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युद्ध का आरम्भ और पहला दिन

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · युद्ध का आरम्भ और पहला दिन

युद्ध का आरम्भ और पहला दिन

मन्दोदरी की आख़िरी विनती से लेकर लङ्का के परकोटे पर पहली चढ़ाई तक, और उस पहले दिन के अन्त तक जब दो वानर रावण के महल की छत गिराकर थके बिना लौट आते हैं।

अंगद लौट चुके हैं। पिछला प्रसंग एक पाँव पर समाप्त हुआ था, जो रावण की भरी सभा में जमा दिया गया था और जिसे वहाँ बैठा कोई भी हिला नहीं सका। उस पाँव तक जो कुछ हुआ, वह सब बात थी। दूत गया, ललकारा गया, ललकार लौट आयी। इस पन्ने पर बात वाला हिस्सा पूरा होता है और हाथ वाला हिस्सा शुरू होता है। दोहा छत्तीस से पैंतालीस तक तुलसी पहले एक स्त्री को आख़िरी बार बोलने देते हैं, फिर एक सभा को आख़िरी बार सलाह करने देते हैं, और उसके बाद लङ्का के परकोटे पर पहला पत्थर गिरता है।

और यहीं इस काण्ड की चाल बदल जाती है। अब तक चौपाई अपनी बँधी हुई चाल से चल रही थी और हर मोड़ पर दोहा आकर बात को गाँठ लगा देता था। जैसे ही लड़ाई छिड़ती है, तुलसी छन्द पर उतर आते हैं। छन्द की पंक्ति लम्बी है, उसके भीतर शब्द एक-दूसरे से टकराते हुए निकलते हैं, और वह ठहरकर पढ़ने के लिये नहीं, ऊँची आवाज़ में बोलने के लिये बना है। इस पन्ने का युद्ध उसी रफ़्तार से पढ़ा जाना चाहिये जिस रफ़्तार से वह लिखा गया है। यहाँ कौन किसको कहाँ लगा, इसका पूरा बही-खाता नहीं मिलेगा। यहाँ कुछ चित्र हैं जिन पर तुलसी ठहर जाते हैं, और बाक़ी सब बहता चला जाता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और दोनों का युद्ध एक जैसा नहीं है। चार मुकुटों का वह उत्तर जो अंगद देते हैं, टिट्टिभ पक्षी का वह दृष्टान्त जो शिव उमा से कहते हैं, और मरते हुए राक्षसों को परम गति मिल जाना, ये तीनों तुलसी के अपने हैं। इस पन्ने पर जो नाम है, जो संख्या है और जो क्रम है, वह सब इसी अवधी पाठ और इसी की टीका से लिया गया है, और कहीं से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • मन्दोदरी रावण की पत्नी, जो इस पन्ने के शुरू में आख़िरी बार समझाती हैं और जिनका एक-एक वाक्य आगे की हर घटना पहले से गिना देता है।
  • रावण लङ्कापति, जो रातभर की चेतावनी सुनकर सुबह सिंहासन पर जा बैठता है और सारा डर भूल जाता है।
  • राम जो युद्ध की सुबह पहले अपने दूत से एक पहेली पूछते हैं, फिर मन्त्रियों से सलाह, और दिन ढलने पर मारे गये शत्रुओं को अपना धाम देते हैं।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो रावण की सभा से चार मुकुट उठा लाये और जिनका उत्तर उन मुकुटों को मुकुट रहने ही नहीं देता।
  • हनुमान पवनपुत्र, जो इस दिन पश्चिम द्वार पर हैं और जिनके एक क्रोध से मेघनाद का रथ टूट जाता है।
  • मेघनाद रावण का पुत्र, जो पश्चिम द्वार रोके खड़ा है और जिसे दिन ढलने से पहले बेसुध घर पहुँचाया जाता है।
  • विभीषण जो मारे गये मुखियों के नाम बताते जाते हैं, और उन नामों पर उन्हें वह मिल जाता है जिसे योगी माँगते रह जाते हैं।
  • सुग्रीव और जाम्बवान् दो पुराने सिर, जिनकी सलाह से वानर सेना के चार दल बनते हैं, एक-एक दरवाज़े के लिये एक।

एक पत्नी का आख़िरी हिसाब

पन्ना एक स्त्री की आवाज़ से खुलता है, और वह आवाज़ विनती की नहीं है। मन्दोदरी पहले भी समझा चुकी हैं, और तब उनके शब्दों में आँसू थे। इस बार वे एक हिसाब लेकर बैठी हैं। कहती हैं कि मन में विचार कीजिये और इस कुबुद्धि को छोड़ दीजिये, क्योंकि आपका और रघुनाथ का युद्ध शोभा नहीं देता। और फिर वे एक बहुत छोटी बात याद दिलाती हैं, इतनी छोटी कि उसे युद्ध की बहस में लाना ही चोट है। उनके छोटे भाई ने ज़मीन पर एक ज़रा-सी रेखा खींच दी थी। वह भी नहीं लाँघी गयी। इतनी-सी है वह मनुसाई जिस पर इतना बड़ा अभिमान खड़ा है।

इसके बाद वे नामों पर उतरती हैं, और हर नाम एक तारीख़ है। एक दूत आया था। उसने रखवालों को मारकर अशोकवन उजाड़ दिया, सामने खड़े रहते हुए अक्षयकुमार को मार डाला, और पूरे नगर को जलाकर राख कर दिया। मन्दोदरी उस दिन का हाल नहीं सुना रहीं, वे एक ही प्रश्न पूछ रही हैं कि उस दिन बल का वह गर्ब कहाँ चला गया था। जिसका दूत यह कर गया, उसे संग्राम में जीत लेने की कल्पना किस भरोसे पर टिकी है, यह वे पूछती हैं और उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करतीं।

और फिर वह चौपाई आती है जिसमें वे पत्नी से हटकर मन्त्री हो जाती हैं। यहाँ का एक शब्द ध्यान खींचता है, मृषा गाल, यानी झूठी डींग। यह शब्द कोई रानी अपने राजा से नहीं कहती।

अब पति मृषा गाल जनि मारहु । मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु । अग जग नाथ अतुलबल जानहु॥

चौपाई १

अब झूठी डींग न हाँकिये, स्वामी, और जो कह रही हूँ उस पर हृदय में कुछ विचार तो कीजिये। रघुपति को केवल एक राजा मत मानिये। उन्हें चराचर का नाथ जानिये, और अतुलनीय बल वाला जानिये। पूरी विनती की धुरी इसी एक भूल पर है। रावण का अनुमान ग़लत नहीं है, उसकी नाप ग़लत है। वह सामने खड़ी चीज़ को अपनी ही तरह की चीज़ समझ रहा है, बस कुछ बड़ी, और मन्दोदरी बार-बार यही कहती हैं कि वह उस तरह की चीज़ ही नहीं है।

इसके बाद जो सूची आती है वह सबसे निर्मम है, क्योंकि उसमें एक भी अनुमान नहीं है, सब घटी हुई बातें हैं। मारीच नीच था, पर उस बाण का प्रताप वह जानता था, और उसकी कही हुई बात भी नहीं मानी गयी। जनक की सभा में अनगिनत राजा बैठे थे और उनमें विशाल तथा अतुलनीय बल वाले आप भी थे। वहीं धनुष टूटा और वहीं जानकी ब्याही गयीं। तब संग्राम में जीत क्यों नहीं लिया गया, यह प्रश्न वे सीधे रख देती हैं। इन्द्र का पुत्र उस बल को थोड़ा-थोड़ा जानता है, क्योंकि उसे पकड़कर केवल एक आँख फोड़ी गयी और जीवित छोड़ दिया गया। और शूर्पणखा की दशा तो अपनी आँखों से देखी जा चुकी है। इतना सब देखकर भी लड़ने की बात सोचते हुए हृदय में कुछ लज्जा नहीं आती, यह मन्दोदरी का सबसे सीधा वार है।

और तब दोहा आता है, जिसमें चार मौतें एक साँस में गिनायी जाती हैं और पाँचवीं बात नाम लेकर कही जाती है।

बधि बिराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध।
बालि एक सर मार्यो तेहि जानहु दसकंध॥ ३६॥

दोहा ३६

जिन्होंने विराध को मारा, खर और दूषण को मारा, और कबन्ध को तो लीला से ही मार डाला। जिन्होंने बालि को एक ही बाण से गिरा दिया। हे दशकन्ध, उन्हें समझिये। इस दोहे का सारा वज़न आख़िरी दो शब्दों पर है। मन्दोदरी डरने को नहीं कहतीं, जानने को कहती हैं। पहचान बुद्धि का काम है, और घर में बैठी यह स्त्री अपने पति से वही एक चीज़ माँग रही है जो उसके पास नहीं बची।

सार: मन्दोदरी आख़िरी बार समझाती हैं। वे लक्ष्मण की खींची रेखा, हनुमान का लङ्कादहन, मारीच, जनक की सभा, जयन्त की आँख और शूर्पणखा की दशा गिनाती हैं, और दोहा छत्तीस में विराध, खर, दूषण, कबन्ध और बालि के नाम लेकर कहती हैं कि राम को राजा मत मानिये, अग-जग का नाथ जानिये।

काल लाठी लेकर नहीं आता

सूची अभी पूरी नहीं हुई। मन्दोदरी ताज़ी ख़बर पर आती हैं, उस पर जो अभी कल की है। जिन्होंने खेल-खेल में समुद्र को बँधा लिया, और जो सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर आये, उन सूर्यकुल के केतु करुणामय ने दूत भेजा, और भेजा भी आपहीं के हित के लिये। जो सेतु बाँधकर पार आ चुका हो वह दूत नहीं भेजता, वह घेरा डालता है। दूत फिर भी भेजा गया, और उसका कारण मन्दोदरी दया बताती हैं, नीति नहीं।

और वह दूत क्या कर गया, यह भी वे याद दिलाती हैं। भरी सभा में आकर उसने आपके बल को उसी तरह मथ डाला जैसे हाथियों के झुंड के बीच आकर सिंह। जिस सभा में यह हुआ, उसमें रावण स्वयं बैठा था। मन्दोदरी इसके बाद एक और पेंच कसती हैं। अंगद और हनुमान, ये दोनों रण के बाँके अत्यन्त विकट वीर, उनके सेवक भर हैं। जो अब तक हो चुका है वह सेवकों का किया हुआ है। स्वामी ने अभी हाथ नहीं उठाया।

और तब भी उन्हें बार-बार नर कहा जा रहा है। मन्दोदरी कहती हैं कि आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझ ढो रहे हैं, और काल के विशेष वश में होने से मन में अब भी बोध नहीं उपजता। इसी के आगे वह चौपाई है जो इस पूरे काण्ड की सबसे बड़ी बात कहती है, और जो युद्ध के मैदान से बहुत दूर की बात है।

काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥
निकट काल जेहि आवत साईं । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥

चौपाई २

काल दण्ड लेकर किसी को नहीं मारता। वह धर्म हर लेता है, बल हर लेता है, बुद्धि हर लेता है, विचार हर लेता है। जिसका समय निकट आ जाता है, उसे ठीक इसी तरह का भ्रम हो जाता है। यह पंक्ति पूरे लङ्काकाण्ड की कुंजी है। तुलसी यह नहीं कह रहे कि रावण हारेगा क्योंकि सेना बड़ी है, या पुल बन गया है, या दूत बलवान हैं। वे कह रहे हैं कि हार पहले ही हो चुकी है, और उसका चिह्न किसी मैदान पर नहीं दिखता। वह चिह्न यह है कि एक आदमी अब सोच नहीं सकता। जो मन अभी-अभी अपने ही नगर को अपने ही सामने जलते देख चुका है, वह सुबह उठकर हँसने वाला है।

और अन्त में मन्दोदरी वही करती हैं जो हर समझदार मन्त्री आख़िर में करता है। वे नुक़सान की गिनती सामने रखती हैं और एक रास्ता छोड़ देती हैं।

दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु॥ ३७॥

दोहा ३७

दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया, अब भी इस भूल की पूर्ति कर दीजिये। कृपा के समुद्र रघुनाथ को भजकर निर्मल यश ले लीजिये। यहाँ ध्यान देने की एक बात है। पाठ इतना ही कहता है कि दो पुत्र मारे गये, और उनमें से एक का नाम इसी बातचीत में पहले आ चुका है, अक्षयकुमार। दूसरे का नाम यह पाठ नहीं देता, और जहाँ पाठ नाम नहीं देता वहाँ नाम नहीं जोड़ा जाना चाहिये। दूसरी बात यह कि मन्दोदरी हार मान लेने को नहीं कह रहीं। वे जीत का एक दूसरा रास्ता दिखा रही हैं, जिसमें यश भी मिलता है और प्राण भी बचते हैं। युद्ध टालने का प्रस्ताव उस स्त्री के मुँह से आ रहा है जिसका पुत्र पहले ही मारा जा चुका है।

सार: मन्दोदरी सेतु-बन्ध, सुबेल और अंगद की दूत-यात्रा गिनाकर कहती हैं कि काल लाठी लेकर नहीं मारता, वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार हर लेता है, और दोहा सैंतीस में अन्तिम प्रस्ताव रखती हैं कि रघुनाथ को भजकर निर्मल यश ले लिया जाय।

सबेरा, और दो सभाएँ

उत्तर क्या मिला, यह तुलसी एक चौपाई में निपटा देते हैं, और उस चौपाई का पहला ही शब्द-समूह पूरी बात कह देता है। स्त्री के वे वचन बाण के समान थे।

नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥
बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥

चौपाई ३

बाण के समान वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभा में चला गया, और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमान में फूलकर सिंहासन पर जा बैठा। इस पंक्ति में सबसे महत्त्व की चीज़ वह शब्द है जिसे पढ़ते हुए आँख फिसल जाती है, त्रास सब भूली। त्रास था। वह असली था। रात में वह आदमी डरा हुआ था, और मन्दोदरी की बातें उसके भीतर उतरी भी थीं, वरना भुलाने के लिये कुछ होता ही नहीं। अभिमान ने तर्क को नहीं हराया। अभिमान ने याद को हराया। सुबह तक वह डर सिंहासन के नीचे कहीं रह गया।

और अब तुलसी एक शब्द से पूरा दृश्य पलट देते हैं। इहाँ, यानी इधर। उधर एक सभा जुड़ रही है जिसमें कोई किसी से कुछ नहीं पूछेगा। इधर सुबेल पर एक सभा जुड़ती है जिसकी शुरुआत ही एक प्रश्न से होती है। राम अंगद को बुलाते हैं। वे आकर चरणकमलों में सिर नवाते हैं, बड़े आदर से पास बिठाये जाते हैं, और खर के शत्रु कृपालु हँसकर बोलते हैं।

बालितनय कौतुक अति मोही । तात सत्य कहु पूछउँ तोही॥
रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका॥

चौपाई ४

हे बालिपुत्र, मुझे बड़ा कौतूहल है, इसीलिये पूछता हूँ, और सच कहना। वह रावण जो राक्षसों के कुल का तिलक है, जिसके अतुलनीय बाहुबल की जगत भर में धाक है। युद्ध की सुबह एक सेनापति अपने लौटे हुए दूत से पहले क्या पूछेगा। दरवाज़े कितने मज़बूत हैं। किस दिशा में सेना कम है। भीतर कितना अनाज है। इनमें से कुछ नहीं पूछा जाता। जो पूछा जाता है वह एक पहेली है, और पूछने वाला हँस रहा है।

प्रश्न यह है कि उसके चार मुकुट आपने चला दिये, बताइये तात, वे मिले किस तरह। अंगद रावण की सभा से चार मुकुट उठा लाये थे और फेंक दिये थे। राम उन चारों की गिनती कर चुके हैं और अब उनका ब्योरा माँग रहे हैं। और अंगद का उत्तर वह है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है। वे कहते हैं कि सर्वज्ञ हैं, शरणागत को सुख देने वाले हैं, सुनिये। वे मुकुट हैं ही नहीं।

साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥
नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जियँ जानि नाथ पहिं आए॥

चौपाई ५

साम, दान, दण्ड और भेद, ये चारों राजा के हृदय में बसते हैं, ऐसा वेद कहते हैं। ये नीति-धर्म के चार सुन्दर चरण हैं। यही जी में जानकर ये नाथ के पास चले आये हैं। यह उत्तर दो काम एक साथ करता है। एक तो यह कि जो चीज़ सिर से गिरी हुई दिखती थी, वह वास्तव में हृदय से निकली हुई थी। दूसरा यह कि मुकुट गिराया जाता है और चरण अपने आप चलते हैं। अंगद ने उन्हें छीना नहीं, वे साथ हो लिये। सभा में किया हुआ एक करतब यहाँ आकर राजनीति का एक सिद्धान्त बन जाता है, और वह भी उस मुँह से जो अभी-अभी शत्रु की सभा में पाँव जमाकर आया है।

धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।
तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस॥ ३८ (क)॥
परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।
समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार॥ ३८ (ख)॥

दोहा ३८ (क)

दशशीश धर्महीन है, प्रभु के चरणों से विमुख है, काल के वश में है। इसलिये हे कोसलाधीश, सुनिये, वे गुण उसे छोड़कर आपके पास आ गये हैं। यहाँ मन्दोदरी की रात वाली बात और अंगद की सुबह वाली बात आकर एक हो जाती हैं। वह कह रही थीं कि काल बुद्धि हर लेता है। यह कह रहे हैं कि चारों नीतियाँ घर छोड़ चुकी हैं। दोनों एक ही ख़बर दे रहे हैं, एक भीतर से और एक बाहर से।

इसके आगे का दोहा उदार राम की हँसी का है। अंगद की उस परम चतुरता को कान से सुनकर वे हँस पड़ते हैं, और उसके बाद बालिकुमार गढ़ के सब समाचार कहते हैं। हँसी पहले आती है, ख़बर बाद में। जिस सभा में पहले हँसी चलती है, वहाँ ख़बर सच निकलती है।

सार: मन्दोदरी के बाण जैसे वचन सुनकर रावण सबेरे सभा में जाकर सारा भय भूल जाता है। उधर राम अंगद को बुलाकर चार मुकुटों का रहस्य पूछते हैं, और अंगद बताते हैं कि वे मुकुट नहीं, साम-दान-दण्ड-भेद हैं, नीति-धर्म के चार चरण, जो धर्महीन रावण को छोड़कर चले आये।

चार दरवाज़े, चार अनी

गढ़ के समाचार मिलते ही पहली बात यह होती है कि राम सब मन्त्रियों को पास बुलाते हैं। और जो वे कहते हैं, वह आदेश नहीं है। लङ्का के चार बाँके दरवाज़े हैं, किस विधि से उन पर लगा जाय, इस पर विचार कीजिये। करहु बिचार, यही दो शब्द इस पूरे दिन की जड़ हैं। एक तरफ़ का स्वामी सलाह माँग रहा है। दूसरी तरफ़ का स्वामी उसी समय सिंहासन पर फूला बैठा है।

सलाह तीन लोग मिलकर करते हैं, और तीनों अलग-अलग दुनिया से आते हैं। वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवान् और विभीषण। तीनों पहले हृदय में सूर्यकुल के भूषण का स्मरण करते हैं, फिर विचार करते हैं, और फिर मन्त्र दृढ़ करते हैं, यानी तय की हुई बात को हिलने नहीं देते। परिणाम एक ही वाक्य में है। वानर सेना के चार दल बनाये गये। चार दरवाज़े हैं, इसलिये चार अनी। योजना इतनी सीधी है कि उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

फिर यथायोग्य सेनापति नियुक्त किये जाते हैं, और सब यूथपति बुला लिये जाते हैं। इन्हें जो समझाया जाता है वह भी ध्यान देने लायक़ है। रणनीति नहीं समझायी जाती, प्रभु का प्रताप कहकर समझाया जाता है। और सुनते ही वानर सिंह के समान गर्जना करके दौड़ पड़ते हैं। यह सेना हथियार से नहीं, एक नाम से चलती है, और तुलसी इसे कहीं छिपाते नहीं।

आगे का चित्र तेज़ हो जाता है। वे हर्षित होकर चरणों में सिर नवाते हैं, फिर पहाड़ों के शिखर उठा लेते हैं और दौड़ते हैं। भालू और वानर गरजते हैं, ललकारते हैं, और कोसलाधीश रघुवीर की जय बोलते हैं। लङ्का को वे परम दुर्ग जानते हैं, यानी यह भ्रम किसी को नहीं है कि किला कमज़ोर है। फिर भी प्रभु के प्रताप से निडर होकर चलते हैं। और घेरा किस तरह पड़ता है, इसका शब्द तुलसी ने बहुत सुन्दर चुना है, घटाटोप। जैसे बादलों की घटा चारों ओर से घिर आती है, वैसे चारों दिशाओं से घेर लिया जाता है।

और घेरे के साथ बाजे बजते हैं। यहाँ एक ब्योरा है जिसे पढ़कर मुस्कान आ जाती है। निसान और भेरी मुँह से ही बजायी जाती हैं। इस सेना के पास न ढोल है, न नगाड़ा, न ध्वजा। जो चाहिये वह मुँह से बना लिया जाता है, और फिर जो नारा उठता है वह दोहा बन जाता है।

जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव।
गर्जहिं सिंहनाद कपि भालु महा बल सींव॥ ३९॥

दोहा ३९

श्रीराम की जय, लक्ष्मण की जय, वानरराज सुग्रीव की जय। महान बल की सीमा वे भालू और वानर सिंह के समान ऊँचे स्वर से गरजने लगे। तीन नाम लिये गये हैं और तीनों उनके अपने पक्ष के हैं। पहली आवाज़ जो लङ्का के भीतर पहुँचती है, वह किसी को गाली नहीं देती। वह सिर्फ़ बताती है कि बाहर कौन खड़ा है।

सार: राम मन्त्रियों से विचार माँगते हैं। सुग्रीव, जाम्बवान् और विभीषण मिलकर चार दरवाज़ों के लिये चार अनी बनाते हैं, यथायोग्य सेनापति नियुक्त होते हैं, और वानर-भालू घटाटोप की तरह लङ्का को चारों ओर से घेरकर मुँह से ही निसान बजाते हुए जयकार करते हैं।

एक ठहाका, और एक टिट्टिभ

लङ्का के भीतर बड़ा भारी कोलाहल मच जाता है। अत्यन्त अहंकारी रावण उसे सुनता है, और उसकी पहली प्रतिक्रिया क्रोध नहीं है। वह कहता है कि वानरों की ढिठाई तो देखो, और यह कहते हुए हँस पड़ता है। हँसते-हँसते ही वह राक्षसों की सेना बुलाता है। युद्ध की पहली सूचना उसके यहाँ एक मज़ाक़ की तरह पहुँचती है।

आए कीस काल के प्रेरे । छुधावंत सब निसिचर मेरे॥
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा । गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा॥

चौपाई ६

बंदर काल की प्रेरणा से चले आये हैं। मेरे राक्षस सब भूखे हैं। विधाता ने घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस सठ ने अट्टहास किया। इस चौपाई में सबसे तीखी बात पहली पंक्ति है, और वह इसलिये तीखी है कि वह सच है। वानर सचमुच काल की प्रेरणा से आये हैं। रावण ने शब्द ठीक चुना और उसका पता ग़लत लिख दिया। कुछ ही घंटे पहले उसकी पत्नी ने उससे यही शब्द कहा था और उसी की ओर इशारा किया था। सुबह होते ही वह वही शब्द उठाता है और शत्रु की ओर फेंक देता है। और उसी पंक्ति में तुलसी उसे सठ कह देते हैं, ताकि पढ़ने वाले को दो पल भी भ्रम में न रहना पड़े।

आदेश छोटा है और भूख का है। हे वीरो, चारों दिशाओं में जाओ, और भालू-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। कोई व्यूह नहीं, कोई दरवाज़ा नहीं, कोई क्रम नहीं। जो सेना अभी-अभी चार अनियों में बाँटी गयी थी, उसके सामने जो सेना निकल रही है उसे केवल इतना बताया गया है कि खा लो। और ठीक यहीं शिवजी उमा से मुड़कर वह दृष्टान्त कहते हैं जो इस पूरे काण्ड में सबसे छोटा और सबसे निर्दय है। रावण को ऐसा अभिमान था जैसे टिट्टिभ पक्षी पैर ऊपर करके सोता है। वह नन्हा पक्षी चित लेटकर टाँगें आकाश की ओर उठा लेता है, इस भरोसे पर कि आकाश गिरा तो वही थाम लेगा। कोई उसे हराता नहीं। वह लेटा ही इस तरह है कि हारना तय है।

आज्ञा माँगकर राक्षस निकल पड़ते हैं, और तुलसी उनके हाथों की एक लम्बी सूची देते हैं। भिंदिपाल, साँगी, तोमर, मुद्गर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी कृपाण, परिघ और पहाड़ों के टुकड़े। सूची इतनी भरी हुई है कि उसे पढ़ते हुए लोहे की गंध आती है। और उसी भरी हुई सूची के तुरन्त बाद वह उपमा आती है जो सारा लोहा बेकार कर देती है।

जिमि अरुनोपल निकर निहारी । धावहिं सठ खग मांस अहारी॥
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥

चौपाई ७

जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरों का ढेर देखकर उस पर टूट पड़ते हैं, और चोंच टूटने का दुख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ मनुजाद दौड़े। यह उपमा दूर से ठीक-ठीक बैठती है। लाल पत्थर दूर से मांस जैसे दीखते हैं। पक्षी भूख से उड़ता है, नाप से नहीं। और जो टूटता है वह पत्थर नहीं, चोंच है। तुलसी ने इन्हीं राक्षसों को दो पंक्तियों में दो बार मूर्ख कहा है, एक बार सठ और एक बार अबूझा, और बीच में सिर्फ़ एक चित्र रखा है।

अगला दोहा गिनती का है। अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण धारण किये करोड़ों बलवान रणधीर राक्षस परकोटे के कँगूरों पर चढ़ जाते हैं। दीवार भर जाती है। नीचे घेरा है, ऊपर कँगूरे हैं, और दोनों जगह भीड़ है।

सार: कोलाहल सुनकर रावण हँसता है और कहता है कि काल की प्रेरणा से भोजन घर चला आया। शिव उमा से उसके अभिमान की तुलना पैर ऊपर करके सोने वाले टिट्टिभ से करते हैं। राक्षस हथियार लेकर वैसे ही दौड़ते हैं जैसे लाल पत्थरों को मांस समझकर पक्षी, और करोड़ों की संख्या में कँगूरों पर चढ़ जाते हैं।

पहला दिन

कँगूरों पर चढ़े हुए वे कैसे दिखते हैं, यह तुलसी एक ही उपमा में बता देते हैं। मानो सुमेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। ऊँचाई भी आ गयी, काला रंग भी आ गया, और भारीपन भी। इसके बाद बाजे शुरू होते हैं, जुझाऊ ढोल और डंके, और तुलसी एक ही ध्वनि के दो असर लिखते हैं जो आमने-सामने रखे हुए हैं। उसे सुनकर योद्धाओं के मन में चाव होता है। और नफ़ीरी तथा भेरी सुनकर कायरों के हृदय में दरारें पड़ जाती हैं। बाजा एक है। जो बजाया जा रहा है वह हर सुनने वाले के भीतर उसी चीज़ को बड़ा कर देता है जो पहले से वहाँ पड़ी है।

दीवार से नीचे देखने पर उन्हें जो दिखता है वह और डराता है। अत्यन्त विशाल शरीर वाले वानर और भालू, ठट्ट के ठट्ट। वे दौड़ते हैं और अवघट घाटियों को कुछ नहीं गिनते। जहाँ पहाड़ रास्ता रोकता है वहाँ उसे पकड़कर फोड़ देते हैं और रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते हैं, गरजते हैं, दाँतों से अपने ही ओठ काटते हैं और ख़ूब डपटते हैं।

और फिर लड़ाई शुरू होती है, पर वह किसी बिगुल से शुरू नहीं होती। उधर रावण की दोहाई बोली जा रही है, इधर राम की। जय जय जय की ध्वनि उठी और लड़ाई पड़ गयी। दो नाम आमने-सामने हुए और उसी से युद्ध छिड़ गया। पहला हथियार दोनों तरफ़ आवाज़ है। उसके बाद पत्थर चलते हैं। राक्षस पहाड़ों के ढेर-के-ढेर शिखर फेंकते हैं, और वानर कूदकर उन्हें बीच में ही पकड़ लेते हैं और उन्हीं की ओर वापस चला देते हैं। जो ऊपर से आया, वह लौटकर ऊपर जाता है।

और यहीं तुलसी चौपाई छोड़कर छन्द पर आ जाते हैं। पंक्ति लम्बी हो जाती है, उसके भीतर क्रियाएँ एक के पीछे एक बिना साँस लिये आती हैं, और पढ़ने वाले को रुकने की जगह नहीं मिलती। यही इस युद्ध की असली आवाज़ है।

धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥
अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।
कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥

छन्द

प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतों के टुकड़े ले-लेकर किले पर डालते हैं। वे झपटते हैं, राक्षसों के पैर पकड़कर उन्हें धरती पर पटकते हैं, भाग चलते हैं, और फिर मुड़कर ललकारते हैं। बहुत चंचल और तरुण, प्रताप से भरे हुए, वे तमककर उछलते हैं और चढ़-चढ़कर गढ़ पर पहुँच जाते हैं। और फिर वह पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा छन्द जाकर बैठता है। वानर और भालू महलों पर चढ़कर जहाँ-तहाँ राम का यश गाने लगे। किले पर चढ़ने का उनका पहला काम किसी को मारना नहीं है। पहला काम गाना है।

पीछे लौटना भी उनका अपने ढंग का है, और अगला दोहा उसी एक तरकीब का है।

एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।
ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥ ४१॥

दोहा ४१

फिर एक-एक राक्षस को पकड़कर वानर भाग चले। ऊपर आप और नीचे योद्धा, इस तरह वे धरती पर आ गिरते हैं। दो पंक्तियों में एक पूरी विधि बतायी गयी है। दीवार ऊँची है, कूदना ही है, इसलिये कूदते समय एक राक्षस साथ ले लिया जाता है और गिरते समय उसे नीचे कर लिया जाता है। गिरना दोनों को है। चोट एक को लगती है।

सार: कँगूरों पर चढ़े राक्षस सुमेरु पर बैठे बादलों जैसे दीखते हैं। बाजों की एक ही ध्वनि वीरों में चाव और कायरों में दरार डालती है। दोनों ओर की दोहाई से लड़ाई छिड़ती है, छन्द में वानर-भालू गढ़ पर चढ़कर महलों में राम का यश गाते हैं, और दोहा इकतालीस में एक-एक राक्षस को नीचे दबाकर कूदते हैं।

भागती हुई सेना और एक तलवार

पहले दिन का पहला पलड़ा साफ़ झुक जाता है। राम के प्रताप से प्रबल वानरों के झुंड राक्षस योद्धाओं के समूह-के-समूह मसल देते हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ दुर्ग पर चढ़ जाते हैं और प्रताप में सूर्य के समान रघुवीर की जय बोलते हैं। राक्षसों के झुंड वैसे ही भाग चलते हैं जैसे तेज़ हवा चलने पर बादलों के समूह तितर-बितर हो जाते हैं। वही बादल जो थोड़ी देर पहले सुमेरु के शिखरों पर बैठे दिखाये गये थे, अब हवा में बिखर रहे हैं। उपमा वही है, और उसी के भीतर हार लिखी हुई है।

और अब दृष्टि दीवार से हटकर नगर के भीतर चली जाती है, जहाँ लड़ने वाला कोई नहीं है। लङ्का में बड़ा भारी हाहाकार मच जाता है। बालक रोते हैं, स्त्रियाँ रोती हैं, रोगी रोते हैं। तुलसी ने वही तीन गिनाये हैं जो भाग भी नहीं सकते। और फिर वह पंक्ति आती है जिसे जल्दी में नहीं पढ़ना चाहिये। सब मिलकर रावण को गालियाँ देने लगते हैं, और गाली का मज़मून यह है कि राज करते हुए इसने मृत्यु को बुला लिया। जो फ़ैसला मन्दोदरी ने रात में शयनकक्ष में सुनाया था, वही फ़ैसला सुबह गली-गली में सुनाया जा रहा है। उसे अनसुना किया जा सकता था। इसे नहीं।

अपनी सेना का विचलित होना रावण अपने कानों से सुनता है। और तब वह पहली बार कुछ करता है। भागते हुए योद्धाओं को लौटाता है और क्रोध में भरकर बोलता है।

जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥
सरबसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥

चौपाई ८

जिसे मैं अपने कानों से रण से विमुख सुनूँगा, उसे मैं स्वयं कराल कृपाण से मारूँगा। मेरा सर्वस्व खाया, तरह-तरह के भोग किये, और अब समरभूमि में प्राण प्यारे हो गये। इन दो पंक्तियों में धमकी और ताना एक ही साँस में हैं। यह आदमी अपने सैनिकों को लड़ने का कोई कारण नहीं दे रहा। वह उन्हें याद दिला रहा है कि उन्होंने उसका खाया है। सामने राम का प्रताप है, जिसके नाम से वानर दौड़ रहे हैं। यहाँ पिछले भोजनों का हिसाब है।

असर होता है। उग्र वचन सुनकर सब डर जाते हैं और लज्जित होकर क्रोध करके लौट चलते हैं। तुलसी यह छिपाते नहीं कि उनका साहस किस चीज़ से लौटा है। पीछे एक तलवार है और सामने लाज है। पर उसी के आगे वे एक पंक्ति और जोड़ देते हैं, और वह पंक्ति इन्हीं राक्षसों को थोड़ी-सी ऊँचाई दे देती है। सम्मुख मरने में ही वीर की शोभा है, ऐसा जानकर तब उन्होंने प्राणों का लोभ छोड़ दिया। जिस डर से वे लौटे, उसी लौटने में वे डरना छोड़ भी देते हैं।

और उसके बाद का दोहा बताता है कि इस बार भिड़न्त कैसी है। बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ते हैं। परिघों और त्रिशूलों से मार-मारकर उन्होंने भालू और वानरों को व्याकुल कर दिया। पहली बार इस पन्ने पर वानर पक्ष के लिये एक कठिन शब्द आता है, व्याकुल। अब तक वे गरजते, दौड़ते, चढ़ते और गाते आये थे।

सार: वानर दुर्ग पर चढ़ जाते हैं, राक्षस बिखर जाते हैं, और नगर में हाहाकार मचता है, जहाँ लोग रावण को गाली देते हैं कि राज करते हुए इसने मृत्यु बुला ली। रावण भागते योद्धाओं को तलवार की धमकी देकर लौटाता है, और वे लज्जा से लौटकर प्राणों का लोभ छोड़ देते हैं, फिर परिघ और त्रिशूल से वानरों को व्याकुल कर देते हैं।

पश्चिम द्वार

और तब वह होता है जो इस पन्ने पर पहली बार होता है। वानर भय से आतुर होकर भागने लगते हैं। तुलसी इसे छिपाते नहीं, और उसी पंक्ति के भीतर शिवजी उमा से कह भी देते हैं कि आगे चलकर ये ही जीतेंगे। कहानी अपना अन्त बीच में ही खोल देती है, और वह भी ठीक उस क्षण जब भगदड़ मची हुई है। यह भरोसा दिलाने के लिये है, और साथ ही यह बताने के लिये कि जीत का होना उस दिन के मैदान पर तय नहीं हो रहा।

भागती हुई भीड़ में से एक आवाज़ उठती है, और वह आवाज़ नामों की है। कोई पूछता है कि अंगद कहाँ हैं, हनुमान कहाँ हैं, बलवान नल, नील और द्विविद कहाँ हैं। सेना जब बिखरती है तो वह नेतृत्व नहीं ढूँढ़ती, वह नाम ढूँढ़ती है। पाँच नाम पुकारे जाते हैं और उनमें से एक तक आवाज़ पहुँच जाती है।

हनुमान उस समय पश्चिम द्वार पर हैं। वहाँ उनसे मेघनाद लड़ रहा है, और द्वार टूटता ही नहीं, बड़ी भारी कठिनाई पड़ी हुई है। लङ्का का सबसे कठिन दरवाज़ा वही है जहाँ सबसे बड़ा योद्धा खड़ा है, और उसे रोकने वाला रावण का पुत्र है। अपने दल की विकलता की ख़बर यहीं पहुँचती है।

पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा॥

चौपाई ९

पवनपुत्र के मन में अत्यन्त क्रोध हुआ। काल के समान वह योद्धा प्रबल गर्जना करके कूदा और लङ्का के गढ़ के ऊपर आ गया, और पहाड़ लेकर मेघनाद की ओर दौड़ा। इस चौपाई की गति देखने लायक़ है। क्रोध, गर्जन, छलाँग, गढ़, पहाड़, दौड़। छह क्रियाएँ, और बीच में एक भी वाक्य ऐसा नहीं जो रुककर बताये कि क्यों। जिस दरवाज़े को तोड़ने में कठिनाई पड़ रही थी, उसे तोड़ने का प्रयत्न छोड़ दिया जाता है। दरवाज़ा वहीं रहता है, और हनुमान ऊपर से चले जाते हैं।

आगे जो होता है वह चार क्रियाओं में निपट जाता है। रथ तोड़ डाला, सारथि को मार गिराया, और मेघनाद की छाती में लात मारी। दूसरा सारथि उसे व्याकुल जानकर रथ में डालकर तुरन्त घर ले आया। मेघनाद यहाँ मरता नहीं। उसे बेसुध उठाकर घर पहुँचाया जाता है, और पहुँचाने वाला उसका दूसरा सारथि है, क्योंकि पहला वहीं पड़ा है। तुलसी इस हार को बड़ा नहीं करते। जिस पुत्र पर रावण का सारा भरोसा टिका है, उसका पहला दिन एक लात पर समाप्त हो जाता है।

और उसके बाद का दोहा उस ख़बर का पीछा करता है। अंगद ने सुना कि पवनपुत्र अकेले ही गढ़ पर चले गये हैं। रण के बाँके बालिपुत्र तरककर किले पर चढ़ गये, और तुलसी उस चढ़ने को कपि खेल कहते हैं। जो दीवार करोड़ों राक्षसों को रोकने के लिये बनी थी, उस पर चढ़ना एक वानर के लिये खेल भर है। और चढ़ने का कारण भी लड़ाई नहीं है। कारण यह है कि साथी अकेला चला गया।

सार: वानर भय से भागने लगते हैं और शिव उमा से कह देते हैं कि जीत आगे इन्हीं की है। पश्चिम द्वार पर मेघनाद से जूझते हनुमान अपने दल की विकलता सुनकर गढ़ पर कूद जाते हैं, रथ और सारथि गिराकर मेघनाद की छाती पर लात मारते हैं, और अंगद उनके अकेले जाने की ख़बर पाकर खेल की तरह किले पर चढ़ जाते हैं।

रावण के महल की छत पर

अब दो वानर किले के भीतर हैं, और दोनों क्रुद्ध हैं। हृदय के भीतर राम के प्रताप का स्मरण करके वे दौड़कर रावण के भवन पर जा चढ़ते हैं और कोसलाधीश की दोहाई बोलते हैं। दिन भर में पहली बार युद्ध महल तक पहुँचा है। और जो पहला काम वे करते हैं वह किसी सैनिक से लड़ना नहीं है।

वे कलश सहित भवन को पकड़कर ढहा देते हैं। कलश वह शिखर है जो महल के सबसे ऊपर लगा होता है, राजा के घर का सबसे ऊँचा बिन्दु। उसे पकड़कर पूरा भवन गिरा दिया जाता है। यह देखकर राक्षसराज भय पाता है, और तुलसी उसे सीधे-सीधे लिख देते हैं। सुबह जो आदमी सारा त्रास भूलकर सिंहासन पर बैठा था, दोपहर तक उसका डर लौट आया है, और इस बार वह अपनी छत के गिरने की आवाज़ से लौटा है।

महल की स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटने लगती हैं और जो कहती हैं वह गिनती की बात है। अब की बार दो उत्पाती वानर आ गये। पिछली बार एक आया था, और उसके अकेले आने पर नगर राख हो गया था। वह हिसाब इस घर में किसी को याद दिलाना नहीं पड़ता। इस वाक्य का सारा डर उस छोटे-से शब्द में है, दो।

दोनों वानर उन्हें डराते हैं, और डराने का ढंग उनका अपना है। कपिलीला करके, यानी वानर वाली उछल-कूद और घुड़की देकर। और उसी साँस में वे रामचन्द्र का सुयश सुनाते हैं। घुड़की और कीर्तन एक साथ चल रहे हैं। फिर सोने के खंभों को हाथों से पकड़कर वे आपस में कहते हैं कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय। यह वाक्य पढ़कर हँसी आती है, क्योंकि जो अब तक हुआ, भवन का गिरना भी, वह उनके हिसाब से अभी शुरुआत नहीं थी।

उत्पात का मतलब वे तुरन्त बता देते हैं। गरजकर वे शत्रु की सेना के बीच में कूद पड़ते हैं और भारी भुजबल से उसका मर्दन करने लगते हैं। किसी की ख़बर लात से ली जाती है, किसी की थप्पड़ से। और हर चोट के साथ एक वाक्य चलता है, कि राम को न भजने का यह फल है। मार के साथ उपदेश चल रहा है, और उपदेश देने वाला उसी क्षण मार भी रहा है।

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥ ४४॥

दोहा ४४

एक को दूसरे से रगड़कर मसल डालते हैं, और सिरों को तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावण के सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दही के कूँड़े फूट रहे हों। इस दोहे में दो बातें एक साथ हैं। पहली यह कि सिर यों ही नहीं फेंके जा रहे, उनका निशाना तय है, वे रावण के सामने गिर रहे हैं। दूसरी यह कि उपमा रसोई से उठायी गयी है। दही का कूँड़ा फूटने की आवाज़ हर घर में सुनी हुई है, और उसी आवाज़ से तुलसी युद्ध का सबसे भयानक क्षण लिखते हैं। सिंहासन पर बैठा आदमी अब सिर्फ़ बैठा हुआ है, और उसके सामने उसकी सेना एक-एक करके पहुँचायी जा रही है।

सार: अंगद और हनुमान रावण के भवन पर चढ़कर उसे कलश सहित ढहा देते हैं, स्त्रियाँ छाती पीटती हैं कि इस बार दो उत्पाती आ गये, और दोनों कपिलीला तथा रामकीर्तन साथ-साथ करते हुए सेना में कूद पड़ते हैं। दोहा चवालीस में तोड़े हुए सिर रावण के सामने दही के कूँड़ों की तरह फूटते हैं।

जो मारे गये, उन्हें क्या मिला

और यहीं यह पन्ना अचानक युद्ध का पन्ना रहना छोड़ देता है। जिन बड़े-बड़े मुखियों को वे पकड़ पाते हैं, उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभु के पास फेंक देते हैं। विभीषण उनके नाम बताते हैं। और राम उन्हें भी अपना धाम दे देते हैं। पहले पकड़, फिर फेंक, फिर नाम, फिर धाम। इस पूरी व्यवस्था में निर्णायक चीज़ विभीषण का बोलना है। मारा हुआ शत्रु जब तक अनजाना है तब तक वह संख्या है। नाम लिये जाते ही वह व्यक्ति हो जाता है, और व्यक्ति को धाम मिलता है।

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।
उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥

चौपाई १०

ब्राह्मणों का मांस खाने वाले वे दुष्ट मनुजाद भी वह गति पाते हैं जिसकी योगी याचना करते रह जाते हैं। और शिवजी उमा से इसका कारण बताते हैं। राम बहुत कोमल चित्त वाले हैं और करुणा की खान हैं, और वे यह देखते हैं कि राक्षस वैरभाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं। जिन्होंने जीवन भर विरोध किया, उन्हें वह मिल रहा है जिसके लिये योगी बैठे हुए हैं। हिसाब में स्मरण गिना जा रहा है, स्मरण का भाव नहीं। शत्रुता भी एक प्रकार का लगातार स्मरण है, और वही गिन ली जाती है।

इसके आगे तुलसी वह करते हैं जो वे प्रायः करते हैं, वे युद्ध से मुँह मोड़कर सीधे सुनने वाले की ओर देख लेते हैं। ऐसा जानकर वे उन्हें परम गति देते हैं, और फिर प्रश्न आता है कि हे भवानी, कहिये तो ऐसा कृपालु और कौन है। और उसके तुरन्त बाद चोट। जो मनुष्य ऐसे प्रभु का स्वभाव सुनकर भी भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम अभागे हैं। मैदान पर राक्षस मर रहे हैं और उन्हें धाम मिल रहा है। जो सुरक्षित बैठकर यह सुन रहा है, उसके लिये यह पंक्ति रखी हुई है।

और फिर दृश्य वापस लौटता है, और उसे लौटाने वाली आवाज़ राम की अपनी है। वे कहते हैं कि अंगद और हनुमान दुर्ग में प्रवेश कर गये हैं। सुबेल की चोटी से वे दोनों को देख रहे हैं और अपने साथियों को बता रहे हैं। और फिर वह उपमा आती है जिसमें लङ्का के भीतर मचा हुआ सारा उत्पात एक चित्र में बँध जाता है। दोनों वानर लङ्का में कैसे शोभा दे रहे हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्र को मथ रहे हों। नगर समुद्र है, दोनों वानर दो मथानियाँ हैं, और जो कुछ ऊपर आ रहा है वह वही है जो नीचे पड़ा हुआ था।

भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।
कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत॥ ४५॥

दोहा ४५

भुजाओं के बल से शत्रु की सेना को कुचलकर और मसलकर, फिर दिन का अन्त होता देखकर दोनों कूद पड़े और वहाँ आ गये जहाँ भगवान थे। और इस दोहे में सबसे सुन्दर दो शब्द हैं, बिगत श्रम, यानी श्रम से रहित। दिन भर दीवार पर, महल पर और सेना के बीच रहने के बाद वे थके हुए नहीं लौटते, और लौटने का कारण थकान भी नहीं है। कारण यह है कि दिन ढल गया। जिस काम को वे कर रहे थे, वह सूरज के साथ बँधा हुआ था, और सूरज के जाते ही वे कूदकर वहाँ आ जाते हैं जहाँ से सुबह चले थे।

सार: पकड़े गये मुखियों को प्रभु के पास फेंका जाता है, विभीषण उनके नाम बताते हैं और राम उन्हें अपना धाम देते हैं, क्योंकि वैरभाव से ही सही, वे स्मरण तो करते ही हैं। दिन ढलते देखकर अंगद और हनुमान, जिन्हें राम समुद्र मथते दो मन्दराचल कहते हैं, बिना थके कूदकर लौट आते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर दो सभाएँ एक ही सुबह लगती हैं, और उन दोनों के बीच का फ़र्क़ इतना छोटा है कि पढ़ते हुए निकल जाता है। एक सभा में स्वामी कहता है कि विचार कीजिये। दूसरी सभा में स्वामी कहता है कि जाइये और खा लीजिये। पहली सभा में तीन लोग बैठकर सोचते हैं, चार दल बनाते हैं, सेनापति चुनते हैं और यूथपतियों को बुलाकर समझाते हैं। दूसरी सभा में एक आदमी हँसता है और सेना निकल जाती है। दिन के अन्त तक दोनों का हिसाब सामने है। एक की सेना दीवार पर चढ़कर गा रही है, दूसरे की सेना दीवार से गिर रही है, और उसके सिर उसी के सामने आकर फूट रहे हैं।

दूसरी बात काल की है, और वह इस पन्ने पर दो बार बोली जाती है। रात में मन्दोदरी कहती हैं कि काल दण्ड लेकर नहीं मारता, वह बुद्धि हर लेता है, और जिसका समय पास आता है उसे ऐसा ही भ्रम होता है। सुबह रावण कहता है कि वानर काल की प्रेरणा से चले आये हैं। दोनों ने एक ही शब्द उठाया। एक ने उसे अपने घर की ओर घुमाया, दूसरे ने बाहर की ओर फेंक दिया। यही एक मोड़ इस पूरे काण्ड की दिशा तय कर देता है, और इसमें कोई हथियार शामिल नहीं है।

और तीसरी बात, जो सबसे धीमी है और सबसे देर तक साथ रहती है। इस दिन जो कुछ भी बड़ा हुआ, वह नाम लेने से हुआ। सेना मुँह से निसान बजाकर तीन नाम पुकारती है और लङ्का काँप जाती है। भागते हुए वानर हथियार नहीं ढूँढ़ते, वे पाँच नाम पुकारते हैं। अंगद और हनुमान मारते हुए भी एक नाम सुनाते चलते हैं। और अन्त में मारे गये शत्रुओं को जो मिलता है, वह भी इसीलिये मिलता है कि विभीषण उनके नाम बता देते हैं। इस पूरे दिन में तलवारों से कम काम नामों से चला है, और तुलसी ने यह बात कहीं समझायी नहीं, बस एक के बाद एक करके दिखा दी है।

इस प्रसंग को पढ़कर जो सबसे पहले खटकता है वह तुलसी का नाप है। मन्दोदरी की समझाइश पर वे तीन दोहे ख़र्च करते हैं और एक-एक चौपाई में पुराने काण्डों की आधी-आधी कथाएँ लौटा लाते हैं। मेघनाद के रथ का टूटना, सारथि का गिरना और उसका बेसुध घर पहुँचाया जाना, यह सब आधी चौपाई में निपट जाता है। जिस पर सबसे ज़्यादा लिखा गया है वह वह बातचीत है जो किसी काम नहीं आयी, और जिस पर सबसे कम लिखा गया है वह वह लड़ाई है जिसका नतीजा निकला। जो बात सुनी नहीं गयी, तुलसी उसे पूरा समय देते हैं। यही उनका तरीक़ा है कि बताये बिना बता दें कि वज़न कहाँ रखा हुआ है।

और जो चित्र सबसे अन्त में बचता है वह लड़ाई का नहीं है। दिन ढल रहा है, लङ्का के भीतर धूल बैठ रही है, महल का एक कोना गिरा हुआ पड़ा है, और दो वानर दीवार से कूदकर वापस उसी पहाड़ की ओर चल देते हैं जहाँ से सुबह निकले थे। उन्हें थकान नहीं है। उन्होंने कुछ माँगा भी नहीं। वे बस वहाँ आ गये जहाँ भगवान थे, और दिन वहीं ख़त्म हो गया। लङ्काकाण्ड का यह पहला दिन इतना ही कहता है कि जो सही जगह से चलता है, वह शाम को लौटकर भी वहीं आता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ३६ से ४५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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