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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 8
औषधि, भरत का बाण और कुम्भकर्ण का जागना
एक ही रात में दो आदमी बचाये जाते हैं। एक वैद्य की दवा से और एक राम के भाई के पहचान लेने से। और दोनों बचाव एक वानर की उड़ान पर टँगे हैं।
यह प्रसंग एक ही रात का है, और उस रात दो आदमी बचाये जाते हैं: एक वैद्य की दवा से, दूसरा राम के भाई के पहचान लेने से। दोनों बचाव एक ही दौड़ पर टँगे हैं: एक वानर आकाश में उड़ रहा है, हाथ में पूरा पहाड़ है, और सूरज उगने से पहले उसे लौटना है। बीच में जो कुछ आता है, वह इसी दौड़ को रोकने आता है।
इस प्रसंग की कथा तीन जगह चलती है। लङ्का में रावण है, जो पहले एक मायावी को भेजता है और फिर, हारकर, अपने सोये भाई को जगाने जाता है। युद्धभूमि पर लक्ष्मण अचेत पड़े हैं और राम उनके सिरहाने बैठकर वे बातें कह रहे हैं जो कोई ईश्वर नहीं कहता। और दूर उत्तर में अवधपुरी है, जहाँ एक आदमी चौदह बरस से प्रतीक्षा कर रहा है और आज रात उसका धनुष उठ जाता है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यहाँ का ब्योरा मानस का अपना है। इस पूरे प्रसंग में न उस पर्वत का नाम आता है, न उस औषधि का। कथा इतना ही कहती है कि सुषेण ने नाम बताया, और उस नाम को दोहराती नहीं। जो नाम आगे की परम्परा में प्रसिद्ध हुए, वे यहाँ नहीं हैं।
एक रात, तीन ठिकाने
- राम सेना के स्वामी, जो इस रात अपने भाई के सिरहाने बैठकर वह विलाप करते हैं जिसे कथा मनुष्य के अनुसार कहा गया बताती है।
- लक्ष्मण जो रात भर अचेत पड़े रहते हैं, और जिनके उठ बैठने पर इस रात का सारा दौड़ना टिका है।
- हनुमान इस रात के दौड़नेवाले, जो पहले वैद्य को घर समेत उठा लाते हैं और फिर औषधि के बदले पूरा पर्वत।
- जाम्बवान् रीछों के बूढ़े राजा, जिन्हें ठीक उस क्षण याद आता है कि लङ्का में एक वैद्य रहता है।
- सुषेण लङ्का का वैद्य, जिसे शत्रु के नगर से उसके घर समेत उठा लाया जाता है और जो आते ही राम के चरणों में सिर नवाता है।
- रावण जो इस रात दो बार किसी और के भरोसे जाता है: पहले एक मायावी के घर, फिर अपने सोये भाई के पास।
- कालनेमि रावण का भेजा हुआ मायावी, जो रास्ते में आश्रम रचता है, और जो रावण को राम का भजन करने को भी कहता है।
- भरत अवध में बैठे राम के भाई, जिनका बाण इस रात की भूल है और जिनका बाण ही उसका उत्तर भी बनता है।
- कुम्भकर्ण रावण का भाई, जो जागते ही सच बोलता है और फिर भी उसी ओर से लड़ने चल देता है।
- विभीषण जो अब दूसरी ओर खड़े हैं और अपने बड़े भाई के सामने अपना नाम स्वयं बताकर पाँव छूते हैं।
संध्या, और एक वैद्य का नाम
दिन भर का युद्ध जहाँ रुकता है, वहीं से यह प्रसंग शुरू होता है। सन्ध्या होती है, दोनों ओर की सेनाएँ लौट पड़ती हैं, और सेनापति अपनी-अपनी टुकड़ियाँ सँभालने लगते हैं। लड़ाई अँधेरे के साथ रुकती है, और शोक अँधेरे के साथ शुरू होता है।
सन्ध्या का दृश्य खुलने से पहले कथा कहनेवाले शिव एक पल रुककर पार्वती से एक प्रश्न पूछते हैं। “जिनके क्रोध की अग्नि चौदहों भुवनों को पल भर में जला डालती है, जिनकी सेवा देवता, मनुष्य और सारा चराचर करता है, उन्हें संग्राम में कौन जीत सकता है?” पोद्दार की टीका बताती है कि यह प्रश्न शेषनाग के बारे में है, यानी उसी के बारे में जो इस समय एक मनुष्य का शरीर लिये अचेत पड़ा है।
शिव प्रश्न का उत्तर नहीं देते। वे उसके ऊपर एक वाक्य और रखते हैं: यह लीला वही जान सकता है जिस पर राम की कृपा हो। आगे इस रात ईश्वर अपने को मनुष्य की तरह दुखी होने देगा। उस दुख पर जिसे उलझन हो, उसके लिये यह बात पहले से रखी है।
अब युद्धभूमि। कथा राम को व्यापक, ब्रह्म, अजेय, भुवनेश्वर और करुणा की खान कहती है, और फिर उनका प्रश्न आता है, तीन शब्दों का: लक्ष्मण कहाँ हैं? विशेषणों और प्रश्न के बीच की यह दूरी ही सारी बात है। तब तक हनुमान उन्हें उठा लाते हैं, और छोटे भाई को उस दशा में देखकर राम बहुत दुखी होते हैं।
ऐसे क्षणों में कोई एक होता है जो रोने के बजाय काम की बात कहता है। यहाँ वह जाम्बवान् हैं। रीछों के ये बूढ़े राजा इस काण्ड में जब भी बोलते हैं, कोई उपाय ही बोलते हैं।
जाम्बवान् कहते हैं, “लङ्का में सुषेण वैद्य रहता है। उसे लाने किसे भेजा जाय?” दवा शत्रु के नगर में है। और प्रश्न पूरा होने से पहले ही उत्तर आ जाता है: किसी ने हाँ नहीं कही, किसी को चुना नहीं गया, हनुमान बस चले गये।
वे छोटा रूप धरकर गये, क्योंकि नगर में घुसना था, और लौटे तो उसे घर समेत ले आये। सुषेण से पूछा नहीं गया। उसका मकान उसके साथ उठा लिया गया। कथा अपनी हड़बड़ी अपने क्रियापदों में रखती है।
और लङ्का का यह वैद्य अभी अपने ही घर में नींद से उखाड़ा गया है। उतरते ही जो पहला काम वह करता है, वह न लड़ने का है, न गिड़गिड़ाने का।
सुषेण राम के चरणों में सिर नवाता है, फिर पर्वत और औषधि का नाम बताता है। नाम क्या था, यह कथा नहीं कहती। वह सीधे उस एक वाक्य पर चली जाती है जिसमें आदेश है: “हनुमान, लेने जाइये।” पूरे प्रसंग में इस औषधि का कोई नाम नहीं आता।
कालनेमि का घर
हनुमान राम के चरणों को हृदय में रखकर चलते हैं, और चलने से पहले अपना बल बखान जाते हैं, यानी कहते हैं कि अभी लिये आता हूँ। इस रात यही एक वाक्य है जिसमें वे अपने बारे में कुछ कहते हैं, और इसी की एक छाया आगे उन्हें एक बार ठोकर खिलायेगी।
उधर लङ्का में एक गुप्तचर रावण को यह भेद बता देता है, और रावण स्वयं उठकर कालनेमि के घर जाता है। लङ्का का राजा किसी के दरवाज़े पर जाता है। रात की हड़बड़ी उसके पाँवों में दिखती है, कहने में नहीं।
कालनेमि सारा हाल सुनता है और बार-बार अपना सिर पीटता है। फिर जो कहता है वह एक जानकार आदमी का वाक्य है: “जिसने आपके देखते-देखते नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है?” यह भय नहीं, हिसाब है। इस घर में सुन्दरकाण्ड की वह रात अब भी याद है।
और फिर रावण का भेजा जानेवाला मायावी, मरने से पहले, अपने स्वामी को उपदेश देने लगता है: “राम का भजन करके अपना कल्याण कीजिये। नाथ, झूठी बकवाद छोड़िये, और उनके नीलकमल जैसे सुन्दर श्याम रूप को हृदय में रखिये।”
वह आगे भी नहीं रुकता: “‘मैं’ और ‘मेरा’ की यह मूढ़ता छोड़िये। महामोह की रात में सो रहे हैं, जाग जाइये। जो कालरूपी सर्प को भी खा जाता है, उसे रण में स्वप्न में भी जीता जा सकता है क्या?” जो तर्क पहले नगर जलने से निकाला था, उसे अब वह ऊपर उठाकर रख देता है।
रावण यह सुनकर अत्यन्त क्रोधित होता है। और कालनेमि एक हिसाब लगाता है: उसके सामने अब दो ही मौतें हैं, और उसे उनमें से एक चुननी है।
कालनेमि मन में सोचता है, “राम के दूत के हाथों मरूँ, यही अच्छा। यह दुष्ट तो पाप के ढेर में डूबा है।” वह न बचने की सोचता है, न भागने की। केवल यह चुनता है कि किसका हाथ उसे मारे।
रास्ते में एक आश्रम
वह चलता है और मार्ग में माया रच देता है: एक तालाब, एक मन्दिर, और एक सुन्दर बाग। मार्ग पर जो रखा जाता है वह विश्राम है। जिसे तेज़ चलने से रोकना हो, उसके रास्ते में दीवार नहीं, छाया रखी जाती है।
हनुमान वह सुन्दर आश्रम देखकर सोचते हैं, “मुनि से पूछकर जल पी लूँ, तो थकावट दूर हो जाय।” पूरी दौड़ में यही एक जगह है जहाँ वे अपनी थकान स्वीकार करते हैं, और वह भी किसी से कहते नहीं, बस मन में उठती है। माया का निशाना ठीक यही आधा वाक्य था।
राक्षस वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाये बैठा है। कथा की टिप्पणी छोटी है: जो स्वयं माया का स्वामी है, उसी के दूत को माया से मोहने की तैयारी। हनुमान जाकर मस्तक नवाते हैं, और वह राम के गुणों की कथा कहने लगता है।
उसकी बातें बिलकुल ठीक हैं, यही उनका दोष है: “रावण और राम में महायुद्ध हो रहा है। राम जीतेंगे, इसमें संशय नहीं। भाई, मैं यहीं रहकर सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टि का बड़ा बल है।” सुननेवाला जो पहले से मानता है वही कह दिया गया, और अपने बारे में एक छोटा-सा वाक्य उसके साथ नत्थी कर दिया गया।
हनुमान जल माँगते हैं। वह कमण्डलु आगे कर देता है। हनुमान कहते हैं, “इतने थोड़े जल से मैं तृप्त नहीं होऊँगा।” और यहीं जाल की गाँठ कसती है: “तालाब में स्नान करके तुरन्त लौट आइये। मैं आपको दीक्षा दूँ, जिससे ज्ञान मिले।” देर करवाने की तरकीब भी उतावली की भाषा में बोली जा रही है।
तालाब में पैठते ही एक मगरी अकुलाकर उनका पैर पकड़ लेती है। हनुमान उसे मार डालते हैं, और मरते ही वह दिव्य शरीर धारण करके विमान पर चढ़कर आकाश की ओर चल देती है। जिस जलाशय को फँसाने के लिये बनाया गया था, उसी में से बचाव निकल आता है।
आकाश से वह कहती है, “आपके दर्शन से मैं पापरहित हो गयी। श्रेष्ठ मुनि का शाप मिट गया। यह मुनि नहीं, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानिये।” माया ने अपने ही भीतर वह जीव पाल रखा था जो उसका भेद खोल देगा।
अप्सरा के जाते ही हनुमान निशाचर के पास लौटते हैं, और जो कहते हैं उसमें उनका स्वभाव खुल जाता है। न गाली, न ललकार: “मुनि, पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। मन्त्र पीछे दीजियेगा।” शिष्टाचार को हथियार बनाकर चलाया जाय, तो ऐसा चलता है।
दक्षिणा यही थी: सिर को पूँछ में लपेटकर पछाड़ दिया, और मरते समय उसने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। पर आगे जो होता है वह अप्रत्याशित है: मरते हुए उसने “राम, राम” कहकर प्राण छोड़े, और वह सुनकर हनुमान मन में हर्षित होकर चल दिये।
जो उन्हें रोकने भेजा गया था, वह उसी नाम के साथ जाता है जिसके काम से वे निकले थे, और जिसने उसे मारा वही उसके लिये प्रसन्न होता है। कथा इस पर कोई टिप्पणी नहीं करती।
पर्वत, और अवधपुरी के ऊपर
अब वे पर्वत पर पहुँचते हैं, और सारी बाधाओं के बाद अन्तिम बाधा यह निकलती है कि वे औषधि पहचान नहीं पाते।
समाधान एक शब्द में है: सहसा। न सोचा, न तौला, न किसी से पूछा। जो पहचान से नहीं मिला, वह आकार से निकाल लिया गया। औषधि नहीं पहचानी गयी तो पूरा पर्वत उखाड़ लिया।
और लौटने का रास्ता अवधपुरी के ऊपर से निकलता है। नीचे वह नगर है जो चौदह बरस से प्रतीक्षा कर रहा है। ऊपर, रात में, एक अत्यन्त विशाल आकृति पहाड़ लिये आकाश में दौड़ी जा रही है।
नीचे बैठे आदमी ने प्रतीक्षा करते हुए क्षत्रिय होना बन्द नहीं किया है। वह आकाश देखता है, मन में अनुमान करता है कि यह कोई राक्षस है, और उसका हाथ धनुष पर चला जाता है।
ज़रूरी बात छोटी है: बिना फल का बाण। धनुष कान तक खींचा गया, यानी पूरी ताक़त से चलाया गया, और फिर भी बाण की नोक उतार दी गयी थी। भरत ने उसे राक्षस मान लिया था, और फिर भी मारने के लिये नहीं चलाया।

कान तक खिंचा धनुष उस भाई का है जो राज्य की रखवाली कर रहा है। बिना फल का बाण उस भाई का है जो चौदह बरस से किसी का बुरा नहीं सोच पाया। दोनों एक ही क्षण में, एक ही हाथ से।
जो गिरा, और जिसने गिराया
गिरते हुए जो आवाज़ नीचे पहुँचती है, वह पीड़ा की नहीं, एक नाम की है। बाण लगते ही हनुमान “राम, राम” कहते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिरते हैं। और भरत उस आवाज़ को प्रिय वचन के रूप में पहचानते हैं। उन्हें यह पता नहीं चलता कि किसे मारा। पता चलता है कि किसका नाम लेनेवाले को मारा।
वे दौड़कर बड़ी उतावली से पास पहुँचते हैं, व्याकुल देखकर उठाकर हृदय से लगा लेते हैं, और बहुत तरह से जगाते हैं, पर हनुमान जागते नहीं। भरत का मुख उदास हो जाता है, मन दुखी, और नेत्रों में पानी भरकर वे बोलना शुरू करते हैं।
वे पछतावे की भाषा में नहीं बोलते। वे इसे उसी मुक़दमे में जोड़ लेते हैं जो चौदह बरस से उनके भीतर चल रहा है। “जिस विधाता ने मुझे राम से विमुख किया, उसी ने फिर यह दारुण दुख भी दिया।”
और फिर वे साहस का काम करते हैं। उनके पास न वैद्य है, न औषधि, न कोई विद्या। एक ही चीज़ है, और वे उसी को दाँव पर लगा देते हैं: “यदि मन, वचन और शरीर से राम के चरणों में मेरा निष्कपट प्रेम हो…”
“…और यदि राम मुझ पर अनुकूल हों, तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाय।” न आज्ञा, न वरदान, न सीधी प्रार्थना। दो शर्तें, और दोनों अपने ही ऊपर। अपना सारा जीवन तराज़ू के एक पलड़े पर रखकर वे एक अनजान वानर के प्राण दूसरे पलड़े में माँग रहे हैं।
और वाक्य पूरा होते ही, सुनते ही, हनुमान “राम की जय हो, जय हो” कहते हुए उठ बैठते हैं। यहाँ उपाय बाद में काम करेगा। प्रेम अभी काम करता है।
भरत उन्हें हृदय से लगा लेते हैं, शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्रों में जल भर आता है, और राम का स्मरण करके हृदय में प्रीति समाती नहीं। जिसे उन्होंने अभी गिराया था, वही अब उनकी छाती से लगा है, और बीच में जो हुआ उसका नाम शर्मिन्दगी नहीं है।
एक बाण पर सवारी
होश में आये वानर से भरत यह नहीं पूछते कि आप कौन हैं। वे कुशल पूछते हैं: “तात, छोटे भाई और माता सीता सहित राम की कुशल कहिये।” चौदह बरस में जो एक सूचना चाहिये थी, वह आधी रात में आकाश से गिरे एक अजनबी से मिल रही है।
हनुमान संक्षेप में सारा चरित कह देते हैं, संक्षेप में, क्योंकि पहाड़ हाथ में है और रात बीत रही है। सुनकर भरत दुखी होते हैं और मन में पछताते हैं। उनका पछतावा उसी घाव से निकलता है जो इस कथा में उनके साथ चलता है: “हा दैव, मैं जगत् में क्यों जन्मा? प्रभु के एक भी काम न आया।”
और यह कहनेवाला उसी क्षण रुक जाता है: यह समय इसका नहीं है, यह जानकर वे मन में धीरज धरते हैं और शोक एक तरफ़ रख देते हैं। फिर वे बलवीर की तरह बोलते हैं, और अब जो कहते हैं वह विलाप नहीं, हिसाब है।
“तात, आपको जाने में देर होगी, और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा।” रात कितनी बीत चुकी है, यह अवध में बैठे आदमी को नहीं मालूम, पर इतना मालूम है कि दूरी बहुत है और घड़ी थोड़ी। इसलिये वे एक साहसी प्रस्ताव रखते हैं।
“पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाइये। मैं आपको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपा के धाम राम हैं।” जिस धनुष ने अभी इन्हें गिराया था, वही अब पहुँचाने को तैयार है। यह वही आदमी कह रहा है जिसने अभी अपने को राम के किसी काम का नहीं कहा था।
और यहाँ हनुमान के मन में एक क्षण के लिये अभिमान उठता है: “मेरे बोझ से यह बाण कैसे चलेगा?” फिर वे राम के प्रभाव का विचार करते हैं, और प्रश्न अपने-आप ढह जाता है। वे भरत के चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोलते हैं।
“नाथ, आपका प्रताप हृदय में रखकर मैं तुरन्त चला जाऊँगा।” बाण का उत्तर न हाँ में, न ना में। उससे वह चीज़ ले ली जिसकी सचमुच ज़रूरत थी, और वह सवारी नहीं थी। आज्ञा पाकर, चरणों की वन्दना करके, वे अपने ही बल से चल देते हैं।
कथा इसी को आगे बढ़ाती है: लौटते हुए हनुमान मन ही मन बार-बार भरत की सराहना करते जाते हैं। उनके बाहुबल की, उनके शील की, उनके गुणों की, और राम के चरणों में उनके अपार प्रेम की।
अवध के उस आदमी का परिचय इसी से उस सेना तक पहुँचा जिसने उसे कभी देखा नहीं था। जो कुछ देर पहले अपने को निकम्मा कह रहा था, उसकी प्रशंसा अब आकाश में उड़ती हुई साथ जा रही है।
उधर, आधी रात
अब कथा युद्धभूमि पर लौटती है। लक्ष्मण को देखकर राम जो वचन बोलते हैं, उन्हें कथा पहले ही नाम दे देती है: साधारण मनुष्य के अनुसार। आगे जो सुनने को मिलेगा, वह मनुष्य के अनुसार है।
“आधी रात बीत गयी, हनुमान नहीं आये।” यह कहकर राम छोटे भाई को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। यहाँ से एक लम्बा एकालाप शुरू होता है, और उसमें युद्ध का एक भी शब्द नहीं आता।
पहला उलाहना वही है जो हर शोक में पहले आता है, कि आप ऐसे तो नहीं थे: “भाई, आप मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। आपका स्वभाव सदा से कोमल था। मेरे हित के लिये आपने माता-पिता तक छोड़ दिये, और वन में जाड़ा, गरमी और हवा सब सह ली।”
फिर ऐसे प्रश्न जो कोई उत्तर नहीं चाहते: “वह अनुराग अब कहाँ है? मेरे व्याकुल वचन सुनकर उठते क्यों नहीं?” और उसके ठीक बाद वह वाक्य जिसकी किसी को आशा नहीं होती: “यदि मैं जानता कि वन में भाई का विछोह होगा, तो मैं पिता का वचन भी न मानता।”
अयोध्याकाण्ड में इस आदमी के लिये पिता का वचन ही सारा धर्म था। उसने उसी वचन पर राजपाट छोड़ा और चौदह बरस वन चुना। वह आज कह रहा है कि यह क़ीमत मालूम होती तो वह वचन भी न मानता।
“पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार, ये जगत् में बार-बार होते और जाते रहते हैं, पर सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। ऐसा विचारकर, तात, जागिये।” यह बात इस प्रसंग से निकलकर बहुत दूर तक दोहरायी जाती है।
फिर उपमाएँ आती हैं, जिनसे वे अपने आगे के जीवन का नक़्शा खींचते हैं: पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प, और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी। आशय, पोद्दार की टीका के अनुसार: “यदि जड़ दैव मुझे जिलाये रखे, तो आपके बिना मेरा जीवन ऐसा ही होगा।”
फिर लाज की बात उठती है: “स्त्री के लिये प्यारे भाई को खोकर मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? इससे तो अच्छा था कि जगत् में बदनामी सह लेता। स्त्री की हानि से कोई विशेष क्षति न थी।” यह सीता के प्रति उपेक्षा नहीं। यह शोक का वह क्षण है जिसमें आदमी अपने ही निर्णय को उलटकर देखता है।
और अन्त में विलाप वहाँ पहुँचता है जहाँ उसे पहुँचना था, सुमित्रा के पास: “आप अपनी माता के एक ही पुत्र हैं और उनके प्राणों के आधार हैं। उन्होंने हाथ पकड़कर आपको मुझे सौंपा था, यह जानकर कि मैं सब प्रकार से सुख देनेवाला हूँ। अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? भाई, उठकर मुझे सिखाते क्यों नहीं?”
फिर दृश्य बाहर से दिखता है: सोच से छुड़ानेवाले स्वयं सोच कर रहे हैं, और उनके नेत्रों से जल बह रहा है। और शिव पार्वती से कहते हैं, “पार्वती, राम एक और अखण्ड हैं। कृपालु ने भक्तों के लिये मनुष्य की गति दिखायी है।” जो प्रश्न सन्ध्या के समय रखा गया था, उसका उत्तर यहाँ आकर बैठ जाता है।
और वानरों का समूह यह प्रलाप कानों से सुनकर व्याकुल हो जाता है। पूरी सेना उसी एक आवाज़ से टूट रही है जिसके भरोसे वह समुद्र पार आयी थी। और ठीक इसी घड़ी दरवाज़ा खुलता है।
हनुमान आ गये, जैसे करुण रस में वीर रस आ गया हो। उपमा काव्य के रसों से ली गयी है। अब तक करुण था, अब वीर आता है, और कथा करवट लेती है।
औषधि, और उठ बैठना
पूरी रात का फल एक वाक्य में निपट जाता है: वैद्य ने तुरन्त उपाय किया और लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठे। न औषधि का नाम, न विधि का वर्णन, न चमत्कार का दृश्य। जिस काम के लिये पहाड़ उखाड़ा गया, मायावी मारा गया और अवध में एक धनुष उठा, वह एक वाक्य में हो जाता है।
इस रात का समय उपचार पर नहीं लगा। समय लगा एक भाई की प्रतीक्षा में, दूसरे भाई की भूल में, और तीसरे भाई के विलाप में। उपाय को बस इतनी जगह मिली जितनी में वह काम कर सके।
राम हर्षित होकर हनुमान से गले लगकर मिले, और कथा उसी साँस में कहती है कि राम परम सुजान और अत्यन्त कृतज्ञ हैं। जिसने अभी मनुष्य की तरह रोकर दिखाया, वह अब मनुष्य की तरह आभार भी मानता है।
फिर राम भाई को हृदय से लगाकर मिलते हैं, और रीछों तथा वानरों के सारे समूह हर्षित हो जाते हैं। थोड़ी देर पहले जो सेना व्याकुल होकर बिखरने को थी, वह एक ही दृश्य से फिर खड़ी हो जाती है।
और इसके तुरन्त बाद: हनुमान वैद्य को उसी तरह वापस पहुँचा आये जिस तरह उसे लाये थे। शत्रु के नगर से जिसे घर समेत उठाया गया था, उसे उसी घर में वापस रख दिया गया। न पक्ष बदलने को कहा गया, न बन्दी बनाया गया।
कुम्भकर्ण का जागना
यह समाचार सुनकर रावण अत्यन्त विषाद से बार-बार सिर पीटता है। इस रात पहले कालनेमि ने सिर पीटा था। एक ही रात में स्वामी और सेवक दोनों ने वही किया।
और फिर वह व्याकुल होकर वहाँ जाता है जहाँ जाने के सिवा अब कुछ नहीं बचा: अपने भाई के पास। कथा कुम्भकर्ण को जगाने का कोई तमाशा नहीं करती। बस इतना कहती है कि बहुत-से उपाय करके उसने उसे जगाया।
जागा हुआ वह ऐसा दीखता है मानो काल ही शरीर धारण करके बैठ गया हो: लङ्का के शत्रुओं के लिये भी, और लङ्का के लिये भी।
और नींद से उठा यह विशालकाय न लड़ाई पूछता है, न शत्रु: “भाई, कहिये तो, आपके मुख सूख क्यों रहे हैं?” जो जागते ही चेहरे पढ़ ले, वह सोया हुआ आलसी नहीं होता।
रावण उसे सारी कथा सुनाता है, वहीं से जहाँ से वह सीता को हर लाया था। फिर वर्तमान पर आता है: “तात, वानरों ने सब राक्षस मार डाले, बड़े-बड़े योद्धाओं तक का संहार कर डाला।”
और फिर नामों की सूची, जो युद्ध के समाचार को शोक बना देती है। दुर्मुख, देवशत्रु, मनुष्यभक्षक, भारी योद्धा अतिकाय, अकम्पन, और महोदर आदि दूसरे सब रणधीर, सब रणभूमि में पड़े हैं।
सुनकर कुम्भकर्ण बिलखता है, और उसका पहला वाक्य सलाह नहीं, निदान है: “जगज्जननी को हर लाकर अब आप कल्याण चाहते हैं?” वह सीता को जगज्जननी कहता है, और यह कहनेवाला अभी-अभी नींद से उठा है।
फिर उलाहना: “राक्षसराज, आपने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे जगाया किसलिये? तात, अब भी अभिमान छोड़कर राम को भजिये, तो कल्याण होगा।” यही बात इस रात पहले कालनेमि कह चुका है, उससे पहले और लोग, और अब अपना ही भाई।
आगे वह हनुमान का नाम लेकर पूछता है, “जिनके हनुमान जैसे सेवक हैं, वे राम क्या मनुष्य हैं?” तर्क का ढाँचा वही है जो कालनेमि ने रावण के सामने रखा था, और दोनों ने उसे एक ही साक्ष्य पर खड़ा किया: उस वानर पर।
फिर वह शिकायत जो केवल भाई कर सकता है: “हाय भाई, आपने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया।” उसका दुख यह है कि उससे समय पर नहीं कहा गया, और अब जो बचा है वह केवल अन्त है।
फिर वह बड़ी बात कहता है: “आपने उस परम देवता का विरोध किया जिसके शिव और ब्रह्मा तक सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं आपसे कहता, पर अब समय निकल गया।” यह ब्योरा मानस का अपना है। इस राक्षस के पास नारद का दिया ज्ञान रखा है, और उसे कहने का समय नहीं बचा।
फिर वह भाई से गले मिलने को कहता है: “भाई, अब अँकवार भरकर मुझसे मिल लीजिये। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ, तीनों तापों से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर राम के दर्शन कर आऊँ।” यह आदमी युद्धभूमि पर जीतने नहीं, देखने जा रहा है। कथा इसे एक वाक्य में पक्का कर देती है: राम के रूप और गुण का स्मरण करके वह एक क्षण के लिये प्रेम में मग्न हो जाता है।
और अगला ही वाक्य उस क्षण को तोड़ देता है: रावण ने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेक भैंसे मँगवाये। एक वाक्य में डूबना, अगले में तैयारी। जिसे सब कुछ दीखता है, उसके पाँव फिर भी उसी ओर जाते हैं जिधर उसका कुल जा रहा है।
किला छोड़कर, बिना सेना के
भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्रपात के समान गरजता है।
मद से चूर और रण के उत्साह से भरा कुम्भकर्ण किला छोड़कर चल देता है, और सेना साथ नहीं लेता। लङ्का का इतना बड़ा योद्धा युद्ध में अकेला जा रहा है: अहंकार भी, और एक तरह की उदासीनता भी।
रास्ते में विभीषण आगे आते हैं, उसके चरणों पर गिरते हैं, और अपना नाम स्वयं सुनाते हैं। अपने ही बड़े भाई के सामने खड़े होकर उन्हें बताना पड़ रहा है कि वे कौन हैं। घर छोड़ देने पर आदमी को यही करना पड़ता है।
कुम्भकर्ण छोटे भाई को उठाकर हृदय से लगा लेता है, और राम का भक्त जानकर विभीषण उसके मन को प्रिय लगते हैं। जिस बात पर रावण ने लात मारी थी, उसी बात पर यह भाई उसे छाती से लगा रहा है। एक ही कुल के दो भाई, एक ही सूचना पर, दो सिरे।
विभीषण भी उलाहना नहीं देते: “तात, परम हितकर सलाह कहने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं राम के पास चला आया, और दीन देखकर मैं प्रभु के मन को प्रिय लगा।” घर से निकाले हुए आदमी की सारी कथा दो वाक्यों में है, और उसका अन्त शिकायत पर नहीं, आश्रय पर होता है।
कुम्भकर्ण का उत्तर वह सच है जिसे वह अपने ऊपर लागू नहीं कर पाया: “पुत्र, सुनिये, रावण तो काल के वश हो गया है। वह अब उत्तम सीख क्या मानेगा? विभीषण, आप धन्य हैं, धन्य हैं, धन्य हैं। तात, आप राक्षसकुल के भूषण हो गये।”
“भाई, आपने अपने वंश को उजागर कर दिया, जो शोभा और सुख के समुद्र राम को भजा।” यह कहकर वह अपनी अन्तिम सीख देता है, और उसके भीतर अपनी अन्तिम स्वीकारोक्ति भी रख देता है।
“मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर राम का भजन कीजिये। अब जाइये। मुझे अपना-पराया नहीं सूझता, मैं काल के वश हो गया हूँ।” वह जानता है, पर जानना उसके पाँव नहीं मोड़ पाता। वह उसी दिशा में चलता चला जाता है जिधर उसका कुल जा रहा है, और भाई को हटा देता है ताकि वह रास्ते में न आये।
प्रसंग यहीं रुकता है। एक ओर लक्ष्मण उठ बैठे हैं और सेना फिर खड़ी है। दूसरी ओर एक अकेला आदमी किला छोड़कर बिना सेना के चला आ रहा है, अपनी हार पहले से जानता हुआ, और अपने शत्रु के दर्शन की इच्छा लेकर। अगला प्रसंग इसी के नाम है।
भाइयों के सिरहाने
इस रात चार आदमी अपने भाइयों के पास बैठते हैं: राम लक्ष्मण के पास, भरत उस वानर के पास जिसे उन्होंने गिराया। रावण कुम्भकर्ण के पास, और कुम्भकर्ण विभीषण के पास। चारों में गले लगना है, और आँसू या ग्लानि। पर तीन जगह भाई भाई के पास सहायता देने जाता है, और एक जगह सहायता लेने।
चौदह बरस से प्रतीक्षा करते भरत एक रात अपने ही उपकारी को राक्षस समझकर गिरा देते हैं। फिर उसे उठाने के लिये उनके पास अपने प्रेम के सिवा कुछ नहीं होता: न वैद्य, न औषधि, न पर्वत। और वही काम कर जाता है।
और उसी रात, दूर, एक दूसरा आदमी अपने भाई के सिरहाने बैठा कह रहा है कि सहोदर भाई फिर नहीं मिलता। दो जगहों के दो दुख, एक ही रात की दो घड़ियाँ, और बीच में एक वानर जो उड़ रहा है।
इस रात रावण को राम का भजन करने के लिये दो लोग कहते हैं। दोनों राक्षस हैं: कालनेमि, जिसे वह भेज रहा है, और कुम्भकर्ण, जो उसके लिये लड़ने जा रहा है। तीसरा राक्षस वह है जो यही बात पहले कह चुका था और जिसे इसी पर लात पड़ी थी। प्रसंग के अन्त में उसी को उसका बड़ा भाई धन्य कहकर विदा करता है। सच किसी के भी मुँह से निकल सकता है, और उसे सुनकर भी न मानने की छूट बची रहती है।
हनुमान का मार्ग यहाँ अवधपुरी के ऊपर से जाता है, और कथा यही नगर नाम लेती है।
वाल्मीकि के युद्धकाण्ड में पर्वत दो बार उठता है: सर्ग 74 में जाम्बवान् के कहने पर हनुमान हिमालय से ओषधियों वाला शिखर लाते हैं। और सर्ग 101 में सुषेण के कहने पर महोदय पर्वत की ओर जाते हैं। दोनों बार रास्ते में न कालनेमि है, न भरत का बाण। कालनेमि का उपदेश, तालाब की मगरी, भरत का बिना फल का बाण, बाण पर सवारी का प्रस्ताव, और कुम्भकर्ण के मुँह से निकला जगज्जननी शब्द। ये सब ब्योरे मानस के अपने हैं, और दोनों ग्रन्थ अपने-अपने घर में पूरे हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 55 से 64, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।