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अमृत, शिव की विनती, और वह विदा जो पूरी नहीं हुई

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · अमृत, शिव की विनती, और वह विदा जो पूरी नहीं हुई

अमृत, शिव की विनती, और वह विदा जो पूरी नहीं हुई

दोहा ११४ से १२१ तक: इन्द्र अमृत बरसाकर मरे हुए वानर-भालुओं को उठा देते हैं, शिव आकर विनती करते हैं, विभीषण अपना घर सौंपते हैं, राम सबको अपने-अपने घर जाने को कहते हैं और कोई नहीं जाता, और पुष्पक उत्तर की ओर मुड़ जाता है।

लङ्काकाण्ड का यह आख़िरी पन्ना है, और इस पूरे पन्ने पर एक भी बाण नहीं चलता। पिछला दोहा एक प्रश्न पर ख़त्म हुआ था। युद्ध जीता जा चुका था, सीता लौट आयी थीं, देवताओं की स्तुति पूरी हो चुकी थी, और देवराज इन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा था कि अब कृपा करके आज्ञा दीजिये, मैं क्या करूँ। यह प्रसंग उसी प्रश्न के उत्तर से शुरू होता है। ऐसे क्षण में माँगने वाले के सामने पूरा आकाश खुला होता है, और जिस आदमी से पूछा गया है वह अपने लिये कुछ नहीं माँगता। वह ज़मीन की ओर हाथ करता है, जहाँ उसके मारे गये साथी पड़े हैं।

उसके बाद जो होता है वह लगातार छोटा होता जाने वाला शोर है। अमृत गिरता है और मरे हुए उठ बैठते हैं। देवता फूल बरसाकर विमानों पर चढ़कर चले जाते हैं। शिव अकेले रुके रहते हैं और एक छन्द में विनती करके, एक तारीख़ माँगकर चले जाते हैं। विभीषण अपना खज़ाना, अपना महल और अपना नगर सामने रख देते हैं। रत्न आकाश से गिरते हैं और वानर उन्हें मुँह में डालकर उगल देते हैं। फिर राम सबको घर भेजते हैं और कोई घर नहीं जाता। अन्त में पुष्पक उत्तर की ओर मुड़ता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और इस पन्ने पर दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। जो आते हैं वे शिव हैं, और वे आशीर्वाद देने नहीं, विनती करने आते हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम जो जीत के बाद अपने लिये एक चीज़ नहीं माँगते, और जिन्हें इस पूरे पन्ने पर जल्दी सिर्फ़ एक ही बात की है।
  • इन्द्र देवराज, जो सेवा का अवसर माँगते हैं और अमृत बरसाकर दोनों दलों को भिगो देते हैं।
  • शिव जो देवताओं के चले जाने के बाद रुके रहते हैं, सुअवसर देखकर पास आते हैं, और जाते-जाते सिर्फ़ एक निमन्त्रण माँगते हैं।
  • विभीषण लङ्का के नये स्वामी, जो अपना घर, खज़ाना और नगर सामने रखकर एक ही चीज़ चाहते हैं, कि उन्हें साथ ले लिया जाय।
  • सीता जो लौटते हुए विमान से वह सारा रास्ता देखती हैं जो उन्होंने कभी नहीं देखा था, और जिन्हें गङ्गा एक आशीर्वाद देती हैं।
  • हनुमान जो इस पन्ने पर लड़ते नहीं, ब्रह्मचारी का रूप धरकर ख़बर लेकर आगे भेजे जाते हैं।
  • वानर और भालू सुग्रीव, नील, जाम्बवान्, अंगद, नल और बाक़ी सेनापति, जिन्हें घर जाने को कहा जाता है और जिनसे घर की इच्छा ही छूट चुकी है।
  • गुह निषादराज, जो नाव ढूँढ़ता हुआ दौड़ता है, और प्रभु को देखते ही बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ता है।
  • काकभुशुण्डि और गरुड़ वे दो, जिनकी बातचीत के भीतर यह सारी कथा कही जा रही है, और जो इस पन्ने पर एक बार सामने आ जाते हैं।

जो वरदान अपने लिये नहीं माँगा गया

देवराज का प्रश्न सीधा था। वे सचमुच पूछ रहे थे कि इस जीत के बाद उनके करने लायक़ क्या बचा है। इन्द्र के पास देने को बहुत कुछ था: स्वर्ग उनके अधीन था, अमृत उनके पास था, और वे उस सभा में सबसे बड़े दानी की तरह खड़े थे। ऐसे आदमी के सामने लोग अपने लिये माँगते हैं। जो उत्तर मिलता है उसमें अपना कुछ भी नहीं है।

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे । परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे॥
मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥

चौपाई १

पूरी प्रार्थना में अपनी ओर से केवल एक वाक्य है, और वह भी दूसरों का हिसाब चुकाने के लिये है: मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। मेरे काम के लिये इन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये। बाक़ी सब उन्हीं का है। जिआउ का अर्थ है जिला दीजिये, और वह जिस स्वर में कहा गया है वह आज्ञा का स्वर नहीं है। देवराज से यह नहीं कहा जाता कि आप समर्थ हैं, इसलिये कीजिये। उनसे कहा जाता है, हे सुजान सुरेश, इन सबको जिला दीजिये। जो माँग रहा है वह उसी मैदान में खड़ा है जहाँ माँगने का कारण पड़ा हुआ है।

इस जगह कथा एक क्षण के लिये रुककर अपने ही ऊपर से बोलती है। रामचरितमानस एक सीधी कही हुई कहानी नहीं है, वह एक कथा के भीतर कही जा रही दूसरी कथा है, और यहाँ काकभुशुण्डि सामने आकर गरुड़ को सम्बोधित करते हैं। वे कहते हैं कि प्रभु के ये वचन अत्यन्त गहरे हैं और इन्हें ज्ञानी मुनि ही पहचान सकते हैं, क्योंकि जो तीनों लोकों को मारकर जिला सकता है उसने यहाँ किसी और से जिलाने को कहा। इसका एक ही कारण बताया गया है, और वह कारण बड़ा साधारण है: इन्द्र को बड़ाई देनी थी।

फिर अमृत गिरता है। पर वह किसी एक दल के ऊपर नहीं गिरता। सुधा की वर्षा दोनों दलों पर होती है, मरे हुए वानरों पर भी और मरे हुए राक्षसों पर भी, और उठते केवल वानर और भालू हैं। यह पूरी लड़ाई का सबसे शान्त और सबसे कड़वा वाक्य है। जिस चीज़ ने एक पक्ष को उठा दिया, उसी चीज़ ने दूसरे पक्ष को छुआ और वे नहीं उठे। बरसाने वाले ने कोई भेद नहीं किया। भेद पहले ही हो चुका था।

और तुलसी उस भेद को उस तरफ़ नहीं मोड़ते जिस तरफ़ पाठक का मन जा रहा होता है। यह नहीं कहा जाता कि राक्षस अमृत के योग्य नहीं थे। यह कहा जाता है कि मरते समय उनके मन रामाकार हो चुके थे, इसलिये वे मुक्त हो गये और उनके भवबन्धन छूट गये। लौटने को अब उनके पास कुछ बचा ही नहीं था। वानर और भालू देवांश थे, इस लीला के साथी थे, सो वे रघुनाथ की इच्छा से जी उठे। एक पक्ष को शरीर वापस मिला और दूसरे को शरीर से छुट्टी।

राम सरिस को दीन हितकारी । कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥
खल मल धाम कामरत रावन । गति पाई जो मुनिबर पाव न॥

चौपाई २

इस चौपाई में एक ही प्रश्न है और उसका उत्तर उसी पंक्ति के भीतर पड़ा है। दीनों का हित करने वाला राम जैसा कौन है, जिसने सारे राक्षसों को झाड़-बुहारकर, एक भी छोड़े बिना, मुक्त कर दिया। झारी का अर्थ यही है, समूचा का समूचा, बिना छाँटे हुए। और फिर वह नाम लिया जाता है जिसे इस पूरे काण्ड में गाली की तरह इस्तेमाल किया गया था। दुष्ट, पापों का घर, काम में डूबा हुआ रावण। उसे भी वह गति मिली जो श्रेष्ठ मुनि जीवन भर साधना करके नहीं पाते।

यह वाक्य लङ्काकाण्ड के हिसाब को उलटकर रख देता है। जिसे मारने के लिये पुल बाँधा गया, उसके बारे में अन्तिम बात यह कही जाती है कि वह जीत गया। मारने वाले के हाथ से मरना ही उसका वरदान था। बदला यहाँ कहीं नहीं है।

सार: इन्द्र सेवा का अवसर माँगते हैं और राम अपने लिये कुछ नहीं माँगते, केवल यह कि मारे गये वानर-भालू जिला दिये जायँ। अमृत दोनों दलों पर बरसता है, पर जीते केवल वानर और भालू हैं, क्योंकि राक्षसों के मन मरते समय रामाकार हो चुके थे और वे मुक्त हो गये। इसी सिलसिले में कहा जाता है कि रावण ने वह गति पायी जो बड़े मुनियों को भी नहीं मिलती।

फूल, विमान, और एक आगन्तुक जो रुका रहा

अब आकाश ख़ाली होने लगता है। इस पूरे काण्ड में देवता बार-बार ऊपर से झाँकते रहे हैं, कभी डरकर, कभी विनती करके, कभी फूल बरसाकर। अब उनका काम पूरा हो चुका है, इसलिये वे फूल बरसाते हैं और अपने-अपने सुन्दर विमानों पर चढ़-चढ़कर चल देते हैं। भीड़ छँट रही है। और उसी छँटती हुई भीड़ में से एक आदमी नहीं जाता।

सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।
देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान॥ ११४ (क)॥

दोहा ११४ (क)

सुअवसर यहाँ का सबसे नपा हुआ शब्द है। शिव को इस युद्ध के दौरान किसी ने बुलाया नहीं था, और वे बीच में आये भी नहीं। उन्होंने प्रतीक्षा की। जब तक भीड़ थी तब तक वे उसी भीड़ में थे। जब भीड़ चली गयी तब वे पास आये। दोहे में उन्हें सुजान कहा गया है, समझदार, जानने वाला, और उस शब्द का पूरा वज़न इसी बात पर है कि वे जानते थे कि कब बोलना है।

जो सामने आता है वह देवताओं के स्वामी की तरह नहीं आता। दोहे का दूसरा हिस्सा उनकी मुद्रा बताता है और उसमें कहीं कोई अधिकार नहीं है। परम प्रेम से दोनों हाथ जुड़े हुए, कमल जैसे नेत्रों में पानी भरा हुआ, शरीर पुलकित, और वाणी गद्गद, यानी गले में अटकी हुई। त्रिपुरारि, जिन्होंने तीन नगर जलाये थे, यहाँ बोलने से पहले रो रहे हैं। और यह उस कथा में हो रहा है जिसे शिव स्वयं कहीं और बैठकर पार्वती को सुना रहे हैं।

सार: देवता फूल बरसाकर विमानों पर चढ़कर चले जाते हैं। शिव भीड़ के छँटने की प्रतीक्षा करते हैं और सुअवसर देखकर पास आते हैं, हाथ जोड़े, नेत्रों में जल भरे, पुलकित शरीर और गद्गद वाणी के साथ।

शिव की विनती

जो विनती अब शुरू होती है वह छन्द में है, और उसकी चाल चौपाई से अलग है। वह तेज़ है, उसमें शब्द एक दूसरे से टकराते हैं, और उसमें लगभग हर पंक्ति एक चित्र है। पहली पंक्ति में ही वह माँग रख दी जाती है जिसके लिये शिव रुके थे, और वह माँग एक ही शब्द की है: मेरी रक्षा कीजिये।

मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥
मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥

छन्द

मामभिरक्षय यानी मेरी रक्षा कीजिये, और उसके तुरन्त बाद जिसकी रक्षा माँगी जा रही है उसका हुलिया आता है: हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण लिये हुए रघुकुल के स्वामी। यह वही मूर्ति है जो अभी-अभी रणभूमि में खड़ी थी। फिर दो उपमाएँ आती हैं और दोनों में विनाश है। महामोह बादलों का घना जमघट है और वे उसके लिये प्रचण्ड आँधी हैं। संशय एक जंगल है और वे उस जंगल के लिये आग हैं।

आगे की पंक्तियाँ वही ढाँचा दोहराती रहती हैं: भीतर की एक बीमारी, और उसे मिटाने वाली एक प्राकृतिक शक्ति। भ्रम अन्धकार है और वे उसके लिये प्रचण्ड प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मद हाथी हैं और वे उनके लिये सिंह हैं, और ठीक उसी साँस में प्रार्थना एक अजीब जगह उतरती है: इस सेवक के मनरूपी वन में निरन्तर निवास कीजिये। जिस जंगल में वे सिंह की तरह माँगे गये, वही जंगल उन्हें रहने को दिया जा रहा है। विषयों की कामनाएँ कमलवन हैं और वे उसके लिये प्रबल पाला, भवसागर को मथने के लिये मन्दराचल। और बीच में एक पंक्ति बिना किसी उपमा के, केवल दो क्रियाओं की: बारय तारय। हमारा परम भय दूर कीजिये, और हमें इस दुस्तर संसार से पार कीजिये।

स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥
अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥
मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥

छन्द

यहाँ स्वर बदल जाता है। अब तक जो कुछ कहा गया था वह शक्ति का वर्णन था, और यह श्याम शरीर और कमल जैसी आँखों का वर्णन है। दीनबन्धु, शरणागत का दुःख छुड़ाने वाले। और फिर वह प्रार्थना जो इस पूरे काण्ड में एक से ज़्यादा बार लौटती है, यहाँ शिव के मुँह से: छोटे भाई और जानकी सहित मेरे हृदय के भीतर निवास कीजिये। माँगने वाला अकेली मूर्ति नहीं माँगता। वह तीनों को एक साथ माँगता है, क्योंकि जो चित्र उसके मन में है उसमें तीनों खड़े हैं।

और अन्तिम पंक्ति में एक नाम आता है जो इस दृश्य में होना नहीं चाहिये। मुनियों को आनन्द देने वाले, पृथ्वीमण्डल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु, भय के नाश करने वाले। लिखने वाला अपनी ही रची हुई विनती के आख़िर में खड़ा हो जाता है और उन्हें अपना कहकर पुकार लेता है। शिव बोल रहे हैं, और बीच में एक शब्द ऐसा गिरता है जो शिव का नहीं हो सकता।

नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।
कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥ ११५॥

दोहा ११५

इतनी बड़ी विनती के बाद माँग यह निकलती है। कोई वरदान नहीं, कोई पद नहीं, कोई छूट नहीं। सिर्फ़ एक निमन्त्रण, और वह भी अपने लिये माँगा हुआ निमन्त्रण। जब कोसलपुरी में राजतिलक होगा, तब मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा। इस पूरे काण्ड में यह पहली बार है जब कोई आगे की तरफ़ देखता है और उस चीज़ का नाम लेता है जो अभी हुई नहीं है।

और यह वाक्य पाठक के लिये भी एक इशारा है। लङ्का यहाँ ख़त्म हो रही है, अयोध्या अभी बाक़ी है, और उस तिलक को देखने के लिये शिव को दुबारा आना पड़ेगा। जिस पन्ने पर युद्ध का अन्त लिखा जा रहा है, उसी पन्ने पर अगली किताब का दिन तय हो जाता है।

सार: शिव एक छन्द में विनती करते हैं, जिसमें राम को मोह के बादलों के लिये आँधी, संशय के वन के लिये आग और काम-क्रोध-मद के हाथियों के लिये सिंह कहा गया है, और अन्त में उनसे भाई और जानकी सहित अपने हृदय में बसने को कहा जाता है। जाते-जाते वे केवल एक चीज़ माँगते हैं: कोसलपुरी में राजतिलक के दिन आने की अनुमति।

विभीषण का घर

शिव के जाते ही अगला आदमी सामने आता है, और उसकी हालत बिलकुल दूसरी है। शिव विनती करके अपने धाम लौट गये। विभीषण के पास लौटने को कोई जगह नहीं है, क्योंकि जो जगह उन्हें मिली है वही उनके घर का मलबा है। वे चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोलते हैं, और सम्बोधन में उन्हें शार्ङ्गधनुष धारण करने वाला कहते हैं, यानी वही रूप जिसने कल उनके भाई को मारा।

जो वे कहते हैं उसमें एक भी शिकायत नहीं है। आपने कुल और सेना सहित रावण को मारा और तीनों लोकों में अपना पवित्र यश फैलाया। और फिर वे अपनी ओर मुड़ते हैं और अपने बारे में चार शब्द कहते हैं जो एक नये राजा के मुँह से अजीब लगते हैं: दीन, मलीन, बुद्धिहीन, जातिहीन। इस आदमी को अभी-अभी लङ्का का राज्य मिला है, और वह अपना परिचय इस तरह देता है।

फिर वे जो माँगते हैं वह क्रम से आता है। पहले घर: इस दास के घर को पवित्र कीजिये। फिर शरीर: वहाँ चलकर स्नान कीजिये जिससे युद्ध की थकान उतर जाय। फिर सम्पत्ति: खज़ाना, महल और सारी सम्पदा देखकर प्रसन्नता से वानरों को दे दीजिये, और वह सम्पत्ति कल ही उनकी हुई है। और तब आख़िरी माँग आती है, जो असल में इन सबका कारण है: मुझे सब प्रकार से अपना लीजिये, और फिर मुझे साथ लेकर अयोध्या जाइये।

यह आदमी अपना राज्य नहीं चाहता। वह साथ जाना चाहता है। इतना सुनते ही दीनदयालु के दोनों विशाल नेत्रों में पानी भर आता है, और उत्तर में जो आता है वह दोहे का एक पूरा गुच्छा है, चार टुकड़ों में, और उसमें राम पहली बार अपनी जल्दी का कारण बताते हैं।

तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥ ११६ (क)॥
तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।
देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥ ११६ (ख)॥

दोहा ११६ (क), (ख)

पहली पंक्ति माँग को उलटकर रख देती है। खज़ाना और घर देने की ज़रूरत नहीं, वह सब मेरा ही है, यह बात सच है, सुनो भाई। सम्बोधन भ्रात है और वह पूरा उत्तर उसी एक शब्द पर टिका हुआ है। जिस आदमी ने अपने को जातिहीन कहा था उसे भाई कहकर उत्तर दिया जाता है। और उसके तुरन्त बाद वह वाक्य आता है जिसकी वजह से यह पूरा पन्ना बेचैन है: भरत की दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है।

फिर वह चित्र आता है जो राम के मन में चौदह बरस से टँगा हुआ है। तपस्वी के वेष में, दुबले शरीर से, निरन्तर मेरा नाम जपते हुए। और उसके बाद एक वाक्य जिसे कोई राजा नहीं बोलता: हे सखा, वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी से जल्दी उन्हें देख सकूँ, मैं निहोरा करता हूँ। निहोरउँ का अर्थ है गिड़गिड़ाना, हाथ जोड़कर माँगना। जिसने अभी-अभी लङ्का जीती है वह अपने ही आश्रित से विनती कर रहा है, और जो चीज़ माँग रहा है वह नाव या रथ नहीं, बस जल्दी है।

आगे का टुकड़ा उस जल्दी का कारण खोल देता है। यदि अवधि बीत जाने पर पहुँचा तो भाई को जीता न पाऊँगा। यह अन्दाज़ा नहीं है, यह हिसाब है। भरत ने चौदह बरस की अवधि पर अपनी साँस टाँगी हुई है, और उस तारीख़ के बाद एक दिन भी देर हो जाना एक मौत है। छोटे भाई की प्रीति याद करते ही प्रभु का शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। लङ्का में खड़ा होकर वह आदमी किसी और की साँस गिन रहा है।

और तब, बीच में ही, विभीषण की ओर मुड़कर वह बात कह दी जाती है जो उनकी सारी चिन्ता का उत्तर है। कल्प भर राज्य करना, मन में मेरा निरन्तर स्मरण करते रहना, और फिर मेरे उस धाम को पा जाना जहाँ सब सन्त जाते हैं। जो आदमी साथ चलना चाहता था उसे रुकना पड़ेगा, पर रुकने की एक सीमा बता दी गयी है और उस सीमा के उस पार वही जगह है जहाँ वह जाना चाहता था।

सार: विभीषण अपना घर, स्नान, खज़ाना और नगर सामने रखकर अन्त में यह माँगते हैं कि उन्हें अपना लिया जाय और साथ ले जाया जाय। राम उनके खज़ाने को अपना ही कहकर टाल देते हैं और भरत की दशा का नाम लेते हैं, कि एक-एक पल कल्प जैसा बीत रहा है और अवधि बीतने पर भाई जीवित नहीं मिलेगा। विभीषण को कल्प भर राज्य और अन्त में वही धाम दिया जाता है जहाँ सन्त जाते हैं।

आकाश से गिरते हुए रत्न

उत्तर सुनते ही विभीषण हर्षित होकर चरण पकड़ लेते हैं, और उन्हीं के पीछे सारे वानर-भालू भी चरण पकड़कर निर्मल गुणों का बखान करने लगते हैं। फिर विभीषण महल जाते हैं और एक काम करते हैं जिसे इस काण्ड में किसी ने नहीं किया था। वे पुष्पक विमान को मणियों और वस्त्रों से भरवा देते हैं और उसे लाकर प्रभु के सामने रख देते हैं। जिस विमान पर एक दिन रावण चढ़ता था, वह अब भरा हुआ खड़ा है।

और तब जो आज्ञा मिलती है वह किसी राजकोष के बँटवारे जैसी नहीं लगती। हँसकर कहा जाता है कि हे सखा विभीषण, विमान पर चढ़कर आकाश में जाइये और वस्त्र तथा गहने वहीं से बरसा दीजिये। बाँटने का कोई क्रम नहीं है, कोई सूची नहीं है, कोई हिसाब नहीं है। लङ्का का सारा कोष आकाश से नीचे उड़ेल दिया जाता है और जो जिसके हाथ लगे वह उसका।

फिर वह दृश्य आता है जिसके लिये यह पूरा टुकड़ा लिखा गया लगता है। जिसके मन को जो अच्छा लगता है वह वही उठा लेता है। वानर मणियों को मुँह में डालते हैं, समझते हैं कि खाने की चीज़ होगी, और फिर उन्हें उगलकर फेंक देते हैं। जिन पत्थरों के लिये तीनों लोक लड़ते हैं, उन्हें चखकर थूक दिया जा रहा है। यह देखकर सीता और लक्ष्मण सहित राम हँस पड़ते हैं, और उन्हें यहाँ परम कौतुकी कहा गया है, यानी तमाशे का शौक़ीन।

मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥ ११७ (क)॥

दोहा ११७ (क)

यह दोहा उस हँसी को उठाकर एक ऐसी जगह रख देता है जहाँ से वह छोटी नहीं रह जाती। जिन्हें मुनि ध्यान में भी नहीं पा पाते, जिनके बारे में वेद हार मानकर नेति नेति कहते हैं, यानी यह भी नहीं, यह भी नहीं, वही कृपा के समुद्र इस समय वानरों के साथ तरह-तरह की ठिठोली कर रहे हैं। ऊपर वेद हैं और नीचे मुँह में मणि भरे हुए बन्दर हैं, और दोनों एक ही वाक्य में रख दिये गये हैं।

इसके बाद वाले टुकड़े में कथा फिर एक बार अपने ऊपर से बोलती है। इस बार बोलने वाले शिव हैं और सुनने वाली पार्वती, जिन्हें उमा कहकर पुकारा गया है। कहा यह जाता है कि अनेक प्रकार के योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करने पर भी राम वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होने पर करते हैं। जो सूची गिनायी गयी वह पूरी साधना-परम्परा है, और उसे एक ऐसी चीज़ से हरा दिया जाता है जिसका कोई विधान नहीं होता।

सार: विभीषण विमान को रत्नों और वस्त्रों से भरकर लाते हैं और राम उन्हें आकाश से बरसा देने को कहते हैं। वानर मणियों को मुँह में डालकर उगल देते हैं और यह देखकर राम हँसते हैं। दोहे में कहा जाता है कि जिन्हें वेद नेति नेति कहते हैं वही वानरों के साथ विनोद कर रहे हैं, और जितनी साधनाएँ हैं उन सबसे बड़ी चीज़ निष्केवल प्रेम है।

अब आप सब अपने-अपने घर जायँ

भालू और वानर कपड़े-गहने पाकर उन्हें पहन-पहनकर लौट आते हैं, और अनेक जातियों के इन वानरों को इस हालत में देखकर कोसलपति बार-बार हँसते हैं। लड़ाई के बाद की यह सबसे हल्की घड़ी है, और ठीक इसी घड़ी में वह वाक्य बोला जाता है जिससे सब कुछ बदल जाता है। पहले कृपादृष्टि से सबकी ओर देखा जाता है, फिर कोमल वचन बोले जाते हैं, और जो कहा जाता है उसमें दो हिस्से हैं।

पहला हिस्सा श्रेय का बँटवारा है और वह पूरा दूसरों के नाम लिख दिया जाता है। आप सबके बल से मैंने रावण को मारा, और फिर विभीषण का राजतिलक किया। यह उस आदमी का वाक्य है जिसने स्वयं धनुष उठाया था, जिसके बाण से रावण गिरा था, और जो अब उस पूरी जीत को उन लोगों के खाते में डाल रहा है जो उसके पीछे चले थे। दूसरा हिस्सा इसके तुरन्त बाद आता है, और वह विदा है।

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू । सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू॥
सुनत बचन प्रेमाकुल बानर । जोरि पानि बोले सब सादर॥

चौपाई ३

तीन आज्ञाएँ हैं और तीनों सीधी हैं। अपने-अपने घर जाइये। मेरा स्मरण करते रहिये। किसी से डरिये मत। यह एक सेनापति की आख़िरी बात है, और शब्दों में इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। लड़ाई ख़त्म हो चुकी है, सबके घर हैं, सब बहुत दूर से आये हैं, और अब लौट जाना ही ठीक है। पर जिनसे यह कहा गया है उनके लिये इसका कोई अर्थ नहीं बनता।

उत्तर में सब वानर प्रेम से विह्वल होकर हाथ जोड़कर आदर से बोलते हैं, और पहला ही वाक्य विनम्रता की ओट में असहमति है। प्रभु, आप जो भी कहें आपको सब सोहता है, पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है। यानी समझ में नहीं आता। आप तीनों लोकों के ईश्वर हैं, और हम वानरों को दीन जानकर ही आपने सनाथ किया है। बल का जो श्रेय अभी-अभी उन्हें दिया गया था, उसे वे लौटा रहे हैं।

सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं । मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥
देखि राम रुख बानर रीछा । प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा॥

चौपाई ४

यह इस पन्ने की सबसे तीखी उपमा है और वह वानरों ने स्वयं अपने ऊपर चलायी है। आपके वचन सुनकर हम लाज के मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़ का भला कर सकते हैं। मसक यानी मच्छर, और खगपति यानी पक्षियों के राजा गरुड़। जिस आदमी ने अभी कहा था कि आप सबके बल से मैंने रावण को मारा, उसी को उत्तर मिलता है कि हम मच्छर हैं। और फिर वह पंक्ति आती है जिसमें विदा टूट जाती है। रुख़ देखकर रीछ-वानर प्रेम में मग्न हो गये, और घर जाने की इच्छा किसी को नहीं है।

कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।
सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान॥ ११८ (ख)॥
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥ ११८ (ग)॥

दोहा ११८ (ख), (ग)

जाने से पहले नाम गिनाये जाते हैं, और यह पूरे काण्ड की इकलौती जगह है जहाँ वे एक साथ, एक ही साँस में, बिना किसी लड़ाई के सन्दर्भ के आते हैं। वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान, और इन सबके साथ विभीषण, और बाक़ी जितने बलवान सेनापति हैं। यह सूची अब सेना की सूची नहीं रही। यह उन लोगों की सूची है जिन्हें जाना है।

और उसके तुरन्त बाद जो पंक्ति आती है वह इस पूरे पन्ने का सबसे शान्त वाक्य है। वे कुछ कह नहीं सकते। प्रेम के वश नेत्रों में बार-बार पानी भर आता है और वे पलक मारना छोड़कर, टकटकी बाँधे, सामने देख रहे हैं। नयन निमेष निवारि का अर्थ यही है, आँख का झपकना रोक देना, क्योंकि जितनी देर पलक गिरती है उतनी देर वह चेहरा नहीं दिखता। घर की ओर वे चल तो पड़ते हैं, पर चलना यहीं तक होता है।

सार: राम पूरी जीत का श्रेय वानरों के बल को देकर उन्हें अपने-अपने घर जाने, अपना स्मरण करते रहने और किसी से न डरने को कहते हैं। वानर श्रेय लौटा देते हैं, कहते हैं कि मच्छर गरुड़ का भला नहीं कर सकते, और उनकी घर जाने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है। नाम गिनाये जाते हैं, और वे कुछ बोल नहीं पाते, बस पलक रोककर देखते रहते हैं।

और कोई नहीं गया

अतिसय प्रीति देखि रघुराई । लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥
मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो । उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥

चौपाई ५

विदा वापस ले ली जाती है और उसके लिये एक भी शब्द ख़र्च नहीं किया जाता। आज्ञा रद्द नहीं की जाती, उसका खण्डन नहीं किया जाता, कोई नयी घोषणा नहीं होती। अतिशय प्रीति देखी जाती है और सबको विमान पर चढ़ा लिया जाता है। जो सूची अभी-अभी घर भेजी जा रही थी वही सूची अब ऊपर बैठी है, और लङ्का का नया राजा भी उसी में शामिल है।

चलने से पहले एक काम और होता है और वह इतना छोटा है कि आँख से फिसल जाता है। मन ही मन ब्राह्मणों के चरणों में सिर नवाया जाता है, और तब विमान उत्तर दिशा की ओर चलाया जाता है। किसी ने देखा नहीं, किसी ने सुना नहीं, वह प्रणाम केवल भीतर हुआ। और उसके बाद दिशा का नाम आता है, और उस एक शब्द से पूरी कथा घूम जाती है। अब तक सब कुछ दक्षिण की ओर जा रहा था। यहाँ से सब कुछ उत्तर की ओर जाता है।

उड़ान शुरू होते ही शोर मच जाता है और हर कोई रघुवीर की जय बोल रहा है। विमान के भीतर एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है और उस पर सीता सहित प्रभु बैठ जाते हैं। यह इस कथा में पहली बार है जब वे दोनों एक साथ सिंहासन पर बैठे दिखाये जाते हैं, और यह अयोध्या में नहीं हो रहा, हवा में हो रहा है। तुलसी उसका चित्र आकाश से उठाते हैं: पत्नी सहित वे ऐसे सुशोभित हैं मानो सुमेरु के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो।

और तब मौसम बदल जाता है। तीन प्रकार की वायु चलने लगती है, शीतल, मन्द और सुगन्धित। समुद्र, तालाब और नदियों का जल निर्मल हो जाता है। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगते हैं, सबके मन प्रसन्न हैं, और आकाश तथा दिशाएँ निर्मल हैं। इस टुकड़े को यहाँ पढ़कर सुनाया नहीं जा सका, क्योंकि जिस इकाई में यह पाठ होना चाहिये उसमें छपाई के समय टीका की हिन्दी आ बैठी है और वहाँ अवधी बची ही नहीं। सो उसका अर्थ यहाँ कह दिया गया है और पंक्ति नहीं उठायी गयी।

सार: राम वानरों की अतिशय प्रीति देखकर सबको विमान पर चढ़ा लेते हैं, मन ही मन ब्राह्मणों के चरणों में सिर नवाकर विमान उत्तर दिशा में चलाते हैं। सीता सहित वे भीतर के सिंहासन पर बैठते हैं, देवता फूल बरसाते हैं, और नीचे हवा, पानी और शकुन सब निर्मल हो जाते हैं।

यहाँ यह हुआ था

अब विमान उसी मैदान के ऊपर है जहाँ यह सब हुआ था, और ऊपर बैठा हुआ आदमी अपनी पत्नी को नीचे दिखाने लगता है। यह इस पन्ने का सबसे अटपटा और सबसे मानवीय दृश्य है। जिसे दिखाया जा रहा है उसने इस युद्ध का एक भी दिन नहीं देखा। वह उस पूरे समय अशोक वाटिका में बन्द थी और ख़बरें सुनती रही थी। अब उसे वह जगह दिखायी जा रही है जहाँ ख़बरें बनी थीं।

कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता॥
हनूमान अंगद के मारे । रन महि परे निसाचर भारे॥

चौपाई ६

बताने का ढंग किसी विजेता का नहीं है। कोई बड़ा वाक्य नहीं, कोई गिनती नहीं, सिर्फ़ जगहें और नाम। यहाँ लक्ष्मण ने उसे मारा जिसने इन्द्र को जीत लिया था। हनुमान और अंगद के मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर यहाँ पड़े हैं। जिस इहाँ को बार-बार दोहराया जा रहा है वह किसी स्मारक की ओर नहीं, ज़मीन के एक टुकड़े की ओर इशारा कर रहा है, और उस टुकड़े पर अब भी शरीर पड़े हुए हैं।

इसके बाद जो पंक्ति आती है वह इसी क्रम को पूरा करती है। देवताओं और मुनियों को दुःख देने वाले कुम्भकर्ण और रावण, दोनों भाई, यहाँ मारे गये। इस पंक्ति को हम यहाँ उठाकर नहीं रख सके। इसके पहले दो शब्द छपाई से निकलते समय टीका की पंक्ति में जा गिरे हैं और बाक़ी पंक्ति अगली इकाई में पड़ी है, इसलिये पूरी पंक्ति एक जगह मिलती ही नहीं। जो कहा जा रहा है वह ऊपर लिख दिया गया है, और पाठ को जोड़कर दिखाना ठीक नहीं होता।

इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥ ११९ (क)॥
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥ ११९ (ख)॥

दोहा ११९ (क), (ख)

इस दोहे में पहली बार वह आदमी अपने किये हुए काम का नाम स्वयं लेता है, और जो काम वह गिनाता है वह पुल है, युद्ध नहीं। यहाँ मैंने सेतु बाँधा, और यहाँ सुखधाम शिव की स्थापना की। और उसके तुरन्त बाद वे स्वयं सीता सहित उन्हीं शिव को प्रणाम करते हैं जिन्हें उन्होंने बिठाया था। जिन शिव ने इसी पन्ने पर थोड़ी देर पहले हाथ जोड़े थे, उन्हें अब हाथ जोड़ा जा रहा है, और दोनों बातें एक ही पन्ने पर बिना किसी सफ़ाई के रख दी गयी हैं।

दूसरा टुकड़ा इस पूरी लौटती हुई यात्रा का नियम बना देता है। जहाँ-जहाँ वन में निवास और विश्राम किया था, वे सब जगहें जानकी को दिखायी गयीं और सबके नाम बताये गये। यह विजय-यात्रा नहीं है। यह एक आदमी का अपनी पत्नी को अपने चौदह बरस दिखाना है, जगह दर जगह, नाम दर नाम, उस क्रम में जिस क्रम में वे बीते थे, बस उलटी दिशा में।

सार: लौटते हुए राम सीता को रणभूमि दिखाते हैं और नाम लेकर बताते हैं कि कौन कहाँ मारा गया, फिर सेतु और अपने स्थापित किये हुए शिव को सीता सहित प्रणाम करते हैं, और वन के वे सारे स्थान दिखाते हैं जहाँ उन्होंने निवास और विश्राम किया था।

दण्डक से गङ्गा तक

विमान शीघ्र ही वहाँ आ जाता है जहाँ परम सुहावना दण्डकवन है और जहाँ अगस्त्य आदि अनेक मुनिराज रहते हैं। इन सबके स्थानों पर जाया जाता है, और यह जाना किसी काम से नहीं है। लौटते हुए हर आश्रम पर उतरना पड़ रहा है क्योंकि जाते समय हर आश्रम ने कुछ दिया था। सारे ऋषियों से आशीर्वाद लेकर चित्रकूट पहुँचा जाता है, वहाँ मुनियों को सन्तुष्ट किया जाता है, और विमान वहाँ से तेज़ी के साथ आगे बढ़ता है।

अब नदियाँ आने लगती हैं और हर नदी के साथ एक छोटा सा काम जुड़ा होता है। पहले जानकी को यमुना दिखायी जाती है, जिसे कलियुग के पापों को हरने वाली और सुहावनी कहा गया है। फिर पवित्र गङ्गा दिखती हैं, और वहाँ कहने वाला कहता है, हे सीते, इन्हें प्रणाम करो। यह पूरे रास्ते का ढाँचा है। जो दिखता है उसका नाम, फिर उसका गुण, और फिर उसके साथ करने की एक क्रिया।

तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥
देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥
पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥

चौपाई ७

तीर्थराज प्रयाग, जिसके दर्शन से ही करोड़ों जन्मों के पाप भाग जाते हैं। फिर परम पावनी वेणी, यानी त्रिवेणी, जो शोक हरने वाली है और जिसे यहाँ हरि लोक निसेनी कहा गया है, हरि के लोक तक पहुँचने की सीढ़ी। और तीसरे में स्वर बदल जाता है। फिर अत्यन्त पावन अयोध्यापुरी देखो, जो तीनों तापों और भव रोग का नाश करने वाली है। जिस शहर से यह आदमी निकाला गया था उसे वह अपनी पत्नी के सामने तीर्थों की सूची में गिना रहा है, और आख़िरी नम्बर पर रख रहा है।

उसके बाद जो होता है वह इस पूरे प्रसंग का सबसे भरा हुआ क्षण है और उसमें कुछ भी बड़ा नहीं होता। ऊपर से ही, उतरे बिना, सीता सहित अवधपुरी को प्रणाम किया जाता है। नेत्र सजल हैं, शरीर पुलकित है, और हर्ष बार-बार लौट रहा है। फिर त्रिवेणी में आकर स्नान किया जाता है और वानरों के साथ-साथ ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिये जाते हैं। लौटने वाला अभी शहर में घुसा भी नहीं है और उसने दान बाँट दिया है।

सार: विमान दण्डकवन, अगस्त्य आदि मुनियों के स्थानों और चित्रकूट होता हुआ लौटता है। यमुना, गङ्गा, प्रयाग, त्रिवेणी और अन्त में अयोध्यापुरी सीता को दिखायी जाती हैं। अवध को ऊपर से ही प्रणाम किया जाता है, त्रिवेणी में स्नान होता है और वानरों सहित ब्राह्मणों को दान दिया जाता है।

एक दूत आगे भेजा जाता है

यहाँ वह जल्दी काम में बदल जाती है जो दोहा एक सौ सोलह में केवल एक वाक्य थी। अब तक भरत का नाम एक चिन्ता था। अब उस चिन्ता के लिये एक आदमी तैनात किया जाता है, और वह आदमी वही है जो इस पूरी कथा में हर बार तब भेजा जाता है जब पहुँचना नामुमकिन हो।

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई । धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु । समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥

चौपाई ८

आज्ञा में चार बातें हैं और चारों नपी हुई हैं। ब्रह्मचारी का रूप धरकर जाइये, ताकि कोई पहचाने नहीं। अवधपुरी जाइये। भरत को हमारी कुशल सुनाइये। और समाचार लेकर लौट आइये। बटु यानी छोटा ब्रह्मचारी, और यही वह वेष है जिसमें एक बार हनुमान पहले भी सामने आये थे, जब उन्होंने ऋष्यमूक पर दो अजनबियों से बात की थी। जो दूत लङ्का में राक्षसों के बीच जा सका था, उसे अयोध्या में भी चुपचाप जाना है।

पवनपुत्र तुरन्त चल देते हैं, और उसके बाद विमान भरद्वाज के पास रुकता है। मुनि अनेक प्रकार से पूजा करते हैं, स्तुति करते हैं और फिर आशीर्वाद देते हैं। यह वही आश्रम है जहाँ से एक बार तीन लोग पैदल दक्षिण की तरफ़ निकले थे। दोनों हाथ जोड़कर मुनि के चरणों की वन्दना करके विमान फिर आगे चलता है।

पवनपुत्र तुरन्त चल देते हैं, और उसके बाद विमान भरद्वाज के पास रुकता है। मुनि अनेक प्रकार से पूजा करते हैं, स्तुति करते हैं और फिर आशीर्वाद देते हैं। यह वही आश्रम है जहाँ से एक बार तीन लोग पैदल दक्षिण की तरफ़ निकले थे। हाथ जोड़कर मुनि के चरणों की वन्दना करके विमान फिर आगे चलता है।

उसकी नावें काम नहीं आतीं। विमान गङ्गा को लाँघकर इस पार आ जाता है और प्रभु की आज्ञा पाकर किनारे पर उतरता है। उतरते ही जो पहला काम होता है वह सीता करती हैं। वे बहुत प्रकार से गङ्गा की पूजा करती हैं और फिर उनके चरणों पर गिर पड़ती हैं। और गङ्गा मन में हर्षित होकर जो आशीर्वाद देती हैं वह इस पूरे पन्ने पर किसी को दिया गया इकलौता वरदान है: हे सुन्दरी, आपका सुहाग अखण्ड रहे।

सार: राम हनुमान को ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी भेजते हैं कि भरत को कुशल सुनाकर समाचार लायें। विमान भरद्वाज के आश्रम पर रुकता है, फिर गङ्गा लाँघकर किनारे उतरता है। सीता गङ्गा की पूजा करती हैं और गङ्गा उन्हें अखण्ड सुहाग का आशीर्वाद देती हैं।

जो देखते ही गिर पड़ा

उधर निषादराज गुह सुनते ही दौड़ पड़ता है। उसे नाव नहीं मिली, पर अब नाव की ज़रूरत भी नहीं रही, क्योंकि जिन्हें पार उतारना था वे स्वयं इस पार उतर चुके हैं। वह परम सुख से भरा हुआ पास आता है, और तब वह देखता है जो वह चौदह बरस से नहीं देख पाया था।

प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही । परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही॥
प्रीति परम बिलोकि रघुराई । हरषि उठाइ लियो उर लाई॥

चौपाई ९

जानकी सहित प्रभु को देखते ही वह ज़मीन पर गिर पड़ता है और उसे शरीर की सुधि नहीं रहती। यह डर से गिरना नहीं है और न ही प्रणाम है। यह वह आदमी है जो पिछली बार तब मिला था जब वनवास शुरू हुआ था, जब सीता साथ थीं और लौटने की कोई तारीख़ पक्की नहीं थी। अब वे तीनों नहीं, वे दोनों उसके सामने खड़े हैं और लौट आये हैं। उसका शरीर उस ख़बर को सँभाल नहीं पाता।

और उत्तर में कोई औपचारिकता नहीं होती। परम प्रेम देखकर उसे उठाया जाता है और हर्ष के साथ हृदय से लगा लिया जाता है। इसके बाद जो छन्द आता है वह इसी गले लगने को धीमा करके दिखाता है। कृपानिधान, सुजानों के राजा, रमापति ने उसे हृदय से लगा लिया, अत्यन्त पास बिठाकर कुशल पूछी, और वह विनती करने लगा कि जो चरणकमल ब्रह्मा और शङ्कर तक सेवते हैं उनके दर्शन करके अब मैं कुशल से हूँ। हे सुखधाम, हे पूर्णकाम राम, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।

उस छन्द का दूसरा आधा इस संस्करण में अपनी जगह पर नहीं मिलता, इसलिये वह यहाँ उठाया नहीं गया, केवल उसका कहा हुआ रख दिया जा रहा है। सब प्रकार से नीच उस निषाद को भगवान ने भरत की तरह हृदय से लगा लिया। जिसे जाति के नाम पर हिसाब से बाहर रखा जा सकता था, उसे उस भाई के बराबर रख दिया जाता है जिसके लिये यह विमान इतनी जल्दी में उड़ रहा है। और उसके तुरन्त बाद लिखने वाला अपने ऊपर एक वाक्य लिखता है: इस मन्दबुद्धि ने मोह के वश उसी प्रभु को भुला दिया।

फिर एक नाम आता है जो इस पूरे काण्ड का नाम हो सकता था। रावण के शत्रु का यह पवित्र करने वाला चरित्र सदा राम के चरणों में प्रीति उत्पन्न करने वाला है, काम आदि विकारों को हरने वाला और विशेष ज्ञान देने वाला है, और देवता, सिद्ध तथा मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं। जिस किताब का यह अन्त है उसे यहाँ एक ही शब्द से पुकारा गया है, रावणारि चरित, और वह शब्द बताता है कि जो अभी-अभी पढ़ा गया वह किसकी कहानी थी।

सार: गुह दौड़कर आता है, सीता सहित प्रभु को देखते ही बेहोश होकर गिर पड़ता है, और राम उसे उठाकर हृदय से लगा लेते हैं और पास बिठाकर कुशल पूछते हैं। छन्द में उस निषाद को भरत की तरह गले लगाया जाना कहा जाता है, और इस पूरे चरित्र को रावणारि चरित कहकर उसकी महिमा गिनायी जाती है।

जो सुनेंगे, उन्हें

अब कहानी ख़त्म हो चुकी है और जो बचा है वह सुनने वाले की तरफ़ मुड़ा हुआ एक वाक्य है। लङ्काकाण्ड का आख़िरी दोहा उन लोगों के बारे में है जो इस काण्ड के पन्ने पर नहीं हैं, यानी हमारे बारे में।

समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥ १२१ (क)॥
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार।
श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार॥ १२१ (ख)॥

दोहा १२१ (क), (ख)

जो सुजान लोग रघुवीर की समरविजय की इस लीला को सुनते हैं, उन्हें भगवान नित्य विजय, विवेक और विभूति देते हैं। तीनों शब्द एक ही अक्षर से शुरू होते हैं और तीनों अलग-अलग चीज़ें हैं। विजय यानी जीत, विवेक यानी सही-ग़लत की पहचान, और विभूति यानी ऐश्वर्य। यह वचन उस काण्ड के अन्त में आता है जिसमें जीत की क़ीमत पूरे विस्तार से गिनायी गयी है, इसलिये इसे सस्ता आश्वासन समझना मुश्किल है।

दूसरा टुकड़ा किसी श्रोता से नहीं, अपने ही मन से बात करता है। अरे मन, विचार करके देख, यह कलिकाल पापों का घर है, और इसमें रघुनाथ के नाम को छोड़कर कोई दूसरा सहारा नहीं है। पूरे काण्ड में शस्त्र, सेना, पुल, माया, यज्ञ और शक्ति सब आज़मायी जा चुकी हैं। आख़िरी दोहे में इनमें से एक भी चीज़ का नाम नहीं है। जो बचता है वह एक नाम है।

और उसके बाद एक पंक्ति और है, पर वह कथा की नहीं है। वह पढ़ने वालों के लिये लगायी गयी चिह्न-रेखा है, मासपारायण का सत्ताईसवाँ विश्राम, यानी महीने भर में पूरा पाठ करने वालों के लिये यहाँ रुकने की जगह। उसके नीचे संस्कृत में वह वाक्य है जो हर सोपान के अन्त में आता है और जिसका अर्थ इतना है कि कलियुग के सारे मल का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस का छठा सोपान यहाँ समाप्त होता है।

सार: अन्तिम दोहा सुनने वालों की ओर मुड़ता है और कहता है कि जो इस समरविजय की लीला को सुनेंगे उन्हें नित्य विजय, विवेक और विभूति मिलेगी, और कलियुग में रघुनाथ के नाम को छोड़कर कोई सहारा नहीं है। उसके बाद मासपारायण का सत्ताईसवाँ विश्राम आता है और छठा सोपान समाप्त हो जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर जो चीज़ बार-बार लौटती है वह कोई घटना नहीं, एक ढंग है। जिसके पास देने को कुछ है, वह उसे अपने पास नहीं रखता। इन्द्र के पास अमृत है और वह उसे दोनों दलों पर उड़ेल देते हैं। विभीषण के पास पूरा खज़ाना है और वह पहले ही दिन उसे सामने रख देते हैं। राम के पास पूरी जीत का श्रेय है और वह उसे अपने पीछे चले लोगों के नाम लिख देते हैं। वानरों के पास वही श्रेय आता है और वे उसे लौटा देते हैं। इस पूरे पन्ने पर एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो अपने हिस्से पर हाथ रखे बैठा हो।

और जो चीज़ सबसे ज़्यादा चुभती है वह विदा है जो पूरी नहीं होती। आज्ञा साफ़ थी, ठीक थी और सही थी। घर जाइये, स्मरण करते रहिये, डरिये मत। कोई बहस नहीं हुई, किसी ने मना नहीं किया, सबने हाथ जोड़कर हामी भर ली और चलने भी लगे। फिर भी वे गये नहीं, और उन्हें रोकने के लिये कोई नया आदेश नहीं देना पड़ा। सिर्फ़ इतना हुआ कि उनकी ओर देखा गया। विदा का टूटना यहाँ किसी के हठ से नहीं होता, देख लेने से होता है।

इस काण्ड की शुरुआत समुद्र के किनारे हुई थी, जहाँ एक सेना पत्थर ढो रही थी और पार जाने का कोई रास्ता नहीं था। उसका अन्त यहाँ होता है, जहाँ वही सेना गहने पहनकर एक उड़ते हुए महल में बैठी है और नीचे वही समुद्र पीछे छूट रहा है। बीच में जो कुछ पड़ा है उसका हिसाब इस आख़िरी पन्ने पर एक बार भी नहीं लगाया जाता। कोई गिनती नहीं होती कि कितने मरे, कितने बचे, किसने क्या किया। सिर्फ़ उँगली उठाकर जगहें दिखायी जाती हैं और नाम लिये जाते हैं।

यह पन्ना एक लड़ाई बन्द करता है, और बन्द करने का उसका तरीक़ा यह है कि आवाज़ें एक-एक करके हटती जाती हैं। पहले देवता जाते हैं। फिर शिव जाते हैं। फिर लङ्का पीछे छूटती है, फिर रणभूमि, फिर वन, फिर नदियाँ। शोर घटता जाता है और उसकी जगह सिर्फ़ रास्ता बचता है। आख़िरी दृश्य में एक आदमी गङ्गा के किनारे बेहोश पड़ा है और उसे उठाकर गले लगाया जा रहा है, और यही इस पूरे काण्ड का अन्तिम काम है।

जो अभी बाक़ी है वह इसी पन्ने पर दो बार कहा जा चुका है। शिव ने जाते हुए कोसलपुरी के तिलक का नाम लिया था, और राम ने हनुमान को ब्रह्मचारी बनाकर भरत की ख़बर लेने भेजा है। वह दूत अभी लौटा नहीं है और वह तिलक अभी हुआ नहीं है। यहाँ षष्ठ सोपान समाप्त होता है, और जो आगे खुलता है वह उत्तरकाण्ड है, जहाँ यह विमान उतरेगा और वह तारीख़ आयेगी जिसके लिये शिव दुबारा आने का वादा करके गये हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ११४ से १२१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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