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युद्ध का आरम्भ और पहला दिन

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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 6

मन्दोदरी की आख़िरी विनती से लेकर लङ्का के परकोटे पर पहली चढ़ाई तक। और उस पहले दिन के अन्त तक जब दो वानर रावण के महल की छत गिराकर थके बिना लौट आते हैं।

अंगद लौट चुके हैं। पिछला प्रसंग एक पाँव पर समाप्त हुआ था, जो रावण की भरी सभा में जमा दिया गया था और जिसे वहाँ कोई हिला नहीं सका। उस पाँव तक जो हुआ, वह सब बात थी: दूत गया, ललकारा गया, ललकार लौट आयी। यहाँ बात वाला हिस्सा पूरा होता है और हाथ वाला शुरू होता है। इस प्रसंग में पहले एक स्त्री आख़िरी बार बोलती है, फिर एक सभा आख़िरी बार सलाह करती है। उसके बाद लङ्का के परकोटे पर पहला पत्थर गिरता है।

और यहीं काण्ड की चाल बदल जाती है। अब तक कथा अपनी बँधी चाल से चल रही थी। लड़ाई छिड़ते ही उसकी चाल लम्बी और आवाज़ ऊँची हो जाती है। यहाँ कौन किसको कहाँ लगा, इसका पूरा बही-खाता नहीं। कुछ चित्र हैं जिन पर कथा ठहरती है, और बाक़ी सब बहता चला जाता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और दोनों का युद्ध एक जैसा नहीं है। चार मुकुटों का अंगद वाला उत्तर, टिटिहरी पक्षी का वह दृष्टान्त जो शिव पार्वती से कहते हैं, और मरते हुए राक्षसों को परम गति मिल जाना। ये तीनों मानस के अपने हैं। यहाँ जो नाम, संख्या और क्रम आते हैं, वे मानस के पाठ और उसकी टीका के हैं।

महल के भीतर और परकोटे के बाहर

  • मन्दोदरी रावण की पत्नी, जो लड़ाई छिड़ने से पहले आख़िरी बार समझाती हैं और जिनके वाक्य आगे की घटनाएँ पहले से गिना देते हैं।
  • रावण लङ्का का राजा, जो रात भर की चेतावनी सुनकर सुबह सिंहासन पर जा बैठता है और सारा डर भूल जाता है।
  • राम जो युद्ध की सुबह पहले अपने दूत से एक पहेली पूछते हैं, फिर मन्त्रियों से सलाह, और दिन ढलने पर मारे गये शत्रुओं को अपना धाम देते हैं।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो रावण की सभा से चार मुकुट उठा लाये और जिनका उत्तर उन मुकुटों को मुकुट रहने ही नहीं देता।
  • हनुमान जो इस दिन पश्चिम द्वार पर हैं और जिनके एक क्रोध से मेघनाद का रथ टूट जाता है।
  • मेघनाद रावण का पुत्र, जो पश्चिम द्वार रोके खड़ा है और जिसे दिन ढलने से पहले बेसुध घर पहुँचाया जाता है।
  • विभीषण जो मारे गये मुखियों के नाम बताते जाते हैं, और उन नामों पर उन्हें वह मिल जाता है जिसे योगी माँगते रह जाते हैं।
  • सुग्रीव और जाम्बवान् दो पुराने सिर, जिनकी सलाह से वानर सेना के चार दल बनते हैं, एक-एक दरवाज़े के लिये एक।

एक पत्नी का आख़िरी हिसाब

प्रसंग एक स्त्री की आवाज़ से खुलता है, और वह आवाज़ विनती की नहीं है। मन्दोदरी पहले भी समझा चुकी हैं, तब उनके शब्दों में आँसू थे। इस बार वे एक हिसाब लेकर बैठी हैं। “मन में विचारकर यह कुबुद्धि छोड़ दीजिये। आपका और राम का युद्ध शोभा नहीं देता।” और फिर एक बहुत छोटी बात, इतनी छोटी कि उसे युद्ध की बहस में लाना ही चोट है: “उनके छोटे भाई ने ज़मीन पर एक ज़रा-सी रेखा खींच दी थी। वह भी आप नहीं लाँघ सके। ऐसा है आपका पुरुषत्व।” लक्ष्मण की खींची रेखा मानस में बस इसी एक जगह आती है। वाल्मीकि के अरण्यकाण्ड (सर्ग 45) में लक्ष्मण सीता के कठोर वचन सुनकर उन्हें वन के देवताओं को सौंपते हैं और कोई रेखा खींचे बिना राम के पास चले जाते हैं।

फिर वे नामों पर उतरती हैं, और हर नाम एक तारीख़ है। एक दूत आया था: उसने रखवालों को मारकर अशोकवन उजाड़ दिया, रावण के देखते-देखते अक्षयकुमार को मार डाला, और पूरे नगर को जलाकर राख कर दिया। “उस समय आपके बल का गर्व कहाँ चला गया था?” जिसका दूत यह कर गया, उसे संग्राम में जीत लेने की कल्पना किस भरोसे पर टिकी है, यह वे पूछती हैं और उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करतीं।

और फिर वह बात आती है जिसमें वे पत्नी से हटकर मन्त्री हो जाती हैं। उसमें एक शब्द है, झूठी डींग, जो कोई रानी अपने राजा से नहीं कहती।

“स्वामी, अब झूठी डींग न हाँकिये। मेरे कहे पर हृदय में कुछ विचार कीजिये। राम को केवल एक राजा मत मानिये। उन्हें चराचर का नाथ और अतुलनीय बलवाला जानिये।” विनती की धुरी इसी भूल पर है। रावण का अनुमान नहीं, उसकी नाप ग़लत है। वह सामने खड़ी चीज़ को अपनी ही तरह की, बस कुछ बड़ी, चीज़ समझ रहा है। मन्दोदरी बार-बार कहती हैं कि वह उस तरह की चीज़ ही नहीं है।

इसके बाद की सूची निर्मम है, क्योंकि उसमें एक भी अनुमान नहीं, सब घटी हुई बातें हैं। मारीच नीच था, पर उस बाण का प्रताप जानता था, और उसका कहना भी नहीं माना गया। “जनक की सभा में अनगिनत राजा थे, और विशाल, अतुलनीय बलवाले आप भी थे। वहीं धनुष टूटा और सीता ब्याही गयीं। तब आपने उन्हें संग्राम में क्यों नहीं जीता?” इन्द्र का पुत्र उस बल को थोड़ा-थोड़ा जानता है, जिसे पकड़कर केवल एक आँख फोड़ी गयी और जीवित छोड़ दिया गया। और शूर्पणखा की दशा तो रावण अपनी आँखों से देख चुका है। “इतना देखकर भी आपके हृदय में लज्जा नहीं आती?” यह मन्दोदरी का सीधा वार है।

और तब चार मौतें एक साथ गिनायी जाती हैं, और पाँचवीं बात नाम लेकर कही जाती है।

“जिन्होंने विराध को मारा, खर और दूषण को मारा, कबन्ध को लीला से ही मार डाला, और बालि को एक ही बाण से गिरा दिया, उन्हें समझिये।” बात का वज़न आख़िरी शब्द पर है, समझिये। मन्दोदरी डरने को नहीं, जानने को कहती हैं। पहचान बुद्धि का काम है, और घर में बैठी यह स्त्री अपने पति से वही एक चीज़ माँग रही है जो उसके पास नहीं बची।

काल लाठी लेकर नहीं आता

सूची अभी पूरी नहीं हुई। मन्दोदरी ताज़ी ख़बर पर आती हैं। “जिन्होंने खेल-खेल में समुद्र बँधा लिया, और जो सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर आये, उन करुणामय राम ने आपके ही हित के लिये दूत भेजा।” जो सेतु बाँधकर पार आ चुका हो, वह दूत नहीं भेजता, घेरा डालता है। दूत फिर भी भेजा गया, और उसका कारण मन्दोदरी दया बताती हैं, नीति नहीं।

और वह दूत क्या कर गया: “भरी सभा में आकर उसने आपके बल को वैसे मथ डाला जैसे हाथियों के झुंड में आकर सिंह।” उस सभा में रावण स्वयं बैठा था। फिर एक और पेंच: अंगद और हनुमान, ये दोनों रण के बाँके, अत्यन्त विकट वीर, राम के सेवक भर हैं। जो अब तक हुआ, वह सेवकों का किया है। स्वामी ने अभी हाथ नहीं उठाया।

“और उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझ ढो रहे हैं। काल के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी बोध नहीं उपजता।” इसके आगे वह बात है जो युद्ध के मैदान से बहुत दूर की है।

“काल लाठी लेकर किसी को नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार हर लेता है। स्वामी, जिसका काल निकट आता है, उसे आपकी ही तरह भ्रम हो जाता है।” मन्दोदरी यह नहीं कहतीं कि रावण हारेगा क्योंकि सेना बड़ी है या पुल बन गया है। वे कहती हैं कि हार पहले ही हो चुकी है, और उसका चिह्न किसी मैदान पर नहीं, इसमें है कि एक आदमी अब सोच नहीं सकता। जो मन अपने नगर को अपने सामने जलते देख चुका है, वह सुबह उठकर हँसनेवाला है।

और अन्त में मन्दोदरी वही करती हैं जो हर समझदार मन्त्री करता है। वे नुक़सान की गिनती सामने रखकर एक रास्ता छोड़ देती हैं।

“दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया। प्रियतम, अब भी इस भूल की पूर्ति कर दीजिये। कृपा के समुद्र राम को भजकर निर्मल यश ले लीजिये।” कथा इतना ही कहती है कि दो पुत्र मारे गये। एक का नाम इसी बातचीत में पहले आ चुका है, अक्षयकुमार, दूसरे का नाम कथा नहीं देती। और मन्दोदरी हार मानने को नहीं कह रहीं। वे जीत का दूसरा रास्ता दिखा रही हैं, जिसमें यश भी मिलता है और प्राण भी बचते हैं। युद्ध टालने का प्रस्ताव उस स्त्री के मुँह से आ रहा है जिसका पुत्र पहले ही मारा जा चुका है।

सबेरा, और दो सभाएँ

उत्तर क्या मिला, यह थोड़े में निपट जाता है, और पहली ही बात पूरी बात कह देती है: स्त्री के वे वचन बाण के समान थे।

बाण जैसे वचन सुनकर रावण सबेरा होते ही उठकर सभा में चला गया, और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमान में फूलकर सिंहासन पर जा बैठा। भय था, और असली था। मन्दोदरी की बातें उसके भीतर उतरी भी थीं, वरना भुलाने को कुछ होता ही नहीं। अभिमान ने तर्क को नहीं, याद को हराया।

अब एक शब्द से दृश्य पलटता है: इधर। उधर एक सभा जुड़ रही है जिसमें कोई किसी से कुछ नहीं पूछेगा। इधर सुबेल पर एक सभा जुड़ती है जिसकी शुरुआत ही एक प्रश्न से होती है। राम अंगद को बुलाते हैं। वे आकर चरणों में सिर नवाते हैं, बड़े आदर से पास बिठाये जाते हैं, और राम हँसकर बोलते हैं।

“बालिपुत्र, मुझे बड़ा कौतूहल है, इसीलिये पूछता हूँ। तात, सच-सच बताइये। वह रावण, जो राक्षसों के कुल का तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबल की जगत् भर में धाक है…” युद्ध की सुबह सेनापति अपने लौटे हुए दूत से दरवाज़ों की मज़बूती, सेना की कमी या भीतर के अनाज के बारे में नहीं पूछता। जो पूछा जाता है वह एक पहेली है, और पूछनेवाला हँस रहा है।

“…उसके चार मुकुट आपने फेंके। तात, बताइये, वे आपको किस तरह मिले?” अंगद रावण की सभा से चार मुकुट उठाकर फेंक आये थे, और राम उनकी गिनती करके अब ब्योरा माँग रहे हैं। अंगद का उत्तर इस प्रसंग का आधार है: “सर्वज्ञ, शरणागत को सुख देनेवाले, सुनिये। वे मुकुट हैं ही नहीं। वे राजा के चार गुण हैं।”

“वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद, ये चारों राजा के हृदय में बसते हैं। ये नीति-धर्म के चार सुन्दर चरण हैं, और यही जी में जानकर ये आपके पास चले आये हैं।” जो सिर से गिरा दीखता था, वह असल में हृदय से निकला था। और मुकुट गिराया जाता है, जबकि चरण अपने-आप चलते हैं। अंगद ने उन्हें छीना नहीं, वे साथ हो लिये। सभा का एक करतब यहाँ राजनीति का सिद्धान्त बन जाता है।

“रावण धर्महीन है, आपके चरणों से विमुख है, काल के वश में है। इसलिये, सुनिये, वे गुण उसे छोड़कर आपके पास आ गये हैं।” यहाँ मन्दोदरी की रात वाली बात और अंगद की सुबह वाली बात एक हो जाती हैं। वे कह रही थीं कि काल बुद्धि हर लेता है। ये कह रहे हैं कि चारों नीतियाँ घर छोड़ चुकी हैं। दोनों एक ही ख़बर दे रहे हैं, एक भीतर से और एक बाहर से।

अब उदार राम की हँसी आती है। अंगद की परम चतुरता सुनकर वे हँस पड़ते हैं, और फिर अंगद गढ़ के सब समाचार कहते हैं। हँसी पहले आती है, ख़बर बाद में।

चार दरवाज़े, चार अनी

गढ़ के समाचार मिलते ही राम सब मन्त्रियों को पास बुलाते हैं। जो कहते हैं वह आदेश नहीं है: “लङ्का के चार बाँके दरवाज़े हैं। किस विधि से उन पर लगा जाय, इस पर विचार कीजिये।” विचार कीजिये, यही दो शब्द इस दिन की जड़ हैं। एक तरफ़ का स्वामी सलाह माँग रहा है। दूसरी तरफ़ का स्वामी उसी समय सिंहासन पर फूला बैठा है।

सलाह तीन लोग मिलकर करते हैं, तीनों अलग दुनिया से: सुग्रीव, जाम्बवान् और विभीषण। तीनों पहले हृदय में राम का स्मरण करते हैं, फिर विचार करते हैं, और फिर मन्त्र दृढ़ करते हैं, यानी तय की हुई बात को हिलने नहीं देते। परिणाम एक वाक्य में है: वानर सेना के चार दल बनाये गये। चार दरवाज़े, इसलिये चार अनी।

फिर यथायोग्य सेनापति नियुक्त होते हैं और सब यूथपति बुला लिये जाते हैं। उन्हें रणनीति नहीं, राम का प्रताप कहकर समझाया जाता है, और सुनते ही वानर सिंह के समान गर्जना करके दौड़ पड़ते हैं। यह सेना हथियार से नहीं, एक नाम से चलती है।

आगे का चित्र तेज़ हो जाता है। वे हर्षित होकर राम के चरणों में सिर नवाते हैं, फिर पहाड़ों के शिखर उठाकर दौड़ते हैं। भालू और वानर गरजते हैं, ललकारते हैं, और राम की जय बोलते हैं। लङ्का को वे परम दुर्ग जानते हैं, यानी किसी को भ्रम नहीं कि किला कमज़ोर है। फिर भी राम के प्रताप से निडर होकर चलते हैं। और घेरा पड़ता है: जैसे बादलों की घटा चारों ओर से घिर आती है, वैसे चारों दिशाओं से लङ्का घेर ली जाती है।

घेरे के साथ बाजे बजते हैं, और डंके और भेरियाँ मुँह से ही बजायी जाती हैं। इस सेना के पास न ढोल है, न नगाड़ा। जो चाहिये वह मुँह से बना लिया जाता है, और फिर एक नारा उठता है।

“राम की जय, लक्ष्मण की जय, वानरराज सुग्रीव की जय!” महान बल की सीमा वे भालू और वानर सिंह के समान गरजने लगे। तीनों नाम अपने पक्ष के हैं। लङ्का के भीतर पहुँचनेवाली पहली आवाज़ किसी को गाली नहीं देती। सिर्फ़ बताती है कि बाहर कौन खड़ा है।

एक ठहाका, और एक टिटिहरी

लङ्का में बड़ा भारी कोलाहल मच जाता है। अत्यन्त अहंकारी रावण उसे सुनकर कहता है, “वानरों की ढिठाई तो देखिये,” और हँस पड़ता है। हँसते-हँसते ही वह राक्षसों की सेना बुलाता है। युद्ध की पहली सूचना उसके यहाँ एक मज़ाक़ की तरह पहुँचती है।

“बंदर काल की प्रेरणा से चले आये हैं। मेरे राक्षस सब भूखे हैं। विधाता ने घर बैठे भोजन भेज दिया।” ऐसा कहकर उस मूर्ख ने अट्टहास किया। पहली बात तीखी इसलिये है कि वह सच है। वानर सचमुच काल की प्रेरणा से आये हैं। कुछ ही घंटे पहले उसकी पत्नी ने यही शब्द उसी की ओर इशारा करके कहा था। सुबह होते ही वह उसे शत्रु की ओर फेंक देता है। और कथा साथ ही उसे मूर्ख कह देती है।

आदेश छोटा है और भूख का है: “वीरो, चारों दिशाओं में जाइये, और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाइये।” न कोई व्यूह, न दरवाज़ा, न क्रम। और यहीं शिव पार्वती से एक छोटा, निर्दय दृष्टान्त कहते हैं: रावण को ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहरी पक्षी पैर ऊपर करके सोता है। वह नन्हा पक्षी चित लेटकर टाँगें आकाश की ओर उठा लेता है, मानो आकाश गिरे तो वही थाम लेगा। कोई उसे हराता नहीं। वह लेटा ही इस तरह है कि हारना तय है।

आज्ञा माँगकर राक्षस निकल पड़ते हैं, और उनके हाथों की लम्बी सूची है: भिंदिपाल, साँगी, तोमर, मुद्गर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी कृपाण, परिघ और पहाड़ों के टुकड़े। और इस भरी हुई सूची के तुरन्त बाद वह उपमा आती है जो सारा लोहा बेकार कर देती है।

जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरों का ढेर देखकर उस पर टूट पड़ते हैं और चोंच टूटने का दुख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े। लाल पत्थर दूर से मांस जैसे दीखते हैं। पक्षी भूख से उड़ता है, नाप से नहीं। जो टूटता है वह पत्थर नहीं, चोंच है। कथा पक्षियों को मूर्ख और इन राक्षसों को बेसमझ कहती है, और बीच में सिर्फ़ एक चित्र रखती है।

फिर गिनती आती है। अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण लिये करोड़ों बलवान, रणधीर राक्षस परकोटे के कँगूरों पर चढ़ जाते हैं। नीचे घेरा है, ऊपर कँगूरे हैं, और दोनों जगह भीड़ है।

पहला दिन

कँगूरों पर चढ़े वे ऐसे दीखते हैं मानो सुमेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। फिर जुझाऊ ढोल और डंके बजते हैं। एक ही ध्वनि के दो असर आमने-सामने रखे गये हैं: योद्धाओं के मन में चाव होता है। और नफ़ीरी तथा भेरी सुनकर कायरों के हृदय में दरारें पड़ जाती हैं। बाजा एक है। वह हर सुननेवाले के भीतर वही चीज़ बड़ी कर देता है जो पहले से वहाँ पड़ी है।

दीवार से नीचे जो दीखता है वह और डराता है: अत्यन्त विशाल शरीरवाले वानर और भालू, ठट्ट के ठट्ट। वे दौड़ते हैं और विकट घाटियों को कुछ नहीं गिनते। जहाँ पहाड़ रास्ता रोकता है, उसे पकड़कर फोड़ देते हैं और रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते हैं, गरजते हैं, दाँतों से अपने ओठ काटते हैं और ख़ूब डपटते हैं।

लड़ाई किसी बिगुल से शुरू नहीं होती। उधर रावण की दोहाई बोली जा रही है, इधर राम की। जय जय जय की ध्वनि उठी और लड़ाई छिड़ गयी। पहला हथियार दोनों तरफ़ आवाज़ है। उसके बाद पत्थर चलते हैं। राक्षस पहाड़ों के ढेर-के-ढेर शिखर फेंकते हैं, और वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और उन्हीं की ओर वापस चला देते हैं। जो ऊपर से आया, वह लौटकर ऊपर जाता है।

और यहीं कथा की चाल बदल जाती है। क्रियाएँ एक के पीछे एक बिना रुके आती हैं, और रुकने की जगह नहीं मिलती। यही इस युद्ध की आवाज़ है।

प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतों के टुकड़े ले-लेकर किले पर डालते हैं। वे झपटते हैं, राक्षसों के पैर पकड़कर उन्हें धरती पर पटकते हैं, भाग चलते हैं, और फिर मुड़कर ललकारते हैं। बहुत चंचल और तेजस्वी, वे तमककर उछलते हैं और चढ़-चढ़कर गढ़ पर पहुँच जाते हैं। और यह दौड़ जिस बात पर ठहरती है, वह यह है: वानर और भालू महलों पर चढ़कर जहाँ-तहाँ राम का यश गाने लगे। किले पर चढ़कर उनका पहला काम किसी को मारना नहीं, गाना है।

पीछे लौटना भी उनका अपने ढंग का है, और उसकी एक तरकीब है।

फिर एक-एक राक्षस को पकड़कर वानर भाग चले: ऊपर आप और नीचे राक्षस, इस तरह वे धरती पर आ गिरते हैं। दीवार ऊँची है, कूदना ही है, इसलिये कूदते समय एक राक्षस साथ ले लिया जाता है और गिरते समय उसे नीचे कर लिया जाता है। गिरना दोनों को है। चोट एक को लगती है।

भागती हुई सेना और एक तलवार

पहले दिन का पहला पलड़ा साफ़ झुकता है। राम के प्रताप से प्रबल वानरों के झुंड राक्षस योद्धाओं के समूह-के-समूह मसल देते हैं, फिर जहाँ-तहाँ दुर्ग पर चढ़कर सूर्य जैसे प्रतापी राम की जय बोलते हैं। राक्षसों के झुंड वैसे ही भाग चलते हैं जैसे तेज़ हवा चलने पर बादल तितर-बितर हो जाते हैं। जो बादल थोड़ी देर पहले सुमेरु के शिखरों पर बैठे थे, अब हवा में बिखर रहे हैं। उपमा वही है, और उसी में हार लिखी है।

अब दृष्टि नगर के भीतर जाती है, जहाँ लड़नेवाला कोई नहीं। लङ्का में बड़ा भारी हाहाकार मचता है: बालक रोते हैं, स्त्रियाँ रोती हैं, रोगी रोते हैं, वही तीन जो भाग भी नहीं सकते। और फिर सब मिलकर रावण को गालियाँ देने लगते हैं कि राज करते हुए इसने मृत्यु को बुला लिया। जो फ़ैसला मन्दोदरी ने रात में शयनकक्ष में सुनाया था, वही सुबह गली-गली में सुनाया जा रहा है। उसे अनसुना किया जा सकता था। इसे नहीं।

अपनी सेना का विचलित होना रावण अपने कानों से सुनता है। तब वह पहली बार कुछ करता है: भागते योद्धाओं को लौटाकर क्रोध में भरकर बोलता है।

“जिसे मैं अपने कानों से रण से भागा हुआ सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक कृपाण से मारूँगा। मेरा सर्वस्व खाया, तरह-तरह के भोग किये, और अब समरभूमि में प्राण प्यारे हो गये!” धमकी और ताना साथ-साथ हैं। वह सैनिकों को लड़ने का कारण नहीं, याद दिला रहा है कि उन्होंने उसका खाया है। सामने राम का प्रताप है। यहाँ पिछले भोजनों का हिसाब।

असर होता है। उग्र वचन सुनकर सब डर जाते हैं और लज्जित होकर, क्रोध करके लौट चलते हैं। पीछे एक तलवार है और सामने लाज। पर आगे एक बात और है। वह इन्हीं राक्षसों को थोड़ी ऊँचाई दे देती है: सम्मुख मरने में ही वीर की शोभा है, ऐसा जानकर तब उन्होंने प्राणों का लोभ छोड़ दिया। जिस डर से वे लौटे, उसी लौटने में वे डरना छोड़ भी देते हैं।

और इस बार की भिड़न्त अलग है। बहुत-से अस्त्र-शस्त्र लिये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ते हैं, और परिघों और त्रिशूलों से मार-मारकर भालू और वानरों को व्याकुल कर देते हैं। इस युद्ध में वानर पक्ष के लिये पहली बार एक कठिन शब्द आता है, व्याकुल। अब तक वे गरजते, दौड़ते, चढ़ते और गाते आये थे।

पश्चिम द्वार

और तब वह होता है जो इस लड़ाई में पहली बार होता है: वानर भय से आतुर होकर भागने लगते हैं। उसी साँस में शिव पार्वती से कह देते हैं कि आगे चलकर ये ही जीतेंगे। कहानी अपना अन्त बीच में ही खोल देती है, ठीक उस क्षण जब भगदड़ मची है। भरोसा दिलाने के लिये भी, और यह बताने के लिये भी कि जीत उस दिन के मैदान पर तय नहीं हो रही।

भागती भीड़ में से एक आवाज़ उठती है, और वह नामों की है: “अंगद और हनुमान कहाँ हैं? बलवान नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?” सेना जब बिखरती है तो वह नेतृत्व नहीं, नाम ढूँढ़ती है। पाँच नाम पुकारे जाते हैं, और उनमें से एक तक आवाज़ पहुँच जाती है।

हनुमान उस समय पश्चिम द्वार पर हैं। वहाँ मेघनाद उनसे लड़ रहा है, और द्वार टूटता ही नहीं। बड़ी भारी कठिनाई है। कठिन दरवाज़ा वही है जहाँ हनुमान खड़े हैं, और उसे रोकनेवाला रावण का पुत्र है। अपने दल की विकलता की ख़बर यहीं पहुँचती है।

हनुमान के मन में अत्यन्त क्रोध हुआ। काल के समान वह योद्धा प्रबल गर्जना करके कूदा, लङ्का के गढ़ के ऊपर आ गया, और पहाड़ लेकर मेघनाद की ओर दौड़ा। क्रोध, गर्जन, छलाँग, गढ़, पहाड़, दौड़: छह क्रियाएँ, और बीच में कोई रुककर कारण नहीं बताता। जिस दरवाज़े को तोड़ने में कठिनाई थी, वह वहीं रहता है, और हनुमान ऊपर से चले जाते हैं।

आगे चार क्रियाएँ: रथ तोड़ डाला, सारथि को मार गिराया, और मेघनाद की छाती में लात मारी। दूसरा सारथि उसे व्याकुल जानकर रथ में डालकर तुरन्त घर ले आया। मेघनाद यहाँ मरता नहीं। बेसुध घर पहुँचाया जाता है, और पहुँचानेवाला दूसरा सारथि है, क्योंकि पहला वहीं पड़ा है। जिस पुत्र पर रावण का भरोसा टिका है, उसका पहला दिन एक लात पर समाप्त हो जाता है।

अब कथा उस ख़बर का पीछा करती है। अंगद ने सुना कि हनुमान अकेले ही गढ़ पर चले गये हैं, और रण के बाँके बालिपुत्र उछलकर किले पर चढ़ गये। कथा इसे वानर का खेल कहती है। जो दीवार करोड़ों राक्षसों को रोकने के लिये बनी थी, उस पर चढ़ना एक वानर का खेल भर है। और चढ़ने का कारण लड़ाई नहीं। कारण यह है कि साथी अकेला चला गया।

रावण के महल की छत पर

अब दो वानर किले के भीतर हैं, और दोनों क्रुद्ध हैं। हृदय में राम के प्रताप का स्मरण करके वे दौड़कर रावण के भवन पर जा चढ़ते हैं और राम की दोहाई बोलते हैं। दिन भर में पहली बार युद्ध महल तक पहुँचा है, और उनका पहला काम किसी सैनिक से लड़ना नहीं है।

वे कलश सहित भवन को पकड़कर ढहा देते हैं। कलश महल के सबसे ऊपर लगा शिखर है, राजा के घर का सबसे ऊँचा बिन्दु। उसे पकड़कर पूरा भवन गिरा दिया जाता है। यह देखकर रावण डर जाता है। सुबह जो आदमी सारा त्रास भूलकर सिंहासन पर बैठा था, दोपहर तक उसका डर लौट आया है, और इस बार अपनी छत के गिरने की आवाज़ से लौटा है।

महल की स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटती हैं और कहती हैं, “अब की बार दो उत्पाती वानर आ गये!” पिछली बार एक आया था, और उसके अकेले आने पर नगर राख हो गया था। वह हिसाब इस घर में किसी को याद दिलाना नहीं पड़ता। सारा डर उस छोटे-से शब्द में है, दो।

दोनों वानर उन्हें वानरलीला करके, यानी उछल-कूद और घुड़की देकर, डराते हैं, और राम का सुयश सुनाते हैं। घुड़की और कीर्तन साथ चल रहे हैं। फिर सोने के खंभों को हाथों से पकड़कर वे आपस में कहते हैं, “अब उत्पात आरम्भ किया जाय।” जो अब तक हुआ, भवन का गिरना भी, वह उनके हिसाब से अभी शुरुआत नहीं थी।

उत्पात का मतलब तुरन्त सामने है। गरजकर वे शत्रु की सेना के बीच कूद पड़ते हैं और भारी भुजबल से उसका मर्दन करने लगते हैं। किसी की ख़बर लात से ली जाती है, किसी की थप्पड़ से, और हर चोट के साथ वे कहते हैं कि राम को न भजने का यह फल है। मार के साथ उपदेश चल रहा है, और उपदेश देनेवाला उसी क्षण मार भी रहा है।

एक को दूसरे से रगड़कर मसल डालते हैं, और सिरों को तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावण के सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दही के कूँड़े फूट रहे हों। निशाना तय है, रावण के सामने। उपमा रसोई की है, वह आवाज़ जो हर घर में सुनी हुई है। सिंहासन पर बैठा आदमी अब सिर्फ़ बैठा है, और उसकी सेना एक-एक करके उसके सामने पहुँचायी जा रही है।

जो मारे गये, उन्हें क्या मिला

और यहीं यह दृश्य अचानक युद्ध का दृश्य नहीं रहता। जिन बड़े-बड़े मुखियों को वे पकड़ पाते हैं, उनके पैर पकड़कर उन्हें राम के पास फेंक देते हैं। विभीषण उनके नाम बताते हैं, और राम उन्हें भी अपना धाम दे देते हैं। पहले पकड़, फिर फेंक, फिर नाम, फिर धाम। निर्णायक चीज़ विभीषण का बोलना है। मारा हुआ शत्रु जब तक अनजाना है, तब तक संख्या है। नाम लिये जाते ही वह व्यक्ति हो जाता है, और व्यक्ति को धाम मिलता है।

ब्राह्मणों का मांस खानेवाले वे दुष्ट नरभोजी भी वह गति पाते हैं जिसकी योगी याचना करते रह जाते हैं। और शिव पार्वती को इसका कारण बताते हैं: राम बहुत कोमल चित्तवाले और करुणा की खान हैं। और वे देखते हैं कि राक्षस वैरभाव से ही सही, उनका स्मरण तो करते ही हैं। हिसाब में स्मरण गिना जा रहा है, स्मरण का भाव नहीं। शत्रुता भी एक तरह का लगातार स्मरण है, और वही गिन ली जाती है।

फिर शिव युद्ध से मुँह मोड़कर सीधे पार्वती की ओर देखते हैं: ऐसा जानकर राम उन्हें परम गति देते हैं, और “कहिये, ऐसा कृपालु और कौन है?” और तुरन्त चोट: जो मनुष्य राम का ऐसा स्वभाव सुनकर भी भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम अभागे हैं। मैदान पर राक्षस मर रहे हैं और उन्हें धाम मिल रहा है। जो सुरक्षित बैठकर यह सुन रहा है, यह बात उसके लिये रखी है।

फिर दृश्य लौटता है, और लौटानेवाली आवाज़ राम की है: “अंगद और हनुमान दुर्ग में घुस गये हैं।” सुबेल की चोटी से वे दोनों को देख रहे हैं और साथियों को बता रहे हैं। और फिर एक उपमा में लङ्का के भीतर का सारा उत्पात बँध जाता है। दोनों वानर लङ्का में ऐसे शोभा दे रहे हैं जैसे दो मन्दराचल समुद्र को मथ रहे हों। नगर समुद्र है, दोनों वानर दो मथानियाँ, और जो ऊपर आ रहा है वह वही है जो नीचे पड़ा था।

भुजाओं के बल से शत्रु की सेना को कुचलकर और मसलकर, फिर दिन का अन्त होता देखकर दोनों कूद पड़े। वे वहाँ आ गये जहाँ राम थे, बिना थकान के। लौटने का कारण थकान नहीं, यह है कि दिन ढल गया। उनका काम सूरज के साथ बँधा था, और सूरज के जाते ही वे वहाँ आ जाते हैं जहाँ से सुबह चले थे।

दो सभाएँ, और काल का एक शब्द

एक ही सुबह दो सभाएँ लगती हैं। एक में स्वामी कहता है, विचार कीजिये। दूसरी में, जाइये और खा लीजिये। पहली में तीन लोग सोचते हैं, चार दल बनाते हैं, सेनापति चुनते हैं और यूथपतियों को समझाते हैं। दूसरी में एक आदमी हँसता है और सेना निकल जाती है। दिन के अन्त तक हिसाब सामने है। एक की सेना दीवार पर चढ़कर गा रही है, दूसरे के सिर उसी के सामने आकर फूट रहे हैं।

दूसरी बात काल की है, जो इस प्रसंग में दो बार बोला जाता है। रात में मन्दोदरी कहती हैं कि काल दण्ड लेकर नहीं मारता, बुद्धि हर लेता है, और जिसका समय पास आता है उसे ऐसा ही भ्रम होता है। सुबह रावण कहता है कि वानर काल की प्रेरणा से चले आये हैं। एक ने वह शब्द अपने घर की ओर घुमाया, दूसरे ने बाहर फेंक दिया। यही एक मोड़ इस काण्ड की दिशा तय करता है, और इसमें कोई हथियार शामिल नहीं।

और तीसरी बात देर तक साथ रहती है। इस दिन जो कुछ बड़ा हुआ, वह नाम लेने से हुआ। सेना मुँह से डंके बजाकर तीन नाम पुकारती है और लङ्का काँप जाती है। भागते हुए वानर हथियार नहीं ढूँढ़ते, पाँच नाम पुकारते हैं। अंगद और हनुमान मारते हुए भी एक नाम सुनाते चलते हैं। और मारे गये शत्रुओं को धाम भी इसीलिये मिलता है कि विभीषण उनके नाम बता देते हैं। इस दिन तलवारों से कम काम नामों से चला है।

इस प्रसंग का नाप भी कुछ कहता है। मन्दोदरी की समझाइश को पूरा विस्तार मिला है, जबकि मेघनाद के रथ का टूटना, सारथि का गिरना और उसका बेसुध घर पहुँचाया जाना पल भर में निपट जाता है। सबसे ज़्यादा जगह उस बातचीत को मिली है जो किसी काम नहीं आयी, और सबसे कम उस लड़ाई को जिसका नतीजा निकला।

और अन्त में जो चित्र बचता है, वह लड़ाई का नहीं है। दिन ढल रहा है, लङ्का के भीतर धूल बैठ रही है, महल का एक कोना गिरा पड़ा है। दो वानर दीवार से कूदकर उसी पहाड़ की ओर चल देते हैं जहाँ से सुबह निकले थे। उन्हें थकान नहीं है, और उन्होंने कुछ माँगा भी नहीं। वे बस वहाँ आ गये जहाँ राम थे, और दिन वहीं ख़त्म हो गया। जो सही जगह से चलता है, वह शाम को लौटकर भी वहीं आता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 36 से 45, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।