रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · अंगद रावण की सभा में
अंगद रावण की सभा में
बालि का बेटा राम का दूत बनकर अपने पिता के पुराने मित्र की सभा में जा बैठता है, और ग्यारह दोहों तक दो आदमी सिर्फ़ बोलते हैं।
पिछला प्रसंग एक आदमी के उठ खड़े होने पर समाप्त हुआ था। सुवेल की चोटी पर सुबह की सभा जुड़ी थी, जाम्बवान् ने सलाह दी थी कि बालिपुत्र को दूत बनाकर भेजा जाय, और अंगद ने वह आज्ञा सिर पर चढ़ाकर उसे भेजा जाना नहीं, अपना आदर माना था। यह पन्ना वहीं से चलता है। एक जवान आदमी पहाड़ से उतरता है, उस नगरी के फाटक में अकेला घुसता है, और उस सभा में जा बैठता है जहाँ बैठे हुए हर एक व्यक्ति के पास उसे मार डालने का कारण भी है और साधन भी।
और जो आगे होता है वह ताने की लड़ाई नहीं है, बहस है। अंगद का बल किसी एक चीज़ पर टिका हुआ है और वह चीज़ बहुत ख़ास है। वे उस राजा के पुत्र हैं जिसे राम ने मारा, वे राम के भेजे हुए आये हैं, और जिस आदमी की सभा में जा बैठे हैं वह उनके पिता का पुराना मित्र है। तीनों नाते एक ही देह में हैं और तीनों एक-दूसरे को काटते हैं। इस पन्ने पर अंगद जो कुछ कहते हैं, वह इन्हीं तीन नातों पर खड़ा है, और रावण जो कुछ कहता है वह बार-बार इन्हीं तीनों को हिलाने की कोशिश है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में अंगद दूत बनकर जाते हैं, पर इस सभा की बातचीत का जो रूप यहाँ मिलता है, कितने रावण जगत् में हैं वाली गिनती और श्रीराम के मनुष्य होने पर वह लम्बी दलील, वह तुलसी की अपनी है। इस पन्ने की हर घटना, हर नाम और हर क्रम इसी अवधी पाठ से लिया गया है और कहीं से नहीं। दोहा अठारह से अट्ठाईस तक।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- अंगद बालि के पुत्र, जिनके पिता को राम ने मारा था और जो अब राम का दूत बनकर अपने पिता के पुराने मित्र की सभा में जाते हैं।
- रावण लङ्कापति, जो पहले हँसता है, फिर नाम पूछता है, फिर अपनी भुजाएँ दिखाता है, और अन्त में अपने ही कटे हुए सिरों की गवाही में शिव को बुलाता है।
- रावण का पुत्र नगर के भीतर खेलता हुआ एक जवान, जिसका नाम इस पाठ में नहीं आता, और जिसकी मृत्यु अंगद के दरबार तक पहुँचने से पहले ही हो जाती है।
- बालि अंगद के पिता, जो इस पन्ने पर कहीं नहीं हैं और लगभग हर पंक्ति में हैं।
- हनुमान जो इस सभा में नहीं हैं, पर जिनका किया हुआ काम दोनों पक्षों की दलील में बार-बार लौटकर आता है।
- सभासद् रावण के दरबारी, जो अंगद को देखते ही बिना कहे उठ खड़े होते हैं, और अपने स्वामी को उस पूरी सभा में यही एक बात सबसे बुरी लगती है।
एक खेलता हुआ लड़का, और एक बात जो बढ़ गयी
चलने से पहले जो होता है वह दो क्रियाओं में निपट जाता है, और दोनों क्रियाएँ झुकने की हैं। चरणों की वन्दना, और सबको सिर नवाना। दूत बनकर जानेवाला आदमी सभा से इस तरह निकलता है जैसे कोई घर से निकल रहा हो, न कि मोर्चे पर। और उसी साँस में तुलसी वह चीज़ भी रख देते हैं जो उसे उस दूर की सभा तक ले जायेगी।
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई॥
चौपाई १
प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका॥
चरणों की वन्दना करके और प्रभु की प्रभुता हृदय में धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले। प्रभु का प्रताप हृदय में धारण किये हुए वे रणबाँकुरे बाँके बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं। यहाँ जो शब्द सबसे ज़ोर से बजता है वह सहज है, और असंका का कारण प्रताप बताया गया है, अपना पराक्रम नहीं। और जिस नाम से उन्हें बुलाया गया है, बालिसुत, वह इस पूरे पन्ने पर लौटता रहेगा, क्योंकि जिस सभा में वे जा रहे हैं वहाँ उनका अपना नाम कम काम आयेगा और पिता का नाम ज़्यादा।
नगर में घुसते ही जो पहली चीज़ सामने आती है वह न पहरा है, न सेना, न कोई मन्त्री। एक लड़का है, और वह खेल रहा है। तुलसी उसे रावण का बेटा कहते हैं और उसका नाम नहीं देते, इस पाठ में आगे भी नहीं। लङ्का के फाटक के भीतर का पहला दृश्य युद्ध का नहीं है।
पुर पैठत रावन कर बेटा । खेलत रहा सो होइ गै भेटा॥
चौपाई २
बातहिं बात करष बढ़ि आई । जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई॥
नगर में प्रवेश करते ही रावण के पुत्र से भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों ही बातों में खिंचाव बढ़ आया। दोनों ही अतुलनीय बलवान् थे, और फिर दोनों की जवानी थी। कारण जिस ढंग से दिया गया है वह ध्यान माँगता है। तुलसी यह नहीं कहते कि किसी ने किसी को शत्रु पहचाना, वे कहते हैं कि बात से बात बढ़ी, और दोनों के पास बल भी था और उम्र भी।
और फिर वह होता है जिसे तुलसी एक ही अर्धाली में निपटा देते हैं, बिना किसी तैयारी के और बिना किसी विस्तार के।
तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई । गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई॥
चौपाई ३
उसने अंगद पर लात उठायी। अंगद ने वही पैर पकड़कर उसे घुमाकर ज़मीन पर दे पटका। पहली अर्धाली में उकसावा है और दूसरी में मृत्यु, बीच में कुछ भी नहीं। जो चीज़ मारने के लिये उठायी गयी थी, वही पकड़ने की जगह बन गयी। इस पन्ने पर आगे जितनी बहस होगी, उसका ढंग भी यही रहेगा, कि जो हथियार सामने से आता है उसी को पकड़कर लौटा दिया जाता है।
राक्षसों के समूह उस भारी योद्धा को देखकर जहाँ-तहाँ भाग चले, और पुकार तक नहीं मचा सके। इसके बाद एक पंक्ति ऐसी आती है जो उस दरबार के बारे में सबसे ज़्यादा बता जाती है। वे एक-दूसरे से असली बात नहीं कहते, उसका वध समझकर चुप मारकर रह जाते हैं। डर मृत्यु का नहीं है, ख़बर पहुँचाने का है। जिस दरबार में बुरी ख़बर लाने की क़ीमत चुकानी पड़ती हो, वहाँ ख़बर रुक जाती है, और राजा सबसे आख़िर में जानता है।
फिर भी नगर में कोलाहल मच जाता है, और जो अफ़वाह उड़ती है वह ग़लत है। लोग कहते हैं कि जिसने लङ्का जलायी थी वही वानर फिर आ गया है। सब अत्यन्त भयभीत होकर सोचने लगते हैं कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। और फिर वह ब्योरा आता है जो डर को नाप देता है। बिना पूछे ही लोग रास्ता दिखा देते हैं, और जिस पर दृष्टि पड़ती है वही सूख जाता है। एक अकेला आदमी नगर के भीतर चल रहा है और नगर उसे रास्ता बता रहा है।
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।
दोहा १८
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥ १८॥
श्रीराम के चरणकमलों का स्मरण करके तब वे सभा के दरबार में गये, और धीर, वीर और बल की राशि वे सिंह की-सी ऐंड़ से इधर-उधर देखने लगे। इस दोहे में दो क्रियाएँ एक साथ रखी हैं और वे दो अलग जगहों की हैं। भीतर स्मरण है, बाहर ठवनि है। और इत उत चितव पर रुकना चाहिये। वे सिर झुकाकर नहीं चलते, वे जगह देख रहे हैं, कौन कहाँ बैठा है, दरवाज़े कहाँ हैं, कितने लोग हैं। दूत का पहला काम यही होता है।
सार: अंगद प्रभु का प्रताप हृदय में धरकर चलते हैं। लङ्का में घुसते ही रावण के उस पुत्र से भेंट होती है जो वहाँ खेल रहा था, बात से बात बढ़ती है, वह लात उठाता है और अंगद वही पैर पकड़कर उसे पटक देते हैं। राक्षस भाग जाते हैं और डर के मारे आपस में भी बात नहीं करते। नगर में अफ़वाह फैलती है कि लङ्का जलानेवाला वानर लौट आया है, और अंगद सिंह की चाल से सभा के दरबार पर पहुँचते हैं।
काजल का एक जीवित पहाड़
दरबार पर पहुँचकर वे भीतर नहीं घुस जाते। वे एक राक्षस को भेजकर रावण तक अपने आने की सूचना भिजवाते हैं। यह छोटी-सी बात है और बहुत बड़ी है। जिस नगर में अभी-अभी राजपुत्र मारा गया है, उसी नगर के राजा के पास वे विधिपूर्वक ख़बर भेजते हैं कि दूत द्वार पर खड़ा है। आगे इसी बात पर बहस होगी कि दूत के साथ बरताव क्या किया जाता है।
सुनते ही रावण हँसकर कहता है कि बुला लाओ, देखें कहाँ का बंदर है। यह हँसी और यह वाक्य उसका पहला उत्तर है और उसकी पहली भूल भी। उसने दूत को मनुष्य नहीं, तमाशा माना। आज्ञा पाकर बहुत से दूत दौड़ते हैं और वानरों में हाथी के समान अंगद को बुला लाते हैं। और फिर वह क्षण आता है जिसमें अंगद पहली बार उस आदमी को देखते हैं जिससे उन्हें बात करनी है।
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए॥
चौपाई ४
अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें॥
आज्ञा पाकर बहुत से दूत दौड़े और वानरों में हाथी के समान अंगद को बुला लाये। अंगद ने रावण को ऐसे बैठे देखा जैसे कोई प्राणयुक्त काजल का पहाड़ हो। इस उपमा में सारा काम सहित प्रान करता है। काजल का पहाड़ अपने-आप में एक चित्र है, गाढ़ा, चिकना, काला और ऊँचा। तुलसी उसमें प्राण डाल देते हैं, और तब वह चित्र नहीं रहता, ख़तरा बन जाता है। और काजल वही काला है जो आँखों में लगाया जाता है, सजा हुआ काला।
अगली चौपाई उसी पहाड़ को खोलकर रख देती है। भुजाएँ वृक्षों के समान हैं और सिर पर्वतों के शिखरों के समान। रोमावली मानो बहुत सी लताएँ हैं। मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वत की कन्दराओं और खोहों के बराबर हैं। पूरी देह एक भूगोल बन गयी है, जिसमें जंगल भी है, चोटियाँ भी, बेलें भी और गुफाएँ भी। और यह सब वह है जो अंगद एक शब्द बोलने से पहले देखते हैं।
इसके बाद जो एक अर्धाली आती है वह इस पन्ने की रीढ़ है। अत्यन्त बलवान् बाँके वीर बालिपुत्र सभा में गये और मन में ज़रा भी नहीं झिझके। मुरा शब्द मुड़ने का है। भीतर कुछ भी नहीं मुड़ा। और उसके तुरन्त बाद वह होता है जिसका आदेश किसी ने नहीं दिया था। अंगद को देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए।
यह देखकर रावण के हृदय में बड़ा क्रोध हुआ, और उस क्रोध का पता ध्यान से लगाना चाहिये। वह क्रोध अंगद पर नहीं है, क्योंकि अंगद ने अभी इतना ही किया है कि भीतर आये हैं। क्रोध अपनी ही सभा पर है, जो बिना कहे खड़ी हो गयी।
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ।
दोहा १९
राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥ १९॥
जैसे मतवाले हाथियों के झुंड में सिंह चला जाता है, वैसे ही श्रीराम के प्रताप का मन में स्मरण करके वे सभा में सिर नवाकर बैठ गये। इस दोहे की आख़िरी क्रिया पर रुकना ज़रूरी है। सिरु नाइ। वे तनकर नहीं बैठते, सिर नवाकर बैठते हैं। सिंह की उपमा दी जा चुकी है, इसलिये यह झुकना डर का नहीं पढ़ा जा सकता। यह वह शिष्टाचार है जो दूत उस सभा को देता है जिसमें वह बैठने आया है, और जिसे देकर वह अपनी बात कहने का हक़ पा लेता है।
सार: अंगद एक राक्षस के हाथ अपने आने की सूचना भिजवाते हैं और रावण हँसकर उन्हें बुलवा लेता है। वे उसे जीवित काजल के पहाड़ जैसा बैठा देखते हैं, जिसकी भुजाएँ वृक्ष हैं, सिर शिखर हैं और मुँह-नाक-नेत्र-कान पहाड़ की कन्दराएँ। सभा में जाते हुए उनका मन ज़रा नहीं झिझकता। उन्हें देखते ही सब सभासद् उठ खड़े होते हैं और रावण के हृदय में इसी पर बड़ा क्रोध होता है।
मैं रघुवीर का दूत हूँ
पहला प्रश्न रावण का है और वह बहुत छोटा है। यह बंदर कौन है। इस प्रश्न में पहचानने की इच्छा नहीं है, नाप लेने की इच्छा है। और जो उत्तर आता है वह एक ही अर्धाली में अपना पूरा परिचय, अपना नाता और अपना प्रयोजन तीनों रख देता है।
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥
चौपाई ५
मम जनकहि तोहि रही मिताई । तव हित कारन आयउँ भाई॥
रावण ने पूछा कि यह बंदर कौन है। अंगद ने कहा कि हे दशग्रीव, मैं श्रीरघुवीर का दूत हूँ। मेरे पिता से और आपसे मित्रता थी, इसलिये हे भाई, मैं आपकी भलाई के लिये ही आया हूँ। तीन वाक्य, तीन नाते। पहला नाता स्वामी का है, मैं दूत हूँ। दूसरा नाता पिता का है, मेरे पिता आपके मित्र थे। और तीसरा उन्हीं दोनों से निकला हुआ है, इसलिये मैं आपके हित के लिये आया हूँ। और सम्बोधन भाई है। पूरे पन्ने पर आगे जो भी कहा-सुना जायेगा, वह इन्हीं तीन पंक्तियों पर खड़ा रहेगा।
इसके बाद अंगद वह करते हैं जिसकी उस सभा में किसी को आशा नहीं रही होगी। वे रावण की प्रशंसा करते हैं, और बिना व्यंग्य के। आपका उत्तम कुल है, आप पुलस्त्य ऋषि के पौत्र हैं, आपने शिव की और ब्रह्मा की बहुत प्रकार से पूजा की है, वर पाये हैं और सब काम सिद्ध किये हैं, लोकपालों और सब राजाओं को जीत लिया है। दूत की नीति यही है कि जिसके पास सन्धि लेकर जाया जाय उसकी बड़ाई पहले मानी जाय, वरना जो कहा जायेगा वह प्रस्ताव नहीं, हार का आदेश लगेगा।
और फिर मोड़ आता है, और वह एक ही शब्द में आता है। राजमद से, या मोहवश। सीता को हर लाने का कारण अंगद दो में से कोई भी चुनने के लिये छोड़ देते हैं, और दोनों ही कारण ऐसे हैं जिनमें आदमी अपने वश में नहीं रहता। वे लोभ नहीं कहते, वे काम नहीं कहते। वे एक ऐसा रास्ता बनाकर देते हैं जिससे लौटने पर आदमी का मान न जाय। और साथ ही जगदंबा शब्द रखकर यह भी बता देते हैं कि जो उठा लायी गयी हैं वे कौन हैं।
फिर शर्तें आती हैं, और वे कठोर हैं। दाँतों में तिनका दबाइये, गले में कुल्हाड़ी डालिये, कुटुम्बियों सहित अपनी स्त्रियों को साथ लीजिये, आदरपूर्वक जानकीजी को आगे कीजिये, और इस प्रकार सब भय छोड़कर चलिये। इन चारों का अपना-अपना अर्थ है। दाँतों में तिनका हारे हुए पशु का चिह्न है, कि मैं खाने योग्य नहीं, छोड़ दीजिये। गले में कुल्हाड़ी का अर्थ है कि दण्ड का साधन मैं स्वयं साथ लाया हूँ। कुटुम्ब और स्त्रियों का साथ होना इसलिये है कि यह किसी एक का काम नहीं था। और जानकीजी को आगे करने का अर्थ है कि उन्हें लौटाना नहीं है, आदर सहित पहुँचाना है।
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।
दोहा २०
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि॥ २०॥
और कहिये कि हे शरणागत के पालनेवाले रघुवंशशिरोमणि, मेरी रक्षा कीजिये, अब मेरी रक्षा कीजिये। आर्त वाणी सुनते ही प्रभु आपको निर्भय कर देंगे। इस दोहे में जो शब्द सबसे हल्का दीखता है वही सबसे भारी है, सुनत। सुनते ही। कोई तपस्या नहीं माँगी गयी, कोई अवधि नहीं रखी गयी, कोई परीक्षा नहीं रखी गयी। शर्त सिर्फ़ यह है कि पुकार आर्त हो। अंगद ने पहले पूरी प्रशंसा दी, फिर कठिन शर्तें रखीं, और अन्त में उन शर्तों की क़ीमत इतनी कर दी कि वे शर्तें नहीं, दरवाज़ा लगने लगें।
सार: अंगद अपना परिचय तीन नातों में देते हैं, कि वे रघुवीर के दूत हैं, कि उनके पिता से रावण की मित्रता थी, और कि वे उसी के हित के लिये आये हैं। फिर वे रावण के कुल, उसकी पूजा और उसकी विजयों की खुली प्रशंसा करते हैं, और तब कहते हैं कि राजमद या मोह में उसने जगदंबा सीता को हर लिया। शर्तें रखते हैं, दाँतों में तिनका, गले में कुल्हाड़ी, कुटुम्ब साथ और जानकी आगे, और कहते हैं कि आर्त पुकार सुनते ही प्रभु निर्भय कर देंगे।
नाम बताइये, और पिता का नाम भी
रावण का उत्तर दलील नहीं है, वह ढंग की डाँट है। अरे बंदर के बच्चे, सँभालकर बोल। मूर्ख, मुझ देवताओं के शत्रु को पहचाना नहीं। यह वही आदमी है जो अभी-अभी हँसकर कह रहा था कि देखें कहाँ का बंदर है, और जिसकी सभा अभी-अभी बिना कहे उठ खड़ी हुई है। और फिर वह प्रश्न पूछता है जो उसी को महँगा पड़ेगा। अपना और अपने पिता का नाम बताइये, और यह भी बताइये कि किस नाते से यह मित्रता मानी जाय।
प्रश्न स्वाभाविक है, किसी भी अनजान दूत से यही पूछा जाता है। पर यह वह अकेला प्रश्न है जिसका उत्तर उस सभा में रावण को छोटा कर देगा, और वह उसे स्वयं पूछता है।
अंगद नाम बालि कर बेटा । तासों कबहुँ भई ही भेटा॥
चौपाई ६
अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना॥
अंगद ने कहा कि मेरा नाम अंगद है, मैं बालि का पुत्र हूँ। उनसे कभी आपकी भेंट हुई थी। अंगद का वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया, और बोला कि हाँ, मैं जान गया, बालि नाम का एक बंदर था। इस चौपाई में सबसे कीमती शब्द सकुचाना है। वह क्रोधित नहीं होता, वह थोड़ा सिकुड़ जाता है। सभा के सामने, जहाँ अभी वह अपनी देवद्रोहिता सुना रहा था, अचानक एक पुराना नाम आ गया है जिसके साथ उसका अपना कोई क़िस्सा जुड़ा हुआ है।
और जो वह सँभलकर कहता है, उसमें भी एक चतुराई है। वह बालि को मित्र नहीं कहता, वह कहता है कि बालि नाम का एक बंदर था। नाम को जाति में डाल देने से नाता कट जाता है। पर अंगद ने पूछा यही था कि कभी भेंट हुई थी, और उत्तर में मान लिया गया कि हाँ, याद है। इतना ही उन्हें चाहिये था।
इसके बाद गालियाँ आती हैं और वे बहुत कड़ी हैं। बालि का लड़का ही है। अपने कुल रूपी बाँस के लिये आग बनकर पैदा हुआ, कुलघातक। गर्भ में ही क्यों न नष्ट हो गया, व्यर्थ ही पैदा हुआ, जो अपने ही मुँह से तपस्वियों का दूत कहलाया। यह आख़िरी चोट देखने लायक़ है। रावण को सबसे बुरा यह नहीं लगा कि अंगद आये, बल्कि यह लगा कि एक राजपुत्र अपने-आप को किसी का सेवक कहकर बुला रहा है। जिस आदमी की पूरी दलील अपने बड़प्पन पर टिकी है, उसे किसी का छोटा होकर रह जाना समझ ही नहीं आता।
और फिर वह सबसे निर्दय प्रश्न पूछता है। अब बालि की कुशल तो बताइये, वे आजकल कहाँ हैं। यह जानते हुए पूछा गया है। अंगद उत्तर देने से पहले हँसते हैं, और यह उनकी पहली हँसी है। दस दिन बीतने पर स्वयं ही बालि के पास जाकर, अपने मित्र को हृदय से लगाकर, उन्हीं से कुशल पूछ लीजिये, क्योंकि श्रीराम से विरोध करने पर जैसी कुशल होती है, वह सब वे ही सुना देंगे।
और तुरन्त बाद अंगद उस चाल का नाम ले देते हैं जो उन पर चली जा रही है। भेद उसी के मन में पड़ सकता है जिसके हृदय में श्रीरघुवीर न हों। दूत को उसके स्वामी से तोड़ना किसी भी दरबार का सबसे पुराना दाँव है, और अंगद उसे चुपचाप सहने के बजाय सभा के सामने रख देते हैं कि यह जो हो रहा है, मैं देख रहा हूँ कि क्या हो रहा है।
हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।
दोहा २१
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस॥ २१॥
सच है, मैं तो कुल का नाश करनेवाला हूँ और हे दशशीश, आप कुल के रक्षक हैं। अंधे और बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, आपके तो बीस नेत्र और बीस कान हैं। इस दोहे की बनावट पूरी तरह लौटाने की है। गाली को नकारा नहीं गया, मान लिया गया, और उसी के बग़ल में वह वाक्य रख दिया गया जिससे वह अपने-आप हास्यास्पद हो जाय। और आख़िरी पंक्ति में जो गणित है वह पूरी सभा के सामने खुला है। दस सिर हैं, इसलिये बीस आँखें और बीस कान हैं, और इतना देखने-सुनने का साधन रखकर भी जो दीख नहीं रहा वह सामने बैठा है।
सार: रावण अंगद का और उनके पिता का नाम पूछता है। अंगद बताते हैं कि वे बालि के पुत्र हैं और पूछते हैं कि क्या कभी भेंट हुई थी। रावण सकुचा जाता है और कहता है कि बालि नाम का एक बंदर था। फिर वह अंगद को कुलघातक कहकर गालियाँ देता है और बालि की कुशल पूछता है। अंगद हँसकर कहते हैं कि दस दिन में स्वयं जाकर अपने मित्र से पूछ लीजिये, और यह भी कि भेद उसी मन में पड़ता है जिसमें रघुवीर न हों।
धर्म की चर्चा, और एक बहन
अंगद रुकते नहीं। शिव, ब्रह्मा आदि देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा करना चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुल डुबा दिया। ऐसी बुद्धि होने पर भी आपका हृदय फट नहीं जाता। यह प्रश्न दलील नहीं है, यह एक आदमी का दूसरे आदमी की समझ पर सीधा आघात है, और सभा के सामने है।
रावण आँखें तरेरकर जो कहता है वह इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा दरवाज़ा खोल देता है। अरे दुष्ट, मैं आपके सब कठोर वचन इसलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्म को जानता हूँ। यानी वह दूत को न मारने का श्रेय ले रहा है। और अंगद उसी दरवाज़े से भीतर चले जाते हैं।
कह कपि धर्मसीलता तोरी । हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥
चौपाई ७
देखी नयन दूत रखवारी । बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥
अंगद ने कहा कि आपकी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है, कि आपने परायी स्त्री की चोरी की है। और दूत की रखवाली तो अभी अपनी आँखों से देख ली। ऐसे धर्म के व्रत को धारण करनेवाले आप डूबकर मर क्यों नहीं जाते। इसमें जो सबसे तेज़ है वह दूत रखवारी है, क्योंकि वह अभी-अभी की बात है। एक क्षण पहले रावण ने यह कहकर उपकार जताया था कि मैं धर्म जानता हूँ इसलिये सह रहा हूँ, और अंगद ने उसी उपकार को उठाकर उसी के सामने रख दिया।
और तीसरा उदाहरण सबसे भारी है। नाक-कान से रहित बहिन को देखकर आपने धर्म विचारकर ही तो क्षमा कर दी थी। आपकी धर्मशीलता जग-जाहिर है, और मैं भी बड़ा भाग्यवान् हूँ जो मैंने आपका दर्शन पा लिया। जिस बहन की दशा से यह सारा युद्ध शुरू हुआ, उसे अंगद धर्म की बहस के बीच में ला खड़ा करते हैं, और बिना एक भी कठोर शब्द कहे। वाक्य प्रशंसा का है और अर्थ उलटा है, और सभा में बैठा हर आदमी दोनों सुन रहा है।
यह अंगद के व्यंग्य की चोटी है, और यही वह जगह है जहाँ रावण बहस करना छोड़ देता है और दिखाना शुरू कर देता है। धर्म से भुजाओं तक का यह उतार एक ही दोहे में हो जाता है।
जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।
दोहा २२ (क)
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु॥ २२ (क)॥
पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास॥ २२ (ख)॥
रावण ने कहा कि अरे जड़ जन्तु वानर, व्यर्थ बक-बक न कर, अरे मूर्ख, मेरी भुजाएँ तो देख। ये सब लोकपालों के विशाल बल रूपी चन्द्रमा को ग्रसने के लिये राहु हैं। इस उपमा में उसने अपनी बीसों भुजाओं को राहु कहा है, यानी वह ग्रह जो निगलता है और पचा नहीं सकता, क्योंकि उसके पास धड़ नहीं है। तुलसी यह बात कहीं समझाते नहीं, वे उपमा रावण के ही मुँह से निकलवा देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
इसके तुरन्त बाद वाला दोहा उसी डींग को और ऊँचा ले जाता है। आकाश रूपी तालाब में मेरी भुजाओं रूपी कमलों पर बसकर शिवजी सहित कैलास हंस के समान शोभा पा रहा था। यह चित्र सुन्दर है और उसी सुन्दरता में उसका दोष है। जिस पर्वत को उसने उठाया था, उस पर्वत पर बैठे हुए जो हैं, उन्हीं को वह अपनी भुजाओं की शोभा बता रहा है। जिसे उठाने में सारी शक्ति लगी थी, वह इस वाक्य में सिर्फ़ एक सजावट है।
सार: रावण कहता है कि वह नीति और धर्म जानता है इसलिये ये कठोर वचन सह रहा है। अंगद उसी धर्मशीलता के तीन प्रमाण गिना देते हैं, परायी स्त्री की चोरी, दूत की रखवाली जो अभी आँखों से देखी, और बिना नाक-कान की बहन को क्षमा कर देना। रावण बहस छोड़कर अपनी भुजाएँ दिखाता है, उन्हें लोकपालों के बल रूपी चन्द्रमा को ग्रसनेवाले राहु कहता है, और कैलास को अपनी भुजाओं के कमलों पर बैठा हंस बताता है।
कौन-सा योद्धा, और कितने रावण
भुजाएँ दिखाने के बाद रावण उस मैदान में उतरता है जिस पर उसे सबसे ज़्यादा भरोसा है, गिनती के मैदान में। सुनिये अंगद, अपनी सेना में बताइये, ऐसा कौन योद्धा है जो मुझसे भिड़ सकेगा। और जो सूची वह गिनाता है वह डींग नहीं है, वह ख़ुफ़िया ख़बर है।
आपके स्वामी स्त्री के वियोग में बलहीन हो रहे हैं, और उनका छोटा भाई उसी दुख से दुखी और उदास है। आप और सुग्रीव दोनों नदी किनारे के वृक्ष हैं। मेरा अपना छोटा भाई, जिसे टीका विभीषण बताती है, वह भी बड़ा डरपोक है। मन्त्री जाम्बवान् बहुत बूढ़ा है, वह अब लड़ाई में क्या चढ़ेगा। नल और नील तो शिल्पकर्म जानते हैं। हाँ, एक वानर ज़रूर महान् बलवान् है, जो पहले आया था और जिसने लङ्का जलायी थी।
कूलद्रुम की उपमा पर रुकना चाहिये। नदी किनारे का पेड़ खड़ा तो रहता है, पर उसकी जड़ के नीचे से मिट्टी बह चुकी होती है। एक-एक नाम काटते हुए वह आख़िरी नाम तक पहुँचता है, और जो अकेला नाम उसे डराता है वह उसी का है जो उसे पहले हरा चुका है। यह बात उसने सभा के सामने स्वयं कही है, और अंगद उसे वहीं से उठा लेते हैं।
अंगद कहते हैं कि हे राक्षसराज, सच्ची बात कहिये, क्या उस वानर ने सचमुच आपका नगर जला दिया। रावण का नगर एक छोटे से वानर ने जला दिया, ऐसे वचन सुनकर उन्हें सत्य कौन कहेगा। जिसे आपने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा है, वह तो सुग्रीव का एक छोटा-सा हरकारा है, जो बहुत चलता है, वीर नहीं है। उसे तो हमने केवल ख़बर लेने भेजा था।
फिर वे और आगे जाते हैं। क्या सचमुच उसने प्रभु की आज्ञा पाये बिना नगर जला डाला, और इसी डर से लौटकर सुग्रीव के पास नहीं गया और कहीं छिप रहा। इसके बाद के दोहे इसी सुर में चलते हैं। आप सब सत्य ही कहते हैं, सुनकर मुझे कुछ क्रोध नहीं है, हमारी सेना में कोई ऐसा नहीं है जो आपसे लड़ने में शोभा पाये। प्रीति और वैर बराबरीवाले से ही करना चाहिये, सिंह यदि मेढकों को मारे तो क्या उसे कोई भला कहेगा। और यद्यपि आपको मारने में श्रीराम की लघुता है और बड़ा दोष भी, तथापि क्षत्रिय जाति का क्रोध बड़ा कठिन होता है।
और इसी जगह तुलसी एक क्षण के लिये बाहर आकर बता देते हैं कि सभा में हो क्या रहा है। वक्रोक्ति रूपी धनुष से वचन रूपी बाण मारकर अंगद ने शत्रु का हृदय जला दिया, और वीर रावण उन बाणों को मानो प्रत्युत्तर रूपी सँड़सियों से निकाल रहा है। सँड़सी से धँसा हुआ काँटा खींचा जाता है, और उसे चलाना पड़ता है, यानी हर उत्तर के साथ एक बार फिर वही चोट लगती है।
रावण हँसकर अपनी सँड़सी उठाता है। बंदर में यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है, उसका वह अनेकों उपायों से भला करने की चेष्टा करता है। धन्य है वह बंदर जो मालिक के लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है, और नाच-कूदकर लोगों को रिझाकर मालिक का हित करता है, यही उसके धर्म की निपुणता है। हे अंगद, आपकी जाति स्वामिभक्त है, फिर आप अपने मालिक के गुण इस प्रकार क्यों न बखानेंगे। मैं गुणग्राहक और परम सुजान हूँ, इसीसे आपकी जली-कटी बक-बक पर कान नहीं देता।
अंगद उस गुणग्राहकता वाले शब्द को भी वहीं पकड़ लेते हैं। आपकी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे पवनसुत ने सुनायी थी। उन्होंने अशोकवन को तहस-नहस करके, आपके पुत्र को मारकर नगर को जला दिया, तो भी उन्होंने आपका कुछ अपकार नहीं किया। आपका वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशकन्धर, मैंने कुछ धृष्टता की है। और हनुमान ने जो कहा था वह मैंने आकर प्रत्यक्ष देख लिया, कि आपको न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है।
इस पर रावण वह बात कहता है जो शायद वह देर से सँभाले बैठा था। जब आपकी ऐसी बुद्धि है तभी तो आप बाप को खा गये। और यह कहकर वह हँसता है। अंगद का उत्तर एक ही कब्ज़े पर घूमता है। पिता को खाकर फिर आपको भी खा डालता, परन्तु अभी तुरन्त कुछ और ही बात मेरी समझ में आ गयी।
वे यह नहीं कहते कि मारने का कारण नहीं मिला। वे कहते हैं कि कारण मिला हुआ है और छोड़ा जा रहा है, और छोड़ने की वजह भी सामनेवाले के भीतर की नहीं है, अपने पिता के यश की है। और इसके तुरन्त बाद वह प्रश्न आता है जिसके लिये यह सारी बातचीत बनी हुई थी।
बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी॥
चौपाई ८
कहु रावन रावन जग केते । मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते॥
अरे नीच अभिमानी, बालि के निर्मल यश का पात्र जानकर मैं आपको नहीं मारता। रावण, यह तो बताइये कि जगत् में कितने रावण हैं। मैंने जितने रावण अपने कानों से सुन रखे हैं, वे सुनिये। नाम को गिनती में बदल देना नाम की सबसे बड़ी हानि है, क्योंकि जो गिना जा सकता है वह अकेला नहीं रहता।
पहला। एक रावण बलि को जीतने पाताल गया था, तब बच्चों ने उसे घुड़साल में बाँध रखा। बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। बलि को दया लगी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया। दूसरा। एक रावण को सहस्रबाहु ने देखा और दौड़कर उसे किसी विचित्र जन्तु की तरह पकड़ लिया, और तमाशे के लिये घर ले आया, तब पुलस्त्य मुनि ने जाकर उसे छुड़ाया।
दोनों क़िस्सों की बनावट एक ही है और वह बनावट ही चोट है। दोनों में रावण मरता नहीं, दोनों में वह छूट जाता है, और दोनों बार छुड़ानेवाला कोई और है। एक बार शत्रु की दया, एक बार बाबा की दौड़-धूप। उस नाम के साथ अब दो ऐसी कहानियाँ जुड़ चुकी हैं जिनमें उसे कोई और छुड़ाकर लाया था।
एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख।
दोहा २४
इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख॥ २४॥
एक रावण की बात कहने में तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है, वह बहुत दिनों तक बालि की काँख में रहा था। इनमें से आप कौन-से रावण हैं, खीझना छोड़कर सच-सच बताइये। यह वार सबसे शान्त है और सबसे गहरा। अंगद ने अपने पिता की बड़ाई एक बार भी नहीं की। उन्होंने बस इतना किया कि अपने पिता को नाप बना दिया, और फिर संकोच जताकर वह नाप सभा के बीच में रख दिया।
सार: रावण पूछता है कि सेना में कौन उससे भिड़ेगा, और एक-एक करके राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, अपने छोटे भाई, जाम्बवान्, नल और नील को काट देता है, पर एक वानर को महान् बलवान् मान लेता है, वही जिसने लङ्का जलायी थी। अंगद उसी स्वीकारोक्ति को पकड़कर उस वानर को सुग्रीव का मामूली हरकारा बता देते हैं। रावण बंदर की स्वामिभक्ति पर ठिठोली करता है और पिता को खा जाने वाली बात कहता है। अंगद उत्तर में जगत् के रावण गिनाते हैं, पाताल में बच्चों के हाथों बँधा हुआ, सहस्रबाहु के घर तमाशा बना हुआ, और वह जो बालि की काँख में रहा था, और पूछते हैं कि इनमें से आप कौन हैं।
मैं वही रावण हूँ
जो उत्तर आता है वह प्रश्न का उत्तर नहीं है। वह जीवनी है। और यही इस पन्ने पर रावण की सबसे बड़ी हार है, कि उससे पूछा गया कि आप कौन-से हैं, और उसने बताना शुरू कर दिया कि मैं कितना हूँ।
सुनिये, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओं की लीला कैलास जानता है। जिसकी शूरता उमापति जानते हैं, जिन्हें अपने सिर रूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था। सिर रूपी कमलों को अपने हाथों से उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि की पूजा की है। मेरी भुजाओं का पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदय में वह आज भी चुभ रहा है।
दिग्गज मेरी छाती की कठोरता जानते हैं। जब-जब मैं जाकर उनसे ज़बरदस्ती भिड़ा, उनके भयानक दाँत कभी मेरी छाती में नहीं गड़े, बल्कि छाती से लगते ही मूली की तरह टूट गये। जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथी के चढ़ते समय छोटी नाव। मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करनेवाले, क्या मुझको कानों से कभी नहीं सुना।
इस पूरी गवाही में देखने की बात यह है कि गवाह कौन बुलाये गये हैं। कैलास, जिसे उसने उठाया था। दिक्पाल, जिनके हृदय में आज भी चुभन है। दिग्गज, जिनके दाँत टूट गये। एक भी मित्र नहीं है, और एक आदमी अपने बड़प्पन के प्रमाण में दूसरों की पीड़ा गिना रहा है। सिर्फ़ उमापति मित्र की तरह बुलाये गये हैं, और उन्हीं की पूजा में उसने अपने सिर काटे थे।
तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान।
दोहा २५
रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान॥ २५॥
उस रावण को आप छोटा कहते हैं और मनुष्य की बड़ाई करते हैं। अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर, अब मैंने आपका ज्ञान जान लिया। दो शब्द ख़ास हैं, बर्बर और खर्ब। पहला यह कहता है कि सामनेवाला सभ्य नहीं है, दूसरा यह कि वह छोटे डील का है। बहस जब तर्क से हटकर देह के नाप और जाति के नाम पर उतर आये, तो यह मान लेना चाहिये कि तर्क चुक गया है। रावण की सबसे बड़ी पंक्तियाँ इसी पन्ने पर हैं और वे सब अपने ही बारे में हैं।
सार: कौन-से रावण होने के प्रश्न पर रावण अपनी जीवनी सुनाने लगता है। कैलास उसकी भुजाओं की लीला जानता है, उमापति उसकी शूरता, जिनकी पूजा उसने अपने सिर काटकर की थी। दिक्पालों के हृदय में उसकी चोट आज भी है और दिग्गजों के दाँत उसकी छाती से लगकर मूली की तरह टूट गये। और फिर दोहे में वह अंगद को असभ्य और तुच्छ कहकर उलाहना देता है कि उस रावण को छोटा कहकर एक मनुष्य की बड़ाई की जा रही है।
क्या श्रीराम मनुष्य हैं
अब पहली बार अंगद के साथ क्रोध शब्द लगता है। सकोप। अब तक तुलसी ने उन्हें हँसी दी थी, ठिठोली दी थी, संकोच दिया था, क्रोध नहीं। और क्रोध उस बात पर नहीं आया जो उनके बारे में कही गयी, वह उस बात पर आया जो उनके स्वामी के बारे में कही गयी। यह अन्तर इस पूरे पन्ने का सबसे साफ़ चरित्र-चिह्न है।
और क्रोध में भी पहला वार गाली नहीं है, नज़ीर है। जिनका फरसा सहस्रबाहु की भुजाओं रूपी अपार वन को जलाने के लिये अग्नि के समान था, जिनके फरसे रूपी समुद्र की तीव्र धारा में अनगिनत राजा अनेकों बार डूब गये, और जिन्हें देखते ही जिनका गर्व भाग गया, अरे अभागे दशशीश, वे मनुष्य क्योंकर हैं। गीताप्रेस की टीका उस फरसेवाले का नाम परशुराम बताती है।
इस नज़ीर के चुनाव में एक कारीगरी है। कुछ ही क्षण पहले अंगद ने वह क़िस्सा सुनाया था जिसमें सहस्रबाहु एक रावण को तमाशे की तरह घर उठा लाया था। अब वे उसी सहस्रबाहु को मिटा देनेवाले का नाम ले आये हैं, और यह भी याद दिला दिया है कि उसी का गर्व किसके सामने भागा था।
राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥
चौपाई ९
पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा॥
क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड, श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य हैं। कामदेव भी क्या धनुर्धारी है, और गङ्गाजी क्या नदी हैं। कामधेनु क्या पशु है, और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है। अन्न भी क्या दान है, और अमृत क्या रस है। इस दलील की बनावट जोड़ों की है, और हर जोड़ा एक ही काम करता है। वह श्रेणी को झुठलाता नहीं, वह दिखाता है कि श्रेणी चीज़ को समेट नहीं पाती। गङ्गा जल ही हैं और नदी ही हैं, और नदी कहकर बात ख़त्म नहीं होती।
और सूची आगे बढ़ती है। गरुड़जी क्या पक्षी हैं, शेषजी क्या सर्प हैं, चिन्तामणि भी क्या पत्थर है। और फिर वह वहाँ पहुँचती है जहाँ पहुँचना था। सुनिये मतिमन्द, वैकुण्ठ भी क्या लोक है, और श्रीरघुनाथजी की अखण्ड भक्ति क्या और लाभों जैसा ही एक लाभ है। जो सूची धनुष और नदी से शुरू हुई थी वह लोक और भक्ति पर आकर रुकती है, और उसी क्रम में उसका पूरा तर्क बसा है।
सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि।
दोहा २६
कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि॥ २६॥
सेना समेत आपका मान मथकर, अशोकवन को उजाड़कर, नगर को जलाकर और आपके पुत्र को मारकर जो लौट गये, क्यों रे दुष्ट, वे हनुमान् क्या वानर हैं। यह दोहा उसी नाम पर लौट आया है जिसे रावण ने स्वयं उठाया था जब उसने कहा था कि एक वानर ज़रूर महान् बलवान् है। अंगद ने उस नाम को पहले छोटा किया था, हरकारा कहकर, और अब उसी नाम को उठाकर उस शब्द पर प्रश्न बना दिया है जिस शब्द से यह सारी सभा उन्हें बुला रही थी। वानर।
सार: पहली बार अंगद क्रोध में बोलते हैं, और क्रोध अपने अपमान पर नहीं, स्वामी के अपमान पर है। वे उस फरसेवाले की नज़ीर देते हैं जिसने सहस्रबाहु की भुजाओं का वन जलाया और जिसका गर्व श्रीराम को देखते ही भाग गया। फिर वे जोड़े गिनाते हैं, कामदेव, गङ्गा, कामधेनु, कल्पवृक्ष, अन्न, अमृत, गरुड़, शेष, चिन्तामणि, वैकुण्ठ और रघुनाथ की भक्ति, और पूछते हैं कि श्रीराम मनुष्य कैसे हुए। दोहे में वही प्रश्न हनुमान के लिये दोहराते हैं।
बीस समुद्र, और एक साक्षी
इसके बाद अंगद दलील छोड़कर चेतावनी पर आ जाते हैं, और चेतावनी में भी पहले प्रार्थना है। सुनिये रावण, चतुराई छोड़कर कृपा के समुद्र श्रीरघुनाथजी का भजन क्यों नहीं करते। यदि आप श्रीराम के द्रोही हुए तो आपको ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे।
और फिर वह चित्र आता है जो सबसे कड़ा है। व्यर्थ गाल न बजाइये, श्रीराम से वैर करने पर ऐसा हाल होगा कि सिरों के समूह बाण लगते ही वानरों के आगे पृथ्वी पर पड़ेंगे, और रीछ-वानर उन गेंद जैसे अनेकों सिरों से चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथजी युद्ध में कोप करेंगे, तब क्या ऐसा गाल चलेगा। ऐसा विचारकर उदार श्रीराम को भजिये।
चौगान घोड़े पर बैठकर डंडे और गेंद से खेला जानेवाला खेल है। इस चित्र में अपमान सिर गिरने का नहीं है, अपमान यह है कि गिरने के बाद वे सिर सामान बन जायेंगे। और यह उसी आदमी से कहा जा रहा है जो अपने सिर काट-काटकर चढ़ाने को अपनी सबसे बड़ी बात मानता है।
ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा, मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्नि में घी पड़ गया हो। और जलकर वह फिर वही करता है, नामों की सूची गिनाता है। कुम्भकर्ण जैसा मेरा भाई है, इन्द्र का शत्रु सुप्रसिद्ध मेरा पुत्र है, जिसे टीका मेघनाद बताती है। और मेरा पराक्रम तो सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् जीत लिया है।
फिर वह समुद्र पर आता है, और यही उसका सबसे कमज़ोर तर्क है और सबसे ज़ोरदार आवाज़ में कहा गया है। वानरों की सहायता जोड़कर समुद्र बाँध लिया, बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं, पर इसीसे वे सब शूरवीर नहीं हो जाते। मेरी एक-एक भुजा रूपी समुद्र बल रूपी जल से भरा है, जिसमें बहुत से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। ये बीस समुद्र अथाह और अपार हैं, कौन ऐसा वीर है जो इनका पार पा जायगा।
और अन्त में वह उस बात को हथियार बनाता है जिस बात ने अंगद को वहाँ पहुँचाया था। मैंने दिक्पालों तक से जल भरवाया और मुझे एक राजा का सुयश सुनाया जा रहा है। यदि आपका मालिक संग्राम का योद्धा है, जिसकी गुणगाथा बार-बार कही जा रही है, तो फिर वह दूत किसलिये भेजता है। शत्रु से प्रीति करते उसे लाज नहीं आती। पहले कैलास का मथन करनेवाली मेरी भुजाओं को देखिये, फिर अपने मालिक की सराहना कीजिये।
इस तर्क की चोट असली है, क्योंकि हर सन्धि-प्रस्ताव इसी ख़तरे में जाता है, कि जो हाथ बढ़ाया जाय उसे दुर्बलता पढ़ लिया जाय। हित उसी का किया जा रहा है जो हित की हर पेशकश को डर का सबूत मान रहा है।
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।
दोहा २८
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस॥ २८॥
रावण के समान शूरवीर कौन है, जिसने अपने ही हाथों से सिर काट-काटकर अत्यन्त हर्ष के साथ बहुत बार उन्हें अग्नि में होम दिया। स्वयं गौरीपति शिवजी इस बात के साक्षी हैं। यह पन्ना यहीं समाप्त होता है, और जिस वाक्य पर समाप्त होता है वह एक डींग है जिसका इकलौता गवाह एक देवता है, और एक यज्ञ है जिसमें दी जानेवाली वस्तु सिर थी। जो आदमी अपने सिर देकर वर पाता आया है, उससे अभी-अभी यह कहा गया है कि उसके सिर गेंद बन जायेंगे। दोनों वाक्य एक ही सभा में, एक के बाद एक कहे गये हैं।
सार: अंगद चेतावनी देते हैं कि चतुराई छोड़कर भजन कीजिये, नहीं तो ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे, और कटे हुए सिरों से रीछ-वानर चौगान खेलेंगे। रावण घी पड़ी आग की तरह जल उठता है, कुम्भकर्ण और अपने पुत्र का नाम लेता है, समुद्र बाँधने को मामूली बताता है क्योंकि पक्षी भी समुद्र लाँघ जाते हैं, अपनी बीस भुजाओं को अथाह समुद्र कहता है, और दूत भेजने को ही दुर्बलता का प्रमाण बताता है। अन्त में वह अपने काटे हुए सिरों के होम की डींग हाँकता है और शिव को साक्षी बनाता है।
और अन्त में, अपनी ओर
ग्यारह दोहों तक दो आदमी बोलते हैं और कोई किसी को नहीं बदलता, फिर भी यह पन्ना ठहरा हुआ नहीं लगता, क्योंकि यहाँ दलीलों की नहीं, ज़मीन की परीक्षा हो रही है। अंगद की ज़मीन उनके पहले ही भाषण में बता दी गयी थी और वे उससे एक बार भी नहीं हटते। मैं उनका दूत हूँ, मेरे पिता आपके मित्र थे, इसलिये मैं आपके हित के लिये आया हूँ। हँसी, गिनती, नज़ीर और चेतावनी, सब इन्हीं तीन पंक्तियों पर टिके हैं।
और दूसरी बात, जो पूरा पन्ना पढ़ने के बाद देर तक खटकती है। रावण एक प्रश्न का उत्तर कभी नहीं देता। उससे पूछा गया था कि जो स्त्री उसके घर में है, उसका क्या किया जाय। वह उत्तर में अपनी भुजाएँ बताता है, अपने कटे हुए सिर बताता है, अपना भाई बताता है, अपना पुत्र बताता है, अपने बीस समुद्र बताता है। हर उत्तर अपने नाप का है। जो एक प्रश्न किसी और की ओर देखता था, उस दिशा में उसके पास कोई वाक्य ही नहीं है।
और सबसे धीमी चीज़ इस पन्ने पर वह है जो बिना किसी के कहे हुई थी। सभासद् उठ खड़े हुए थे। किसी ने आदेश नहीं दिया था, किसी ने पहचान नहीं करायी थी। एक आदमी भीतर आया और उस कमरे ने कुछ पहचान लिया। रावण का क्रोध वहीं से शुरू होता है, एक शब्द बोले जाने से पहले। जिस दरबार को यह बताना पड़े कि कब उठना है, वह उस प्रश्न का उत्तर पहले ही दे चुका होता है जिसे पूछने दूत आया था।
इस पन्ने पर अंगद को उनके अपने नाम से बहुत कम बुलाया गया है। बालिसुत, बालितनय, बालिकुमार, बालि का बेटा। नाम हर बार पिता के नाम के साथ बँधकर आता है, और यही इस पूरी बहस की बुनियाद है। उस सभा में उनके पिता का नाम सबसे बड़ा प्रमाण भी है और सबसे बड़ी चुभन भी, क्योंकि वह नाम उस आदमी का मित्र भी था और उससे बड़ा भी निकला। इसीलिये गिनती शुरू होते ही वह नाप अपने-आप बन जाता है, और अंगद को अपने पिता की एक भी बड़ाई नहीं करनी पड़ती।
और चलते समय उन्हें जो एक ही हिदायत मिली थी, वह भी इस पूरे पन्ने पर काम करती दीखती है। ऐसी बातचीत कीजिये जिससे अपना काम हो और शत्रु का हित हो। जो कुछ यहाँ रखा गया, हर बार एक निकलने का रास्ता था। प्रशंसा दी गयी ताकि लौटने में मान न जाय। कारण मोह बताया गया ताकि दोष कम पड़े। शर्तें कड़ी रखी गयीं, पर उनके अन्त में वह वाक्य रखा गया कि सुनते ही निर्भय कर देंगे। और जो ठिठोली की गयी वह भी एक ही दिशा में चलती रही, कि सामनेवाला अपने-आप को एक बार वैसा देख ले जैसा वह बाहर से दीखता है। ग्यारह दोहों तक यही कोशिश चलती रही, और सभा में एक भी आदमी नहीं हिला।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा १८ से २८, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।