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औषधि, भरत का बाण और कुम्भकर्ण का जागना

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · औषधि, भरत का बाण और कुम्भकर्ण का जागना

औषधि, भरत का बाण और कुम्भकर्ण का जागना

एक ही रात में दो आदमी बचाये जाते हैं, एक वैद्य की दवा से और एक अपने भाई के पहचान लेने से, और दोनों बचाव एक वानर की उड़ान पर टँगे हैं।

यह पन्ना एक ही रात का है, और उस रात में दो आदमी बचाये जाते हैं। एक वैद्य की दवा से बचता है और दूसरा अपने भाई के पहचान लेने से। दोनों बचाव एक ही दौड़ पर टँगे हुए हैं: एक वानर आकाश में उड़ रहा है, उसके हाथ में एक पूरा पहाड़ है, और सूरज उगने से पहले उसे लौट आना है। इस रात में जो कुछ भी बीच में आता है, वह इसी दौड़ को रोकने के लिये आता है, और हर बार किसी और ही तरह से रुकता है।

दोहा पचपन से चौंसठ तक की यह कथा एक साथ तीन जगहों पर चलती है। लङ्का में रावण है, जो पहले एक मायावी को भेजता है और फिर, हारकर, अपने सोये हुए भाई को जगाने जाता है। समुद्र के इस पार युद्धभूमि है, जहाँ लक्ष्मण अचेत पड़े हैं और राम उनके सिरहाने बैठकर वे बातें कह रहे हैं जो कोई ईश्वर नहीं कहता। और इन दोनों के बीच, बहुत दूर उत्तर में, अवधपुरी है, जहाँ एक आदमी चौदह बरस से प्रतीक्षा कर रहा है और आज रात उसका धनुष उठ जाता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यहाँ का ब्योरा तुलसी का अपना है। इस पूरे प्रसंग में न उस पर्वत का नाम आता है और न उस औषधि का। दोहा पचपन इतना ही कहता है कि सुषेण ने नाम बताया, और पाठ उस नाम को दोहराता नहीं। जो नाम आगे की परम्परा में प्रसिद्ध हुए, वे इन चौपाइयों में नहीं हैं, इसलिये इस पन्ने पर भी नहीं हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम सेना के स्वामी, जो इस रात अपने भाई के सिरहाने बैठकर वह विलाप करते हैं जिसे तुलसी स्वयं मनुष्य की चाल कहकर दिखाते हैं।
  • लक्ष्मण जो पूरे पन्ने पर अचेत पड़े रहते हैं, और जिनके उठ बैठने पर इस रात का सारा दौड़ना टिका हुआ है।
  • हनुमान् इस रात के दौड़नेवाले, जो पहले वैद्य को घरसमेत उठा लाते हैं और फिर औषधि के बदले पूरा पर्वत।
  • जाम्बवान् रीछों के बूढ़े राजा, जिन्हें ठीक उस क्षण याद आता है कि लङ्का में एक वैद्य रहता है।
  • सुषेण लङ्का का वैद्य, जिसे शत्रु के नगर से उसके घरसहित उठा लाया जाता है और जो आते ही राम के चरणों में सिर नवाता है।
  • रावण जो इस रात दो बार किसी और के भरोसे जाता है: पहले एक मायावी के घर, फिर अपने सोये हुए भाई के पास।
  • कालनेमि रावण का भेजा हुआ मायावी, जो रास्ते में आश्रम रचता है और जिसके मुँह से तुलसी राम का भजन कहलवाते हैं।
  • भरत अवध में बैठे हुए राम के भाई, जिनका बाण इस पन्ने की सबसे बड़ी भूल है और जिनका बाण ही उसका उत्तर भी बनता है।
  • कुम्भकर्ण रावण का भाई, जो जागते ही सच बोलता है और फिर भी उसी ओर से लड़ने चल देता है।
  • विभीषण जो अब दूसरी ओर खड़े हैं और अपने बड़े भाई के सामने अपना नाम स्वयं बताकर पाँव छूते हैं।

संध्या, और एक वैद्य का नाम

दिन भर का युद्ध जहाँ रुकता है, वहीं से यह पन्ना शुरू होता है। सन्ध्या होती है और दोनों ओर की सेनाएँ लौट पड़ती हैं। सेनापति अपनी-अपनी टुकड़ियाँ सँभालने लगते हैं, गिनती होती है, घायलों को उठाया जाता है, और जो नहीं लौटे उनका हिसाब अगली सुबह पर छोड़ दिया जाता है। युद्ध की यही एक रीति है जो हर युग में एक जैसी रहती है: लड़ाई अँधेरे के साथ रुक जाती है, और शोक अँधेरे के साथ शुरू होता है।

इससे पहले कि तुलसी हमें बतायें कि इस सन्ध्या को किस दशा में उतरना है, कथा का कहनेवाला एक पल के लिये रुकता है। यह पूरा रामचरितमानस शंकर पार्वती से कह रहे हैं, और यहाँ वे पार्वती को सम्बोधित करके एक प्रश्न पूछते हैं। जिनके क्रोध की अग्नि चौदहों भुवनों को पल भर में जला डालती है, जिनकी सेवा देवता, मनुष्य और सारा चराचर करता है, उन्हें संग्राम में कौन जीत सकता है? पोद्दार की टीका इस प्रश्न को शेषनाग का बताती है, अर्थात् उसी का, जो इस समय एक मनुष्य की देह लिये अचेत पड़ा है।

प्रश्न का उत्तर तुलसी नहीं देते। वे उसके ऊपर एक और वाक्य रख देते हैं: यह कौतुक वही जान सकता है जिस पर राम की कृपा हो। यही इस पन्ने की चाबी है। आगे जो कुछ होगा उसमें ईश्वर अपने को मनुष्य की तरह दुखी होने देगा, और उस दुख को देखकर जिसे उलझन हो, उसके लिये यह पंक्ति पहले ही रख दी गयी है।

अब दृश्य में लौटिये। व्यापक, ब्रह्म, अजित, भुवनेश्वर और करुणा की खान, इतने विशेषण एक साथ रखकर तुलसी जो वाक्य कहलवाते हैं वह तीन शब्दों का है: लक्ष्मण कहाँ हैं। विशेषणों और प्रश्न के बीच की यह दूरी ही सारी बात है। तब तक हनुमान् उन्हें उठाकर ले आते हैं, और छोटे भाई को उस दशा में देखकर प्रभु बहुत दुखी होते हैं।

ऐसे क्षणों में कोई एक होता है जो रोने के बजाय काम की बात कहता है। यहाँ वह जाम्बवान् हैं। रीछों के इस बूढ़े राजा को इस पूरे काण्ड में जब भी बोलते देखिये, वे हमेशा कोई उपाय ही बोलते हैं।

जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥

चौपाई १

इस चौपाई की दो बातें देखने लायक हैं। पहली, वैद्य लङ्का में रहता है। अर्थात् दवा शत्रु के नगर में है, और उसे वहाँ से लाना पड़ेगा। दूसरी, जाम्बवान् का वाक्य प्रश्न पर खत्म होता है: किसको भेजा जाय। और प्रश्न पूरा होने से पहले ही चौपाई का दूसरा चरण उत्तर दे देता है। किसी ने हाँ नहीं कही, किसी को चुना नहीं गया, हनुमान् बस चले गये।

जिस तरह वे गये, वह भी ब्योरे की बात है। धरि लघु रूप, छोटा रूप धरकर, क्योंकि नगर में घुसना है और किसी की नींद नहीं तोड़नी। और जब लौटे तो आनेउ भवन समेत, घरसमेत ले आये। सुषेण से पूछा नहीं गया, बुलाया नहीं गया, उसका मकान उसके साथ उठा लिया गया। यह कथा अपनी हड़बड़ी अपने क्रियापदों में रखती है।

और लङ्का का यह वैद्य, जो अभी-अभी अपने ही घर में अपनी नींद से उखाड़ा गया है, उतरते ही जो पहला काम करता है वह लड़ने या गिड़गिड़ाने का नहीं है।

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥ ५५॥

दोहा ५५

दोहा कहता है कि उसने पर्वत और औषधि का नाम बताया। नाम क्या था, यह दोहा नहीं कहता। तुलसी उसे पन्ने से बाहर रख देते हैं, और कथा को उस एक वाक्य पर चला देते हैं जिसमें आदेश है: हे पवनपुत्र, लेने जाओ। पूरे प्रसंग में इस औषधि का कोई और नाम नहीं आता, और हम भी उसे यहाँ नहीं बुलायेंगे।

सार: सन्ध्या को दोनों सेनाएँ लौटती हैं, राम अचेत लक्ष्मण के पास बैठते हैं, जाम्बवान् लङ्कावासी वैद्य सुषेण का नाम लेते हैं, और हनुमान् उसे घरसमेत उठा लाते हैं। सुषेण पर्वत और औषधि का नाम बताकर हनुमान् को लेने भेजता है।

कालनेमि का घर

हनुमान् राम के चरणकमलों को हृदय में रखकर चलते हैं, और चलने से पहले अपना बल बखान जाते हैं, अर्थात् यह कहकर जाते हैं कि अभी लिये आता हूँ। इस पन्ने पर उनका यही एक वाक्य ऐसा है जिसमें वे अपने बारे में कुछ कहते हैं, और आगे इसी की एक छाया उन्हें एक बार ठोकर भी खिलायेगी।

उधर लङ्का में एक गुप्तचर रावण को यह भेद बता देता है। और अब वह होता है जो रावण की सभा के किसी भी दृश्य से ज़्यादा बताता है: रावण स्वयं उठकर कालनेमि के घर जाता है। दस सिरोंवाला लङ्कापति किसी के दरवाज़े पर जाता है। रात की यह हड़बड़ी उसके पाँवों में दिखती है, कहने में नहीं।

कालनेमि सारा मर्म सुनता है और बार-बार अपना सिर पीट लेता है। फिर जो कहता है वह एक कर्मचारी का नहीं, एक जानकार आदमी का वाक्य है: जिसने आपके देखते-देखते नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है। यह भय नहीं है, यह हिसाब है। इस घर में सुन्दरकाण्ड की वह रात अब भी याद है।

और फिर मायावी वह करता है जो तुलसी की सबसे प्यारी चालों में से एक है। रावण को मारने भेजा जानेवाला आदमी, मरने से ठीक पहले, अपने स्वामी को उपदेश देने लगता है।

भजु रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥
नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥

चौपाई २

वह आगे भी नहीं रुकता। मैं और मेरा, इस मूढ़ता को छोड़िये। महामोह की रात में सो रहे हैं, जाग जाइये। और फिर वही तर्क जो पहले नगर जलने से निकाला था, अब ऊपर उठाकर रख देता है: जो काल रूपी सर्प तक को खा जाता है, उसे रण में जीतना स्वप्न में भी सम्भव है क्या।

रावण यह सुनकर अत्यन्त क्रोधित होता है। और यहाँ कालनेमि एक ऐसा हिसाब लगाता है जो इस पूरे काण्ड में दूसरा कोई राक्षस नहीं लगाता। उसके सामने अब दो ही मौतें हैं, और उसे उनमें से एक चुननी है।

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।
राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥ ५६॥

दोहा ५६

राम के दूत के हाथों मरना उसे बेहतर लगता है, क्योंकि यह दुष्ट तो पाप के ढेर में डूबा हुआ है। ध्यान दीजिये कि वह बच निकलने की बात नहीं सोचता, न भागने की, न मना करने की। वह केवल यह चुनता है कि किसका हाथ उसे मारे। जो आदमी अपनी मृत्यु का हाथ चुन लेता है, वह मरने से पहले ही एक बार जीत चुका होता है।

सार: गुप्तचर से भेद पाकर रावण स्वयं कालनेमि के घर जाता है। कालनेमि उसे राम का भजन करने का उपदेश देता है, रावण क्रोधित होता है, और कालनेमि मन में तय कर लेता है कि मरना ही है तो राम के दूत के हाथ से मरे।

रास्ते में एक आश्रम

वह चलता है और मार्ग में माया रच देता है। एक तालाब, एक मन्दिर, और एक सुन्दर बाग। किसी सेना की घात नहीं, किसी जाल की डोर नहीं। उस मार्ग पर जो चीज़ रखी जाती है वह विश्राम है, और यह इस पूरे प्रसंग का सबसे चतुर वाक्य है। जिसे तेज़ चलने से रोकना हो, उसके रास्ते में दीवार नहीं, छाया रखी जाती है।

हनुमान् वह शुभ आश्रम देखते हैं और मन में सोचते हैं कि मुनि से पूछकर जल पी लें तो थकावट दूर हो जाय। इस पूरे पन्ने पर यही एक जगह है जहाँ वे अपनी थकान को स्वीकार करते हैं, और वह स्वीकार भी किसी से कहा नहीं जाता, बस मन में उठता है। माया का निशाना ठीक यही आधा वाक्य था।

राक्षस वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाये बैठा है। तुलसी इस दृश्य पर जो टिप्पणी करते हैं वह दो शब्दों की है: मायापति दूतहि चह मोहा। जो स्वयं माया का स्वामी है, उसी के दूत को माया से मोहने की तैयारी। हनुमान् जाकर मस्तक नवाते हैं, और वह राम के गुणों की कथा कहने लगता है।

उसकी बातें बिल्कुल ठीक हैं, यही उनका दोष है। रावण और राम में महायुद्ध हो रहा है, राम जीतेंगे, इसमें संशय नहीं, मैं यहीं बैठा सब देख रहा हूँ, मुझे ज्ञानदृष्टि का बड़ा बल है। झूठ बोलने का सबसे सधा हुआ तरीका यही है कि जो सुननेवाला पहले से मानता है, वही कह दिया जाय, और अपने बारे में एक छोटा-सा वाक्य उसके साथ नत्थी कर दिया जाय।

हनुमान् जल माँगते हैं। वह कमण्डलु आगे कर देता है। हनुमान् कहते हैं कि इतने थोड़े जल से तृप्ति नहीं होगी। और यहीं जाल की गाँठ कसी जाती है: तालाब में स्नान करके तुरंत लौट आइये, मैं दीक्षा दे दूँ जिससे ज्ञान मिल जाय। देर करवाने की तरकीब में भी उतावली की भाषा बोली जा रही है, यह ध्यान देने लायक है।

दोहा सत्तावन में जो होता है वह इस काण्ड के सबसे अनोखे दृश्यों में है। तालाब में पैठते ही एक मगरी अकुलाकर उनका पैर पकड़ लेती है। हनुमान् उसे मार डालते हैं। और मरते ही वह दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़कर आकाश की ओर चल देती है। जिस जलाशय को फँसाने के लिये बनाया गया था, उसी में से बचाव निकल आता है।

आकाश से वह कहती है कि आपके दर्शन से मैं पापरहित हो गयी और श्रेष्ठ मुनि का शाप मिट गया। फिर वह वाक्य, जिसके लिये यह सारा दृश्य रचा गया है: यह मुनि नहीं है, यह घोर निशाचर है, मेरा वचन सत्य मानिये। माया ने अपने ही भीतर वह जीव पाल रखा था जो उसका भेद खोल देगा, और उसे यह मालूम नहीं था।

अप्सरा के जाते ही हनुमान् निशाचर के पास लौटते हैं, और जो कहते हैं उसमें उनका सारा स्वभाव खुल जाता है। वे गाली नहीं देते, ललकारते नहीं। वे कहते हैं कि हे मुनि, पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये, मन्त्र पीछे दीजियेगा। शिष्टाचार को हथियार बनाकर चलाया गया हो, तो ऐसा चलता है।

सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥

चौपाई ३

दक्षिणा यही थी। सिर को पूँछ में लपेटकर पछाड़ दिया, और मरते समय उसने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। पर चौपाई यहाँ खत्म नहीं होती, और उसका बचा हुआ आधा इस पन्ने की सबसे अप्रत्याशित बात है। मरते हुए उसने राम राम कहकर प्राण छोड़े, और वह सुनकर हनुमान् मन में हर्षित होकर चल दिये।

जो आदमी उन्हें रोकने और मरवाने भेजा गया था, वह उसी नाम के साथ जाता है जिसके काम से वे निकले थे, और जिसने उसे मारा वही उसके लिये प्रसन्न होता है। तुलसी इस पर एक शब्द की टीका नहीं लगाते। वे बस अगली चौपाई पर चले जाते हैं, जैसे यह कोई असाधारण बात न हो।

सार: कालनेमि मार्ग में तालाब, मन्दिर और बाग की माया रचकर मुनि के वेष में बैठता है और हनुमान् को स्नान के बहाने रोकना चाहता है। तालाब की मगरी शापमुक्त होकर भेद खोल देती है, और हनुमान् गुरुदक्षिणा माँगकर उसे मार डालते हैं। मरते हुए वह राम का नाम लेता है।

पर्वत, और अवधपुरी के ऊपर

अब वे पर्वत पर पहुँचते हैं, और वहाँ वह होता है जिसकी तैयारी किसी ने नहीं की थी। सुषेण ने नाम बता दिया था, रास्ता निकल आया था, मायावी हट गया था। पर पर्वत पर खड़े होकर वे औषधि पहचान नहीं पाते। सारी बाधाएँ पार करने के बाद अन्तिम बाधा यह निकलती है कि दो पत्ते एक जैसे दिखते हैं।

देखा सैल न औषध चीन्हा । सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ । अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥

चौपाई ४

इस रात का सारा समाधान एक शब्द में है: सहसा। न सोचा, न तौला, न किसी से पूछा। जिस समस्या का उत्तर पहचान में नहीं मिला, उसका उत्तर आकार से निकाल लिया गया। औषधि नहीं पहचान सके तो पूरा पर्वत उखाड़ लिया। इसी एक क्रिया से यह प्रसंग उन चित्रों में बदल गया जो आज हर घर में टँगे मिलते हैं।

और लौटने का रास्ता अवधपुरी के ऊपर से निकलता है। तुलसी इसे एक अर्धाली में निपटा देते हैं, पर उसी अर्धाली में इस पन्ने का दूसरा हिस्सा खुल जाता है। नीचे वह नगर है जो चौदह बरस से प्रतीक्षा कर रहा है। ऊपर, रात में, एक अत्यन्त विशाल आकृति एक पहाड़ लिये आकाश में दौड़ी जा रही है।

नीचे जो आदमी बैठा है, उसने प्रतीक्षा करते हुए क्षत्रिय होना बन्द नहीं किया है। वह आकाश देखता है, अनुमान लगाता है कि यह कोई राक्षस है, और अनुमान लगाते ही उसका हाथ धनुष पर चला जाता है। जो नगर बिना राजा के चौदह बरस से पहरा दे रहा हो, उसके पहरेदार का हाथ ऐसा ही होता है।

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥ ५८॥

दोहा ५८

इस दोहे को धीरे पढ़िये, क्योंकि इसका सबसे ज़रूरी शब्द सबसे छोटा है। बिनु फर सायक, बिना फल का बाण। धनुष कान तक खींचा गया, अर्थात् पूरी ताक़त से चलाया गया, और फिर भी बाण की नोक उतार दी गयी थी। भरत ने उसे राक्षस मान लिया था और फिर भी मारने के लिये नहीं चलाया।

एक ही पंक्ति में तुलसी ने पूरा आदमी रख दिया है। कान तक खिंचा हुआ धनुष उस भाई का है जो राज्य की रखवाली कर रहा है। बिना फल का बाण उस भाई का है जो चौदह बरस से किसी का बुरा नहीं सोच पाया। दोनों एक ही क्षण में, एक ही हाथ से।

सार: पर्वत पर पहुँचकर हनुमान् औषधि नहीं पहचान पाते और सारा पर्वत ही उखाड़ लेते हैं। लौटते हुए उनका मार्ग रात में अवधपुरी के ऊपर से निकलता है, जहाँ भरत उन्हें राक्षस समझकर कान तक धनुष खींचकर बिना फल का बाण मारते हैं।

जो गिरा, और जिसने गिराया

परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक॥
सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥

चौपाई ५

गिरते हुए जो आवाज़ नीचे पहुँचती है वह पीड़ा की नहीं है, वह एक नाम है। बाण लगते ही हनुमान् राम राम रघुनायक कहते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिरते हैं। और भरत उस आवाज़ को जिस शब्द से पहचानते हैं वह तुलसी ने बहुत सोचकर रखा है: प्रिय बचन। उन्हें यह पता नहीं चलता कि किसे मारा, उन्हें यह पता चलता है कि किसका नाम लेनेवाले को मारा।

वे उठकर दौड़ते हैं और बड़ी उतावली से पास पहुँचते हैं। व्याकुल देखकर उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। बहुत तरह से जगाते हैं, पर वे जागते नहीं। मुख उदास हो जाता है, मन दुखी हो जाता है, और नेत्रों में पानी भरकर वे बोलना शुरू करते हैं।

अब जो वे कहते हैं, वह पछतावे की भाषा में नहीं है। वे यह नहीं कहते कि मुझसे भूल हुई। वे इसे अपने ही जीवन के उसी एक मुक़दमे में जोड़ लेते हैं जो चौदह बरस से उनके भीतर चल रहा है। जिस विधाता ने मुझे राम से विमुख किया, उसी ने फिर यह दारुण दुख भी दिया। सारी घटना उनके लिये एक ही चोट का अगला हिस्सा है।

और फिर वे वह करते हैं जो इस पन्ने पर सबसे साहस का काम है। उनके पास न वैद्य है, न औषधि, न कोई विद्या। उनके पास एक ही चीज़ है, और वे उसी को दाँव पर लगा देते हैं। यदि मन, वचन और शरीर से राम के चरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो, तो।

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥

चौपाई ६

वाक्य की बनावट देखिये। वे आरोग्य की आज्ञा नहीं देते, वरदान नहीं देते, प्रार्थना तक सीधे नहीं करते। वे दो शर्तें रखते हैं और दोनों अपने ही ऊपर हैं: यदि मेरा प्रेम निष्कपट है, और यदि रघुपति मुझ पर अनुकूल हैं। अपने सारे जीवन को तराज़ू के एक पलड़े पर रखकर वे एक अनजान वानर के प्राण दूसरे पलड़े में माँग रहे हैं।

और यह वाक्य पूरा होते ही, सुनते ही, कपिराज उठ बैठते हैं और कोसलाधीश की जय बोलते हैं। इस पन्ने पर उपाय बाद में काम करेगा, प्रेम अभी काम करता है।

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।
प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥ ५९॥

सोरठा ५९

भरत उन्हें हृदय से लगा लेते हैं, शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्रों में जल भर आता है, और रघुकुल के तिलक का स्मरण करके हृदय में प्रीति समाती नहीं। थोड़ी देर पहले जिसे उन्होंने गिराया था, वही अब उनकी छाती से लगा है, और बीच में जो हुआ उसका नाम शर्मिन्दगी नहीं है। जिस आदमी ने अपनी भूल को अपने प्रेम से ढाँप लिया हो, उसकी छाती ऐसी ही चौड़ी होती है।

सार: बाण लगते ही हनुमान् राम का नाम लेते हुए गिरते हैं, और वही नाम भरत को बता देता है कि उन्होंने किसे मारा है। जगाने के सब उपाय व्यर्थ जाने पर भरत अपने निष्कपट प्रेम की शपथ रखते हैं, और हनुमान् उसी क्षण उठ बैठते हैं।

एक बाण पर सवारी

होश में आये हुए वानर से भरत पहला प्रश्न यह नहीं पूछते कि आप कौन हैं। वे पूछते हैं कुशल। हे तात, छोटे भाई और माता जानकी सहित सुखनिधान की कुशल कहिये। चौदह बरस में उन्हें जो एक ही सूचना चाहिये थी, वह उन्हें आधी रात में आकाश से गिरे हुए एक अजनबी से मिल रही है, और वे उसे तीन नामों में बाँधकर पूछते हैं।

हनुमान् संक्षेप में सारा चरित कह देते हैं। संक्षेप में, क्योंकि पहाड़ हाथ में है और रात बीत रही है। सुनकर भरत दुखी होते हैं और मन में पछताने लगते हैं, और उनका पछतावा उस घाव से निकलता है जो इस कथा में उनके साथ-साथ चलता है: हा दैव, मैं जगत् में क्यों जन्मा, प्रभु के एक भी काम न आया।

यह वाक्य कहनेवाला आदमी उसी क्षण रुक जाता है, और यही इस चरित्र की असली ऊँचाई है। तुलसी उसे दो शब्दों में दर्ज करते हैं: जानि कुअवसरु। यह समय इसका नहीं है, यह जानकर वे मन में धीरज धरते हैं और अपना शोक एक तरफ़ रख देते हैं। फिर वे बलवीर की तरह बोलते हैं, और अब जो कहते हैं वह विलाप नहीं, हिसाब है।

उनका हिसाब यह है कि आपको जाने में देर हो जायगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। रात कितनी बीत चुकी है, यह अवध में बैठे हुए आदमी को नहीं मालूम, पर इतना मालूम है कि दूरी बहुत है और घड़ी थोड़ी। इसलिये वे जो प्रस्ताव रखते हैं वह इस पन्ने का सबसे साहसी वाक्य है।

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥
चढ़ मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥

चौपाई ७

पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाइये, मैं आपको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपा के धाम राम हैं। जिस धनुष ने अभी-अभी इन्हें गिराया था, वही अब इन्हें पहुँचाने का साधन बनने को तैयार है। और यह वही आदमी कह रहा है जिसने अभी-अभी कहा था कि मैं प्रभु के एक काम न आया। अपने को बेकार कहनेवाला आदमी इतनी बड़ी बात इसी तरह कहता है, बिना यह जाने कि उसने क्या कह दिया।

और यहाँ हनुमान् के मन में एक क्षण के लिये अभिमान उठता है: मेरे बोझ से यह बाण कैसे चलेगा। तुलसी इसे छिपाते नहीं। जिस वानर ने समुद्र लाँघा है और अभी-अभी पर्वत उखाड़ा है, उसके मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। फिर वे राम के प्रभाव का विचार करते हैं और वह प्रश्न अपने आप ढह जाता है। उसके बाद वे चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोलते हैं।

तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥ ६० (क)॥
भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥ ६० (ख)॥

दोहा ६० (क)

आपका प्रताप हृदय में रखकर मैं तुरंत चला जाऊँगा। बाण का उत्तर उन्होंने न हाँ में दिया, न ना में। उन्होंने उससे वह चीज़ ले ली जिसकी उन्हें सचमुच ज़रूरत थी, और वह चीज़ सवारी नहीं थी। आज्ञा पाकर, चरणों की वन्दना करके, वे अपने ही पंखों पर चल देते हैं।

दोहा साठ का दूसरा भाग इसी को आगे बढ़ाता है, और यहाँ हमें एक बात कहनी है। इस संग्रह में वह अर्धांश टीका के भीतर पड़ा हुआ है, इसलिये हम उसे उद्धृत नहीं कर रहे, केवल उसका आशय कह रहे हैं। लौटते हुए पवनकुमार मन ही मन बार-बार भरत की सराहना करते जाते हैं: उनका बाहुबल, उनका शील, उनके गुण, और प्रभु के चरणों में उनका अपार प्रेम।

इस एक अर्धांश ने अवध के उस आदमी का परिचय उस सेना तक पहुँचा दिया जिसने उसे कभी देखा नहीं था। और जो आदमी कुछ देर पहले अपने को निकम्मा कह रहा था, उसकी प्रशंसा अब आकाश में उड़ती हुई साथ जा रही है, और उसे इसका पता भी नहीं।

सार: भरत कुशल पूछते हैं, संक्षेप में सब सुनते हैं, और अपना शोक एक ओर रखकर हनुमान् को पर्वत सहित अपने बाण पर चढ़ने का प्रस्ताव देते हैं। हनुमान् के मन में उठा क्षणिक अभिमान राम के प्रभाव का विचार करते ही बैठ जाता है, और वे आज्ञा लेकर भरत की सराहना करते हुए चल देते हैं।

उधर, आधी रात

अब कथा युद्धभूमि पर लौटती है, और लौटते ही तुलसी हमें चेता देते हैं। लक्ष्मण को देखकर राम जो वचन बोलते हैं, उन्हें तुलसी पहले ही नाम दे देते हैं: बोले बचन मनुज अनुसारी। आगे जो सुनने को मिलेगा वह मनुष्य के अनुसार है। यह पंक्ति पाठक के हाथ में पहले थमा दी जाती है, ताकि वह आगे का विलाप बिना उलझन के सुन सके।

आधी रात बीत चुकी और हनुमान् नहीं आये। यह वाक्य कहकर वे छोटे भाई को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। यहाँ से जो बोलना शुरू होता है, वह इस काण्ड का सबसे लम्बा एकालाप है, और उसमें युद्ध का एक भी शब्द नहीं आता।

पहला उलाहना वही है जो हर शोक में सबसे पहले आता है, कि आप ऐसे तो नहीं थे। भाई, आप मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे, आपका स्वभाव सदा से कोमल था। फिर हिसाब खुलता है: मेरे हित के लिये आपने माता-पिता तक छोड़ दिये, वन में जाड़ा, गरमी और हवा सब सह ली।

फिर वे प्रश्न पूछते हैं जो कोई उत्तर नहीं चाहता: वह अनुराग अब कहाँ है, मेरे व्याकुल वचन सुनकर उठते क्यों नहीं। और उसके ठीक बाद वह वाक्य आता है जिसकी किसी को आशा नहीं होती। यदि मैं जानता कि वन में भाई का विछोह होगा, तो मैं पिता का वचन भी न मानता।

इस एक पंक्ति को अयोध्याकाण्ड के सामने रखकर देखिये। जिस आदमी के लिये पिता का वचन ही सारा धर्म था, जिसने उसी वचन पर राजपाट छोड़ा और चौदह बरस वन को चुना, वह आज कह रहा है कि यह क़ीमत मालूम होती तो वह वचन भी न मानता। तुलसी की करुणा यहीं से असह्य होने लगती है।

सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥

चौपाई ८

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार, ये जगत् में बार-बार होते और जाते रहते हैं, पर सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। यही वह पंक्ति है जो इस पन्ने से निकलकर लोगों के साथ घर तक जाती है, और जो उन घरों में भी दोहरायी जाती है जहाँ रामचरितमानस कभी खोला नहीं गया। दुख के सामने तराज़ू रख देने की यह तुलसी की पुरानी आदत है।

इसके बाद वे उपमाएँ आती हैं जिनसे वे अपने आगे के जीवन का नक़्शा खींचते हैं: पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प, और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी। इस अवधी अर्धाली को हम उद्धृत नहीं कर रहे, क्योंकि हमारे संग्रह में उसका एक शब्द टूटा हुआ है और टूटे हुए शब्द को हम पद्य कहकर नहीं छापेंगे। आशय यही है, और वह पोद्दार की टीका से पूरा मिलता है: यदि जड़ दैव मुझे जिलाये रखे, तो आपके बिना मेरा जीवन ऐसा ही होगा।

फिर लाज की बात उठती है। स्त्री के लिये प्यारे भाई को खोकर मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा। इससे तो अच्छा था कि जगत् में बदनामी सह लेता, स्त्री की हानि से कोई विशेष क्षति न थी। यह वाक्य सीता के प्रति उपेक्षा नहीं है, यह शोक का वह क्षण है जिसमें आदमी अपने ही निर्णय को उलटकर देखता है और पाता है कि दूसरा पलड़ा कहीं भारी था।

और अन्त में वे वहाँ पहुँचते हैं जहाँ इस विलाप को पहुँचना ही था, सुमित्रा के पास। आप अपनी माता के एक ही पुत्र हैं और उनके प्राणों के आधार हैं। उन्होंने हाथ पकड़कर आपको मुझे सौंपा था, यह जानकर कि मैं सब प्रकार से सुख देनेवाला हूँ। अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा। भाई, उठकर मुझे सिखाते क्यों नहीं।

यहाँ तुलसी एक कदम पीछे हटकर हमें दृश्य दिखाते हैं। सोच से छुड़ानेवाले स्वयं सोच कर रहे हैं और कमल की पँखुड़ी जैसे नेत्रों से जल बह रहा है। फिर वे पार्वती की ओर मुड़ते हैं: हे उमा, रघुनाथ एक और अखण्ड हैं, कृपालु ने भक्तों के लिये मनुष्य की गति दिखायी है। जो प्रश्न पन्ने के आरम्भ में रखा गया था, उसका उत्तर यहाँ आकर बैठ जाता है।

और वानरों का समूह यह प्रलाप कानों से सुनकर व्याकुल हो जाता है। पूरी सेना उस एक आवाज़ से टूट रही है जिस आवाज़ के भरोसे वह समुद्र पार आयी थी। ठीक इसी घड़ी पर तुलसी दरवाज़ा खोलते हैं।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥ ६१॥

सोरठा ६१

हनुमान् आ गये, जैसे करुण रस में वीर रस आ गया हो। इस उपमा में तुलसी अपनी ही कारीगरी का नाम ले लेते हैं। जो चीज़ वे अभी-अभी कर रहे थे और जो अब करने जा रहे हैं, दोनों को एक ही साँस में गिनाकर, कवि पाठक को यह बता देता है कि पन्ना अब पलट रहा है।

सार: युद्धभूमि पर आधी रात बीत जाती है और राम मनुष्य की तरह विलाप करते हैं, जिसमें वे पिता के वचन तक को उलटकर देखते हैं और सहोदर भाई के दुर्लभ होने की वह पंक्ति कहते हैं जो सबसे प्रसिद्ध हुई। तुलसी स्वयं बताते हैं कि यह भक्तों के लिये दिखायी गयी मनुष्य की गति है, और उसी क्षण हनुमान् लौट आते हैं।

औषधि, और उठ बैठना

हरषि राम भेटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई॥

चौपाई ९

इस पूरी रात का फल एक अर्धाली में निपट जाता है। वैद्य ने तुरंत उपाय किया और लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठे। न औषधि का नाम, न विधि का वर्णन, न कोई चमत्कार का दृश्य। जिस काम के लिये पहाड़ उखाड़ा गया, मायावी मारा गया और अवध में एक धनुष उठा, वह काम पन्द्रह शब्दों में हो जाता है।

यह तुलसी का चुनाव है और इसे पहचानिये। इस पन्ने का समय जहाँ लगाया गया, वह उपचार नहीं था। समय लगाया गया एक भाई की प्रतीक्षा में, दूसरे भाई की भूल में, और तीसरे भाई के विलाप में। उपाय को बस इतनी जगह दी गयी जितनी में वह काम कर सके।

उठने से पहले की पंक्ति भी देखने लायक है। राम हर्षित होकर हनुमान् से गले लगकर मिले, और तुलसी उसी साँस में जोड़ देते हैं कि प्रभु परम सुजान और अत्यन्त कृतज्ञ हैं। जिसने अभी-अभी मनुष्य की तरह रोकर दिखाया, वह अब मनुष्य की तरह ही आभार मानता है, और यह दूसरा वाला मनुष्य होना कहीं दुर्लभ है।

फिर प्रभु भाई को हृदय से लगाकर मिलते हैं और रीछों तथा वानरों के सारे समूह हर्षित हो जाते हैं। थोड़ी देर पहले जो सेना व्याकुल होकर बिखरने को थी, वह एक ही दृश्य से फिर खड़ी हो जाती है।

और इसके तुरन्त बाद वह पंक्ति आती है जिस पर पाठ की आँख सबसे कम पड़ती है। हनुमान् वैद्य को उसी तरह वापस पहुँचा आये जिस तरह उसे लाये थे। शत्रु के नगर से जिस आदमी को घरसमेत उठाया गया था, उसे उसी घर में वापस रख दिया गया। उससे पक्ष बदलने को नहीं कहा गया, उसे बन्दी नहीं बनाया गया, उसका उपयोग करके छोड़ा नहीं गया। यह इस सेना का चरित्र है, और वह इसी एक अर्धाली में लिखा है।

सार: वैद्य तुरंत उपाय करता है और लक्ष्मण उठ बैठते हैं। राम भाई को और हनुमान् को हृदय से लगाते हैं, सारी सेना हर्षित होती है, और हनुमान् सुषेण को उसी रीति से उसके घर वापस पहुँचा आते हैं जिस रीति से लाये थे।

कुम्भकर्ण का जागना

यह समाचार जब रावण सुनता है तो वह अत्यन्त विषाद से बार-बार सिर पीटता है। इस रात में यह दूसरी बार है जब वह सिर पीटता हुआ दिखता है, और पहली बार कालनेमि ने पीटा था। एक ही रात में स्वामी और सेवक दोनों ने वही किया।

और फिर वह व्याकुल होकर वहाँ जाता है जहाँ जाने के सिवा अब कुछ बचा नहीं है। अपने भाई के पास। कुम्भकर्ण को जगाने में तुलसी कोई हँसी नहीं बोते, न भैंसों की क़तार का तमाशा बनाते हैं। वे बस इतना कहते हैं कि बहुत से उपाय करके उसने उसे जगाया।

जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥

चौपाई १०

जागा हुआ वह कैसा दिखता है, इसका उत्तर तुलसी उपमा से देते हैं: मानो काल ही शरीर धारण करके बैठ गया हो। इस उपमा की मार दोनों ओर चलती है। वह लङ्का के शत्रुओं के लिये भी काल है और लङ्का के लिये भी, और अगले पन्ने पर यही दोनों बातें एक साथ सच निकलेंगी।

और नींद से उठा हुआ यह विशालकाय पहला वाक्य क्या बोलता है, यह देखिये। वह लड़ाई नहीं पूछता, शत्रु नहीं पूछता। वह पूछता है कि भाई, कहिये तो, आपके मुख सूख क्यों रहे हैं। जो आदमी जागते ही चेहरे पढ़ ले, वह सोया हुआ आलसी नहीं होता।

रावण उसे सारी कथा सुनाता है, और तुलसी कथा को वहीं से शुरू करवाते हैं जहाँ से इसे शुरू होना चाहिये: जिस प्रकार वह सीता को हर लाया था। फिर वह वर्तमान पर आता है। वानरों ने सब निशाचर मार डाले, बड़े-बड़े योद्धाओं तक का संहार कर डाला।

और फिर नामों की वह सूची आती है जो युद्ध के समाचार को आँकड़े से हटाकर शोक बना देती है। दुर्मुख, देवशत्रु, मनुष्यभक्षक, भारी योद्धा अतिकाय, अकम्पन, और महोदर आदि दूसरे सब रणधीर। ये सब रणभूमि में पड़े हैं। यह सूची भाई से भाई को सुनायी जा रही है, और सुननेवाला उनमें से कई को बच्चों की तरह जानता रहा होगा।

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥ ६२॥

दोहा ६२

सुनकर कुम्भकर्ण बिलखता है, और उसका पहला वाक्य कोई सलाह नहीं है, वह एक निदान है। जगज्जननी को हर लाकर अब कल्याण चाहते हो। ध्यान दीजिये कि वह सीता को क्या कहकर पुकारता है, और यह कहनेवाला अभी-अभी नींद से उठा है।

इसके बाद उसका उलाहना खुलता है। आपने अच्छा नहीं किया, राक्षसराज। अब आकर मुझे जगाया किसलिये। और फिर वही उपदेश, जो इस रात में तीसरी बार इसी घर में दिया जा रहा है: अब भी अभिमान छोड़कर राम को भजिये तो कल्याण होगा। पहले कालनेमि ने कहा था, उससे पहले और लोगों ने कहा था, और अब अपना ही भाई कह रहा है।

आगे वह अर्धाली आती है जिसमें वह हनुमान् का नाम लेकर पूछता है कि जिनके ऐसे सेवक हैं, वे रघुनायक क्या मनुष्य हैं। हमारे संग्रह में यह पंक्ति टीका के भीतर पड़ी रह गयी है, इसलिये हम उसे उद्धृत नहीं कर रहे और केवल उसका आशय रख रहे हैं। तर्क का ढाँचा वही है जो कालनेमि ने रावण के सामने रखा था, और दोनों ने उसे एक ही साक्ष्य पर खड़ा किया: उस वानर पर।

फिर वह शिकायत आती है जो केवल भाई ही कर सकता है। हाय भाई, आपने बुरा किया जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया। उसका दुख यह नहीं है कि युद्ध हो गया। उसका दुख यह है कि उससे समय पर नहीं कहा गया, और अब जो बचा है वह केवल अन्त है।

फिर वह सबसे बड़ी बात कहता है। आपने उस परम देवता का विरोध किया जिसके शिव और ब्रह्मा तक सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं आपसे कहता, पर अब समय निकल गया। यह ब्योरा तुलसी का अपना है और इसे धीरे पढ़िये: इस राक्षस के पास नारद का दिया हुआ ज्ञान रखा हुआ है, और वह कहता है कि उसे कहने का समय अब नहीं बचा।

और फिर वह भाई से गले मिलने को कहता है, और उसी साँस में कहता है कि मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ, तीनों तापों से छुड़ानेवाले श्यामशरीर और कमलनेत्र राम के दर्शन कर आऊँ। यह आदमी युद्धभूमि पर जीतने नहीं जा रहा। वह देखने जा रहा है। दोहा तिरसठ इसे एक पंक्ति में पक्का कर देता है: राम के रूप और गुण का स्मरण करके वह एक क्षण के लिये प्रेम में मग्न हो जाता है।

और उसी दोहे का दूसरा चरण उसी क्षण को तोड़ देता है। रावण ने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये। एक पंक्ति में डूबना और अगली में तैयारी। तुलसी दोनों को एक ही दोहे में रखकर इस चरित्र का पूरा दुख बता देते हैं: जिसे दीखता सब कुछ है, उसके पाँव फिर भी उसी ओर जाते हैं जिधर उसका कुल जा रहा है।

सार: लक्ष्मण के उठ बैठने का समाचार पाकर रावण कुम्भकर्ण को जगाता है। जागते ही कुम्भकर्ण भाइयों के मुरझाये मुख पहचान लेता है, सीता को जगज्जननी कहकर रावण को फटकारता है, नारद के दिये ज्ञान का समय बीत जाना बताता है, और अन्तिम भेंट माँगकर राम के दर्शन की इच्छा से चलने को तैयार होता है।

किला छोड़कर, बिना सेना के

भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्रपात के समान गरजता है। यहाँ हमें एक बात कहनी है: इस अर्धाली को हम उद्धृत नहीं कर रहे, क्योंकि हमारे संग्रह में यह पंक्ति बीच से टूटकर दो हिस्सों में बँट गयी है, और आधी पंक्ति को पद्य कहकर छापना उससे भी बड़ी भूल होती। आशय पोद्दार की टीका से पूरा मिलता है और वही ऊपर रखा गया है।

इसके बाद जो अर्धाली आती है, वह इस चरित्र का पूरा नक़्शा है। मद से चूर और रण के उत्साह से भरा हुआ कुम्भकर्ण किला छोड़कर चल देता है, और सेना साथ नहीं लेता। लङ्का का सबसे बड़ा योद्धा युद्ध में अकेला जा रहा है। यह अहंकार भी है और एक तरह की उदासीनता भी, और इस आदमी में दोनों एक साथ बैठे हुए हैं।

रास्ते में उसे कोई मिलता है। विभीषण आगे आते हैं, उसके चरणों पर गिरते हैं, और अपना नाम स्वयं सुनाते हैं। इस पूरे प्रसंग में सबसे चुभनेवाला ब्योरा यही है। अपने ही बड़े भाई के सामने खड़े होकर उन्हें बताना पड़ रहा है कि मैं कौन हूँ। घर छोड़ देने पर आदमी को यही करना पड़ता है।

और कुम्भकर्ण जो करता है, वह इस रात का सबसे कोमल दृश्य है। वह छोटे भाई को उठाकर हृदय से लगा लेता है, और रघुनाथ का भक्त जानकर वह उसके मन को प्रिय लगता है। जिस बात पर रावण ने लात मारी थी, ठीक उसी बात पर यह भाई उसे छाती से लगा रहा है। एक ही कुल के दो भाई, एक ही सूचना पर, दो सिरे।

विभीषण अपनी बात कहते हैं, और वे भी उलाहना नहीं देते। परम हितकर सलाह कहने पर रावण ने मुझे लात मारी, उसी ग्लानि के मारे मैं रघुनाथ के पास चला आया, और दीन देखकर मैं प्रभु के मन को प्रिय लगा। घर से निकाले हुए आदमी की सारी कथा तीन अर्धालियों में है, और उसका अन्त शिकायत पर नहीं, आश्रय पर होता है।

कुम्भकर्ण का उत्तर वह सच है जिसे वह अपने ऊपर लागू नहीं कर पाया। सुनिये, रावण तो काल के वश हो गया है, वह अब उत्तम शिक्षा क्या मानेगा। और फिर वह तीन बार कहता है कि आप धन्य हैं, और जोड़ता है कि आप निशाचर कुल के भूषण हो गये। जिस कुल का यह सबसे बलवान् आदमी है, उसी कुल का भूषण वह उसे बता रहा है जो उस कुल को छोड़ आया।

भाई, आपने अपने वंश को देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुख के समुद्र राम को भजा। यह वाक्य कहकर वह अपनी अन्तिम सीख देता है, और अन्तिम सीख के भीतर अपनी अन्तिम स्वीकारोक्ति भी रख देता है।

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥ ६४॥

दोहा ६४

मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर राम का भजन कीजिये। और फिर वह आधी पंक्ति, जिस पर यह सारा चरित्र टिका है: अब जाइये, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता, मैं काल के वश हो गया हूँ। वह जानता है। जानना उसके पाँव नहीं मोड़ पाता। वह उसी दिशा में चलता चला जाता है जिधर उसका कुल जा रहा है, और अपने भाई को हटा देता है ताकि रास्ते में न आये।

यहीं यह प्रसंग हमें छोड़ता है। एक ओर लक्ष्मण उठ बैठे हैं और सेना फिर खड़ी है। दूसरी ओर एक अकेला आदमी किला छोड़कर बिना सेना के चला आ रहा है, अपनी हार पहले से जानता हुआ, और अपने शत्रु के दर्शन की इच्छा लेकर। अगला पन्ना इसी के नाम है।

सार: कुम्भकर्ण मदिरा और भैंसों के बाद गरजकर किला छोड़ देता है और सेना साथ नहीं लेता। रास्ते में विभीषण पाँव छूकर अपना नाम बताते हैं, वह उन्हें छाती से लगाता है, धन्य कहता है, राम के भजन की सीख देता है, और यह कहकर विदा करता है कि वह स्वयं काल के वश हो चुका है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर चार आदमी अपने भाइयों के पास बैठते हैं। राम लक्ष्मण के पास, भरत उस वानर के पास जिसे उन्होंने गिराया, रावण कुम्भकर्ण के पास, और कुम्भकर्ण विभीषण के पास। चारों दृश्यों में गले लगना है और चारों में आँसू या ग्लानि है। पर इनमें एक फ़र्क़ है जिस पर पूरी कथा टिकी है: तीन जगह भाई भाई के पास सहायता देने जाता है, और एक जगह सहायता लेने।

भरत का प्रसंग जल्दी में पढ़ लिया जाने वाला प्रसंग है, और यह उसके साथ अन्याय है। चौदह बरस से जो आदमी प्रतीक्षा कर रहा है, वह एक रात अपने ही उपकारी को राक्षस समझकर गिरा देता है, और फिर उसे उठाने के लिये उसके पास अपने प्रेम के सिवा कुछ नहीं होता। उसके पास वैद्य नहीं, औषधि नहीं, पर्वत नहीं। जो कुछ है वह भीतर है, और वही काम कर जाता है।

और उसी रात, हज़ारों कोस दूर, एक दूसरा आदमी अपने भाई के सिरहाने बैठा वही बात दूसरी तरह से कह रहा है, कि सहोदर भाई फिर नहीं मिलता। दोनों दृश्य एक ही पन्ने पर रखे गये हैं, और दोनों में से किसी एक को हटा दीजिये तो दूसरा आधा रह जाता है। तुलसी इसी तरह जोड़ते हैं: दो अलग जगहों के दो दुख, एक ही रात की दो घड़ियाँ, और बीच में एक वानर जो उड़ रहा है।

एक बात और, जो इस पन्ने के उपदेशकों के बारे में है। इस रात में रावण को राम का नाम लेने के लिये दो लोग कहते हैं, और दोनों राक्षस हैं। कालनेमि, जो उसे मारने भेजा जा रहा है, और कुम्भकर्ण, जो उसके लिये लड़ने जा रहा है। तीसरा राक्षस वह है जो यही बात पहले कह चुका था और जिसे इसी बात पर लात पड़ी थी, और इस पन्ने के अन्त में उसी को उसका बड़ा भाई धन्य कहकर विदा करता है। और कालनेमि तो मरते हुए भी वही नाम लेकर जाता है। तुलसी यह बताने में कभी नहीं हिचकते कि सच किसके मुँह से निकल सकता है, और उसे सुनकर भी न मानने की छूट किसके पास बची रहती है।

स्रोत के बारे में दो बातें कह देना ठीक होगा, क्योंकि इस पन्ने पर वे काम की हैं। पहली, इस पूरे प्रसंग में न पर्वत का नाम है और न औषधि का। दोहा पचपन केवल इतना कहता है कि सुषेण ने नाम बताया। जो नाम बाद की परम्परा और चित्रों में प्रसिद्ध हुए, वे तुलसी की इन चौपाइयों में नहीं आते, इसलिये इस पन्ने पर भी नहीं लाये गये। दूसरी, हनुमान् का मार्ग यहाँ अवधपुरी के ऊपर से जाता है और पाठ यही नगर नाम लेता है।

और अन्त में वही बात जो इस काण्ड के हर पन्ने पर दोहरानी पड़ती है। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में यह रात आती है, दोनों में एक पर्वत उठता है, पर जो ब्योरे आपने ऊपर पढ़े वे इसी अवधी पाठ से लिये गये हैं: कालनेमि का उपदेश, तालाब की वह मगरी, भरत का बिना फल का बाण, बाण पर सवारी का प्रस्ताव, और कुम्भकर्ण के मुँह से निकला हुआ जगज्जननी शब्द। इनमें से किसी को दूसरी रामायण के बराबर मत रखिये। दोनों अपने-अपने घर में पूरे हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ५५ से ६४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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