो गया, और सवेरा होते ही पता चलता है कि दूसरा पक्ष विचार नहीं कर रहा था: वानर फिर चारों दरवाज़ों पर जा लगे हैं। उन्होंने क्रोध करके दुर्गम किले को घेर लिया, नगर में बहुत कोलाहल मच गया। राक्षस तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े और किले के ऊपर से पहाड़ों की चोटियाँ ढहाने लगे।

फिर रफ़्तार बढ़ जाती है। करोड़ों शिखर ढहाये गये, तरह-तरह के गोले चले, जो बिजली गिरने की तरह घहराते हैं, और योद्धा प्रलय के बादलों की तरह गरजते हैं। वानर भिड़ते हैं, कट जाते हैं, उनका देह जर्जर हो जाता है, फिर भी वे हिम्मत नहीं हारते। ऊपर से फेंके गये पहाड़ उठाकर वे उसी किले पर चला देते हैं, और राक्षस जो जहाँ है वहीं मारा जाता है।

डंका बजाकर उतरना

मेघनाद ने कानों से सुना कि वानरों ने आकर फिर किले को घेर लिया है। तब वह वीर किले से उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला। वह ऊपर से नहीं लड़ता, यद्यपि किले पर चढ़े रहना सुलभ था। वह छिपकर नहीं, घोषणा करके आता है।

और आकर वह नाम पुकारता है: “समस्त लोकों में प्रसिद्ध धनुर्धर, कोसल के राजा, दोनों भाई कहाँ हैं? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव कहाँ हैं? बल की सीमा अंगद और हनुमान कहाँ हैं? भाई से द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सबको, और उस दुष्ट को तो अवश्य, हठपूर्वक मारूँगा।” सबसे आख़िर में वह नाम आता है जिस पर उसका असली ग़ुस्सा है। इस प्रसंग में विभीषण का नाम केवल यहीं आता है, और वह भी उस आदमी के मुँह में जो उसका भतीजा है।

ऐसा कहकर उसने धनुष पर कठिन बाणों का सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके प्रत्यंचा कान तक खींची। फिर वह बाणों के समूह छोड़ने लगा, मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। साँप का दौड़ना ही तेज़ होता है, और पंख उस तेज़ी को हवा में उठा देते हैं। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी देने लगे, और उस समय कोई उसके सामने न हो सका।

कितने गिरे, यह नहीं गिनाया जाता। रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले, सबको युद्ध की इच्छा भूल गयी। रणभूमि में ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखा जिसे उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो, यानी जिसमें साँस के सिवा कुछ बचा हो। किसी को अपवाद न बचने देना किसी संख्या से बड़ी बात है।

फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे और वानर वीर धरती पर गिर पड़े, और बलवान्, धीर मेघनाद सिंह की तरह गरजा। इतनी भीड़ में भी वह गिनकर मार रहा है, हर एक को दस। और कथा उसे धीर, यानी ठहरा हुआ, कहती है। यह प्रशंसा नहीं, चेतावनी है, क्योंकि ठहरा हुआ शत्रु ग़लती नहीं करता।

एक पहाड़, और एक मर्म

सारी सेना को बेहाल देखकर हनुमान क्रोध में ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आ रहा हो। उन्होंने तुरन्त एक बहुत बड़ा पहाड़ उखाड़ा और बड़े क्रोध से मेघनाद पर छोड़ दिया। जिस नगर को इसी देह ने जलाया था, उसी के सामने यह देह फिर पहाड़ उठाये खड़ा है।

पहाड़ को आते देखकर वह आकाश में चढ़ गया, और उसके रथ, सारथी और घोड़े सब चूर हो गये। हनुमान उसे बार-बार ललकारते हैं, पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि उनके बल का मर्म जानता था। वह डरा हुआ नहीं, क्योंकि मैदान नहीं छोड़ता। हारा हुआ भी नहीं, क्योंकि अगले क्षण किसी और पर जा पड़ता है। वह बस जानता है कि इस एक आदमी के सामने उसका दाँव नहीं चलेगा।

तो वह सीधे राम के पास पहुँचता है: अनेक प्रकार के दुर्वचन, और अपने सारे अस्त्र-शस्त्र। राम ने उन सबको खेल में ही काटकर अलग कर दिया। उस शब्द की यह तीसरी आवृत्ति है। मेघनाद ने कहा था, “सवेरे मेरा कौतुक देखियेगा।” सवेरा आया तो कौतुक किसी और का निकला।

राम का प्रताप देखकर वह मूर्ख लज्जित हुआ और अनेक प्रकार की माया करने लगा। उपमा सटीक है: जैसे कोई साँप का छोटा-सा बच्चा हाथ में लेकर गरुड़ को डराये और उससे खेल करे। गरुड़ का भोजन ही साँप है। जिस चीज़ से डराया जा रहा है, वह डरनेवाले का आहार है।

जिनकी प्रबल माया के वश में शिव और ब्रह्मा तक, छोटे-बड़े सब हैं, उन्हीं को यह खोटी बुद्धिवाला निशाचर अपनी माया दिखा रहा है। कथा उसकी माया को कमज़ोर नहीं कहती। उसकी मति, उसकी माप, को खोटा कहती है। वह ताक़त में नहीं, अन्दाज़े में कम पड़ा।

दूसरा अँधेरा, और दूसरा बाण

अब वह वही करता है जो रात में उसके सेनापतियों ने किया था, पर कहीं अधिक गन्दगी के साथ। आकाश में ऊँचे चढ़कर वह ढेरों अंगारे बरसाने लगा, और धरती से पानी की धाराएँ फूट पड़ीं। अनेक प्रकार के पिशाच और पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर मारो-काटो की आवाज़ लगाने लगे। वह कभी विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता, कभी ढेर सारे पत्थर फेंक देता।

और फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि आदमी को अपना फैलाया हाथ न सूझे। यह दूसरा अँधेरा है, और दोनों बार शत्रु का निशाना शरीर नहीं, आँख है। इस सेना को तोड़ने का सस्ता तरीक़ा यह है कि उसे दिखना बन्द कर दिया जाय।

इस बार वानरों की हालत भी लिखी है: माया देखकर वे अकुला उठे, और मन में जोड़ने लगे, “इस हिसाब से तो सबका मरण आ बना।” और इसके ठीक बाद वह बात दूसरी बार आती है: यह कौतुक देखकर राम मुसकराये, और उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं।

हँसी पहली बार तब आयी थी जब सेना अँधेरे में चीख़ रही थी। मुसकान अब आयी है जब सेना अपने मरने का हिसाब लगा चुकी है। और दोनों बार उसके बाद जो होता है वह सेना के लिये होता है। राम ने जो जाना, वह माया की गिनती नहीं, डर की पहचान है।

तब एक ही बाण से उन्होंने सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकार के समूह को हर लेता है। और उसी क्षण वे कृपा भरी दृष्टि से वानरों और भालुओं की ओर देखते हैं। इससे वे इतने प्रबल हो जाते हैं कि रण में रोकने पर भी नहीं रुकते।

बाण ने माया काटी, और दृष्टि ने डर। दूसरा काम अलग से किया गया। माया चली जाती तो भी सेना डरी खड़ी रहती, क्योंकि जो देख लिया गया है वह आँख से नहीं जाता। सेना को लड़ने लायक़ हर बार देखने भर से किया जाता है, उसी क्रिया से जिससे साँझ को अंगद और हनुमान की थकान उतरी थी।

लक्ष्मण का चलना

राम से आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरों के साथ, हाथों में धनुष-बाण लिये लक्ष्मण क्रुद्ध होकर चले। आज्ञा पहले आती है, क्रोध बाद में। इन दो दिनों में यह इकलौता आदमी है जो जाने से पहले किसी से पूछता है। मेघनाद ने अपने बाप को सूचना दी थी, माल्यवान् को पूछने का मौक़ा नहीं मिला। यह आदमी क्रोध से भरा होकर भी रुककर आज्ञा लेता है।

उनके नेत्र रक्त के रंग के हैं। छाती चौड़ी, भुजाएँ विशाल, और हिमालय जैसे उजले शरीर पर कुछ ललाई आ गयी है। क्रोध का चित्र बाहर से खींचा गया है। कोई नहीं कहता कि उन्हें ग़ुस्सा आया। बताया जाता है कि आँखें किस रंग की हो गयीं। और इधर रावण ने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े।

फिर दोनों ओर से भिड़न्त है। वानरों के हथियार पर्वत, नख और वृक्ष हैं, और वे राम की जय पुकारकर दौड़े। सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ गये, और इधर और उधर, दोनों तरफ़ जीतने की इच्छा कम नहीं थी। यह बात ईमानदार है। शत्रु भी उतना ही जीतना चाहता था।

वानर घूँसों और लातों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं, और मारकर फिर डाँटते भी हैं। फिर कथा थमती है और मैदान की अपनी आवाज़ सुनायी देती है। उसमें कोई वाक्य नहीं, केवल ललकारें हैं: “मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो, भुजा उखाड़ लो!” ऐसी आवाज़ नवों खण्डों में भर गयी, और प्रचण्ड धड़ जहाँ-तहाँ दौड़ने लगे।

और ऊपर आकाश में देवताओं की भीड़ यह कौतुक देख रही है। उन्हें कभी विषाद होता है, कभी आनन्द। जो ऊपर से देख रहे हैं, उनके लिये यह तमाशा है। नीचे जो खड़े हैं, उनके लिये यह दिन है।

उस दिन के अन्त का चित्र किसी योद्धा का नहीं। खून गड्ढों में भर-भरकर जम गया है और उस पर धूल उड़कर पड़ रही है, मानो अंगारों के ढेरों पर राख छा रही हो। अंगारा राख के नीचे बुझा नहीं होता, केवल ढँका होता है। युद्ध का दिन ख़त्म नहीं हुआ। उस पर बस धूल पड़ गयी है।

शक्ति

अब बात घायलों से शुरू होती है: घायल वीर ऐसे शोभित हैं जैसे फूले हुए पलास के पेड़। पलास इतना लाल फूलता है कि पूरा पेड़ जलता दीखता है, और ख़ून से भरे शरीरों के लिये यही उपमा रखी गयी है, बिना एक भी शब्द घृणा के।

उसी समय दोनों योद्धा आमने-सामने आते हैं: लक्ष्मण और मेघनाद अत्यन्त क्रोध करके एक दूसरे से भिड़ते हैं। और भिड़न्त वहीं अटक जाती है: कोई किसी को जीत नहीं सकता। यह पहली जगह है जहाँ मेघनाद बराबरी पर रोका गया है।

और जहाँ बराबरी आती है, वहीं वह अपनी असली आदत पर लौटता है। छल, बल और अनीति, यानी वहाँ से निकलने की कोशिश जहाँ से नियम से निकला नहीं जा सकता। तब लक्ष्मण को क्रोध आया, और उन्होंने तुरन्त उसका रथ तोड़ डाला और सारथी को समाप्त कर दिया। यहाँ से कथा लक्ष्मण को अनन्त कहती है, और फिर शेष, यानी शेषनाग, और यह नाम आगे काम आयेगा।

लक्ष्मण ने उस पर अनेक प्रकार से प्रहार किये, और राक्षस के प्राणमात्र शेष रह गये। रावण के पुत्र ने मन में अनुमान किया, “अब प्राणसंकट आ बना। ये मेरे प्राण हर लेंगे।” इससे पहले माल्यवान् ने अनुमान किया था कि अब राम रावण को मारना ही चाहते हैं। दोनों अनुमान सही हैं। पर बूढ़ा चुपचाप कमरे से निकल गया, और यह आदमी हाथ बढ़ाता है।

तब उसने वीरों का घात करनेवाली शक्ति छोड़ी। वह तेज का पुंज लक्ष्मण की छाती में लगा, और उन्हें मूर्च्छा आ गयी। तब वह भय छोड़कर उनके निकट गया। अब तक जो दूरी थी, वह डर की दूरी थी। कथा मेघनाद के डर का नाम नहीं लेती, उसे उस फ़ासले से नापती है जो वह रखता आया था।

और वह पास किसलिये आया, यही इस कथा का अन्तिम चित्र है।

मेघनाद के समान सौ करोड़ योद्धा उन्हें उठा रहे हैं, पर जगत् के आधार शेष उनसे कैसे उठें? तब वे लजाकर चले गये। वह मारने नहीं, उठाकर ले जाने आया था। यहीं उसकी मति फिर खोटी पड़ती है, जिसकी बात माया के समय हुई थी। वह अन्दाज़ा ही नहीं लगा पाया कि उठा किसे रहा है।

जगत् का आधार, यानी जिस पर जगत् टिका है। उत्तर हथियार का नहीं, वज़न का है। सौ करोड़ हाथ लगे हैं, और ज़मीन से एक इंच नहीं उठता। इसीलिये यह दिन, जिसका अन्त एक भाई के गिरने पर होना था, असल में उन आदमियों पर ख़त्म होता है जो उसे उठा नहीं पाते और लजाकर लौट जाते हैं।

किससे सुनना है

तीन आदमियों को ठीक-ठीक पता है कि क्या होनेवाला है। माल्यवान् को पता है कि युद्ध हारा जा चुका है। वह दलील और क्रम के साथ कहता है, और निकाल दिया जाता है। मेघनाद को पता है कि वह हनुमान से नहीं जीत सकता। वह इसे छिपाकर रखता है और उससे बहुत दिन कमा लेता है। और रावण को भी सब पता है, क्योंकि उसने ख़ुद गिनकर बताया था कि आधी सेना कट चुकी है। उसने बस यह तय किया कि वह किससे सुनेगा।

रावण ने सलाह सच में माँगी थी, और सलाह आयी भी। पर जब वह चुभी, तो उसने बोलनेवाले को हटा दिया, और उसी रात, उसी कमरे में, उस आवाज़ को गोद में बिठा लिया जिससे अच्छा लगता था। जिस आदमी के चारों ओर केवल अच्छी लगनेवाली बात कहनेवाले बचे हों, वह ख़बरों से नहीं, अपने कमरे से हारता है।

दूसरी ओर की सभा में भी दो बार अँधेरा पड़ता है। पर वहाँ हर बार पहले बताया जाता है कि हो क्या रहा है, फिर उजाला किया जाता है, और उसके बाद अलग से डर उतारा जाता है। थकान तीन बार उतरती है, और तीनों बार किसी औषधि से नहीं, देखे जाने से।

और सबसे आख़िर में वह आदमी है जो क्रोध में, हथियार हाथ में लिये, जाने से पहले रुककर आज्ञा माँगता है। उस रात और दिन किसी और ने किसी से कुछ नहीं पूछा। बाप ने बेटे की प्रतिज्ञा मान ली, बेटा प्रतिज्ञा सुनाकर चल दिया। जिस बूढ़े ने बिना पूछे सच कहा वह बाहर कर दिया गया। लक्ष्मण अकेले हैं जो पूछकर निकलते हैं, और वही शाम तक ज़मीन पर हैं।

प्रसंग यहीं रुकता है। शक्ति लग चुकी है, मूर्च्छा आ चुकी है, और शत्रु उन्हें उठाने में हारकर लौट गया है। आगे की बात अगले प्रसंग की है। कथा का आख़िरी शब्द न विजय है, न विलाप। एक वज़न है, जिसे सौ करोड़ हाथ नहीं उठा सके, और जिसे कथा जगत् का आधार कहती है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 46 से 54, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।