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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 4
अंगद रावण की सभा में
बालि का बेटा राम का दूत बनकर अपने पिता के पुराने मित्र की सभा में जा बैठता है। प्रसंग भर दो आदमी सिर्फ़ बोलते हैं।
पिछला प्रसंग एक आदमी के उठ खड़े होने पर समाप्त हुआ था। सुवेल की चोटी पर सुबह की सभा में जाम्बवान् ने सलाह दी थी कि बालि के पुत्र को दूत बनाकर भेजा जाय। अंगद ने वह आज्ञा सिर पर चढ़ाकर उसे अपना आदर माना था। कथा वहीं से आगे चलती है। एक जवान आदमी पहाड़ से उतरता है, उस नगरी के फाटक में अकेला घुसता है। वह उस सभा में जा बैठता है जहाँ बैठे हर व्यक्ति के पास उसे मार डालने का कारण भी है और साधन भी।
आगे जो होता है वह ताने की लड़ाई नहीं, बहस है। अंगद उस राजा के पुत्र हैं जिसे राम ने मारा। वे राम के भेजे हुए आये हैं। जिस आदमी की सभा में बैठे हैं वह उनके पिता का पुराना मित्र है। तीनों नाते एक-दूसरे को काटते हैं। अंगद जो कहते हैं वह इन्हीं पर खड़ा है, और रावण जो कहता है वह बार-बार इन्हीं को हिलाने की कोशिश है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। अंगद दोनों में दूत बनकर जाते हैं। पर इस सभा की बातचीत का यह रूप, “जगत् में कितने रावण हैं” वाली गिनती और राम के मनुष्य होने पर वह लम्बी दलील, मानस का अपना है।
बालिपुत्र और रावण की सभा
- अंगद बालि के पुत्र, जिनके पिता को राम ने मारा था। वे अब राम का दूत बनकर अपने पिता के पुराने मित्र की सभा में जाते हैं।
- रावण लङ्का का राजा, जो पहले हँसता है, फिर नाम पूछता है, फिर अपनी भुजाएँ दिखाता है। अन्त में वह अपने ही कटे हुए सिरों की गवाही में शिव को बुलाता है।
- रावण का पुत्र नगर के भीतर खेलता हुआ एक जवान, जिसका नाम इस पाठ में नहीं आता। उसकी मृत्यु अंगद के दरबार तक पहुँचने से पहले ही हो जाती है।
- बालि अंगद के पिता, जो इस सभा में कहीं नहीं हैं और लगभग हर बात में हैं।
- हनुमान जो इस सभा में नहीं हैं, पर जिनका किया हुआ काम दोनों पक्षों की दलील में बार-बार लौटता है।
- सभासद् रावण के दरबारी, जो अंगद को देखते ही बिना कहे उठ खड़े होते हैं, और उनके स्वामी को यही बात बुरी लगती है।
एक खेलता हुआ लड़का, और एक बात जो बढ़ गयी
चलने से पहले दो ही क्रियाएँ होती हैं, और दोनों झुकने की हैं: चरणों की वन्दना, और सबको सिर नवाना। दूत बनकर जानेवाला सभा से ऐसे निकलता है जैसे कोई घर से निकल रहा हो, मोर्चे पर नहीं।
चरणों की वन्दना करके और राम की प्रभुता हृदय में धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले। राम का प्रताप हृदय में धारण किये वे रणबाँकुरे बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं। निर्भयता सहज है, और उसका कारण प्रताप है, अपना पराक्रम नहीं। जिस नाम से उन्हें बुलाया गया है, बालि का बेटा, वह पूरी सभा में लौटता रहेगा। क्योंकि उस सभा में उनका अपना नाम कम काम आयेगा और पिता का नाम ज़्यादा।
नगर में घुसते ही जो पहली चीज़ सामने आती है वह न पहरा है, न सेना, न कोई मन्त्री। एक लड़का है, और वह खेल रहा है। कथा उसे रावण का बेटा कहती है और उसका नाम नहीं देती, आगे भी नहीं। लङ्का के फाटक के भीतर का पहला दृश्य युद्ध का नहीं है।
नगर में घुसते ही रावण के पुत्र से भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों ही बातों में झगड़ा बढ़ गया, क्योंकि दोनों अतुलनीय बलवान् थे और दोनों की जवानी थी। किसी ने किसी को शत्रु नहीं पहचाना। बात से बात बढ़ी, और दोनों के पास बल भी था और उम्र भी।
और फिर जो होता है, वह पल भर में निपट जाता है, बिना किसी तैयारी या विस्तार के।
उसने अंगद पर लात उठायी। अंगद ने वही पैर पकड़कर उसे घुमाकर ज़मीन पर दे पटका। जो चीज़ मारने के लिये उठायी गयी थी, वही पकड़ने की जगह बन गयी। सभा में आगे की बहस का ढंग भी यही रहेगा: जो हथियार सामने से आता है, उसी को पकड़कर लौटा दिया जाता है।
राक्षसों के समूह उस भारी योद्धा को देखकर जहाँ-तहाँ भाग चले, और डर के मारे पुकार तक नहीं मचा सके। वे एक-दूसरे से असली बात नहीं कहते। राजपुत्र का वध समझकर चुप मारकर रह जाते हैं। जिस दरबार में बुरी ख़बर लाने की क़ीमत चुकानी पड़ती हो, वहाँ ख़बर रुक जाती है, और राजा सबसे आख़िर में जानता है।
फिर भी नगर में कोलाहल मच जाता है, और जो अफ़वाह उड़ती है वह ग़लत है: जिसने लङ्का जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है। सब अत्यन्त भयभीत होकर सोचने लगते हैं कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। बिना पूछे ही लोग अंगद को रास्ता दिखा देते हैं, और जिस पर उनकी दृष्टि पड़ती है वही डर से सूख जाता है। एक अकेला आदमी नगर में चल रहा है और नगर उसे रास्ता बता रहा है।
राम के चरणों का स्मरण करके अंगद सभा के द्वार पर गये, और धीर, वीर और बल की राशि वे सिंह की-सी शान से इधर-उधर देखने लगे। भीतर स्मरण है, बाहर शान। वे जगह देख रहे हैं, कौन कहाँ बैठा है, दरवाज़े कहाँ हैं, कितने लोग हैं। दूत का पहला काम यही होता है।
काजल का एक जीवित पहाड़
द्वार पर पहुँचकर वे भीतर नहीं घुस जाते। एक राक्षस को भेजकर रावण तक अपने आने की सूचना भिजवाते हैं। जिस नगर में अभी राजपुत्र मारा गया है, उसी के राजा को वे विधिपूर्वक ख़बर भेजते हैं कि दूत द्वार पर है। आगे इसी पर बहस होगी कि दूत के साथ बरताव क्या किया जाता है।
सुनते ही रावण हँसकर कहता है, “बुलाकर लाइये, देखें कहाँ का बंदर है।” यह हँसी उसका पहला उत्तर है और उसकी पहली भूल भी। उसने दूत को तमाशा माना। और फिर वह क्षण आता है जिसमें अंगद पहली बार उस आदमी को देखते हैं जिससे उन्हें बात करनी है।
आज्ञा पाकर बहुत-से दूत दौड़े और वानरों में हाथी के समान अंगद को बुला लाये। अंगद ने रावण को ऐसे बैठे देखा जैसे कोई प्राणयुक्त काजल का पहाड़ हो। काजल का पहाड़ अपने-आप में एक चित्र है, गाढ़ा, चिकना, काला और ऊँचा। उसमें प्राण पड़ते ही वह चित्र नहीं रहता, ख़तरा बन जाता है।
फिर वही पहाड़ खुलता है: भुजाएँ वृक्ष, सिर पर्वत-शिखर, रोमावली मानो लताएँ, और मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वत की कन्दराएँ और खोह। यह सब अंगद एक शब्द बोलने से पहले देखते हैं।
फिर इस प्रसंग की रीढ़: अत्यन्त बलवान् बाँके बालिपुत्र सभा में गये और मन में ज़रा भी नहीं झिझके। भीतर कुछ नहीं मुड़ा। और तुरन्त वह होता है जिसका आदेश किसी ने नहीं दिया था: अंगद को देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए।
यह देखकर रावण के हृदय में बड़ा क्रोध हुआ। वह क्रोध अंगद पर नहीं है, क्योंकि अंगद ने अभी इतना ही किया है कि भीतर आये हैं। क्रोध अपनी सभा पर है, जो बिना कहे खड़ी हो गयी।
जैसे मतवाले हाथियों के झुंड में सिंह चला जाता है, वैसे ही राम के प्रताप का मन में स्मरण करके अंगद सभा में सिर नवाकर बैठ गये। सिंह की उपमा दी जा चुकी है, इसलिये यह झुकना डर नहीं है। यह वह शिष्टाचार है जो दूत उस सभा को देता है जिसमें बैठने आया है, और जिसे देकर वह अपनी बात कहने का हक़ पाता है।
मैं राम का दूत हूँ
पहला प्रश्न रावण का है, और बहुत छोटा: यह बंदर कौन है? इसमें पहचानने की नहीं, नाप लेने की इच्छा है। और उत्तर एक ही साँस में परिचय, नाता और प्रयोजन तीनों रख देता है।
अंगद ने कहा, “रावण, मैं राम का दूत हूँ। मेरे पिता से और आपसे मित्रता थी, इसलिये भाई, मैं आपकी भलाई के लिये ही आया हूँ।” तीन वाक्य, तीन नाते: स्वामी का, पिता का, और उन्हीं दोनों से निकला हित। सम्बोधन है, भाई। आगे जो भी कहा-सुना जायेगा, इन्हीं तीन वाक्यों पर खड़ा रहेगा।
फिर अंगद वह करते हैं जिसकी उस सभा में किसी को आशा नहीं रही होगी। वे रावण की प्रशंसा करते हैं, और बिना व्यंग्य के। “आपका उत्तम कुल है, आप पुलस्त्य ऋषि के पौत्र हैं। आपने शिव और ब्रह्मा की बहुत प्रकार से पूजा की है, वर पाये हैं और सब काम सिद्ध किये हैं। लोकपालों और सब राजाओं को जीत लिया है।” दूत की नीति यही है कि जिसके पास सन्धि लेकर जाया जाय उसकी बड़ाई पहले मानी जाय, वरना जो कहा जायेगा वह प्रस्ताव नहीं, हार का आदेश लगेगा।
फिर एक शब्द में मोड़ आता है: राजमद से, या मोहवश, “आप जगज्जननी सीता को हर लाये हैं।” कारण अंगद दो में से चुनने के लिये छोड़ देते हैं, और दोनों ऐसे हैं जिनमें आदमी अपने वश में नहीं रहता। वे लोभ नहीं कहते, काम नहीं कहते। वे लौटने का ऐसा रास्ता बनाकर देते हैं जिसमें आदमी का मान न जाय। और जगज्जननी कहकर यह भी बता देते हैं कि जो उठा लायी गयी हैं, वे कौन हैं। “अब मेरी हित की बात सुनिये। राम आपके सब अपराध क्षमा कर देंगे।”
फिर शर्तें आती हैं। वे कठोर हैं: “दाँतों में तिनका दबाइये, गले में कुल्हाड़ी डालिये, कुटुम्बियों सहित अपनी स्त्रियों को साथ लीजिये। आदरपूर्वक सीता को आगे कीजिये, और इस प्रकार सब भय छोड़कर चलिये।” दाँतों में तिनका हारे हुए पशु का चिह्न है। गले में कुल्हाड़ी का अर्थ है कि दण्ड का साधन वह स्वयं लाया है। कुटुम्ब का साथ इसलिये कि यह किसी एक का काम नहीं था। और सीता को आगे करने का अर्थ है कि उन्हें आदर सहित पहुँचाना है।
“और कहिये, शरणागत के पालनेवाले राम, मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। यह आर्त पुकार सुनते ही राम आपको निर्भय कर देंगे।” भारी शब्द है, सुनते ही: न कोई तपस्या, न अवधि, न परीक्षा। शर्त सिर्फ़ यह कि पुकार आर्त हो। पहले प्रशंसा, फिर कठिन शर्तें, और अन्त में उनकी क़ीमत इतनी कम कि वे शर्तें नहीं, दरवाज़ा लगने लगें।
नाम बताइये, और पिता का नाम भी
रावण का उत्तर दलील नहीं, डाँट है: “अरे बंदर के बच्चे, ज़बान सँभालिये! मूर्ख, मुझ देवताओं के शत्रु को पहचाना नहीं?” यह वही आदमी है जो अभी हँसकर पूछ रहा था कि कहाँ का बंदर है, और जिसकी सभा अभी बिना कहे उठ खड़ी हुई है। फिर वह वह प्रश्न पूछता है जो उसी को महँगा पड़ेगा: “अपना और अपने पिता का नाम बताइये। किस नाते से यह मित्रता मानी जाय?”
किसी भी अनजान दूत से यही पूछा जाता है। पर उस सभा में यही प्रश्न रावण को छोटा कर देगा, और वह उसे स्वयं पूछता है।
अंगद ने कहा, “मेरा नाम अंगद है, मैं बालि का पुत्र हूँ। उनसे कभी आपकी भेंट हुई थी?” यह सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया, और बोला, “हाँ, मैं जान गया, बालि नाम का एक बंदर था।” सकुचाना। वह क्रोधित नहीं होता, थोड़ा सिकुड़ जाता है। सभा के सामने एक पुराना नाम आ गया है जिसके साथ उसका अपना कोई क़िस्सा जुड़ा है।
और सँभलकर कही बात में भी चतुराई है। वह बालि को मित्र नहीं, “एक बंदर” कहता है, और नाम को जाति में डालकर नाता काट देता है। पर अंगद ने यही पूछा था कि कभी भेंट हुई थी, और उत्तर में मान लिया गया कि याद है। उन्हें इतना ही चाहिये था।
फिर कड़ी गालियाँ आती हैं: “तो आप ही बालि के लड़के हैं? अपने कुलरूपी बाँस के लिये आग बनकर पैदा हुए, कुलघातक! गर्भ में ही क्यों न नष्ट हो गये? व्यर्थ पैदा हुए, जो अपने ही मुँह से तपस्वियों के दूत कहलाये!” रावण को सबसे बुरा यह लगा कि एक राजपुत्र अपने को किसी का सेवक कहकर बुला रहा है। जिसकी पूरी दलील अपने बड़प्पन पर टिकी है, उसे किसी का छोटा होकर रहना समझ ही नहीं आता।
फिर वह जानते-बूझते पूछता है, “अब बालि की कुशल तो बताइये, वे आजकल कहाँ हैं?” अंगद उत्तर देने से पहले हँसते हैं। यह उनकी पहली हँसी है: “दस दिन बीतने पर स्वयं बालि के पास जाकर, अपने मित्र को हृदय से लगाकर, उन्हीं से कुशल पूछ लीजियेगा। राम से विरोध करने पर जैसी कुशल होती है, वह सब वे ही आपको सुना देंगे।”
और तुरन्त अंगद उस चाल का नाम ले देते हैं जो उन पर चली जा रही है। “भेद उसी के मन में पड़ सकता है जिसके हृदय में राम न हों।” दूत को उसके स्वामी से तोड़ना दरबारों का पुराना दाँव है। अंगद उसे चुपचाप सहने के बजाय सभा के सामने रख देते हैं, कि जो हो रहा है वह वे देख रहे हैं।
“सच है, मैं तो कुल का नाश करनेवाला हूँ, और रावण, आप कुल के रक्षक हैं। अंधे और बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, और आपके तो बीस नेत्र और बीस कान हैं।” गाली को नकारा नहीं गया, मान लिया गया, और उसके बग़ल में वह वाक्य रख दिया गया जिससे वह अपने-आप हास्यास्पद हो जाय। दस सिर, बीस आँखें, बीस कान, और इतने साधन रखकर भी जो दीख नहीं रहा, वह सामने बैठा है।
धर्म की चर्चा, और एक बहन
अंगद रुकते नहीं: “शिव, ब्रह्मा आदि देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा करना चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुल डुबा दिया? ऐसी बुद्धि होने पर भी आपका हृदय फट नहीं जाता?” यह दलील नहीं, एक आदमी का दूसरे की समझ पर सीधा आघात है, और सभा के सामने है।
रावण आँखें तरेरकर कहता है, “अरे दुष्ट, मैं आपके सब कठोर वचन इसलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्म जानता हूँ।” वह दूत को न मारने का श्रेय ले रहा है, और अंगद उसी दरवाज़े से भीतर चले जाते हैं।
अंगद ने कहा, “आपकी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है, कि आपने परायी स्त्री की चोरी की है। और दूत की रखवाली तो अभी अपनी आँखों से देख ली। ऐसे धर्म का व्रत धारण करनेवाले आप डूबकर मर क्यों नहीं जाते?” दूत की रखवाली अभी की बात है। रावण ने एक क्षण पहले जो उपकार जताया था, अंगद ने वही उठाकर उसके सामने रख दिया।
और तीसरा उदाहरण: “नाक-कान से रहित बहिन को देखकर आपने धर्म विचारकर ही तो क्षमा कर दिया था! आपकी धर्मशीलता जग-जाहिर है, और मैं भी बड़ा भाग्यवान् हूँ जो मैंने आपका दर्शन पाया।” जिस बहन की दशा से यह सारा युद्ध शुरू हुआ, उसे अंगद धर्म की बहस के बीच ला खड़ा करते हैं, बिना एक भी कठोर शब्द कहे। वाक्य प्रशंसा का है और अर्थ उलटा।
यह अंगद के व्यंग्य की चोटी है, और यहीं रावण बहस करना छोड़कर दिखाना शुरू कर देता है। धर्म से भुजाओं तक का यह उतार बिना रुके हो जाता है।
रावण ने कहा, “अरे जड़ जन्तु वानर, व्यर्थ बक-बक न कीजिये। मूर्ख, मेरी भुजाएँ तो देखिये। ये सब लोकपालों के विशाल बलरूपी चन्द्रमा को ग्रसने के लिये राहु हैं।” अपनी बीसों भुजाओं को उसने राहु कहा, वह ग्रह जो निगलता है और पचा नहीं सकता, क्योंकि उसके पास धड़ नहीं है। यह उपमा रावण के अपने मुँह से निकली है, और कोई उसे समझाता नहीं।
अगली बात उसी डींग को और ऊँचा ले जाती है: “आकाशरूपी तालाब में मेरी भुजाओंरूपी कमलों पर बसकर शिव सहित कैलास हंस की तरह शोभा पा रहा था।” जिस पर्वत को उसने उठाया था, उस पर बैठे शिव को वह अपनी भुजाओं की शोभा बता रहा है। जिसे उठाने में सारी शक्ति लगी थी, वह इस वाक्य में सिर्फ़ एक सजावट है।
कौन-सा योद्धा, और कितने रावण
भुजाएँ दिखाने के बाद रावण गिनती के मैदान में उतरता है। उस पर उसे बहुत भरोसा है: “सुनिये अंगद, अपनी सेना में बताइये, ऐसा कौन योद्धा है जो मुझसे भिड़ सकेगा?” और जो सूची वह गिनाता है, वह डींग नहीं, ख़ुफ़िया ख़बर है।
“आपके स्वामी स्त्री के वियोग में बलहीन हो रहे हैं, और उनका छोटा भाई उसी दुख से दुखी और उदास है। आप और सुग्रीव दोनों नदी किनारे के वृक्ष हैं। मेरा अपना छोटा भाई भी बड़ा डरपोक है।” टीका इस छोटे भाई को विभीषण बताती है। “मन्त्री जाम्बवान् बहुत बूढ़ा है, वह अब लड़ाई में क्या चढ़ेगा। नल और नील तो शिल्पकर्म जानते हैं। हाँ, एक वानर ज़रूर महान् बलवान् है, जो पहले आया था और जिसने लङ्का जलायी थी।”
नदी किनारे का पेड़ खड़ा तो रहता है, पर उसकी जड़ के नीचे से मिट्टी बह चुकी होती है। एक-एक नाम काटते हुए रावण आख़िरी नाम तक पहुँचता है, और जो अकेला नाम उसे डराता है वह उसी का है जो उसे पहले हरा चुका है। अंगद उसे वहीं से उठा लेते हैं।
अंगद कहते हैं, “राक्षसराज, सच्ची बात कहिये, क्या उस वानर ने सचमुच आपका नगर जला दिया? रावण का नगर एक छोटे-से वानर ने जला दिया, ऐसे वचन सुनकर उन्हें सत्य कौन कहेगा? जिसे आपने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा, वह तो सुग्रीव का एक छोटा-सा हरकारा है, जो बहुत चलता है, वीर नहीं है। उसे तो हमने केवल ख़बर लेने भेजा था।”
फिर वे और आगे जाते हैं: “क्या सचमुच उसने राम की आज्ञा पाये बिना नगर जला डाला? इसी डर से वह लौटकर सुग्रीव के पास नहीं गया और कहीं छिप रहा है।” आगे की बात इसी सुर में चलती है: “आप सब सत्य ही कहते हैं, सुनकर मुझे कुछ क्रोध नहीं। हमारी सेना में कोई ऐसा नहीं जो आपसे लड़ने में शोभा पाये। प्रीति और वैर बराबरीवाले से ही करना चाहिये। सिंह यदि मेढकों को मारे तो क्या उसे कोई भला कहेगा? और यद्यपि आपको मारने में राम की लघुता है और बड़ा दोष भी, तथापि क्षत्रिय जाति का क्रोध बड़ा कठिन होता है।”
और बीच में कवि बताते हैं कि सभा में हो क्या रहा है: वक्रोक्तिरूपी धनुष से वचनरूपी बाण मारकर अंगद ने शत्रु का हृदय जला दिया। और वीर रावण उन बाणों को मानो प्रत्युत्तररूपी सँड़सियों से निकाल रहा है। सँड़सी से धँसा काँटा खींचा जाता है, और हर खिंचाव के साथ वही चोट फिर लगती है।
रावण हँसकर अपनी सँड़सी उठाता है: “बंदर में यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है, उसका वह अनेक उपायों से भला करने की चेष्टा करता है। धन्य है वह बंदर जो मालिक के लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है, और नाच-कूदकर लोगों को रिझाकर मालिक का हित करता है। यही उसके धर्म की निपुणता है। अंगद, आपकी जाति स्वामिभक्त है, फिर आप अपने मालिक के गुण इस प्रकार क्यों न बखानेंगे? मैं गुणग्राहक और परम सुजान हूँ, इसी से आपकी जली-कटी बक-बक पर कान नहीं देता।”
अंगद गुणग्राहकता वाला शब्द भी वहीं पकड़ लेते हैं: “आपकी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमान ने सुनायी थी। उन्होंने अशोकवन उजाड़कर, आपके पुत्र को मारकर नगर जला दिया, तो भी आपने यही समझा कि उन्होंने आपका कुछ अपकार नहीं किया। आपका वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, रावण, मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान ने जो कहा था, वह मैंने आकर प्रत्यक्ष देख लिया, कि आपको न लज्जा है, न क्रोध, न चिढ़।”
इस पर रावण कहता है, “जब आपकी ऐसी बुद्धि है, तभी तो आप बाप को खा गये,” और हँसता है। अंगद का उत्तर एक ही कब्ज़े पर घूमता है: “पिता को खाकर फिर आपको भी खा डालता, परन्तु अभी तुरन्त कुछ और ही बात मेरी समझ में आ गयी।”
वे यह नहीं कहते कि मारने का कारण नहीं मिला। कारण मिला हुआ है और छोड़ा जा रहा है, और छोड़ने की वजह सामनेवाले में नहीं, अपने पिता के यश में है। और इसके तुरन्त बाद वह प्रश्न आता है जिसके लिये यह सारी बातचीत बनी थी।
“अरे नीच अभिमानी, बालि के निर्मल यश का पात्र जानकर मैं आपको नहीं मारता। रावण, यह तो बताइये कि जगत् में कितने रावण हैं? मैंने जितने रावण अपने कानों से सुन रखे हैं, वे सुनिये।” नाम को गिनती में बदल देना नाम की बड़ी हानि है, क्योंकि जो गिना जा सकता है वह अकेला नहीं रहता।
“एक रावण बलि को जीतने पाताल गया था, तब बच्चों ने उसे घुड़साल में बाँध रखा। बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। बलि को दया आयी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया। फिर एक रावण को सहस्रबाहु ने देखा, और दौड़कर उसे किसी विचित्र जन्तु की तरह पकड़ लिया और तमाशे के लिये घर ले आया। तब पुलस्त्य मुनि ने जाकर उसे छुड़ाया।”
दोनों क़िस्सों की बनावट एक है, और बनावट ही चोट है। दोनों में रावण मरता नहीं, छूट जाता है, और दोनों बार छुड़ानेवाला कोई और है: एक बार शत्रु की दया, एक बार बाबा की दौड़-धूप।
“एक रावण की बात कहने में तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है। वह बहुत दिनों तक बालि की काँख में रहा था। इनमें से आप कौन-से रावण हैं? खीझना छोड़कर सच-सच बताइये।” यह वार शान्त भी है और गहरा भी। अंगद ने अपने पिता की बड़ाई एक बार भी नहीं की। उन्होंने बस पिता को नाप बना दिया, और संकोच जताकर वह नाप सभा के बीच रख दिया।
मैं वही रावण हूँ
जो उत्तर आता है वह जीवनी है। रावण से पूछा गया था कि वह कौन-सा रावण है, और उसने बताना शुरू कर दिया कि वह कितना है।
रावण कहता है, “मूर्ख, सुनिये, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओं की लीला कैलास जानता है, जिसकी शूरता शिव जानते हैं, जिन्हें मैंने अपने सिररूपी फूल चढ़ा-चढ़ाकर पूजा था। सिररूपी कमल अपने हाथों से उतार-उतारकर मैंने अगणित बार शिव की पूजा की है। मेरी भुजाओं का पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदय में वह आज भी चुभ रहा है।”
“दिग्गज मेरी छाती की कठोरता जानते हैं। जब-जब मैं जाकर उनसे ज़बरदस्ती भिड़ा, उनके भयानक दाँत मेरी छाती में कभी नहीं गड़े, छाती से लगते ही मूली की तरह टूट गये। जिसके चलते समय पृथ्वी ऐसे हिलती है जैसे मतवाले हाथी के चढ़ते समय छोटी नाव, मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करनेवाले, क्या मेरे बारे में कभी कानों से नहीं सुना?”
गवाह कैलास है, जिसे उसने उठाया था। दिक्पाल हैं, जिनके हृदय में आज भी चुभन है। दिग्गज हैं, जिनके दाँत टूट गये। एक भी मित्र नहीं। एक आदमी अपने बड़प्पन के प्रमाण में दूसरों की पीड़ा गिना रहा है। सिर्फ़ शिव मित्र की तरह बुलाये गये हैं, और उन्हीं की पूजा में उसने अपने सिर काटे थे।
“उस रावण को आप छोटा कहते हैं और एक मनुष्य की बड़ाई करते हैं? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर, अब मैंने आपका ज्ञान जान लिया।” असभ्य कहकर वह सामनेवाले की सभ्यता पर उतरता है, तुच्छ कहकर उसके डील पर। बहस जब तर्क से हटकर शरीर के नाप और जाति के नाम पर उतर आये, तो तर्क चुक गया है।
क्या राम मनुष्य हैं
अब पहली बार अंगद के साथ क्रोध शब्द लगता है। अब तक उनके साथ हँसी, ठिठोली और संकोच आये थे, क्रोध नहीं। और क्रोध उस बात पर नहीं आया जो उनके बारे में कही गयी। उस बात पर आया जो उनके स्वामी के बारे में कही गयी। यह अन्तर अंगद का साफ़ चरित्र-चिह्न है।
और क्रोध में भी पहला वार गाली नहीं, नज़ीर है: “अरे नीच अभिमानी, सँभालकर बोलिये। जिनका फरसा सहस्रबाहु की भुजाओंरूपी अपार वन को जलाने के लिये अग्नि के समान था, जिनके फरसेरूपी समुद्र की तीव्र धारा में अनगिनत राजा अनेक बार डूब गये। उनका गर्व जिन्हें देखते ही भाग गया, अभागे रावण, वे मनुष्य क्योंकर हैं?” गीताप्रेस की टीका उस फरसेवाले का नाम परशुराम बताती है।
नज़ीर का चुनाव भी कारीगरी है। अंगद ने अभी वह क़िस्सा सुनाया था जिसमें सहस्रबाहु एक रावण को तमाशे की तरह घर उठा लाया था। अब वे उसी सहस्रबाहु को मिटा देनेवाले का नाम ले आये हैं, और याद दिला दिया है कि उसका गर्व किसके सामने भागा था।
“क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड, राम मनुष्य हैं? कामदेव भी क्या धनुर्धारी है, और गङ्गा क्या नदी हैं? कामधेनु क्या पशु है, और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है? अन्न भी क्या दान है, और अमृत क्या रस है?” हर जोड़ा श्रेणी को झुठलाता नहीं, दिखाता है कि श्रेणी चीज़ को समेट नहीं पाती। गङ्गा नदी भी हैं, पर नदी कहकर बात ख़त्म नहीं होती।
सूची आगे बढ़ती है: “गरुड़ क्या पक्षी हैं, शेष क्या सर्प हैं, रावण, चिन्तामणि भी क्या पत्थर है? मूर्ख, सुनिये, वैकुण्ठ भी क्या लोक है, और राम की अखण्ड भक्ति क्या और लाभों जैसा ही एक लाभ है?” जो सूची धनुष और नदी से शुरू हुई थी, वह लोक और भक्ति पर आकर रुकती है, और उसी क्रम में उसका पूरा तर्क है।
“सेना समेत आपका मान मथकर, अशोकवन उजाड़कर, नगर जलाकर और आपके पुत्र को मारकर जो लौट गये, क्यों रे दुष्ट, वे हनुमान क्या वानर हैं?” बात उसी नाम पर लौट आयी है जिसे रावण ने स्वयं उठाया था। अंगद ने पहले उस नाम को हरकारा कहकर छोटा किया था। और अब उसी नाम से उस शब्द पर प्रश्न बना दिया है जिससे यह सारी सभा उन्हें बुला रही थी: वानर।
बीस समुद्र, और एक साक्षी
इसके बाद अंगद दलील छोड़कर चेतावनी पर आते हैं, और चेतावनी में भी पहले प्रार्थना है: “रावण, सुनिये, चतुराई छोड़कर कृपा के समुद्र राम का भजन क्यों नहीं करते? यदि आप राम के द्रोही हुए तो आपको ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे।”
और फिर कड़ा चित्र: “व्यर्थ गाल न बजाइये। राम से वैर करने पर ऐसा हाल होगा कि आपके सिरों के समूह राम के बाण लगते ही वानरों के आगे पृथ्वी पर पड़ेंगे। रीछ-वानर उन गेंद जैसे अनेक सिरों से चौगान खेलेंगे। जब राम युद्ध में कोप करेंगे और उनके बहुत-से तीक्ष्ण बाण छूटेंगे, तब क्या आपका ऐसा गाल चलेगा? ऐसा विचारकर उदार राम को भजिये।”
चौगान घोड़े पर बैठकर डंडे और गेंद से खेला जानेवाला खेल है। अपमान सिर गिरने का नहीं, इस बात का है कि गिरकर वे सिर सामान बन जायेंगे। यह उस आदमी से कहा जा रहा है जो सिर काट-काटकर चढ़ाने को अपनी बड़ी बात मानता है।
ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा, मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्नि में घी पड़ गया हो। और जलकर वह फिर नामों की सूची गिनाता है: “कुम्भकर्ण जैसा मेरा भाई है, इन्द्र का शत्रु सुप्रसिद्ध मेरा पुत्र है।” टीका उसे मेघनाद बताती है। “और मेरा पराक्रम तो आपने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् जीत लिया है।”
फिर वह समुद्र पर आता है, और कमज़ोर तर्क को ज़ोरदार आवाज़ में कहता है: “वानरों की सहायता जोड़कर समुद्र बाँध लिया, बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेक पक्षी भी लाँघ जाते हैं, पर इसी से वे सब शूरवीर नहीं हो जाते। मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जल से भरा है, जिसमें बहुत-से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। ये बीस समुद्र अथाह और अपार हैं। कौन ऐसा वीर है जो इनका पार पा जायगा?”
और अन्त में वह उसी बात को हथियार बनाता है जिसने अंगद को वहाँ पहुँचाया था: “मैंने दिक्पालों तक से जल भरवाया। और मुझे एक राजा का सुयश सुनाया जा रहा है! यदि आपका मालिक, जिसकी गुणगाथा आप बार-बार कहते हैं, संग्राम का योद्धा है, तो वह दूत किसलिये भेजता है? शत्रु से प्रीति करते उसे लाज नहीं आती? पहले कैलास का मथन करनेवाली मेरी भुजाओं को देखिये, फिर अपने मालिक की सराहना कीजिये।”
इस तर्क की चोट असली है, क्योंकि हर सन्धि-प्रस्ताव इसी ख़तरे में जाता है, कि बढ़ाया हुआ हाथ दुर्बलता पढ़ लिया जाय। हित उसी का किया जा रहा है जो हित की हर पेशकश को डर का सबूत मान रहा है।
“रावण के समान शूरवीर कौन है, जिसने अपने ही हाथों से सिर काट-काटकर अत्यन्त हर्ष के साथ बहुत बार उन्हें अग्नि में होम दिया? स्वयं शिव इसके साक्षी हैं।” बहस यहीं थमती है, एक डींग पर जिसका इकलौता गवाह एक देवता है। जो अपने सिर देकर वर पाता आया है, उससे अभी कहा गया है कि उसके सिर गेंद बन जायेंगे।
तीन नाते और उठे हुए सभासद्
इस पूरे प्रसंग में दो आदमी बोलते हैं और कोई किसी को नहीं बदलता, फिर भी बहस ठहरी हुई नहीं लगती, क्योंकि यहाँ ज़मीन की परीक्षा हो रही है। अंगद की ज़मीन उनके पहले वाक्य में थी। वे उससे एक बार भी नहीं हटते: “मैं राम का दूत हूँ, मेरे पिता आपके मित्र थे, इसलिये मैं आपके हित के लिये आया हूँ।”
दूसरी बात देर तक खटकती है। रावण एक प्रश्न का उत्तर कभी नहीं देता। उससे पूछा गया था कि जो स्त्री उसके घर में है, उसका क्या किया जाय। वह उत्तर में अपनी भुजाएँ बताता है, अपने कटे हुए सिर, अपना भाई, अपना पुत्र, अपने बीस समुद्र। हर उत्तर अपने नाप का है। जो प्रश्न किसी और की ओर देखता था, उस दिशा में उसके पास कोई वाक्य ही नहीं।
और एक बात बिना किसी के कहे हुई थी। सभासद् उठ खड़े हुए थे। किसी ने आदेश नहीं दिया था, किसी ने पहचान नहीं करायी थी। एक आदमी भीतर आया और उस कमरे ने कुछ पहचान लिया। रावण का क्रोध वहीं से शुरू होता है, एक शब्द बोले जाने से पहले।
इस सभा में अंगद को अपने नाम से बहुत कम बुलाया गया है: बालिपुत्र, बालिकुमार, बालि का बेटा। उस सभा में पिता का नाम प्रमाण भी है और चुभन भी, क्योंकि वह नाम रावण का मित्र भी था और उससे बड़ा भी निकला। इसीलिये गिनती शुरू होते ही वह नाप अपने-आप बन जाता है, और अंगद को पिता की एक भी बड़ाई नहीं करनी पड़ती।
चलते समय मिली एक हिदायत सभा में शुरू से अन्त तक काम करती दीखती है: ऐसी बातचीत कीजिये जिससे अपना काम हो और शत्रु का हित हो। प्रशंसा दी गयी ताकि लौटने में मान न जाय। कारण मोह बताया गया ताकि दोष कम पड़े। कड़ी शर्तों के अन्त में यह रखा गया कि सुनते ही निर्भय कर देंगे। ठिठोली भी इसी ओर चलती रही, कि सामनेवाला अपने को एक बार वैसा देख ले जैसा वह बाहर से दीखता है। अन्त तक यही कोशिश चली, और सभा में एक भी आदमी नहीं हिला।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 18 से 28, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।