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अमृत, शिव की विनती, और वह विदा जो पूरी नहीं हुई

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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 17

इन्द्र अमृत बरसाकर मरे हुए वानर-भालुओं को उठा देते हैं। शिव आकर विनती करते हैं, विभीषण अपना घर सौंपते हैं। राम सबको अपने-अपने घर जाने को कहते हैं और कोई नहीं जाता, और पुष्पक उत्तर की ओर मुड़ जाता है।

लङ्काकाण्ड के इस आख़िरी प्रसंग में एक भी बाण नहीं चलता। पिछला प्रसंग एक प्रश्न पर ख़त्म हुआ था। युद्ध जीता जा चुका था, सीता लौट आयी थीं, और इन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा था, “अब कृपा करके आज्ञा दीजिये, मैं क्या करूँ।” यह प्रसंग उसी के उत्तर से शुरू होता है, और जिनसे पूछा गया है, वे अपने लिये कुछ नहीं माँगते। वे ज़मीन की ओर हाथ करते हैं, जहाँ उनके मारे गये साथी पड़े हैं।

उसके बाद का शोर लगातार छोटा होता जाता है। अमृत गिरता है और मरे हुए उठ बैठते हैं। देवता फूल बरसाकर विमानों पर चढ़कर चले जाते हैं। शिव अकेले रुके रहते हैं, एक लम्बी विनती करते हैं और एक दिन माँगकर चले जाते हैं। विभीषण अपना खज़ाना, अपना महल और अपना नगर सामने रख देते हैं। रत्न आकाश से गिरते हैं और वानर उन्हें मुँह में डालकर उगल देते हैं। फिर राम सबको घर भेजते हैं, और कोई घर नहीं जाता। अन्त में पुष्पक उत्तर की ओर मुड़ता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और इस प्रसंग में दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। जो आते हैं वे शिव हैं, और वे आशीर्वाद देने नहीं, विनती करने आते हैं।

विदा के दिन जो मिले

  • राम जो जीत के बाद अपने लिये एक चीज़ नहीं माँगते, और जिन्हें अब जल्दी केवल एक बात की है।
  • इन्द्र देवराज, जो सेवा का अवसर माँगते हैं और अमृत बरसाकर दोनों दलों को भिगो देते हैं।
  • शिव जो देवताओं के चले जाने के बाद रुके रहते हैं, सुअवसर देखकर पास आते हैं, और जाते-जाते सिर्फ़ एक निमन्त्रण माँगते हैं।
  • विभीषण लङ्का के नये स्वामी, जो अपना घर, खज़ाना और नगर सामने रखकर एक ही चीज़ चाहते हैं, कि उन्हें साथ ले लिया जाय।
  • सीता जो लौटते हुए विमान से वह सारा रास्ता देखती हैं जो उन्होंने कभी नहीं देखा था, और जिन्हें गङ्गा एक आशीर्वाद देती हैं।
  • हनुमान जो अब लड़ते नहीं, ब्रह्मचारी का रूप धरकर ख़बर लेकर आगे भेजे जाते हैं।
  • वानर और भालू सुग्रीव, नील, जाम्बवान्, अंगद, नल और बाक़ी सेनापति, जिन्हें घर जाने को कहा जाता है और जिनसे घर की इच्छा ही छूट चुकी है।
  • गुह निषादराज, जो राम के आने की ख़बर पर नाव के लिये पुकार लगाता है, और उन्हें देखते ही बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ता है।
  • काकभुशुण्डि और गरुड़ वे दो, जिनकी बातचीत के भीतर यह सारी कथा कही जा रही है, और जो यहाँ एक बार सामने आ जाते हैं।

जो वरदान अपने लिये नहीं माँगा गया

इन्द्र के पास देने को बहुत कुछ था। स्वर्ग उनके अधीन था, अमृत उनके पास था। ऐसे के सामने लोग अपने लिये माँगते हैं, पर जो उत्तर मिलता है, उसमें अपना कुछ नहीं है।

राम कहते हैं, “देवराज, सुनिये, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरों ने मारा, पृथ्वी पर पड़े हैं। मेरे हित के लिये इन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये। हे सुजान सुरेश, इन सबको जिला दीजिये।” अपनी ओर से एक ही वाक्य है, कि मेरे हित के लिये इन्होंने प्राण छोड़ दिये, और वह भी दूसरों का हिसाब चुकाने के लिये। और जिला दीजिये आज्ञा के स्वर में नहीं कहा गया।

यहाँ कथा एक क्षण रुककर अपने ही ऊपर से बोलती है। रामचरितमानस एक कथा के भीतर कही जा रही दूसरी कथा है। यहाँ काकभुशुण्डि गरुड़ को सम्बोधित करते हैं: राम के ये वचन अत्यन्त गहरे हैं और इन्हें ज्ञानी मुनि ही पहचानते हैं। क्योंकि जो तीनों लोकों को मारकर जिला सकता है, उसने यहाँ किसी और से जिलाने को कहा। कारण साधारण है। इन्द्र को बड़ाई देनी थी।

फिर अमृत गिरता है, और किसी एक दल पर नहीं। अमृत की वर्षा दोनों दलों पर होती है, मरे हुए वानरों पर भी और मरे हुए राक्षसों पर भी, और उठते केवल वानर और भालू हैं। जिस चीज़ ने एक पक्ष को उठा दिया, उसी ने दूसरे पक्ष को छुआ और वे नहीं उठे। बरसाने वाले ने कोई भेद नहीं किया। भेद पहले ही हो चुका था।

कथा उस भेद को उधर नहीं मोड़ती जिधर मन जाता है। यह नहीं कहा जाता कि राक्षस अमृत के योग्य नहीं थे। कहा यह जाता है कि मरते समय उनके मन रामाकार हो चुके थे, इसलिये वे मुक्त हो गये और उनके भवबन्धन छूट गये। लौटने को उनके पास कुछ बचा ही नहीं था। वानर और भालू देवांश थे, इस लीला के साथी, सो वे राम की इच्छा से जी उठे। एक पक्ष को शरीर वापस मिला, और दूसरे को शरीर से छुट्टी।

फिर एक प्रश्न आता है, और उसका उत्तर उसी साँस में है। दीनों का हित करने वाला राम जैसा कौन है, जिसने सारे राक्षसों को समूचा का समूचा, बिना छाँटे, मुक्त कर दिया। और फिर वह नाम आता है जो इस पूरे काण्ड में गाली की तरह आया था: दुष्ट, पापों का घर, काम में डूबा हुआ रावण। उसे भी वह गति मिली जो श्रेष्ठ मुनि जीवन भर साधना करके नहीं पाते।

यह वाक्य लङ्काकाण्ड के हिसाब को उलट देता है। जिसे मारने के लिये पुल बाँधा गया, उसके लिये मारने वाले के हाथ से मरना ही वरदान था।

फूल, विमान, और एक आगन्तुक जो रुका रहा

अब आकाश ख़ाली होने लगता है। इस काण्ड में देवता बार-बार ऊपर से झाँकते रहे हैं, कभी डरकर, कभी विनती करके, कभी फूल बरसाकर। अब उनका काम पूरा हो चुका है। वे फूल बरसाते हैं और अपने-अपने विमानों पर चढ़कर चल देते हैं। भीड़ छँट रही है, और उसी में से एक नहीं जाता।

शिव सुअवसर देखकर राम के पास आते हैं, और सुअवसर नपा हुआ शब्द है। शिव को इस युद्ध में किसी ने बुलाया नहीं था, और वे बीच में आये भी नहीं। उन्होंने प्रतीक्षा की। भीड़ चली गयी, तब वे पास आये। कथा उन्हें सुजान, यानी जानने वाला, कहती है, और उस शब्द का वज़न इसी पर है कि वे जानते थे कि कब बोलना है।

जो सामने आते हैं, वे देवताओं के स्वामी की तरह नहीं आते। फिर कथा उनकी मुद्रा बताती है: परम प्रेम से दोनों हाथ जुड़े हुए, नेत्रों में पानी भरा हुआ, शरीर पुलकित, और वाणी गद्गद, यानी गले में अटकी हुई। कथा उन्हें यहाँ त्रिपुरारि कहती है, तीन नगर जलाने वाले, और वे बोलने से पहले रो रहे हैं। और यह उस कथा में हो रहा है जिसे शिव स्वयं पार्वती को सुना रहे हैं।

शिव की विनती

जो विनती अब शुरू होती है, उसकी चाल अलग है: तेज़, शब्द एक दूसरे से टकराते हुए, लगभग हर बात एक चित्र। शुरू में ही वह माँग है जिसके लिये शिव रुके थे: “मेरी रक्षा कीजिये।”

रक्षा की माँग, और तुरन्त बाद राम का रूप: हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण, वही मूर्ति जो अभी रणभूमि में खड़ी थी। फिर दो उपमाएँ: महामोह बादलों का घना जमघट है और वे उसके लिये प्रचण्ड आँधी हैं। संशय एक जंगल है और वे उसके लिये आग हैं।

आगे की बातें वही ढाँचा दोहराती हैं। भ्रम अन्धकार है, वे सूर्य हैं। काम, क्रोध और मद हाथी हैं, वे सिंह हैं, और साथ ही प्रार्थना होती है: इस सेवक के मन रूपी वन में निरन्तर निवास कीजिये। जिस जंगल में वे सिंह की तरह माँगे गये, वही उन्हें रहने को दिया जा रहा है। विषयों की कामनाएँ कमलवन हैं, वे उसके लिये पाला हैं, भवसागर को मथने के लिये मन्दराचल। और बीच में दो क्रियाएँ: भय दूर कीजिये, और इस दुस्तर संसार से पार कीजिये।

यहाँ स्वर बदल जाता है। अब तक शक्ति का वर्णन था। यह श्याम शरीर का, शरणागत का दुःख छुड़ाने वाले का वर्णन है। और फिर वह प्रार्थना आती है जो इस काण्ड में एक से ज़्यादा बार लौटती है। यहाँ शिव के मुँह से: “छोटे भाई और सीता सहित मेरे हृदय के भीतर निरन्तर निवास कीजिये।” माँगने वाला अकेली मूर्ति नहीं, तीनों को एक साथ माँगता है।

और अन्त में एक नाम आता है। वह इस दृश्य में होना नहीं चाहिये: मुनियों को आनन्द देने वाले, पृथ्वीमण्डल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु, भय के नाश करने वाले। लिखने वाले तुलसीदास अपनी ही रची हुई विनती के आख़िर में खड़े होकर उन्हें अपना कहकर पुकार लेते हैं। बोल शिव रहे हैं, और बीच में एक शब्द ऐसा गिरता है जो शिव का नहीं हो सकता।

इतनी बड़ी विनती के बाद माँग यह निकलती है। शिव कहते हैं, “नाथ, जब अयोध्यापुरी में आपका राजतिलक होगा, तब मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा।” कोई वरदान नहीं, कोई पद नहीं, कोई छूट नहीं। केवल एक निमन्त्रण, और वह भी अपने लिये माँगा हुआ।

लङ्का यहाँ ख़त्म हो रही है, अयोध्या अभी बाक़ी है, और उस तिलक को देखने के लिये शिव को दुबारा आना पड़ेगा। जिस प्रसंग में युद्ध का अन्त लिखा जा रहा है, उसी में अगले काण्ड का दिन तय हो जाता है।

विभीषण का घर

शिव के जाते ही विभीषण सामने आते हैं, और उनकी हालत दूसरी है। शिव अपने धाम लौट गये, विभीषण के पास लौटने को कोई जगह नहीं, क्योंकि जो जगह उन्हें मिली है, वही उनके घर का मलबा है। वे चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोलते हैं। वे राम को शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाला कहकर पुकारते हैं, वही रूप जिसने कल उनके भाई को मारा।

उनकी बात में एक भी शिकायत नहीं है। विभीषण कहते हैं, “आपने कुल और सेना सहित रावण को मारा और तीनों लोकों में अपना पवित्र यश फैलाया।” फिर वे अपने बारे में चार शब्द कहते हैं जो एक नये राजा के मुँह से अजीब लगते हैं: दीन, पापी, बुद्धिहीन, जातिहीन। इन्हें अभी-अभी लङ्का का राज्य मिला है, और ये अपना परिचय इस तरह देते हैं।

फिर वे क्रम से माँगते हैं। पहले घर: “इस दास के घर को पवित्र कीजिये।” फिर शरीर: वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्ध की थकान उतर जाय। फिर सम्पत्ति: खज़ाना, महल और सारी सम्पदा देखकर प्रसन्नता से वानरों को दे दीजिये, वह सम्पत्ति जो कल ही उनकी हुई है। और तब आख़िरी माँग, जो इन सबका कारण है: “मुझे सब प्रकार से अपना लीजिये, और फिर मुझे साथ लेकर अयोध्या जाइये।”

विभीषण अपना राज्य नहीं, साथ चाहते हैं। इतना सुनते ही राम के दोनों विशाल नेत्रों में पानी भर आता है। उत्तर कई टुकड़ों में आता है, और उसमें राम पहली बार अपनी जल्दी का कारण बताते हैं।

राम कहते हैं, “भाई, सुनिये, आपका खज़ाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है।” सम्बोधन भाई का है, और पूरा उत्तर उसी पर टिका है: जिसने अपने को जातिहीन कहा था, उसे भाई कहकर उत्तर दिया जाता है। और फिर वह वाक्य जिसकी वजह से यह सारी विदा बेचैन है: “भरत की दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है।”

फिर वह चित्र आता है जो राम के मन में चौदह बरस से टँगा है: तपस्वी के वेष में, दुबले शरीर से, निरन्तर उनका नाम जपते हुए भरत। और फिर एक वाक्य जिसे कोई राजा नहीं बोलता: “सखा, वही उपाय कीजिये जिससे मैं जल्दी से जल्दी उन्हें देख सकूँ। मैं निहोरा करता हूँ।” निहोरा, यानी हाथ जोड़कर माँगना। जिसने अभी लङ्का जीती है, वह अपने आश्रित से विनती कर रहा है, और जो माँग रहा है वह बस जल्दी है।

फिर राम उस जल्दी का कारण खोल देते हैं: “यदि अवधि बीत जाने पर पहुँचा, तो भाई को जीता न पाऊँगा।” भरत ने चौदह बरस की अवधि पर अपनी साँस टाँग रखी है, और उसके बाद एक दिन की देर भी एक मौत है। छोटे भाई की प्रीति याद करते ही राम का शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है।

और तब, बीच में ही, विभीषण की ओर मुड़कर वह बात कही जाती है जो उनकी सारी चिन्ता का उत्तर है। “कल्प भर राज्य कीजियेगा, मन में मेरा स्मरण करते रहियेगा, और फिर मेरे उस धाम को पाइयेगा जहाँ सब सन्त जाते हैं।” जो साथ चलना चाहते थे, उन्हें रुकना पड़ेगा, पर रुकने की सीमा बता दी गयी है। उस सीमा के पार वही जगह है जहाँ वे जाना चाहते थे।

आकाश से गिरते हुए रत्न

उत्तर सुनते ही विभीषण हर्षित होकर चरण पकड़ लेते हैं, और उनके पीछे सारे वानर-भालू भी चरण पकड़कर निर्मल गुणों का बखान करने लगते हैं। फिर विभीषण महल जाते हैं, पुष्पक विमान को मणियों और वस्त्रों से भरवा देते हैं, और उसे लाकर राम के सामने रख देते हैं। जिस विमान पर एक दिन रावण चढ़ता था, वह अब भरा हुआ खड़ा है।

और तब जो आज्ञा मिलती है, वह किसी राजकोष के बँटवारे जैसी नहीं। राम हँसकर कहते हैं, “सखा विभीषण, विमान पर चढ़कर आकाश में जाइये, और वस्त्र तथा गहने वहीं से बरसा दीजिये।” न क्रम, न सूची, न हिसाब। लङ्का का सारा कोष आकाश से नीचे उड़ेल दिया जाता है, और जो जिसके हाथ लगे वह उसका।

जिसके मन को जो अच्छा लगता है, वह वही उठा लेता है। वानर मणियों को मुँह में डालते हैं, समझते हैं कि खाने की चीज़ होगी, और फिर उगलकर फेंक देते हैं। जिन पत्थरों के लिये तीनों लोक लड़ते हैं, उन्हें चखकर थूक दिया जा रहा है। यह देखकर सीता और लक्ष्मण सहित राम हँस पड़ते हैं, और उन्हें यहाँ परम कौतुकी, यानी तमाशे का शौक़ीन, कहा गया है।

कथा उस हँसी को ऐसी जगह रख देती है जहाँ से वह छोटी नहीं रह जाती। जिन्हें मुनि ध्यान में भी नहीं पाते, जिनके बारे में वेद कहते हैं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। वही राम वानरों के साथ तरह-तरह की ठिठोली कर रहे हैं।

फिर कथा अपने ऊपर से बोलती है। शिव पार्वती से कहते हैं। अनेक प्रकार के योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करने पर भी राम वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होने पर करते हैं। जो सूची गिनायी गयी, वह पूरी साधना-परम्परा है, और उसे एक ऐसी चीज़ हरा देती है जिसका कोई विधान नहीं होता।

अब आप सब अपने-अपने घर जायँ

भालू और वानर कपड़े-गहने पाकर उन्हें पहन-पहनकर लौट आते हैं, और अनेक जातियों के इन वानरों को इस हालत में देखकर राम बार-बार हँसते हैं। लड़ाई के बाद की यह हल्की घड़ी है, और इसी घड़ी में वह वाक्य बोला जाता है जिससे सब कुछ बदल जाता है। पहले कृपादृष्टि से सबकी ओर देखा जाता है, फिर कोमल वचन बोले जाते हैं, और उनमें दो हिस्से हैं।

पहला हिस्सा श्रेय का बँटवारा है, और वह पूरा दूसरों के नाम लिख दिया जाता है। राम कहते हैं, “आप सबके बल से मैंने रावण को मारा, और फिर विभीषण का राजतिलक किया।” जिसके बाण से रावण गिरा था, वह पूरी जीत उनके खाते में डाल रहा है जो उसके पीछे चले थे। दूसरा हिस्सा विदा है।

राम कहते हैं, “अब आप सब अपने-अपने घर जाइये, मेरा स्मरण करते रहिये, और किसी से डरिये मत।” शब्दों में इसमें कुछ भी ग़लत नहीं। लड़ाई ख़त्म हो चुकी है, सबके घर हैं, सब बहुत दूर से आये हैं। पर जिनसे यह कहा गया है, उनके लिये इसका कोई अर्थ नहीं बनता।

सब वानर प्रेम से विह्वल होकर हाथ जोड़कर आदर से बोलते हैं। पहला ही वाक्य विनम्रता की ओट में असहमति है: “प्रभु, आप जो भी कहें, आपको सब सोहता है, पर आपके वचन सुनकर हमें मोह होता है। आप तीनों लोकों के ईश्वर हैं। हम वानरों को दीन जानकर ही आपने सनाथ किया है।” बल का जो श्रेय अभी उन्हें दिया गया था, उसे वे लौटा रहे हैं।

और फिर एक तीखी उपमा, जो वानरों ने स्वयं अपने ऊपर चलायी है: “आपके वचन सुनकर हम लाज के मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़ का भला कर सकते हैं?” जिसने अभी कहा था कि आप सबके बल से मैंने रावण को मारा, उसे उत्तर मिलता है, “हम मच्छर हैं।” और फिर वह बात आती है जिसमें विदा टूट जाती है: राम का रुख़ देखकर रीछ-वानर प्रेम में मग्न हो गये। और घर जाने की इच्छा किसी को नहीं रही।

जाने से पहले नाम गिनाये जाते हैं, एक साथ, बिना किसी लड़ाई के सन्दर्भ के: सुग्रीव, नील, जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान। इन सबके साथ विभीषण, और बाक़ी जितने बलवान सेनापति हैं। यह सूची अब सेना की नहीं, उन लोगों की है जिन्हें जाना है।

और तुरन्त बाद एक शान्त बात: वे कुछ कह नहीं सकते। प्रेम के वश नेत्रों में बार-बार पानी भर आता है, और वे पलक मारना छोड़कर, टकटकी बाँधे, सामने देख रहे हैं। पलक रोकने का कारण सीधा है: जितनी देर पलक गिरती है, उतनी देर वह चेहरा नहीं दिखता।

और कोई नहीं गया

विदा वापस ले ली जाती है, और उसके लिये एक भी शब्द ख़र्च नहीं किया जाता। आज्ञा रद्द नहीं की जाती, कोई नयी घोषणा नहीं होती। अतिशय प्रीति देखी जाती है, और सबको विमान पर चढ़ा लिया जाता है। जो सूची अभी घर भेजी जा रही थी, वही अब ऊपर बैठी है, और लङ्का का नया राजा भी उसमें शामिल है।

चलने से पहले मन ही मन ब्राह्मणों के चरणों में सिर नवाया जाता है, और तब विमान उत्तर दिशा की ओर चलाया जाता है। उस एक शब्द से पूरी कथा घूम जाती है। अब तक सब कुछ दक्षिण की ओर जा रहा था, यहाँ से उत्तर की ओर जाता है।

उड़ान शुरू होते ही शोर मच जाता है, और हर कोई राम की जय बोल रहा है। विमान के भीतर एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है, और उस पर सीता सहित राम बैठ जाते हैं। यह अयोध्या में नहीं, हवा में हो रहा है। कथा इसका चित्र आकाश से उठाती है: पत्नी सहित वे ऐसे सुशोभित हैं मानो सुमेरु के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो।

और तब मौसम बदल जाता है। तीन प्रकार की वायु चलने लगती है, शीतल, मन्द और सुगन्धित। समुद्र, तालाब और नदियों का जल निर्मल हो जाता है। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगते हैं, सबके मन प्रसन्न हैं, और आकाश तथा दिशाएँ निर्मल हैं।

यहाँ यह हुआ था

अब विमान उसी मैदान के ऊपर है जहाँ यह सब हुआ था, और राम अपनी पत्नी को नीचे दिखाने लगते हैं। जिन्हें दिखाया जा रहा है, उन्होंने इस युद्ध का एक भी दिन नहीं देखा। वे पूरे समय अशोक वाटिका में बन्द थीं और ख़बरें सुनती रही थीं। अब उन्हें वह जगह दिखायी जा रही है जहाँ ख़बरें बनी थीं।

बताने का ढंग किसी विजेता का नहीं। कोई बड़ा वाक्य नहीं, कोई गिनती नहीं, केवल जगहें और नाम। राम कहते हैं, “सीता, रणभूमि देखिये। यहाँ लक्ष्मण ने इन्द्र को जीतने वाले मेघनाद को मारा। हनुमान और अंगद के मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर यहाँ पड़े हैं।” बार-बार दोहराया गया यहाँ किसी स्मारक की ओर नहीं, ज़मीन के एक टुकड़े की ओर इशारा करता है, जिस पर अब भी शरीर पड़े हुए हैं।

अगली बात इसी क्रम को पूरा करती है: “देवताओं और मुनियों को दुःख देने वाले कुम्भकर्ण और रावण, दोनों भाई, यहाँ मारे गये।”

फिर राम अपने किये हुए काम का नाम स्वयं लेते हैं। वह काम पुल है, युद्ध नहीं: “यहाँ मैंने सेतु बाँधा, और यहाँ सुखधाम शिव की स्थापना की।” फिर वे स्वयं सीता सहित उन्हीं शिव को प्रणाम करते हैं जिन्हें उन्होंने बिठाया था। जिन शिव ने थोड़ी देर पहले हाथ जोड़े थे, उन्हें अब हाथ जोड़ा जा रहा है।

फिर एक बात इस यात्रा का नियम बना देती है: जहाँ-जहाँ वन में निवास और विश्राम किया था, वे सब जगहें सीता को दिखायी गयीं, और सबके नाम बताये गये। यह विजय-यात्रा नहीं। एक आदमी अपनी पत्नी को अपने चौदह बरस दिखा रहा है, उसी क्रम में जिसमें वे बीते थे, बस उलटी दिशा में।

दण्डक से गङ्गा तक

विमान शीघ्र ही वहाँ आ जाता है जहाँ परम सुहावना दण्डकवन है और जहाँ अगस्त्य आदि अनेक मुनिराज रहते हैं। इन सबके स्थानों पर जाया जाता है। जाते समय हर आश्रम ने कुछ दिया था। सारे ऋषियों से आशीर्वाद लेकर चित्रकूट पहुँचा जाता है, वहाँ मुनियों को सन्तुष्ट किया जाता है, और विमान वहाँ से तेज़ी से आगे बढ़ता है।

अब नदियाँ आने लगती हैं, और हर नदी के साथ एक छोटा-सा काम जुड़ा है। पहले सीता को यमुना दिखायी जाती है, जिसे कलियुग के पापों को हरने वाली और सुहावनी कहा गया है। फिर पवित्र गङ्गा, और राम कहते हैं, “सीता, इन्हें प्रणाम कीजिये।” पूरे रास्ते का ढाँचा यही है: जो दिखता है उसका नाम, फिर उसका गुण, फिर उसके साथ करने की एक क्रिया।

तीर्थराज प्रयाग, जिसके दर्शन से ही करोड़ों जन्मों के पाप भाग जाते हैं। फिर परम पावनी वेणी, यानी त्रिवेणी, जो शोक हरने वाली है और जिसे यहाँ भगवान के लोक तक की सीढ़ी कहा गया है। और फिर स्वर बदल जाता है: “फिर अत्यन्त पावन अयोध्यापुरी देखिये, जो तीनों तापों और भव रोग का नाश करने वाली है।” जिस शहर से वे निकाले गये थे, उसे वे अपनी पत्नी के सामने तीर्थों की सूची में आख़िरी नम्बर पर रख रहे हैं।

उसके बाद का क्षण भरा हुआ है, और उसमें कुछ भी बड़ा नहीं होता। ऊपर से ही, उतरे बिना, सीता सहित अवधपुरी को प्रणाम किया जाता है। नेत्र सजल हैं, शरीर पुलकित है, और हर्ष बार-बार लौट रहा है। फिर त्रिवेणी में आकर स्नान किया जाता है, और वानरों के साथ-साथ ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिये जाते हैं। लौटने वाला अभी शहर में घुसा भी नहीं, और दान बाँट चुका है।

एक दूत आगे भेजा जाता है

यहाँ वह जल्दी काम में बदल जाती है जो विभीषण से कही बात में केवल एक वाक्य थी। उसके लिये वही भेजा जाता है जो इस कथा में हर बार तब भेजा जाता है जब पहुँचना नामुमकिन हो।

राम हनुमान से कहते हैं, “ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुर जाइये, भरत को हमारी कुशल सुनाइये, और समाचार लेकर लौट आइये।” छोटे ब्रह्मचारी का यह वही वेष है जिसमें हनुमान पहले भी सामने आये थे, जब उन्होंने ऋष्यमूक पर दो अजनबियों से बात की थी।

हनुमान तुरन्त चल देते हैं, और उसके बाद विमान भरद्वाज के पास रुकता है। मुनि अनेक प्रकार से पूजा करते हैं, स्तुति करते हैं और फिर आशीर्वाद देते हैं। यह वही आश्रम है जहाँ से एक बार तीन लोग पैदल दक्षिण की तरफ़ निकले थे। दोनों हाथ जोड़कर मुनि के चरणों की वन्दना करके विमान फिर आगे चलता है।

इधर निषादराज गुह सुनता है कि राम आ गये हैं, और “नाव कहाँ है, नाव कहाँ है” पुकारता हुआ अपने लोगों को बुलाने लगता है। पर उसकी नावें काम नहीं आतीं: विमान गङ्गा को लाँघकर इस पार आ जाता है और राम की आज्ञा पाकर किनारे पर उतरता है। उतरते ही पहला काम सीता करती हैं। वे बहुत प्रकार से गङ्गा की पूजा करती हैं और फिर उनके चरणों पर गिर पड़ती हैं। और गङ्गा मन में हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं, “सुन्दरी, आपका सुहाग अखण्ड रहे।”

जो देखते ही गिर पड़ा

राम के किनारे उतरने की बात सुनते ही गुह प्रेम से विह्वल होकर दौड़ पड़ता है। जिन नावों के लिये उसने पुकार लगायी थी, उनकी अब ज़रूरत नहीं रही, क्योंकि जिन्हें पार उतारना था, वे स्वयं इस पार उतर चुके हैं। वह परम सुख से भरा हुआ पास आता है, और तब वह देखता है जो वह चौदह बरस से नहीं देख पाया था।

सीता सहित राम को देखते ही वह ज़मीन पर गिर पड़ता है, और उसे शरीर की सुधि नहीं रहती। पिछली बार वह तब मिला था जब वनवास शुरू हुआ था। अब वे लौट आये हैं, और उसका शरीर उस ख़बर को सँभाल नहीं पाता।

उत्तर में कोई औपचारिकता नहीं होती। परम प्रेम देखकर राम उसे उठाते हैं और हर्ष के साथ हृदय से लगा लेते हैं। इसके बाद कथा इसी गले लगने को धीमा करके दिखाती है।

राम ने उसे हृदय से लगा लिया, अत्यन्त पास बिठाकर कुशल पूछी। वह विनती करने लगा, “जिन चरणों को ब्रह्मा और शिव तक सेवते हैं, उनके दर्शन करके अब मैं कुशल से हूँ। सुखधाम, पूर्णकाम राम, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।”

फिर कथा कहती है कि सब प्रकार से नीच उस निषाद को राम ने भरत की तरह हृदय से लगा लिया। जिसे जाति के नाम पर हिसाब से बाहर रखा जा सकता था, उसे उस भाई के बराबर रख दिया जाता है। उसी भाई के लिये यह विमान इतनी जल्दी में उड़ रहा है। और तुरन्त बाद तुलसीदास अपने ऊपर एक वाक्य लिखते हैं: इस मन्दबुद्धि तुलसीदास ने मोह के वश ऐसे प्रभु को भुला दिया।

फिर एक नाम आता है जो इस पूरे काण्ड का नाम हो सकता था। रावण के शत्रु का यह पवित्र करने वाला चरित्र सदा राम के चरणों में प्रीति उत्पन्न करने वाला है। वह काम आदि विकारों को हरने वाला और विशेष ज्ञान देने वाला है। देवता, सिद्ध तथा मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं। जिस काण्ड का यह अन्त है, उसे यहाँ एक ही नाम से पुकारा गया है: रावण के शत्रु का चरित्र। वह नाम बताता है कि जो अभी-अभी सुना गया, वह किसकी कहानी थी।

जो सुनेंगे, उन्हें

अब कहानी ख़त्म हो चुकी है, और जो बचा है, वह सुनने वालों की तरफ़ मुड़ा हुआ एक वाक्य है। लङ्काकाण्ड की आख़िरी बात उनके बारे में है जो इस काण्ड की कथा में नहीं हैं: जो इसे सुनते हैं।

जो सुजान लोग राम की समरविजय की इस लीला को सुनते हैं, उन्हें भगवान नित्य विजय, विवेक और विभूति देते हैं: जीत, सही-ग़लत की पहचान, और ऐश्वर्य। यह वचन उस काण्ड के अन्त में आता है जिसमें जीत की क़ीमत पूरे विस्तार से गिनायी गयी है।

फिर बात किसी श्रोता से नहीं, अपने ही मन से होती है: मन विचार करके देखे, यह कलिकाल पापों का घर है। और इसमें राम के नाम को छोड़कर कोई दूसरा सहारा नहीं है। पूरे काण्ड में शस्त्र, सेना, पुल, माया, यज्ञ और शक्ति, सब आज़मायी जा चुकी हैं। आख़िरी बात में इनमें से एक का भी नाम नहीं। जो बचता है, वह एक नाम है।

ठीक यहीं पढ़ने वालों के लिये एक चिह्न-रेखा है, जो कथा की नहीं: मासपारायण का सत्ताईसवाँ विश्राम, यानी महीने भर में पूरा पाठ करने वालों के लिये रुकने की जगह। हर सोपान के अन्त में संस्कृत का एक वाक्य आता है। यहाँ उसका अर्थ इतना है कि कलियुग के सारे मल का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस का छठा सोपान यहाँ समाप्त होता है।

देखने से टूटी विदा

जो बार-बार लौटता है, वह एक ढंग है। जिसके पास देने को कुछ है, वह उसे अपने पास नहीं रखता। इन्द्र अमृत दोनों दलों पर उड़ेल देते हैं। विभीषण पहले ही दिन खज़ाना सामने रख देते हैं। राम जीत का श्रेय अपने पीछे चले लोगों के नाम लिख देते हैं। और वानर उसे लौटा देते हैं।

और जो विदा पूरी नहीं होती, वह चुभती है। आज्ञा साफ़ थी और सही थी: घर जाइये, स्मरण करते रहिये, डरिये मत। किसी ने मना नहीं किया। फिर भी वे गये नहीं, और उन्हें रोकने के लिये कोई नया आदेश नहीं देना पड़ा। केवल इतना हुआ कि उनकी ओर देखा गया। विदा का टूटना यहाँ किसी के हठ से नहीं, देख लेने से होता है।

यह प्रसंग एक लड़ाई बन्द करता है, और आवाज़ें एक-एक करके हटती जाती हैं: पहले देवता, फिर शिव। फिर लङ्का पीछे छूटती है, फिर रणभूमि, वन और नदियाँ। आख़िरी दृश्य में एक आदमी गङ्गा के किनारे बेहोश पड़ा है और उसे उठाकर गले लगाया जा रहा है। यही इस काण्ड का अन्तिम काम है।

जो अभी बाक़ी है, वह यहीं दो बार कहा जा चुका है। शिव ने जाते हुए अयोध्या के तिलक का नाम लिया था, और राम ने हनुमान को ब्रह्मचारी बनाकर भरत की ख़बर लेने भेजा है। वह दूत अभी लौटा नहीं, और वह तिलक अभी हुआ नहीं। यहाँ छठा सोपान समाप्त होता है, और आगे उत्तरकाण्ड खुलता है। वहाँ यह विमान उतरेगा और वह दिन आयेगा जिसके लिये शिव दुबारा आने का वादा करके गये हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 114 से 121, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।