रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · सुवेल की रात, चन्द्रमा का दाग और अंगद का चलना
सुवेल की रात, चन्द्रमा का दाग और अंगद का चलना
समुद्र पार कर चुकी सेना एक पहाड़ की चोटी पर डेरा डालती है, और युद्ध से पहले की उस रात सेनापति अपने साथियों से पूछते हैं कि चन्द्रमा में जो कालापन दीखता है वह क्या है।
यह पन्ना युद्ध से ठीक पहले की एक रात का है, और इस रात में युद्ध की कोई बात नहीं होती। समुद्र बँध चुका है, सेना पार उतर चुकी है, लङ्का सामने खड़ी दीख रही है। ऐसे समय में जो किया जाना चाहिये वह हर सिपाही जानता है। व्यूह बँधे, चौकियाँ बैठें, अगले दिन का आदेश निकले, और सब जल्दी सो जायँ। इस पन्ने पर इनमें से कुछ नहीं होता। जिनके कहने पर यह सारी सेना समुद्र पार आयी है, वे एक पहाड़ की चोटी पर बैठ जाते हैं, आकाश की ओर देखते हैं, और अपने साथियों से पूछते हैं कि चन्द्रमा में जो कालापन है वह आख़िर है क्या।
दोहा ग्यारह से सत्रह तक की यह कथा दो डेरों के बीच आती-जाती रहती है, और दोनों डेरे एक ही रात में हैं। एक ओर सुवेल की चोटी है, जहाँ पत्तों के आसन पर बैठकर बातचीत हो रही है। दूसरी ओर लङ्का की चोटी का महल है, जहाँ नाच-गाने का अखाड़ा जमा हुआ है। दोनों जगह आकाश की ओर देखा जाता है। एक जगह देखने से एक प्रश्न उठता है, दूसरी जगह देखने से एक बाण चलता है। और उसी बाण के गिरने से वह बातचीत शुरू होती है जो इस काण्ड की सबसे ऊँची बातचीत है, और जो एक स्त्री अपने पति से अपने ही शयनकक्ष में करती है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में सुवेल है, दोनों में अंगद दूत बनकर जाता है, पर चन्द्रमा के दाग पर हुई यह गोष्ठी तुलसी की अपनी है, और मन्दोदरी के मुँह से कहलवाया गया विश्वरूप भी उन्हीं का है। इस पन्ने पर जो कुछ है, वह इसी अवधी पाठ से लिया गया है और कहीं से नहीं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम सेना के स्वामी, जो युद्ध की पूर्वसंध्या पर पहले आकाश की ओर देखते हैं और फिर अपने साथियों की बुद्धि की ओर।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो अपने हाथों से आसन बिछाते हैं और फिर कमर में तरकस कसे रातभर पीछे बैठे रहते हैं।
- सुग्रीव वानरराज, जिनकी गोद में इस रात प्रभु का सिर है और जो चन्द्रमा के दाग का सबसे सीधा उत्तर देते हैं।
- हनुमान पवनपुत्र, जो सबके बाद बोलते हैं और जिनके उत्तर पर बात समाप्त हो जाती है।
- विभीषण लङ्का छोड़कर आ मिले हुए, जिन्हें तुलसी यहाँ लंकेस कहते हैं, और जो दक्षिण दिशा के उस उजाले को एक ही नज़र में पहचान लेते हैं जिसे बाक़ी सब बादल समझ रहे थे।
- अंगद बालि के पुत्र, जो इस रात चरणों के पास बैठे हैं और सुबह दूत बनकर शत्रु की सभा की ओर चल देते हैं।
- जाम्बवान् सबसे पुराने मन्त्री, जिनकी एक पंक्ति की सलाह पर पूरी सभा सहमत हो जाती है।
- रावण लङ्कापति, जिसके सिर का छत्र और मुकुट इसी रात कट कर गिरते हैं और जो उस पर एक चतुर दलील बना लेता है।
- मन्दोदरी रावण की पत्नी, जो इस पूरे काण्ड की सबसे बड़ी बात कहती है और जिसकी बात सबसे पूरी तरह अनसुनी की जाती है।
सुवेल के शिखर पर
पिछला प्रसंग लङ्का के भीतर बन्द था। वहाँ मन्दोदरी ने पहली बार अपने पति को समझाया था और सुनी नहीं गयी थी, मन्त्रियों की सभा में प्रहस्त ने नीति की बात कही थी और झिड़क दिया गया था, और सन्ध्या होते ही लङ्कापति अपनी बीसों भुजाएँ देखता हुआ महल की ओर चला गया था। अब तुलसी एक ही शब्द से पूरा दृश्य बदल देते हैं। इहाँ, यानी इधर। कथा एक दीवार के भीतर से निकलकर खुले आकाश के नीचे आ जाती है, और जो पहला चित्र मिलता है वह एक उतरती हुई सेना का है।
सुवेल एक पर्वत है और सेना उस पर उतरती है। तुलसी भीड़ शब्द लगाते हैं, अति भीरा, क्योंकि जो उतर रही है वह सजी हुई पंक्ति नहीं है, वह लाखों का एक रेला है जो अभी-अभी समुद्र पार करके आया है। और उस पूरे पर्वत में से एक शिखर चुना जाता है। वह चुनाव तीन-चार विशेषणों में बताया जाता है और हर विशेषण का अपना काम है। वह बहुत ऊँचा है, इसलिये वहाँ से दीखता है। वह समतल है, इसलिये वहाँ बैठा जा सकता है। वह उज्ज्वल है, इसलिये रात में भी वहाँ अँधेरा नहीं होगा।
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा । उतरे सेन सहित अति भीरा॥
चौपाई १
सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥
इधर श्रीरघुवीर सेना की बड़ी भीड़ के साथ सुवेल पर्वत पर उतरे। उन्होंने एक शिखर देखा, बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेष रूप से उज्ज्वल। ध्यान देने की बात यह है कि यह पूरी चौपाई देखने की क्रिया पर टिकी है। कोई आदेश नहीं दिया गया, कोई मोर्चा नहीं बाँधा गया। एक जगह देखी गयी और पसन्द आ गयी, जैसे कोई यात्रा के बीच रुककर कहे कि आज की रात यहीं।
और फिर वह होता है जो इस पन्ने की सबसे घरेलू बात है। लक्ष्मण वृक्षों के कोमल पत्ते और सुन्दर फूल लाकर अपने हाथों से सजाकर बिछा देते हैं, और उसके ऊपर एक कोमल मृगछाला डाल देते हैं। जिस भाई के हाथ में अभी-अभी धनुष था, वही हाथ पत्ते बिछा रहा है। तुलसी निज हाथ कहकर यह बात दो शब्दों में तय कर देते हैं कि यह काम किसी सेवक से नहीं कराया गया। उसी आसन पर कृपालु बैठ जाते हैं, और रात का चित्र बनना शुरू होता है।
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥
चौपाई २
दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥
प्रभु ने वानरराज सुग्रीव की गोद में अपना सिर रखा हुआ है। बायीं ओर धनुष है, दाहिनी ओर तरकस। दोनों कर-कमलों से वे बाण सुधार रहे हैं, और विभीषण कान से लगकर सलाह कह रहे हैं। इस एक चौपाई में एक साथ चार चीज़ें चल रही हैं और चारों अलग-अलग दुनिया की हैं। सिर मित्र की गोद में है, यानी विश्राम। धनुष और तरकस दोनों ओर हैं, यानी तैयारी। हाथ बाण सीधे कर रहे हैं, यानी काम। और कान पर एक आवाज़ है, यानी मन्त्रणा। जो आदमी सो सकता था वह लेटा हुआ है, पर सोया नहीं है।
सुधारत बाना पर एक क्षण रुकना चाहिये। बाण सुधारना बड़ा काम नहीं है, वह सिपाही का रोज़ का काम है। पंख ठीक करना, सीध देखना, नोक परखना। युद्ध से पहले की रात में यही वह काम है जो हाथ को व्यस्त रखता है और मन को खाली। और जिस विभीषण को तुलसी यहाँ लंकेस कहकर बुलाते हैं, वह नाम अपने-आप में एक पूरी बात है। लङ्का का स्वामी इस समय लङ्का के बाहर एक पहाड़ पर बैठा है, और उसी नगर की भीतरी बात कान से लगकर कह रहा है जो सामने अन्धेरे में पड़ा हुआ है।
चित्र यहीं पूरा नहीं होता। चरणों के पास दो और लोग हैं। परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान अनेकों प्रकार से चरणकमल दबा रहे हैं, और पीछे लक्ष्मण वीरासन लगाये बैठे हैं, कमर में तरकस कसे हुए और हाथ में धनुष-बाण लिये हुए। वीरासन का अर्थ सोने का आसन नहीं है, वह वह बैठक है जिसमें से एक क्षण में उठा जा सके। यानी एक आदमी विश्राम कर रहा है और उसके चारों ओर चार लोग जागे हुए हैं, और उनमें से कोई भी पहरेदार नहीं है। सब अपने-आप वहाँ हैं।
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
दोहा ११ (क)
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन॥ ११ (क)॥
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक॥ ११ (ख)॥
इस प्रकार कृपा, रूप और गुणों के धाम श्रीराम विराजमान हैं, और वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इसी ध्यान में लौ लगाये रहते हैं। यहाँ तुलसी कथा से एक क़दम बाहर निकल आते हैं। वे यह नहीं कहते कि यह देखिये कि सेना कितनी बड़ी है या शत्रु कितना प्रबल। वे कहते हैं कि जिसने यह चित्र मन में बसा लिया उसका काम हो गया। पूरे लङ्काकाण्ड में ध्यान के लिये जो एक रूप सुझाया गया है वह न सिंहासन पर बैठा है, न रथ पर। वह एक पहाड़ की चोटी पर पत्तों के आसन पर लेटा हुआ है और उसके हाथ में एक टेढ़ा बाण है जिसे वह सीधा कर रहा है।
सार: सेना सुवेल पर्वत पर उतरती है और एक ऊँचा, समतल, उज्ज्वल शिखर चुना जाता है। लक्ष्मण अपने हाथों से पत्तों और फूलों का आसन बिछाते हैं। राम सुग्रीव की गोद में सिर रखे बाण सुधार रहे हैं, विभीषण कान में सलाह कह रहे हैं, अंगद और हनुमान चरण दबा रहे हैं, लक्ष्मण पीछे वीरासन में हैं। तुलसी इसी चित्र को ध्यान के योग्य बताकर रुकते हैं।
पूरब की ओर, एक उगा हुआ चन्द्रमा
और तभी वे पूरब की ओर देखते हैं। चन्द्रमा उदय हो चुका है। जो पहली बात कही जाती है वह किसी सेनापति की नहीं लगती, किसी ऐसे आदमी की लगती है जिसे कोई चीज़ अच्छी लगी हो और जो चाहता हो कि सब उसे देखें। सबसे कहा जाता है कि चन्द्रमा को तो देखो, यह कैसा निडर है, ठीक जंगल के राजा जैसा। सिंह की यह उपमा दोहे में ही रख दी जाती है, और उसके बाद की चौपाइयाँ उसी उपमा को खोलती चली जाती हैं।
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥
चौपाई ३
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी । ससि केसरी गगन बन चारी॥
पूर्व दिशारूपी पर्वत की गुफा में रहनेवाला, प्रताप, तेज और बल की राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथी के मस्तक को फाड़कर आकाशरूपी वन में निर्भय घूम रहा है। चित्र को टुकड़ों में देखिये। पूरब का क्षितिज एक पहाड़ है और उसमें एक गुफा है, और चन्द्रमा वहीं से निकलता है, जैसे सिंह दिनभर सोकर साँझ को निकलता है। अँधेरा एक मतवाला हाथी है। हाथी के माथे पर जो दो उभार होते हैं उन्हें कुम्भ कहते हैं, और सिंह की मार वहीं पड़ती है। आकाश जंगल है, और उसमें कोई उसे रोकनेवाला नहीं है।
यह उपमा जितनी सुन्दर है उतनी ही इस रात के अनुकूल भी है। सामने एक नगर है जिसे लेना है, बीच में समुद्र है जिसे लाँघ लिया गया है, और ऊपर आकाश में हर रात एक अकेला निकलता है और अन्धकार को चीरकर निकल जाता है। जो आदमी यह कह रहा है वह कल इसी काम पर निकलेगा। पर उसने यह बात अपने लिये नहीं कही है। उसने बस ऊपर देखा और जो दीखा वह कह दिया, और उसी में सारा ब्योरा आ गया।
इसके बाद तुलसी आकाश में बिखरे हुए तारों को मोती कहते हैं और उन मोतियों को रात्रिरूपी सुन्दरी का शृंगार बताते हैं। रात एक सजी हुई स्त्री है और तारे उसके गहने हैं। यह कहकर वे दृश्य को वहाँ छोड़ देते हैं और एक प्रश्न उठा देते हैं, और प्रश्न इस पन्ने का असली मोड़ है।
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई॥
चौपाई ४
प्रभु ने कहा, भाइयो, चन्द्रमा में जो कालापन है वह क्या है, अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहो। इस एक पंक्ति में दो चीज़ें रखी हुई हैं जिन्हें अलग-अलग देखना चाहिये। पहली, सम्बोधन। सेना का स्वामी अपने साथियों को भाई कहकर बुला रहा है, और उनमें एक वानरराज है, एक पवनपुत्र है, एक लङ्का से चलकर आया हुआ आदमी है और एक बालि का पुत्र है। दूसरी, शर्त। निज निज मति, यानी जिसकी जितनी समझ हो उतनी कहे। किसी शास्त्र का प्रमाण नहीं माँगा गया, किसी की राय को पहले से ठीक नहीं ठहराया गया।
सार: पूरब में चन्द्रमा उगता है और राम सबको उसे दिखाते हैं, कहते हैं कि यह सिंह के समान निडर है। चौपाई में वह उपमा खुलती है, पूरब की गुफा से निकला सिंह अन्धकाररूपी हाथी का कुम्भ फाड़कर आकाशरूपी वन में घूम रहा है। तारे रात्रि के शृंगार के मोती हैं। और फिर प्रश्न उठता है कि चन्द्रमा का कालापन क्या है, जिसे सब अपनी-अपनी बुद्धि से कहें।
चन्द्रमा में वह कालापन क्या है
युद्ध की पूर्वसंध्या पर पूछे गये इस प्रश्न को जल्दी में पढ़ जाना आसान है, और उसी जल्दी में इस पन्ने की सबसे असाधारण बात छूट जाती है। यहाँ एक सेना पड़ाव डाले हुए है, कल सुबह जिस नगर पर चढ़ाई होनी है वह दीखने की दूरी पर है, और सेनापति की सारी शाम इस बात में जा रही है कि चन्द्रमा पर जो धब्बा है उसके बारे में उनके साथी क्या सोचते हैं। और वे पूछकर छोड़ नहीं देते। वे हर उत्तर सुनते हैं, किसी को काटते नहीं, और अन्त में अपना उत्तर भी उन्हीं उत्तरों में एक के रूप में रखते हैं।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई॥
चौपाई ५
मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महँ परी स्यामता सोई॥
सुग्रीव ने कहा, हे रघुनाथजी, सुनिये, चन्द्रमा में पृथ्वी की छाया दीख रही है। यह पहला उत्तर है और सबसे सीधा है। वानरराज कोई कथा नहीं सुनाते, वे बस एक कारण बताते हैं, और कारण वही है जो आँख से समझ में आ सकता है, कि एक चीज़ के आगे दूसरी चीज़ आ जाये तो छाया पड़ती है। किसने कहा, तुलसी बता देते हैं। किसका उत्तर है, दर्ज़ हो जाता है।
दूसरा उत्तर बिना नाम के आता है। कह कोई, किसी ने कहा। राहु ने चन्द्रमा पर प्रहार किया था, और वही चोट का काला दाग उसके हृदय पर पड़ा हुआ रह गया। यह उत्तर पुराण से उठाया गया है और इसमें एक पुराना झगड़ा है, एक पुरानी मार है, और एक निशान है जो कभी नहीं गया। तुलसी कहनेवाले का नाम नहीं देते, और यह छोड़ना अपने-आप में एक बात कह जाता है। सभा में जो बोला उसका नाम ज़रूरी नहीं था, उसकी बात दर्ज़ हो गयी, इतना काफ़ी था।
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥
चौपाई ६
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥
तीसरा उत्तर भी बिना नाम के है, और सबसे अनोखा है। कोई कहता है कि जब ब्रह्मा ने रति का मुख बनाया, तब उन्होंने उसके लिये चन्द्रमा का सार भाग निकाल लिया। मुख तो परम सुन्दर बन गया, पर चन्द्रमा के हृदय में एक छेद रह गया, और उसी छेद की राह से आकाश की काली छाया भीतर दीखती है। यह जवाब कारीगर का जवाब है। इसमें सुन्दरता की एक क़ीमत मानी गयी है, कि जो सबसे सुन्दर मुख बना वह किसी और के भीतर से निकाली गयी चीज़ से बना, और जिससे निकाली गयी उसमें एक ख़ाली जगह रह गयी।
तीन उत्तर आ चुके हैं और तीनों अलग ढंग के हैं। पहला देखने से निकला है, दूसरा कथा से, तीसरा कल्पना से। किसी को ग़लत नहीं कहा गया। यह इस गोष्ठी का नियम है और यह नियम पूछनेवाले ने ही बाँधा था जब उसने कहा था कि अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहो। अब चौथा उत्तर आता है, और वह पूछनेवाले का अपना है।
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥
चौपाई ७
बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत बिरहवंत नर नारी॥
प्रभु ने कहा, विष चन्द्रमा का बहुत प्यारा भाई है, इसीलिये उसने उसे अपने हृदय में बसेरा दे रखा है, और विष से भरे अपने किरणसमूह को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है। यह उत्तर बाक़ी तीनों से अलग जाति का है। बाक़ी तीन बताते हैं कि दाग कैसे बना। यह बताता है कि वह दाग करता क्या है। और जो वह करता है, वह इस समय इस पहाड़ पर सबसे अधिक किसी एक व्यक्ति पर लागू होता है।
क्योंकि यह कहनेवाला स्वयं वियोगी है। जिसकी पत्नी उसी नगर में है जो सामने दीख रहा है, और जिसे लौटा लाने के लिये यह सारी सेना समुद्र पार करके आयी है, वही आदमी कह रहा है कि चाँदनी जलाती है। सारी सभा चन्द्रमा के बारे में बात कर रही थी और उसने अपने बारे में कह दिया, और किसी को पता भी नहीं चला, क्योंकि उसने अपना नाम नहीं लिया। उसने नर-नारी कहा, सब कहा। दुख को सबका बनाकर कह देना अपने दुख को ढकने का सबसे पुराना तरीक़ा है।
और यहीं उस गोष्ठी की सबसे अच्छी बात होती है। सबसे बाद में वह बोलता है जो सबसे कम बोलता है।
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास।
दोहा १२ (क)
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास॥ १२ (क)॥
हनुमान ने कहा, हे प्रभो, सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी श्यामल मूर्ति उसके हृदय में बसती है, और वही श्यामता की झलक बाहर दीख रही है। इस उत्तर के आते ही पूरी गोष्ठी पलट जाती है। अब तक सब यह बता रहे थे कि चन्द्रमा में कोई कमी है। किसी ने कहा उस पर छाया पड़ी है, किसी ने कहा उसे चोट लगी है, किसी ने कहा उसमें से कुछ निकाल लिया गया है, और स्वयं प्रभु ने कहा कि उसमें विष है। हनुमान कहते हैं कि उसमें कुछ घटा नहीं है, उसमें कुछ रखा हुआ है।
और जो रखा हुआ है वह पूछनेवाले का अपना रूप है। यानी जिस धब्बे पर सारी शाम बात हुई, वह दूर से देखने पर दाग है और पास से देखने पर किसी का घर है। यह उत्तर सेवक ही दे सकता था, क्योंकि यह वही जानता है कि हृदय में किसी को बसा लेने से हृदय काला नहीं होता। और यह उत्तर देकर हनुमान चुप हो जाते हैं। आगे कोई पाँचवाँ उत्तर नहीं आता।
सार: चार उत्तर आते हैं। सुग्रीव कहते हैं पृथ्वी की छाया, कोई कहता है राहु की मार का दाग, कोई कहता है ब्रह्मा ने रति का मुख बनाने के लिये चन्द्रमा का सार निकाल लिया और वह छेद रह गया। राम कहते हैं कि विष चन्द्रमा का प्यारा भाई है और वह अपनी किरणों से वियोगियों को जलाता है। अन्त में हनुमान कहते हैं कि चन्द्रमा प्रभु का दास है और उसके हृदय में बसी श्यामल मूर्ति ही वह श्यामता है।
दक्षिण की ओर, एक और आकाश
पवनपुत्र के वचन सुनकर सुजान हँस पड़ते हैं। वह हँसी इस पूरे काण्ड में बहुत कम मिलती है, और यहाँ वह किसी मज़ाक़ पर नहीं है। वह उस आदमी की हँसी है जिसे उसके अपने सेवक ने उसी की बात में मात दे दी हो। और उसी हँसी के साथ सिर घूम जाता है। पूरब की ओर से नज़र हटकर दक्षिण की ओर चली जाती है, और दक्षिण में लङ्का है।
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥
चौपाई ८
मधुर मधुर गरजइ घन घोरा । होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥
विभीषण से कहा जाता है कि दक्षिण दिशा की ओर देखिये, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली कैसी चमक रही है, भयानक बादल मीठे-मीठे स्वर में गरज रहा है, कहीं कठोर ओलों की वर्षा न हो जाये। ऊपर से यह मौसम की बात है और सेनापति की सही चिन्ता है, क्योंकि ओले पड़ें तो खुले में पड़ी हुई सेना का क्या हाल होगा। पर पंक्ति को दुबारा पढ़िये और शरारत साफ़ दीखने लगती है। जिस आदमी ने अभी-अभी आकाश के हर टुकड़े को पहचान लिया था, उसे दक्षिण का यह उजाला पहचानने में कोई कठिनाई नहीं थी।
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला॥
चौपाई ९
लंका सिखर उपर आगारा । तहँ दसकंधर देख अखारा॥
विभीषण बोले, हे कृपालु, सुनिये, यह न बिजली है न बादलों की घटा। लङ्का की चोटी पर एक महल है, दशग्रीव वहाँ अखाड़ा देख रहा है। यह उत्तर वही दे सकता था। बाक़ी सबके लिये दक्षिण में एक रोशनी थी। विभीषण के लिये वह एक जानी-पहचानी छत थी, जिस पर वे स्वयं न जाने कितनी बार गये होंगे। अपना घर छोड़ आने का अर्थ यही होता है कि दूर से भी उसका हर कोना पहचान में आता रहे। और वह अखाड़ा उस रात का नया नहीं है। सन्ध्या होते ही लङ्कापति उसी महल में जा बैठा था और गवैये उसके गुण गाने लगे थे।
और फिर वे एक-एक करके उस भ्रम को खोलते हैं। जिसे बादलों की काली घटा समझा गया, वह रावण के सिर पर तना हुआ मेघडंबर छत्र है, इतना बड़ा और इतना काला कि दूर से बादल ही लगे। जिसे बिजली की चमक समझा गया, वह मन्दोदरी के कानों के कर्णफूल हैं जो नाच के साथ हिल रहे हैं और दीये की रोशनी में चमक रहे हैं। मौसम की सारी सामग्री एक-एक करके उतरकर एक आदमी के ठाट में बदल जाती है।
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥
चौपाई १०
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥
और जिसे मीठी गरज समझा गया, वह अनुपम ताल और मृदंग की आवाज़ है। विभीषण यह कहकर अपनी बात पूरी करते हैं और सम्बोधन में सुरभूप कहते हैं, देवताओं के सम्राट्। इसके बाद जो होता है वह दो पंक्तियों में हो जाता है और उसमें कोई क्रोध नहीं है। रावण का अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये, धनुष चढ़ाया, और उस पर बाण चढ़ा दिया। मुसकराना और धनुष चढ़ाना एक ही साँस में लिखे गये हैं।
सार: हनुमान के उत्तर पर हँसकर राम दक्षिण की ओर देखते हैं और विभीषण को बादल, बिजली और गरज दिखाते हैं। विभीषण बताते हैं कि वह लङ्का की चोटी का महल है जहाँ रावण नाच-गाने का अखाड़ा देख रहा है, कि काला बादल उसका मेघडंबर छत्र है, बिजली मन्दोदरी के कर्णफूल हैं और गरज ताल-मृदंग की ध्वनि है। सुनकर राम मुसकराते हैं और धनुष पर बाण चढ़ा देते हैं।
एक बाण, और सबके देखते हुए
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।
दोहा १३ (क)
सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ १३ (क)॥
एक ही बाण से छत्र, मुकुट और कर्णफूल काट गिराये गये। सबके देखते-देखते वे ज़मीन पर आ पड़े, और इसका भेद किसी ने नहीं जाना। तीन चीज़ें एक साथ गिरीं और तीनों चुनी हुई थीं। छत्र राजा होने का चिह्न है। मुकुट सिर पर होने का चिह्न है। और कर्णफूल सुहाग का चिह्न है, जो पत्नी पहनती है। बाण किसी को छूता नहीं। वह सिर्फ़ वह सब उतार देता है जो सिर के ऊपर सजा हुआ था।
और फिर वह लौट आता है। ऐसा चमत्कार करके बाण वापस आकर तरकस में जा घुसा। इस लौटने में एक बात जान-बूझकर रखी गयी है। अगर बाण वहीं पड़ा रह जाता तो कोई उसे उठाकर देखता और जान जाता कि यह किधर से आया। बाण के लौट जाने से कोई प्रमाण नहीं बचा, और इसीलिये आगे की सारी उलझन सम्भव होती है। यह सजा हुआ भरा हुआ रंग टूट गया, और उसे तुलसी रसभंग कहते हैं। सारी सभा साँस रोककर बैठ गयी।
उसके बाद जो सोच-विचार चलता है वह किसी भी सेना के किसी भी ख़ुफ़िया कक्ष जैसा है। न भूकम्प हुआ, न आँधी चली, न किसी ने कोई अस्त्र-शस्त्र आँख से देखा। तीन कारण जाँचे गये और तीनों ख़ारिज हो गये। जो बचा वह सबसे डरावना था, और सब अपने-अपने हृदय में यही सोचने लगे कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ है। इस पूरे प्रसंग में किसी ने यह नहीं सोचा कि यह बाण था। जो सामने बैठा है उसे उन्होंने अभी शत्रु भी नहीं माना था।
सभा का डर रावण से छिपा नहीं रहता, और वह वही करता है जो वह हमेशा करता है। वह हँसता है और एक युक्ति बना लेता है। उसका तर्क यह है कि जिसके लिये सिरों का गिरना सदा शुभ होता आया है, उसके लिये एक मुकुट का गिर जाना अपशकुन कैसे हो सकता है। यह दलील चतुर है और सुनने में ठीक भी लगती है। इसी में इसका ख़तरा है। जिन सिरों के गिरने को वह अपने लिये सदा शुभ बता रहा है, उसी पुरानी बात को वह इस क्षण ढाल की तरह सामने कर देता है, और सभा को उससे तसल्ली हो भी जाती है।
फिर वह सबको घर जाकर सो जाने को कहता है, और सब सिर नवाकर चले जाते हैं। एक व्यक्ति नहीं जाता। जिस क्षण से वह कर्णफूल पृथ्वी पर गिरा, उसी क्षण से मन्दोदरी के हृदय में एक सोच बैठ गया। सारी सभा में वही अकेली है जिसका अपना कुछ गिरा है, और शायद इसीलिये वही अकेली है जिसे यह समझ आ गया कि जो गिरा वह गहना नहीं था।
नेत्रों में जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह अपने पति से कहती है कि हे प्राणनाथ, मेरी विनती सुनिये, श्रीराम से विरोध छोड़ दीजिये, और उन्हें मनुष्य जानकर मन में हठ न पकड़े रहिये। इस विनती में दो टुकड़े हैं। पहला अनुरोध है, विरोध छोड़ दीजिये। दूसरा कारण है, और कारण एक ग़लतफ़हमी की ओर उँगली उठाता है, कि आप उन्हें आदमी समझ बैठे हैं। यही वह बिन्दु है जहाँ से उसकी अगली सारी बात उठती है, क्योंकि अब उसे यह बताना है कि वे कौन हैं।
सार: एक ही बाण से रावण का छत्र और मुकुट तथा मन्दोदरी का कर्णफूल कटकर गिरते हैं, और बाण लौटकर तरकस में समा जाता है। न भूकम्प, न आँधी, न कोई दीखनेवाला शस्त्र, इसलिये सभा इसे भयंकर अपशकुन मानकर डर जाती है। रावण हँसकर तर्क गढ़ लेता है कि जिसके सिर गिरना शुभ रहा हो उसके लिये मुकुट गिरना अपशकुन नहीं। सब सो जाते हैं, पर मन्दोदरी के मन में चिन्ता बैठ जाती है और वह हाथ जोड़कर विरोध छोड़ने की विनती करती है।
मन्दोदरी का विश्वरूप
बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
दोहा १४
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ १४॥
वह कहती है कि मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिये कि रघुकुल के शिरोमणि विश्वरूप हैं, और वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं। इस दोहे के बाद जो आता है वह लङ्काकाण्ड का सबसे बड़ा वर्णन है, और वह किसी ऋषि के मुख से नहीं आता, किसी देवसभा में नहीं आता। वह एक स्त्री अपने पति को रात में समझाते हुए कहती है, और उसका उद्देश्य कोई उपदेश देना नहीं है। उसका उद्देश्य अपना घर बचाना है। और यह उसकी पहली कोशिश भी नहीं है। इससे पहले भी वह एक बार हाथ जोड़कर यही कह चुकी है, और तब भी सुनी नहीं गयी थी।
वर्णन नीचे से शुरू होता है। पाताल जिनके चरण हैं, ब्रह्मलोक जिनका सिर है, और बीच के सब लोक जिनके अलग-अलग अंगों पर टिके हुए हैं। फिर मुख की ओर आती है। भौंहों का चलना भयंकर काल है, आँखें सूर्य हैं, और बालों का समूह बादलों की माला है। एक-एक चीज़ आकाश से उठाकर शरीर पर रखी जा रही है, और जो शरीर बन रहा है वह वही है जिसे उसका पति कल तक एक वनवासी राजकुमार समझता रहा है।
आगे वर्णन और सूक्ष्म होता जाता है। नासिका अश्विनीकुमार हैं। रात और दिन जिनके अपार निमेष हैं, यानी पलक का गिरना और उठना। दसों दिशाएँ कान हैं और वेद यही कहते हैं। वायु श्वास है और वेद उनकी अपनी वाणी हैं। निमेष वाली पंक्ति पर ठहरना चाहिये। जिसे हम एक पूरा दिन कहते हैं और जिसमें हमारा सारा सुख-दुख समा जाता है, वह उस शरीर में पलक के एक बार झपकने जितना है।
और फिर वर्णन में वे चीज़ें आ जाती हैं जो सुन्दर नहीं हैं। लोभ उनका होठ है, यमराज भयानक दाँत हैं, माया उनकी हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं। अग्नि मुख है और वरुण जीभ है। उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा है। यह वर्णन केवल महिमा नहीं गा रहा। यह यह भी कह रहा है कि जो चीज़ें हमें अपनी लगती हैं और जिन पर हमें गर्व है, वे भी उसी एक शरीर के भीतर की कोई छोटी क्रिया हैं, और लोभ उनमें से एक है।
अन्त में वर्णन फिर पृथ्वी पर उतर आता है। अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसों का जाल हैं, समुद्र पेट है, और नरक नीचे की इन्द्रियाँ हैं। और फिर वह अपनी ही बात को समेट देती है, कि इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अब अधिक कल्पना क्या की जाय। जो समुद्र इस समय दोनों डेरों के बीच पड़ा हुआ है, इस वर्णन में वह किसी के पेट भर की जगह है।
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।
दोहा १५ (क)
मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥ १५ (क)॥
शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन है और महान् अर्थात् विष्णु ही चित्त हैं, उन्हीं चराचररूप भगवान् ने मनुष्य के रूप में निवास किया है। यह दोहा उस पूरे वर्णन की चोटी है, और इसका काम एक ही है, कि इतना बड़ा शरीर खड़ा करने के बाद उसे वापस लाकर एक आदमी पर रख दिया जाये, जो इस समय एक पहाड़ पर पत्तों के आसन पर बैठा है। और यहीं चन्द्रमा दुबारा आता है। कुछ घड़ी पहले उसी चन्द्रमा के दाग पर सुवेल की चोटी पर बात हो रही थी, और यहाँ लङ्का के महल में वही चन्द्रमा किसी के मन के रूप में गिनाया जा रहा है।
और इसके तुरन्त बाद वह अपने असली शब्द पर आ जाती है। वह कहती है कि हे प्राणपति, सुनिये, ऐसा विचार करके प्रभु से वैर छोड़कर श्रीरघुवीर के चरणों में प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय। इतना बड़ा दर्शन जिस वाक्य पर आकर रुकता है वह वाक्य एक पत्नी का सादा डर है। सारे लोक, सारे वेद, सारे देवता गिनाने के बाद जो माँगा जा रहा है वह यह है कि मेरा पति जीता रहे।
इस पूरे काण्ड में तत्त्व की इससे साफ़ बात और कहीं नहीं कही गयी, और वह उस कमरे में कही गयी है जहाँ उसे सुनने वाला एक ही है, और वही एक नहीं सुनेगा। तुलसी यह भी बता देते हैं कि कौन जानता है। लङ्का में जो सबसे ठीक जानती है, वह वही है जिसकी बात का लङ्का में सबसे कम मोल है।
सार: मन्दोदरी विश्वास दिलाती है कि राम विश्वरूप हैं और वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं। वह पाताल से ब्रह्मलोक तक, सूर्य-नेत्र और मेघ-केश से लेकर पर्वत-अस्थि और समुद्र-उदर तक पूरा विराट् शरीर गिनाती है, शिव को अहंकार और चन्द्रमा को मन बताती है, और अन्त में कहती है कि वही चराचररूप भगवान् मनुष्य रूप में रह रहे हैं। फिर वह अपनी असली माँग रखती है, कि वैर छोड़कर चरणों में प्रेम कीजिये जिससे मेरा सुहाग बचा रहे।
बेत और बादल
पत्नी के वचन सुनकर रावण ज़ोर से हँसता है, और पहली बात जो कहता है वह विचित्र रूप से सही है। अहो, मोह की महिमा बड़ी बलवान् है। जिस बात को वह अपनी पत्नी पर चस्पाँ कर रहा है, वह ठीक उसी पर लागू होती है जो उसे कह रहा है। और यही इस पूरे प्रसंग की सबसे कड़वी चीज़ है, कि सही वाक्य ग़लत आदमी के मुँह से निकल रहा है और ग़लत दिशा में फेंका जा रहा है।
फिर वह आठ अवगुण गिनाता है जो लोग स्त्री-स्वभाव के बारे में कहते आये हैं। साहस, झूठ, चंचलता, छल, भय, अविवेक, अपवित्रता और निर्दयता। तुलसी इसे रावण के मुँह से कहलवाते हैं और साथ ही यह भी दर्ज़ कर देते हैं कि ऐसा सब कहते हैं। कहनेवाला कौन है, यह ध्यान में रखना चाहिये। यह वह आदमी है जो किसी और की पत्नी उठा लाया है और अपनी पत्नी से कह रहा है कि स्त्रियों में भय और अविवेक होता है।
आगे वह कहता है कि शत्रु का समग्र रूप गाकर उसे बड़ा भारी भय सुना दिया गया, और फिर एक पंक्ति में सब कुछ उलट देता है। वह कहता है कि यह सारा चराचर विश्व तो स्वभाव से ही उसके वश में है, और यह बात अब उसे इसी कृपा से समझ में आयी है। यानी जो वर्णन उसे झुकाने के लिये किया गया था, उसी वर्णन को उठाकर उसने अपने सिर पर सजा लिया। जितना बड़ा विश्वरूप गिनाया गया, उतना ही बड़ा वह अपने को मानने लगा, क्योंकि उसके हिसाब से वह सब उसी के वश में है।
और फिर वह अपनी पत्नी की चतुराई का श्रेय उसे लौटा देता है। उसकी समझ में यह पूरी विनती एक बहाना थी, और इस बहाने से असल में उसी की प्रभुता का बखान किया जा रहा था। जो डर से कहा गया था उसे उसने प्रशंसा मान लिया। बात यहीं तक जाकर रुक जाती है और फिर एक मीठे वाक्य में बदल जाती है, कि हे मृगनयनी, यह बात बड़ी गूढ़ है, समझने पर सुख देती है और सुनने पर भय छुड़ा देती है।
इसी जगह मन्दोदरी हार मान लेती है, और तुलसी उसके मन का निर्णय एक पंक्ति में दर्ज़ कर देते हैं। उसने मन में तय कर लिया कि उसके पति को काल के वश होकर मतिभ्रम हो गया है। यह जो शब्द है, कालवश, इस पूरे काण्ड की कुंजी है। वह पागल नहीं हुआ है और मूर्ख भी नहीं है। उसकी बुद्धि उसी दिशा में चलने लगी है जिधर उसका अन्त है, और बुद्धि का यह मुड़ जाना बाहर से चतुराई जैसा ही दीखता है।
इस प्रकार बहुत-से विनोद करते-करते रावण की रात बीत जाती है और सबेरा हो जाता है। सुबह होते ही स्वभाव से निडर और घमंड से अंधा लङ्कापति अपनी सभा में चला जाता है। उसी रात का दूसरा डेरा भी सो चुका है और वहाँ भी सबेरा होने वाला है। दोनों जगह एक ही सूरज निकलेगा। और इसी सन्धि पर तुलसी बीच में आकर एक सोरठा रख देते हैं, जिसमें वे कथा नहीं कहते, वे बस एक बात कह देते हैं।
फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
सोरठा १६ (ख)
मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥ १६ (ख)॥
यद्यपि बादल अमृत जैसा जल बरसाते हैं, तो भी बेत में फूल और फल नहीं आते, और इसी तरह ब्रह्मा के समान गुरु मिल जायँ तो भी मूर्ख के हृदय में चेत नहीं आता। इस सोरठे में किसी को गाली नहीं दी गयी। बेत पर कोई दोष नहीं लगाया गया कि वह बादल का अपमान कर रहा है। बात इससे कहीं शान्त है और इसीलिये कहीं अधिक कठोर है, कि कुछ चीज़ें पानी लेती ही नहीं। रात भर जो अमृत बरसा वह मन्दोदरी के वचन थे, और उस पर एक कली नहीं फूटी।
सार: रावण हँसकर मोह की महिमा और स्त्री-स्वभाव के आठ अवगुण गिनाता है, कहता है कि यह सारा चराचर तो उसी के वश में है, और पत्नी की विनती को अपनी प्रभुता का बखान मान लेता है। मन्दोदरी मन में तय कर लेती है कि पति कालवश मतिभ्रम में है। विनोद करते-करते सबेरा होता है और मद में अंधा रावण सभा में जाता है। तुलसी बीच में सोरठा रखते हैं कि बादल अमृत बरसाये तब भी बेत नहीं फूलता।
प्रात, और दूत का चुनाव
अब कथा फिर उसी शब्द से लौटती है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। इहाँ। इधर सुवेल पर्वत पर प्रातःकाल श्रीरघुनाथ जागे और उन्होंने सब मन्त्रियों को बुलाकर सलाह पूछी कि शीघ्र बताइये, अब क्या उपाय किया जाय। रात की वह सारी गोष्ठी जिसमें चन्द्रमा के दाग पर बात हो रही थी, सुबह होते ही मन्त्रणा में बदल जाती है। और यह उसी आदमी का दूसरा रूप है, न इससे कम असली, न उससे अधिक।
दूसरे डेरे से इसका अन्तर पूछने के ढंग में ही खुल जाता है। लङ्का में सभा इसलिये जुड़ी थी कि राजा ने जो तय कर लिया है उसे सुन ले। यहाँ सभा इसलिये बुलायी गयी है कि वह बताये कि क्या करना चाहिये। और पहला उत्तर उस आदमी का आता है जो उस सभा में सबसे बूढ़ा है। जाम्बवान् चरणों में सिर नवाकर बोलते हैं।
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी । बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥
चौपाई ११
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा । दूत पठाइअ बालिकुमारा॥
वे कहते हैं, हे सर्वज्ञ, हे सबके हृदय में बसनेवाले, हे बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणों की राशि, सुनिये। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार को दूत बनाकर भेजा जाय। सम्बोधन और सलाह को अलग-अलग देखिये। पहले वे यह मान लेते हैं कि जिनसे कहा जा रहा है वे सब जानते हैं और सबके भीतर बैठे हैं। और उसी के बाद वे कहते हैं कि मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कह रहा हूँ। जो सब जानता है उससे भी सलाह इसी ढंग से कही जाती है, पूरे मन से और अपनी सीमा जानते हुए।
यह सलाह सबके मन में जँच जाती है, और कृपानिधान अंगद से कहते हैं कि हे बुद्धि, बल और गुणों के धाम बालिपुत्र, हे तात, मेरे काम के लिये लङ्का जाइये। इस चुनाव पर रुकना चाहिये। जिस अंगद को यह काम सौंपा जा रहा है, वही रातभर उन्हीं चरणों के पास बैठा उन्हें दबाता रहा है, और तुलसी ने उसे वहीं बड़भागी कह दिया था। रात में वह सबसे पास था, सुबह वह सबसे दूर भेजा जा रहा है। और जिस नाम से उसे यहाँ हर बार बुलाया गया है वह उसका अपना नाम नहीं है, बालिकुमार और बालितनय, यानी हर बार उसके पिता का नाम साथ बाँधकर।
और जो हिदायत दी जाती है वह और भी अनोखी है। कहा जाता है कि बहुत समझाकर क्या कहा जाय, मुझे मालूम है कि आप परम चतुर हैं। यानी दूत को उसका सन्देश शब्दशः नहीं पकड़ाया गया। उस पर भरोसा किया गया है। और फिर एक ही पंक्ति में वह कसौटी दे दी जाती है जिस पर उसे अपनी सारी बातचीत तौलनी है, कि शत्रु से वही बातचीत कीजिये जिससे हमारा काम हो और उसका हित हो।
इस पंक्ति पर रुकना ज़रूरी है। दूत जिस आदमी के पास भेजा जा रहा है वह शत्रु कहा गया है, और उसी वाक्य में उसका हित भी माँगा गया है। यह कूटनीति की चाल नहीं है और नरमी भी नहीं है। यह एक शर्त है जो युद्ध के दरवाज़े पर खड़े होकर लगायी गयी है, और अगला पूरा प्रसंग इसी शर्त की परीक्षा है, क्योंकि वहाँ अंगद को वही सब सुनना पड़ेगा जो एक जवान आदमी को सुनकर भूल जाना सबसे कठिन होता है।
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।
सोरठा १७ (क)
सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु॥ १७ (क)॥
स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ॥ १७ (ख)॥
प्रभु की आज्ञा सिर पर चढ़ाकर और चरणों की वन्दना करके अंगद उठ खड़े होते हैं, और कहते हैं कि आप जिस पर कृपा करें वही गुणों का समुद्र हो जाता है। यह वाक्य विनय का है, पर इसमें विनय से अधिक कुछ है। युवराज यह मान रहा है कि जो योग्यता उसमें अभी-अभी गिनायी गयी, बुद्धि, बल और गुण, वह उसकी अपनी कमाई नहीं है।
और उठते-उठते वह अपने मन की बात भी कह देता है, कि स्वामी के सब काम तो अपने-आप सिद्ध हैं, यह तो मुझे आदर दिया गया है। इसी विचार से उसका हृदय हर्षित हो जाता है और शरीर पुलकित। यह पन्ना यहीं समाप्त होता है, एक आदमी के उठ खड़े होने पर, जिसे भेजा जा रहा है और जो जाने में अपमान नहीं, आदर देख रहा है।
सार: सुबह राम जागकर सब मन्त्रियों को बुलाते हैं और उपाय पूछते हैं। जाम्बवान् सलाह देते हैं कि बालिपुत्र अंगद को दूत बनाकर भेजा जाय, और यह सबको जँच जाती है। राम अंगद को लङ्का जाने को कहते हैं, उन्हें परम चतुर बताकर सन्देश नहीं थमाते, केवल यह कसौटी देते हैं कि बातचीत ऐसी हो जिससे अपना काम हो और शत्रु का हित। अंगद आज्ञा सिर चढ़ाकर उठते हैं और इसे अपना आदर मानकर हर्षित होते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो रातें एक साथ चलती हैं और दोनों में आकाश की ओर देखा जाता है। सुवेल की चोटी पर देखने से एक प्रश्न उठता है और वह प्रश्न सबके सामने रख दिया जाता है। लङ्का की चोटी पर देखने का अवसर ही नहीं आता, क्योंकि वहाँ छत पर चँदोवा तना हुआ है और नीचे नाच हो रहा है। एक जगह लोग बाहर बैठे हैं और ऊपर देख रहे हैं। दूसरी जगह लोग भीतर बैठे हैं और सामने देख रहे हैं। जो कुछ आगे होना है, उसका बीज इसी अन्तर में पड़ा हुआ है।
और दूसरी बात, जो इस पन्ने को पढ़ने के बाद देर तक साथ रहती है। चन्द्रमा वाली गोष्ठी में जितने लोग बोले, सबकी बात सुनी गयी और किसी को ग़लत नहीं कहा गया। लङ्का के महल में जो एक स्त्री बोली, उसकी बात पर हँसी आयी और उसे बहाना कह दिया गया। दोनों जगह एक ही चीज़ की परीक्षा हो रही थी, कि दूसरे की बात के लिये कितनी जगह बची है। जिस डेरे में वह जगह बची थी, वहाँ सुबह सलाह पूछी गयी। जिस डेरे में नहीं बची, वहाँ सुबह सिर्फ़ आदेश निकला।
और आख़िरी बात, जो सबसे धीमी है। पूरी रात में जो एक काम बार-बार होता रहा वह है किसी के हृदय में किसी का बसना। हनुमान कहते हैं कि चन्द्रमा के हृदय में प्रभु की मूर्ति बसी है। राम कहते हैं कि चन्द्रमा ने विष को अपने हृदय में बसेरा दे रखा है। मन्दोदरी के हृदय में उसी क्षण से एक सोच बस जाता है जब उसका कर्णफूल गिरता है। और दोहे में तुलसी उन मनुष्यों को धन्य कहते हैं जो उस एक चित्र में लौ लगाये रहते हैं। हृदय में कुछ न कुछ तो बसता ही है। इस पन्ने का सारा भेद इतना ही है कि किसने किसको भीतर जगह दी।
लङ्काकाण्ड की यह रात पढ़ते हुए बार-बार यह लगता है कि तुलसी जल्दी में नहीं हैं। समुद्र बँध चुका है, सेना पार है, और सत्रहवें दोहे तक एक भी तीर युद्ध के लिये नहीं चला। जो एक बाण चला भी, वह किसी को मारने नहीं गया, वह एक छत्र, एक मुकुट और एक कर्णफूल उतारकर लौट आया। इतनी बड़ी तैयारी के बाद इतनी देर रुक जाना अपने-आप में एक बात कहता है, कि जिस काम में इतने लोगों का प्राण जाना है, उसे शुरू करने की कोई हड़बड़ी नहीं दिखायी जानी चाहिये।
और जो अन्त में बचता है वह वही चित्र है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। एक पहाड़ की चोटी, पत्तों और फूलों का एक आसन जिसे एक भाई ने अपने हाथ से बिछाया है, एक मित्र की गोद, दो हाथ जो टेढ़े बाण सीधे कर रहे हैं, और चारों ओर वे लोग जिन्हें कहीं और होना चाहिये था और जो यहीं हैं। कल इस चोटी से जो उतरेगा वह युद्ध में जायेगा। आज की रात उसने सिर्फ़ इतना किया कि सबसे पूछा कि चाँद में यह जो कालापन है, आपको क्या लगता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ११ से १७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।