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मन्दोदरी की विनती और प्रहस्त की चेतावनी

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · मन्दोदरी की विनती और प्रहस्त की चेतावनी

मन्दोदरी की विनती और प्रहस्त की चेतावनी

लंका में दो लोग रावण से वह बात कहते हैं जो सच है, एक उसके अपने महल में और एक उसकी भरी सभा में, और दोनों को उसी दिन लौटा दिया जाता है।

लङ्काकाण्ड के इस हिस्से में युद्ध का एक भी बाण नहीं चलता। समुद्र बँध चुका है, सेना उतर चुकी है, और अब लंका के भीतर वह समय है जो किसी भी घेरे से पहले आता है और जिसमें असल में सब कुछ तय हो जाता है। यहाँ जो कुछ होता है, बोलचाल में होता है। एक महल के भीतर, फिर एक सभा के भीतर, और अन्त में एक छत पर। पाँच दोहों में तुलसी तीन तरह की बातें सामने रखते हैं: सच, अभिमान, और खुशामद। और फिर वे दिखा देते हैं कि इन तीनों में से कौन-सी बात रावण के कान तक पहुँचती है।

इस समय लंका में दो लोग ऐसे हैं जो साफ़ देख रहे हैं। एक उसकी पत्नी है, एक उसका पुत्र। दोनों अलग-अलग जगह, अलग-अलग ढंग से, वही एक बात कहते हैं जो कही जानी चाहिये। एक चरणों में सिर रखकर कहती है, दूसरा भरी सभा में हाथ जोड़कर कहता है। और दोनों लौटा दिये जाते हैं। तुलसी इसके ऊपर कोई टिप्पणी नहीं करते, किसी को दोष नहीं देते, किसी पर तरस नहीं खाते। वे बस दोनों दृश्य एक के बाद एक रख देते हैं, और उसके तुरन्त बाद तीसरा दृश्य रख देते हैं, जिसमें वही कमरा उस दूसरी तरह की सलाह से भर जाता है, जो सुनने में मीठी होती है और जिससे कुछ माँगना नहीं पड़ता।

मन्दोदरी पर एक क्षण ठहर जाना चाहिये, क्योंकि उन्हें पढ़ने में सबसे बड़ी भूल यही होती है कि उन्हें राम का पक्ष लेनेवाली मान लिया जाय। वे किसी का पक्ष नहीं ले रहीं। वे अपने पति को वही बता रही हैं जो उन्हें अपनी आँखों से दिख रहा है, और जो वे कह रही हैं वह एक-एक अक्षर ठीक है। इस पन्ने की सबसे कड़ी बात यही है कि ठीक होने से उनका कुछ नहीं बनता। उनकी नीति, उनका शास्त्र, उनका हिसाब, सब सही निकलता है, और उसका कोई फल नहीं मिलता।

और यह ध्यान में रखने की बात है कि यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। जो नाम, जो क्रम और जो वाक्य इस पन्ने पर हैं, वे इन्हीं चौपाइयों और इन्हीं दोहों से उठाये गये हैं। इसी कारण यहाँ प्रहस्त रावण का पुत्र है, क्योंकि चौपाई स्वयं उसे सुत कहती है और रावण की बात सुनकर वह पितु गिरा सुनकर लौटता है। किसी दूसरी रामकथा की याद को इस पन्ने पर जगह नहीं दी गयी है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • रावण लंका का राजा, जो इस पूरे प्रसंग में एक बार भी किसी शत्रु के सामने नहीं आता और फिर भी हर दृश्य में थोड़ा और नीचे उतरता जाता है।
  • मन्दोदरी रावण की पत्नी, मय की पुत्री, जो इस प्रसंग में सबसे साफ़ देखती हैं और सबसे कम सुनी जाती हैं।
  • प्रहस्त रावण का पुत्र, जो भरी सभा में मन्त्रियों की खुशामद को उसका नाम देकर पुकार देता है और उसी शाम अपने घर लौटा दिया जाता है।
  • मन्त्रिगण रावण के सचिव, जिनके पास हर प्रश्न का एक ही उत्तर है, कि चिन्ता की कोई बात ही नहीं है।
  • श्रीराम इस पन्ने पर एक बार भी सामने नहीं आते। वे केवल दूसरों के वचनों में हैं, और सबसे अधिक उनके वचनों में जिन्हें उनसे लड़ना है।

जो डर महल तक साथ चला आया

पिछला प्रसंग जहाँ छूटा था, वहाँ रावण अपने ही भीतर की एक हलचल से जूझ रहा था। जिस समुद्र के भरोसे उसकी सारी निश्चिन्तता टिकी हुई थी, वह बँध चुका था, और यह समाचार उस तक पहुँच चुका था। इस पन्ने की पहली चौपाई ठीक उसी घड़ी से उठती है, और उसमें तुलसी एक काम बहुत चुपचाप कर जाते हैं। वे पहले भीतर की व्याकुलता दिखाते हैं, फिर बाहर की हँसी दिखाते हैं, और हँसी को व्याकुलता के ठीक ऊपर रख देते हैं, जैसे कोई ढक्कन रखा जाता है।

निज बिकलता बिचारि बहोरी । बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी॥
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो॥

चौपाई १

अपनी व्याकुलता को समझकर, ऊपर से हँसता हुआ, भय को भुलाकर वह महल की ओर चला गया। इस आधी पंक्ति में दो शब्द रुकने लायक हैं। पहला है बिहँसि, हँसकर। यह हँसी किसी को दिखाने के लिये है, और जिसे दिखायी जा रही है वह इस समय कोई नहीं है, क्योंकि वह अकेला चल रहा है। दूसरा शब्द है भय भोरी, भय को भुलाकर। डर मिटाया नहीं गया, न उसका कोई उत्तर खोजा गया। उसे भुला दिया गया, और भुलाने का तरीक़ा यह निकला कि उसके ऊपर एक हँसी रख दी जाय।

और ठीक उसी क्षण, उसी चौपाई के दूसरे आधे में, तुलसी दृश्य बदल देते हैं। जिस बात को छिपाने के लिये वह हँस रहा था, वह महल के भीतर पहले से पहुँच चुकी है। मन्दोदरी ने सुन लिया है कि प्रभु आ गये हैं, और उन्होंने खेल ही खेल में समुद्र बँधवा लिया है। घर की मालकिन को समाचार राजा से पहले मिल गया, और यह इस पूरे प्रसंग का पहला सन्देश है। जो घेरा अभी नगर के बाहर है, वह ख़बर बनकर भीतर आ चुका है।

और उस समाचार में एक शब्द ऐसा है जो सब कुछ बदल देता है, कौतुकहीं। खेल ही खेल में। जिस काम को लंका असम्भव मानकर बैठी थी, जिसके न होने के भरोसे सारी सुरक्षा की गिनती चलती थी, वह हो गया, और बिना ज़ोर लगाये हो गया। मन्दोदरी के भीतर का सारा हिसाब इसी एक शब्द पर पलटता है। जिस चीज़ को कोई खेल में कर दे, उसके विषय में यह अनुमान लगाना बन्द कर देना चाहिये कि वह और क्या-क्या कर सकता है।

सार: अपनी व्याकुलता पर हँसी की परत चढ़ाकर और भय को भुलाकर रावण महल लौटता है, और वहाँ मन्दोदरी पहले से सुन चुकी हैं कि प्रभु आ पहुँचे हैं और उन्होंने खेल ही खेल में समुद्र बँधवा लिया है।

हाथ पकड़कर, आँचल पसारकर

अब जो होता है, वह इस पूरे काण्ड की सबसे कोमल और सबसे निर्भय चीज़ों में से एक है। मन्दोदरी बीच रास्ते में खड़ी होकर बहस नहीं करतीं। वे पहले जगह बदलती हैं। वे उसका हाथ पकड़ती हैं और उसे अपने महल में ले आती हैं, यानी सभा से हटाकर, दरबार से हटाकर, उस जगह ले आती हैं जहाँ वह राजा नहीं है। जो बात कहनी है वह राजा से कही ही नहीं जा सकती थी।

कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी॥
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥

चौपाई २

हाथ पकड़कर पति को अपने महल में लाकर वे परम मनोहर वाणी बोलीं। चरणों में सिर नवाकर उन्होंने अपना आँचल पसार दिया, और कहा कि हे प्रियतम, क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये। इस एक चौपाई में चार काम हैं और चारों क्रम से हैं। पहले हाथ, फिर एकान्त, फिर चरणों में सिर, फिर आँचल। और उसके बाद ही पहला वाक्य निकलता है, और वह वाक्य कोई सूचना नहीं है। वह एक शर्त है, क्रोध छोड़िये।

आँचल पसारना लंका के किसी सेनापति का काम नहीं है, और यही इस मुद्रा की ताक़त है। यह वह भंगिमा है जिसमें माँगनेवाला अपने पास कुछ नहीं रखता, न पद, न तर्क, न कोई सौदा। मन्दोदरी जानती हैं कि जो बात वे कहने जा रही हैं, वह किसी बराबरी से नहीं मानी जायेगी। इसलिये वे बराबरी छोड़ देती हैं, और नीचे से बोलती हैं, ताकि बात ऊपर तक जा सके।

और फिर वे जो कहती हैं, उसकी शुरुआत देखिये। वे भक्ति से शुरू नहीं करतीं, महिमा से शुरू नहीं करतीं, डर से भी शुरू नहीं करतीं। वे नीति से शुरू करती हैं, यानी उसी भाषा से जो उस घर में चलती है। राजा को राजा की भाषा में समझाया जा रहा है।

नाथ बयरु कीजे ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥

चौपाई ३

हे नाथ, वैर उसी के साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बल के द्वारा जीता जा सके। यह पूरी पंक्ति एक ही नाप पर खड़ी है, और उस नाप में शत्रु का भला-बुरा नहीं तौला जा रहा, केवल अपना बल तौला जा रहा है। और तौल का नतीजा अगली ही आधी पंक्ति में आ जाता है, जिसमें वे अपने पति और रघुनाथ के बीच का अन्तर एक उपमा में रख देती हैं, जुगनू और सूर्य का अन्तर।

खद्योत यानी जुगनू। इस उपमा की मार इसी में है कि यह अपमान नहीं करती। जुगनू का उजाला झूठा नहीं होता, वह सचमुच का उजाला है, और अँधेरे में दिखता भी है। रावण का बल भी झूठा नहीं है, और मन्दोदरी उसे कहीं झुठलाती भी नहीं। वे बस इतना कहती हैं कि उस उजाले की एक हद है और वह हद रात के साथ बँधी हुई है। सूर्य से उसकी तुलना करने में जुगनू की हानि नहीं होती, केवल यह पता चल जाता है कि सवेरा किसके आने से होता है।

इसके बाद वे वह सूची गिनाती हैं जो किसी शास्त्रार्थ के लिये नहीं निकली, एक पत्नी के डर से निकली है। जिन्होंने अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ को मारा, जिन्होंने महाशूरवीर दितिपुत्रों का संहार किया, जिन्होंने बलि को बाँधा और सहस्रबाहु को मारा, वे ही पृथ्वी का भार हरने के लिये उतर आये हैं। पोद्दार की टीका इन दितिपुत्रों को हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बताती है और इन कामों को विष्णु के अवतारों से जोड़ देती है। चौपाई स्वयं एक भी नाम नहीं जोड़ती। वह बस काम गिनाती चली जाती है और अन्त में उन सबको एक ही व्यक्ति पर लाकर रख देती है, सोइ अवतरेउ हरन महि भारा

ध्यान दीजिये कि यह सूची किस घर में सुनायी जा रही है। जिन दैत्यों और जिन असुरों के नाम गिनाये जा रहे हैं, वे इसी वंश की कथा के नाम हैं। मन्दोदरी अपने पति को पराये लोगों की हार नहीं सुना रहीं, वे उसे उसके अपने पक्ष का पुराना हिसाब सुना रही हैं। और वह हिसाब हर बार एक ही ओर गया है।

तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा॥

चौपाई ४

हे नाथ, उनका विरोध न कीजिये, जिनके हाथ में काल, कर्म और जीव, तीनों हैं। यह वह वाक्य है जिसके आगे नीति की बात ख़त्म हो जाती है, क्योंकि अब बात बल की नहीं रही। काल, यानी समय, जो हर लड़नेवाले का असली मैदान है। कर्म, यानी वह हिसाब जो किसी सेना के आने से पहले ही लिखा जा चुका होता है। और जीव, यानी वह जिसके लिये यह सारी लड़ाई लड़ी जा रही है। जिसके हाथ में ये तीनों हों, उससे युद्ध की कल्पना करने का अर्थ है कि युद्ध की शर्तें ही उसी से माँगी जायँ।

रामहि सौंपि जानकी नाइ कमल पद माथ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥ ६॥

दोहा ६

और यहीं वे अपनी पूरी योजना रख देती हैं, और वह योजना चार टुकड़ों की है। चरणकमलों में सिर नवाइये। जानकी को उन्हें सौंप दीजिये। पुत्र को राज्य दे दीजिये। और वन में जाकर रघुनाथ का भजन कीजिये। यह किसी हारे हुए आदमी की शर्तें नहीं हैं, यह एक पूरा जीवन-क्रम है, जिसमें हार को एक नये काम में बदल दिया गया है।

और इस क्रम में जो चीज़ सबसे आसानी से छूट जाती है वह यह है कि इसमें मन्दोदरी अपने लिये कुछ नहीं बचा रहीं। राज्य पुत्र को दिया जाय, यानी रानी का पद भी उसी दिन उतर जायेगा। वन में जाना है, यानी यह महल, यह अखाड़ा, यह लंका, सब पीछे छूटेगा। जो स्त्री यह सलाह दे रही है, वह सलाह मान ली जाने पर अपना सब कुछ खो देगी और केवल एक चीज़ बचायेगी, अपना पति।

सार: मन्दोदरी रावण का हाथ पकड़कर उसे एकान्त में लाती हैं, चरणों में सिर नवाकर आँचल पसारती हैं, और नीति से बात शुरू करती हैं कि वैर उसी से करना चाहिये जिसे बुद्धि और बल से जीता जा सके। वे उसे जुगनू और सूर्य का अन्तर बताती हैं, मधु-कैटभ से लेकर सहस्रबाहु तक की सूची गिनाती हैं, कहती हैं कि जिनके हाथ में काल, कर्म और जीव हैं उनका विरोध न कीजिये, और दोहे में अपनी पूरी योजना रख देती हैं, जानकी लौटा दीजिये, पुत्र को राज्य दीजिये और वन में जाकर भजन कीजिये।

और अन्त में वह माँग, जो अपने लिये थी

उनकी बात अभी पूरी नहीं हुई है, और आगे का हिस्सा पहले से भी नरम है। वे कहती हैं कि रघुनाथ तो दीनों पर दया करनेवाले हैं, और सम्मुख जाने पर तो बाघ भी नहीं खाता। यह उपमा उस घर के लिये चुनी गयी है जहाँ बल ही एकमात्र भाषा है। शरण जाने को कमज़ोरी माना जाता है, इसलिये वे शरण का उदाहरण किसी सन्त से नहीं, जंगल से उठाती हैं। और फिर वे उसकी जीवन-भर की कमाई का हिसाब उसी के सामने रख देती हैं, कि जो करना था वह सब आप कर चुके, देवता, राक्षस और चर-अचर, सब आप जीत चुके।

इस वाक्य में कोई व्यंग्य नहीं है। यह सचमुच का हिसाब है, और वह पूरा है। और पूरा होना ही इस वाक्य का काम है, क्योंकि उसी के सहारे अगली बात कही जा सकती है। जिसका काम पूरा हो चुका हो, उसके लिये अगली सीढ़ी बताना अपमान नहीं होता।

संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥
तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता । जो करता पालक संहर्ता॥

चौपाई ५

हे दशमुख, सन्तजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन में राजा को वन चला जाना चाहिये। हे स्वामी, वहाँ आप उन्हीं का भजन कीजिये जो रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं। ध्यान दीजिये कि एक ही चौपाई में वे उसे दसानन भी कहती हैं और भर्ता भी। पहला नाम उस पहचान का है जिससे तीनों लोक काँपते हैं, दूसरा नाम उस रिश्ते का है जो इस कमरे के भीतर है। बात कहनेवाली स्त्री दोनों को एक साथ सँभाले हुए है, और यही उसका सबसे कठिन काम है।

और यह भी देखिये कि उन्होंने अपनी सलाह को अपना नहीं कहा। उन्होंने कहा कि सन्तजन ऐसी नीति कहते हैं। जिस घर में पत्नी की बात हँसकर टाल दी जाती है, वहाँ वह अपनी बात के पीछे किसी और को खड़ा कर देती है, ताकि टालना थोड़ा और कठिन हो जाय।

आगे वे उसी शरणागतवत्सल रघुवीर का भजन करने को कहती हैं, विषयों की सारी ममता छोड़कर, और साथ ही यह भी बता देती हैं कि जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं, वही कोसलाधीश रघुनाथ आप पर दया करने आये हैं। इस वाक्य पर ठहरिये। नगर के बाहर एक सेना खड़ी है, समुद्र बाँधा जा चुका है, और घर के भीतर वह सेना को दया कहकर पुकारा जा रहा है। पूरे लङ्काकाण्ड में इससे बड़ा उलटफेर किसी एक पंक्ति में नहीं है। जिसे लंका आक्रमण मान रही है, मन्दोदरी उसे अवसर बता रही हैं, और वे यह किसी भक्ति के आवेश में नहीं कह रहीं, वे इसे नीति की तरह कह रही हैं।

और फिर वे वह चीज़ सामने रखती हैं जो हर राजा को सबसे प्रिय होती है, उसका यश। यदि आप मेरी सीख मान लें तो आपका अत्यन्त पवित्र यश तीनों लोकों में फैल जायगा। यानी जिस चीज़ के लिये वह लड़ने जा रहा है, वही चीज़ बिना लड़े मिल रही है। यह उनकी आख़िरी युक्ति है, और इसके बाद उनके पास युक्ति कोई नहीं बचती।

अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात।
नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात॥ ७॥

दोहा ७

ऐसा कहकर, नेत्रों में जल भरकर, पति के चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीर से उन्होंने कहा कि हे नाथ, रघुनाथ का भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय। अहिवात यानी सुहाग, सधवा होने की वह अवस्था जो पति के रहने से रहती है। और यही इस पूरे प्रसंग की सबसे ईमानदार पंक्ति है।

अब तक उन्होंने नीति कही, शास्त्र कहा, अवतारों की सूची कही, सन्तों का हवाला दिया, यश का लालच दिया। वह सब सच था और वह सब उनके काम का नहीं था। अन्त में, जब कुछ नहीं बचा, तब उन्होंने वह रखा जो सचमुच उनका अपना था। वे राम के लिये नहीं कह रहीं। वे विधवा नहीं होना चाहतीं। इस पन्ने पर भजन का जो कारण सबसे अन्त में आता है, वह सबसे छोटा है और सबसे सच्चा है।

और देह के काँपने पर भी ध्यान जाना चाहिये, कंपित गात। यह काँपना किसी भय से नहीं है, कम से कम अपने भय से नहीं। यह उस आदमी का काँपना है जो जानता है कि उसकी बात पूरी हो चुकी और सुनी नहीं गयी। जिसे अपनी बात मनवाने की आशा बची हो, वह चरण पकड़कर काँपता नहीं है।

सार: मन्दोदरी कहती हैं कि रघुनाथ दीनों पर दया करनेवाले हैं और सम्मुख गये को बाघ भी नहीं खाता, कि सन्तों की नीति है कि चौथेपन में राजा वन चला जाय, और कि जिनके लिये मुनि साधन करते हैं वही कोसलाधीश आप पर दया करने आये हैं। अन्त में नेत्रों में जल भरकर, चरण पकड़कर और काँपते हुए वे अपना असली कारण कहती हैं, कि रघुनाथ का भजन कीजिये जिससे मेरा सुहाग अचल रहे।

उठाकर, समझाकर, टाल दिया गया

उत्तर आता है, और उसका पहला काम शारीरिक है। वह उन्हें उठा देता है। यह देखने में शिष्टाचार लगता है और असल में बात का अन्त है, क्योंकि जो मुद्रा उन्होंने चुनी थी, चरणों में सिर और पसरा हुआ आँचल, वही उनकी पूरी प्रार्थना थी। उसे उठा देने के बाद सुनने को कुछ बचा नहीं रह जाता।

तब रावन मयसुता उठाई । कहै लाग खल निज प्रभुताई॥
सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥

चौपाई ६

तब रावण ने मन्दोदरी को उठाया और वह दुष्ट अपनी प्रभुता बखानने लगा। तुलसी यहाँ एक शब्द रखते हैं जो पूरे दृश्य पर अपना निर्णय लिख देता है, खल। और उसके तुरन्त बाद जो वाक्य आता है, वह एक प्रश्न की शक्ल में है, पर प्रश्न है नहीं। जगत् में मेरे समान योद्धा कौन है। इस वाक्य का उत्तर देने की कोई आशा नहीं की गयी है। यह उन वाक्यों में से है जो कहे ही इसलिये जाते हैं कि उनका उत्तर न मिले।

और फिर वह अपनी सूची गिनाता है, जो ठीक उसी जगह पर आती है जहाँ मन्दोदरी की सूची आयी थी। वरुण, कुबेर, पवन, यमराज और स्वयं काल, सारे दिक्पाल उसने अपनी भुजाओं के बल से जीत रखे हैं। देवता, दानव और मनुष्य, सब उसके वश में हैं। और फिर वह पूछता है कि ऐसे में भय उपजा किस कारण।

दोनों सूचियों को अगल-बगल रखकर देखिये तो इस पूरे प्रसंग का ढाँचा दिख जाता है। मन्दोदरी ने एक व्यक्ति की बात की थी और उसके किये हुए काम गिनाये थे। रावण ने बाक़ी सब की बात कर दी और अपने जीते हुए नाम गिनाये। जिस एक नाम पर चेतावनी दी गयी थी, उसका उत्तर सूची में है ही नहीं। यही तरीक़ा होता है, कि जिस प्रश्न का उत्तर न हो, उस पर अपनी पुरानी जीतों का ढेर लगा दिया जाय, और ढेर इतना ऊँचा हो जाय कि प्रश्न उसके नीचे दब जाय।

और उस सूची में एक नाम ऐसा है जिसे वह अपनी ओर से गिनाता है और जो थोड़ी देर में उसके विरुद्ध खड़ा हो जायेगा। उसने काल को भी जीत रखा है, ऐसा वह कहता है। इस वाक्य को याद रखिये। इसी कमरे में, कुछ ही पंक्तियों बाद, उसी काल का नाम दुबारा आयेगा और तब वह किसी और के मुँह से आयेगा।

नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई । सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥
मंदोदरीं हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥

चौपाई ७

उन्होंने उसे बहुत तरह से समझाया, और वह उठकर फिर सभा में जाकर बैठ गया। तुलसी यह नहीं कहते कि उसने क्या उत्तर दिया, क्योंकि उत्तर था ही नहीं। वह बस उठकर चला गया, और जहाँ जाकर बैठा वह जगह वही है जहाँ ऐसी बातें नहीं की जातीं। महल में जो कहा जा सकता था वह कहा जा चुका, और अब वह उस कमरे में है जहाँ केवल सहमति मिलती है।

और अब वह आधी पंक्ति, जो इस पन्ने का सबसे शान्त और सबसे भारी वाक्य है। मन्दोदरी ने हृदय में ऐसा जान लिया कि काल के वश होने से अभिमान उपजा है। ध्यान दीजिये कि उन्होंने यह नहीं समझा कि उनका पति मूर्ख है, न यह कि वह दुष्ट है, न यह कि वह सुनता नहीं। उन्होंने यह समझा कि समय आ गया है। और उन्होंने कारण और लक्षण को उलट कर रखा है, जो इस पंक्ति की असली बात है। अभिमान के कारण काल नहीं आया, काल आ गया है इसलिये अभिमान उपजा है। जो अकड़ अब तक बल की निशानी दिखती थी, वह अब एक और ही चीज़ की निशानी बन गयी है।

और इसी के साथ मन्दोदरी इस प्रसंग से निकल जाती हैं। उनके आगे एक भी पंक्ति नहीं है। जो स्त्री एक क्षण पहले तक चरण पकड़े हुए थी, वह अब चुप हो जाती है, और तुलसी उसकी चुप्पी को कहीं समझाते नहीं। जिसने यह जान लिया हो कि काल अपना काम कर रहा है, उसके पास कहने को बचता भी क्या है।

सार: रावण मन्दोदरी को उठा देता है और अपनी प्रभुता गिनाने लगता है, कि जगत् में उसके समान योद्धा कौन है, कि वरुण, कुबेर, पवन, यम और काल सहित सब दिक्पाल उसके जीते हुए हैं। बहुत समझाने पर भी वह उठकर सभा में जा बैठता है, और मन्दोदरी हृदय में जान लेती हैं कि काल के वश होने से ही यह अभिमान उपजा है।

सभा में एक प्रश्न, और उसका लोप

सभा में आकर वह मन्त्रियों से पूछता है, और जो पूछता है वह ठीक वही प्रश्न है जो एक राजा को पूछना चाहिये। शत्रु से किस प्रकार जूझना होगा। यह प्रश्न व्यावहारिक है, इसका उत्तर हो सकता है, और उसी उत्तर के लिये मन्त्री रखे जाते हैं। यह प्रसंग का एक ऐसा क्षण है जहाँ सब कुछ अभी भी बच सकता था।

और उत्तर में जो आता है, उसमें पहली चीज़ प्रश्न पर झुँझलाहट है। सचिव कहते हैं कि हे राक्षसों के नाथ, हे प्रभु, आप बार-बार क्या पूछते हैं। यानी पूछने को ही एक कमज़ोरी बना दिया गया। जिस दरबार में प्रश्न पूछने पर उलाहना मिलने लगे, वहाँ उत्तर की गुणवत्ता नापने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

कहहु कवन भय करिअ बिचारा । नर कपि भालु अहार हमारा॥

चौपाई ८

कहिये तो ऐसा कौन-सा भय है जिस पर विचार किया जाय। मनुष्य और वानर-भालू तो हमारा आहार हैं। खुशामद का सबसे पूरा रूप यही होता है। इसमें झूठ बोलने की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। मन्त्रियों ने यह नहीं कहा कि हम जीत जायेंगे, उन्होंने युद्ध की कोई योजना भी नहीं बतायी। उन्होंने प्रश्न को ही उठा दिया। जब कोई भय है ही नहीं, तो विचार किसका किया जाय।

और इस वाक्य में जो शब्द सबसे अधिक काम कर रहा है वह अहार है, भोजन। शत्रु को भोजन कह देने के बाद उसके विषय में और कुछ जानने को नहीं बचता। भोजन की गिनती नहीं की जाती, उसकी चाल नहीं देखी जाती, उससे कोई सन्धि नहीं की जाती। एक ही शब्द में शत्रु को श्रेणी से बाहर कर दिया गया, और उसी के साथ सोचने का काम भी समाप्त हो गया।

सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।
नीति बिरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि॥ ८॥

दोहा ८

सबके वचन कानों से सुनकर प्रहस्त ने हाथ जोड़कर कहा कि हे प्रभु, नीति के विरुद्ध कुछ न कीजिये, मन्त्रियों की बुद्धि बहुत ही थोड़ी है। दो बातें इस दोहे में एक साथ हैं और दोनों जान-बूझकर हैं। पहली, उसने सबको पूरा सुन लिया, तब बोला। दूसरी, बोलते समय उसने हाथ जोड़ रखे हैं। वह शिष्टाचार नहीं छोड़ रहा, वह केवल आराम छोड़ रहा है।

और उसने सबसे पहले जो वाक्य कहा, वह मन्त्रियों के विषय में है, राम के विषय में नहीं। यह क्रम महत्त्व रखता है। लंका का संकट इस समय बाहर से आती हुई सेना नहीं है, लंका का संकट यह कमरा है। जिस राजा को इस कमरे से सलाह मिलेगी, वह सेना के सामने पहुँचने से पहले ही हार चुका होगा।

सार: सभा में रावण पूछता है कि शत्रु से किस प्रकार जूझें, और मन्त्री उलटकर उसी से कहते हैं कि बार-बार क्या पूछते हैं, भय की बात ही क्या है, मनुष्य और वानर-भालू तो हमारा आहार हैं। सब सुन चुकने के बाद प्रहस्त हाथ जोड़कर कहता है कि नीति के विरुद्ध कुछ न कीजिये, इन मन्त्रियों की बुद्धि बहुत थोड़ी है।

प्रहस्त, और वह बात जो सुनने में कड़वी है

अब जो भाषण आता है, वह इस पूरे काण्ड का सबसे व्यावहारिक भाषण है। इसमें भक्ति नहीं है, भविष्यवाणी नहीं है, कोई शाप या वरदान नहीं है। इसमें केवल वह चीज़ है जिसे कोई भी देख सकता था और जिसे देखने से पूरी सभा इनकार कर रही है।

कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥
बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥

चौपाई ९

ये मूर्ख मन्त्री ठकुरसोहाती कह रहे हैं। हे नाथ, इस प्रकार से काम नहीं चलेगा। ठकुरसोहाती यानी मुँहदेखी बात, वह बात जो कहनेवाले के मन से नहीं, सुननेवाले के मुख से निकलती है। यह शब्द इस पन्ने का सबसे नुकीला शब्द है, और इसे कहा उस आदमी ने है जिसे उसी सभा में बैठकर उन्हीं मन्त्रियों के साथ काम करना है।

और फिर वह अपना प्रमाण रखता है, और प्रमाण कोई तर्क नहीं है। एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था, और उसका चरित सब लोग अब तक मन ही मन गाते हैं। यह वाक्य पूरी सभा को एक ही झटके में पकड़ लेता है, क्योंकि जो बात वह कह रहा है वह सबको याद है। उस बंदर का नाम यहाँ लिया भी नहीं गया है, केवल एक कपि कहा गया है, और उतने से काम चल गया। जिस घटना को अभी-अभी सब भूल जाने का अभिनय कर रहे थे, वह उसी कमरे में सबके भीतर बैठी हुई है।

उसके बाद वह उनकी अपनी बात उन्हीं पर लौटा देता है, और उससे अधिक सफ़ाई से यह हो भी नहीं सकता था। अभी-अभी कहा गया था कि वानर हमारा आहार हैं। तो उस दिन किसी को भूख न लगी थी। नगर जलाते समय उसे पकड़कर खा क्यों नहीं लिया। एक ही प्रश्न में उसने उनकी पूरी बहादुरी का हिसाब माँग लिया, और वह हिसाब उनके पास नहीं है। और फिर वह बताता है कि इन मन्त्रियों ने स्वामी को वह सम्मति दी है जो सुनने में अच्छी है और जिससे आगे चलकर दुःख पाना है।

जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला॥
सो भनु मनुज खाब हम भाई । बचन कहहिं सब गाल फुलाई॥

चौपाई १०

जिसने खेल ही खेल में समुद्र बँधा लिया और जो सेना सहित सुबेल पर्वत पर आ उतरा, कहिये तो वह मनुष्य है जिसे खा लेने की बात कही जा रही है। और सब गाल फुला-फुलाकर वचन कह रहे हैं। गाल फुलाई में वह पूरी सभा एक चित्र बन जाती है, फूले हुए गाल, ऊँची आवाज़, और भीतर कुछ नहीं। इस उपमा के बाद उन मन्त्रियों के लिये कुछ कहने को बचता नहीं।

और यहाँ वही शब्द लौटकर आया है जो इस पन्ने के पहले वाक्य में था, खेल। मन्दोदरी ने महल में सुना था कि समुद्र खेल में बँध गया। प्रहस्त सभा में वही बात दुहरा रहा है। दो अलग-अलग कमरों में, दो अलग-अलग लोगों ने, एक ही चीज़ देखी और एक ही शब्द चुना। और दोनों में से किसी की बात नहीं मानी जाती।

फिर वह अपने विषय में एक बात कहता है, जो कहनी उसे पड़ी होगी। हे तात, मेरे वचनों को बहुत आदर से सुनिये, और मुझे मन में कायर न समझ लीजियेगा। यह पंक्ति बता देती है कि उस सभा में सच बोलने की क़ीमत क्या है। जो युद्ध से बचने का रास्ता बताये, वह डरपोक कहलायेगा, और यह इतना निश्चित है कि उसने पहले से ही इसका उत्तर दे रखा है। और उसके बाद वह जगत् का हाल बताता है, कि प्यारी लगनेवाली बात सुनने और कहनेवाले लोग तो झुंड के झुंड हैं।

बचन परम हित सुनत कठोरे । सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥

चौपाई ११

हे प्रभो, सुनने में कठोर परन्तु परिणाम में परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। इस आधी पंक्ति में दो काम गिनाये गये हैं और दोनों दुर्लभ बताये गये हैं, ऐसा कहना और ऐसा सुनना। इस समय उस सभा में पहला काम करनेवाला एक आदमी खड़ा है, और दूसरा काम करनेवाला कोई नहीं है।

और फिर वह अपनी नीति रखता है, और वह नीति दो कदमों की है। पहले दूत भेजिये। फिर सीता को देकर श्रीरामजी से प्रीति कर लीजिये। बसीठ यानी दूत। पहला कदम युद्ध टालने का नहीं, समय जानने का है। दूत भेजने का अर्थ यह पता करना है कि सामनेवाला चाहता क्या है, और उसके बाद ही दूसरा कदम तय होता है।

नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि।
नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि॥ ९॥

दोहा ९

यदि वे स्त्री पाकर लौट जायँ तो झगड़ा न बढ़ाइये। और यदि न लौटें, तो हे तात, सम्मुख युद्धभूमि में डटकर मार-काट कीजिये। इस दोहे को पढ़े बिना प्रहस्त को समझा नहीं जा सकता। वह शान्ति का पक्षधर नहीं है। उसने दोनों रास्ते खुले रखे हैं और दोनों में लंका की इज़्ज़त बची हुई है। वह केवल यह कह रहा है कि पहले जान तो लीजिये कि लड़ना पड़ेगा या नहीं, और उसके बाद जो करना हो पूरे बल से कीजिये।

और यह ध्यान दीजिये कि उसकी सलाह और मन्दोदरी की सलाह एक नहीं हैं। मन्दोदरी ने शरण जाने को कहा था, राज्य छोड़ने को कहा था, वन जाने को कहा था। प्रहस्त यह कुछ नहीं कह रहा। वह केवल सीता लौटाने और उसके बाद भी युद्ध के लिये तैयार रहने की बात कर रहा है। यानी वह सलाह जो सबसे कम माँगती थी, वह भी उतनी ही बुरी तरह ठुकरायी जायेगी। इस सभा में सच की मात्रा से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, सच होना ही बहुत है।

सार: प्रहस्त कहता है कि मन्त्री ठकुरसोहाती कह रहे हैं और इससे काम नहीं चलेगा, कि एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था और नगर जलाते समय किसी ने उसे पकड़कर खाया नहीं, कि जिसने खेल में समुद्र बाँधा और सेना सहित सुबेल पर उतरा वह मनुष्य नहीं कहा जा सकता। हितकारी पर कड़वी बात कहने और सुननेवाले थोड़े हैं, इसलिये पहले दूत भेजिये, फिर सीता देकर प्रीति कीजिये, और यदि वे न लौटें तो सामने डटकर युद्ध कीजिये।

पिता का उत्तर

अपनी बात के अन्त में प्रहस्त एक वाक्य और जोड़ता है, जो उसका सबसे बड़ा दाँव है। हे प्रभो, यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे तो जगत् में दोनों ही प्रकार से आपका सुयश होगा। यानी सीता लौटाने पर भी यश, और युद्ध करने पर भी यश। वह अपने पिता को वही चीज़ दिखा रहा है जो कुछ देर पहले मन्दोदरी ने दिखायी थी, और दोनों ने एक ही जगह हाथ रखा, उसके यश पर। दोनों जानते हैं कि उस आदमी को क्या प्रिय है।

और उत्तर में जो आता है, उसमें बहस नहीं है। रावण क्रोध में भरकर पुत्र से कहता है कि अरे मूर्ख, ऐसी बुद्धि किसने सिखायी। ध्यान दीजिये कि यह प्रश्न बात का उत्तर नहीं देता। वह यह नहीं पूछता कि यह सलाह ठीक है या नहीं, वह यह पूछता है कि यह सलाह आयी कहाँ से। जिस बात का उत्तर न हो, उसका स्रोत पूछ लेने से बात टल जाती है।

अबहीं ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई॥
सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा । चला भवन कहि बचन कठोरा॥

चौपाई १२

अभी से हृदय में सन्देह हो रहा है। हे पुत्र, आप तो बाँस की जड़ में उगी हुई घमोई निकले। घमोई वह पौधा है जो बाँस की जड़ में उग आता है, और पोद्दार की टीका इस उलाहने का अर्थ यह बताती है कि आप मेरे वंश के अनुरूप नहीं निकले। यह वाक्य सलाह पर नहीं गिरता, वंश पर गिरता है। जिस आदमी ने अभी-अभी दूत भेजने की बात कही थी, उसे बताया जा रहा है कि वह अपने कुल का ही नहीं है।

और इस चौपाई के दूसरे आधे में तुलसी वह क्रम रखते हैं जो पढ़ने में आसानी से छूट जाता है। पिता की अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त कड़े वचन कहता हुआ घर को चला गया। पहले उसका जाना बताया गया, फिर उसका कहना। यानी वह रुककर उत्तर नहीं देता। वह चलते-चलते कहता है, दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए, जब सभा में कहने को कुछ बचा नहीं।

हित मत तोहि न लागत कैसें । काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥
संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा॥

चौपाई १३

हितकारी सलाह आपको कैसे नहीं लगती, जैसे मृत्यु के वश हुए रोगी को दवा नहीं लगती। यह उसका आख़िरी वाक्य है और यह कोई शाप नहीं है। यह किसी वैद्य की तरह कही गयी बात है। भेषज यानी दवा। दवा बुरी नहीं होती, रोगी बुरा नहीं होता, कोई किसी का दोष नहीं है। बस एक अवस्था होती है जिसके बाद दवा का काम करना बन्द हो जाता है, और उस अवस्था का नाम इसी वाक्य में रख दिया गया है।

और अब पीछे मुड़कर देखिये। महल में एक स्त्री ने अपने हृदय में जाना था कि काल के वश होने से अभिमान उपजा है। सभा में एक पुत्र कह रहा है कि जैसे काल के वश हुए को दवा नहीं लगती। दोनों ने एक-दूसरे की बात नहीं सुनी, दोनों अलग कमरों में थे, दोनों के पास अलग-अलग कारण थे। और दोनों एक ही शब्द पर पहुँचे। यह तुलसी की सबसे चुपचाप की जानेवाली चालों में से एक है, कि वे निर्णय अपने मुँह से नहीं सुनाते, वे दो गवाह खड़े कर देते हैं और दोनों से एक ही बात कहलवा देते हैं।

और उस आदमी के लिये भी एक क्षण रुकिये जो अब इस प्रसंग से बाहर जा रहा है। वह लंका छोड़कर नहीं जा रहा, वह पक्ष बदलकर नहीं जा रहा, वह किसी से शिकायत करने नहीं जा रहा। वह अपने घर जा रहा है। जो कहना था कह दिया गया, जो मिलना था मिल गया, और जिस युद्ध के विरुद्ध उसने सलाह दी थी, उसी युद्ध में उसे अपनी जगह पर खड़ा होना है।

सार: प्रहस्त कहता है कि यह सम्मति मानने पर दोनों प्रकार से यश होगा, और रावण क्रोध में भरकर उसे मूर्ख कहता है और पूछता है कि ऐसी बुद्धि किसने सिखायी, कि वह बाँस की जड़ में उगी घमोई निकला। पिता की घोर वाणी सुनकर प्रहस्त यह कहता हुआ घर चला जाता है कि काल के वश हुए को जैसे दवा नहीं लगती, वैसे ही हित की सलाह आप पर असर नहीं करती।

और ऊपर, छत पर, संगीत

दोनों सलाहें लौटायी जा चुकीं, और अब तुलसी वह करते हैं जो वे अक्सर करते हैं। वे बहस को वहीं छोड़ देते हैं और एक दृश्य बनाने लगते हैं, और दृश्य वह सब कह देता है जो बहस नहीं कह सकती थी। सन्ध्या का समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओं को देखता हुआ महल की ओर चला।

निरखत भुज बीसा। चलते-चलते अपनी भुजाएँ देखना। यह उस आदमी की मुद्रा है जिसे अभी-अभी दो बार बताया गया है कि उसका बल कम पड़ेगा, और जो उत्तर में अपना प्रमाण दुबारा गिन रहा है। उसके पास कोई नयी बात नहीं है, इसलिये वह वही पुरानी चीज़ फिर से देख रहा है जो उसके पास है, और जो उसे अब तक हमेशा पर्याप्त लगती आयी है। चौपाई में कहीं नहीं लिखा कि उसे कोई शंका हुई। पर आदमी अपनी भुजाएँ तभी गिनता है जब कोई उन पर उँगली उठा चुका हो।

आगे जो आता है, वह इस पन्ने का सबसे सुन्दर और सबसे ठंडा चित्र है। लंका की चोटी पर एक अत्यन्त विचित्र महल था, और वहाँ नाच-गान का अखाड़ा जमता था। रावण उसी महल में जाकर बैठ गया, और किन्नर उसके गुणों के समूह गाने लगे। ताल, पखावज और वीणा बजने लगे, और नृत्य में प्रवीण अप्सराएँ नाचने लगीं।

इस चित्र की एक-एक चीज़ अपनी जगह बिलकुल ठीक है। नगर की सबसे ऊँची जगह। सबसे अच्छा संगीत। सबसे कुशल नर्तकियाँ। और बीच में एक आदमी, जिसके गुण उसके सामने बैठकर गाये जा रहे हैं। पूरे दिन में उसने तीन बार सलाह सुनी है, और तीनों बार उसने एक ही चीज़ चुनी है, वह आवाज़ जो उसे बड़ा बताती है। रात के अखाड़े में वही चुनाव अपने पूरे रूप में आ जाता है। किन्नरों का गाना और मन्त्रियों की सम्मति, दोनों एक ही जाति की चीज़ें हैं। एक को संगीत कहा जाता है और दूसरे को नीति, और दोनों में सुननेवाले को वही सुनाया जाता है जो वह सुनना चाहता है।

सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास॥ १०॥

दोहा १०

वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रों के समान भोग-विलास करता रहता है। टीका सुनासीर को इन्द्र बताती है, यानी उस देवता को जिसका नाम ही भोग की सीमा माना जाता है, और तुलसी उसकी भी सौ गुना कर देते हैं। यहाँ तक यह प्रशंसा है। और फिर दूसरी पंक्ति आती है और सारी प्रशंसा को उलटकर रख देती है। परम प्रबल शत्रु सिर पर है, फिर भी न सोच है न त्रास।

तद्यपि, यही वह शब्द है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है। तुलसी यह नहीं कहते कि उसे डरना चाहिये था। वे यह भी नहीं कहते कि उसका भोग बुरा है। वे केवल दो बातें आमने-सामने रख देते हैं, सिर पर खड़ा हुआ शत्रु और भीतर बैठी हुई निश्चिन्तता, और उन दोनों के बीच में यह एक शब्द रख देते हैं। निर्णय पढ़नेवाले के हाथ में छोड़ दिया जाता है, और उसे लेने में देर नहीं लगती।

और पन्ना यहीं समाप्त हो जाता है, संगीत के बीच में। न कोई शाप, न कोई भविष्यवाणी, न कोई उपदेश। बस वीणा बज रही है, अप्सराएँ नाच रही हैं, और लंका की सबसे ऊँची छत पर एक आदमी बैठा हुआ है जिसे आज दिन में दो बार सच बताया गया और जिसने दोनों बार उसे लौटा दिया।

सार: सन्ध्या के समय रावण अपनी बीसों भुजाएँ देखता हुआ लंका की चोटी पर बने महल में जाकर बैठ जाता है, किन्नर उसके गुण गाने लगते हैं, ताल, पखावज और वीणा बजते हैं और प्रवीण अप्सराएँ नाचती हैं। वह सैकड़ों इन्द्रों के समान भोग करता है, और सिर पर परम प्रबल शत्रु होते हुए भी उसे न चिन्ता है न भय।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर एक ही बात दो बार होती है, और तुलसी उसे दुहराने में कोई संकोच नहीं करते। एक व्यक्ति आता है, सच कहता है, और लौटा दिया जाता है। फिर दूसरा व्यक्ति आता है, वही सच दूसरी भाषा में कहता है, और वह भी लौटा दिया जाता है। दोनों के बीच में कुछ भी नहीं बदला, न सुननेवाला, न कमरा, न कारण। यह दुहराव ही इस प्रसंग की रचना है। एक बार होता तो दुर्भाग्य कहा जाता। दो बार हो जाने से वह स्वभाव बन जाता है।

और दोनों में जो फ़र्क़ है, वह भी देखने लायक है। मन्दोदरी ने सब कुछ छोड़ देने को कहा था, राज्य, नगर, अपना पद और अपना अधिकार तक। प्रहस्त ने बहुत कम माँगा, बस इतना कि पहले एक दूत भेज दिया जाय। एक ने सबसे बड़ी बात कही, दूसरे ने सबसे छोटी। और दोनों का एक ही अन्त हुआ। इससे एक बात साफ़ हो जाती है, कि जिस कान में बात नहीं जानी है, वहाँ बात का छोटा या बड़ा होना कोई काम नहीं आता।

तीसरी बात उस निर्णय के विषय में है जो इस पन्ने पर दो लोग अलग-अलग करते हैं और जो एक ही निकलता है। काल के वश होने से अभिमान उपजा है, यह पत्नी ने अपने हृदय में जाना। काल के वश हुए को दवा नहीं लगती, यह पुत्र ने जाते-जाते कहा। दोनों में से किसी ने रावण को बुरा नहीं कहा। दोनों ने यह कहा कि उसका समय आ चुका है, और उसका सबसे पक्का लक्षण यह है कि अब वह सुन नहीं सकता। इस कथा में आगे बहुत बाण चलेंगे और बहुत सिर गिरेंगे, पर जो हार इस पन्ने पर हो चुकी है, वह उन सबसे पहले की है और उनमें से किसी से भी बड़ी है।

और एक बात मन्दोदरी की, जिसे इस प्रसंग का सबसे कड़वा हिस्सा कहना चाहिये। उनकी हर बात ठीक थी। समुद्र सचमुच खेल में बँधा था, अन्तर सचमुच जुगनू और सूर्य जितना था, और जो सिर पर आ चुका था वह सचमुच वही था जिसे वे बता रही थीं। इस पूरे काण्ड में उनसे अधिक ठीक कोई नहीं निकला। और उन्हें उसका कुछ नहीं मिला। सही होना अपने आप में किसी को नहीं बचाता, यह इस पन्ने की सबसे शान्त और सबसे कठोर बात है, और तुलसी इसे कहते कहीं नहीं, बस दिखा देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

लङ्काकाण्ड का यह हिस्सा पढ़ते हुए बार-बार यह लगता है कि इसमें युद्ध की तैयारी कहीं भी नहीं हो रही। शस्त्र नहीं गिने जाते, दुर्ग नहीं देखा जाता, सेनापति नहीं बुलाये जाते। जो प्रश्न एक बार पूछा भी गया था कि शत्रु से किस प्रकार जूझा जाय, उसका उत्तर किसी ने नहीं दिया। उस प्रश्न को खुशामद ने निगल लिया, और जिसने उसे फिर से उठाने की कोशिश की उसे घर भेज दिया गया। जिस दिन लंका ने हारना तय किया, उस दिन उसके द्वार पर कोई खड़ा भी नहीं था।

और अन्त में एक और बात, जो इस पन्ने को पीछे मुड़कर देखने पर दिखती है। इस प्रसंग की पहली पंक्ति में एक आदमी अपने डर पर हँसी की परत चढ़ाकर घर जाता है, और आख़िरी दोहे में वही आदमी सैकड़ों इन्द्रों के समान भोग करता हुआ बिना चिन्ता और बिना भय के बैठा है। बीच में सारा दिन है, दो सच्ची सलाहें हैं, और एक भरी हुई सभा है। परत उसी दिन चढ़ायी गयी थी और शाम तक वह इतनी मोटी हो चुकी है कि नीचे का डर अब दिखता ही नहीं। तुलसी इसी को दिखाने के लिये यह पूरा पन्ना बनाते हैं, कि आदमी अपने भय को भुलाने के लिये जो कुछ करता है, वह उसके भय से कहीं अधिक महँगा पड़ता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ६ से १०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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