Lulla Family

मेघनाद की माया और उसका अन्त

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · मेघनाद की माया और उसका अन्त

मेघनाद की माया और उसका अन्त

एक रात की डींग से लेकर एक मरते हुए आदमी के दो प्रश्नों तक, और बीच में वह लड़ाई जिसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि लड़ने वाला दिखता ही नहीं था।

पिछला प्रसंग एक भाई पर समाप्त हुआ था। यह प्रसंग उसी दिन की शाम से शुरू होता है। दोनों सेनाएँ लौट रही हैं, दोनों ओर के योद्धा थके हुए हैं, और लङ्का के भीतर एक आदमी बैठा है जो बार-बार अपने मरे हुए भाई का सिर छाती से लगा रहा है। उसके चारों ओर स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटकर रो रही हैं और रोते हुए उसी मरे हुए के तेज और बल का बखान कर रही हैं। ठीक उसी क्षण, उसी कमरे में, रावण का बेटा चला आता है। दोहा बहत्तर से सतहत्तर तक की कथा वहीं से खुलती है, एक शोक वाले घर से, और अगली ही साँस में आकाश में चली जाती है।

इस पन्ने की लड़ाई और तरह की है। अब तक जो लड़ा गया था, उसमें वार दिखते थे। यहाँ नहीं दिखते। बाण आते हैं और यह पता नहीं चलता कि कहाँ से आये। आवाज़ें कानों में पड़ती हैं, पकड़ो, पकड़ो, मारो, और उन आवाज़ों के पीछे कोई शरीर नहीं मिलता। वानर पहाड़ और पेड़ उठाकर आकाश में दौड़ते हैं और ख़ाली लौट आते हैं, इसलिये नहीं कि हार गये, इसलिये कि निशाना ही नहीं मिला। तुलसी इस पूरे हिस्से को एक ही प्रश्न पर टिका देते हैं, और वह प्रश्न बल का नहीं है। वह यह है कि जो दिख रहा है वह है भी या नहीं, और जो नहीं दिख रहा उसे छुआ कैसे जाय।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस प्रसंग में अन्तर कई जगह पड़ता है। यहाँ नागपाश में राम बँधते हैं। यहाँ उस बन्धन को काटने कोई अस्त्र नहीं आता, गरुड़ आते हैं, और उन्हें भेजने वाले का नाम पाठ नहीं लेता, केवल देवरिषि कहता है। यहाँ मेघनाद को पहली बार धरती पर पटकने वाला एक बूढ़ा है। और यहाँ बीच में कथा रुक जाती है और शिव उमा से कहते हैं कि जो बँधा हुआ दिख रहा है, वह बँधा नहीं है। इस पन्ने का हर नाम, हर संख्या और हर क्रम इसी अवधी पाठ से और इसी की टीका से लिया गया है, और कहीं से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • मेघनाद रावण का पुत्र, जो अपने इष्टदेव से पाया हुआ रथ अब तक छिपाये बैठा था और इस प्रसंग में पहली बार उसे बाहर निकालता है। पाठ उसे घननाद भी कहता है।
  • रावण लङ्कापति, जो इस प्रसंग के आरम्भ में अपने भाई का सिर छाती से लगाये बैठा है और अन्त में अपने बेटे की ख़बर सुनकर धरती पर गिर पड़ता है।
  • राम जो इस प्रसंग में नागपाश में बँधते हैं, और जिनके विषय में तुलसी उसी साँस में कह देते हैं कि वे बँधने वाली वस्तु नहीं हैं।
  • लक्ष्मण जिन्हें पाठ यहाँ बार-बार अनन्त और अहीसा कहता है, और जिनके हाथों उस माया का अन्त होता है जो साँप भेजकर लड़ी गयी थी।
  • जाम्बवान् वह बूढ़ा, जिसे बूढ़ा जानकर छोड़ दिया गया था, और जो चलता हुआ त्रिशूल हाथ से पकड़ लेता है।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जो देवरिषि के भेजे हुए आते हैं और जो बन्धन काटते नहीं, खा जाते हैं।
  • विभीषण जो गुफा वाले यज्ञ की ख़बर लाते हैं और बताते हैं कि उसे पूरा हो जाने देना कितना महँगा पड़ेगा।
  • हनुमान और अंगद जो इस दिन दो बार गिराये जाते हैं, दो बार उठते हैं, और अन्त में मरे हुए शत्रु की माता को धन्य कहते हैं।
  • मन्दोदरी जिनका विलाप इस प्रसंग की अन्तिम चौपाई में है और जिन्हें रावण जगत् के नाशवान् होने का उपदेश देकर चुप कराता है।

एक थकी हुई शाम, और कल का वादा

दिन ढल चुका है और दोनों सेनाएँ लौट पड़ी हैं। योद्धाओं में बड़ी थकावट है, और यह बात पाठ बिना किसी पक्ष का नाम लिये कहता है, क्योंकि थकान दोनों ओर एक जैसी होती है। इसके तुरंत बाद तुलसी एक बारीक़ बात जोड़ देते हैं, जो आगे हर पन्ने पर काम आती है। राम की कृपा से वानर दल का बल घटा नहीं, बढ़ा। और इसकी उपमा वे आग से देते हैं। घास पाकर आग जितनी बढ़ जाती है, उतना। दिनभर लड़ने के बाद बल का बढ़ जाना अपने आप होने वाली बात नहीं है, और तुलसी उसे अपने आप होने वाली बताते भी नहीं। वे उसका कारण नाम लेकर बताते हैं।

दूसरी ओर का हिसाब ठीक उलटा चल रहा है, और उसकी उपमा और भी तीखी है। राक्षस दिन और रात घटते जा रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपने ही मुँह से कह देने पर पुण्य घट जाता है। यह उपमा रणभूमि की नहीं है। यह घर की है, और मन की है। किया हुआ भला काम जिस क्षण अपनी ज़बान से गिनाया जाता है, उसी क्षण कम हो जाता है। एक सेना के क्षय को नापने के लिये तुलसी वह तराज़ू उठाते हैं जो आदमी के भीतर रखा रहता है। और जिस घर में यह उपमा सुनायी जा रही है, उसी घर में थोड़ी देर बाद एक आदमी अपने बल का बखान करता हुआ मिलेगा।

लङ्का के भीतर रावण विलाप कर रहा है। बार-बार वह अपने भाई का सिर हृदय से लगाता है। आसपास स्त्रियाँ हाथों से छाती पीट-पीटकर रो रही हैं और रोते हुए उसी के बड़े भारी तेज और बल का बखान कर रही हैं। यह वह क्षण है जब कोई घर अपने सबसे बड़े आदमी को खोकर उसकी कहानियाँ कहने लगता है। और ठीक इसी क्षण मेघनाद आता है और बहुत-सी कथाएँ कहकर पिता को समझाता है। पाठ उन कथाओं का ब्योरा नहीं देता। वह सीधे उस वाक्य पर जाता है जिस पर वह बातचीत जाकर ठहरती है।

देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥

चौपाई १

कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा, अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ। हे तात, अपने इष्टदेव से मैंने जो बल और रथ पाया था, वह बल अब तक आपको नहीं दिखाया था। यहाँ दो बातें ठहरकर देखने लायक़ हैं। पहली यह कि पाठ उस इष्टदेव का नाम नहीं देता, और जहाँ पाठ नाम नहीं देता वहाँ नाम जोड़ा नहीं जाना चाहिये। दूसरी उस एक शब्द में है जिसे मेघनाद ख़ुद चुनता है, मनुसाई, यानी पुरुषार्थ। रोते हुए घर के बीच खड़ा होकर बेटा पिता को जो सान्त्वना देता है, वह यह नहीं है कि शोक छोटा है। वह यह है कि कल एक तमाशा होगा।

और यह भी देखने लायक़ है कि तुलसी उसकी इस बातचीत को क्या नाम देते हैं। इस प्रकार जल्पत, यानी डींग मारते हुए, सबेरा हो गया। कवि सान्त्वना को सान्त्वना नहीं कहता, डींग कहता है, और रातभर की बातचीत को एक ही शब्द में तौल देता है। सबेरा होते ही लङ्का के चारों दरवाज़ों पर बहुत-से वानर आ डटे। इधर काल के समान वीर वानर और भालू, उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस। दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी जय के लिये लड़ रहे हैं, और यहीं कवि एक बार रुककर किसी को सम्बोधन करता है, खगकेतू, और टीका उसे पक्षियों के राजा का सम्बोधन पढ़ती है। इस सम्बोधन को याद रखियेगा। जिसे यहाँ पुकारा जा रहा है, वह दो दोहे बाद स्वयं इस कथा के भीतर चला आयेगा।

सार: कुम्भकर्ण के शोक में डूबे घर में मेघनाद आता है और पिता से कहता है कि कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा, क्योंकि इष्टदेव से पाया हुआ बल और रथ अब तक दिखाया नहीं गया। तुलसी उसकी सान्त्वना को डींग कहते हैं, और उसी डींग में रात बीत जाती है।

आकाश में एक रथ

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥ ७२॥

दोहा ७२

मेघनाद उसी मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरों की सेना में भय छा गया। दोहे का सबसे ज़रूरी शब्द मायामय है, और वह रथ का विशेषण है, सवार का नहीं। जो ऊपर गया है वह सचमुच है। जिस पर चढ़कर गया है, वह नहीं। और उसका पहला हथियार हथियार है ही नहीं। पहले अट्टहास आता है, फिर त्रास, और उसके बाद बाण। सेना के भीतर डर उससे पहले पहुँच जाता है जो डराने आया है।

इसके बाद जो सूची आती है, वह अपने लम्बे होने से ही काम करती है। शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण, तरह-तरह के अस्त्र और शस्त्र, वज्र जैसे बहुत-से आयुध। फरसे, परिघ, पत्थर। और इन सबके ऊपर बाणों की वृष्टि। पढ़ने वाले को गिनती याद नहीं रहती, और यही कवि का मतलब है। नीचे खड़े आदमी को भी गिनती याद नहीं रहती। उस पर जो गिर रहा है उसका नाम रखने का समय उसके पास नहीं है।

दस दिसि रहे बान नभ छाई । मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥
धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥

चौपाई २

आकाश में दसों दिशाओं में बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्र के बादलों ने झड़ी लगा दी हो। और फिर वह पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा प्रसंग खड़ा है। कानों में धरु धरु मारु की आवाज़ सुनायी पड़ती है, पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता। पहला आधा शोर है और दूसरा आधा सन्नाटा। पकड़ो और मारो कहने वाले बहुत हैं, और जिसे पकड़ना है वह किसी की आँख में नहीं है।

मघा वाली उपमा भी लापरवाही से नहीं चुनी गयी। मघा की झड़ी वह बारिश है जो रुकती नहीं और जिसमें एक बूँद का दूसरी से अलग होना बन्द हो जाता है। बाणों के साथ भी वही हुआ है। वे अलग-अलग वार नहीं रहे, एक मौसम हो गये। और मौसम से कोई लड़ता नहीं, उसे झेलता है।

सार: मेघनाद मायामय रथ पर आकाश में चढ़ जाता है, अट्टहास से सेना को डराता है, और फिर हर तरह का अस्त्र बरसाता है। दसों दिशाएँ बाणों से भर जाती हैं, पकड़ो और मारो की आवाज़ें गूँजती हैं, और जो मार रहा है उसे कोई देख नहीं पाता।

बाणों का पिंजरा

वानर वही करते हैं जो वे जानते हैं। पहाड़ और पेड़ उठाकर आकाश में दौड़ते हैं। और लौट आते हैं। पाठ का शब्द यहाँ बहुत सटीक है, वे दुखी होकर लौटते हैं। हारकर नहीं, दुखी होकर। जो चीज़ उन्हें तोड़ रही है वह उसका बल नहीं है, उसका न दिखना है। हथियार हाथ में है, बाँह में ज़ोर है, और सामने कोई नहीं।

इसके बाद मेघनाद वह करता है जो अब तक किसी ने नहीं किया था। वह भागने की जगहें बन्द कर देता है। अटपटी घाटियाँ, रास्ते, पहाड़ की कन्दराएँ, सब बाणों से छा दी जाती हैं, और पाठ उन्हें एक ही शब्द में बाँध देता है, सर पंजर, यानी बाणों का पिंजरा। युद्ध अब मैदान नहीं रहा, कमरा हो गया। और उपमा फिर पहाड़ों की है, कि वानर ऐसे व्याकुल हो गये मानो पर्वत इन्द्र की क़ैद में पड़े हों। जो चीज़ अपनी जगह से हिलती ही नहीं, उसे भी बाँधा जा सकता है, यह तुलसी की सबसे उदास उपमाओं में से एक है।

और फिर नाम आने लगते हैं, और हर नाम का आना एक दरवाज़ा बन्द होना है। मारुति हनुमान, अंगद, नल, नील, सारे बलवाले व्याकुल कर दिये गये। फिर लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण, तीनों बाणों से मारकर चलनी कर दिये गये। जब ऊपर से आती चीज़ का उत्तर नहीं है तो बल का क्रम काम नहीं आता, और सबसे बड़ा नाम भी उसी पंक्ति में खड़ा हो जाता है जिसमें सबसे छोटा। और तब वह उस ओर मुड़ता है जिस ओर उसे मुड़ना ही था। वह रघुनाथ से जूझने लगता है, और अब वह जो बाण छोड़ता है वे साँप होकर लगते हैं।

ब्याल पास बस भए खरारी । स्वबस अनंत एक अबिकारी॥
नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥

चौपाई ३

पहली पंक्ति में तुलसी वह कह देते हैं जो कहा जाना चाहिये, और उसी पंक्ति में उसे काट भी देते हैं। खर के शत्रु नागपाश के वश में हो गये, और उसी साँस में कहा जाता है कि वे स्वबस हैं, अनन्त हैं, एक हैं, अविकारी हैं। वश में होना और स्वबस होना एक वाक्य में साथ नहीं रह सकते, और कवि उन्हें जानबूझकर एक ही वाक्य में रखता है। दूसरी पंक्ति इस पर मुहर लगा देती है। नट की तरह वे अनेकों प्रकार के दिखावटी चरित्र करते हैं, और सदा स्वतन्त्र, एक भगवान् हैं। नट का काम मंच पर बँधना भी है, और मंच के पीछे वह किसी का बँधा हुआ नहीं होता।

इस उपमा का चुनाव यहाँ बहुत ज़रूरी है। ऊपर एक मायावी बैठा है जो रूप बदलकर लड़ रहा है। नीचे वह है जिसे कवि नट कह रहा है। दोनों दिखावा कर रहे हैं, और तुलसी दोनों को एक तराज़ू पर नहीं रखते। एक अपने को छिपाने के लिये रूप बदलता है। दूसरा दिखायी देने के लिये।

रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो । नागपास देवन्ह भय पायो॥

चौपाई ४

रण की शोभा के लिये प्रभु ने अपने को नागपाश में बँधा लिया, और उससे देवताओं को बड़ा भय हुआ। क्रिया पर ध्यान दीजिये। पाठ यह नहीं कहता कि वे बँध गये। वह कहता है कि उन्होंने अपने को बँधा लिया। कर्ता बदल जाता है, और उसके साथ पूरी घटना का अर्थ बदल जाता है। और कारण जो बताया गया है वह और भी असाधारण है, रन सोभा, रण की शोभा। युद्ध का एक सौन्दर्य होता है, और उस सौन्दर्य में हारने का एक क्षण भी शामिल है।

पर देवताओं को यह समझाया नहीं गया। उन्हें भय हुआ। तुलसी यहाँ एक बहुत मानवीय बात कह जाते हैं। ऊपर बैठे हुए वे लोग भी, जो जानते हैं कि वह कौन है, वह दृश्य देखकर डर जाते हैं। जानना और देखना एक साथ नहीं चलते, और जब दोनों टकराते हैं तो देखना जीत जाता है।

सार: मेघनाद घाटियों, रास्तों और कन्दराओं को बाणों का पिंजरा बना देता है, हनुमान, अंगद, नल और नील को व्याकुल करता है, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण को बाणों से बींध देता है, और उसके छोड़े बाण साँप होकर राम को बाँध लेते हैं। तुलसी उसी क्षण कह देते हैं कि प्रभु ने रण की शोभा के लिये स्वयं को बँधाया है।

जो बँधता नहीं

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।
सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥ ७३॥

दोहा ७३

हे गिरिजा, जिनका नाम जपकर मुनि जन्म और मृत्यु की फाँसी काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्व के निवास कहीं बन्धन में आ सकते हैं। यह पूरे लङ्काकाण्ड के सबसे साफ़ दोहों में से एक है, और यह कथा के भीतर से नहीं आता। यह कथा रोककर आता है। शिव उमा से बात कर रहे हैं, और उनका प्रश्न सुनने वाले के डर को सीधे छू लेता है। जो नाम दूसरों की फाँसी काट देता है, वह स्वयं फाँसी में कैसे आयेगा।

और इसके बाद जो चौपाई आती है, वह पढ़ने वाले को एक नियम दे देती है। हे भवानी, राम की इन सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क नहीं किया जा सकता। ऐसा विचार करके जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त हैं, वे सब तर्क छोड़कर राम का भजन ही करते हैं। यह हार मान लेने की सलाह नहीं है। यह औज़ार बदलने की सलाह है। जिस चीज़ को तराज़ू से नहीं नापा जा सकता, उसके लिये और बड़ा तराज़ू मँगाना काम नहीं आता।

सार: कथा रुक जाती है और शिव उमा से पूछते हैं कि जिनका नाम जपकर मुनि भव की फाँसी काट डालते हैं, वे बन्धन में कैसे आ सकते हैं। राम की सगुण लीला तर्क का विषय नहीं है, यह कहकर तुलसी सुनने वाले को उस दृश्य से बाहर निकाल लेते हैं जिसमें वह अभी-अभी डरा था।

एक बूढ़े का हाथ

अब कथा फिर मैदान पर लौटती है, और लौटते ही पाठ मेघनाद का दूसरा नाम इस्तेमाल करता है, घननाद। उसने सेना को व्याकुल कर दिया, और फिर वह प्रकट हो गया। यह वाक्य इस पूरे प्रसंग का मोड़ है, और तुलसी इसे बिना किसी ज़ोर के लिख देते हैं। जो अब तक इसीलिये अजेय था कि दिखता नहीं था, वह स्वयं दिखने के लिये उतर आता है। और जिस कारण से उतरता है वह और भी छोटा है। उसे गाली देनी है। वह प्रकट होकर दुर्वचन कहने लगता है।

और भरी सेना में से उत्तर एक ऐसे मुँह से आता है जिससे किसी को उम्मीद नहीं थी। जाम्बवान् कहते हैं, अरे दुष्ट, खड़ा रह। तीन शब्द। न ललकार, न प्रतिज्ञा, न कोई बड़ी बात। जो आदमी अभी-अभी आकाश से पूरी सेना को बाँधकर आया है, उससे एक बूढ़ा इतना ही कहता है कि जहाँ है वहीं रुका रह। इसे सुनकर मेघनाद का क्रोध बहुत बढ़ जाता है, और क्रोध का कारण वह स्वयं बता देता है।

बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही । लागेसि अधम पचारै मोही॥
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥

चौपाई ५

अरे मूर्ख, मैंने बूढ़ा जानकर छोड़ दिया था, और अब अधम होकर मुझी को ललकारने लगा है। यह वाक्य मेघनाद के बारे में वह सब बता देता है जो अब तक नहीं बताया गया था। उसने पहले जाम्बवान् को छोड़ा था, और छोड़ने का कारण दया नहीं, हिसाब था। बूढ़े को गिनती में नहीं रखा गया था। इस पूरे दिन में उसकी सबसे बड़ी चूक कोई हथियार नहीं है। वह यही गिनती है।

और फिर वह चमकता हुआ त्रिशूल चलाता है। जाम्बवान् उसे रोकते नहीं, काटते नहीं, हटते नहीं। वे उसी त्रिशूल को हाथ से पकड़ लेते हैं और उसे लेकर दौड़ पड़ते हैं। इस पूरे प्रसंग में यह पहली चीज़ है जो मेघनाद की भेजी हुई हो और किसी के हाथ में आयी हो। अब तक जो कुछ आया था वह ऊपर से आता था और किसी की मुट्ठी में नहीं आता था।

आगे का ब्योरा छोटा है और बहुत ठोस है। वही त्रिशूल मेघनाद की छाती पर दे मारा जाता है। देवताओं का वह शत्रु चक्कर खाकर धरती पर गिर पड़ता है। जाम्बवान् फिर क्रोध में भरकर उसका पैर पकड़ते हैं, उसे घुमाते हैं, और धरती पर पटककर अपना बल दिखा देते हैं। जो आकाश में रहकर अदृश्य था, वह अब ज़मीन पर है, और एक बूढ़े की मुट्ठी में है। उसकी माया उसके शरीर की रक्षा नहीं कर सकती, क्योंकि माया आँख पर काम करती है, चमड़ी पर नहीं।

सार: मेघनाद सेना को व्याकुल करके गाली देने के लिये प्रकट हो जाता है, और जाम्बवान् उससे खड़े रहने को कहते हैं। वह याद दिलाता है कि बूढ़ा जानकर उसे छोड़ा गया था, फिर त्रिशूल चलाता है। जाम्बवान् वही त्रिशूल हाथ से पकड़कर उसकी छाती पर मारते हैं और उसे धरती पर पटक देते हैं।

पक्षियों का राजा

बर प्रसाद सो मरइ न मारा । तब गहि पद लंका पर डारा॥
इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥

चौपाई ६

पहली पंक्ति एक दीवार है। वरदान के प्रताप से वह मारे नहीं मरता। जाम्बवान् ने जो किया, उससे बड़ा कुछ आज किसी ने नहीं किया, और फिर भी वह मरता नहीं। तब वे उसका पैर पकड़कर उसे लङ्का पर फेंक देते हैं। ध्यान दीजिये कि फेंका कहाँ जाता है। मैदान में नहीं, नगर पर। जिस घर से वह कल रात बड़ाई करके निकला था, उसी घर पर उसे लौटा दिया जाता है।

और उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में कथा कहीं और चली जाती है। इधर देवरिषि ने गरुड़ को भेजा, और वे तुरंत राम के पास आ पहुँचे। पाठ यहाँ केवल देवरिषि कहता है और टीका उन्हें नारद बताती है। जो बात सबसे ज़्यादा ध्यान माँगती है वह यह है कि यह किसी की प्रार्थना का उत्तर नहीं है। नीचे किसी ने नहीं पुकारा। ऊपर किसी ने देख लिया, और भेज दिया।

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥ ७४ (क) ॥

दोहा ७४ (क)

पक्षिराज गरुड़ सब माया-सर्पों के समूहों को पकड़कर खा गये। तब सब वानरों के झुंड माया से रहित होकर हर्षित हुए। इस दोहे में जो नहीं है, वह उतना ही ज़रूरी है जितना जो है। कोई मन्त्र नहीं है। कोई उलटा जादू नहीं है। कोई अस्त्र नहीं छूटता। एक पक्षी आता है और साँपों को खा जाता है, क्योंकि साँप उसका भोजन हैं। जिस माया ने पूरी सेना को बाँध रखा था, उसका उत्तर एक भूख निकलती है।

और जो शब्द तुलसी चुनते हैं, वह भी यही कहता है, माया बिगत। माया हारी नहीं, माया चली गयी। जिस चीज़ का अपना कोई शरीर नहीं था, उसे तोड़ा नहीं जा सकता था। उसे केवल हटाया जा सकता था। इसके साथ का दूसरा दोहा दिखाता है कि हटते ही क्या होता है। पहाड़, पेड़, पत्थर और नख लिये वानर क्रोध में दौड़ पड़ते हैं, और निशाचर पहले से कहीं ज़्यादा व्याकुल होकर भाग चलते हैं और भागकर किले पर चढ़ जाते हैं। वानरों में कोई नया बल नहीं आया। केवल निशाना लौट आया।

सार: वरदान के कारण मेघनाद मारे नहीं मरता, तो जाम्बवान् उसे लङ्का पर फेंक देते हैं। उधर देवरिषि के भेजे गरुड़ आकर सब माया-सर्पों को खा जाते हैं। माया हटते ही वानर पहाड़ और पेड़ लेकर दौड़ पड़ते हैं और राक्षस भागकर किले पर चढ़ जाते हैं।

गुफा में एक यज्ञ

मेघनाद कै मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा । करौं अजय मख अस मन धरा॥

चौपाई ७

मेघनाद की मूर्च्छा टूटती है, और सबसे पहले जो चीज़ उसे मिलती है वह चोट नहीं है। पिता को देखकर उसे बहुत शर्म लगती है। इस पन्ने का इंजन यही एक शब्द है, लाज। जिसने रात को कहा था कि कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा, वह सुबह उसी आदमी के सामने बेसुध पड़ा मिला है। इसके बाद जो होता है वह लड़ाई का फ़ैसला नहीं है, शर्म का फ़ैसला है। वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वत की गुफा में चला जाता है, यह मन में ठानकर कि अजेय होने का यज्ञ करूँगा।

यह भी देखने लायक़ है कि वह मैदान में नहीं लौटता। वह छिपने चला जाता है, और छिपकर जो करने जा रहा है वह भी वही है जो वह अब तक करता आया है। रथ माया का था। पिंजरा माया का था। और अब यज्ञ भी हार को टालने के लिये नहीं, हार को असम्भव बनाने के लिये किया जा रहा है। एक ही आदमी बार-बार एक ही उपाय पर लौटता है, कि नियम बदल दिया जाय। जो लड़ाई जीती नहीं जा रही, उसे लड़ाई ही न रहने दिया जाय।

उधर विभीषण सलाह लेकर आते हैं, और उनकी बात में कोई अलंकार नहीं है। हे अतुलनीय बलवाले उदार प्रभो, देवताओं को सतानेवाला वह दुष्ट मायावी एक अपवित्र यज्ञ कर रहा है। और फिर वे वह वाक्य कहते हैं जिस पर आगे की सारी दौड़ टिकी है। यदि वह यज्ञ सिद्ध हो गया तो फिर उसे जल्दी जीता नहीं जा सकेगा। ख़तरा उसके बल का नहीं है। ख़तरा समय का है, और गिनती घंटों में चल रही है।

और राम इस ख़बर पर जो करते हैं, वह ठहरकर देखने लायक़ है। पाठ कहता है कि यह सुनकर रघुनाथ ने बहुत सुख माना। यह चिन्ता की ख़बर है और उस पर सुख हुआ है। कारण अगली ही पंक्तियों में खुल जाता है। यह ख़बर एक काम बताती है, और काम बताया जाना उस पक्ष के लिये राहत है जिसके सामने आज सुबह से कोई निशाना ही नहीं था। सुबह से यह सेना हवा पर वार कर रही थी। अब एक जगह का पता है।

सार: होश आते ही मेघनाद को पिता के सामने लाज आती है और वह गुफा में अजेय होने का यज्ञ करने चला जाता है। विभीषण चेताते हैं कि वह अपवित्र यज्ञ सिद्ध हो गया तो उसे जल्दी जीता नहीं जा सकेगा, और यह सुनकर रघुनाथ को बहुत सुख होता है।

आज्ञा, और एक प्रतिज्ञा

लछिमन संग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई॥
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥

चौपाई ८

हे भाइयो, सब लोग लक्ष्मण के साथ जाओ और जाकर यज्ञ को विध्वंस करो। और फिर एक वाक्य अलग से, एक ही आदमी के नाम। संग्राम में उसे लक्ष्मण मारें। और कारण जो दिया जाता है वह न प्रतिशोध है, न नीति। देवताओं को भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है। पूरे आदेश की जड़ यही एक पंक्ति है। जो आज्ञा दी जा रही है वह लङ्का जीतने के लिये नहीं है। वह किसी और के डर को मिटाने के लिये है।

इसके बाद जो कहा जाता है वह और भी असाधारण है। उसे ऐसे बल और बुद्धि के उपाय से मारना जिससे निशाचर का नाश हो। बल और बुद्धि, दोनों नाम लिये गये हैं, और उपाई शब्द अपनी जगह साफ़ है। यह सीधी टक्कर का आदेश नहीं है। यह उस आदमी के लिये आदेश है जिससे लड़ने वाला दिखता ही नहीं। और अन्त में तीन नाम आते हैं जिन्हें सेना समेत साथ रहने को कहा जाता है, जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण। इनमें एक वह है जिसने उसे अभी-अभी पटका था, एक वह है जिसे उसने बाणों से बींधा था, और एक वह है जो उसका अपना चाचा है और जिसने उसके यज्ञ का भेद खोला है।

आज्ञा मिलते ही लक्ष्मण की तैयारी गिनायी जाती है, और वह बहुत कम शब्दों में है। कमर में तरकश कसा, धनुष सजाया, प्रभु के प्रताप को हृदय में धारण किया, और मेघ के समान गम्भीर वाणी बोले। पहले वाले दोनों काम हाथ के हैं। तीसरा नहीं है, और इस पन्ने पर वही सबसे ज़्यादा काम आयेगा।

जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥
जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥

चौपाई ९

यदि आज मैं उसे बिना मारे लौट आऊँ तो रघुनाथ का सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शङ्कर भी उसकी सहायता करें तो भी, रघुवीर की दुहाई, आज मैं उसे मार ही डालूँगा। दोनों आधे अलग-अलग क़िस्म के हैं। पहले आधे में वे अपने ऊपर एक शर्त रखते हैं, और जो चीज़ दाँव पर लगायी गयी है वह जीवन नहीं है, नाम है। दूसरे आधे में वे अपने सामने की कठिनाई को जितना बड़ा किया जा सकता है उतना बड़ा कर देते हैं, और फिर भी वही कहते हैं।

इसके बाद रघुनाथ के चरणों में सिर नवाकर अनन्त तुरंत चल पड़ते हैं। पाठ लक्ष्मण को यहाँ अनन्त कहता है, और यह नाम इस प्रसंग में बार-बार लौटेगा। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान जैसे उत्तम योद्धा हैं। जिस माया ने साँप भेजकर बाँधा था, उसे मारने अब वह जा रहा है जिसे यही पाठ थोड़ी देर बाद सर्पों का स्वामी कहेगा। यह मेल पाठ ने स्वयं रखा है, और रखकर उसकी ओर उँगली नहीं उठायी।

सार: राम सब वानरों को लक्ष्मण के साथ यज्ञ तोड़ने भेजते हैं, लक्ष्मण को बल और बुद्धि के उपाय से मारने का आदेश देते हैं, और कारण यह बताते हैं कि देवताओं का भय उन्हें दुःख देता है। लक्ष्मण प्रतिज्ञा करते हैं कि बिना मारे लौटे तो सेवक न कहलायें, और जाम्बवान्, सुग्रीव तथा विभीषण सेना समेत साथ चलते हैं।

यज्ञ टूटता है

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥

चौपाई १०

वानरों ने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ है और रुधिर तथा भैंसे की आहुति दे रहा है। यह ब्योरा पाठ ने ठंडे मन से रखा है और उस पर कोई टिप्पणी नहीं की। जिस यज्ञ को विभीषण ने अपवित्र कहा था, उसका अपवित्र होना यहाँ दिखा दिया जाता है, कहा नहीं जाता। वानरों ने सारा यज्ञ विध्वंस कर दिया। और तब वह होता है जिसकी उम्मीद नहीं थी। वह नहीं उठता।

यह इस पूरे दिन का सबसे अजीब दृश्य है। यज्ञ उजाड़ा जा चुका है और करने वाला वहीं बैठा है। तब वानर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं। फिर भी वह नहीं उठता। तब वे जाकर उसके बाल पकड़ते हैं और लातों से मार-मारकर भाग चलते हैं। जिस आदमी ने आज सुबह आकाश से पूरी सेना को बाँध दिया था, उसके बाल पकड़े जा रहे हैं और वह हिलता नहीं। संकल्प इतना गाढ़ा है कि अपमान उस तक पहुँच ही नहीं रहा।

और फिर वह उठता है, पर यज्ञ के लिये नहीं। वह त्रिशूल लेकर दौड़ता है। वानर भागते हैं और वहीं आते हैं जहाँ आगे लक्ष्मण खड़े हैं। पूरी योजना का यही हिस्सा था, कि उसे उस जगह तक ले आया जाय जहाँ उसका सामना करने वाला खड़ा है। जिसे सुबह से कोई ढूँढ़ नहीं पाया था, उसे अब चलकर आना पड़ा है। यही वह उपाय है जिसकी बात राम ने बल के साथ जोड़कर की थी।

आगे जो होता है वह तेज़ है और बुरा है। वह अत्यन्त क्रोध का मारा हुआ आता है और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजता है। हनुमान और अंगद क्रोध करके दौड़ते हैं, और वह दोनों की छाती में त्रिशूल मारकर उन्हें धरती पर गिरा देता है। फिर वही प्रचण्ड त्रिशूल वह लक्ष्मण पर छोड़ता है, और अनन्त एक बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर देते हैं। हनुमान और युवराज अंगद उठकर फिर क्रोध से उसे मारते हैं, और उसे चोट नहीं लगती। वीर लौट आते हैं, क्योंकि शत्रु मारे नहीं मरता। और तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ता है, और उसे क्रुद्ध काल की तरह आता देखकर लक्ष्मण भयानक बाण छोड़ते हैं।

सार: वानर गुफा में उसे रुधिर और भैंसे की आहुति देते हुए पाते हैं और यज्ञ उजाड़ देते हैं, पर वह नहीं उठता, और बाल पकड़कर लात मारे जाने पर भी नहीं उठता। फिर वह त्रिशूल लेकर दौड़ता है, हनुमान और अंगद को गिराता है, त्रिशूल लक्ष्मण पर छोड़ता है, और लक्ष्मण उसे बाण से दो टुकड़े कर देते हैं।

कभी दिखता है, कभी नहीं

देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥
बिबिध बेष धरि करइ लराई । कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥

चौपाई ११

वज्र के समान बाणों को आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो जाता है, और फिर भाँति-भाँति के रूप धारण करके लड़ता है, कभी प्रकट होकर, कभी छिपकर। यह उसकी माया का दूसरा दौर है और पहले से अलग है। पहले दौर में वह ऊपर था और दिखता नहीं था। इस दौर में वह सामने है और ठहरता नहीं। हर बार जब बाण उस जगह पहुँचता है, वहाँ कोई नहीं होता। लड़ाई अब निशाने की नहीं रही, समय की हो गयी है।

और इसका असर सबसे पहले वानरों पर दिखता है। शत्रु को हारता न देखकर वे डरने लगते हैं। यह डर चोट से नहीं आया। यह इस बात से आया कि कोई चीज़ ख़त्म ही नहीं हो रही। हर लड़ाई का एक क्षण होता है जिसके बाद लड़ने वाला सोचने लगता है कि यह कभी ख़त्म भी होगी या नहीं, और तुलसी उस क्षण को नाम लेकर दर्ज कर देते हैं। माया का असली काम यही है। वह किसी को मारती नहीं, थका देती है।

देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥
लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥

चौपाई १२

तब सर्पों के स्वामी को बहुत क्रोध आया, और लक्ष्मण ने मन में यह बात पक्की कर ली कि इस पापी को मैं बहुत खिला चुका। यह वाक्य इस पूरे प्रसंग का ताला खोल देता है, और वह एक शब्द पर खुलता है, खेलावा। जो अब तक हो रहा था उसे लक्ष्मण लड़ाई नहीं कहते। वे उसे खेल कहते हैं, और उस खेल में खिलाने वाले वे थे। माया अपराजित नहीं थी। उसे चलने दिया जा रहा था। और जिस क्षण चलने देना बन्द होता है, उस माया के पास कुछ नहीं बचता।

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥
छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥

चौपाई १३

कोसलपति के प्रताप का स्मरण करके उन्होंने दर्प के साथ बाण का सन्धान किया। बाण छूटा और छाती के बीच में लगा। यहाँ भी वही बात है जो गरुड़ वाले दोहे में थी। कोई उलटी माया नहीं चलती। कोई भेद खोलने वाला मन्त्र नहीं पढ़ा जाता। एक आदमी किसी और का प्रताप याद करता है और तीर छोड़ देता है। और इस बार वह लगता है, क्योंकि इस बार वह सचमुच छोड़ा गया है।

और फिर पाठ वह पंक्ति लिखता है जिसे इस प्रसंग की आख़िरी कुंजी कहा जा सकता है। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया। जिस आदमी की पूरी पहचान छिपना थी, वह अन्तिम क्षण में खुल जाता है। माया किसी के हाथों तोड़ी नहीं गयी। वह उसके भीतर से गिर गयी, और तब जो बचा वह बहुत छोटा और बहुत साफ़ था।

सार: बाण आते देखकर मेघनाद अन्तर्धान हो जाता है और रूप बदल-बदलकर लड़ता है, और वानर डरने लगते हैं। तब लक्ष्मण मन में तय करते हैं कि इस पापी को बहुत खिला चुके, कोसलपति का प्रताप स्मरण करके बाण छोड़ते हैं, और वह छाती के बीच लगता है। मरते समय मेघनाद सब कपट छोड़ देता है।

दो नाम

जो आख़िरी शब्द वह कहता है, वे प्रश्न हैं, और वे चौंका देते हैं। राम का छोटा भाई कहाँ है, राम कहाँ हैं। ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। जीवनभर जिन दो लोगों को ढूँढ़ने का नाटक उसने किया था, मरते समय वह सचमुच उन्हें ढूँढ़ता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह प्रश्न बैर का नहीं लगता। वह किसी को ललकार नहीं रहा। वह पूछ रहा है कि वे कहाँ हैं, और पाठ उत्तर नहीं देता, क्योंकि उत्तर की अब ज़रूरत नहीं रही।

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥ ७६॥

दोहा ७६

अंगद और हनुमान कहते हैं कि धन्य है, धन्य है वह माता। टीका इस पर जो जोड़ती है वह वाक्य को पूरा कर देती है, कि वह लक्ष्मण के हाथों मरा और मरते समय राम तथा लक्ष्मण के नामों का उच्चारण करके गया। जिन दो वानरों को उसने आज ही छाती में त्रिशूल मारकर गिराया था, वही दोनों उसके मरने पर उसकी माता को धन्य कहते हैं। इस पन्ने की सबसे बड़ी उदारता यही है, और वह किसी बड़े के मुँह से नहीं आती। वह उन दो के मुँह से आती है जिन्हें आज सबसे ज़्यादा चोट लगी है।

इसके बाद का ब्योरा और भी शान्त है। हनुमान उसे बिना किसी परिश्रम के उठा लेते हैं, लङ्का के दरवाज़े पर रख आते हैं, और लौट आते हैं। बिनु प्रयास इस पूरे दिन का सबसे चुपचाप वाला शब्द है। जिस शरीर को छूने में पूरी सेना हार गयी थी, वह अब हलका है। और उसे लौटाया वहीं जाता है जहाँ से वह आया था, घर के दरवाज़े पर। न कोई तमाशा, न कोई सन्देश। एक लाश घर पहुँचा दी जाती है।

उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व विमानों पर चढ़कर आकाश में आते हैं। फूल बरसाते हैं, नगाड़े बजाते हैं और रघुनाथ का निर्मल यश गाते हैं। और जो पुकार वे लगाते हैं, वह इस प्रसंग को गोल घुमाकर वहीं ले आती है जहाँ से वह चला था। हे अनन्त, आपकी जय हो, हे जगदाधार, आपकी जय हो, हे प्रभो, आपने सब देवताओं का उद्धार किया। यही अनन्त शब्द थोड़ी देर पहले लक्ष्मण के लिये आया था और यहाँ वह उस स्तुति में है जो रघुनाथ के लिये गायी जा रही है। और जिनका भय मिटाने के लिये यह सारा काम हुआ था, वे ही आकर उसकी रसीद दे रहे हैं। राम ने जो कारण बताया था, वह पूरा हो गया।

सार: मेघनाद मरते हुए पूछता है कि रामानुज कहाँ हैं, राम कहाँ हैं, और प्राण छोड़ देता है। अंगद और हनुमान उसकी माता को धन्य कहते हैं, हनुमान उसका शरीर बिना परिश्रम उठाकर लङ्का के दरवाज़े पर रख आते हैं, और देवता विमानों पर आकर फूल बरसाते और रघुनाथ का यश गाते हैं।

ख़बर, और एक उपदेश

देवता और सिद्ध स्तुति करके चले जाते हैं, और लक्ष्मण कृपा के समुद्र के पास लौट आते हैं। प्रतिज्ञा पूरी हुई, और पाठ उस पर एक शब्द भी ख़र्च नहीं करता। न कोई घोषणा, न कोई गिनती। ठीक उसी चौपाई में कथा दूसरी ओर पलट जाती है। रावण ने ज्यों ही पुत्र-वध का समाचार सुना, त्यों ही वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। एक ही चौपाई में एक घर लौट रहा है और दूसरा गिर रहा है।

मन्दोदरी का विलाप यहाँ है, और वह बहुत तेज़ है। छाती पीट-पीटकर, बहुत प्रकार से पुकार-पुकारकर। इस काण्ड में उनका यह पहला दुःख नहीं है, पर पहले वे समझा रही थीं। अब समझाने को कुछ बचा नहीं। और इसके साथ पाठ एक और बात दर्ज करता है जो अब तक नहीं कही गयी थी। नगर के सब लोग शोक से व्याकुल हो गये, और सभी रावण को पोच कहने लगे, यानी नीच। अब तक नगर चुप था। भाई के मरने पर चुप था, सेना के कटने पर चुप था। इस मौत पर वह चुप नहीं रहता, और वह जो कहता है वह शत्रु के बारे में नहीं है, अपने राजा के बारे में है।

और अन्तिम दोहा वही आदमी बोलता है जो अभी-अभी बेहोश होकर गिरा था।

तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाईं सब नारि।
नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि॥ ७७॥

दोहा ७७

तब रावण ने सब स्त्रियों को अनेकों प्रकार से समझाया कि जगत् का यह सारा रूप नाशवान् है, हृदय में विचार करके देख लीजिये। बात अपने आप में सच है, और इस पूरे प्रसंग में वह सबसे ठंडी जगह पर खड़ी है। जो आदमी अपने बेटे की ख़बर सुनकर धरती पर गिर पड़ा था, वह उठकर दूसरों को संसार की नश्वरता समझा रहा है। सच्ची बात उस मुँह से निकल रही है जिसने उस पर अमल नहीं किया, और वह उन लोगों को सुनायी जा रही है जो अभी-अभी रो रहे हैं। तुलसी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते। वे दोहा पूरा करते हैं और प्रसंग वहीं छोड़ देते हैं, बिना यह बताये कि स्त्रियाँ चुप हुईं या नहीं।

सार: लक्ष्मण लौट आते हैं, और उधर रावण पुत्र-वध का समाचार सुनते ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। मन्दोदरी छाती पीटकर विलाप करती हैं, नगर के लोग रावण को नीच कहने लगते हैं, और रावण उठकर सब स्त्रियों को समझाता है कि जगत् का यह सारा रूप नाशवान् है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में माया तीन बार हारती है, और तीनों बार वह उस तरह नहीं हारती जिस तरह कहानियों में हारती है। पहली बार जाम्बवान् के हाथ से, जो कोई मन्त्र नहीं जानते और जिनके पास उसका भेजा हुआ त्रिशूल भर है। दूसरी बार गरुड़ से, जो कोई अस्त्र नहीं चलाते, जो साँपों को खा जाते हैं क्योंकि साँप उनका भोजन हैं। तीसरी बार लक्ष्मण से, जो कोई नयी विद्या नहीं निकालते, बस यह तय कर लेते हैं कि खिलाना बहुत हो चुका। तीनों जगह उत्तर उसी दुनिया से आया है जिसमें भूख लगती है, हाथ थकते हैं और सब्र टूटता है। तुलसी जादू का उत्तर जादू से नहीं दिलाते।

और इसीलिये यह प्रसंग उस डींग से शुरू होकर उन दो प्रश्नों पर ख़त्म होता है। रात को उसने कहा था कि कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा, अभी बड़ाई क्या करूँ, इष्टदेव से पाया हुआ बल अब तक दिखाया नहीं। सुबह उसने वह सब दिखा दिया, पूरा का पूरा, आकाश से लेकर गुफा तक। और जिस चीज़ पर पर्दा आख़िर तक पड़ा रहा, वह उसका बल नहीं था। वह यह था कि वह उन दोनों को जानता है, और अन्त में केवल यही बचा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया, यह पंक्ति उसकी सारी विद्या का हिसाब एक साँस में चुका देती है।

हम भी बहुत कुछ बचाकर रखते हैं। कोई नाराज़गी, कोई डर, कोई बात जो कहने लायक़ थी और कही नहीं गयी। और उन सबकी हिफ़ाज़त में जो ताक़त लगती है, वह बहुत होती है। यह पन्ना यह नहीं कहता कि छिपाना बुरा है। यह इतना कहता है कि छिपाया हुआ बहुत महँगा पड़ता है, और आख़िर में वह छूट ही जाता है। जिसे अन्त में छोड़ना ही है, उसे थोड़ा पहले छोड़ देने में कोई घाटा नहीं।

जो पाठक यहाँ तक आया है, वह यह देख चुका है कि इस काण्ड की सबसे कठिन लड़ाई किसी तलवार से नहीं लड़ी गयी। वह उस चीज़ से लड़ी गयी जो सामने आती ही नहीं थी, और उसे जीतने के लिये किसी को आकाश में नहीं जाना पड़ा। जाम्बवान् ने बस पकड़ लिया। गरुड़ ने बस खा लिया। लक्ष्मण ने बस तय कर लिया। तीनों के पास वही था जो उनके पास पहले से था।

अगला प्रसंग उसी घर में खुलता है जहाँ यह बन्द हुआ, और वहाँ जो आदमी अभी स्त्रियों को जगत् की नश्वरता समझा रहा है, वह ख़ुद उठकर चलेगा। पर उससे पहले इस दोहे पर एक क्षण रुका जा सकता है। लङ्का में आज दो बातें एक साथ हुई हैं। एक बेटा मारा गया, और नगर ने पहली बार अपने राजा का नाम लेकर उसे नीच कहा। इनमें से दूसरी बात लङ्का के लिये ज़्यादा भारी है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ७२ से ७७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English