लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

सुवेल की रात, चन्द्रमा का दाग और अंगद का चलना

इस पृष्ठ पर

रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 3

समुद्र पार कर चुकी सेना एक पहाड़ की चोटी पर डेरा डालती है। युद्ध से पहले की उस रात राम अपने साथियों से पूछते हैं कि चन्द्रमा में जो कालापन दीखता है वह क्या है।

यह कथा युद्ध से ठीक पहले की एक रात की है, और इस रात युद्ध की कोई बात नहीं होती। समुद्र बँध चुका है, सेना पार है, लङ्का सामने दीख रही है। ऐसे समय व्यूह बँधने चाहिये, चौकियाँ बैठनी चाहिये, अगले दिन का आदेश निकलना चाहिये। इस रात इनमें से कुछ नहीं होता। जिनके कहने पर यह सेना समुद्र पार आयी है, वे एक पहाड़ की चोटी पर बैठकर आकाश की ओर देखते हैं। वे साथियों से पूछते हैं कि चन्द्रमा में जो कालापन है वह आख़िर है क्या।

यह कथा एक ही रात के दो डेरों के बीच आती-जाती है। एक ओर सुवेल की चोटी है, जहाँ पत्तों के आसन पर बैठकर बातचीत हो रही है। दूसरी ओर लङ्का की चोटी का महल है, जहाँ नाच-गाने का अखाड़ा जमा है। दोनों जगह आकाश की ओर देखा जाता है। एक जगह देखने से एक प्रश्न उठता है, दूसरी जगह से एक बाण चलता है। और उसी बाण के गिरने से वह बातचीत शुरू होती है जो एक स्त्री अपने पति से अपने शयनकक्ष में करती है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। सुवेल और अंगद का दूत बनकर जाना दोनों में है, पर चन्द्रमा के दाग पर हुई यह गोष्ठी, और मन्दोदरी के मुँह से कहा गया विश्वरूप, मानस के अपने हैं।

दो डेरों के लोग

  • राम सेना के स्वामी, जो युद्ध की पूर्वसंध्या पर पहले आकाश की ओर देखते हैं और फिर अपने साथियों की बुद्धि की ओर।
  • लक्ष्मण छोटे भाई, जो अपने हाथों से आसन बिछाते हैं और फिर कमर में तरकस कसे रात भर पीछे बैठे रहते हैं।
  • सुग्रीव वानरों के राजा, जिनकी गोद में इस रात राम का सिर है और जो चन्द्रमा के दाग का सीधा उत्तर देते हैं।
  • हनुमान जो सबके बाद बोलते हैं और जिनके उत्तर पर बात समाप्त हो जाती है।
  • विभीषण लङ्का छोड़कर आ मिले हुए, जिन्हें कथा यहाँ लङ्का का स्वामी कहती है। वे दक्षिण के उस उजाले को एक नज़र में पहचान लेते हैं जिसे बाक़ी सब बादल समझ रहे थे।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो इस रात चरणों के पास बैठे हैं और सुबह दूत बनकर शत्रु की सभा की ओर चल देते हैं।
  • जाम्बवान् बूढ़े मन्त्री, जिनकी एक वाक्य की सलाह पर पूरी सभा सहमत हो जाती है।
  • रावण लङ्का का राजा, जिसके सिर का छत्र और मुकुट इसी रात कटकर गिरते हैं और जो उस पर एक चतुर दलील बना लेता है।
  • मन्दोदरी रावण की पत्नी, जो इस प्रसंग की बड़ी बात कहती हैं और जिनकी बात पूरी तरह अनसुनी की जाती है।

सुवेल के शिखर पर

पिछला प्रसंग लङ्का के भीतर बन्द था। वहाँ मन्दोदरी ने पहली बार अपने पति को समझाया था और सुनी नहीं गयी थीं। सभा में प्रहस्त ने नीति की बात कही थी और झिड़क दिया गया था। सन्ध्या होते ही रावण अपनी बीसों भुजाएँ देखता हुआ महल की ओर चला गया था। अब एक शब्द से पूरा दृश्य बदल जाता है: इधर। कथा दीवार के भीतर से निकलकर खुले आकाश के नीचे आ जाती है, और पहला चित्र एक उतरती हुई सेना का है।

सुवेल एक पर्वत है और सेना उस पर बड़ी भीड़ में उतरती है, क्योंकि यह सजी हुई पंक्ति नहीं, अभी-अभी समुद्र पार करके आया एक रेला है। उस पर्वत का एक शिखर चुना जाता है: बहुत ऊँचा, इसलिये वहाँ से दीखता है। समतल, इसलिये वहाँ बैठा जा सकता है। उज्ज्वल, इसलिये रात में भी वहाँ अँधेरा नहीं।

इधर राम सेना की बड़ी भीड़ के साथ सुवेल पर्वत पर उतरे, और उन्होंने एक शिखर देखा, बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेष रूप से उज्ज्वल। कोई आदेश नहीं, कोई मोर्चा नहीं। एक जगह देखी गयी और पसन्द आ गयी, जैसे कोई यात्रा के बीच रुककर कहे कि आज की रात यहीं।

फिर एक घरेलू बात होती है। लक्ष्मण वृक्षों के कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथों से सजाकर बिछा देते हैं, और उन पर एक कोमल मृगछाला डाल देते हैं। जिस भाई के हाथ में अभी धनुष था, वही हाथ पत्ते बिछा रहा है। यह काम किसी सेवक से नहीं कराया गया। उसी आसन पर राम बैठ जाते हैं, और रात का चित्र बनना शुरू होता है।

राम ने सुग्रीव की गोद में अपना सिर रखा है। बायीं ओर धनुष है, दाहिनी ओर तरकस। दोनों हाथों से वे बाण सुधार रहे हैं, और विभीषण कान से लगकर सलाह कह रहे हैं। सिर मित्र की गोद में है, यानी विश्राम। धनुष और तरकस दोनों ओर, यानी तैयारी। हाथ बाण सीधे कर रहे हैं, यानी काम। और कान पर एक आवाज़, यानी मन्त्रणा। जो सो सकता था वह लेटा है, पर सोया नहीं।

बाण सुधारना सिपाही का रोज़ का काम है, जो युद्ध से पहले की रात हाथ को व्यस्त रखता है। और विभीषण को यहाँ लङ्का का स्वामी कहा गया है। लङ्का का स्वामी इस समय लङ्का के बाहर एक पहाड़ पर बैठा है। सामने अँधेरे में पड़े उसी नगर की भीतरी बात वह कान से लगकर कह रहा है।

चरणों के पास दो और लोग हैं। बड़भागी अंगद और हनुमान अनेक प्रकार से राम के चरण दबा रहे हैं। पीछे लक्ष्मण वीरासन में बैठे हैं, कमर में तरकस कसे और हाथ में धनुष-बाण लिये। वीरासन सोने का आसन नहीं, वह बैठक है जिसमें से एक क्षण में उठा जा सके। एक आदमी विश्राम कर रहा है और उसके चारों ओर चार लोग जागे हुए हैं, और उनमें से कोई पहरेदार नहीं है। सब अपने-आप वहाँ हैं।

इस प्रकार कृपा, रूप और गुणों के धाम राम विराजमान हैं, और वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इसी ध्यान में लौ लगाये रहते हैं। यहाँ कवि कथा से एक क़दम बाहर निकलते हैं। वे सेना का आकार या शत्रु का बल नहीं गिनाते। वे कहते हैं कि जिसने यह चित्र मन में बसा लिया, उसका काम हो गया। ध्यान के लिये यहाँ जो रूप दिया गया है, वह न सिंहासन पर है, न रथ पर। वह एक पहाड़ की चोटी पर पत्तों के आसन पर लेटा है, और उसके हाथ में एक टेढ़ा बाण है जिसे वह सीधा कर रहा है।

पूरब की ओर, एक उगा हुआ चन्द्रमा

और तभी राम पूरब की ओर देखते हैं। चन्द्रमा उदय हो चुका है। पहली बात किसी सेनापति की नहीं लगती। किसी ऐसे आदमी की लगती है जिसे कोई चीज़ अच्छी लगी हो और जो चाहता हो कि सब उसे देखें। वे सबसे कहते हैं, “चन्द्रमा को तो देखिये, यह कैसा सिंह के समान निडर है।” फिर वे उसी उपमा को खोलते हैं।

पूर्व दिशारूपी पर्वत की गुफा में रहनेवाला, प्रताप, तेज और बल की राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथी का मस्तक फाड़कर आकाशरूपी वन में निर्भय घूम रहा है। चन्द्रमा पूरब की गुफा से वैसे ही निकलता है जैसे सिंह साँझ को निकलता है। अँधेरा मतवाला हाथी है, और सिंह की मार उसके मस्तक पर पड़ती है। आकाश जंगल है, और उसमें उसे कोई रोकनेवाला नहीं।

यह उपमा इस रात के अनुकूल भी है। सामने एक नगर है जिसे लेना है, और ऊपर एक अकेला अन्धकार को चीरकर निकल रहा है। जो यह कह रहा है वह कल इसी काम पर निकलेगा, पर उसने यह अपने लिये नहीं कहा। बस ऊपर देखा और जो दीखा वह कह दिया।

फिर आकाश में बिखरे तारे मोती कहे जाते हैं, रात्रिरूपी सुन्दरी के शृंगार। रात एक सजी हुई स्त्री है और तारे उसके गहने। यहीं दृश्य छूट जाता है और एक प्रश्न उठता है, और वही प्रश्न सुवेल की इस गोष्ठी का मोड़ है।

राम ने कहा, “भाइयो, चन्द्रमा में जो कालापन है वह क्या है? अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहिये।” इस प्रश्न में दो चीज़ें हैं। पहली, सम्बोधन। सेना का स्वामी अपने साथियों को भाई कहकर बुला रहा है, और उनमें सुग्रीव हैं, हनुमान हैं, लङ्का से आये विभीषण हैं और बालि के पुत्र अंगद हैं। दूसरी, शर्त। जिसकी जितनी समझ हो उतनी कहे। किसी शास्त्र का प्रमाण नहीं माँगा गया, किसी की राय पहले से ठीक नहीं ठहरायी गयी।

चन्द्रमा में वह कालापन क्या है

एक सेना पड़ाव डाले है, कल जिस नगर पर चढ़ाई होनी है वह सामने है। सेनापति की शाम इस बात में जा रही है कि चन्द्रमा के धब्बे के बारे में उनके साथी क्या सोचते हैं। वे हर उत्तर सुनते हैं, किसी को काटते नहीं, और अन्त में अपना उत्तर भी उन्हीं में से एक की तरह रखते हैं।

सुग्रीव ने कहा, “राम, सुनिये, चन्द्रमा में पृथ्वी की छाया दीख रही है।” यह पहला उत्तर है और सबसे सीधा। सुग्रीव कोई कथा नहीं सुनाते, बस वह कारण बताते हैं जो आँख से समझ में आ सकता है, कि एक चीज़ के आगे दूसरी आ जाय तो छाया पड़ती है। कहनेवाले का नाम दर्ज है।

दूसरा उत्तर बिना नाम के आता है। किसी ने कहा कि राहु ने चन्द्रमा पर प्रहार किया था, और उसी चोट का काला दाग उसके हृदय पर रह गया। यह उत्तर पुराण से आया है। इसमें एक पुराना झगड़ा है, एक पुरानी मार, और एक निशान जो कभी नहीं गया। कथा कहनेवाले का नाम नहीं देती। उसकी बात दर्ज हो गयी, इतना काफ़ी था।

तीसरा उत्तर भी बिना नाम के है, और अनोखा है। कोई कहता है कि जब ब्रह्मा ने रति का मुख बनाया, तब चन्द्रमा का सार भाग निकाल लिया। मुख परम सुन्दर बन गया, पर चन्द्रमा के हृदय में एक छेद रह गया, और उसी छेद से आकाश की काली छाया भीतर दीखती है। यह कारीगर का उत्तर है। जो सुन्दर मुख बना, वह किसी और के भीतर से निकाली चीज़ से बना, और जिससे निकाली गयी उसमें ख़ाली जगह रह गयी।

तीन उत्तर आ चुके हैं, तीनों अलग ढंग के: पहला देखने से निकला, दूसरा कथा से, तीसरा कल्पना से। किसी को ग़लत नहीं कहा गया। यह नियम पूछनेवाले ने ही बाँधा था। अब चौथा उत्तर आता है, और वह पूछनेवाले का अपना है।

राम ने कहा, “विष चन्द्रमा का बहुत प्यारा भाई है, इसीलिये उसने उसे अपने हृदय में बसेरा दे रखा है। और विष से भरी अपनी किरणें फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है।” यह उत्तर बाक़ी तीनों से अलग जाति का है। बाक़ी तीन बताते हैं कि दाग कैसे बना। यह बताता है कि दाग करता क्या है। और जो वह करता है, वह इस समय इस पहाड़ पर एक व्यक्ति पर सबसे अधिक लागू होता है।

क्योंकि कहनेवाला स्वयं वियोगी है। जिसकी पत्नी उसी नगर में है जो सामने दीख रहा है, वही कह रहा है कि चाँदनी जलाती है। सभा चन्द्रमा की बात कर रही थी और उसने अपनी कह दी, पर अपना नाम नहीं लिया। नर-नारी कहा, सब कहा। दुख को सबका बनाकर कहना अपने दुख को ढकने का पुराना तरीक़ा है।

और सबसे बाद में हनुमान बोलते हैं।

हनुमान ने कहा, “प्रभु, सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी श्यामल मूर्ति उसके हृदय में बसती है, और वही श्यामता की झलक बाहर दीख रही है।” इस उत्तर के आते ही पूरी गोष्ठी पलट जाती है। अब तक सब यह बता रहे थे कि चन्द्रमा में कोई कमी है: किसी ने कहा उस पर छाया पड़ी है, किसी ने कहा उसे चोट लगी है। किसी ने कहा उसमें से कुछ निकाल लिया गया, और स्वयं राम ने कहा कि उसमें विष है। हनुमान कहते हैं कि उसमें कुछ घटा नहीं, कुछ रखा हुआ है।

और जो रखा है, वह पूछनेवाले का अपना रूप है। जिस धब्बे पर सारी शाम बात हुई, वह दूर से दाग है और पास से किसी का घर। यह उत्तर सेवक ही दे सकता था, क्योंकि वही जानता है कि हृदय में किसी को बसा लेने से हृदय काला नहीं होता। यह कहकर हनुमान चुप हो जाते हैं। पाँचवाँ उत्तर नहीं आता।

दक्षिण की ओर, एक और आकाश

हनुमान के वचन सुनकर राम हँस पड़ते हैं। यह हँसी किसी मज़ाक़ पर नहीं है। यह उसकी हँसी है जिसे उसके अपने सेवक ने उसी की बात में मात दे दी हो। उसी हँसी के साथ सिर घूम जाता है। पूरब से नज़र हटकर दक्षिण की ओर चली जाती है, और दक्षिण में लङ्का है।

राम विभीषण से कहते हैं, “दक्षिण दिशा की ओर देखिये, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली कैसी चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे स्वर में गरज रहा है। कहीं कठोर ओले न बरसें।” ऊपर से यह मौसम की बात है और सेनापति की सही चिन्ता, क्योंकि ओले पड़ें तो खुले में पड़ी सेना का क्या हाल होगा। पर इसमें शरारत भी है। जिसने अभी आकाश के हर टुकड़े को पहचान लिया था, उसे दक्षिण का यह उजाला पहचानने में कोई कठिनाई नहीं थी।

विभीषण बोले, “सुनिये, यह न बिजली है, न बादलों की घटा। लङ्का की चोटी पर एक महल है। रावण वहाँ अखाड़ा देख रहा है।” बाक़ी सबके लिये दक्षिण में एक रोशनी थी। विभीषण के लिये वह एक जानी-पहचानी छत थी। और वह अखाड़ा इस रात का नया नहीं है। सन्ध्या होते ही रावण उसी महल में जा बैठा था और किन्नर उसके गुण गाने लगे थे।

फिर वे एक-एक करके भ्रम खोलते हैं। जिसे बादलों की काली घटा समझा गया, वह रावण के सिर पर तना मेघडंबर छत्र है, इतना बड़ा और काला कि दूर से बादल ही लगे। जिसे बिजली की चमक समझा गया, वह मन्दोदरी के कानों के कर्णफूल हैं जो नाच के साथ हिल रहे हैं। मौसम की सारी सामग्री उतरकर एक आदमी के ठाट में बदल जाती है।

और जिसे मीठी गरज समझा गया, वह अनुपम ताल और मृदंग की आवाज़ है। यह कहकर विभीषण अपनी बात पूरी करते हैं, और राम को देवताओं का सम्राट् कहकर सम्बोधित करते हैं। इसके बाद जो होता है वह पल भर में हो जाता है, और उसमें कोई क्रोध नहीं। रावण का अभिमान समझकर राम मुसकराये, धनुष चढ़ाया, और उस पर बाण चढ़ा दिया। मुसकराना और धनुष चढ़ाना एक ही साँस में होते हैं।

एक बाण, और सबके देखते हुए

एक ही बाण से छत्र, मुकुट और कर्णफूल काट गिराये गये। सबके देखते-देखते वे ज़मीन पर आ पड़े, और इसका भेद किसी ने नहीं जाना। तीनों चीज़ें चुनी हुई थीं। छत्र राजा होने का चिह्न है, मुकुट सिर पर होने का, और कर्णफूल सुहाग का, जो पत्नी पहनती है। बाण किसी को छूता नहीं। वह सिर्फ़ वह उतार देता है जो सिर के ऊपर सजा था।

और फिर वह लौट आता है: ऐसा कौतुक करके बाण वापस आकर तरकस में जा घुसा। बाण वहीं पड़ा रहता तो कोई उसे उठाकर जान जाता कि यह किधर से आया। उसके लौट जाने से कोई प्रमाण नहीं बचा। सजे हुए रंग में भारी भंग पड़ गया, और रावण की सारी सभा डर गयी।

न भूकम्प हुआ, न आँधी चली, न किसी ने कोई अस्त्र-शस्त्र आँख से देखा। तीन कारण जाँचे गये और तीनों ख़ारिज हो गये, और सब अपने-अपने हृदय में सोचने लगे कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ है। किसी ने नहीं सोचा कि यह बाण था। जो सामने बैठा है, उसे उन्होंने अभी शत्रु भी नहीं माना था।

सभा का डर रावण से छिपा नहीं रहता। वह हँसकर एक युक्ति बना लेता है: “जिसके लिये सिरों का गिरना भी सदा शुभ होता रहा, उसके लिये मुकुट का गिरना अपशकुन कैसा?” दलील चतुर है और सुनने में ठीक लगती है, और यही इसका ख़तरा है। पुरानी बात को वह ढाल की तरह सामने कर देता है, और सभा को तसल्ली हो भी जाती है।

फिर वह सबको अपने-अपने घर जाकर सो जाने को कहता है, और सब सिर नवाकर चले जाते हैं। एक व्यक्ति के मन से बात नहीं जाती। जिस क्षण कर्णफूल पृथ्वी पर गिरा, उसी क्षण से मन्दोदरी के हृदय में सोच बैठ गया। सारी सभा में वही अकेली हैं जिनका अपना कुछ गिरा है, और वही समझती हैं कि जो गिरा वह गहना नहीं था।

नेत्रों में जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वे अपने पति से कहती हैं, “प्राणनाथ, मेरी विनती सुनिये। राम से विरोध छोड़ दीजिये, और उन्हें मनुष्य जानकर मन में हठ न पकड़े रहिये।” विनती में दो टुकड़े हैं। पहला अनुरोध है, विरोध छोड़ दीजिये। दूसरा कारण है, जो एक ग़लतफ़हमी की ओर उँगली उठाता है, कि आप उन्हें आदमी समझ बैठे हैं। उनकी अगली सारी बात यहीं से उठती है, क्योंकि अब उन्हें बताना है कि राम कौन हैं।

मन्दोदरी का विश्वरूप

मन्दोदरी कहती हैं, “मेरे वचनों पर विश्वास कीजिये कि राम विश्वरूप हैं, और वेद उनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं।” इसके बाद एक विराट् वर्णन आता है, किसी ऋषि के मुख से या किसी देवसभा में नहीं, एक स्त्री के मुख से। वह रात में अपने पति को समझा रही है, और उसका उद्देश्य उपदेश नहीं, अपना घर बचाना है। यह उनकी पहली कोशिश भी नहीं है। पहले भी वे हाथ जोड़कर यही कह चुकी हैं।

वर्णन नीचे से शुरू होता है। पाताल उनके चरण हैं, ब्रह्मलोक सिर, और बीच के सब लोक उनके अंगों पर टिके हैं। भौंहों का चलना भयंकर काल है, आँखें सूर्य, और केश बादलों की माला। जो शरीर बन रहा है, वह वही है जिसे उनका पति कल तक एक वनवासी राजकुमार समझता रहा है।

नासिका अश्विनीकुमार हैं। रात और दिन उनके अपार निमेष, पलक का गिरना और उठना। दसों दिशाएँ कान, ऐसा वेद कहते हैं। वायु श्वास और वेद उनकी अपनी वाणी। मनुष्य का एक पूरा दिन, जिसमें उसका सारा सुख-दुख समा जाता है, उस शरीर में पलक के एक बार झपकने जितना है।

फिर वे चीज़ें आती हैं जो सुन्दर नहीं हैं। लोभ उनका होठ है, यमराज भयानक दाँत, माया हँसी, दिक्पाल भुजाएँ, अग्नि मुख और वरुण जीभ। उत्पत्ति, पालन और प्रलय उनकी चेष्टा। जिन चीज़ों पर मनुष्य को गर्व है, वे भी उसी एक शरीर के भीतर की कोई छोटी क्रिया हैं, और लोभ उनमें से एक है।

अन्त में वर्णन पृथ्वी पर उतरता है: अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ रोमावली, पर्वत अस्थियाँ, नदियाँ नसों का जाल, समुद्र पेट, और नरक नीचे की इन्द्रियाँ। फिर वे बात समेट देती हैं: “इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं। अधिक कल्पना क्या की जाय।” जो समुद्र इस समय दोनों डेरों के बीच पड़ा है, इस वर्णन में वह किसी के पेट भर की जगह है।

शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि, चन्द्रमा मन और महान् अर्थात् विष्णु चित्त, उन्हीं चराचररूप भगवान् ने मनुष्य के रूप में निवास किया है। इतना बड़ा शरीर खड़ा करने के बाद मन्दोदरी उसे एक आदमी पर लाकर रख देती हैं, जो इस समय एक पहाड़ पर पत्तों के आसन पर बैठा है। और चन्द्रमा फिर आता है। कुछ घड़ी पहले सुवेल पर उसी के दाग की बात हो रही थी। यहाँ लङ्का के महल में वह किसी का मन गिनाया जा रहा है।

और इसके तुरन्त बाद वे अपनी असली बात पर आ जाती हैं: “प्राणपति, सुनिये, ऐसा विचार करके उनसे वैर छोड़िये। और राम के चरणों में प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय।” इतना बड़ा दर्शन जिस वाक्य पर आकर रुकता है, वह एक पत्नी का सादा डर है। सारे लोक, सारे वेद, सारे देवता गिनाने के बाद माँगा यह जा रहा है कि उनका पति जीता रहे।

तत्त्व की यह साफ़ बात उस कमरे में कही गयी है जहाँ उसे सुननेवाला एक ही है, और वही नहीं सुनेगा। लङ्का में जो ठीक जानती है, उसी की बात का वहाँ सबसे कम मोल है।

बेत और बादल

पत्नी के वचन सुनकर रावण ज़ोर से हँसता है, और उसकी पहली बात विचित्र रूप से सही है: “अहो, मोह की महिमा बड़ी बलवान् है!” जो बात वह अपनी पत्नी पर चस्पाँ कर रहा है, वह ठीक उसी पर लागू होती है जो कह रहा है। सही वाक्य ग़लत आदमी के मुँह से निकलकर ग़लत दिशा में फेंका जा रहा है।

फिर वह आठ अवगुण गिनाता है जो लोग स्त्री-स्वभाव के बारे में कहते आये हैं: साहस, झूठ, चंचलता, छल, भय, अविवेक, अपवित्रता और निर्दयता। यह रावण कहता है, और साथ में यह भी कि ऐसा सब कहते हैं। कहनेवाला वह आदमी है जो किसी और की पत्नी उठा लाया है और अपनी पत्नी से कह रहा है कि स्त्रियों में भय और अविवेक होता है।

आगे वह कहता है, “आपने शत्रु का समग्र रूप गाकर मुझे बड़ा भारी भय सुनाया। प्रिये, वह सब तो स्वभाव से ही मेरे वश में है। आपकी कृपा से यह अब मेरी समझ में आया।” जो वर्णन उसे झुकाने के लिये किया गया था, उसी को उसने अपने सिर पर सजा लिया। जितना बड़ा विश्वरूप गिनाया गया, उतना ही बड़ा वह अपने को मानने लगा।

फिर वह पत्नी की चतुराई का श्रेय उन्हें लौटा देता है: “प्रिये, आपकी चतुराई मैं जान गया। आप इसी बहाने मेरी प्रभुता का बखान कर रही हैं।” जो डर से कहा गया था, उसे उसने प्रशंसा मान लिया। और बात एक मीठे वाक्य में बदल जाती है: “आपकी बातें बड़ी गूढ़ हैं। समझने पर सुख देती हैं और सुनने पर भय छुड़ा देती हैं।”

यहीं मन्दोदरी हार मान लेती हैं। उनके मन का निर्णय छोटा है: उन्होंने मन में तय कर लिया कि पति को काल के वश होकर मतिभ्रम हो गया है। कुंजी शब्द कालवश है। वह पागल नहीं हुआ, मूर्ख भी नहीं। उसकी बुद्धि उसी दिशा में चलने लगी है जिधर उसका अन्त है, और बुद्धि का यह मुड़ना बाहर से चतुराई जैसा ही दीखता है।

इस प्रकार बहुत-से विनोद करते-करते रावण की रात बीत जाती है। सबेरा होते ही स्वभाव से निडर और घमंड से अंधा रावण अपनी सभा में चला जाता है। उसी रात का दूसरा डेरा भी सो चुका है, और वहाँ भी सबेरा होनेवाला है। दोनों जगह एक ही सूरज निकलेगा। इसी सन्धि पर कवि कथा नहीं कहते, बस एक बात कहते हैं।

यद्यपि बादल अमृत जैसा जल बरसाते हैं, तो भी बेत में फूल और फल नहीं आते। इसी तरह ब्रह्मा के समान गुरु मिल जायँ, तो भी मूर्ख के हृदय में चेत नहीं आता। बेत पर यह दोष नहीं लगाया गया कि वह बादल का अपमान कर रहा है। बात शान्त है, और इसीलिये कठोर। कुछ चीज़ें पानी लेती ही नहीं। रात भर जो अमृत बरसा, वह मन्दोदरी के वचन थे, और उस पर एक कली नहीं फूटी।

प्रात, और दूत का चुनाव

अब कथा उसी शब्द से लौटती है जिससे सुवेल की रात शुरू हुई थी। इधर सुवेल पर्वत पर प्रातःकाल राम जागे और सब मन्त्रियों को बुलाकर सलाह पूछी, “शीघ्र बताइये, अब क्या उपाय किया जाय?” रात की गोष्ठी सुबह होते ही मन्त्रणा में बदल जाती है, और यह उसी आदमी का दूसरा रूप है।

दूसरे डेरे से अन्तर पूछने के ढंग में ही खुल जाता है। लङ्का में सभा इसलिये जुड़ी थी कि राजा ने जो तय कर लिया है उसे सुन ले। यहाँ सभा इसलिये बुलायी गयी है कि वह बताये कि क्या करना चाहिये। पहला उत्तर बूढ़े जाम्बवान् का आता है, जो चरणों में सिर नवाकर बोलते हैं।

जाम्बवान् राम को सर्वज्ञ और सबके हृदय में बसनेवाला कहकर सम्बोधित करते हैं। फिर वे कहते हैं, “मैं अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार को दूत बनाकर भेजा जाय।” पहले वे मानते हैं कि सामनेवाला सब जानता है। फिर कहते हैं कि वे अपनी बुद्धि के अनुसार कह रहे हैं। जो सब जानता है, उससे भी सलाह इसी ढंग से कही जाती है, पूरे मन से और अपनी सीमा जानते हुए।

यह सलाह सबके मन में जँच जाती है। राम अंगद से कहते हैं, “बुद्धि, बल और गुणों के धाम बालिपुत्र, तात, मेरे काम के लिये लङ्का जाइये।” यही अंगद रात भर उन चरणों के पास बैठा उन्हें दबाता रहा था, और कथा ने उसे वहीं बड़भागी कहा था। रात में वह सबसे पास था, सुबह सबसे दूर भेजा जा रहा है। और उसे यहाँ हर बार पिता के नाम से बुलाया गया है, बालिकुमार और बालिपुत्र।

हिदायत और भी अनोखी है। राम कहते हैं, “आपको बहुत समझाकर क्या कहूँ। मैं जानता हूँ कि आप परम चतुर हैं।” दूत को सन्देश शब्दशः नहीं पकड़ाया गया। उस पर भरोसा किया गया। फिर एक वाक्य में वह कसौटी दे दी जाती है। उसी पर उसे अपनी सारी बातचीत तौलनी है: “शत्रु से वही बातचीत कीजिये जिससे हमारा काम हो और उसका हित हो।”

जिसके पास दूत जा रहा है उसे शत्रु कहा गया है, और उसी वाक्य में उसका हित भी माँगा गया है। यह न कूटनीति की चाल है, न नरमी। यह युद्ध के दरवाज़े पर लगायी गयी शर्त है। अगला पूरा प्रसंग इसी की परीक्षा है, क्योंकि वहाँ अंगद को वह सब सुनना पड़ेगा जिसे सुनकर भूल जाना एक जवान आदमी के लिये कठिन होता है।

राम की आज्ञा सिर पर चढ़ाकर और चरणों की वन्दना करके अंगद उठ खड़े होते हैं। वे कहते हैं, “आप जिस पर कृपा करें, वही गुणों का समुद्र हो जाता है।” यह वाक्य विनय का है, पर इसमें विनय से अधिक भी है। युवराज यह मान रहा है कि जो योग्यता उसमें अभी गिनायी गयी, बुद्धि, बल और गुण, वह उसकी अपनी कमाई नहीं है।

और मन में वह सोचता है कि स्वामी के सब काम तो अपने-आप सिद्ध हैं। यह तो उसे आदर दिया गया है। इसी विचार से उसका हृदय हर्षित हो जाता है और शरीर पुलकित। प्रसंग यहीं पूरा होता है, एक आदमी के उठ खड़े होने पर, जिसे भेजा जा रहा है और जो जाने में आदर देख रहा है।

किसने किसको जगह दी

एक ही समय में दो रातें चलती हैं। सुवेल की चोटी पर आकाश देखने से एक प्रश्न उठता है, जो सबके सामने रख दिया जाता है। लङ्का की चोटी पर आकाश देखने का अवसर ही नहीं आता, क्योंकि वहाँ छत पर चँदोवा तना है और नीचे नाच हो रहा है। एक जगह लोग बाहर बैठे ऊपर देख रहे हैं, दूसरी जगह भीतर बैठे सामने। आगे जो होना है, उसका बीज इसी अन्तर में है।

चन्द्रमा वाली गोष्ठी में जितने बोले, सबकी बात सुनी गयी और किसी को ग़लत नहीं कहा गया। लङ्का के महल में जो एक स्त्री बोली, उसकी बात पर हँसी आयी और उसे बहाना कह दिया गया। दोनों जगह परीक्षा एक ही चीज़ की थी, कि दूसरे की बात के लिये कितनी जगह बची है। जिस डेरे में वह जगह बची थी, वहाँ सुबह सलाह पूछी गयी। जिसमें नहीं बची, वहाँ सुबह सिर्फ़ आदेश निकला।

और पूरी रात एक काम बार-बार होता रहा: किसी के हृदय में किसी का बसना। हनुमान कहते हैं कि चन्द्रमा के हृदय में राम की मूर्ति बसी है। राम कहते हैं कि चन्द्रमा ने विष को अपने हृदय में बसेरा दे रखा है। मन्दोदरी के हृदय में उसी क्षण से सोच बस जाता है जब उनका कर्णफूल गिरता है। और कवि उन मनुष्यों को धन्य कहते हैं जो उस एक चित्र में लौ लगाये रहते हैं। हृदय में कुछ न कुछ तो बसता ही है। इस रात का सारा भेद इतना है कि किसने किसको भीतर जगह दी।

इस रात कथा जल्दी में नहीं है। इस पूरी रात एक भी तीर युद्ध के लिये नहीं चला। जो एक बाण चला, वह किसी को मारने नहीं गया। एक छत्र, एक मुकुट और एक कर्णफूल उतारकर लौट आया।

अन्त में वही चित्र बचता है जिससे यह रात शुरू हुई थी: एक पहाड़ की चोटी, पत्तों और फूलों का आसन जिसे एक भाई ने अपने हाथ से बिछाया। एक मित्र की गोद, दो हाथ जो टेढ़े बाण सीधे कर रहे हैं, और चारों ओर वे लोग जो यहीं हैं। कल इस चोटी से जो उतरेगा वह युद्ध में जायेगा। आज की रात उसने सिर्फ़ इतना किया कि सबसे पूछा कि चाँद में यह जो कालापन है, आपको क्या लगता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 11 से 17, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।