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रावण का वध, मन्दोदरी का विलाप, और लङ्का का तिलक

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · रावण का वध, मन्दोदरी का विलाप, और लङ्का का तिलक

रावण का वध, मन्दोदरी का विलाप, और लङ्का का तिलक

दोहा एक सौ तीन से एक सौ सात तक: इकतीस बाण अपना काम कर जाते हैं, सिर और भुजाएँ मन्दोदरी के आगे रखी जाती हैं, वही स्त्री जो काण्ड भर समझाती रही थी अन्त में राम को नमस्कार करती है, विभीषण भाई की क्रिया करके सिंहासन पाते हैं, और हनुमान लङ्का जाकर जानकी से आशीर्वाद लेकर लौटते हैं।

पिछला प्रसंग एक धनुष के खिंचने पर ख़त्म हुआ था। कानों तक खींचकर इकतीस बाण छोड़े गये थे और तुलसीदास ने उन्हें कालसर्प कहा था। यह पन्ना ठीक वहीं से उठता है जहाँ वे बाण जाकर लगते हैं, और पहली ही चौपाई में वह काम पूरा हो जाता है जिसके लिये यह पूरा काण्ड बँधा हुआ था। पर ध्यान देने लायक़ बात यह है कि तुलसी वहाँ रुकते नहीं। रावण के गिरने में उन्हें जितनी दिलचस्पी है, उससे कहीं अधिक इसमें है कि गिरने के बाद कौन क्या कहता है।

इसीलिये इस पन्ने का सबसे लम्बा हिस्सा लड़ाई का नहीं है। वह एक स्त्री का है। मन्दोदरी पति के सिर देखते ही गिर पड़ती हैं, उठायी जाती हैं, और फिर जो बोलती हैं उसमें शोक और निर्णय एक साथ बँधे हुए हैं। वे रावण का बखान करती हैं, पूरा बखान, और उसी बखान के भीतर से वह वाक्य निकलता है जो इस काण्ड में वे बहुत पहले से कहती आ रही थीं। और उनके बोल चुकने के बाद तुलसी एक असाधारण काम करते हैं: वे लिखते हैं कि सुनने वाले कौन थे और उन्होंने उसे क्या माना।

इसके बाद पन्ना तीन काम निपटाता है और तीनों में एक जैसी बनावट है। विभीषण को भाई की क्रिया करने का आदेश मिलता है, और आदेश के साथ एक शर्त जुड़ी हुई है। विभीषण को लङ्का का राज्य मिलता है, पर जिसने जीता है वह नगर में क़दम नहीं रखता। और हनुमान लङ्का भेजे जाते हैं, जहाँ उसी नगर के निशाचर दौड़कर उनकी पूजा करते हैं जिसके राजा के लिये वे कल तक शत्रु थे। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस पन्ने का हर नाम, हर संख्या और हर क्रम इसी अवधी पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका से लिया गया है, कहीं और से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • रावण लङ्कापति, जो इस पन्ने पर बिना सिर के भी दौड़ता है, और मरते समय जो आख़िरी वाक्य कहता है वह एक ललकार है।
  • मन्दोदरी रावण की पत्नी, जिनका विलाप इस पन्ने का सबसे लम्बा भाषण है और जो उसे राम को नमस्कार करके समाप्त करती हैं।
  • राम जो रावण को गिराते हैं, विभीषण से शोक छोड़ने को कहते हैं, और अपने ही जीते हुए नगर में पिता के वचन के कारण नहीं जाते।
  • विभीषण जो भाई की दशा देखकर दुखी होते हैं, विधिपूर्वक उसकी क्रिया करते हैं, और उसी दिन लङ्का के सिंहासन पर बैठाये जाते हैं।
  • लक्ष्मण जिन्हें राम पहले विभीषण को समझाने और फिर तिलक कराने भेजते हैं, दोनों बार अपनी जगह पर।
  • हनुमान जो लङ्का में ख़बर लेकर जाते हैं, निशाचरों की पूजा पाते हैं, और जानकी से जो माँगते हैं वह कुछ भी नहीं है।
  • जानकी जो ख़बर सुनने से पहले सेना की कुशल पूछती हैं, और अन्त में हनुमान को पुत्र कहकर आशीर्वाद देती हैं।
  • देवता और मुनि जो आकाश से फूल बरसाते हैं, नगाड़े बजाते हैं, और मन्दोदरी के वचन सुनकर सुख मानते हैं।

इकतीस बाण, और एक धड़ जो दौड़ता रहा

बाण जिस क्रम से लगते हैं, वह क्रम तुलसी ने अलग-अलग गिनाया है, और पहला बाण ऊपर नहीं जाता। वह नाभि पर जाता है और वहाँ जो सरोवर था उसे सोख लेता है। पोद्दार की टीका उसे अमृतकुण्ड कहती है, और इस पूरे युद्ध का ब्योरा इसी एक जगह पर टिका हुआ था: जब तक वह कुण्ड भरा है, कटा हुआ सिर फिर उग आता है। बाक़ी तीस बाण उसके बाद चलते हैं, और वे रोष करके चलते हैं।

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥

चौपाई १

सिर और भुजाएँ कटकर गिरती नहीं। बाण उन्हें लेकर उड़ जाते हैं। और जो पीछे बचता है वह एक रुण्ड है, सिर और भुजाओं से रहित, और वह भूमि पर नाचता है। यह पंक्ति पढ़ने में जितनी भयानक है, कहानी में उससे कहीं अधिक साफ़ है। जिस आदमी की पहचान बीस भुजाएँ और दस सिर थीं, उसमें से वह सब निकाल लिया गया है, और जो बचा है वह अब भी खड़ा है और हिल रहा है।

और फिर वह दौड़ता है। धड़ प्रचण्ड वेग से दौड़ता है, इतने वेग से कि धरती धँसने लगती है। यह इस पन्ने की सबसे विचित्र आधी पंक्ति है, क्योंकि यहाँ मरा हुआ आदमी अब भी मैदान में है और अब भी ख़तरा है। युद्ध ख़त्म हो चुका है, पर शरीर ने अभी वह ख़बर नहीं सुनी।

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी । कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥

चौपाई २

प्रभु बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर देते हैं। और तभी वह बोलता है। मरते हुए, घोर शब्द से गरजकर, वह पूछता है कि राम कहाँ हैं, कि वह ललकारकर उन्हें रण में मारे। इस पूरे काण्ड में उसके मुँह से निकलने वाला यह आख़िरी वाक्य है, और यह एक प्रश्न है। जिस आदमी ने अभी इकतीस बाण खाये हैं, वह पूछ रहा है कि मारने वाला कहाँ है। सामने ही खड़े हैं। पर उसके पास अब वे दस सिर नहीं हैं जिनसे वह देखता था।

उसके गिरते ही पृथ्वी हिल जाती है। समुद्र, नदियाँ, दिशाओं के हाथी और पर्वत, सब क्षुब्ध हो उठते हैं। और गिरते समय भी वह ख़ाली नहीं गिरता: धड़ के दोनों टुकड़े फैलाकर वह भालुओं और वानरों के समुदाय को दबाता हुआ गिरता है। यानी उसकी लाश भी सेना मारती है। तुलसी ने यह ब्योरा छोड़ा नहीं, और यह उन जगहों में से है जहाँ वे विजय को सस्ता नहीं पड़ने देते। जो सेना अभी जय बोलने वाली है, उसमें से कुछ लोग इसी क्षण उसी शरीर के नीचे दब गये।

सार: पहला बाण नाभि के अमृतकुण्ड को सोख लेता है और शेष तीस सिरों तथा भुजाओं में लगते हैं। बाण उन्हें उठाकर ले जाते हैं, बचा हुआ रुण्ड भूमि पर नाचता है, फिर प्रचण्ड वेग से दौड़ता है और धरती धँसने लगती है। राम एक बाण से उसके दो टुकड़े कर देते हैं। मरते समय रावण गरजकर पूछता है कि राम कहाँ हैं। उसके गिरने से पृथ्वी हिलती है और गिरता हुआ धड़ भी वानरों और भालुओं को दबा देता है।

बाणों के पास एक और काम था

अब वे बाण लौटते हैं, और लौटते हुए सीधे राम के पास नहीं जाते। बीच में उनका एक पड़ाव है, और वह पड़ाव इस पूरे पन्ने की दिशा तय कर देता है।

मंदोदरि आगें भुज सीसा । धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥

चौपाई ३

सिर और भुजाएँ मन्दोदरी के आगे रखकर, तब बाण वहाँ चलते हैं जहाँ जगदीश्वर हैं। आगे की आधी पंक्ति में वे सब तरकस में जाकर समा जाते हैं और यह देखकर देवता नगाड़े बजाते हैं। पर असली बात पहली आधी पंक्ति है। मरने वाले का शरीर मैदान में पड़ा है, और उसके सिर तथा भुजाएँ उठाकर उसकी पत्नी के सामने रख दी गयी हैं। ख़बर भेजी नहीं गयी, दिखा दी गयी। और जो आगे इस पन्ने पर होने वाला है उसका पता यहीं चल जाता है: यह मृत्यु जिसके नाम लिखी गयी है, वह मन्दोदरी हैं।

इसके तुरंत बाद तुलसी एक पंक्ति में वह बात कह देते हैं जिसे कहने में दूसरे ग्रंथ अध्याय लगा देते हैं। रावण का तेज प्रभु के मुख में समा जाता है, और यह देखकर शम्भु और चतुरानन हर्षित होते हैं। ब्रह्माण्ड भर में जय-जय की ध्वनि भर जाती है और प्रबल भुजदण्डों वाले रघुवीर की जय पुकारी जाती है। देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं, कृपालु की जय, मुकुन्द की जय। ध्यान रखने की बात यह है कि यहाँ शत्रु का नाश नहीं लिखा गया। शत्रु का समा जाना लिखा गया है।

जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।
खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥
सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं॥ भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥॥ २॥

छन्द

छन्द पहले नाम गिनाता है और फिर एक चित्र बनाता है। कृपा का कन्द, मुकुन्द, द्वन्द्वों को हरने वाला, शरण में सुख देने वाला, दुष्टों के दल को चीर देने वाला, कारणों का भी परम कारण, सदा करुणा करने वाला, सर्वव्यापी विभु। और इन सब नामों के बाद जो पंक्ति आती है वह सबसे सादी है: संग्राम के आँगन में राम के अङ्गों ने बहुत से कामदेवों की शोभा पायी। युद्ध के मैदान को आँगन कहा गया है, और उसी शब्द में इस पूरे हिस्से का स्वर रखा हुआ है। जो अभी तक रणभूमि थी, वह अब घर के भीतर की जगह हो गयी।

इसी छन्द का दूसरा हिस्सा उस चित्र को पूरा करता है। सिर पर जटाओं का मुकुट है और उसके बीच-बीच में अत्यन्त मनोहर फूल सजे हैं, मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह के साथ नक्षत्र चमक रहे हों। भुजदण्ड अब भी धनुष और बाण फिरा रहे हैं, और शरीर पर रुधिर के कण ऐसे लगते हैं मानो तमाल के पेड़ पर बहुत सी लाल चिड़ियाँ अपने ही सुख में डूबी बैठी हों। लड़ाई ख़त्म हो चुकी है और लड़ाई का निशान अब सुन्दर लगने लगा है।

कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३॥

दोहा १०३

दोहा एक सौ तीन दो काम एक साथ करता है। प्रभु कृपादृष्टि की वर्षा करके देवसमूह को अभय कर देते हैं, और वानर-भालू हर्षित होकर सुखधाम मुकुन्द की जय पुकारने लगते हैं। देवता अब तक निर्भय नहीं थे, यह बात इसी पंक्ति से खुलती है। आकाश में खड़े होकर फूल बरसाने वाले लोग भीतर से डरे हुए थे, और उनका डर विजय से नहीं मिटता, एक दृष्टि से मिटता है।

सार: राम के बाण रावण के सिर और भुजाएँ मन्दोदरी के सामने रखकर तरकस में लौट आते हैं और देवता नगाड़े बजाते हैं। रावण का तेज प्रभु के मुख में समा जाता है, शम्भु और ब्रह्मा हर्षित होते हैं, और ब्रह्माण्ड जय-जय से भर जाता है। छन्द में राम के अङ्गों की शोभा संग्राम के आँगन में कामदेवों जैसी कही गयी है। दोहा एक सौ तीन में कृपादृष्टि की वर्षा से देवसमूह अभय होता है।

पति का सिर देखते ही

अब कहानी मैदान छोड़कर महल की ओर चली जाती है, और वहाँ का पहला दृश्य ऐसा है जिसमें कोई कुछ बोलता नहीं। मन्दोदरी पति के सिर देखती हैं, और उसी क्षण गिर पड़ती हैं।

पति सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥
जुबति बृंद रोवत उठि धाईं । तेहि उठाइ रावन पहिं आईं॥

चौपाई ४

युवतियों का समूह रोता हुआ उठ दौड़ता है, उन्हें उठाता है, और उठाकर रावण के पास ले आता है। यह छोटी सी क्रिया बहुत कुछ कह देती है। वे मूर्च्छित हुईं, और होश में लाये जाने पर उन्हें वहीं ले जाया गया जहाँ शरीर पड़ा है। महल में अब कोई नहीं बचा जो उन्हें वहाँ जाने से रोके, और रोकने की ज़रूरत भी किसी को नहीं जान पड़ी।

पति की दशा देखकर वे सब पुकार-पुकारकर रोती हैं। बाल खुल गये हैं, देह की सँभाल नहीं रही। वे अनेक प्रकार से छाती पीटती हैं, और तभी तुलसी वह आधी पंक्ति रखते हैं जिससे आगे का पूरा भाषण समझ में आता है: रोती हुई वे रावण के प्रताप का बखान करती हैं। यानी जो आगे आ रहा है वह केवल रुदन नहीं है। वह बखान है, और शोक उसी बखान के भीतर से निकलेगा।

विलाप जो बखान है

यहाँ से मन्दोदरी का भाषण शुरू होता है, जो इस पूरे प्रसंग का सबसे लम्बा हिस्सा है। इसकी बनावट एक ही है और बार-बार दुहरायी हुई है: पहले वह जो था, फिर वह जो अब है, और दोनों को एक ही साँस में रख देना। कोई तर्क बीच में नहीं आता। दो चित्र आमने-सामने रख दिये जाते हैं और सुनने वाले को उनके बीच की दूरी ख़ुद नापनी पड़ती है।

तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा । सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥

चौपाई ५

उनके बल से पृथ्वी नित्य डोलती थी। अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य उनके सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप, जो पृथ्वी का ही भार उठाते हैं, उस शरीर का भार नहीं सह पाते थे। और फिर चौपाई का आख़िरी टुकड़ा: वही शरीर आज धूल से भरा हुआ भूमि पर पड़ा है। तीन बार आकाश छूकर चौथी बार ज़मीन। यह क्रम आगे की हर चौपाई में लौटता है।

अगली चौपाई नाम लेकर वही काम करती है। वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमें से किसी ने रण में सामने आकर धीरज नहीं धरा। भुजबल से काल और यमराज तक जीत लिये गये थे। और आज वही आदमी अनाथ की तरह पड़ा है। अनाथ की नाईं, यह शब्द उस आदमी के लिये चुना गया है जिसके पास इसी काण्ड में एक पूरा नगर, एक पूरी सेना और एक पूरा कुल था। अनाथ वह होता है जिसका कोई नहीं, और वह अभी तक सबका स्वामी था।

तीसरी चौपाई में वे कुल तक पहुँचती हैं। उनकी प्रभुता जगत में प्रसिद्ध है, पुत्रों और कुटुम्बियों के बल का वर्णन ही नहीं हो सकता। फिर वह वाक्य आता है जिसके बाद विलाप का रुख़ बदल जाता है: राम से विमुख होने के कारण यह हाल हुआ, और कुल में अब कोई रोने वाला भी नहीं बचा। बखान और निर्णय एक ही वाक्य में आ जाते हैं, और आगे उन्हें अलग करना सम्भव नहीं रहता।

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥

चौपाई ६

विधाता का सारा प्रपञ्च उनके वश में था, लोकपाल भयभीत होकर नित्य मस्तक नवाते थे। और अब वही सिर और वही भुजाएँ गीदड़ खा रहे हैं। इसके बाद जो आधी पंक्ति आती है वह इस पन्ने की सबसे कठोर पंक्ति है, और वह पत्नी के मुँह से निकलती है: राम से विमुख के लिये यह अनुचित नहीं है। पोद्दार की टीका उसे और खोलकर रख देती है, कि ऐसा होना उचित ही है। जो स्त्री अभी छाती पीट रही थी, वही कह रही है कि जो हुआ वह ठीक हुआ।

यह वह जगह है जहाँ यह भाषण साधारण विलाप से अलग हो जाता है। विलाप में शिकायत होती है, किसी से या किसी के विरुद्ध। यहाँ शिकायत है ही नहीं। मरने वाले की महिमा पूरी गिनायी गयी है, मारने वाले पर एक शब्द नहीं कहा गया, और अन्त में कारण मरने वाले के भीतर से निकाला गया है। शोक इतना ही है, और उतना ही रहने दिया गया है।

सार: मन्दोदरी और महल की स्त्रियाँ छाती पीटती हुई रावण के प्रताप का बखान करती हैं। पृथ्वी उसके बल से डोलती थी, अग्नि-चन्द्र-सूर्य उसके सामने तेजहीन थे, शेष और कच्छप उसका भार नहीं सह पाते थे, और वरुण, कुबेर, इन्द्र तथा वायु में से किसी ने रण में धीरज नहीं धरा। वही शरीर आज धूल में पड़ा है और सिर-भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। और अन्त में वे स्वयं कहती हैं कि राम से विमुख के लिये यह अनुचित नहीं।

जो वे इस काण्ड में शुरू से कहती आ रही थीं

यह वाक्य उनके मुँह में नया नहीं है। इसी लङ्काकाण्ड में मन्दोदरी पहले भी यही कहती रही हैं, एक बार नहीं, कई बार, और हर बार बात एक ही थी: राम से विरोध छोड़ दीजिये, उन्हें मनुष्य मानकर हठ मत पकड़िये। एक बार वे हाथ पकड़कर पति को अपने महल में ले गयी थीं, चरणों में सिर नवाकर आँचल पसारा था, और कहा था कि वैर उसी से करना चाहिये जिसे बुद्धि और बल से जीता जा सके। एक बार नेत्रों में जल भरकर हाथ जोड़कर विनती की थी। और हर बार बात ख़त्म होने पर उन्होंने मन ही मन यही तय किया था कि पति काल के वश हैं और उनकी बुद्धि भ्रमित हो चुकी है।

अब वही निष्कर्ष वे शरीर के सामने खड़ी होकर बोलती हैं, और इस बार यह अनुमान नहीं रह गया। काल के पूर्ण वश में होने से पति ने किसी का कहा नहीं माना, और चराचर के नाथ को मनुष्य करके जाना। यही उनका पूरा अभियोग है और यह तीन शब्दों का है: कहा न माना। जिस बात के लिये उन्हें बार-बार टाला गया था, वह बात अब सुनने वाले किसी के होने पर नहीं, सुनने वाले के न रहने पर कही जा रही है।

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥

छन्द

छन्द में वे एक-एक करके सब रख देती हैं। दैत्यरूपी वन को जलाने के लिये जो साक्षात् अग्नि हैं, उन हरि को मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन करुणामय को नहीं भजा। और फिर वे पति के बारे में वह कहती हैं जो कोई पत्नी अपने पति के शव के सामने नहीं कहती: यह शरीर जन्म से ही दूसरों से द्रोह करने में लगा रहा और पापों के ढेर से भरा रहा। पुकार अब भी पिय की है, सम्बोधन अब भी प्रियतम का है, और उसी सम्बोधन के भीतर यह सब कहा जा रहा है।

और इसके बाद छन्द की आख़िरी पंक्ति आती है, जो पूरे पन्ने को पलट देती है। इतना सब होने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म ने उसे अपना धाम दिया, उन राम को मैं नमस्कार करती हूँ। विधवा हुए अभी कुछ ही क्षण बीते हैं और वे मारने वाले को प्रणाम कर रही हैं। इसलिये नहीं कि वे हार गयीं। इसलिये कि उन्होंने देख लिया कि पति को अन्त में क्या मिला।

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥ १०४॥

दोहा १०४

दोहा एक सौ चार उसी बात को सबसे छोटे रूप में कहता है, और उसकी शुरुआत एक आवाज़ से होती है, अहह। रघुनाथ के समान कृपा का समुद्र दूसरा कोई नहीं, क्योंकि उन्होंने वह गति दी जो योगियों के समूह को भी दुर्लभ है। इस काण्ड में रावण को अब तक जितने नामों से पुकारा गया है, उन सबके बाद उसके लिये यह वाक्य रखा गया है, और यह वाक्य उसकी पत्नी कह रही है। जो कुछ कहने को बचा था, वह उसी के हिस्से आया जिसने सबसे अधिक खोया।

सार: मन्दोदरी कहती हैं कि काल के वश होकर पति ने किसी का कहा नहीं माना और चराचर के नाथ को मनुष्य समझा। छन्द में वे गिनाती हैं कि जिन्हें शिव और ब्रह्मा नमस्कार करते हैं उन करुणामय को उसने नहीं भजा और उसका शरीर जन्म से द्रोह तथा पाप में लगा रहा। फिर वे राम को नमस्कार करती हैं जिन्होंने उसे अपना धाम दिया, और दोहा एक सौ चार में कहती हैं कि उसे वह गति मिली जो योगियों को भी दुर्लभ है।

जिन्होंने सुना, उन्होंने सुख माना

मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥
अज महेस नारद सनकादी । जे मुनिबर परमारथबादी॥

चौपाई ७

यह असाधारण है। तुलसी विलाप को अकेला नहीं छोड़ते। वे लिखते हैं कि उसे किसने सुना और सुनकर क्या माना। देवता, मुनि और सिद्ध, सबने सुख माना। और फिर वे नाम गिनाते हैं: ब्रह्मा, महेश, नारद, सनकादि, और वे श्रेष्ठ मुनि जो परमार्थवादी हैं, यानी जो तत्त्व को जानते और कहते हैं। जिस बात को इस काण्ड भर एक ही आदमी ने बार-बार टाला था, वह बात अब उन लोगों के सामने रखी गयी जिनका काम ही ऐसी बातों को परखना है, और उन्होंने उसे मान लिया।

वे सब नेत्र भरकर रघुनाथ को निहारते हैं, प्रेम में मग्न हो जाते हैं और सुखी होते हैं। और ठीक इसी हर्ष के बीच तुलसी दृष्टि घुमा देते हैं। अपने घर की सब स्त्रियों को रोती हुई देखकर विभीषण के मन में बड़ा भारी दुख होता है और वे उनके पास जाते हैं। जिस आदमी को कुछ ही देर में राजा बनाया जाने वाला है, इस पन्ने पर उसका पहला काम रोना देखना है।

भाई की दशा देखकर वे दुख करते हैं। और यहाँ राम स्वयं आगे नहीं बढ़ते। वे छोटे भाई को आयसु देते हैं, और लक्ष्मण जाकर विभीषण को बहुत प्रकार से समझाते हैं। समझाये जाने पर विभीषण प्रभु के पास लौट आते हैं। यह क्रम ध्यान देने लायक़ है, क्योंकि इसी पन्ने पर आगे भी राम अपनी जगह पर बने रहते हैं और काम करने कोई और भेजा जाता है।

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥

चौपाई ८

प्रभु उन्हें कृपादृष्टि से देखते हैं और कहते हैं कि सारा शोक छोड़कर क्रिया कीजिये। आदेश में दोनों बातें एक साथ बँधी हुई हैं, शोक छोड़ना और क्रिया करना, और दूसरी पहली के बिना नहीं हो सकती। विभीषण वैसा ही करते हैं। वे प्रभु की आज्ञा मानते हैं, हृदय में देश और काल का विचार करते हैं, और विधिपूर्वक सब क्रिया करते हैं। तुलसी यहाँ ब्योरा नहीं देते कि क्या-क्या किया गया। वे केवल इतना कहते हैं कि वह विधि से हुई, और अगले दोहे में उस पूरी क्रिया में से एक ही चीज़ का नाम लेते हैं।

मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।
भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥ १०५॥

दोहा १०५

तिलाञ्जलि। यही एक शब्द तुलसी चुनकर लिखते हैं, और वह मन्दोदरी आदि सब स्त्रियों के हाथ से दी जाती है। और लौटते समय वे महल में जो लेकर जाती हैं, वह भी लिखा गया है: मन में रघुनाथ के गुणसमूहों का वर्णन। लङ्का की रानियाँ अपने राजा को जल देकर लौट रही हैं और रास्ते भर मारने वाले के गुण गिन रही हैं। यह इस पन्ने का सबसे चुपचाप बीत जाने वाला वाक्य है और शायद सबसे बड़ा।

सार: मन्दोदरी के वचन सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सुख मानते हैं, और ब्रह्मा, महेश, नारद तथा सनकादि परमार्थवादी मुनि रघुनाथ को नेत्र भरकर निहारते हैं। अपने घर की स्त्रियों को रोती देखकर विभीषण दुखी होते हैं, राम लक्ष्मण को भेजकर उन्हें समझवाते हैं, और फिर कहते हैं कि शोक छोड़कर क्रिया करें। विभीषण देश और काल का विचार कर विधिपूर्वक क्रिया करते हैं और सब स्त्रियाँ तिलाञ्जलि देकर महल लौटती हैं।

तिलक, और एक आदमी जो नगर में नहीं गया

क्रिया पूरी करके विभीषण आते हैं और फिर सिर नवाते हैं। तब कृपा के समुद्र छोटे भाई को बुलाते हैं, और जो कहते हैं उसमें नामों की एक पूरी सूची है।

तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा॥
पिता बचन मैं नगर न आवउँ । आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ॥

चौपाई ९

सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान् और मारुति, इन सबको नीतिनिपुण कहकर गिनाया गया है, और लक्ष्मण के साथ सबको विभीषण के साथ भेजा जा रहा है, इस आदेश के साथ कि तिलक पूरा करा दीजिये। और फिर वह आधी पंक्ति आती है जो इस पूरे पन्ने पर अकेली खड़ी है: पिता के वचन के कारण मैं नगर में नहीं आऊँगा।

यह वाक्य किसी ने माँगा नहीं था। युद्ध जीता जा चुका है, नगर के सिंहासन पर वही बैठेगा जिसे वे बैठाना चाहते हैं, और उस नगर में जाकर बैठने से उन्हें कोई नहीं रोक रहा। रोक बहुत पुरानी है और अयोध्या में दी गयी थी। बीच में समुद्र आया, सेतु बना, एक पूरा काण्ड बीत गया, और वह वचन अब भी उसी जगह खड़ा है जहाँ रखा गया था। इसलिये वे अपने समान वानरों को और छोटे भाई को भेजते हैं। आपु सरिस, अपने ही जैसा। भेजने वाले ने प्रतिनिधि को अपने बराबर कहकर भेजा है, और यही इस पन्ने पर उनके हर आदेश का ढंग है।

वानर प्रभु के वचन सुनकर तुरंत चलते हैं और जाकर तिलक की सारी रचना कर देते हैं। आदर के साथ विभीषण को सिंहासन पर बैठाया जाता है, तिलक होता है, और स्तुति की जाती है। फिर सब हाथ जोड़कर सिर नवाते हैं और विभीषण सहित प्रभु के पास आते हैं। तब रघुवीर वानरों को बुला लेते हैं और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी करते हैं। पूरा राज्याभिषेक चार आधी पंक्तियों में निपट जाता है, और उसके बाद जो छन्द आता है वह उससे कहीं लम्बा है।

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।
पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो॥
मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं।
संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं॥

छन्द

इस छन्द में जीतने वाला जीत अपने पास नहीं रखता। पहली ही पंक्ति में वे कहते हैं कि यह प्रबल शत्रु आप लोगों के बल से मारा गया और विभीषण ने राज्य पाया, और इसी कारण आप लोगों का यश तीनों लोकों में नित्य नया बना रहेगा। फिर आख़िरी दो पंक्तियों में वे उसे अपने साथ जोड़ देते हैं: जो लोग मेरे सहित आपकी शुभ कीर्ति को परम प्रेम से गायेंगे, वे बिना परिश्रम के अपार संसारसागर के पार पहुँच जायेंगे। जिनका नाम अभी लड़ाई की सूची में गिना गया था, उनका नाम अब उस सूची में डाल दिया गया है जिसे गाने से लोग तर जाते हैं।

अगला दोहा उसी का असर है। प्रभु के वचन कानों से सुनकर वानर-समूह तृप्त नहीं होते। वे बार-बार सिर नवाते हैं और सब चरणकमल पकड़ लेते हैं। तृप्त न होना, यही शब्द तुलसी ने चुना है, और वह भूख की भाषा है। ये वही लोग हैं जिन्होंने अभी-अभी एक नगर जीता है, और जो चीज़ उन्हें कम पड़ रही है वह कुछ पंक्तियाँ हैं।

सार: विभीषण के सिर नवाने पर राम लक्ष्मण को बुलाकर सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान् और मारुति के साथ भेजते हैं कि तिलक करा दें, और स्वयं पिता के वचन के कारण नगर में नहीं जाते। वानर तुरंत जाकर विभीषण को सिंहासन पर बैठाकर तिलक और स्तुति करते हैं। लौटने पर राम कहते हैं कि शत्रु उन्हीं के बल से मारा गया और जो उनकी कीर्ति राम के साथ गायेंगे वे बिना परिश्रम संसारसागर पार कर जायेंगे।

लङ्का में एक ख़बर बाक़ी थी

इसके बाद प्रभु हनुमान को बुला लेते हैं, और जो आदेश देते हैं वह दो हिस्सों का है। लङ्का जाइये और जानकी को समाचार सुनाइये। और फिर दूसरा हिस्सा, जो पहले जितना ही ज़रूरी है: उनकी कुशल लेकर लौट आइये। ख़बर पहुँचाना आधा काम है, ख़बर लाना पूरा। इस पूरे काण्ड में जितने दूत भेजे गये, उनमें से किसी को लौटकर यह बताने को नहीं कहा गया था कि दूसरी ओर का हाल कैसा है।

हनुमान नगर में आते हैं, और जो होता है वह इस पूरे काण्ड का सबसे अनोखा दृश्य है। सुनते ही निशाचर और निशाचरी दौड़ पड़ते हैं। यह वही नगर है और वही लोग हैं जिनके राजा के विरुद्ध वे कल तक लड़ रहे थे। वे बहुत प्रकार से उनकी पूजा करते हैं और फिर जानकी को दिखा देते हैं। राज्य बदल चुका है और नगर ने उसे उसी दिन मान लिया है, बिना किसी के कहे।

हनुमान दूर से ही प्रणाम करते हैं। पास नहीं जाते। और जानकी उन्हें पहचान लेती हैं कि यह रघुनाथ का वही दूत है। फिर वे जो पहला प्रश्न पूछती हैं, उसमें अपना नाम नहीं है। हे तात, कहिये, कृपा के धाम प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेना सहित कुशल से तो हैं। जो स्त्री इतने समय से इसी नगर में बैठी हुई हैं, वे पहले सेना का हाल पूछ रही हैं।

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥
अबिचल राजु बिभीषन पायो । सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥

चौपाई १०

उत्तर में हनुमान पूरी लड़ाई दो टुकड़ों में रख देते हैं। कोसलपति सब प्रकार से सकुशल हैं, उन्होंने संग्राम में दससीस को जीत लिया, और विभीषण ने अविचल राज्य पा लिया। इतना सुनते ही हृदय में हर्ष छा जाता है। ध्यान दीजिये कि हनुमान ने अपने बारे में एक शब्द नहीं कहा। जिस आदमी को यह समाचार ले जाने के लिये चुना गया, उसने समाचार में अपना नाम कहीं नहीं रखा।

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।
का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥
सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।
रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥

छन्द

छन्द का पहला हिस्सा जानकी का है और वह एक असम्भव प्रश्न है। शरीर पुलकित है, नेत्रों में जल है, और वे बार-बार कहती हैं कि इस वाणी के समान तीनों लोकों में कुछ भी नहीं है, तो दिया क्या जाय। यह उपहार न होने की विवशता नहीं है। यह हिसाब है: जो लाया गया है उसके बराबर का कुछ है ही नहीं, इसलिये देने को कुछ बचता नहीं।

और दूसरा हिस्सा हनुमान का उत्तर है, जो इस पन्ने का सबसे सुन्दर वाक्य है। हे माता, सुनिये, मैंने आज सारे जगत का राज्य पा लिया, इसमें कोई सन्देह नहीं, क्योंकि रण में शत्रुसेना को जीतकर भाई सहित निर्विकार राम को मैं देख रहा हूँ। इस पूरे पन्ने पर एक राज्य सचमुच बाँटा गया है, लङ्का का, और वह विभीषण को मिला है। और यहाँ एक आदमी कह रहा है कि अखिल जगत का राज्य उसे मिल चुका है, और उसका प्रमाण केवल इतना है कि वह किसी को देख पा रहा है।

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥ १०७॥

दोहा १०७

पन्ना यहीं ख़त्म होता है, आशीर्वाद पर। जानकी उन्हें पुत्र कहकर पुकारती हैं और दो चीज़ें माँगती हैं, दोनों उन्हीं के लिये: समस्त सद्गुण उनके हृदय में बसें, और शेष सहित कोसलपति उन पर सदा प्रसन्न रहें। जिसने माँगने से इनकार कर दिया, उसे बिना माँगे दे दिया गया, और देने वाली के पास इस समय देने को इसके सिवा कुछ था भी नहीं।

सार: राम हनुमान को लङ्का भेजते हैं कि जानकी को समाचार सुनाकर उनकी कुशल लेकर लौटें। नगर के निशाचर दौड़कर उनकी पूजा करते हैं और जानकी को दिखा देते हैं। जानकी पहले प्रभु और सेना की कुशल पूछती हैं, और हनुमान बताते हैं कि दससीस जीत लिया गया और विभीषण को अविचल राज्य मिला। जानकी कहती हैं कि इस वाणी के समान तीनों लोकों में कुछ नहीं, और हनुमान कहते हैं कि राम को भाई सहित देख लेना ही अखिल जगत का राज्य है। दोहा एक सौ सात में वे उन्हें पुत्र कहकर आशीर्वाद देती हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने को पढ़ते हुए एक बात बार-बार लौटती है। रावण के बारे में अन्तिम निर्णय तुलसी अपने मुँह से नहीं कहते, देवताओं के मुँह से नहीं कहते, और राम के मुँह से भी नहीं कहते। वे उसे मन्दोदरी के हवाले कर देते हैं। जिस स्त्री का सब कुछ इस युद्ध में गया, वही यह कहती है कि राम से विमुख के लिये यह अनुचित नहीं, और वही यह भी कहती है कि इतना सब होने पर भी उसे वह गति मिली जो योगियों को दुर्लभ है। एक ही मुँह से दोनों बातें निकलती हैं और उनके बीच कोई विरोध नहीं छोड़ा गया। जो लोग सुनते हैं वे भी कोई विरोध नहीं निकालते, वे सुख मानते हैं।

दूसरी बात आदेशों की है। इस पन्ने पर राम तीन आदेश देते हैं और तीनों किसी और के हाथ में काम सौंपते हैं। विभीषण को समझाने लक्ष्मण जाते हैं। तिलक कराने लक्ष्मण और वानर जाते हैं। जानकी तक ख़बर हनुमान ले जाते हैं। जिस आदमी ने अभी रावण को मारा है, वह इस पूरे पन्ने पर एक बार भी अपनी जगह से हिलता नहीं, और हर बार जो भेजा जाता है उसे अपने बराबर कहकर भेजा जाता है। जीत का श्रेय भी उसी दिशा में लौटा दिया जाता है, और छन्द में वह एक सूची बन जाती है जिसे गाने भर से लोग पार हो जायेंगे।

और तीसरी बात सबसे छोटी है। शत्रु का शरीर पड़ा है और उसकी क्रिया करने का आदेश उसी भाई को मिलता है जो उसे छोड़कर आया था, और आदेश के साथ शोक छोड़ने की बात जुड़ी हुई है। तुलसी उसमें कोई ब्योरा नहीं जोड़ते। वे केवल तिलाञ्जलि का नाम लेते हैं और लौटती हुई स्त्रियों के मन का हाल लिखते हैं। पूरा प्रसंग वहीं तय हो जाता है: जो किया गया वह विधि से किया गया, और जो लोग उसे करके लौटे वे मन में किसी और के गुण गिनते हुए लौटे।

यह प्रसंग लङ्काकाण्ड का अन्त नहीं है। अभी जानकी का आना बाक़ी है और वह अगले पन्ने की बात है। पर जो लड़ाई कई प्रसंगों से चल रही थी वह यहाँ रुक जाती है, और रुकते ही तुलसी का ध्यान तुरंत उन लोगों पर चला जाता है जो लड़ नहीं रहे थे: एक विधवा, एक भाई, एक दूत, और स्त्रियों का एक समूह जो जल देकर लौट रहा है। युद्ध के बाद का पहला पूरा दृश्य किसी विजेता का नहीं है।

और इसीलिये इस पन्ने की सबसे ऊँची पंक्ति युद्ध की नहीं है। वह वह पंक्ति है जिसमें एक वानर से पूछा जाता है कि क्या दिया जाय, और वह कहता है कि मिल चुका है। माँगने की जगह आयी और उसने उसे ख़र्च नहीं किया। पूरे काण्ड में सबसे बड़ा राज्य वही पाता है, और वह राज्य किसी सिंहासन पर नहीं बैठता।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा १०३ से १०७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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