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माया, कटकर उगते हुए सिर, त्रिजटा का उत्तर और इकतीस बाण

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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 14

एक माया जिससे कथा खुलती है। वे सिर और भुजाएँ जो कटकर फिर उग आती हैं, उसी रात अशोक वाटिका में त्रिजटा का दिया हुआ उत्तर। दूसरी माया, विभीषण का बताया हुआ भेद, और अन्त में कान तक खिंचा हुआ धनुष।

पिछला प्रसंग वहाँ ख़त्म हुआ था जहाँ वानरों का बल देखकर रावण ने पाखण्ड प्रकट किया। यह कथा उसी पाखण्ड के भीतर खुलती है। शुरू में ही वह एक क्षण के लिये अदृश्य होता है और लौटकर अकेला नहीं लौटता। माया यहाँ अन्त की नहीं, शुरुआत की चीज़ है। वह दो बार आती है: एक बार शुरू में और एक बार रात बीतने के बाद। दोनों बार उसे हटाने में राम को एक ही बाण लगता है।

इन दोनों मायाओं के बीच जो चीज़ बैठी है, वही इस प्रसंग की असली समस्या है। राम रावण के सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट देते हैं, और वे चारों फिर बढ़ जाते हैं। कथा इसकी उपमा युद्ध से नहीं, तीर्थ से देती है। इस बात के दो उत्तर आगे दो अलग जगहों से आते हैं। एक रात में अशोक वाटिका के भीतर त्रिजटा देती हैं: वह मर कहाँ सकता है, और वह जगह छोड़ी क्यों जा रही है। दूसरा दिन में रणभूमि पर विभीषण देते हैं: वह टिका किस बल पर है। पाठ दोनों को रखता है और उन्हें आपस में मिलाने की कोशिश नहीं करता।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस प्रसंग की लम्बी बैठक रणभूमि पर नहीं, अशोक वाटिका में है। यह कथा रावण के मरने पर ख़त्म नहीं होती। वहाँ थमती है जहाँ धनुष कान तक खिंचता है और इकतीस बाण हवा में हैं।

रण के योद्धा और दो स्त्रियाँ

  • रावण जिसके सिर और भुजाएँ बार-बार कटती हैं और बार-बार उग आती हैं, और जो दो बार माया का सहारा लेता है।
  • राम जो विकल देवताओं और वानरों को देखकर पहले हँसते हैं, फिर एक ही बाण से करोड़ों झूठे रावण मिटा देते हैं। अन्त में वे धनुष कान तक खींचते हैं।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो देवताओं को व्याकुल देखकर दौड़ते हैं, कूदकर रावण का पैर पकड़ते हैं और उसे पृथ्वी पर गिरा देते हैं।
  • जाम्बवान् भालुओं के स्वामी, रणधीर, जो अपने दल का विध्वंस देखकर रावण की छाती के ठीक बीच में लात मारते हैं।
  • नल और नील जो रावण के सिरों पर चढ़कर नखों से उसके ललाट फाड़ते हैं और उसके हाथों में पकड़ में नहीं आते।
  • सीता जो रात में यह ख़बर सुनकर काँप जाती हैं कि शत्रु के सिर कटकर बढ़ जाते हैं। वे उसके जीवित रहने का कारण अपने भाग्य में ढूँढ़ती हैं।
  • त्रिजटा जो उसी रात सारी कथा सुनाने आती हैं और इस उलझन का पहला उत्तर देती हैं, कि राम उसके हृदय पर बाण क्यों नहीं मारते।
  • विभीषण जिनकी ओर राम स्वयं देखते हैं, और जो नाभिकुण्ड के अमृत की बात कहकर दूसरा उत्तर देते हैं।
  • देवता जो एक बार भागते हैं, एक बार फूल बरसाते हैं, और अन्त में उत्पात देखकर व्याकुल होकर पुकारते हैं।
  • सारथि रावण का रथ हाँकने वाला, जो उसे बेसुध रणभूमि से निकाल ले जाता है और इसी उपकार के लिये आधी रात में धिक्कारा जाता है।

जितने वानर, उतने रावण

पहले वह एक क्षण के लिये आँखों से ओझल होता है। लौटकर वह अनेक रूपों में प्रकट होता है: राम की सेना में जितने भालू और वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ प्रकट हो गये। गिनती मनमानी नहीं, सामने वाले की गिनती से नापी गयी है। हर वानर के हिस्से में एक पूरा रावण आ गया, और हर एक को दिखता है कि यह उसी के लिये आया है।

वानरों ने अपरिमित रावण देखे और जहाँ-तहाँ भाग चले। भागते हुए वे धीरज नहीं धरते, और उनके मुँह से दो नाम निकलते हैं, लक्ष्मण और राम। फिर गिनती और बढ़ती है: दसों दिशाओं में करोड़ों रावण दौड़ रहे हैं और घोर, कठोर, भयावने शब्द से गरज रहे हैं। भागने वालों में देवता भी गिनाये गये हैं। वे डरकर भागते हुए आपस में कहते हैं, “हे भाई, अब जय की आशा छोड़ दें। एक ही रावण ने सब देवताओं को जीत लिया था, अब तो बहुत हो गये हैं, इसलिये पहाड़ की गुफाएँ ढूँढ़ें।”

और यह भी बताया जाता है कि कौन नहीं भागे: ब्रह्मा, शिव और ज्ञानी मुनि वहीं डटे रहे, क्योंकि उन्होंने राम की महिमा कुछ जानी थी। मैदान में दो तरह के लोग हैं, और उनके बीच की लकीर बल की नहीं, पहचान की है।

आगे कथा इसी को खोलती है। जिन्होंने प्रताप जाना था, वे निर्भय रहे, और वानरों ने शत्रु को सच्चा मान लिया। इसके बाद ही वे विचलित होकर भागते हैं और भय से व्याकुल होकर पुकारते हैं, “राम, रक्षा कीजिये।” जो चीज़ उन्हें भगा रही है, वह रावण नहीं, उस रावण को सच मान लेना है। उसी समय चार नाम डटे भी हैं: हनुमान, अंगद, नील और नल अत्यन्त बलवान रणबाँकुरों की तरह लड़ रहे हैं और कोटि-कोटि रावणों को मसल रहे हैं। उन रावणों के लिये कथा का शब्द खेती का है: कपट की भूमि से अंकुर की तरह उगे योद्धा। उगने की बात यहाँ पहली बार आती है, आख़िरी बार नहीं।

अब जो आता है, उसका पहला काम प्रहार नहीं, एक हँसी है।

देवताओं और वानरों को विकल देखकर राम हँसे। इस हँसी में मज़ाक़ नहीं, नाप है। जिससे सारा मैदान भाग रहा है, वह उनकी दृष्टि में इतना भर है कि उस पर हँसा जा सके। शार्ङ्ग पर एक बाण चढ़ाया गया और सब रावण मार डाले गये। करोड़ों के लिये एक, अन्त में जब असली शरीर की बारी आयेगी, तब गिनती इकतीस होगी।

फिर कथा इसे एक उपमा से पूरा करती है: राम ने क्षणभर में सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार फट जाता है। अन्धकार से कोई लड़ता नहीं। वह उस चीज़ के आने से हटता है जिसकी वह अनुपस्थिति था। अब एक ही रावण बचा है, और उसे देखकर देवता हर्षित होते हैं, लौट आते हैं और राम पर बहुत से फूल बरसाते हैं। थोड़ी देर पहले यही गुफाओं की सलाह दे रहे थे।

एक लात, और एक बात जिसमें सब अटक जाता है

राम भुजा उठाकर वानरों को लौटाते हैं। वे एक दूसरे को पुकार-पुकारकर लौटते हैं, और राम का बल पाकर फुर्ती से उछलकर रणभूमि में आ जाते हैं। इधर रावण देवताओं को स्तुति करते देखकर सोचता है, “इनकी समझ में मैं एक हो गया।” फिर ताना देता है कि ये मूर्ख सदा से उसकी मार खाने वाले रहे हैं, और वानरों को छोड़कर क्रोध में आकाश की ओर दौड़ता है। जिस लड़ाई में वह हार रहा है, उसे छोड़कर वह वहाँ जाता है जहाँ उसका पुराना हिसाब जमा है।

देवता हाहाकार करते हुए भागते हैं, और पीछे से रावण का वाक्य आता है, “दुष्टो, मेरे आगे से कहाँ जाएँगे?” तभी अंगद, देवताओं को व्याकुल देखकर, दौड़ते हैं, कूदकर चरण पकड़ते हैं, और उसे पृथ्वी पर गिरा देते हैं। फिर अंगद उसे लात मारकर राम के पास चले जाते हैं। वह सँभलकर उठता है, घोर कठोर शब्द से गरजता है, दर्प करके दसों धनुष चढ़ाता है। बाण बरसाकर वह सब योद्धाओं को घायल और भय से व्याकुल कर देता है, और अपना बल देखकर हर्षित होता है। गिरना, उठना, और फिर अपने ही बल पर प्रसन्न हो जाना। यह क्रम आगे बार-बार लौटेगा।

और अब वह बात आती है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है, और जिसके बाद हर घटना एक ही प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ती चलती है।

काटे गये सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष, और चारों फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थ में किया हुआ पाप बढ़ जाता है। पोद्दार खोलते हैं कि वह कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करता है। जो जगह पाप को मिटाने के लिये बनी है, वहीं किया गया पाप कई गुना हो जाता है। इसी तरह जो बाण उसे घटाने के लिये चला है, वही उसे बढ़ा रहा है।

नख, दाँत और दो भौंरे

शत्रु के सिरों और भुजाओं की बढ़ती देखकर भालुओं और वानरों को बहुत क्रोध होता है: यह मूर्ख भुजाओं और सिरों के कटने पर भी नहीं मरता। फिर नामों की एक झड़ी आती है, अंगद, हनुमान, नल, नील, सुग्रीव और द्विविद, और ये सब वृक्षों और पर्वतों का प्रहार करते हैं। उत्तर तुरन्त आता है: वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षों को पकड़कर वानरों को मारता है। जो फेंका जा रहा है, वही लौटकर आ रहा है।

फिर लड़ाई हथियारों से उतरकर शरीर पर आ जाती है। कोई वानर नखों से उसका शरीर फाड़कर भाग जाता है, कोई लात मारकर। नल और नील उसके सिरों पर चढ़ जाते हैं और नखों से उसके ललाट फाड़ने लगते हैं। फिर उसके भीतर का पहला समाचार आता है: खून देखकर उसके हृदय में भारी विषाद हुआ।

फिर वह उन दोनों को पकड़ने के लिये हाथ फैलाता है, और वे पकड़ में नहीं आते। वे उसके हाथों के ऊपर-ऊपर ही फिरते रहते हैं, मानो दो भौंरे कमलों के वन में विचर रहे हों। बीस फैले हुए हाथ एक कमल-वन बन गये हैं। यह चित्र थोड़ी देर बाद उलटे अर्थ में लौटेगा।

आख़िर वह क्रोध करके उछलता है और दोनों को पकड़ लेता है, पर पृथ्वी पर पटकते समय वे उसकी भुजाएँ मरोड़कर निकल भागते हैं। तब वह फिर हाथों में दसों धनुष लेता है और बाणों से मारकर वानरों को घायल कर देता है। हनुमान आदि वानर मूर्च्छित हो जाते हैं। यहाँ कथा समय बता देती है: सन्ध्या का समय पाकर रावण हर्षित हुआ। रात उसका पक्ष है। और ठीक उसी घड़ी, सब वानर वीरों को मूर्च्छित देखकर, रणधीर जाम्बवान् दौड़ पड़ते हैं।

जाम्बवान् के साथ के भालू पर्वत और वृक्ष लिये उसे ललकार-ललकारकर मारने लगते हैं। बलवान रावण क्रोधित होकर पैर पकड़-पकड़कर अनेकों योद्धाओं को पृथ्वी पर पटकने लगता है। अपने दल का यह विध्वंस देखकर जाम्बवान् क्रोध करके उसकी छाती के ठीक बीच में लात मारते हैं।

छाती पर लात का प्रचण्ड आघात, और वह व्याकुल होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। और वह चित्र लौट आता है: उसने बीसों हाथों में भालुओं को पकड़ रखा था, मानो रात के समय भौंरे कमलों में बसे हुए हों। थोड़ी देर पहले भौंरे उसके हाथों के ऊपर उड़ रहे थे। अब वे उसकी मुट्ठियों में हैं, पर पकड़ने वाला वहीं पड़ा है।

उसे मूर्च्छित देखकर जाम्बवान् एक बार और लात मारते हैं और राम के पास चले जाते हैं। रात्रि जानकर सारथि उसे रथ में डालता है और होश में लाने का उपाय करने लगता है। फिर यह दिन बन्द होता है: मूर्च्छा दूर होने पर सब भालू-वानर राम के पास आ जाते हैं। और उधर सब राक्षस अत्यन्त भयभीत होकर रावण को घेरकर खड़े हो जाते हैं।

उसी रात, अशोक वाटिका में

अब कथा रणभूमि छोड़ देती है। उसी रात त्रिजटा सीता के पास जाती हैं और सारी कथा कह सुनाती हैं। वे न हार की ख़बर लेकर आयी हैं, न जीत की। वे यह ख़बर लेकर आयी हैं कि शत्रु के सिर और भुजाएँ कटकर बढ़ जाती हैं। यह ऐसी ख़बर है जिसका कोई पक्ष नहीं, और इसीलिये वह डरावनी है।

सुनते ही सीता के हृदय में बड़ा भय होता है, मुख मलिन हो जाता है और मन में चिन्ता उपज आती है। वे यह नहीं पूछतीं कि क्या वह मरेगा। सीता पूछती हैं, “माता, बताती क्यों नहीं, क्या होगा? यह विश्व को दुख देने वाला किस विधि से मरेगा?” प्रश्न में संशय नहीं, विधि की माँग है। जो रास्ता अब तक दिख रहा था, वह बन्द हो चुका है।

और अपना उत्तर वे ख़ुद दे देती हैं। सीता कहती हैं, “राम के बाणों से सिर कटने पर भी वह नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र उलटे ही कर रहा है। मेरा अभाग्य ही उसे जिला रहा है, वही अभाग्य जिसने मुझे राम के चरणों से अलग किया।” एक बन्दी स्त्री, जिसका इस युद्ध में कोई हाथ नहीं, शत्रु के जीवित रहने का हिसाब अपने नाम लिख रही है।

और वे रुकती नहीं: “जिसने कपट का झूठा स्वर्णमृग बनाया, वही दैव अब भी मुझ पर रूठा है। जिसने मुझसे दुःसह दुख सहन कराये और लक्ष्मण को कड़वे वचन कहलाये। जो राम के विरह के विषैले बाणों से तक-तककर मुझे बार-बार मारता है, और ऐसे दुख में भी मेरे प्राण रखे हुए है। वही उसे जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं।” अपने भाग्य के विरुद्ध इस मुक़दमे में वे अपनी ही भारी घड़ियाँ, वह मृग और वे वचन, सबूत की तरह रख रही हैं।

राम की याद कर-करके सीता बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं। यहाँ तक कोई उत्तर नहीं आया, केवल एक स्त्री का अपने आप से किया हुआ हिसाब है। उत्तर अब आता है, और उसी त्रिजटा से, जो इसी नगरी की हैं।

जिसके हृदय में सीता बसती हैं

त्रिजटा का उत्तर एक वाक्य में आ जाता है: “राजकुमारी, सुनिये, देवताओं का शत्रु हृदय में बाण लगते ही मर जायेगा।” यानी वह अवध्य है ही नहीं। यहाँ कोई ऐसा वरदान नहीं गिनाया जाता जिसने उसे अमर कर रखा हो। एक जगह है जहाँ बाण लगते ही सब समाप्त है, और वह जगह अब तक छोड़ी जा रही है। आगे वे बताती हैं कि क्यों।

त्रिजटा कहती हैं, “राम इसी कारण उसके हृदय पर प्रहार नहीं करते कि इसके हृदय में सीता बसती हैं।” इस लड़ाई के लम्बे खिंचने का कारण उसका बल नहीं, एक पता है। जिसने उन्हें हर लिया और जो उन्हीं के लिये मारा जाने वाला है, उसी के भीतर वे रहती हैं, और इसीलिये वह जगह सुरक्षित है। फिर यह बात एक क़दम और आगे जाती है।

त्रिजटा बताती हैं कि राम यही सोचकर रह जाते हैं, “इसके हृदय में सीता का निवास है, सीता के हृदय में मेरा निवास है। और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं। बाण लगते ही सबका नाश हो जायेगा।” तीन घेरे, एक के भीतर एक: राक्षस के हृदय में सीता, सीता के हृदय में राम, और राम के उदर में सारे लोक। इसीलिये वह बाण रुका हुआ है, और इसीलिये सिर कटते हैं और बढ़ते रहते हैं।

यह सुनकर सीता के मन में हर्ष और विषाद दोनों एक साथ होते हैं, और यह देखकर त्रिजटा फिर कहती हैं, “सुन्दरी, महान सन्देह छोड़ दीजिये। अब सुनिये, शत्रु इस प्रकार मरेगा।” जो वे कहती हैं, वह उस चीज़ को अर्थ दे देता है जो अब तक व्यर्थ दिख रही थी।

युद्ध की उसी रात अशोक वाटिका में त्रिजटा सीता के पास बैठकर बताती हैं कि प्रभु रावण के हृदय पर बाण क्यों नहीं मारते, और सीता के मुख पर हर्ष और विषाद एक साथ उतर आते हैं।

“सिरों के बार-बार काटे जाने से वह व्याकुल हो जायेगा, और व्याकुल होने पर उसके हृदय से आपका ध्यान छूट जायेगा। तब सुजान राम उसके हृदय में बाण मारेंगे।” जो कटाई निष्फल दिख रही थी, वही पूरी विधि है। युद्ध का प्रश्न इसी रात हल होता है। हल करने वाली एक राक्षसी है, जो रात में यह बात उस स्त्री को बताने आयी है जिसके कारण यह सारी देर लगी है।

एक ही रात में दो जागते हुए लोग

त्रिजटा बहुत प्रकार से समझाकर अपने घर चली जाती हैं, और जाते ही सीता के भीतर वही लौट आता है जो समझाने से नहीं जाता। राम के स्वभाव का स्मरण करके उन्हें अत्यन्त विरहव्यथा उपजती है। वे रात्रि की और चन्द्रमा की बहुत प्रकार से निन्दा करती हैं: रात युग के समान बड़ी हो गयी और बीतती ही नहीं। मन ही मन वे भारी विलाप करती हैं। फिर, जब हृदय में दाह असह्य हो जाता है, उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठते हैं। इसे शकुन मानकर वे मन में धीरज धरती हैं कि अब राम अवश्य मिलेंगे। एक छोटे-से संकेत को पकड़कर पूरी रात काट ली जाती है।

और फिर कथा उसी रात के दूसरे जागने वाले के पास चली जाती है।

आधी रात को रावण मूर्च्छा से जागता है, और होश आते ही अपने बचाने वाले को धिक्कारता है। वह सारथि पर इसलिये रुष्ट होता है कि उसने उसे रणभूमि से अलग कर दिया। वह उसे अधम और मन्दबुद्धि कहकर बार-बार धिक्कारता है। यहाँ किसी की जान बचाने का दण्ड मिलता है, और उससे मिलता है जिसे बेहोशी में उठाकर ले जाना पड़ा था।

सारथि उसके चरण पकड़कर उसे बहुत प्रकार से समझाता है, और सबेरा होते ही वह फिर रथ पर चढ़कर दौड़ता है। उसका आना सुनकर वानरों की सेना में बड़ी खलबली मचती है। वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँ से पर्वत और वृक्ष उखाड़कर दाँत कटकटाते हुए दौड़ते हैं, और उनका वेग ऐसा है कि राक्षस भाग निकलते हैं। बलवान वानर उसकी सेना को विचलित करके फिर उसी को घेर लेते हैं। वे चारों ओर से चपेटे मारते हैं और नखों से शरीर विदीर्ण करके उसे व्याकुल कर देते हैं। इस बार उसका उत्तर न धनुष है, न गर्जना। वह उसी दरवाज़े पर लौटता है जिससे यह कथा शुरू हुई थी।

दूसरी माया

कथा पहले ही कारण बता देती है: वानरों को बड़ा ही प्रबल देखकर उसने विचार किया, अन्तर्धान हुआ, और निमेषभर में माया का विस्तार किया। पहली बार उसने अपने ही रूप बनाये थे। इस बार वह अपने चेहरे से भी बाहर चला जाता है।

उसके पाखण्ड रचते ही प्रचण्ड जीव प्रकट हो गये: बेताल, भूत और पिशाच, हाथों में धनुष-बाण लिये। योगिनियाँ, एक हाथ में तलवार और दूसरे में मनुष्य की खोपड़ी लिये, ताज़ा खून पीकर नाचती और तरह-तरह के गीत गाती हुईं। चारों ओर एक ही ध्वनि भर जाती है, पकड़ो और मारो, और वे मुँह फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगते हैं, और भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। माया का पूरा काम इसी में है: भागने की कोई दिशा न बचे।

फिर वह बालू बरसाने लगता है। वानरों को जहाँ-तहाँ थकित करके रावण फिर गरजता है, और लक्ष्मण तथा सुग्रीव सहित सब वीर अचेत हो जाते हैं। “हा राम” पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर वह एक और कपट रचता है: बहुत सारे हनुमान प्रकट करता है। वे पत्थर लिये दौड़ते हैं और चारों ओर दल बनाकर राम को घेर लेते हैं। वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारते हैं, “मारो, पकड़ो, जाने न पावे।” दसों दिशाओं में लंगूर शोभा दे रहे हैं और उनके बीच में राम हैं। जितने चेहरे वह चुन सकता था, उनमें से उसने वही चुना जिसने उसे बार-बार चोट दी है, और उसी चेहरे की घेराबन्दी राम के चारों ओर खड़ी कर दी।

कथा इस घेरे को सुन्दर बना देती है। उनके बीच राम का श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो किसी ऊँचे तमाल वृक्ष के चारों ओर अनेक इन्द्रधनुषों की बाड़ बना दी गयी हो। पूँछों का घेरा इन्द्रधनुष हो गया, और घिरा हुआ एक वृक्ष। फिर देवताओं की पुकार आती है, और उनके हृदय में हर्ष और विषाद दोनों एक साथ हैं, दर्शन का हर्ष और घेरे का विषाद। और फिर वह क्षण, जिसमें यह जाल जितनी देर में बना था, उससे कम देर में टूट जाता है। राम ने क्रोध करके एक ही बाण से निमेषभर में माया हर ली।

वही हिसाब दुहराया जाता है जो पहली माया में था: एक बाण, एक पलक। माया हटते ही वानर-भालू हर्षित होकर वृक्ष और पर्वत लेकर लौट पड़ते हैं। राम बाणों के समूह छोड़ते हैं, और रावण के हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वी पर गिरते हैं। और फिर एक बात आती है जो कथा के भीतर से कथा के ऊपर चली जाती है। राम और रावण के इस युद्ध का चरित यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते।

मक्खी अपने ही बल के अनुसार उड़ती है

और ठीक उसी जगह, जहाँ अभी कहा गया है कि इस चरित का पार कोई नहीं पा सकता, तुलसीदास अपना नाम लेकर सामने आ जाते हैं। यह लड़ाई के ठीक बीच में आता है, वहाँ नहीं जहाँ कोई अध्याय पूरा हो रहा हो।

वे अपने को मन्दबुद्धि कहते हैं और कहते हैं कि उस चरित के कुछ ही गुण उन्होंने कहे हैं, जैसे मक्खी अपने बल के अनुरूप आकाश में उड़ती है। मक्खी सचमुच उड़ती है, और आकाश में ही उड़ती है। पर उसकी ऊँचाई उसके अपने बल से नपती है, आकाश की ऊँचाई से नहीं।

इसके तुरन्त बाद कथा उस अटकाव को फिर एक बार, ठंडे ढंग से रख देती है: सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं, फिर भी वीर रावण मरता नहीं। राम तो क्रीड़ा कर रहे हैं, परन्तु देवता, सिद्ध और मुनि उस क्लेश को देखकर व्याकुल हैं। एक ही दृश्य, और उसे देखने के दो ढंग: जो कर रहा है उसके लिये खेल, जो देख रहे हैं उनके लिये कष्ट। कथा यह नहीं बताती कि कौन ठीक देख रहा है।

लोभ की तरह बढ़ते हुए सिर

अब वही बात दूसरी उपमा पाती है: काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है। तीर्थ वाली उपमा जगह की थी, यह मन की है, और दोनों एक ही नियम बताती हैं: कुछ चीज़ें उसी क्रिया से बढ़ती हैं जिससे उन्हें घटना चाहिये।

उसी साँस में लिखा है कि शत्रु मरता नहीं और श्रम बहुत हुआ। और फिर वह बात आती है जो पूरी कथा को मोड़ देती है: तब राम ने विभीषण की ओर देखा। कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता। केवल देखा जाता है। और शिव पार्वती से इस देखने का अर्थ बता देते हैं। “पार्वती, जिनकी इच्छा मात्र से काल भी मर जाता है, वही राम अपने सेवक की प्रीति की परीक्षा ले रहे हैं।” यह जानकारी माँगना नहीं है। जिसे पहले से मालूम है, वह अपने आदमी को वह अवसर दे रहा है जो केवल पूछे जाने से मिलता है।

विभीषण चार सम्बोधनों से शुरू करते हैं, और पहला है सर्वज्ञ। वे पहले कहते हैं कि सामने वाला सब जानता है, फिर उसे बताते हैं। परीक्षा में उत्तर देना ही प्रीति है।

विभीषण कहते हैं, “हे नाथ, इसके नाभिकुण्ड में अमृत का निवास है। रावण उसी के बल पर जीता है।” यह दूसरा उत्तर है, और पहले से बिलकुल अलग जगह से आता है। त्रिजटा ने बताया था कि वह मर कहाँ सकता है और वह जगह छोड़ी क्यों जा रही है। विभीषण बताते हैं कि वह टिका किस बल पर है।

उत्तर सुनते ही राम ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिये। यह हर्ष सूचना का नहीं, उसके लिये है जिसकी परीक्षा पूरी हुई और जो उसमें खरा उतरा।

इकतीस बाण

बाण हाथ में आते ही आकाश और पृथ्वी बोलने लगते हैं। नाना प्रकार के अशकुन होते हैं: बहुत से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगते हैं, पक्षी जगत की आर्ति सूचित करने के लिये बोलने लगते हैं। आकाश में जहाँ-तहाँ केतु प्रकट हो जाते हैं, दसों दिशाओं में अत्यन्त दाह होने लगता है। बिना किसी पर्व के सूर्यग्रहण लग जाता है, और मूर्तियाँ नेत्रों के मार्ग से जल बहाने लगती हैं।

इसी सूची के बीच एक बात अशकुन नहीं है: मन्दोदरी का हृदय बहुत काँपने लगा। कथा यह नहीं कहती कि उसे कुछ पता चला। केवल इतना कि उसी घड़ी उसका हृदय काँपा। यह दूसरा शरीर है जो किसी दूर की घटना पर पहले हिलता है। पहली अशोक वाटिका में थीं, जिनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़के थे।

फिर कथा सारे उत्पात को एक साथ रख देती है: मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाश से वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बही, पृथ्वी डोलने लगी। बादल रक्त, बाल और धूल बरसाने लगे, और अनगिनत अमङ्गल हुए। अपरिमित उत्पात देखकर आकाश में देवता व्याकुल होकर जय जय पुकारते हैं, और उनके भय को जानकर राम धनुष पर बाण जोड़ने लगते हैं। बाण चढ़ाने का कारण यहाँ भी क्रोध नहीं, देवताओं का भय लिखा गया है।

कानों तक धनुष खींचकर उन्होंने इकतीस बाण छोड़े। संख्या ठीक-ठीक दी गयी है, और उसका कोई हिसाब पाठ में नहीं समझाया जाता। उपमा एक ही है: वे बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों। काल शब्द पहले भी आ चुका है, जब शिव ने कहा था कि राम की इच्छा से काल भी मर जाता है। अब वही काल उनके बाणों की उपमा बनकर लौटा है।

यहीं यह प्रसंग रुक जाता है। बाण हवा में हैं। वे कहाँ लगे, क्या हुआ, कौन गिरा, यह यहाँ नहीं बताया जाता। जो इतनी देर से नहीं हो पा रहा था, उसके होने का क्षण अगले प्रसंग में है। वहाँ तक पहुँचने के लिये जो कुछ चाहिये था, वह सब इस प्रसंग में इकट्ठा हो चुका है: विधि त्रिजटा से, भेद विभीषण से। और अवसर उस व्याकुलता से जो बार-बार सिर कटने से बनी।

जिस हृदय पर बाण रुका

समस्या एक है, और उसकी दोनों उपमाएँ युद्ध से बाहर की हैं: तीर्थ में किया हुआ पाप, और हर लाभ पर बढ़ता लोभ। इसलिये हल किसी बड़े हथियार में नहीं, एक जगह में निकलता है, हृदय में, और वहाँ तक पहुँचने का रास्ता यह है कि उसकी पकड़ ढीली हो।

जिसे मारना है, उसके भीतर जो चीज़ बची है, वह उसकी अपनी नहीं, किसी और का ध्यान है। जब तक वह वहाँ है, उस पर हाथ नहीं डाला जाता। लङ्का में बैठी एक बन्दी स्त्री अपने भाग्य को कोस रही है कि उसी के कारण वह जीवित है। उसी रात उसे बताया जाता है कि कारण उसका अभाग्य नहीं, कारण यह है कि वे उस हृदय में हैं।

रात वाला हिस्सा इस प्रसंग का केन्द्र है। एक तरफ़ वह स्त्री है जो एक पलक के फड़कने को शकुन मानकर पूरी रात काट लेती है। दूसरी तरफ़ वह आदमी जिसे सुबह आकाश में केतु और बिना पर्व का ग्रहण दिखेगा, और वह उन्हें लेकर कुछ नहीं करेगा।

अन्त में एक गिनती सब कुछ बाँध देती है। करोड़ों झूठे रावणों के लिये एक बाण। झूठे हनुमानों के पूरे घेरे के लिये एक बाण और एक निमेष। और असली शरीर के लिये इकतीस, वह भी कान तक खिंचे धनुष से। जो झूठ है, वह पलक झपकने में जाता है। जो सच में खड़ा है, उसे हटाने में समय, मर्यादा, एक रात की बातचीत और दो लोगों का दिया हुआ उत्तर लगता है।

तुलसीदास अपना नाम लेकर अपने को मन्दबुद्धि कहते हैं और अपनी उड़ान को मक्खी की उड़ान बताते हैं, लड़ाई के ठीक बीच में। दावा यह नहीं कि यह युद्ध लिख दिया गया। दावा यह है कि उसके कुछ गुण कहे गये, उतने जितने अपने बल से उड़ा जा सकता था।

अन्त में जो चित्र रह जाता है, वह उस हृदय का है जिस पर बाण नहीं मारा गया। त्रिजटा कहती हैं कि जिस दिन वहाँ की याद छूटेगी, उसी दिन वह बाण चलेगा। उस आदमी को उसका बल नहीं बचा रहा। उसे वह चीज़ बचा रही है जो उसने चुरायी थी। जिस दिन वह उसके भीतर से निकल जायेगी, वह उतनी ही देर खड़ा रहेगा जितनी देर एक बाण को कान से चलकर पहुँचने में लगती है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 96 से 102, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।