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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 10
मेघनाद की माया और उसका अन्त
एक रात की डींग से लेकर एक मरते हुए आदमी के दो प्रश्नों तक। और बीच में वह लड़ाई जिसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि लड़ने वाला दिखता ही नहीं था।
पिछला प्रसंग एक भाई पर समाप्त हुआ था। यह प्रसंग उसी दिन की शाम से शुरू होता है। दोनों सेनाएँ लौट रही हैं, दोनों ओर के योद्धा थके हुए हैं। लङ्का के भीतर रावण बैठा है, जो बार-बार अपने मरे हुए भाई का सिर छाती से लगा रहा है। चारों ओर स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटकर रो रही हैं और रोते हुए उसी मरे हुए के तेज और बल का बखान कर रही हैं। ठीक उसी क्षण रावण का बेटा चला आता है। इस प्रसंग की कथा वहीं से खुलती है, एक शोक वाले घर से, और फिर आकाश में चली जाती है।
इस दिन की लड़ाई और तरह की है। अब तक वार दिखते थे। यहाँ नहीं दिखते। बाण आते हैं और पता नहीं चलता कि कहाँ से आये। कानों में पकड़ो, पकड़ो, मारो की आवाज़ें पड़ती हैं, और उनके पीछे कोई शरीर नहीं मिलता। वानर पहाड़ और पेड़ उठाकर आकाश में दौड़ते हैं और ख़ाली लौट आते हैं, क्योंकि निशाना ही नहीं मिला। यह पूरा हिस्सा एक प्रश्न पर टिका है: जो नहीं दिख रहा, उसे छुआ कैसे जाय।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस प्रसंग में अन्तर कई जगह पड़ता है। यहाँ नागपाश में राम बँधते हैं। यहाँ उस बन्धन को काटने कोई अस्त्र नहीं आता, गरुड़ आते हैं, और उन्हें भेजने वाले का नाम पाठ नहीं लेता, केवल देवर्षि कहता है। यहाँ मेघनाद को पहली बार धरती पर पटकने वाला एक बूढ़ा है। और यहाँ बीच में कथा रुक जाती है और शिव पार्वती से कहते हैं कि जो बँधा हुआ दिख रहा है, वह बँधा नहीं है।
अदृश्य योद्धा के सामने
- मेघनाद रावण का पुत्र, जो अपने इष्टदेव से पाया हुआ रथ अब तक छिपाये बैठा था और इस प्रसंग में पहली बार उसे बाहर निकालता है।
- रावण जो इस प्रसंग के आरम्भ में अपने भाई का सिर छाती से लगाये बैठा है और अन्त में अपने बेटे की ख़बर सुनकर धरती पर गिर पड़ता है।
- राम जो इस प्रसंग में नागपाश में बँधते हैं, और जिनके विषय में कथा साथ ही कह देती है कि वे बँधने वाली वस्तु नहीं हैं।
- लक्ष्मण जिनके हाथों उस माया का अन्त होता है जो साँप भेजकर लड़ी गयी थी, और जिन्हें कथा यहाँ सर्पों का स्वामी भी कहती है।
- जाम्बवान् वह बूढ़ा, जिसे बूढ़ा जानकर छोड़ दिया गया था, और जो चलता हुआ त्रिशूल हाथ से पकड़ लेता है।
- गरुड़ पक्षियों के राजा, जो देवर्षि के भेजे हुए आते हैं और बन्धन काटते नहीं, खा जाते हैं।
- विभीषण जो गुफा वाले यज्ञ की ख़बर लाते हैं और बताते हैं कि उसे पूरा हो जाने देना कितना महँगा पड़ेगा।
- हनुमान और अंगद जो इस दिन दो बार गिराये जाते हैं, दो बार उठते हैं, और अन्त में मरे हुए शत्रु की माता को धन्य कहते हैं।
- मन्दोदरी जिनका विलाप इस प्रसंग के अन्त में है, और जिन्हें रावण जगत् के नाशवान् होने का उपदेश देकर चुप कराता है।
एक थकी हुई शाम, और कल का वादा
दिन ढल चुका है और दोनों सेनाएँ लौट पड़ी हैं। योद्धाओं में बड़ी थकावट है, और पाठ यह बात किसी पक्ष का नाम लिये बिना कहता है। फिर कथा जोड़ती है कि राम की कृपा से वानर दल का बल घटा नहीं, बढ़ा, उतना ही जितना घास पाकर आग बढ़ जाती है। दिनभर लड़ने के बाद बल का बढ़ना अपने आप नहीं होता, और कथा उसका कारण नाम लेकर बताती है।
दूसरी ओर का हिसाब उलटा है: राक्षस दिन और रात घटते जा रहे हैं, जैसे अपने ही मुँह से कह देने पर पुण्य घट जाता है। किया हुआ भला काम जिस क्षण अपनी ज़बान से गिनाया जाता है, उसी क्षण कम हो जाता है। और इसी घर में थोड़ी देर बाद एक आदमी अपने बल का बखान करता हुआ मिलेगा।
लङ्का के भीतर रावण विलाप कर रहा है। बार-बार वह अपने भाई का सिर हृदय से लगाता है। आसपास स्त्रियाँ छाती पीट-पीटकर रो रही हैं और उसी के भारी तेज और बल का बखान कर रही हैं। तभी मेघनाद आता है और बहुत-सी कथाएँ कहकर पिता को समझाता है। पाठ उन कथाओं का ब्योरा नहीं देता। वह सीधे उस वाक्य पर जाता है जिस पर बातचीत जाकर ठहरती है।
मेघनाद कहता है, “कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा, अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ। हे तात, अपने इष्टदेव से मैंने जो बल और रथ पाया था, वह बल अब तक आपको नहीं दिखाया।” पाठ उस इष्टदेव का नाम नहीं देता। और जो शब्द मेघनाद ख़ुद चुनता है, वह है पुरुषार्थ। रोते हुए घर के बीच खड़ा बेटा पिता को यह सान्त्वना नहीं देता कि शोक छोटा है। वह यह कहता है कि कल एक तमाशा होगा।
कथा उसकी इस बातचीत को एक नाम देती है: इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। सान्त्वना को सान्त्वना नहीं, डींग कहा गया है। सबेरा होते ही लङ्का के चारों दरवाज़ों पर बहुत-से वानर आ डटे। इधर काल के समान वीर वानर और भालू, उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस, और दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी जय के लिये लड़ रहे हैं। यहीं कथा एक बार रुककर किसी को सम्बोधित करती है, और टीका उसे पक्षियों के राजा गरुड़ का सम्बोधन पढ़ती है। जिसे यहाँ पुकारा जा रहा है, वह थोड़ी ही देर बाद स्वयं इस कथा के भीतर चला आयेगा।
आकाश में एक रथ
मेघनाद उसी मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरों की सेना में भय छा गया। मायामय रथ का विशेषण है, सवार का नहीं। जो ऊपर गया है वह सचमुच है, जिस पर चढ़कर गया है वह नहीं। पहले अट्टहास आता है, फिर त्रास, और उसके बाद बाण। सेना के भीतर डर उससे पहले पहुँच जाता है जो डराने आया है।
फिर हथियारों की लम्बी सूची: शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण, तरह-तरह के अस्त्र और शस्त्र, वज्र जैसे बहुत-से आयुध, फरसे, परिघ, पत्थर, और इन सबके ऊपर बाणों की वृष्टि। नीचे खड़े आदमी के पास उस पर गिरती चीज़ों का नाम रखने का समय नहीं है।
आकाश में दसों दिशाओं में बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्र के बादलों ने झड़ी लगा दी हो, ऐसी बारिश जो रुकती नहीं और जिसमें बूँदें अलग नहीं दिखतीं। फिर वह बात आती है जिस पर यह पूरा प्रसंग खड़ा है। कानों में पकड़ो, पकड़ो, मारो की आवाज़ सुनायी पड़ती है, पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता। एक ओर शोर है और दूसरी ओर सन्नाटा।
बाणों का पिंजरा
वानर वही करते हैं जो वे जानते हैं। पहाड़ और पेड़ उठाकर आकाश में दौड़ते हैं, और लौट आते हैं। कथा यहाँ सटीक है। वे दुखी होकर लौटते हैं, हारकर नहीं। जो चीज़ उन्हें तोड़ रही है, वह उसका बल नहीं, उसका न दिखना है। हथियार हाथ में है, बाँह में ज़ोर है, और सामने कोई नहीं।
फिर मेघनाद भागने की जगहें बन्द कर देता है। अटपटी घाटियाँ, रास्ते, पहाड़ की कन्दराएँ, सब बाणों से छा दी जाती हैं, और कथा उन्हें एक नाम में बाँध देती है: बाणों का पिंजरा। वानर ऐसे व्याकुल हो गये मानो पर्वत इन्द्र की क़ैद में पड़े हों।
फिर नाम आने लगते हैं, और हर नाम का आना एक दरवाज़ा बन्द होना है। हनुमान, अंगद, नल, नील, सारे बलवाले व्याकुल कर दिये गये। फिर लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण, तीनों बाणों से मारकर चलनी कर दिये गये। जब ऊपर से आती चीज़ का उत्तर नहीं है, तो बल का क्रम काम नहीं आता, और बड़ा नाम भी उसी क़तार में खड़ा हो जाता है जिसमें छोटा। तब वह राम से जूझने लगता है, और अब जो बाण वह छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं।
कथा कहती है कि राम नागपाश के वश में हो गये, और यह भी कि वे अपने ही वश में हैं, अनन्त हैं, एक हैं, अविकारी हैं। वश में होना और अपने वश में होना एक ही वाक्य में हैं। फिर कथा इस पर मुहर लगाती है: नट की तरह वे अनेकों प्रकार के दिखावटी चरित्र करते हैं, और सदा स्वतन्त्र, एक भगवान् हैं। नट मंच पर बँधता भी है, और मंच के पीछे किसी का बँधा हुआ नहीं होता। ऊपर का मायावी अपने को छिपाने के लिये रूप बदलता है। नीचे का नट दिखायी देने के लिये।
रण की शोभा के लिये राम ने अपने को नागपाश में बँधा लिया, और उससे देवताओं को बड़ा भय हुआ। कथा यह नहीं कहती कि वे बँध गये। वह कहती है कि उन्होंने अपने को बँधा लिया। और कारण है रण की शोभा।
देवताओं को यह समझाया नहीं गया। उन्हें भय हुआ। ऊपर बैठे वे लोग भी, जो जानते हैं कि राम कौन हैं, यह दृश्य देखकर डर जाते हैं। जानना और देखना टकराते हैं, तो देखना जीत जाता है।
जो बँधता नहीं
शिव कहते हैं, “पार्वती, जिनका नाम जपकर मुनि जन्म और मृत्यु की फाँसी काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्व के निवास कहीं बन्धन में आ सकते हैं?” यह प्रश्न कथा के भीतर से नहीं आता। कथा रोककर आता है। शिव का प्रश्न सुनने वाले के डर को सीधे छू लेता है। जो नाम दूसरों की फाँसी काट देता है, वह स्वयं फाँसी में कैसे आयेगा।
फिर शिव एक नियम देते हैं: “पार्वती, राम की इन सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क नहीं किया जा सकता।” ऐसा विचार करके जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त हैं, वे सब तर्क छोड़कर राम का भजन ही करते हैं। यह हार मान लेने की नहीं, औज़ार बदलने की सलाह है।
एक बूढ़े का हाथ
अब कथा फिर मैदान पर लौटती है। मेघनाद ने सेना को व्याकुल कर दिया, और फिर वह प्रकट हो गया। यह वाक्य इस पूरे प्रसंग का मोड़ है। जो अब तक इसीलिये अजेय था कि दिखता नहीं था, वह स्वयं दिखने के लिये उतर आता है। और जिस कारण से उतरता है वह और भी छोटा है: उसे गाली देनी है। वह प्रकट होकर दुर्वचन कहने लगता है।
भरी सेना में से उत्तर एक ऐसे मुँह से आता है जिससे किसी को उम्मीद नहीं थी। जाम्बवान् कहते हैं, “अरे दुष्ट, खड़ा रह।” तीन शब्द। न ललकार, न प्रतिज्ञा, न कोई बड़ी बात। जो अभी-अभी आकाश से पूरी सेना को बाँधकर आया है, उससे एक बूढ़ा इतना ही कहता है कि जहाँ है वहीं रुका रहे। इसे सुनकर मेघनाद का क्रोध बहुत बढ़ जाता है, और क्रोध का कारण वह स्वयं बता देता है।
मेघनाद कहता है, “अरे मूर्ख, मैंने बूढ़ा जानकर छोड़ दिया था, और अब अधम होकर मुझी को ललकारने लगा है।” इस वाक्य से पता चलता है कि उसने पहले जाम्बवान् को छोड़ा था, और छोड़ने का कारण दया नहीं, हिसाब था। बूढ़े को गिनती में नहीं रखा गया था। इस पूरे दिन में उसकी बड़ी चूक कोई हथियार नहीं, यही गिनती है।
फिर वह चमकता हुआ त्रिशूल चलाता है। जाम्बवान् उसे रोकते नहीं, काटते नहीं, हटते नहीं। वे उसी त्रिशूल को हाथ से पकड़ लेते हैं और उसे लेकर दौड़ पड़ते हैं। इस प्रसंग में यह पहली चीज़ है जो मेघनाद की भेजी हुई हो और किसी के हाथ में आयी हो। अब तक जो कुछ आया था, वह ऊपर से आता था और किसी की मुट्ठी में नहीं आता था।
वही त्रिशूल मेघनाद की छाती पर दे मारा जाता है, और देवताओं का वह शत्रु चक्कर खाकर धरती पर गिर पड़ता है। जाम्बवान् फिर क्रोध में भरकर उसका पैर पकड़ते हैं, उसे घुमाते हैं, और धरती पर पटककर अपना बल दिखा देते हैं। जो आकाश में अदृश्य था, वह अब ज़मीन पर है, एक बूढ़े की मुट्ठी में। माया आँख पर काम करती है, चमड़ी पर नहीं।
पक्षियों का राजा
पहली बात एक दीवार है: वरदान के प्रताप से वह मारे नहीं मरता। जाम्बवान् उसे पटक चुके हैं, फिर भी वह मरता नहीं। तब वे उसका पैर पकड़कर उसे लङ्का पर फेंक देते हैं। मैदान में नहीं, नगर पर। जिस घर से वह कल रात बड़ाई करके निकला था, उसी घर पर उसे लौटा दिया जाता है।
उसी क्षण कथा कहीं और चली जाती है: इधर देवर्षि ने गरुड़ को भेजा, और वे तुरंत राम के पास आ पहुँचे। पाठ केवल देवर्षि कहता है, और टीका उन्हें नारद बताती है। यह किसी की प्रार्थना का उत्तर नहीं है। नीचे किसी ने नहीं पुकारा। ऊपर किसी ने देख लिया, और भेज दिया।
पक्षिराज गरुड़ सब माया-सर्पों के समूहों को पकड़कर खा गये, तब सब वानरों के झुंड माया से रहित होकर हर्षित हुए। न कोई मन्त्र, न कोई उलटा जादू, न कोई अस्त्र। एक पक्षी आता है और साँपों को खा जाता है, क्योंकि साँप उसका भोजन हैं।
माया हारी नहीं, चली गयी। फिर कथा दिखाती है कि उसके हटते ही क्या होता है। पहाड़, पेड़, पत्थर और नख लिये वानर क्रोध में दौड़ पड़ते हैं। निशाचर पहले से कहीं ज़्यादा व्याकुल होकर भाग चलते हैं और भागकर किले पर चढ़ जाते हैं। वानरों में कोई नया बल नहीं आया। केवल निशाना लौट आया।
गुफा में एक यज्ञ
मेघनाद की मूर्च्छा टूटती है, और पिता को देखकर उसे बहुत शर्म लगती है। उसकी आगे की हर चाल इसी लाज से चलती है। जिसने रात को कहा था, “कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा,” वह सुबह उसी पिता के सामने बेसुध पड़ा मिला है। वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वत की गुफा में चला जाता है, यह मन में ठानकर कि अजेय होने का यज्ञ करेगा।
वह मैदान में नहीं लौटता, छिपने चला जाता है। रथ माया का था, पिंजरा माया का था, और अब यज्ञ भी हार को असम्भव बनाने के लिये है। जो लड़ाई जीती नहीं जा रही, उसे वह लड़ाई ही न रहने देना चाहता है।
उधर विभीषण सलाह लेकर आते हैं, और उनकी बात सीधी है: “हे नाथ, देवताओं को सतानेवाला वह दुष्ट मायावी मेघनाद एक अपवित्र यज्ञ कर रहा है। यदि वह यज्ञ सिद्ध हो गया तो फिर उसे जल्दी जीता नहीं जा सकेगा।” ख़तरा उसके बल का नहीं, समय का है, और गिनती घंटों में चल रही है।
यह सुनकर राम ने बहुत सुख माना। चिन्ता की ख़बर पर सुख इसलिये कि यह ख़बर एक काम बताती है। सुबह से यह सेना हवा पर वार कर रही थी। अब एक जगह का पता है।
आज्ञा, और एक प्रतिज्ञा
राम कहते हैं, “हे भाइयो, सब लोग लक्ष्मण के साथ जाइये और जाकर यज्ञ को विध्वंस कीजिये।” फिर एक वाक्य अलग से, एक ही आदमी के नाम: “लक्ष्मण, संग्राम में उसे आप मारियेगा।” और कारण न प्रतिशोध है, न नीति: “देवताओं को भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है।” पूरे आदेश की जड़ यही बात है। जो आज्ञा दी जा रही है, वह लङ्का जीतने के लिये नहीं, किसी और के डर को मिटाने के लिये है।
फिर राम लक्ष्मण से कहते हैं कि उसे ऐसे बल और बुद्धि के उपाय से मारें जिससे निशाचर का नाश हो। उपाय शब्द साफ़ है। यह सीधी टक्कर का नहीं, उस शत्रु के लिये आदेश है जो दिखता ही नहीं। अन्त में जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण को सेना समेत साथ रहने को कहा जाता है। इनमें एक ने उसे अभी-अभी पटका था, एक को उसने बाणों से बींधा था, और एक उसका अपना चाचा है, जिसने उसके यज्ञ का भेद खोला है।
आज्ञा मिलते ही लक्ष्मण की तैयारी बहुत कम शब्दों में गिनायी जाती है। कमर में तरकश कसा, धनुष सजाया, राम के प्रताप को हृदय में धारण किया, और मेघ के समान गम्भीर वाणी बोले। पहले दोनों काम हाथ के हैं। तीसरा नहीं है, और आज वही काम आयेगा।
लक्ष्मण कहते हैं, “यदि आज मैं उसे बिना मारे लौट आऊँ, तो राम का सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शिव भी उसकी सहायता करें, तो भी, राम की दुहाई, आज मैं उसे मार ही डालूँगा।” पहले आधे में दाँव पर जीवन नहीं, नाम है। दूसरे आधे में कठिनाई को जितना बड़ा किया जा सकता है उतना बड़ा करके भी वे वही कहते हैं।
इसके बाद राम के चरणों में सिर नवाकर लक्ष्मण तुरंत चल पड़ते हैं। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान जैसे उत्तम योद्धा हैं। जिस माया ने साँप भेजकर बाँधा था, उसे मारने अब वे जा रहे हैं जिन्हें यही कथा थोड़ी देर बाद सर्पों का स्वामी कहेगी।
यज्ञ टूटता है
वानरों ने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ है और रुधिर तथा भैंसे की आहुति दे रहा है। जिस यज्ञ को विभीषण ने अपवित्र कहा था, उसका अपवित्र होना यहाँ दिखा दिया जाता है। वानरों ने सारा यज्ञ विध्वंस कर दिया, और फिर भी वह नहीं उठता।
तब वानर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं। फिर भी वह नहीं उठता। तब वे जाकर उसके बाल पकड़ते हैं और लातों से मार-मारकर भाग चलते हैं। जिसने आज सुबह आकाश से पूरी सेना को बाँध दिया था, उसके बाल पकड़े जा रहे हैं और वह हिलता नहीं।
फिर वह उठता है, पर यज्ञ के लिये नहीं। वह त्रिशूल लेकर दौड़ता है। वानर भागते हैं और वहीं आते हैं जहाँ आगे लक्ष्मण खड़े हैं। जिसे सुबह से कोई ढूँढ़ नहीं पाया था, उसे अब चलकर वहाँ आना पड़ा है जहाँ उसका सामना करने वाला खड़ा है। यही वह उपाय है जिसकी बात राम ने बल के साथ जोड़कर की थी।
आगे जो होता है, वह तेज़ है और बुरा है। वह अत्यन्त क्रोध में आता है और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजता है। हनुमान और अंगद क्रोध करके दौड़ते हैं, और वह दोनों की छाती में त्रिशूल मारकर उन्हें धरती पर गिरा देता है। फिर वही प्रचण्ड त्रिशूल वह लक्ष्मण पर छोड़ता है, और लक्ष्मण एक बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर देते हैं। हनुमान और युवराज अंगद उठकर फिर क्रोध से उसे मारते हैं, और उसे चोट नहीं लगती। वीर लौट आते हैं, क्योंकि शत्रु मारे नहीं मरता। तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ता है, और उसे क्रुद्ध काल की तरह आता देखकर लक्ष्मण भयानक बाण छोड़ते हैं।
कभी दिखता है, कभी नहीं
वज्र के समान बाणों को आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो जाता है, और फिर भाँति-भाँति के रूप धारण करके लड़ता है, कभी प्रकट होकर, कभी छिपकर। पहले दौर में वह ऊपर था और दिखता नहीं था। इस दौर में वह सामने है और ठहरता नहीं। हर बार जब बाण उस जगह पहुँचता है, वहाँ कोई नहीं होता।
शत्रु को हारता न देखकर वानर डरने लगते हैं। यह डर चोट से नहीं, इस बात से आया कि कुछ ख़त्म ही नहीं हो रहा। माया किसी को मारती नहीं, थका देती है।
तब लक्ष्मण को बहुत क्रोध आया। कथा उन्हें यहाँ सर्पों का स्वामी कहती है। और लक्ष्मण ने मन में यह बात पक्की कर ली, “इस पापी को मैं बहुत खिला चुका।” यह वाक्य इस प्रसंग का ताला खोल देता है, और वह एक शब्द पर खुलता है: खिलाना। जो अब तक हो रहा था, उसे लक्ष्मण लड़ाई नहीं, खेल कहते हैं, और उस खेल में खिलाने वाले वे थे। माया अपराजित नहीं थी। उसे चलने दिया जा रहा था। और जिस क्षण चलने देना बन्द होता है, माया के पास कुछ नहीं बचता।
राम के प्रताप का स्मरण करके लक्ष्मण ने दर्प के साथ बाण का सन्धान किया। बाण छूटा और छाती के बीच में लगा। यहाँ भी कोई उलटी माया नहीं चलती, कोई मन्त्र नहीं पढ़ा जाता। एक आदमी किसी और का प्रताप याद करता है और तीर छोड़ देता है।
फिर वह बात आती है जो इस प्रसंग की कुंजी है: मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया। जिसकी पूरी पहचान छिपना थी, वह अन्तिम क्षण में खुल जाता है। माया किसी के हाथों तोड़ी नहीं गयी। वह उसके भीतर से गिर गयी, और तब जो बचा वह बहुत छोटा और बहुत साफ़ था।
दो नाम
उसके आख़िरी शब्द प्रश्न हैं: “राम का छोटा भाई कहाँ है, राम कहाँ हैं?” ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। यह प्रश्न बैर का नहीं लगता। वह किसी को ललकार नहीं रहा, पूछ रहा है कि वे कहाँ हैं, और पाठ उत्तर नहीं देता।
अंगद और हनुमान कहते हैं कि धन्य है, धन्य है उसकी माता। टीका इस पर जो जोड़ती है, वह वाक्य को पूरा कर देती है: वह लक्ष्मण के हाथों मरा, और मरते समय राम तथा लक्ष्मण के नामों का उच्चारण करके गया। जिन दो वानरों को उसने आज ही छाती में त्रिशूल मारकर गिराया था, वही दोनों उसके मरने पर उसकी माता को धन्य कहते हैं। यह उदारता किसी बड़े के मुँह से नहीं आती। उन्हीं दो के मुँह से आती है।
इसके बाद का ब्योरा और भी शान्त है। हनुमान उसे बिना किसी परिश्रम के उठा लेते हैं, लङ्का के दरवाज़े पर रख आते हैं, और लौट आते हैं। जिस शरीर को छूने में पूरी सेना हार गयी थी, वह अब हलका है। और उसे वहीं लौटाया जाता है जहाँ से वह आया था, घर के दरवाज़े पर। न कोई तमाशा, न कोई सन्देश।
उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व विमानों पर चढ़कर आकाश में आते हैं, फूल बरसाते हैं, नगाड़े बजाते हैं और राम का निर्मल यश गाते हैं। वे राम की जय बोलते हैं और कहते हैं कि आपने सब देवताओं का उद्धार किया। जिनका भय मिटाने के लिये यह सारा काम हुआ था, वे ही आकर उसकी रसीद दे रहे हैं। राम ने जो कारण बताया था, वह पूरा हो गया।
ख़बर, और एक उपदेश
देवता और सिद्ध स्तुति करके चले जाते हैं, और लक्ष्मण राम के पास लौट आते हैं। प्रतिज्ञा पूरी हुई, और पाठ उस पर एक शब्द भी ख़र्च नहीं करता। न कोई घोषणा, न कोई गिनती। फिर कथा दूसरी ओर पलट जाती है: रावण ने ज्यों ही पुत्र-वध का समाचार सुना, त्यों ही वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। एक ही साँस में एक घर लौट रहा है और दूसरा गिर रहा है।
मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकार से पुकार-पुकारकर बड़ा भारी विलाप करती हैं। इस काण्ड में उनका यह पहला दुःख नहीं है, पर पहले वे समझा रही थीं। अब समझाने को कुछ बचा नहीं। और पाठ एक और बात दर्ज करता है जो अब तक नहीं कही गयी थी: नगर के सब लोग शोक से व्याकुल हो गये। और सभी रावण को नीच कहने लगे। भाई के मरने पर नगर चुप था, सेना के कटने पर चुप था। इस मौत पर वह चुप नहीं रहता, और जो कहता है वह शत्रु के बारे में नहीं, अपने राजा के बारे में है।
अन्त में वही बोलता है जो अभी-अभी बेहोश होकर गिरा था।
तब रावण ने सब स्त्रियों को अनेकों प्रकार से समझाया कि जगत् का यह सारा रूप नाशवान् है, हृदय में विचार करके देख लीजिये। बात अपने आप में सच है, पर उस मुँह से निकल रही है जिसने उस पर अमल नहीं किया, और जो अभी बेटे की ख़बर सुनकर धरती पर गिरा था। कथा इस पर कोई टिप्पणी नहीं करती, और यह भी नहीं बताता कि स्त्रियाँ चुप हुईं या नहीं।
छोड़ा हुआ कपट
इस प्रसंग में माया तीन बार हारती है, और तीनों बार किसी जादू से नहीं। पहली बार जाम्बवान् के हाथ से, जिनके पास उसका भेजा हुआ त्रिशूल भर है। दूसरी बार गरुड़ से, जो साँपों को खा जाते हैं क्योंकि साँप उनका भोजन हैं। तीसरी बार लक्ष्मण से, जो बस यह तय कर लेते हैं कि खिलाना बहुत हो चुका। तीनों के पास वही था जो उनके पास पहले से था।
इसीलिये यह प्रसंग उस डींग से शुरू होकर उन दो प्रश्नों पर ख़त्म होता है। रात को मेघनाद ने कहा था कि इष्टदेव से पाया हुआ बल उसने अब तक दिखाया नहीं। सुबह उसने वह सब दिखा दिया, आकाश से लेकर गुफा तक। जिस चीज़ पर आख़िर तक पर्दा पड़ा रहा, वह यह थी कि वह उन दोनों को जानता है, और अन्त में केवल यही बचा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया।
अगला प्रसंग उसी घर में खुलता है जहाँ यह बन्द हुआ, और जो आदमी अभी स्त्रियों को जगत् की नश्वरता समझा रहा है, वह ख़ुद उठकर चलेगा। लङ्का में आज दो बातें एक साथ हुई हैं: एक बेटा मारा गया, और नगर ने पहली बार अपने राजा को नीच कहा। इनमें से दूसरी बात लङ्का के लिये ज़्यादा भारी है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 72 से 77, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।