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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 13
माया, द्वन्द्व और विभीषण
इन्द्र का रथ उतरता है, रावण माया फैलाता है। सारा मैदान दो आदमियों के बीच सिमट आता है। वहाँ सिर कटते हैं और फिर उग आते हैं।
देवता ऊपर से नीचे देख रहे हैं, और जो उन्हें दिखता है वह उनसे सहा नहीं जाता: राम पैदल लड़ रहे हैं। सामने वाले के पास रथ है, घोड़े हैं, ध्वजा है, और इधर कोई सवारी नहीं। प्रसंग लड़ाई की नहीं, देखने की एक बात से खुलता है। किसी ने कुछ माँगा नहीं। इन्द्र अपना रथ भेज देते हैं, मातलि उसे हर्ष के साथ ले आते हैं, और उसके बाद लड़ाई की चाल बदल जाती है।
इस प्रसंग में मैदान ख़ाली हो जाता है। राम सारी सेना की ओर देखकर कहते हैं कि आप सब बहुत थक चुके हैं, अब द्वन्द्वयुद्ध देखिये। जो सेना अभी तक लड़ रही थी, वह दर्शक बन जाती है। उसके बाद जो होता है, उसकी अजीब बात यह है कि वह ख़त्म ही नहीं होता। सिर कटते हैं और उसी क्षण नये हो जाते हैं। और ठीक बीच में, जब शोर सबसे ऊँचा है, कथा लड़ाई रोककर थोड़े में बता देती है कि यह किस चीज़ का चित्र है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। यहाँ जो कुछ है वह मानस में ही है: इन्द्र का रथ और मातलि, पाटल-आम-कटहल वाली वह नीति जो राम बीच युद्ध में रावण को सुनाते हैं। विभीषण पर चली हुई शक्ति का राम के ऊपर ले लिया जाना, आकाश में सिरों की माला लिये चलती कालिकाएँ। और शिव का पार्वती से कहा हुआ वह एक वाक्य जिसमें एक पूरे घर का हिसाब आ जाता है।
दो योद्धा और देखती हुई सेना
- राम जो इस द्वन्द्व में तीन बार हँसते हैं, दो बार गिरी हुई चीज़ उठाते हैं। एक बार वे दूसरे के लिये चलाया हुआ अस्त्र अपने ऊपर ले लेते हैं।
- रावण जो अपना परिचय ख़ुद देता है, अपनी हारें गिनाकर डराता है, और जिसके सिर कटते ही फिर उग आते हैं।
- मातलि इन्द्र का सारथी, जो हर्ष के साथ रथ लेकर आता है और थोड़ी ही देर में सौ बाण खाकर धरती पर पड़ा जय राम पुकार रहा होता है।
- विभीषण जिन पर काल के दण्ड जैसी शक्ति चलती है, जो राम को चोट लगी देखकर गदा उठा लेते हैं। उनके बारे में शिव एक प्रश्न पूछकर चुप हो जाते हैं।
- हनुमान जो विभीषण को थका देखकर पर्वत लिये दौड़ते हैं, और जिनका आधा युद्ध ज़मीन पर नहीं, आकाश में लड़ा जाता है।
- मन्दोदरी जो यहाँ केवल एक बार आती हैं, एक ही वाक्य में, और मैदान पर नहीं, कहीं दूर, जहाँ धनुष की आवाज़ सुनकर उनका हृदय काँप जाता है।
- शिव और पार्वती जिनकी बातचीत के भीतर यह पूरी कथा कही जा रही है। कठिन जगह पर आकर शिव एक वाक्य रख देते हैं।
देवताओं ने ऊपर से क्या देखा
कथा एक नज़र से खुलती है, प्रहार से नहीं। देवताओं ने राम को पैदल देखा। पोद्दार इसे खोलते हैं: बिना सवारी के युद्ध करते हुए। और उसके तुरन्त बाद जो लिखा है वह डर नहीं, क्षोभ है: उनके हृदय में बहुत भारी क्षोभ उठा। यह तकलीफ़ किसी को हारते देखकर नहीं होती। किसी को ऐसी जगह खड़ा देखकर होती है जो उसे शोभा नहीं देती।
फिर इस प्रसंग का पहला काम होता है, और वह किसी के माँगने पर नहीं होता। इन्द्र अपना रथ तुरन्त भेज देते हैं, वही जिस पर वे स्वयं चलते हैं, और उसे लाने वाला भी कोई साधारण आदमी नहीं।
मातलि उसे हर्ष के साथ ले आये। मातलि इन्द्र के सारथी हैं। देवताओं और असुरों के युद्धों में वे जिस रथ को हाँकते रहे हैं, वही रथ आज उन्हें यहाँ लाना है, और वे उसे खिंचे हुए मन से नहीं लाते।
रथ का वर्णन छोटा-सा है: वह तेज का पुञ्ज है, दिव्य है, अनुपम है। राम हर्षित होकर उस पर चढ़ते हैं। चार घोड़े जुते हैं: चंचल, मनोहर, अजर, अमर, और मन के समान गति करने वाले। राम रथ माँगते नहीं, चढ़ने से पहले कुछ कहते नहीं, मना भी नहीं करते। जो मिला, वह ले लिया गया, और उस पर कोई भाषण नहीं हुआ।
असर उसी क्षण दिखता है। राम को रथ पर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। किसी ने उन्हें बल दिया नहीं, कुछ कहा नहीं। देखने भर से बल आ गया। और उधर उलटा हो रहा है: वानरों की मार सही नहीं जाती, तब रावण माया फैलाता है। माया पहले नहीं आती। वह तब आती है जब असली चीज़ काम देना छोड़ देती है।
बहुत-से राम
माया की बनावट में रावण की सारी समझ खुल जाती है। पहले कथा बताती है कि वह किस पर नहीं चली: वह माया अकेले राम से बच गयी, उन्हें छू नहीं सकी। बाक़ी सब पर चल गयी। सब वानरों ने और लक्ष्मण ने भी उसे सच मान लिया।
और उन्होंने देखा क्या? राक्षसी सेना के भीतर लक्ष्मण सहित बहुत-से राम। माया ने कोई भयानक चीज़ नहीं दिखायी। उनका अपना स्वामी दिखाया, बहुत-से, शत्रु की क़तार में खड़े। जिसके भरोसे सेना लड़ रही थी, वही उसे चारों ओर दिखने लगा, और उसी से वह जड़ हो गयी।
बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर और भालू मन में बहुत ही डर गये, और कथा उस डर का नाम देती है: झूठा डर, जिसके नीचे कोई कारण नहीं। लक्ष्मण सहित वे सब मानो चित्र में लिखे हुए हों, जहाँ के तहाँ खड़े देखते रह गये। सेना टूटी नहीं, रुक गयी। भागना भी एक काम है, और वह भी नहीं हुआ।
समाधान इतना छोटा है कि पढ़ते हुए निकल जाता है। अपनी सेना को चकित देखकर राम ने हँसकर धनुष पर बाण चढ़ाया और पल भर में सारी माया हर ली। वे हँसते हैं। कुछ समझाते नहीं, पुकारकर यह नहीं कहते, “असली मैं यह रहा।” जो चीज़ आँखों के भीतर घुसी हुई थी, उसे बाहर का एक बाण हटा देता है। उसी वाक्य में कथा उन्हें हरि कहती है और क्रिया हरी है, जिसे पोद्दार दुःखों के हरने वाले से खोलते हैं। नाम और काम आमने-सामने हैं।
अब देखिये
माया हट जाने के बाद सारी वानर सेना हर्षित है, और राम सबकी ओर दृष्टि डालकर गम्भीर वचन बोलते हैं।
राम कहते हैं, “आप सब वीर बहुत थक गये हैं। अब द्वन्द्वयुद्ध देखिये।” वे यह नहीं कहते कि यह लड़ाई सेना के बस की नहीं, या यश उन्हें चाहिये। जिस सेना ने लड़कर यह मैदान यहाँ तक पहुँचाया है, उसे हटाया नहीं, विश्राम दिया जा रहा है। हटने का कारण उसकी थकान में रखा गया है, उसकी योग्यता में नहीं।
लड़ने के बदले जो दिया जा रहा है, वह है देखना। इसके बाद हर बाण, हर कटा हुआ सिर, हर गिरा हुआ रथ उन आँखों के सामने से गुज़रता है जो कुछ देर पहले तक ख़ुद हथियार उठाये हुए थीं।
दो परिचय
ऐसा कहकर राम ने ब्राह्मणों के चरणों में सिर नवाया और फिर रथ चलाया। आकाश से उतरे रथ का पहला उपयोग एक प्रणाम है। उधर का ब्योरा उलटा है: रावण के हृदय में क्रोध छा गया, और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा।
रावण का पहला वाक्य एक परिचय है। परिचय वही देता है जिसे लगता है कि उसे पहचाना नहीं गया। और वह सामने खड़े राम को तपस्वी कहकर पुकारता है।
रावण कहता है, “अरे तपस्वी, सुनिये, युद्ध में जिन योद्धाओं को जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत जानता है, लोकपाल तक मेरे कैदख़ाने में पड़े हैं।” यहाँ तक यह एक राजा की भाषा है। इसके बाद जो सूची आती है, वह किसी और की होती तो शोक-गीत होती: खर, दूषण और विराध मारे गये। बेचारे बालि का वध व्याध की तरह किया गया। राक्षस योद्धाओं के समूह संहार दिये गये। कुम्भकर्ण और मेघनाद भी मार दिये गये।
वह शत्रु को डराने के लिये अपनी ही हारें गिना रहा है, और उसे इसका पता नहीं। उस सूची में एक शब्द ऐसा है जिसे वह सँभाल नहीं पाया: बेचारा बालि। उसमें उसके भीतर की वह बात खुल जाती है जो बाहर नहीं आने वाली थी। फिर धमकी आती है: आज सारा वैर निबाह लेगा, यदि वे रण से भाग न गये। और उत्तर में जो मिलता है, वह धमकी नहीं है।
दुर्वचन सुनकर और उसे काल के वश में पड़ा हुआ जानकर राम हँसकर कहते हैं, “सत्य है, सत्य है, आपकी सारी प्रभुता सच है। अब व्यर्थ बकवाद न कीजिये, पुरुषार्थ दिखाइये।” जो दावा किया गया था, वह पूरा मान लिया जाता है, और जो चीज़ दावे में नहीं थी, वही माँगी जाती है। टीका का क्रम है: पहले जानना कि सामने वाला काल के वश में है, फिर हँसना। यह उपहास नहीं है।
पाटल, आम और कटहल
अब राम वह करते हैं जिसका युद्धभूमि में कोई काम नहीं। वे क्षमा माँगते हैं और नीति सुनाते हैं। सामने वाला धनुष ताने हुए है, सेना दोनों ओर खड़ी देख रही है, और बीच में बाग़ीचे की बात आती है।
राम कहते हैं, “व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यश का नाश न कीजिये। क्षमा कीजियेगा, एक नीति सुनाता हूँ, सुनिये। संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं, गुलाब, आम और कटहल के समान।” एक केवल फूल देता है, एक फूल भी देता है और फल भी, और एक में केवल फल ही लगते हैं। इसी तरह एक कहते हैं और करते नहीं, दूसरे कहते भी हैं और करते भी हैं, और तीसरे करते हैं पर वाणी से कुछ कहते नहीं।
इस नीति की बारीक बात उसकी जगह है। जिसे यह सुनाई जा रही है, वह अभी-अभी देर तक अपने बारे में बोलकर हटा है, और नीति उसे पहली क़िस्म का कहती नहीं। वह हिसाब उसी पर छोड़ देती है। राम इस बँटवारे में अपने को कहीं नहीं रखते। तीसरी क़िस्म की परिभाषा ही यह है कि वह अपने बारे में नहीं बोलती।
यह सुनकर जो होता है, वह यहाँ रावण का आख़िरी वाक्य है।
राम के वचन सुनकर वह ख़ूब हँसा और बोला, “मुझे ज्ञान सिखाते हैं? उस समय वैर करते हुए तो डरे नहीं, अब प्राण प्यारे लगने लगे हैं।” उसने उपदेश सुना, उसका अर्थ देर लगाया, और देर का अर्थ डर। जो बात को हथियार ही समझता है, उसे बात की कोई और वजह सूझ नहीं सकती। इसके आगे वह एक शब्द नहीं बोलता। वह केवल लड़ता है, गिरता है, उठता है, और फिर लड़ता है।
पहला दौर, और एक गिरा हुआ सारथी
लड़ाई शुरू होती है, और उसका पहला चित्र भरा हुआ है। दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर वज्र के समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकार के बाण दौड़े, और दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी, सब जगह छा गये। उत्तर में एक बाण चलता है: राम ने अग्निबाण छोड़ा, और क्षण भर में सब बाण जल गये।
फिर वह खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ता है, और राम उसे बाण के साथ वापस भेज देते हैं। यह शक्ति आगे दोबारा चलेगी, और तब उसका निशाना कोई और होगा।
फिर करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलते हैं, और राम उन्हें बिना किसी परिश्रम के काटकर हटा देते हैं। रावण के बाण वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्य के सारे मनोरथ। वे इसलिये नहीं रुक रहे कि कोई उन्हें रोक रहा है, बल्कि उस चीज़ से निकल रहे हैं जिससे निकलकर कुछ पूरा होता ही नहीं।
और तब इस पूरे दौर का एक ही प्रहार लगता है, और वह राम पर नहीं लगता।
उसने सारथी को सौ बाण मारे। वह “जय राम” पुकारकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। राम ने कृपा करके सारथी को उठाया, और तब परम क्रोध को प्राप्त हुए। जो थोड़ी देर पहले हर्ष के साथ रथ लेकर आया था, वह गिरते हुए भी जय राम कहता है। राम पहले उसे उठाते हैं, फिर क्रोध करते हैं। क्रोध रथ पर, अपने ऊपर लगे बाण पर या अपमान पर नहीं, एक आदमी पर आया, जो केवल पहुँचाने आया था।
धनुष की टंकार
यहाँ परम क्रोध भाषण नहीं होता। पहला चिह्न तरकश में मिलता है: बाण भीतर ही भीतर बाहर निकलने को छटपटाने लगे। हथियार से पहले हथियार की बेचैनी लिखी जाती है। फिर धनुष की टंकार उठती है, अत्यन्त प्रचण्ड, और उसे सुनते ही सारे राक्षस वातग्रस्त हो जाते हैं। फिर बात फैलकर बाक़ी संसार तक पहुँच जाती है।
मन्दोदरी का हृदय काँप उठा। कच्छप काँपा, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओं के हाथी पृथ्वी को दाँतों से पकड़कर चिग्घाड़ने लगे। और यह कौतुक देखकर देवता हँसे। डरने वालों की सूची किसी योद्धा के नाम से शुरू नहीं होती। एक स्त्री से होती है, जो युद्ध में नहीं हैं। और जो दो जीव काँप रहे हैं, कच्छप और दिग्गज, उन्हीं के ज़िम्मे संसार को थामे रखना है।
तीसरी बात है कौतुक, यानी तमाशा। जिस आवाज़ पर एक स्त्री का हृदय काँप रहा है, उसी पर देवता हँस रहे हैं। आवाज़ एक है। अन्तर यह है कि कौन कहाँ खड़ा है।
धनुष को कान तक तानकर उन्होंने भयानक बाण छोड़े, और बाणों का समूह ऐसे चला मानो सर्प लहराते हुए जा रहे हों। यह उपमा आगे की लड़ाई पर छायी रहेगी। अगले ही पल बाण फिर सर्प हो जाते हैं, इस बार पंखवाले।
कटते हैं, और उग आते हैं
बाण पंखवाले सर्पों की तरह उड़े। उन्होंने पहले सारथी और घोड़ों को मारा, फिर रथ को चूर-चूर करके ध्वजा और पताका गिरा दी। वह बहुत ज़ोर से गरजा, पर भीतर उसका बल थक चुका था। गर्जना बाहर की चीज़ है। जो थका है, वह भीतर है।
वह तुरन्त दूसरे रथ पर चढ़ता है, खिसियाता है, और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र छोड़ता है। और कथा फिर वही कहती है: उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे परद्रोह में लगे हुए चित्त वाले मनुष्य के। थोड़ी ही दूरी पर दो बार वही बात। हार का कारण कौशल में नहीं, स्वभाव में ढूँढ़ा जा रहा है।
फिर रावण दस त्रिशूल चलाकर चारों घोड़े मारकर गिरा देता है। और राम का पहला काम धनुष उठाना नहीं: पहले घोड़ों को उठाकर, तब क्रोध करके धनुष खींचा। पहले मातलि उठाये गये, फिर क्रोध। अब घोड़े उठाये गये, फिर क्रोध। जो गिर गया, उसे पहले खड़ा किया जाता है, और लड़ाई उसके बाद चलती है।
अब सिरों का हिसाब शुरू होता है, एक उपमा से: रावण के सिर कमलों का वन हैं, और राम के बाण उस वन में विचरने वाले भौंरों की पंक्ति। दसों सिरों में दस-दस बाण मारे गये, जो आर-पार निकल गये, और सिरों से रक्त के पनाले बह चले। रक्त बहाता हुआ ही वह बलवान दौड़ा। राम ने फिर तीस बाण मारकर बीसों भुजाओं समेत दसों सिर धरती पर गिरा दिये। यह अन्त होना चाहिये था। यहीं से लड़ाई बदल जाती है।
काटते ही वे फिर नये हो गये। राम ने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे, और कटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये। कोई वार रोका नहीं जा रहा, कोई निशाना चूक नहीं रहा। हर बाण अपना काम करता है, और स्थिति ज्यों की त्यों रहती है। कथा राम के लिये जो शब्द रखती है, वह भी लड़ाई का नहीं: बहुत खिलाड़ी।
आकाश भर जाता है। कटे हुए सिर और बाहु ऊपर ऐसे छाये हैं मानो असंख्य केतु और राहु हों। फिर वे सिर रक्त बहाते हुए आकाशमार्ग में दौड़ते हैं। राम के बाण उन्हें बार-बार लगते रहते हैं, इसलिये वे नीचे गिरने भी नहीं पाते। एक-एक बाण से समूह के समूह सिर बिंधकर उड़ते हैं, मानो सूर्य की किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओं को पिरो रही हों। और ठीक इसी ऊँचाई पर कथा लड़ाई रोक देती है।
जैसे-जैसे राम उसके सिर हरते हैं, वैसे-वैसे वे अपार होते जाते हैं, जैसे विषयों का सेवन करने से काम नित नया-नया बढ़ता जाता है। पोद्दार इसे भोगने की इच्छा बताते हैं। जो सिर फिर उग आता है, वह किसी राक्षस का जादू नहीं। वह वही चीज़ है जिसे आदमी अपने भीतर काटता है और अगली सुबह पहले से बड़ा पाता है। कथा युद्ध को मैदान से उठाकर आदमी की अपनी छाती में रख देती है, ठीक उस जगह जहाँ शोर सबसे ऊँचा था।
आकाश में दौड़ते हुए सिर
सिरों की उस बाढ़ से रावण एक ही निष्कर्ष निकालता है, और वह ग़लत है: उसे अपना मरना भूल गया, और क्रोध गहरा हो गया। जो चीज़ उसकी असमर्थता का सबूत थी, उसे वह अपनी आपूर्ति समझ लेता है। महान अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुष तानकर दौड़ा।
और इस बार वह कुछ कर भी लेता है। रणभूमि में क्रोध करके उसने बाण बरसाकर राम का रथ ढक दिया, और एक दण्ड भर रथ दिखायी ही नहीं पड़ा, मानो कुहरे में सूर्य छिप गया हो। यही क्षण है जब दूसरी ओर वाला ओझल हो जाता है, और वे देवता, जो थोड़ी देर पहले कौतुक देखकर हँस रहे थे, हाहाकार करते हैं। हँसी और हाहाकार के बीच का फ़र्क़ इतना ही है कि इस बार दिखना बन्द हो गया।
तब राम क्रोध करके धनुष उठाते हैं, बाणों को हटाकर शत्रु के सिर काटते हैं, और उनसे दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी, सब पाट देते हैं। अब कटे हुए सिर आकाशमार्ग से दौड़ते हैं, जय-जय की ध्वनि करके भय उपजाते हैं, और पूछते हैं, “लक्ष्मण कहाँ हैं, सुग्रीव कहाँ हैं, राम कहाँ हैं?” कटकर भी वे खोज ही रहे हैं, और जिन्हें खोज रहे हैं, उनके नाम अब भी याद हैं।
“राम कहाँ हैं,” यह कहते हुए सिरों के समूह दौड़े, और उन्हें देखकर वानर भाग चले। जो सेना पहले ही बिठा दी गयी थी और तब से देख रही थी, उसके ऊपर से अब कटे हुए सिर उड़ते हुए यही पूछते जा रहे हैं। तब राम धनुष सन्धान करते हैं, हँसते हैं, और उन सिरों को बाणों से भली भाँति बेध डालते हैं। यह उनकी तीसरी हँसी है, और तीनों बार वे तब हँसे हैं जब कोई और डरा हुआ था।
फिर कथा युद्ध के बाद की जगह में चली जाती है। हाथों में मुण्डों की मालाएँ लिये बहुत-सी कालिकाएँ झुंड के झुंड इकट्ठी हुईं। उन्होंने रक्त की नदी में स्नान किया, और चलीं, मानो संग्राम रूपी वटवृक्ष की पूजा करने जा रही हों।
विभीषण
यहीं कथा मुड़ जाती है। रावण फिर क्रोधित होकर एक प्रचण्ड शक्ति छोड़ता है, वही हथियार जो एक बार चलकर बाण के साथ वापस लौट आया था। इस बार वह उसे राम की ओर नहीं फेंकता।
वह विभीषण के सामने ऐसी चली मानो काल का दण्ड हो। निशाना बदलना अपने आप में एक पूरा वाक्य है। राम के सामने असफल होकर वह लक्ष्य बदल देता है। जिसे चुनता है, वह उस मैदान का अकेला आदमी है जो उसके अपने घर से निकलकर वहाँ खड़ा है।
इस प्रसंग में विभीषण को रावण का भाई कहीं नहीं कहा गया। वह सम्बन्ध इसी काण्ड के पिछले प्रसंगों से आता है। यहाँ केवल दो नाम आमने-सामने खड़े हैं, और आगे शिव का एक वाक्य वह सब कह देता है जो अभी तक नहीं कहा गया।
अत्यन्त भयानक शक्ति को आती देखकर राम ने विचारा, “शरणागत का दुःख हरना मेरा प्रण है।” तुरन्त उन्होंने विभीषण को पीछे कर लिया और सम्मुख होकर वह शक्ति स्वयं सह ली। एक अस्त्र के मैदान पार करने भर के समय में कारण भी दे दिया गया है, और वह चौंकाने वाला है। यह नहीं कहा गया कि विभीषण मित्र हैं, या काम के आदमी हैं, या अपने हैं। कहा गया है: शरणागत का दुःख हरना मेरा प्रण है। बचाने का कारण बचाये जाने वाले में नहीं, बचाने वाले के वचन में है।
फिर वह बात आती है जिस पर पूरा दृश्य टिका है: शक्ति लगी और कुछ मूर्च्छा हुई। उस मूर्च्छा को बड़ा नहीं होने दिया जाता। कथा कह देती है कि राम ने तो यह खेल किया, व्याकुलता देवताओं को हुई।
पर विभीषण को इतना ही दिखता है कि राम को श्रम हुआ, चोट पहुँची, और वे क्रुद्ध होकर हाथ में गदा लेकर दौड़ पड़ते हैं। जिसे बचाया जा रहा था, वही हथियार उठा लेता है, इसलिये कि बचाने वाले को चोट लग गयी। इसमें कोई हिसाब नहीं। यह वह चीज़ है जो हिसाब से पहले हो जाती है।
फिर विभीषण बोलते हैं, और वह बोलना गाली है: “अरे अभागे, मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि! देवता, मनुष्य, मुनि और नाग, सबसे विरोध किया। आदर के साथ शिव को सिर चढ़ाये, इसीलिये एक-एक के बदले करोड़ों पाये, और उसी कारण अब तक बचे रहे। पर अब काल सिर पर नाच रहा है। और राम से विमुख होकर सम्पदा की चाह!” ऐसा कहकर उन्होंने छाती के ठीक बीच गदा मारी।
इस गाली में प्रशंसा भी है। शिव को आदर के साथ सिर चढ़ाये, यह आदर का तथ्य है। विभीषण कह रहे हैं कि रावण ने जो पाया, वह कमाकर पाया, और अब उसे उसी के विरुद्ध ख़र्च कर रहा है जिससे वह मिला था। यह वाक्य उस घर के भीतर की जानकारी से ही बन सकता था।
बीच छाती में कठोर गदा की घोर चोट लगते ही रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा, दसों मुखों से रुधिर बहने लगा। वह अपने को सँभालकर क्रोध में भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान भिड़ गये, और यह भिड़न्त मल्लयुद्ध है, हाथ की लड़ाई। हथियार नीचे रह गये। आगे की बात कठिन है। राम के बल से दर्पित विभीषण उसे पासंग के बराबर भी नहीं गिनते। पासंग वह छोटा-सा बटखरा है जो तराज़ू के हल्के पलड़े में बराबरी के लिये रख दिया जाता है। जिसके कैदख़ाने में लोकपाल पड़े हैं, वह इस क्षण उतना भी नहीं तौलता।
उस दर्प को छिपाया नहीं गया। कथा यह नहीं कहती कि विभीषण निर्भय हैं। वह कहती है कि वे राम के बल से दर्पित हैं, यानी वह गर्व उधार का है, और उसी साँस में उसका मालिक भी बता देती है। पर बताने के बाद वह उसे छीनती नहीं।
शिव कहते हैं, “पार्वती, विभीषण क्या कभी रावण के सामने आँख उठाकर भी देख सकते थे? अब वही काल की तरह उससे भिड़ रहे हैं। यह राम का ही प्रभाव है।” शिव यह नहीं कह रहे कि विभीषण वीर हैं। वे पार्वती को एक घर की बात बता रहे हैं। वह पूरा घर इस एक प्रश्न में है: लड़ना तो दूर, उत्तर देना तो दूर, कभी एक बार सामने आँख उठाकर देख भी सके थे क्या।
यह दृश्य कहीं टिककर आराम से नहीं बैठता। जो आँख नहीं उठा सकता था, उसके हाथ उसी की छाती पर हैं, और इसका एक ही कारण बताया जाता है: बल किसी और का है। शिव बात को प्रश्न की शक्ल में रखते हैं और वहीं छोड़ देते हैं।
हनुमान, और फिर वही चाल
उधार का बल सच्चा है, पर अनन्त नहीं, और विभीषण को जीत नहीं मिलती। अगले ही पल वे बहुत थके हुए दिखते हैं। यह देखकर हनुमान पर्वत लिये दौड़े, उस पर्वत से रथ, घोड़े और सारथी, तीनों का संहार कर डाला। फिर उन्होंने रावण के हृदय के बीचो-बीच लात मारी, ठीक वहीं जहाँ थोड़ी देर पहले गदा लगी थी।
रावण खड़ा रह गया, पर उसका शरीर अत्यन्त काँप रहा था। और उसी क्षण विभीषण लड़ाई से हट जाते हैं: वे वहाँ गये जहाँ अपने जनों के रक्षक राम थे। अपनी शुरू की हुई लड़ाई वे पूरी नहीं करते। वे लौटकर ठीक उसी जगह खड़े हो जाते हैं जहाँ तब थे जब उन पर शक्ति चली थी।
इसके बाद रावण ललकारकर हनुमान को मारता है। हनुमान पूँछ फैलाकर आकाश में चले जाते हैं। रावण पूँछ पकड़ लेता है और उन्हीं के साथ ऊपर उठ जाता है। फिर हनुमान लौटकर उससे भिड़ जाते हैं, और लड़ाई आकाश में होने लगती है। कथा दोनों को दो बराबर के योद्धा कहती है। जिसके सिर तीस बाणों से कट चुके हैं और जिसके दसों मुँह से रक्त बह रहा है, उसे यहाँ बराबरी दी जा रही है।
दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शोभित होते हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु लड़ रहे हों, काजल का पहाड़ और सोने का पहाड़। फिर एक सीधी बात: बुद्धि से और बल से, दोनों से, राक्षस गिराया न जा सका। तब हनुमान ने राम का स्मरण किया। यह भक्ति की सजावट नहीं। यह क्रम में तीसरे नम्बर पर है, दो चीज़ों के आज़माये जाने के बाद।
उसके बाद कथा तेज़ चलती है। राम का स्मरण करके धीर हनुमान ललकारकर रावण को मारते हैं। दोनों पृथ्वी पर गिरते हैं और फिर उठकर लड़ते हैं, और देवता दोनों की जय-जय पुकारते हैं, दोनों की। फिर हनुमान पर सङ्कट देखकर वानर और भालू क्रोध में भरकर दौड़ते हैं। रण के मद में चूर रावण उन सब योद्धाओं को अपनी प्रचण्ड भुजाओं के बल से कुचलकर मसल डालता है।
यहाँ कथा सच बोल देती है। जिसका रथ दो बार टूट चुका है, जिसके सिर बार-बार कट चुके हैं, वह अब भी अकेले सब योद्धाओं को मसल डालता है। कथा उसे मूर्ख, अभिमानी और कालवश कहती है, पर कमज़ोर एक बार भी नहीं।
तब राम के ललकारने पर प्रचण्ड वानर दौड़े, और वानरों का प्रबल बल देखकर उसने माया प्रकट कर दी। कथा उसी चाल पर थमती है जिससे खुली थी: आरम्भ में वानरों की मार सही नहीं गयी, तब माया फैली। अब वानरों का बल फिर भारी पड़ा, तो फिर वही माया। इतने सब के बाद भी वह वहीं है जहाँ से चला था, फिर उसी तरकीब पर हाथ रखे हुए।
घोड़े उठा लिये गये
यहाँ बड़ी चीज़ लड़ाई नहीं, बीच की वह छोटी-सी रुकावट है। जो सिर कटकर फिर उग आता है, वह वही चीज़ है जिसे हर कोई अपने भीतर काटता है और अगली सुबह पहले से बड़ा पाता है। समझाया युद्ध जा रहा है, और समझाने के लिये रोज़ का जीवन उठाया गया है।
दूसरी बात उठाने की है। मातलि गिरते हैं और पहले उठाये जाते हैं, क्रोध बाद में आता है। चारों घोड़े गिरते हैं और पहले उठाये जाते हैं, धनुष बाद में खिंचता है। और एक आदमी के लिये चली हुई शक्ति अपने ऊपर ले ली जाती है, और उसका कारण अपने वचन में रखा जाता है।
तीसरी बात सुलझती नहीं। जो कभी सामने आँख नहीं उठा सका था, वह उसी की छाती पर हाथ रखे हुए है। शिव इसे विजय, साहस या न्याय नहीं कहते। प्रश्न की शक्ल में पार्वती के सामने रखकर इतना जोड़ते हैं कि यह बल किसी और का है। और तुरन्त बाद वही आदमी थका हुआ लौटकर उसी के पीछे जा खड़ा होता है जिसका बल था।
और हँसी। राम यहाँ तीन बार हँसते हैं, और तीनों बार कोई डरा हुआ है: जब उनकी अपनी सेना चित्रलिखी-सी खड़ी है। जब सामने खड़ा आदमी कालवश होकर अपना परिचय दे रहा है। और जब आकाश कटे सिरों से भरा है और वानर भाग रहे हैं। देवता उस आवाज़ पर हँसते हैं जो उसी क्षण मन्दोदरी के हृदय को काँपा रही है। और रावण की हँसी, ज्ञान सिखाये जाने पर, न समझ पाने से निकलती है।
अन्त में चित्र भरा हुआ है: तेज का पुञ्ज रथ, अजर-अमर घोड़े, तीस बाण, कटते और उगते सिर। पर जो तय होता है, वह छोटी बातों में आता है: घोड़े उठा लिये गये। विभीषण पीछे कर लिये गये। यह हिस्सा लड़ने वाले का स्वभाव तय करता है, और वह रुकावटों में तय होता है, वारों में नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 89 से 95, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।