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माया, कटकर उगते हुए सिर, त्रिजटा का उत्तर और इकतीस बाण

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · माया, कटकर उगते हुए सिर, त्रिजटा का उत्तर और इकतीस बाण

माया, कटकर उगते हुए सिर, त्रिजटा का उत्तर और इकतीस बाण

दोहा छियानबे से एक सौ दो तक: एक माया जिससे यह पन्ना खुलता है, वे सिर और भुजाएँ जो कटकर फिर उग आती हैं, उसी रात अशोक वाटिका में त्रिजटा का दिया हुआ उत्तर, दूसरी माया, विभीषण का बताया हुआ भेद, और अन्त में कान तक खिंचा हुआ धनुष।

पिछला प्रसंग वहाँ ख़त्म हुआ था जहाँ वानरों का बल देखकर रावण ने पाखण्ड प्रकट किया। यह पन्ना उसी पाखण्ड के भीतर खुलता है। पहली ही चौपाई में वह एक क्षण के लिये अदृश्य होता है और लौटकर अकेला नहीं लौटता। इसलिये इस पन्ने को पढ़ते समय सबसे पहले यह देख लेना ठीक रहेगा कि माया यहाँ अन्त की चीज़ नहीं है, शुरुआत की चीज़ है, और वह एक बार नहीं, दो बार आती है। एक बार दोहा छियानबे से पहले और एक बार दोहा एक सौ के बाद, और दोनों बार उसे हटाने में राम को एक ही बाण लगता है।

इन दोनों मायाओं के बीच में जो चीज़ बैठी हुई है, वही इस पन्ने की असली समस्या है। दोहा सत्तानबे में राम रावण के सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट देते हैं, और वे चारों फिर बढ़ जाते हैं। तुलसी इसके लिये जो उपमा चुनते हैं वह युद्ध की नहीं है, तीर्थ की है। इसी बात के दो उत्तर इस पन्ने पर मिलते हैं और दोनों अलग-अलग जगहों से आते हैं। एक उत्तर रात में अशोक वाटिका के भीतर त्रिजटा देती हैं, और वह बताता है कि वह मर कहाँ सकता है और वह जगह छोड़ी क्यों जा रही है। दूसरा उत्तर दिन में रणभूमि पर विभीषण देते हैं, और वह बताता है कि वह टिका किस बल पर है। पाठ दोनों को रखता है और दोनों को आपस में मिलाने की कोशिश नहीं करता।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस पन्ने की सबसे लम्बी बैठक रणभूमि पर नहीं, अशोक वाटिका में है। यहाँ जो नाम हैं, जो गिनतियाँ हैं और जो क्रम है, वह इसी अवधी पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका से लिया गया है, और कहीं से नहीं। और एक बात शुरू में ही कह देना ठीक होगा: यह पन्ना रावण के मरने पर ख़त्म नहीं होता। यह वहाँ ख़त्म होता है जहाँ धनुष कान तक खिंचता है और इकतीस बाण हवा में हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • रावण लङ्कापति, जिसके सिर और भुजाएँ इस पन्ने पर बार-बार कटती हैं और बार-बार उग आती हैं, और जो दो बार माया का सहारा लेता है।
  • राम जो विकल देवताओं और वानरों को देखकर पहले हँसते हैं, फिर एक ही बाण से करोड़ों झूठे रावण मिटा देते हैं, और अन्त में धनुष कान तक खींचते हैं।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो देवताओं को व्याकुल देखकर दौड़ते हैं, कूदकर रावण का पैर पकड़ते हैं और उसे पृथ्वी पर गिरा देते हैं।
  • जाम्बवान् भालुओं के स्वामी, रणधीर, जो अपने दल का विध्वंस देखकर रावण की छाती के ठीक बीच में लात मारते हैं।
  • नल और नील जो रावण के सिरों पर चढ़कर नखों से उसके ललाट फाड़ते हैं और उसके हाथों में पकड़ में नहीं आते।
  • सीता जो रात में यह ख़बर सुनकर काँप जाती हैं कि शत्रु के सिर कटकर बढ़ जाते हैं, और जो उसके जीवित रहने का कारण अपने भाग्य में ढूँढ़ती हैं।
  • त्रिजटा जो उसी रात सारी कथा सुनाने आती हैं और इस पन्ने का पहला उत्तर देती हैं, कि प्रभु उसके हृदय पर बाण क्यों नहीं मारते।
  • विभीषण जिनकी ओर राम स्वयं देखते हैं, और जो नाभिकुण्ड के अमृत की बात कहकर इस पन्ने का दूसरा उत्तर देते हैं।
  • देवता जो इस पन्ने पर एक बार भागते हैं, एक बार फूल बरसाते हैं, और अन्त में उत्पात देखकर व्याकुल होकर पुकारते हैं।
  • सारथि रावण का रथ हाँकने वाला, जो उसे बेसुध रणभूमि से निकाल ले जाता है और इसी उपकार के लिये आधी रात में धिक्कारा जाता है।

जितने वानर, उतने रावण

पन्ने की पहली चौपाई में वह एक क्षण के लिये आँखों से ओझल होता है। इतना ही समय लगता है। लौटकर वह अनेक रूपों में प्रकट होता है, और तुलसी यहाँ जो गिनती देते हैं वह ध्यान से पढ़ने लायक़ है। वे यह नहीं कहते कि असंख्य रावण हो गये। वे कहते हैं कि श्रीरघुनाथ की सेना में जितने भालू और वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ प्रकट हो गये। यानी गिनती मनमानी नहीं है, वह सामने वाले की गिनती से नापी गयी है। हर वानर के हिस्से में एक पूरा रावण आ गया। अनगिनत से डर लगता है, पर अपने बराबर की संख्या से जो डर लगता है वह दूसरी तरह का होता है, क्योंकि उसमें हर आदमी को अलग से यह दिखता है कि यह मेरे लिये आया है।

अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥
रघुपति कटक भालु कपि जेते । जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥

चौपाई १

वानरों ने अपरिमित दशानन देखे और जहाँ-तहाँ भाग चले। भागते हुए वे धीरज नहीं धरते, और जो पुकार उनके मुँह से निकलती है उसमें दो नाम हैं, लक्ष्मण और रघुवीर। फिर गिनती और बढ़ती है। दसों दिशाओं में करोड़ों रावण दौड़ रहे हैं और घोर, कठोर, भयावने शब्द से गरज रहे हैं। और यहाँ तुलसी वह करते हैं जो इस पूरे काण्ड में बहुत कम करते हैं। वे भागने वालों में देवताओं को गिनाते हैं। सब देवता डर गये और भागते हुए आपस में यह कहते गये कि हे भाई, अब जय की आशा छोड़ दो। उनका तर्क भी साथ में लिखा हुआ है, कि एक ही रावण ने सब देवताओं को जीत लिया था, अब तो बहुत हो गये हैं, इसलिये पहाड़ की गुफाएँ ढूँढ़ो।

और तभी यह भी बता दिया जाता है कि कौन नहीं भागे। ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि वहीं डटे रहे, और उनके डटे रहने का कारण साहस नहीं बताया गया। कारण यह बताया गया है कि जिन्होंने प्रभु की महिमा कुछ जानी थी, वे रुके रहे। इस आधी पंक्ति से इस पूरे हिस्से का ढाँचा बन जाता है। मैदान में दो तरह के लोग हैं, और उनके बीच की लकीर बल की नहीं है, पहचान की है। जिसने पहचान लिया है, उसके लिये करोड़ों रावण भी एक झूठ ही हैं। जिसने नहीं पहचाना, उसके लिये एक भी सच है।

जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।
चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥
हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे।
मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥

छन्द

छन्द इसी को खोलकर रख देता है। जिन्होंने प्रताप जाना था वे निर्भय रहे, और वानरों ने शत्रु को फुरे मान लिया, यानी सच्चा मान लिया। इसके बाद ही वे विचलित होकर भागते हैं और भय से व्याकुल होकर पुकारते हैं कि हे कृपालु, रक्षा कीजिये। यानी जो चीज़ उन्हें भगा रही है वह रावण नहीं है, उस रावण को सच मान लेना है। और उसी छन्द में चार नाम डटे हुए भी हैं। हनुमान, अंगद, नील और नल अत्यन्त बलवान रणबाँकुरों की तरह लड़ रहे हैं और कोटि-कोटि रावणों को मसल रहे हैं। और उन रावणों के लिये तुलसी जो शब्द रखते हैं वह खेती का है, कपट भू भट अंकुरे, कपट की भूमि से अंकुर की तरह उगे हुए योद्धा। इस पन्ने पर उगने की बात यहाँ पहली बार आती है और आख़िरी बार नहीं।

अब दोहा आता है, और उसका पहला काम कोई प्रहार नहीं है। उसका पहला काम एक हँसी है।

सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।
सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥ ९६॥

दोहा ९६

देवताओं और वानरों को विकल देखकर कोसलपति हँसे। इस हँसी में मज़ाक़ नहीं है, नाप है। जिस चीज़ से सारा मैदान भाग रहा है, वह देखने वाले की दृष्टि में इतनी भर है कि उस पर हँसा जा सके। और उसके बाद जो होता है वह उसी नाप के अनुसार होता है। शार्ङ्ग पर एक बाण चढ़ाया गया और सब दशानन मार डाले गये। करोड़ों के लिये एक। यह हिसाब याद रखने लायक़ है, क्योंकि इस पन्ने के अन्त में जब असली शरीर की बारी आयेगी, तब गिनती इकतीस हो जायेगी।

अगली चौपाई इसे एक उपमा से पूरा करती है। प्रभु ने क्षणभर में सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार फट जाता है। अन्धकार से कोई लड़ता नहीं, और न ही उसे काटने के लिये कोई अलग से हथियार उठाता है। वह हटता ही उस चीज़ के आने से है जिसकी वह अनुपस्थिति था। अब एक ही रावण बचा है, और उसे देखकर देवता हर्षित होते हैं, लौट आते हैं और प्रभु पर बहुत से फूल बरसाते हैं। थोड़ी देर पहले ये वही लोग थे जो गुफाओं की सलाह दे रहे थे।

सार: पिछले प्रसंग के पाखण्ड के भीतर यह पन्ना खुलता है। रावण क्षणभर को अदृश्य होकर उतने रूपों में प्रकट होता है जितने राम की सेना में भालू-वानर हैं। वानर और देवता भाग चलते हैं, केवल ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि डटे रहते हैं। दोहा छियानबे में राम विकल सेना को देखकर हँसते हैं और एक ही बाण से सारे झूठे रावण मिटा देते हैं, जैसे सूर्य के उगने पर अन्धकार फट जाता है।

एक लात, और एक दोहा जिसमें सब अटक जाता है

राम भुजा उठाकर वानरों को लौटाते हैं। भागे हुए लोग एक-एक करके नहीं लौटते, वे एक दूसरे को पुकार-पुकारकर लौटते हैं, और प्रभु का बल पाकर फुर्ती से उछलकर रणभूमि में आ जाते हैं। इधर रावण देवताओं को स्तुति करते देख रहा है, और उसके मन में जो हिसाब बैठता है वह विचित्र है। वह सोचता है कि इनकी समझ में मैं एक हो गया। इसके बाद उसका वाक्य एक ताना है, कि ये मूर्ख सदा से ही उसकी मार खाने वाले रहे हैं। और यह कहकर वह वानरों को छोड़कर क्रोध में आकाश की ओर दौड़ता है। जिस लड़ाई में वह हार रहा है, उसे छोड़कर वह उस तरफ़ जाता है जहाँ उसका पुराना हिसाब जमा है।

हाहाकार करत सुर भागे । खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥
देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥

चौपाई २

देवता हाहाकार करते हुए भागते हैं और उसका पीछा करता हुआ वाक्य आता है, कि दुष्टो, मेरे आगे से कहाँ जाओगे। और तभी अंगद दौड़ते हैं, और उनके दौड़ने का कारण पाठ में साफ़ लिखा है: देवताओं को व्याकुल देखकर। वे कूदते हैं, चरण पकड़ते हैं, और उसे पृथ्वी पर गिरा देते हैं। जो आदमी अभी-अभी करोड़ों होकर पूरे मैदान को भगा चुका था, वह एक पैर की पकड़ से ज़मीन पर है। इसके बाद छन्द में अंगद उसे लात मारकर प्रभु के पास चले जाते हैं, और वह सँभलकर उठता है, घोर कठोर शब्द से गरजता है, दर्प करके दसों धनुष चढ़ाता है, बाण बरसाकर सब योद्धाओं को घायल और भयाकुल कर देता है, और अपना बल देखकर हर्षित होता है। गिरना, उठना, और फिर अपने ही बल पर प्रसन्न हो जाना। यह क्रम इस पन्ने पर बार-बार लौटेगा।

और अब वह दोहा आता है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है, और जिसके बाद इस पन्ने की हर घटना एक ही प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ती हुई चलती है।

तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥ ९७॥

दोहा ९७

ध्यान दीजिये कि क्या-क्या काटा गया। सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष। यानी आदमी भी और उसका सामान भी। और चारों फिर बहुत बढ़ गये। उपमा के लिये तुलसी रणभूमि से कुछ नहीं उठाते। वे तीर्थ पर चले जाते हैं। तीर्थ में किया हुआ पाप जैसे बढ़ जाता है, वैसे ये बढ़े। पोद्दार जी इसे खोलकर कहते हैं कि वह कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करता है। उपमा का काम यहाँ सजाना नहीं है, तर्क देना है। जो जगह पाप को मिटाने के लिये बनी है, वही उसे कई गुना कर देती है, यदि आदमी उसी जगह पर जाकर वह काम करे। इसी तरह जो बाण उसे घटाने के लिये चला है, वही उसे बढ़ा रहा है।

सार: राम भुजा उठाकर भागे हुए वानरों को लौटाते हैं। रावण देवताओं पर झपटता है, अंगद कूदकर उसका पैर पकड़कर उसे गिरा देते हैं और लात मारकर लौट जाते हैं। वह उठकर दसों धनुष चढ़ाकर सबको घायल कर देता है। तब दोहा सत्तानबे में राम उसके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डालते हैं, और वे फिर बहुत बढ़ जाते हैं, जैसे तीर्थ में किया हुआ पाप बढ़ जाता है।

नख, दाँत और दो भौंरे

शत्रु के सिरों और भुजाओं की बढ़ती देखकर भालुओं और वानरों को बहुत क्रोध होता है, और उनके क्रोध में जो वाक्य है वह एक शिकायत है, कि यह मूर्ख भुजाओं और सिरों के कटने पर भी नहीं मरता। इसके बाद नामों की एक पंक्ति आती है, बालि के पुत्र अंगद, मारुति हनुमान, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद, और ये सब वृक्षों और पर्वतों का प्रहार करते हैं। और तुलसी अगली ही आधी पंक्ति में उसका उत्तर लिख देते हैं: वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षों को पकड़कर वानरों को मारता है। जो फेंका जा रहा है वही लौटकर आ रहा है।

फिर लड़ाई हथियारों से उतरकर शरीर पर आ जाती है। कोई वानर नखों से उसका शरीर फाड़कर भाग जाता है, कोई लात मारकर। और तब नल और नील उसके सिरों पर चढ़ जाते हैं और नखों से उसके ललाट फाड़ने लगते हैं। यह कोई युद्ध नहीं है, यह किसी चीज़ पर चढ़कर उसे नोचना है, और जिस आदमी पर यह हो रहा है वह वही है जिसने अभी-अभी सब देवताओं को भगाया था। इसके बाद जो आधी पंक्ति आती है, वह इस पूरे पन्ने पर उसके भीतर का पहला समाचार है। खून देखकर उसके हृदय में भारी विषाद हुआ। पीड़ा नहीं लिखी गयी, विषाद लिखा गया।

फिर वह उन दोनों को पकड़ने के लिये हाथ फैलाता है, और वे पकड़ में नहीं आते। वे उसके हाथों के ऊपर-ऊपर ही फिरते रहते हैं, और तुलसी उस पर जो उपमा रखते हैं वह लड़ाई की नहीं है: मानो दो भौंरे कमलों के वन में विचर रहे हों। बीस हाथ फैले हुए हैं और उन्हें एक कमल-वन बना दिया गया है। इस चित्र को याद रखिये, क्योंकि यह इसी पन्ने पर थोड़ी देर बाद लौटेगा और तब इसका अर्थ उलटा हुआ होगा।

आख़िर वह क्रोध करके उछलता है और दोनों को पकड़ लेता है। पर पृथ्वी पर पटकते समय वे उसकी भुजाएँ मरोड़कर निकल भागते हैं। तब वह फिर हाथों में दसों धनुष लेता है और बाणों से मारकर वानरों को घायल कर देता है। हनुमान आदि वानर मूर्च्छित हो जाते हैं, और यहाँ तुलसी समय बता देते हैं। प्रदोष पाकर दशकन्धर हर्षित हुआ, यानी सन्ध्या का समय पाकर। रात उसका पक्ष है और वह यह जानता है। और ठीक उसी घड़ी, सब वानर वीरों को मूर्च्छित देखकर, रणधीर जाम्बवान् दौड़ पड़ते हैं।

जाम्बवान् के साथ के भालू पर्वत और वृक्ष धारण किये हुए उसे ललकार-ललकारकर मारने लगते हैं। बलवान रावण क्रोधित होता है और पैर पकड़-पकड़कर अनेकों योद्धाओं को पृथ्वी पर पटकने लगता है। और तब अपने दल का यह विध्वंस देखकर भालुओं के स्वामी वह करते हैं जो इस पन्ने पर दूसरी बार हो रहा है। वे क्रोध करके उसकी छाती के ठीक बीच में लात मारते हैं।

उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।
गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥

छन्द

छाती पर लात का प्रचण्ड आघात, और वह व्याकुल होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। और अगली ही पंक्ति में वह चित्र लौट आता है। उसने बीसों हाथों में भालुओं को पकड़ रखा था, मानो रात के समय भौंरे कमलों में बसे हुए हों। थोड़ी देर पहले भौंरे उसके हाथों के ऊपर उड़ रहे थे और पकड़ में नहीं आते थे। अब वे उसकी मुट्ठियों में हैं, और उपमा में रात भी जुड़ गयी है, वही रात जिसमें भौंरा कमल के भीतर ही रह जाता है। जो पकड़ा गया है वह वही है जो पकड़े जाने से पहले उड़ रहा था, और पकड़ने वाला वहीं पड़ा है।

उसे मूर्च्छित देखकर जाम्बवान् एक बार और लात मारते हैं और प्रभु के पास चले जाते हैं। अब रणभूमि पर उसका अपना आदमी बचता है। रात्रि जानकर सारथि उसे रथ में डालता है और होश में लाने का उपाय करने लगता है। दोहा अट्ठानबे इस दिन को बन्द कर देता है। मूर्च्छा दूर होने पर सब भालू-वानर प्रभु के पास आ जाते हैं, और उधर सब राक्षस अत्यन्त भयभीत होकर रावण को घेरकर खड़े हो जाते हैं। दोनों दल लौट चुके हैं, और दोनों के लौटने में फ़र्क़ यह है कि एक तरफ़ लोग अपने स्वामी के पास जा रहे हैं और दूसरी तरफ़ लोग अपने स्वामी को घेरकर खड़े हैं।

सार: वानर और भालू नखों और लातों से उस पर टूट पड़ते हैं, नल और नील उसके सिरों पर चढ़कर ललाट फाड़ते हैं और उसके हाथों में नहीं आते। सन्ध्या पाकर वह हनुमान आदि को मूर्च्छित कर देता है, तब जाम्बवान् दौड़कर उसकी छाती में लात मारते हैं और वह रथ से गिर पड़ता है। सारथि रात जानकर उसे रथ में डालकर ले जाता है, और दोहा अट्ठानबे में दोनों दल अपने-अपने स्वामी के पास लौट आते हैं।

उसी रात, अशोक वाटिका में

अब यह पन्ना रणभूमि छोड़ देता है, और जितनी देर के लिये छोड़ता है वह इस पूरे प्रसंग का सबसे लम्बा हिस्सा है। उसी रात त्रिजटा सीता के पास जाती हैं और सारी कथा कह सुनाती हैं। सोचिये कि वे कौन-सी ख़बर लेकर आयी हैं। न हार की, न जीत की। वे यह ख़बर लेकर आयी हैं कि शत्रु के सिर और भुजाएँ कटकर बढ़ जाती हैं। युद्ध की सारी ख़बरों में यह अकेली ऐसी ख़बर है जिसका कोई पक्ष नहीं है, और इसीलिये वह सबसे डरावनी है।

तेही निसि सीता पहिं जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥

चौपाई ३

सुनते ही सीता के हृदय में बड़ा भय होता है, मुख मलिन हो जाता है और मन में चिन्ता उपज आती है। और फिर वे जो पूछती हैं, उसका शब्द-शब्द नापा हुआ है। वे यह नहीं पूछतीं कि क्या वह मरेगा। वे पूछती हैं कि हे माता, बताती क्यों नहीं, क्या होगा, यह विश्व को दुख देने वाला किस विधि से मरेगा। प्रश्न में संशय नहीं है, प्रश्न में विधि की माँग है। उन्हें यह जानना है कि रास्ता कौन-सा है, क्योंकि जो रास्ता अब तक दिख रहा था वह बन्द हो चुका है।

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही॥

चौपाई ४

और अपना उत्तर वे ख़ुद दे देती हैं, और यह इस पन्ने की सबसे कठिन आधी पंक्ति है। रघुनाथ के बाणों से सिर कटने पर भी वह नहीं मरता, विधाता सारे चरित्र उलटे ही कर रहा है, और फिर वे कहती हैं कि मेरा अभाग्य ही उसे जिला रहा है, वही अभाग्य जिसने मुझे हरि के चरणकमलों से अलग किया। एक स्त्री, जो बन्दी है, जिसका कोई हाथ इस युद्ध में नहीं है, शत्रु के जीवित रहने का हिसाब अपने नाम लिख रही है।

और वे रुकती नहीं। जिसने कपट का झूठा स्वर्णमृग बनाया, वही दैव अब भी मुझ पर रूठा है। जिस विधाता ने मुझसे दुःसह दुख सहन कराये और लक्ष्मण को कड़वे वचन कहलाये। जो रघुनाथ के विरह के विषैले बाणों से तक-तककर मुझे बार-बार मारता है। जो ऐसे दुख में भी मेरे प्राण रखे हुए है। वही उसे जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं। इस सूची में जो दो चीज़ें उन्होंने चुनी हैं, वे उनकी अपनी याद में सबसे भारी दो क्षण हैं, वह मृग और वे वचन। यानी वे अपने भाग्य के विरुद्ध जो मुक़दमा रख रही हैं, उसमें सबूत के तौर पर अपनी ही सबसे बुरी घड़ियाँ लगा रही हैं।

कृपानिधान की याद कर-करके जानकी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं। यहाँ तक इस हिस्से में कोई उत्तर नहीं आया है, केवल एक स्त्री का अपने आप से किया हुआ हिसाब है। उत्तर अब आता है, और वह उसी त्रिजटा से आता है जो इस नगरी की ही हैं।

सार: उसी रात त्रिजटा अशोक वाटिका में आकर सीता को सारी कथा सुनाती हैं। शत्रु के सिरों और भुजाओं की बढ़ती सुनकर सीता के हृदय में बड़ा भय होता है और वे पूछती हैं कि यह विश्व को दुख देने वाला किस विधि से मरेगा। फिर वे स्वयं कहती हैं कि राम के बाणों से भी वह नहीं मरता, और उसे जिलाने वाला उनका अपना अभाग्य है, वही जिसने स्वर्णमृग रचा था।

जिसके हृदय में जानकी बसती हैं

त्रिजटा का उत्तर एक वाक्य में आ जाता है, और उस वाक्य से यह सारा प्रसंग खुल जाता है। वे कहती हैं कि हे राजकुमारी, सुनो, देवताओं का शत्रु हृदय में बाण लगते ही मर जायेगा। यानी वह अवध्य है ही नहीं। इस प्रसंग में कोई ऐसा वरदान नहीं गिनाया जाता जिसने उसे अमर कर रखा हो। एक जगह है जहाँ बाण लगते ही सब समाप्त है, और वह जगह अब तक छोड़ी जा रही है। इसके बाद जो आधी पंक्ति आती है, वह बताती है कि छोड़ी क्यों जा रही है।

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥

चौपाई ५

प्रभु इसी कारण उसके हृदय पर प्रहार नहीं करते कि इसके हृदय में वैदेही बसती हैं। इस लड़ाई के इतने लम्बे खिंचने का कारण उसका बल नहीं है, एक पता है। जिस आदमी ने उन्हें हर लिया और जो उनके लिये ही मारा जाने वाला है, उसी के भीतर वे रहती हैं, और इसीलिये वह जगह सुरक्षित है। यह बात जितनी विचित्र लगती है, पाठ में उतनी ही सीधी रखी हुई है। और अगले छन्द में यह एक क़दम और आगे जाती है।

एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।

छन्द

इसके हृदय में जानकी बसती हैं, जानकी के हृदय में मेरा निवास है। और उसी छन्द का शेष यह जोड़ता है कि मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं, इसलिये बाण लगते ही सबका नाश है। तीन कमरे एक के भीतर एक। सबसे बाहर एक राक्षस का हृदय, उसके भीतर राम, और उनके भीतर सारे लोक। जो बाण उस बाहरी दीवार को भेदेगा, वह उन सब तक पहुँचेगा। इसीलिये वह बाण रोका हुआ है, और इसीलिये सिर कटते हैं और बढ़ते रहते हैं। पन्ने की शुरुआत में जो असम्भव-सी बात लगती थी, उसका कारण किसी वरदान में नहीं, इस भूगोल में निकलता है।

यह सुनकर सीता के मन में हर्ष और विषाद दोनों एक साथ होते हैं, और यह देखकर त्रिजटा फिर कहती हैं कि हे सुन्दरी, महान सन्देह छोड़ दो, अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा। और जो वे कहती हैं वह इस पन्ने की सबसे काम की बात है, क्योंकि वह उस चीज़ को अर्थ दे देती है जो अब तक व्यर्थ दिख रही थी।

काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।
तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान॥ ९९॥

दोहा ९९

सिरों के बार-बार काटे जाने से वह व्याकुल हो जायेगा, और व्याकुल होने पर उसके हृदय से आपका ध्यान छूट जायेगा। तब सुजान राम उसके हृदय में बाण मारेंगे। यानी जो कटाई निष्फल दिख रही थी, वही पूरी विधि है। हर बार जो सिर काटा जा रहा है, वह उस पकड़ को ढीला कर रहा है जिससे वह आदमी अपने भीतर एक ध्यान थामे हुए है। दोहा सत्तानबे से जो प्रश्न उठा था, उसका उत्तर दोहा निन्यानबे में है, और उत्तर देने वाली एक राक्षसी है, जो लङ्का में रहती है और रात में यह बात उस स्त्री को बताने आयी है जिसके कारण यह सारी देर लगी है।

सार: त्रिजटा बताती हैं कि हृदय में बाण लगते ही रावण मर जायेगा, पर प्रभु उसके हृदय पर बाण इसलिये नहीं मारते कि उसमें वैदेही बसती हैं, वैदेही के हृदय में राम, और राम के उदर में अनेकों भुवन। फिर वे दोहा निन्यानबे में विधि बता देती हैं: सिरों के बार-बार कटने से वह व्याकुल होगा, उसका ध्यान छूटेगा, और तब राम उसके हृदय में बाण मारेंगे।

एक ही रात में दो जागते हुए लोग

त्रिजटा बहुत प्रकार से समझाकर अपने घर चली जाती हैं, और जाते ही सीता के भीतर वही लौट आता है जो समझाने से नहीं जाता। राम के स्वभाव का स्मरण करके उन्हें अत्यन्त विरहव्यथा उपजती है। वे रात्रि की और चन्द्रमा की बहुत प्रकार से निन्दा करती हैं, और उनकी शिकायत का माप बहुत सीधा है: रात युग के समान बड़ी हो गयी और बीतती ही नहीं। मन ही मन वे भारी विलाप कर रही हैं। और तब, जब हृदय में दाह असह्य हो जाता है, उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठते हैं। इसे शकुन मानकर वे मन में धीरज धरती हैं कि अब कृपालु रघुवीर अवश्य मिलेंगे। दुख के बीच में मिला हुआ एक छोटा-सा संकेत, और उसे पकड़कर एक पूरी रात काट ली जाती है।

और ठीक अगली पंक्ति में यह पन्ना उसी रात के दूसरे जागने वाले के पास चला जाता है।

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा॥
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही । धिग धिग अधम मंदमति तोही॥

चौपाई ६

आधी रात को रावण मूर्च्छा से जागता है, और होश आते ही वह जो पहला काम करता है वह अपने बचाने वाले को धिक्कारना है। सारथि पर वह रुष्ट होता है कि इसने मुझे रणभूमि से अलग कर दिया, और उसे अधम और मन्दबुद्धि कहकर बार-बार धिक्कारता है। इस पूरे पन्ने पर वह अकेला आदमी यही है जिसे किसी की जान बचाने का दण्ड मिलता है। और वह दण्ड उस आदमी से मिल रहा है जो उस समय बेहोश पड़ा था और जिसे उठाकर ले जाना पड़ा था।

दोनों दृश्य एक ही रात के हैं और आमने-सामने रखे हुए हैं। एक जगह वह स्त्री है जिसके लिये रात युग जितनी लम्बी है और जो एक फड़कती हुई पलक को पकड़कर धीरज बना लेती है। दूसरी जगह वह आदमी है जो अपनी रात इस पर ख़र्च कर रहा है कि उसे मैदान से हटाया क्यों गया।

सारथि उसके चरण पकड़कर उसे बहुत प्रकार से समझाता है, और सबेरा होते ही वह फिर रथ पर चढ़कर दौड़ता है। उसका आना सुनकर वानरों की सेना में बड़ी खलबली मचती है। वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँ से पर्वत और वृक्ष उखाड़कर दाँत कटकटाते हुए दौड़ते हैं, और छन्द में उनका वेग ऐसा है कि राक्षस भाग निकलते हैं। बलवान वानर उसकी सेना को विचलित करके फिर उसी को घेर लेते हैं, चारों ओर से चपेटे मारते हैं और नखों से शरीर विदीर्ण करके उसे व्याकुल कर देते हैं। इस पन्ने पर यह तीसरी बार है जब वानर उसे घेरकर हाथों और नखों से सँभालते हैं, और इस बार उसका उत्तर न धनुष है न गर्जना। इस बार वह उसी दरवाज़े पर लौटता है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था।

सार: त्रिजटा के जाने पर सीता को रात युग जैसी लगती है, और अन्त में बायाँ नेत्र और बाहु फड़कने पर वे इसे शकुन मानकर धीरज धरती हैं। उसी रात आधी रात को रावण जागता है और अपने सारथि को इसलिये धिक्कारता है कि उसने उसे रणभूमि से हटा दिया। सबेरा होते ही वह फिर निकलता है, और वानर उसकी सेना को विचलित करके उसे चारों ओर से घेरकर व्याकुल कर देते हैं।

दूसरी माया

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार।
अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार॥ १००॥

दोहा १००

दोहे की पहली पंक्ति कारण बता देती है: वानरों को बड़ा ही प्रबल देखकर उसने विचार किया। विचार का नतीजा अन्तर्धान होना है, और निमेषभर में माया का विस्तार। यह वही दरवाज़ा है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था, और दूसरी बार उससे जो निकलता है वह पहले से गन्दा है। पहली बार उसने अपने ही रूप बनाये थे, बहुत सारे रावण, यानी एक झूठ जिसमें कम से कम उसका अपना चेहरा था। इस बार वह अपने चेहरे से भी बाहर चला जाता है।

जब उसने पाखण्ड रचा तो प्रचण्ड जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथों में धनुष-बाण लिये हुए। योगिनियाँ एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में मनुष्य की खोपड़ी लिये, ताज़ा खून पीकर नाचती और तरह-तरह के गीत गाती हुईं। चारों ओर एक ही ध्वनि भर जाती है, पकड़ो और मारो, और वे मुँह फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगते हैं। और भागकर वे जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। इस एक आधी पंक्ति में माया का पूरा काम आ जाता है: भागने की दिशा का न बचना।

फिर वह बालू बरसाने लगता है। वानरों को जहाँ-तहाँ थकित करके दशानन फिर गरजता है, और लक्ष्मण तथा वानरराज सहित सब वीर अचेत हो जाते हैं। हा राम, हा रघुनाथ पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर वह एक और कपट रचता है, और यह चुनाव इस पूरे पन्ने पर सबसे निर्दय चुनाव है। वह बहुत सारे हनुमान प्रकट करता है, जो पत्थर लिये दौड़ते हैं और चारों ओर दल बनाकर राम को घेर लेते हैं। वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारते हैं, मारो, पकड़ो, जाने न पावे। दसों दिशाओं में लंगूर शोभा दे रहे हैं और उनके बीच में कोसलराज हैं। जितने चेहरे वह चुन सकता था, उनमें से उसने वही चुना जिसने उसे सबसे ज़्यादा चोट दी है, और उसी चेहरे की एक घेराबन्दी उसने राम के चारों ओर खड़ी कर दी है।

तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।
रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥
माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे। सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥ श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं। सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥॥ २॥

छन्द

और छन्द इस घेरे को सुन्दर बना देता है, जो माया की सबसे सच्ची पहचान है। उनके बीच में कोसलराज का श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो किसी ऊँचे तमाल वृक्ष के चारों ओर अनेक इन्द्रधनुषों की श्रेष्ठ बाड़ बना दी गयी हो। पूँछों का घेरा इन्द्रधनुष हो गया और घिरा हुआ आदमी एक वृक्ष। फिर देवताओं की पुकार आती है, और उनके हृदय में हर्ष और विषाद दोनों एक साथ लिखे गये हैं, दर्शन का हर्ष और घेरे का विषाद। और उसके बाद वह आधी पंक्ति, जिसमें यह सारा जाल जितनी देर में बना था उससे कम देर में टूट जाता है। रघुवीर ने क्रोध करके एक ही बाण से निमेषभर में माया हर ली।

फिर वही हिसाब दुहराया जाता है जो दोहा छियानबे में था। एक बाण, एक पलक। माया हटते ही वानर-भालू हर्षित होकर वृक्ष और पर्वत लेकर लौट पड़ते हैं। राम बाणों के समूह छोड़ते हैं और रावण के हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वी पर गिरते हैं। और इसी जगह तुलसी एक बात कह देते हैं जो पाठ के भीतर से पाठ के ऊपर चली जाती है: राम और रावण के इस युद्ध का चरित यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते।

सार: वानरों को प्रबल देखकर रावण दोहा एक सौ में फिर अन्तर्धान होकर माया फैलाता है। बेताल, भूत, पिशाच और खप्पर लिये योगिनियाँ प्रकट होती हैं, भागते वानरों को हर दिशा में आग दिखती है, बालू बरसती है और लक्ष्मण तथा सुग्रीव सहित सब वीर अचेत हो जाते हैं। फिर वह बहुत से हनुमान प्रकट करके राम को घेर लेता है, और रघुवीर एक ही बाण से निमेषभर में सारी माया हर लेते हैं।

मक्खी अपने ही बल के अनुसार उड़ती है

और ठीक उसी जगह, जहाँ पाठ ने अभी कहा है कि इस चरित का पार कोई नहीं पा सकता, तुलसी अपना नाम लेकर सामने आ जाते हैं। पूरे काण्ड में ऐसी जगहें गिनी-चुनी हैं, और यह उनमें सबसे ज़रूरी है, क्योंकि यह लड़ाई के ठीक बीच में आती है, वहाँ नहीं जहाँ कोई अध्याय पूरा हो रहा हो।

ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।
जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥ १०१ क ॥
काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥॥ १०१ (ख)॥

दोहा १०१ क

वे अपने को जड़मति कहते हैं और कहते हैं कि उस चरित के कुछ ही गुण उन्होंने कहे हैं, जैसे मक्खी अपने बल के अनुरूप आकाश में उड़ती है। उपमा में दो बातें एक साथ हैं। मक्खी सचमुच उड़ती है, और वह आकाश में ही उड़ती है, किसी और छोटी जगह में नहीं। और साथ ही उसकी ऊँचाई उसके अपने बल से नपती है, आकाश की ऊँचाई से नहीं। इस दोहे के बाद जो कुछ इस पन्ने पर आता है, उसे इसी विनय के नीचे पढ़ना चाहिये।

और इसी दोहे का दूसरा भाग उस अटकाव को फिर एक बार, बहुत ठंडे ढंग से रख देता है। सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं, फिर भी वीर लङ्केश मरता नहीं। प्रभु तो क्रीड़ा कर रहे हैं, परन्तु देवता, सिद्ध और मुनि उस क्लेश को देखकर व्याकुल हैं। एक ही दृश्य, और उसे देखने के दो ढंग। जो कर रहा है उसके लिये यह खेल है। जो देख रहे हैं उनके लिये यह कष्ट है। तुलसी दोनों को एक ही दोहे में रखकर आगे बढ़ जाते हैं और यह नहीं बताते कि कौन ठीक देख रहा है।

सार: पाठ यह कहकर कि इस युद्ध का पार शेष, सरस्वती, वेद और कवि भी नहीं पा सकते, तुलसीदास को सामने ले आता है, जो अपने को जड़मति कहते हैं और अपनी उड़ान को मक्खी की उड़ान बताते हैं। उसी दोहे का दूसरा भाग कहता है कि बार-बार सिर-भुजाएँ कटने पर भी लङ्केश मरता नहीं, और यह प्रभु के लिये क्रीड़ा है, देवताओं-मुनियों के लिये क्लेश।

लोभ की तरह बढ़ते हुए सिर

काटत बढ़हिं सीस समुदाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥

चौपाई ७

अब वही बात दूसरी उपमा पाती है, और यह उपमा पहली से भी पास की है। काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है। तीर्थ वाली उपमा जगह की थी, यह उपमा मन की है, और दोनों एक ही नियम बता रही हैं: कुछ चीज़ें उसी क्रिया से बढ़ती हैं जिससे उन्हें घटना चाहिये। जो मिल गया वह लोभ को शान्त नहीं करता, उसे बड़ा कर देता है, और अगली बार माँग और ऊँची होती है। इसी तरह जो सिर काटा गया वह संख्या घटाता नहीं, बढ़ा देता है। इस पन्ने पर जो अटकाव है, तुलसी उसे बल का मामला नहीं मानते। वे उसे उस चीज़ का मामला मानते हैं जो कटने से बढ़ती है।

उसी चौपाई में लिखा है कि शत्रु मरता नहीं और श्रम बहुत हुआ। और इसके बाद वह आधी पंक्ति आती है जो पूरे पन्ने को मोड़ देती है: राम बिभीषन तन तब देखा। कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता। केवल देखा जाता है। और पाठ यह भी बता देता है कि इस देखने का अर्थ क्या है। शिवजी उमा से कहते हैं कि जिसकी इच्छामात्र से काल भी मर जाता है, वही प्रभु अपने सेवक की प्रीति की परीक्षा ले रहे हैं। यानी यह जानकारी माँगना नहीं है। जिसे यह पहले से मालूम है, वह अपने आदमी को वह अवसर दे रहा है जो केवल पूछे जाने से मिलता है।

और विभीषण का उत्तर भी उसी तरह बना हुआ है। वे पहले चार सम्बोधन देते हैं, सर्वज्ञ, चराचर के नायक, शरणागत के पालक, देवताओं और मुनियों को सुख देने वाले। यानी वे पहले यह कहते हैं कि सामने वाला सब जानता है, और उसके बाद उसे कुछ बताते हैं। यह आदमी जानता है कि यह परीक्षा है, और फिर भी उत्तर देता है, क्योंकि परीक्षा में उत्तर देना ही प्रीति है।

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥

चौपाई ८

इसके नाभिकुण्ड में अमृत का निवास है, हे नाथ, रावण उसी के बल पर जीता है। यह इस पन्ने का दूसरा उत्तर है, और पहले उत्तर से यह बिलकुल अलग जगह से आता है। त्रिजटा ने बताया था कि वह मर कहाँ सकता है और वह जगह छोड़ी क्यों जा रही है। विभीषण बताते हैं कि वह टिका किस बल पर है। पाठ दोनों को साथ-साथ रखता है और दोनों को आपस में जोड़ने की कोई कोशिश नहीं करता, इसलिये हम भी नहीं जोड़ेंगे। जो इस पन्ने पर लिखा है, वह इतना ही है।

और उत्तर सुनते ही राम का पहला भाव हर्ष है। विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिये। यह हर्ष सूचना का नहीं हो सकता, क्योंकि सूचना उनके पास पहले से थी। यह हर्ष उस आदमी का है जिसकी परीक्षा पूरी हुई और जो उसमें खरा उतरा।

सार: कटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है, जैसे हर लाभ पर लोभ बढ़ता है, और श्रम बहुत हो जाता है। तब राम विभीषण की ओर देखते हैं, और शिवजी बताते हैं कि यह सेवक की प्रीति की परीक्षा है। विभीषण चार सम्बोधनों के बाद कहते हैं कि रावण के नाभिकुण्ड में अमृत बसता है और वह उसी बल पर जीता है, और यह सुनकर राम हर्षित होकर विकराल बाण हाथ में लेते हैं।

इकतीस बाण

बाण हाथ में आते ही आकाश और पृथ्वी बोलने लगते हैं। नाना प्रकार के अशकुन होने लगते हैं। बहुत से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगते हैं। पक्षी जगत की आर्ति सूचित करने के लिये बोलने लगते हैं। आकाश में जहाँ-तहाँ केतु प्रकट हो जाते हैं। दसों दिशाओं में अत्यन्त दाह होने लगता है। बिना किसी पर्व के सूर्यग्रहण लग जाता है। मूर्तियाँ नेत्रों के मार्ग से जल बहाने लगती हैं।

और इसी सूची के बीच में एक पंक्ति ऐसी है जो अशकुन नहीं है। मन्दोदरी का हृदय बहुत काँपने लगा। ग्रहण, केतु, दाह और रोती हुई मूर्तियों के बीच में एक स्त्री का काँपता हुआ हृदय रख दिया गया है, उसी सूची में, उसी क्रम में। तुलसी यह नहीं कहते कि उसे कुछ पता चला। वे केवल इतना कहते हैं कि उसी घड़ी उसका हृदय काँपा। इस पन्ने पर यह दूसरा शरीर है जो किसी दूर की घटना पर पहले हिलता है। पहली अशोक वाटिका में थी, जिसका बायाँ नेत्र और बाहु फड़के थे, और उसने उसे शुभ शकुन माना था।

छन्द इस सारे उत्पात को एक साथ रख देता है। मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाश से वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बही, पृथ्वी डोलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूल बरसाने लगे, और इतने अमङ्गल हुए कि उन्हें कौन कह सकता है। अपरिमित उत्पात देखकर आकाश में देवता व्याकुल होकर जय जय पुकारते हैं। और उनके भय को जानकर कृपालु रघुनाथ धनुष पर बाण जोड़ने लगते हैं। ध्यान दीजिये कि बाण चढ़ाने का कारण भी क्रोध नहीं लिखा गया है। कारण यह लिखा गया है कि देवताओं को भयभीत जाना।

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ १०२॥

दोहा १०२

कानों तक धनुष खींचकर उन्होंने इकतीस बाण छोड़े। संख्या ठीक-ठीक दी गयी है और उसका कोई हिसाब पाठ में नहीं समझाया जाता। और उपमा एक ही है, कि वे बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों। इस पन्ने पर काल शब्द पहले भी आ चुका है, जब शिवजी ने कहा था कि उनकी इच्छा से काल भी मर जाता है। अब वही काल उनके छोड़े हुए बाणों की उपमा बनकर लौटा है।

और यहीं यह प्रसंग रुक जाता है। बाण हवा में हैं। तुलसी यहाँ यह नहीं बताते कि वे कहाँ लगे, क्या हुआ, कौन गिरा। यह पन्ना उस आदमी के मरने पर पूरा नहीं होता, धनुष के कान तक खिंचने पर पूरा होता है। जो इतनी देर से नहीं हो पा रहा था, उसके होने का क्षण अगले प्रसंग में है, और वहाँ तक पहुँचने के लिये जो कुछ चाहिये था, वह सब इसी पन्ने पर इकट्ठा हो चुका है: विधि त्रिजटा से, भेद विभीषण से, और अवसर उस व्याकुलता से जो बार-बार सिर कटने से बनी।

सार: बाण हाथ में लेते ही नाना अशकुन होने लगते हैं, गदहे और स्यार रोते हैं, केतु निकल आते हैं, बिना पर्व के सूर्यग्रहण लगता है, मूर्तियाँ आँसू बहाती हैं और मन्दोदरी का हृदय काँपने लगता है। उत्पात देखकर देवता व्याकुल होकर पुकारते हैं, और उनका भय जानकर राम धनुष को कान तक खींचकर इकतीस बाण छोड़ते हैं, जो कालसर्पों की तरह चलते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर एक ही समस्या है और उसके लिये दो उपमाएँ दी गयी हैं, और दोनों ही युद्ध से बाहर की हैं। तीर्थ में किया हुआ पाप, और हर लाभ पर बढ़ता हुआ लोभ। दोनों एक ही बात कह रही हैं, कि कुछ चीज़ें उसी क्रिया से बढ़ती हैं जिससे उनका घटना तय माना जाता है। पाप मिटाने की जगह पर किया गया पाप और बड़ा हो जाता है। पाने से लोभ शान्त नहीं होता, बड़ा होता है। और सिर काटने से सिर कम नहीं होते। इसीलिये इस पन्ने का हल किसी बड़े हथियार में नहीं निकलता। हल एक जगह में निकलता है, हृदय में, और उस जगह तक पहुँचने का रास्ता भी बल का नहीं है। रास्ता यह है कि उसकी पकड़ ढीली हो।

और यही इस प्रसंग की सबसे विचित्र बात है। जिस आदमी को मारना है, उसके भीतर जो चीज़ बची हुई है वह उसकी अपनी नहीं है। वह किसी और का ध्यान है, जिसे उसने बलपूर्वक ले आकर अपने भीतर रख लिया है, और जब तक वह वहाँ है तब तक उस पर हाथ नहीं डाला जाता। सारा युद्ध इस एक मर्यादा के चारों ओर घूम रहा है। लङ्का के भीतर बैठी हुई एक बन्दी स्त्री अपने भाग्य को कोस रही है कि उसी के कारण वह जीवित है, और ठीक उसी रात उसे बताया जाता है कि कारण उसका अभाग्य नहीं है। कारण यह है कि वह उस हृदय में हैं, और उस हृदय पर बाण नहीं मारा जा रहा।

रात वाला हिस्सा इस पन्ने का असली केन्द्र है। एक तरफ़ वह स्त्री है जो एक पलक के फड़कने को शकुन मानकर पूरी रात काट लेती है। दूसरी तरफ़ वह आदमी है जिसे सुबह ऐसे संकेत मिलेंगे जिन्हें देखने के लिये कुछ ढूँढ़ना नहीं पड़ता, आकाश में केतु और बिना पर्व का ग्रहण, और वह उन्हें लेकर कुछ नहीं करेगा।

और अन्त में एक गिनती इस पूरे पन्ने को बाँध देती है। करोड़ों झूठे रावणों के लिये एक बाण। झूठे हनुमानों के पूरे घेरे के लिये एक बाण और एक निमेष। और असली शरीर के लिये इकतीस, वह भी कान तक खिंचे हुए धनुष से। जो झूठ है वह पलक झपकने में जाता है। जो सच में खड़ा है, उसे हटाने में समय, मर्यादा, एक रात की बातचीत और दो लोगों का दिया हुआ उत्तर लगता है।

इस पन्ने पर तुलसी अपने बारे में जो एक बात कहते हैं, वह लड़ाई के ठीक बीच में रखी हुई है और उसे वहीं से पढ़ना चाहिये। अभी-अभी कहा गया है कि इस युद्ध का पार सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों में भी नहीं पा सकते, और तुरन्त उसके बाद कहने वाला अपना नाम लेकर अपने को जड़मति कहता है और अपनी उड़ान को मक्खी की उड़ान बताता है। दावा यह नहीं है कि यह युद्ध लिख दिया गया। दावा यह है कि उसके कुछ गुण कहे गये हैं, और उतने ही कहे गये हैं जितने अपने बल से उड़ा जा सकता था। इतने बड़े आकाश के नीचे खड़े आदमी के लिये यही एक ईमानदार वाक्य बचता है।

और जो चित्र सबसे अन्त में रह जाता है वह बाण का नहीं है, उस हृदय का है जिस पर बाण नहीं मारा गया। दसों सिर बार-बार कट रहे हैं और बार-बार उग रहे हैं, बीसों भुजाएँ वही कर रही हैं, और उस सारे शोर के बीच में एक जगह ऐसी है जहाँ कोई नहीं छूता, क्योंकि वहाँ किसी और की याद रखी हुई है। त्रिजटा कहती हैं कि जिस दिन वह याद छूटेगी, उसी दिन वह बाण चलेगा। यानी उस आदमी को उसका बल नहीं बचा रहा। उसे वह चीज़ बचा रही है जो उसने चुरायी थी, और जिस दिन वह चीज़ उसके भीतर से निकल जायेगी, उस दिन वह अपने ही बल पर खड़ा होगा, और उतनी ही देर खड़ा रहेगा जितनी देर एक बाण को कान से चलकर पहुँचने में लगती है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ९६ से १०२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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