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माया, द्वन्द्व और विभीषण

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · माया, द्वन्द्व और विभीषण

माया, द्वन्द्व और विभीषण

इन्द्र का रथ उतरता है, रावण माया फैलाता है, और दोहा नवासी से पंचानबे तक का सारा मैदान दो आदमियों के बीच सिमट आता है, जहाँ सिर कटते हैं और फिर उग आते हैं।

देवता ऊपर से नीचे देख रहे हैं, और जो उन्हें दिखता है वह उनसे सहा नहीं जाता। प्रभु पैदल लड़ रहे हैं। सामने वाले के पास रथ है, घोड़े हैं, ध्वजा है, और इधर कोई सवारी नहीं है। यह प्रसंग वहीं से खुलता है, एक ऐसी बात से जो लड़ाई की नहीं, देखने की है। किसी ने कुछ माँगा नहीं। इन्द्र अपना रथ भेज देते हैं और मातलि उसे हर्ष के साथ ले आते हैं, और उसके बाद इस पूरे पन्ने की चाल बदल जाती है।

दोहा नवासी से पंचानबे तक तुलसी वह करते हैं जो वे कम करते हैं। वे मैदान ख़ाली करा देते हैं। राम सारी सेना की ओर देखकर कहते हैं कि आप सब बहुत थक चुके हैं, अब द्वन्द्वयुद्ध देखिये, और जो सेना अभी तक लड़ रही थी वह दर्शक बन जाती है। उसके बाद जो होता है उसकी सबसे अजीब बात यह है कि वह ख़त्म ही नहीं होता। सिर कटते हैं और उसी क्षण नये हो जाते हैं। और ठीक बीच में, जब शोर सबसे ऊँचा है, तुलसी लड़ाई रोककर दो पंक्तियों में बता देते हैं कि यह किस चीज़ का चित्र है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यहाँ जो कुछ है वह इसी अवधी पाठ में है। इन्द्र का रथ और मातलि, पाटल-आम-कटहल वाली वह नीति जो राम बीच युद्ध में रावण को सुनाते हैं, विभीषण पर चली हुई शक्ति का राम के ऊपर ले लिया जाना, आकाश में सिरों की माला लिये चलती हुई कालिकाएँ, और शिवजी का उमा से कहा हुआ वह एक वाक्य जिसमें एक पूरे घर का हिसाब आ जाता है। इस पन्ने पर जो नाम है, जो संख्या है और जो क्रम है, वह सब इन्हीं चौपाइयों, छन्दों और दोहों से लिया गया है, और इन्हीं की टीका से, कहीं और से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम जो इस पन्ने पर तीन बार हँसते हैं, दो बार गिरी हुई चीज़ उठाते हैं, और एक बार दूसरे के लिये चलाया हुआ अस्त्र अपने ऊपर ले लेते हैं।
  • रावण लङ्कापति, जो अपना परिचय ख़ुद देता है, अपनी हारें गिनाकर डराता है, और जिसके सिर कटते ही फिर उग आते हैं।
  • मातलि इन्द्र का सारथी, जो हर्ष के साथ रथ लेकर आता है और थोड़ी ही देर में सौ बाण खाकर धरती पर पड़ा जय राम पुकार रहा होता है।
  • विभीषण जिस पर काल के दण्ड जैसी शक्ति चलती है, जो प्रभु को चोट लगी देखकर गदा उठा लेता है, और जिसके बारे में शिवजी एक प्रश्न पूछकर चुप हो जाते हैं।
  • हनुमान जो विभीषण को थका देखकर पर्वत लिये दौड़ते हैं, और जिनका आधा युद्ध ज़मीन पर नहीं, आकाश में लड़ा जाता है।
  • मन्दोदरी जो इस पन्ने पर एक बार आती हैं, एक छन्द की एक पंक्ति में, और मैदान पर नहीं, कहीं दूर, जहाँ धनुष की आवाज़ सुनकर उनका हृदय काँप जाता है।
  • शिव और उमा जिनकी बातचीत के भीतर यह पूरी कथा कही जा रही है, और जो ठीक सबसे कठिन जगह पर आकर एक वाक्य रख देते हैं।

देवताओं ने ऊपर से क्या देखा

पन्ना एक नज़र से खुलता है, प्रहार से नहीं। देवताओं ने प्रभु को पयादें देखा, यानी पैदल, बिना किसी सवारी के। पोद्दार इस एक शब्द पर रुककर समझाते हैं कि बिना सवारी के युद्ध करते हुए। और उसके तुरन्त बाद जो लिखा है वह डर नहीं है, क्षोभ है। उनके हृदय में बहुत भारी क्षोभ उपजा। यह वह तकलीफ़ है जो किसी को हारते देखकर नहीं होती, किसी को ऐसी जगह खड़ा देखकर होती है जो उसे शोभा नहीं देती।

और फिर इस प्रसंग का पहला काम होता है, और वह किसी के माँगने पर नहीं होता। किसी ने ऊपर सन्देश नहीं भेजा, किसी ने प्रार्थना नहीं की। इन्द्र अपना रथ तुरन्त भेज देते हैं, वही जिस पर वे स्वयं चलते हैं, और उसे लाने वाला भी कोई साधारण आदमी नहीं भेजा जाता।

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥
सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥

चौपाई १

मातलि हर्ष के साथ उसे ले आये। इस आधी पंक्ति में जो दो शब्द सबसे अच्छे हैं वे हरष सहित हैं। मातलि इन्द्र के सारथी हैं। देवताओं और असुरों के युद्धों में वे जिस रथ को हाँकते रहे हैं, वही रथ आज उन्हें यहाँ लाना है, और वे उसे खिंचे हुए मन से नहीं लाते।

रथ का वर्णन तुलसी एक ही साँस में निपटा देते हैं। वह तेज का पुञ्ज है, दिव्य है, अनुपम है। कोसलपुरी के राजा हर्षित होकर उस पर चढ़ते हैं। चार घोड़े जुते हैं और उनके चार विशेषण गिनाये जाते हैं: चंचल, मनोहर, अजर, अमर, और मन के समान गति करने वाले। बूढ़े न होने वाले और मरने से परे घोड़े। और अब जो लिखा नहीं गया उस पर ध्यान दीजिये। राम रथ माँगते नहीं, चढ़ने से पहले कुछ कहते नहीं, मना भी नहीं करते। जो मिला, वह ले लिया गया, और उसके ऊपर कोई भाषण नहीं हुआ।

असर उसी क्षण दिखता है, और वह असर बड़ा दिलचस्प है। रघुनाथ को रथ पर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। किसी ने उन्हें बल दिया नहीं। किसी ने उनसे कुछ कहा नहीं। उन्होंने देखा, और देखने भर से बल आ गया। और उधर उसी क्षण उल्टा हो रहा है: वानरों की मार सही नहीं जाती। तब रावण माया फैलाता है। क्रम पर ध्यान दीजिये। माया पहले नहीं आती। माया तब आती है जब असली चीज़ काम देना छोड़ देती है।

सार: प्रभु को पैदल लड़ते देखकर देवताओं के हृदय में क्षोभ उपजता है। इन्द्र अपना रथ भेजते हैं और मातलि उसे हर्ष के साथ लाते हैं। दिव्य रथ पर चार अजर-अमर घोड़े जुते हैं। राम को रथ पर देखकर वानर नये बल से दौड़ते हैं, और उनकी मार न सह पाने पर रावण माया फैलाता है।

बहुत-से राम

माया की बनावट पर रुकना चाहिये, क्योंकि उसमें रावण की सारी समझ खुल जाती है। पहली पंक्ति यह बताती है कि वह किस पर नहीं चली: सो माया रघुबीरहि बाँची, वह माया अकेले रघुवीर से बच गयी, उन्हें छू नहीं सकी। बाक़ी सब पर चल गयी। सब वानरों ने और लक्ष्मण ने भी उसे सच मान लिया।

और उन्होंने देखा क्या? राक्षसी सेना के भीतर भाई लक्ष्मण सहित बहुत-से राम। यह इस माया की निर्दयता है। उसने उन्हें कोई भयानक चीज़ नहीं दिखायी। उसने उन्हें उनका अपना स्वामी दिखाया, गिनती में बहुत-से, और शत्रु की पंक्ति में खड़ा हुआ। सेना जिस एक चीज़ के भरोसे लड़ रही थी, वही चीज़ उसे चारों ओर दिखने लगी, और उसी से वह जड़ हो गयी।

बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे॥
निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी।
माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी॥

छन्द

बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर और भालू मन में बहुत ही डर गये, और तुलसी ने उस डर का नाम भी दे दिया है, अपडरे, यानी झूठा डर, वह डर जिसके नीचे कोई कारण नहीं है। फिर वह चित्र आता है जो इस छन्द को याद रखने लायक़ बनाता है। लक्ष्मण सहित वे सब मानो चित्र में लिखे हुए हों, जहाँ के तहाँ खड़े देखते रह गये। सेना टूटी नहीं, सेना रुक गयी। भागना भी एक काम है, और वह काम भी नहीं हुआ।

और फिर समाधान आता है, और वह इतना छोटा है कि पढ़ते हुए निकल जाता है। अपनी सेना को चकित देखकर कोसलपति ने हँसकर धनुष पर बाण चढ़ाया और पल भर में सारी माया हर ली। तीन बातें यहाँ एक साथ हैं। पहली, वे हँसते हैं। दूसरी, वे कुछ समझाते नहीं, पुकारकर यह नहीं कहते कि असली मैं यह रहा। तीसरी, जो चीज़ आँखों के भीतर घुसी हुई थी उसे बाहर का एक बाण हटा देता है। और उसी पंक्ति में हरने वाले का नाम हरि है और क्रिया हरी है, जिसे पोद्दार दुःखों के हरने वाले से खोलते हैं। नाम और काम आमने-सामने रख दिये गये हैं।

सार: माया अकेले रघुवीर पर नहीं चलती। लक्ष्मण और सारी वानर सेना उसे सच मान लेती है और शत्रु की पंक्तियों में बहुत-से राम देखकर चित्रलिखी-सी खड़ी रह जाती है। राम अपनी सेना को चकित देखकर हँसते हैं, बाण चढ़ाते हैं और पल भर में माया हर लेते हैं।

दोहा नवासी: अब देखिये

माया हट जाने के बाद सारी वानर सेना हर्षित है, और ठीक इसी जगह राम सबकी ओर देखते हैं। सब तन चितइ, सबकी ओर दृष्टि डालकर। और जो कहते हैं उसे तुलसी बचन गँभीर कहते हैं, गम्भीर वचन, यानी वह बात जिसे दोहराया नहीं जायेगा।

बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर।
द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥ ८९॥

दोहा ८९

इन दो पंक्तियों में दो चीज़ें हैं और दोनों पर ठहरना चाहिये। पहली, कारण। वे यह नहीं कहते कि यह लड़ाई आप लोगों के बस की नहीं। वे यह नहीं कहते कि यह मेरा अधिकार है, या कि यश मुझे चाहिये। वे कहते हैं कि आप सब वीर बहुत थक गये हैं। जिस सेना ने लड़कर यह मैदान यहाँ तक पहुँचाया है, उसे हटाया नहीं जा रहा, उसे विश्राम दिया जा रहा है, और हटने का कारण उसके शरीर में रखा गया है, उसकी योग्यता में नहीं।

दूसरी चीज़ वह है जो लड़ने के बदले में दी जा रही है: देखहु, देखिये। सेना को लड़ाई से उठाकर दर्शक की जगह बिठा दिया जाता है, और इसके बाद इस पन्ने पर जो कुछ होता है वह देखा जा रहा है। हर बाण, हर कटा हुआ सिर, हर गिरा हुआ रथ, उन आँखों के सामने से गुज़रता है जो कुछ देर पहले तक ख़ुद हथियार उठाये हुए थीं।

सार: राम सारी सेना की ओर देखकर गम्भीर वचन कहते हैं कि आप सब वीर अत्यन्त थक गये हैं, अब द्वन्द्वयुद्ध देखिये। जो सेना अभी तक लड़ रही थी वह दर्शक बन जाती है, और आगे का पूरा युद्ध उन्हीं आँखों के सामने होता है।

दो परिचय

ऐसा कहकर रघुनाथ ने रथ चलाया, और उससे पहले ब्राह्मणों के चरणकमलों में सिर नवाया। आकाश से एक रथ उतरा है और उसका पहला उपयोग एक प्रणाम है। इसके बाद ही दृश्य दूसरी ओर मुड़ता है, और वहाँ का ब्योरा उल्टा है। लङ्केश के हृदय में क्रोध छा गया, और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा।

और अब वह बात आती है जो इस प्रसंग की सबसे बड़ी विडम्बना है। रावण का पहला वाक्य एक परिचय है। परिचय वही आदमी देता है जिसे लगता है कि उसे पहचाना नहीं गया। और वह सामने खड़े व्यक्ति को तापस कहकर पुकारता है, तपस्वी।

जीतेहु जे भट संजुग माहीं । सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥
रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥

चौपाई २

अरे तपस्वी, सुनिये, युद्ध में जिन योद्धाओं को जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत जानता है, लोकपाल तक जिसके कैदख़ाने में पड़े हैं। यहाँ तक यह एक राजा की भाषा है। इसके बाद जो सूची आती है वह किसी और की होती तो शोक-गीत होती। खर, दूषण और विराध मारे गये। बेचारे बालि का वध व्याध की तरह किया गया। राक्षस योद्धाओं के समूह संहार दिये गये। कुम्भकर्ण और मेघनाद भी मार दिये गये।

यह आदमी अपने शत्रु को डराने के लिये अपनी ही हारें गिना रहा है, और उसे इसका पता नहीं है। पर उस सूची में एक शब्द ऐसा है जिसे वह सँभाल नहीं पाया, बिचारा। बेचारा बालि। उस एक शब्द में उसके भीतर की वह पंक्ति खुल जाती है जो बाहर नहीं आने वाली थी। फिर धमकी आती है। आज सारा वैर निबाह लूँगा, यदि रण से भाग न गये। और उत्तर में जो मिलता है वह धमकी नहीं है।

सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥
सत्य सत्य सब तव प्रभुताई । जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥

चौपाई ३

दुर्वचन सुनकर और उसे कालबस जानकर, यानी काल के वश में पड़ा हुआ जानकर, कृपानिधान ने हँसकर कहा कि सत्य है, सत्य है, आपकी सारी प्रभुता सच है। अब व्यर्थ बकवाद न कीजिये, मनुसाई दिखाइये। यह उत्तर दो काम करता है और दोनों छोटे हैं। पहला, जो दावा किया गया था वह पूरा का पूरा मान लिया जाता है, एक शब्द भी काटा नहीं जाता। दूसरा, जो चीज़ दावे में नहीं थी वही एक चीज़ माँगी जाती है। और उस हँसी के लिये टीका का क्रम देखिये: पहले जानना कि सामने वाला काल के वश में है, फिर हँसना। यह उपहास नहीं है। यह वह चीज़ है जो तब बचती है जब सामने खड़ा आदमी पूरा हो चुका है और अभी तक अपना नाम बता रहा है।

सार: राम ब्राह्मणों के चरणों में सिर नवाकर रथ चलाते हैं और रावण गरजता हुआ सामने आता है। वह अपना नाम, अपना यश और लोकपालों का कैदख़ाना गिनाता है, फिर खर, दूषण, विराध, बालि, कुम्भकर्ण और मेघनाद की मौतें गिनाकर धमकी देता है। राम उसे कालवश जानकर हँसते हैं, उसकी सारी प्रभुता स्वीकार कर लेते हैं, और केवल इतना कहते हैं कि बकवाद छोड़कर मनुसाई दिखाइये।

पाटल, आम और कटहल

और अब राम वह करते हैं जिसका युद्धभूमि में कोई काम नहीं है। वे क्षमा माँगते हैं और नीति सुनाते हैं। सामने खड़ा आदमी धनुष ताने हुए है, बाण तरकश में हैं, सेना दोनों ओर खड़ी देख रही है, और बीच में एक छन्द आता है जो बाग़ीचे की बात करता है।

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।
संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥

छन्द

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यश का नाश न कीजिये। क्षमा कीजियेगा, एक नीति सुनाता हूँ, सुनिये। संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं, पाटल के समान, रसाल के समान और पनस के समान, यानी गुलाब, आम और कटहल। एक केवल फूल देता है। एक फूल भी देता है और फल भी। और एक में केवल फल ही लगते हैं। इसी तरह एक कहते हैं और करते नहीं, दूसरे कहते भी हैं और करते भी हैं, और तीसरे करते हैं पर वाणी से कुछ कहते नहीं।

इस छन्द की सबसे बारीक बात उसकी जगह है। तीन तरह के आदमी गिनाये जा रहे हैं, और जिसे यह सुनाया जा रहा है वह अभी-अभी चार चौपाइयाँ अपने बारे में बोलकर हटा है। छन्द उसे पहली क़िस्म का नहीं कहता। वह हिसाब उसके लिये छोड़ दिया जाता है। और राम इस बँटवारे में अपने को कहीं नहीं रखते। कटहल पर कोई दावा नहीं किया जाता, क्योंकि तीसरी क़िस्म की परिभाषा ही यह है कि वह अपने बारे में नहीं बोलती।

और यह सब सुनकर जो होता है, वह इस पन्ने पर रावण का आख़िरी वाक्य है।

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥ ९०॥

दोहा ९०

राम के वचन सुनकर वह ख़ूब हँसा। मुझे ज्ञान सिखाते हैं? उस समय वैर करते हुए तो डरे नहीं, अब प्राण प्यारे लगने लगे हैं। यह पूरा उत्तर एक ग़लत अनुवाद है। उसने उपदेश सुना, उसका अर्थ देर लगाया, और देर का अर्थ डर। जो आदमी बात को हथियार ही समझता है, उसे बात की कोई और वजह सूझ नहीं सकती। और यह उसका अन्तिम कथन है। इसके आगे इस पन्ने पर वह एक शब्द नहीं बोलता, केवल लड़ता है, गिरता है, उठता है, और फिर लड़ता है।

सार: राम बीच युद्ध में रावण को नीति सुनाते हैं कि संसार में तीन तरह के पुरुष होते हैं, पाटल जैसे जो केवल कहते हैं, आम जैसे जो कहते भी हैं और करते भी, और कटहल जैसे जो केवल करते हैं। रावण इसे डर का चिह्न समझकर हँसता है और कहता है कि अब प्राण प्यारे लग रहे हैं। दोहा नब्बे उसका इस पन्ने पर आख़िरी वाक्य है।

पहला दौर, और एक गिरा हुआ सारथी

लड़ाई शुरू होती है और उसका पहला चित्र भरा हुआ है। दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर वज्र के समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकार के सिलीमुख दौड़े, यानी बाण, और दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी, सब जगह छा गये। कहीं ख़ाली जगह नहीं छोड़ी गयी। इसके उत्तर में एक बाण चलता है। रघुवीर ने पावक बाण छोड़ा और क्षण भर में सब बाण जल गये।

फिर वह खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ता है, और राम उसे बाण के साथ वापस भेज देते हैं। इस शक्ति को याद रखिये। एक बार चलकर वह लौट आयी है। आगे चलकर वह दोबारा चलेगी, और तब उसका निशाना कोई और होगा।

फिर करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलते हैं और प्रभु उन्हें बिनु प्रयास काटकर हटा देते हैं, बिना किसी परिश्रम के। और यहीं तुलसी एक काम करते हैं जो वे इस पन्ने पर दो बार करेंगे। वे कहते हैं कि रावण के बाण वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्य के सारे मनोरथ। यानी वे इसलिये नहीं रुक रहे कि कोई उन्हें रोक रहा है। वे उस चीज़ से निकल रहे हैं जिससे निकलकर कुछ पूरा होता ही नहीं।

और तब इस पूरे दौर का एक ही प्रहार लगता है, और वह राम पर नहीं लगता।

तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि॥
राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा॥

चौपाई ४

तब उसने सारथी को सौ बाण मारे। वह जय राम पुकारकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। राम ने कृपा करके सारथी को उठाया। तब प्रभु परम क्रोध को प्राप्त हुए। इन चार टुकड़ों का क्रम ही इनका अर्थ है। जो आदमी थोड़ी देर पहले हर्ष के साथ रथ लेकर आया था वह अब ज़मीन पर पड़ा है, और गिरते हुए उसके मुँह से जो निकलता है वह बचाओ नहीं है, जय राम है। राम पहले उसे उठाते हैं, फिर क्रोध करते हैं। और क्रोध किस बात पर आया, यह भी देखिये। रथ टूटने पर नहीं, अपने ऊपर बाण लगने पर नहीं, अपमान पर नहीं। एक आदमी पर, जो यहाँ का था ही नहीं और केवल पहुँचाने आया था।

सार: रावण वज्र जैसे बाण, शक्ति, करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है और सब निष्फल जाते हैं, जैसे दुष्ट के मनोरथ। फिर वह मातलि को सौ बाण मारता है। सारथी जय राम पुकारकर गिरता है, राम उसे कृपा करके उठाते हैं, और उसके बाद परम क्रोध को प्राप्त होते हैं।

धनुष की टंकार

परम क्रोध तुलसी के यहाँ भाषण नहीं होता। पहला चिह्न तरकश में मिलता है: बाण कसमसे, कसमसाने लगे, यानी भीतर ही भीतर बाहर निकलने को छटपटाने लगे। हथियार से पहले हथियार की बेचैनी लिखी जाती है। फिर धनुष की कोदंड धुनि उठती है, अत्यन्त प्रचण्ड, और उसे सुनते ही सारे मनुजाद वातग्रस्त हो जाते हैं। और उसके बाद छन्द फैलकर बाक़ी संसार तक पहुँच जाता है।

मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।
चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे॥

छन्द

मन्दोदरी का हृदय काँप उठा। कच्छप काँपा, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओं के हाथी पृथ्वी को दाँतों से पकड़कर चिग्घाड़ने लगे। और यह कौतुक देखकर देवता हँसे। डरने वालों की सूची जिस नाम से शुरू होती है वह किसी योद्धा का नहीं है। वह एक स्त्री हैं जो युद्ध में नहीं हैं, और जिन्हें यह भी पता नहीं कि वह आवाज़ किस चीज़ की थी। और जो दो जीव काँप रहे हैं, कच्छप और दिग्गज, उन्हीं के ज़िम्मे संसार को थामे रखना है। हाथी जिस पृथ्वी को थामे हैं उसी को दाँतों से पकड़ लेते हैं।

और तीसरी बात सबसे ठंडी है। कौतुक, यानी तमाशा। जिस आवाज़ पर एक स्त्री का हृदय काँप रहा है, उसी आवाज़ पर देवता हँस रहे हैं। आवाज़ एक है। अन्तर यह है कि कौन कहाँ खड़ा है। जो दूर खड़ा है उसके लिये वह कौतुक है और जिस पर वह गिर सकती है उसके लिये वह कुछ और है। तुलसी दोनों को एक ही छन्द में, एक के बाद एक, रख देते हैं और कुछ नहीं कहते।

तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।
राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल॥ ९१॥

दोहा ९१

धनुष को कान तक तानकर उन्होंने भयानक बाण छोड़े, और बाणों का समूह ऐसे चला मानो सर्प लहलहात हुए जा रहे हों। लहलहाना वह शब्द है जो लहराती हुई चीज़ के लिये आता है, और साँप के शरीर की वह चाल इस शब्द में पूरी आ जाती है। यह उपमा आगे की पूरी लड़ाई पर छायी रहेगी, क्योंकि अगली ही चौपाई में बाण फिर सर्प हो जाते हैं, इस बार पंखवाले।

सार: क्रोध का पहला चिह्न तरकश में बाणों का कसमसाना है। धनुष की टंकार सुनकर राक्षस वातग्रस्त हो जाते हैं, मन्दोदरी का हृदय काँपता है, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डरते हैं, दिग्गज पृथ्वी को दाँतों से पकड़ लेते हैं, और देवता इसी को कौतुक मानकर हँसते हैं। फिर राम कान तक धनुष तानकर लहराते सर्पों जैसे बाण छोड़ते हैं।

कटते हैं, और उग आते हैं

बाण पंखवाले सर्पों की तरह उड़े। उन्होंने पहले सारथी और घोड़ों को मारा, फिर रथ को चूर-चूर करके ध्वजा और पताका गिरा दी। और उसके बाद वह पंक्ति आती है जिसमें तुलसी बिना कुछ कहे सब कह देते हैं। वह बहुत ज़ोर से गरजा, पर अंतर बल थाका, भीतर उसका बल थक चुका था। गर्जना बाहर की चीज़ है। जो थका है वह भीतर है, और तुलसी उसे एक ही आधी पंक्ति में गिनकर आगे बढ़ जाते हैं।

वह तुरन्त दूसरे रथ पर चढ़ता है, खिसियाता है, और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र छोड़ता है। और यहाँ तुलसी वही काम दोबारा करते हैं। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे परद्रोह में लगे हुए चित्त वाले मनुष्य के। एक पन्ने पर दो बार वही बात: हार का कारण कौशल में नहीं, स्वभाव में ढूँढ़ा जा रहा है।

फिर रावण दस त्रिशूल चलाकर चारों घोड़े मारकर गिरा देता है। और राम का पहला काम धनुष उठाना नहीं है। तुरग उठाइ, घोड़ों को उठाकर, तब क्रोध करके धनुष खींचा। इस पन्ने पर यह दूसरी बार है। पहले मातलि उठाये गये, फिर क्रोध। अब घोड़े उठाये गये, फिर क्रोध। जो गिर गया उसे पहले खड़ा किया जाता है, और लड़ाई उसके बाद चलती है।

और अब सिरों का हिसाब शुरू होता है, और तुलसी उसे एक सुन्दर उपमा से खोलते हैं। रावण के सिर कमलों का वन हैं और रघुवीर के बाण उस वन में विचरने वाले भौंरों की पंक्ति। दसों सिरों में दस-दस बाण मारे गये, जो आर-पार निकल गये, और सिरों से रक्त के पनारे बह चले, यानी नालियाँ। रक्त बहाता हुआ ही वह बलवान दौड़ा। प्रभु ने फिर तीस बाण मारकर बीसों भुजाओं समेत दसों सिर धरती पर गिरा दिये। यह अन्त होना चाहिये था। यहीं से पन्ना बदल जाता है।

काटतहीं पुनि भए नबीने । राम बहोरि भुजा सिर छीने॥
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए । कटत झटिति पुनि नूतन भए॥

चौपाई ५

काटते ही वे फिर नये हो गये। राम ने फिर भुजाएँ और सिर काट गिराये। प्रभु ने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे, और कटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये। इस चौपाई में एक भी बचाव नहीं है। कोई वार रोका नहीं जा रहा, कोई निशाना चूक नहीं रहा। हर बाण लगता है, हर बाण अपना काम करता है, और स्थिति ज्यों की त्यों रहती है। यह लड़ाई का ढाँचा नहीं है, और तुलसी अगली पंक्ति में राम के लिये जो शब्द चुनते हैं वह भी लड़ाई का नहीं है, अति कौतुकी, बहुत खिलाड़ी।

आकाश भर जाता है। कटे हुए सिर और बाहु ऊपर ऐसे छाये हैं मानो असंख्य केतु और राहु हों, और उसके बाद के छन्द में वे सिर रक्त बहाते हुए आकाशमार्ग में दौड़ते हैं, और राम के बाण उन्हें बार-बार लगते रहते हैं इसलिये वे नीचे गिरने भी नहीं पाते। एक-एक बाण से समूह के समूह सिर बिंधकर उड़ते हैं, मानो सूर्य की किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओं को पिरो रही हों। और ठीक इसी ऊँचाई पर तुलसी लड़ाई रोक देते हैं।

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥ ९२॥

दोहा ९२

जैसे-जैसे प्रभु उसके सिर हरते हैं, वैसे-वैसे वे अपार होते जाते हैं, जैसे विषयों का सेवन करने से मार नित नया-नया बढ़ता जाता है। पोद्दार इसे खोलते हैं कि मार यानी काम, भोगने की इच्छा। यह दोहा इस पूरे पन्ने की जड़ है। जो सिर फिर उग आता है वह किसी राक्षस का जादू नहीं है। वह वही चीज़ है जिसे हर आदमी अपने भीतर काट चुका है और अगली सुबह पहले से बड़ा पा चुका है। तुलसी ने युद्ध को मैदान से उठाकर पढ़ने वाले की अपनी छाती में रख दिया है, और यह उन्होंने दो पंक्तियों में किया है, ठीक उस जगह जहाँ शोर सबसे ऊँचा था।

सार: बाण रथ, ध्वजा, सारथी और घोड़े गिरा देते हैं, राम गिरे हुए घोड़े उठाकर फिर धनुष तानते हैं, दसों सिरों में दस-दस बाण लगते हैं और तीस बाणों से बीस भुजाओं समेत दसों सिर कट जाते हैं। पर कटते ही वे नये हो जाते हैं, और दोहा बानबे कहता है कि जैसे विषयों के सेवन से काम नित नया बढ़ता है, वैसे ही ये सिर अपार होते जाते हैं।

आकाश में दौड़ते हुए सिर

सिरों की उस बाढ़ से रावण एक ही निष्कर्ष निकालता है, और वह ग़लत निकालता है। बिसरा मरन, उसे अपना मरना भूल गया, और क्रोध गहरा हो गया। जो चीज़ उसकी असमर्थता का सबूत थी, उसे वह अपनी आपूर्ति समझ लेता है। महान अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुष तानकर दौड़ा।

और इस बार वह कुछ कर भी लेता है। रणभूमि में क्रोध करके उसने बाण बरसाकर रघुनाथ का रथ ढक दिया, और एक दण्ड भर रथ दिखायी ही नहीं पड़ा, मानो कुहरे में सूर्य छिप गया हो। यह इस पन्ने का इकलौता क्षण है जब दूसरी ओर वाला ओझल हो जाता है। और इसी क्षण वे देवता, जो थोड़ी देर पहले कौतुक देखकर हँस रहे थे, हाहाकार करते हैं। हँसी और हाहाकार के बीच का फ़र्क़ इतना ही है कि इस बार दिखना बन्द हो गया।

तब प्रभु क्रोध करके धनुष उठाते हैं, बाणों को हटाकर शत्रु के सिर काटते हैं, और उनसे दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी, सब पाट देते हैं। और अब कटे हुए सिर वह करते हैं जो उन्होंने अब तक नहीं किया था। वे आकाशमार्ग से दौड़ते हैं, जय-जय की ध्वनि करके भय उपजाते हैं, और बोलते हैं। वे पूछते हैं कि लक्ष्मण कहाँ हैं, वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं, कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं। कटकर भी वे खोज ही रहे हैं, और जिन्हें खोज रहे हैं उनके नाम अब भी याद हैं।

कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।
संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥
सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं।
करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥

छन्द

राम कहाँ हैं, यह कहते हुए सिरों के समूह दौड़े, और उन्हें देखकर वानर भाग चले। वानरों का भागना अनुचित नहीं लगता। जो सेना दोहा नवासी में बिठा दी गयी थी और तब से देख रही थी, उसके ऊपर से अब कटे हुए सिर उड़ते हुए यह पूछते जा रहे हैं कि राम कहाँ हैं। इसके बाद रघुकुलमणि धनुष सन्धान करते हैं, हँसते हैं, और उन सिरों को बाणों से भली भाँति बेध डालते हैं। यह इस पन्ने की तीसरी हँसी है, और तीनों बार वे तब हँसे हैं जब कोई और डरा हुआ था।

और छन्द का उत्तरार्ध वहाँ चला जाता है जहाँ युद्ध के बाद की जगह होती है। हाथों में मुण्डों की मालाएँ लिये बहुत-सी कालिकाएँ झुंड के झुंड मिलकर इकट्ठी हुईं, रक्त की नदी में स्नान किया, और चलीं, मानो संग्रामरूपी वटवृक्ष की पूजा करने जा रही हों। कटे हुए सिरों का सफ़र इसी एक छन्द में पूरा हो जाता है। वे पहले घाव थे, फिर हथियार, फिर हवा में तैरते हुए प्रश्न, और अब वे माला हैं जिसे पहनकर कोई पूजा करने जा रहा है।

सार: सिरों की बाढ़ को रावण अपनी आपूर्ति समझकर मरना भूल जाता है और बाणों से राम का रथ एक दण्ड तक ढक देता है। देवताओं का हाहाकार सुनकर राम फिर सिर काटते हैं, और वे कटे सिर आकाश में दौड़कर पूछते हैं कि लक्ष्मण, सुग्रीव और रघुवीर कहाँ हैं। वानर भाग चलते हैं, राम हँसकर उन्हें बेध डालते हैं, और कालिकाएँ उन्हीं मुण्डों की मालाएँ लिये रक्त की नदी में स्नान करके संग्रामरूपी वट की पूजा करने चलती हैं।

विभीषण

और यहीं यह पन्ना मुड़ जाता है। रावण फिर क्रोधित होकर एक प्रचण्ड शक्ति छोड़ता है। यह वही हथियार है जो इस पन्ने पर एक बार चल चुका है और बाण के साथ वापस लौट आया था। इस बार वह उसे राम की ओर नहीं फेंकता।

पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥ ९३॥

दोहा ९३

वह विभीषण के सामने ऐसी चली मानो काल का दण्ड हो। निशाना बदलना अपने आप में एक पूरा वाक्य है। इस आदमी का अब तक का सारा समय राम के सामने असफल होकर बीता है। तो वह लक्ष्य बदल देता है, और जो लक्ष्य वह चुनता है वह उस मैदान का इकलौता ऐसा आदमी है जो उसके अपने घर से निकलकर वहाँ खड़ा हुआ है।

यहाँ ठहरकर एक बात साफ़ कह देनी चाहिये। इन पंक्तियों में विभीषण को रावण का भाई कहीं नहीं कहा गया। वह सम्बन्ध इसी काण्ड के पिछले प्रसंगों से आता है, इन दोहों से नहीं। तुलसी यहाँ केवल दो नामों को आमने-सामने खड़ा करते हैं और आगे चलकर शिवजी से एक वाक्य कहलवा देते हैं, और उस एक वाक्य में वह सब आ जाता है जो उन्होंने अभी तक नहीं कहा।

आवत देखि सक्ति अति घोरा । प्रनतारति भंजन पन मोरा॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला । सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥

चौपाई ६

अत्यन्त भयानक शक्ति को आती हुई देखकर, और यह विचारकर कि शरणागत का दुःख हरना मेरा प्रण है, राम ने तुरन्त विभीषण को पीछे कर लिया और सम्मुख होकर वह शक्ति स्वयं सह ली। एक अस्त्र को मैदान पार करने में जितना समय लगता है, उतने में एक कारण भी दे दिया गया है, और वह कारण चौंकाने वाला है। यह नहीं कहा गया कि विभीषण मित्र हैं, या काम के आदमी हैं, या अपने हैं। जो कहा गया है वह है प्रनतारति भंजन पन मोरा, मेरा प्रण, प्रथम पुरुष में। बचाने का कारण बचाये जाने वाले में नहीं है, बचाने वाले के वचन में है।

और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिस पर पूरा दृश्य टिका है। शक्ति लगी और कुछ मूर्च्छा हुई। कछु, यानी कुछ। तुलसी उस मूर्च्छा को बड़ा नहीं होने देते, और अगली ही साँस में सारा प्रश्न निपटा देते हैं: प्रभु ने तो यह खेल किया, व्याकुलता देवताओं को हुई।

पर विभीषण वह पंक्ति नहीं पढ़ते। उन्हें इतना ही दिखता है कि प्रभु को श्रम प्राप्त हुआ, चोट पहुँची, और वे क्रुद्ध होकर हाथ में गदा लेकर दौड़ पड़ते हैं। जिसे बचाया जा रहा था वही हथियार उठा लेता है, और इसलिये कि बचाने वाले को चोट लग गयी। इसमें कोई हिसाब नहीं है। यह वह चीज़ है जो हिसाब से पहले हो जाती है।

और फिर वे बोलते हैं, और वह बोलना गाली है। अरे अभागे, मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि। देवता, मनुष्य, मुनि और नाग, सबसे विरोध किया। आदर के साथ शिवजी को सिर चढ़ाये, और इसीलिये एक-एक के बदले करोड़ों पाये। उसी कारण से अब तक बचे हुए हैं। पर अब काल सिर पर नाच रहा है। और रामविमुख होकर सम्पदा की चाह। ऐसा कहकर उन्होंने माझ उर, छाती के ठीक बीचो-बीच, गदा मारी।

इस गाली की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें प्रशंसा भी है। सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए कोई अपमान नहीं है, वह आदर का तथ्य है। कहने वाला यह नहीं कह रहा कि सामने वाला कुछ नहीं है। वह कह रहा है कि सामने वाले ने जो पाया है वह कमाकर पाया है, और अब उसे उसी के विरुद्ध ख़र्च कर रहा है जिससे वह मिला था। यह वाक्य उस मैदान पर खड़ा कोई और नहीं बना सकता था, क्योंकि इसके लिये उस घर के भीतर की जानकारी चाहिये।

उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्यो।
दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्यो॥
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥

छन्द

बीच छाती में कठोर गदा की घोर चोट लगते ही वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, दसों मुखों से रुधिर बहने लगा, और वह अपने को सँभालकर क्रोध में भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान भिड़ गये, और जो भिड़न्त हुई वह मल्लजुद्ध है, हाथ की लड़ाई। हथियार नीचे रह गये। और छन्द की आख़िरी पंक्ति इस प्रसंग का सबसे कठिन वाक्य है। रघुवीर के बल से दर्पित विभीषण उसे घालि के बराबर भी नहीं गिनते, यानी पासंग के बराबर, वह छोटा-सा बटखरा जो तराजू के हल्के पलड़े में बराबरी के लिये रख दिया जाता है। जिस आदमी के कैदख़ाने में लोकपाल पड़े हैं, वह इस क्षण उस कंकड़ जितना भी नहीं तौलता।

और तुलसी उस दर्प को छिपाते नहीं। वे यह नहीं कहते कि विभीषण निर्भय हैं। वे कहते हैं रघुबीर बल दर्पित, यानी वह गर्व उधार का है, और उसी पंक्ति में उसका मालिक भी बता देते हैं। पर बताने के बाद वे उसे छीनते नहीं।

उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।
सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ॥ ९४॥

दोहा ९४

हे उमा, विभीषण क्या कभी रावण के सामने आँख उठाकर भी देख सकते थे? पर अब वही काल की तरह उससे भिड़ रहे हैं। यह श्रीरघुवीर का ही प्रभाव है। इस दोहे को प्रशंसा की तरह मत पढ़िये। शिवजी यह नहीं कह रहे कि विभीषण वीर हैं। वे उमा को एक घर की बात बता रहे हैं, और वह पूरा घर सन्मुख चितव कि काउ इन चार शब्दों में रखा हुआ है। लड़ना तो दूर, उत्तर देना तो दूर, कभी एक बार सामने आँख उठाकर देख भी सके थे क्या।

और इसीलिये यह दृश्य कहीं टिककर आराम से नहीं बैठता। यहाँ कोई बहस नहीं जीती जा रही, किसी को सही नहीं ठहराया जा रहा। जो आदमी आँख नहीं उठा सकता था उसके हाथ उसी की छाती पर हैं, और तुलसी इसका जो एकमात्र कारण बताते हैं वह यह है कि बल किसी और का है। न यह विजय है, न मुक्ति, न बदला। शिवजी वाक्य को प्रश्न की शक्ल में रखते हैं और प्रश्न की शक्ल में ही छोड़ देते हैं।

सार: रावण की प्रचण्ड शक्ति काल के दण्ड की तरह विभीषण की ओर चलती है। राम शरणागत का दुःख हरने के अपने प्रण के कारण उन्हें पीछे करके वह शक्ति स्वयं सह लेते हैं और कुछ मूर्च्छित होते हैं। विभीषण गदा लेकर दौड़ते हैं, रावण की छाती के बीच मारते हैं, और दोनों मल्लयुद्ध में भिड़ जाते हैं। शिवजी पूछते हैं कि जो कभी सामने आँख नहीं उठा सका था वह अब काल की तरह भिड़ रहा है, और यह रघुवीर का ही प्रभाव है।

हनुमान, और फिर वही चाल

उधार का बल सच्चा है, पर अनन्त नहीं है, और तुलसी विभीषण को जीत नहीं देते। अगली ही पंक्ति में लिखा है कि विभीषण बहुत ही थके हुए दिखे। यह देखकर हनुमान पर्वत धारण किये हुए दौड़े, और उस पर्वत से रथ, घोड़े और सारथी, तीनों का संहार कर डाला। और फिर उन्होंने रावण के हृदय के बीचो-बीच लात मारी, ठीक उसी जगह जहाँ थोड़ी देर पहले गदा लगी थी।

रावण खड़ा रह गया, पर उसका शरीर अत्यन्त काँप रहा था। और उसी पंक्ति में विभीषण इस पन्ने से चले जाते हैं, और जिस तरह जाते हैं वह देखने लायक़ है। वे वहाँ गये जहाँ जनत्राता थे, यानी अपने जनों के रक्षक। वे अपनी शुरू की हुई लड़ाई पूरी नहीं करते। वे लौटकर ठीक उसी जगह जाकर खड़े हो जाते हैं जहाँ वे तब खड़े थे जब उन पर शक्ति चली थी।

इसके बाद रावण ललकारकर हनुमान को मारता है। हनुमान पूँछ फैलाकर आकाश में चले जाते हैं। रावण पूँछ पकड़ लेता है और उन्हीं के साथ ऊपर उठ जाता है। फिर हनुमान लौटकर उससे भिड़ जाते हैं, और अब लड़ाई ज़मीन पर नहीं रह जाती। दोनों आकाश में लड़ते हैं, और तुलसी उन्हें जुगल सम जोधा कहते हैं, दो बराबर के योद्धा। यह शब्द हल्के मन से नहीं लिखा गया। जिस आदमी के सिर तीस बाणों से कट चुके हैं और जिसके दसों मुँह से रक्त बह रहा है, उसे यहाँ बराबरी दी जा रही है।

दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शोभित होते हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु लड़ रहे हों, काजल का पहाड़ और सोने का पहाड़। और फिर वह पंक्ति आती है जो इस पन्ने पर सबसे सीधी है। बुधि बल निसिचर परइ न पार्यो, बुद्धि से और बल से, दोनों से, राक्षस गिराया न जा सका। तब मारुतिसुत ने प्रभु को सँभाला, यानी स्मरण किया। तुलसी इसे भक्ति की सजावट की तरह नहीं रखते। वे उसे क्रम में तीसरे नम्बर पर रखते हैं, दो चीज़ों के आज़माये जाने के बाद।

उसके बाद का छन्द बहुत तेज़ चलता है। रघुवीर का स्मरण करके धीर हनुमान ललकारकर रावण को मारते हैं। दोनों पृथ्वी पर गिरते हैं और फिर उठकर लड़ते हैं, और देवता दोनों की जय-जय पुकारते हैं। दोनों की। जो देवता सुबह क्षोभ में थे, जो बीच में हँसे, जो थोड़ी देर पहले हाहाकार कर रहे थे, वे अब दोनों योद्धाओं के लिये जयकार कर रहे हैं। फिर हनुमान पर सङ्कट देखकर वानर और भालू क्रोध में भरकर दौड़ते हैं, और रण के मद में चूर रावण उन सब योद्धाओं को अपनी प्रचण्ड भुजाओं के बल से कुचलकर मसल डालता है।

यह पन्ना बहुत देर से एक ही दिशा में जा रहा था, और यहाँ वह पलटकर सच बोल देता है। जिसका रथ दो बार टूट चुका है, जिसके सिर बार-बार कट चुके हैं, जिसके दसों मुँह से रक्त बह चुका है, वह अब भी उस मैदान की सबसे बलवान अकेली चीज़ है। तुलसी उसे मूर्ख कहते हैं, अभिमानी कहते हैं, कालवश कहते हैं, पर कमज़ोर एक बार भी नहीं कहते।

तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।
कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड॥ ९५॥

दोहा ९५

तब रघुवीर के ललकारने पर प्रचण्ड वानर दौड़े, और वानरों का प्रबल बल देखकर उसने प्रगट पाषंड किया, माया प्रकट कर दी। यहीं यह पन्ना बन्द हो जाता है, ठीक उसी चाल पर जिससे वह खुला था। आरम्भ में जब वानरों की मार सही नहीं गयी थी, तब माया फैलायी गयी थी। अब जब वानरों का बल फिर भारी पड़ा, तब पाषंड प्रकट किया जाता है। इन दो मायाओं के बीच में यह सब पड़ा हुआ है: आकाश से उतरा एक रथ, तीन तरह के आदमियों वाली एक नीति, तीस बाण, कमलों के वन जैसे सिर, दूसरे के लिये अपने ऊपर ली गयी एक शक्ति, और ज़मीन पर एक मल्लयुद्ध। और इतना सब होने के बाद भी वह आदमी वहीं है जहाँ से चला था, फिर उसी तरकीब पर हाथ रखे हुए।

सार: विभीषण को थका देखकर हनुमान पर्वत लिये दौड़ते हैं, रथ, घोड़े और सारथी गिराकर रावण की छाती पर लात मारते हैं। विभीषण लौटकर प्रभु के पास चले जाते हैं। रावण हनुमान की पूँछ पकड़कर आकाश तक जाता है और दोनों बराबर के योद्धाओं की तरह लड़ते हैं। बुद्धि और बल से बात न बनने पर हनुमान प्रभु का स्मरण करते हैं, पर रावण वानर-भालुओं को मसल डालता है, और दोहा पंचानबे में वानरों का बल देखकर फिर माया प्रकट कर देता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने की सबसे बड़ी चीज़ लड़ाई नहीं है, वह दो पंक्तियों की एक रुकावट है। तुलसी उसे बीच में रोककर बता देते हैं कि यह किस चीज़ का चित्र है। जो सिर कटकर फिर उग आता है वह किसी वरदान की बात नहीं है, वह वही चीज़ है जिसे हर कोई अपने भीतर काट चुका है और अगली सुबह पहले से बड़ा पा चुका है। और उपमा की दिशा उल्टी है, यही उसका सारा कौशल है। समझाया युद्ध जा रहा है, और समझाने के लिये रोज़ का जीवन उठाया जा रहा है। इसके बाद पढ़ने वाला बाक़ी पन्ना अपने बारे में पढ़ता है और उसे पता भी नहीं चलता।

दूसरी बात उठाने की है, और वह इस पन्ने पर तीन बार होती है। मातलि गिरते हैं और पहले उठाये जाते हैं, क्रोध उसके बाद आता है। चारों घोड़े गिरते हैं और पहले उठाये जाते हैं, धनुष उसके बाद खिंचता है। और एक बार, दिन के सबसे कठिन हिस्से में, एक आदमी के लिये चली हुई शक्ति अपने ऊपर ले ली जाती है, और लेते समय कारण भी बता दिया जाता है, और वह कारण उस आदमी में नहीं, अपने वचन में रखा गया है। इस पन्ने का शोर बाणों और गर्जनाओं का है, पर जो याद रह जाता है वह शोर के बीच के ख़ाली हिस्सों में होता है।

और तीसरी बात वह है जो सुलझती नहीं, और जिसे तुलसी सुलझाते भी नहीं। एक आदमी जो कभी सामने आँख नहीं उठा सका था, वह ज़मीन पर उसी की छाती पर हाथ रखे हुए है। शिवजी इसे विजय नहीं कहते, साहस नहीं कहते, न्याय नहीं कहते। वे इसे एक प्रश्न की शक्ल में उमा के सामने रखकर केवल इतना जोड़ देते हैं कि यह बल किसी और का है। और उसके तुरन्त बाद वही आदमी थका हुआ दिखाया जाता है और चुपचाप लौटकर उसी के पीछे जा खड़ा होता है जिसका बल था।

इस प्रसंग को बन्द करके जो एक चीज़ देर तक साथ चलती है वह हँसी है। राम इस पन्ने पर तीन बार हँसते हैं, और तीनों बार कोई न कोई डरा हुआ है। पहली बार तब, जब उनकी अपनी सेना चित्रलिखी-सी जड़ खड़ी है। दूसरी बार तब, जब सामने खड़ा आदमी काल के वश में पड़ा हुआ अपना परिचय दे रहा है। तीसरी बार तब, जब आकाश कटे हुए सिरों से भरा है और वानर भाग रहे हैं। और एक बार देवता हँसते हैं, उस आवाज़ पर, जो उसी क्षण एक स्त्री के हृदय को काँपा रही है। हँसी यहाँ दूरी नापने का पैमाना है, और मन्दोदरी की वह आधी पंक्ति छन्द के ठीक बीच में इसीलिये रखी गयी है, ताकि याद रहे कि वही आवाज़ किसी और दूरी पर खड़े आदमी को क्या दे रही है। इन सबके बीच एक हँसी और है, रावण की, ज्ञान सिखाये जाने पर, और वह इकलौती हँसी है जो समझ से नहीं, न समझ पाने से निकलती है।

और जो चित्र आख़िर में बचता है वह बहुत भरा हुआ है और बहुत बेकार है। आकाश से एक रथ उतरा है, तेज का पुञ्ज, जिसे एक सारथी हर्ष के साथ लाया था और जो कुछ ही देर में सौ बाण खाकर धरती पर पड़ा था। उसमें चार घोड़े जुते हैं जो बूढ़े नहीं होते, मरते नहीं, और मन जितनी तेज़ चलते हैं। और इस सारी सामग्री से एक ऐसे आदमी के चारों ओर चक्कर काटा जा रहा है जिसके सिर काटने से घटते नहीं, बढ़ते हैं। इस साज़-सामान से कुछ तय नहीं होता। जो तय होता है वह बहुत छोटी पंक्तियों में आता है, तुरग उठाइ, और तुरत बिभीषन पाछें मेला। घोड़े उठा लिये गये। विभीषण पीछे कर लिये गये। लङ्काकाण्ड का यह हिस्सा युद्ध का कुछ तय नहीं करता। वह जो तय करता है वह लड़ने वाले का स्वभाव है, और वह रुकावटों में तय होता है, वारों में नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ८९ से ९५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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