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जो जला वह प्रतिबिंब था

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · जो जला वह प्रतिबिंब था

जो जला वह प्रतिबिंब था

लङ्कापति मारा जा चुका है और सीता पालकी पर बिठा दी गयी हैं, तभी श्रीराम कहते हैं कि पालकी रहने दीजिये, वे पैदल आयें, ताकि वानर उन्हें माता की तरह देख सकें; और यहीं से यह पन्ना उस आग तक पहुँचता है जिसमें सीता नहीं, उनका प्रतिबिंब और दुनिया का लगाया हुआ कलंक जलता है।

इस प्रसंग की पहली पंक्ति बीच से शुरू होती है, और जो बोल रही हैं वे अपने बचाव की बात नहीं कर रहीं। वे कह रही हैं कि अब कोई ऐसा उपाय कीजिये कि इन आँखों से उन कोमल श्याम अङ्गों को देख लूँ। जिनसे यह कहा जा रहा है उन्हें वे ताता कहती हैं, और वे पवनपुत्र हैं, जो सुनकर श्रीरामजी के पास जाते हैं और जानकीजी का कुशल-समाचार सुनाते हैं। लङ्का गिर चुकी है, लङ्कापति अपने ही पाप से जा चुका है, युद्ध का कोई काम बाक़ी नहीं बचा, और जिस स्त्री के लिये यह सब हुआ उनकी पहली माँग दर्शन की है।

उस एक माँग को पकड़कर पढ़िये तो यह पूरा पन्ना उसी के चारों ओर बुना हुआ मिलता है। रीछ-वानर देखने आते हैं और रोक दिये जाते हैं। श्रीराम रोक हटा देते हैं, और जो कारण बताते हैं वह मर्यादा का नहीं, देखने का है। लक्ष्मण को आदेश शब्द से नहीं मिलता, मुख देखकर मिलता है। आग जब जलती है तो देवता, सिद्ध और मुनि आकाश में खड़े सब कुछ देखते हैं और कुछ नहीं समझ पाते। ब्रह्माजी की चार मुखों वाली आँखें देखते-देखते तृप्त नहीं होतीं। दशरथजी को ज्ञान एक दृष्टि से मिलता है। इन्द्र का अभिमान किसी तर्क से नहीं, चरणकमलों को देख लेने से जाता है। और अन्तिम दोहे में दिशा उलट जाती है: सारा पन्ना जिन्हें देखता रहा, उनसे देवराज कहते हैं कि अब मेरी ओर देखिये।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस प्रसंग में वह फ़र्क़ छिपाया नहीं जा सकता। यहाँ आग सीताजी को परखने के लिये नहीं जलायी जाती। आग वे स्वयं माँगती हैं, और तुलसी ने पाठक को उसका भेद उससे सात पंक्तियाँ पहले ही बता दिया है। इस पन्ने पर जो नाम, संख्या और क्रम हैं वे सब इसी अवधी पाठ से और इसी की हिन्दी टीका से लिये गये हैं, कहीं और से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीसीता जो इस पन्ने पर पहले दर्शन माँगती हैं, फिर आग माँगती हैं, और दोनों बार माँगने वाली वही हैं, कोई उनसे कुछ माँगता नहीं।
  • श्रीराम जो इस पूरे प्रसंग में एक भी कठोर आदेश नहीं देते, और जिनका सबसे बड़ा आदेश यह है कि पालकी रहने दी जाय।
  • हनुमान जो सन्देश लेकर आते हैं और उसी सन्देश के साथ वापस भेजे जाते हैं।
  • विभीषण लङ्का के नये राजा, जिन्हें इस पन्ने पर पहला काम राक्षसियों को समझाने का मिलता है।
  • जुबराज चौपाई में केवल यही पद आता है; पोद्दार की टीका इन्हें अङ्गद बताती है, और इसी नाते यह पन्ना उन्हें यही कहता है।
  • लक्ष्मण जिन्हें धर्म का नेगी बनाया जाता है, जिनकी आँखें भर आती हैं, और जो एक शब्द कहे बिना लकड़ी ले आते हैं।
  • अग्नि जिनसे सीताजी कुछ माँगती नहीं, केवल याद दिलाती हैं कि वे सबके मन की गति जानते हैं।
  • देवगण जिन्हें तुलसी उनके बोलने से पहले ही सदा का स्वार्थी कह देते हैं, और जो बोलते-बोलते स्वयं यही मान लेते हैं।
  • ब्रह्मा चतुरानन, जो वरदान देने वाले हैं और इस पन्ने पर वरदान माँगते हैं।
  • दशरथ जो पुत्र को देखने आते हैं, ज्ञान पाते हैं, और मोक्ष लिये बिना हर्षित होकर लौट जाते हैं।
  • इन्द्र जो रावण के घमंड की शिकायत करते हैं और उसी साँस में अपना घमंड मान लेते हैं।
  • उमा जिन्हें सम्बोधित करके यह सारी कथा कही जा रही है, और जिनका नाम ठीक उस जगह उभरता है जहाँ सबसे कठिन बात कहनी थी।

पालकी, जो लौटा दी गयी

सन्देश सुनते ही सूर्यकुलभूषण ने दो लोगों को बुलवाया और उन्हें पवनपुत्र के साथ भेजा। जिस वाक्य से वे भेजे जाते हैं उसमें एक शब्द ऐसा है जो बाद में इस पूरे पन्ने पर लौटकर आता है। शब्द है सादर, और वह आदेश पर ही लगा हुआ है। यह नहीं कहा गया कि ले आओ; कहा गया कि आदर के साथ ले आओ। आदर की शर्त काम के साथ ही जोड़ दी गयी है, बाद में जोड़ी गयी सफ़ाई की तरह नहीं।

सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥
मारुतसुत के संग सिधावहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु॥

चौपाई १

इस चौपाई में जो पद आया है वह जुबराज है, नाम नहीं। पोद्दार की टीका उसे अङ्गद बताती है और यह पन्ना उसी को मानकर चलता है, पर चौपाई में नाम नहीं है, इतना कह देना ठीक रहेगा। दूसरी बात यह कि जाने वाले तीनों में से दो उस नगर के हैं जिसमें अभी-अभी युद्ध हुआ है और एक उस सेना का है जो बाहर से आयी। जो स्त्री महीनों अकेली रही, उसे लेने वह जाता है जिसने उसे सबसे पहले खोजा था, वह जो उस नगर का नया स्वामी है, और वह जो दूसरी सेना का युवराज है। तुलसी इस चुनाव पर कोई टिप्पणी नहीं करते।

वे तुरन्त वहाँ पहुँचते हैं जहाँ सीताजी हैं। यहाँ एक पंक्ति है जिसे पढ़कर रुकना पड़ता है: सब राक्षसियाँ नम्रता के साथ उनकी सेवा कर रही थीं। ये वही स्त्रियाँ हैं जो पहरे पर थीं। तुलसी उनके मन बदलने का कोई दृश्य नहीं लिखते, कोई पश्चात्ताप नहीं लिखते, कोई क्षमा-याचना नहीं लिखते। वे बदलाव को पूरा हो चुका मानकर, एक ही विशेषण में, बिनीता कहकर, आगे बढ़ जाते हैं। विभीषणजी उन्हें जल्दी से समझा देते हैं, वे कई प्रकार से स्नान कराती हैं, बहुत से गहने पहनाती हैं, और फिर एक सुन्दर पालकी सजाकर लायी जाती है।

सीताजी उस पर हर्ष के साथ चढ़ती हैं, और तुलसी यह भी लिख देते हैं कि चढ़ते समय वे किसका स्मरण कर रही थीं। चारों ओर हाथों में छड़ी लिये रक्षक चलते हैं और सबके मन में परम उल्लास है। यह ब्योरा मामूली लगता है, पर अगली ही पंक्ति उसे काम में ले आती है। रीछ और वानर सब देखने आते हैं, और रक्षक क्रोध करके उन्हें रोकने दौड़ते हैं। ध्यान दीजिये कि रक्षक खलनायक नहीं हैं। उन्हीं के मन में उल्लास बताया जा चुका है। वे वही कर रहे हैं जो किसी रानी की सवारी के साथ चलने वाले लोग सदा करते आये हैं। मर्यादा उनके पक्ष में है।

और ठीक उसी जगह श्रीराम बोलते हैं। जो कहते हैं वह मर्यादा को उलट देता है, और जिस ढंग से कहते हैं वह और भी ध्यान देने लायक़ है।

कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु॥
देखहुँ कपि जननी की नाईं । बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं॥

चौपाई २

चार बातें इस एक चौपाई में हैं। पहली, वे आदेश नहीं देते, अनुरोध का पुट रखते हैं: मेरा कहना मानिये। जिस बात के लिये किसी को मनाना पड़े वह वही होती है जिसके विरुद्ध रिवाज़ खड़ा हो। दूसरी, पयादें, पैदल। पालकी मँगायी भी उन्हीं के आदेश से गयी थी और अब हटायी भी उन्हीं के कहने से जा रही है। तीसरी, और यही असली बात है, कारण। कारण यह नहीं है कि उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा हो। कारण यह है कि वानर उन्हें देख सकें। और चौथी बात एक क्रिया में छिपी है: यह सब गोसाईं ने हँसकर कहा।

हँसी वहीं आती है जहाँ कोई जानता है कि वह क्या कर रहा है। पर्दा हटाना भारी काम है और उसे भारी बनाकर करने से वह और भारी हो जाता है। इसलिये वह हँसकर किया जाता है। और जिस शब्द से वह सम्भव होता है वह जननी है। रानी को सिपाही देखें तो अशिष्टता है; माता को पुत्र देखें तो दर्शन है। एक शब्द बदलते ही वही आँखें, वही भीड़ और वही रास्ता, सब कुछ और हो जाता है। और ये वही रीछ-वानर हैं जिन्होंने समुद्र पर पुल बाँधा, जो इस युद्ध में मरे, और जिन्होंने आज तक उन्हें देखा नहीं था जिनके लिये लड़ रहे थे।

प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो जाते हैं और आकाश से देवता बहुत से फूल बरसाते हैं। और तभी कवि कथा से एक क़दम बाहर निकलकर पाठक से सीधे बात करता है।

सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥

चौपाई ३

यह वाक्य कथा के भीतर किसी पात्र का नहीं है। यह तुलसी का है, और वे इसे उस घटना से पहले रख रहे हैं जिसका भेद वह खोलता है। प्रथम का अर्थ है पहले। अनल आग है। सीताजी पहले ही आग में रखी जा चुकी थीं, और अब अंतर साखी, भीतर का साक्षी, उन्हें प्रकट करना चाहता है। इतना ही यह पन्ना कहता है। कब रखी गयी थीं और कहाँ, यह यहाँ नहीं लिखा; केवल यह लिखा है कि पहले रखी जा चुकी थीं। जो आगे आग में जाता हुआ दिखेगा और जो आगे आग से लौटेगा, दोनों का हिसाब इसी एक पंक्ति में पहले से चुका दिया गया है।

और तब वह दोहा आता है जिसे पढ़ना सबसे कठिन है, क्योंकि उसमें जो हुआ उसका कारण उससे पहले ही रख दिया गया है।

तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।
सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥ १०८॥

दोहा १०८

तेहि कारन, यानी उसी कारण से। दोहा अपनी पहली साँस में ही पीछे की ओर इशारा कर देता है, उस पंक्ति की ओर जहाँ प्रकट करने की इच्छा कही गयी थी। कठोर वचन इस दोहे में साधन हैं, और कवि साधन होने की बात घटना बताने से पहले बता देता है। दूसरी बात इससे भी बड़ी है: तुलसी उन वचनों में से एक भी नहीं लिखते। वे केवल इतना कहते हैं कि कुछ कठोर वचन कहे गये। जो कवि पूरे-पूरे छन्दों में स्तुति उतार देता है, वह यहाँ एक शब्द उद्धृत नहीं करता। और तीसरी बात यह कि जिस समय वे वचन कहे जाते हैं उसी समय बोलने वाले का नाम करुनानिधि रखा जाता है, करुणा का भण्डार। नाम और काम एक ही पंक्ति में आमने-सामने रखकर छोड़ दिये गये हैं।

और चौथी बात सबसे चुपचाप है। सुनकर किसकी प्रतिक्रिया दर्ज होती है? सीताजी की नहीं। लक्ष्मणजी की नहीं। सेना की नहीं। दोहे का दूसरा चरण राक्षसियों को देता है: सुनते ही सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं। जो कल तक पहरेदार थीं, वे आज उस स्त्री के लिये दुःखी होने वाली पहली जमात हैं। तुलसी यह कहते नहीं कि उनका हृदय बदल गया। वे बस यह लिखते हैं कि दुःख उन्हें हुआ, और पाठक को हिसाब ख़ुद लगाने देते हैं।

सार: सन्देश पाकर श्रीराम जुबराज और विभीषण को हनुमान के साथ भेजते हैं; राक्षसियाँ सेवा करती हैं, स्नान और शृंगार के बाद पालकी आती है, पर श्रीराम पालकी हटवाकर कहते हैं कि वे पैदल आयें ताकि वानर उन्हें माता की तरह देखें। इसी बीच कवि बता देता है कि सीताजी पहले ही अग्नि में रखी जा चुकी थीं और अब प्रकट की जानी हैं, और इसी कारण कुछ कठोर वचन कहे जाते हैं, जिन्हें सुनकर राक्षसियाँ विषाद करती हैं।

धर्म का नेगी

उत्तर देने से पहले सीताजी जो करती हैं वह क्रिया में लिखा है: वचनों को सिर पर धारण करती हैं। न खण्डन, न सफ़ाई, न प्रश्न। और बोलने से ठीक पहले कवि उनकी एक गवाही दर्ज करता है, मन, वचन और कर्म से पवित्र। यह प्रमाणपत्र वक्तव्य के पहले आता है, बाद में नहीं, इसलिये जो अब कहा जायगा वह किसी को कुछ सिद्ध करने के लिये नहीं कहा जा रहा।

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥
लछिमन होहु धरम के नेगी । पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥

चौपाई ४

नेगी शब्द पर ठहरना चाहिये। नेग वह हिस्सा है जो किसी संस्कार में किसी को रीति से मिलता है, और नेगी वह है जिसका उस पर हक़ है। सीताजी लक्ष्मणजी से दया नहीं माँग रहीं और सहायता भी नहीं माँग रहीं। वे उन्हें एक कर्म में उनका बनता हुआ हिस्सा दे रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जो होने जा रहा है उसे वे पहले ही संस्कार मान चुकी हैं, विपत्ति नहीं। और आदेश का दूसरा आधा हिस्सा बेगी है, शीघ्र। जो सिद्ध करने को रुकता है वह देर लगाता है; जो सिर पर वचन रखकर उठा है वह जल्दी करता है।

लक्ष्मणजी उस वाणी को सुनते हैं जिसे तुलसी चार चीज़ों में सनी हुई बताते हैं: विरह, विवेक, धर्म और नीति। इस क्रम पर ध्यान दीजिये, विरह पहले आता है। जो कुछ आगे होगा उसकी जड़ शास्त्र में नहीं, बिछोह में है। सुनकर लक्ष्मणजी के नेत्रों में जल भर आता है और वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रह जाते हैं। और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिसमें सब कुछ है: वे प्रभु से कुछ कह नहीं सकते। आँसू सीताजी के लिये हैं और चुप्पी श्रीराम की ओर है। कविता यह नहीं कहती कि वे सीताजी से कुछ नहीं कह सके।

देखि राम रुख लछिमन धाए । पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥
पावक प्रबल देखि बैदेही । हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥

चौपाई ५

आज्ञा कभी शब्द बनकर नहीं आती। लक्ष्मणजी श्रीराम का रुख देखते हैं और दौड़ पड़ते हैं। इस पन्ने पर यह पहली बार नहीं है कि दौड़ने की क्रिया आयी हो: कुछ पंक्तियाँ पहले रक्षक भी दौड़े थे, देखने से रोकने के लिये। वही क्रिया यहाँ एक चितवन मानकर दौड़ने के लिये है। जो दृष्टि रोकने भागी थी और जो दृष्टि आज्ञा बनकर भेजती है, दोनों एक ही पन्ने पर एक ही क्रिया से लिखी गयी हैं।

फिर आग तैयार होती है और बहुत सी लकड़ी आती है, और दूसरा अर्धांश उस आग को देखने वाली आँख पर चला जाता है। आग को प्रबल देखकर जानकीजी के हृदय में हर्ष होता है। तुलसी हर्ष पहले लिखते हैं और भय का निषेध बाद में। यदि निषेध पहले लिखा जाता तो पढ़ने वाला मानता कि भय पर क़ाबू पाया गया। हर्ष पहले लिखने से भय की बात केवल एक पुष्टि रह जाती है, मुख्य पाठ नहीं।

जौं मन बच क्रम मम उर माहीं । तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥

चौपाई ६

यह प्रतिज्ञा जिस साँचे में ढली है वह शर्त का साँचा है, यदि और तो। पर जो माँगा जा रहा है उसे ग़ौर से देखिये। वे यह नहीं कहतीं कि मुझे बचा लीजिये। वे यह भी नहीं कहतीं कि मुझे प्रमाणित कर दीजिये। वे अग्निदेव को उस विशेषण से पुकारती हैं जो पहले ही सब तय कर देता है: जो सबकी गति जानते हैं। साक्षी को कुछ बताया नहीं जाता, उसे केवल उसका काम करने दिया जाता है।

और यहाँ इस पन्ने का सबसे साफ़ जोड़ बनता है। कुछ पंक्तियाँ पीछे भीतर के साक्षी की बात आ चुकी है। अब बाहर का साक्षी वह है जो सबके मन की गति जानता है। दो गवाह एक ही प्रसंग में खड़े हैं और दोनों की एक ही ख़ूबी है: दोनों को कुछ सुनाने की ज़रूरत नहीं। और जो प्रमाण माँगा गया है उसका नाम श्रीखंड है, चन्दन, जो शीतल है, सुगन्धित है, और पूजा में शरीर पर लगाया जाता है। अग्नि से यह नहीं कहा गया कि जलना बन्द कर दीजिये। यह कहा गया कि मेरे लिये चन्दन हो जाइये।

सार: सीताजी वचनों को सिर पर धारण करके लक्ष्मणजी को धर्म का नेगी बनाती हैं और शीघ्र अग्नि तैयार करने को कहती हैं; लक्ष्मणजी की आँखें भर आती हैं पर वे प्रभु से कुछ कह नहीं पाते, और श्रीराम का रुख देखकर काठ ले आते हैं। प्रचण्ड अग्नि देखकर जानकीजी को हर्ष होता है, भय नहीं, और वे अग्नि से केवल इतना कहती हैं कि जो सबकी गति जानते हैं वे उनके लिये चन्दन के समान हो जायँ।

आग में जला क्या

और फिर छन्द आता है, जिसकी लम्बी चाल उस क्षण के लिये चुनी गयी लगती है। चौपाई की छोटी साँस यहाँ काम न देती।

श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥
प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥ सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥॥ २॥

छन्द १

प्रवेश किस भाव से होता है, यह पहली ही पंक्ति में तय है: प्रभु का स्मरण करके, और चन्दन के समान हो चुकी अग्नि में। दूसरी पंक्ति में छन्द एक क्षण रुककर दो बातें दर्ज करता है, कि जिन चरणों की वन्दना महादेवजी करते हैं वे ही ये हैं, और कि उनमें इस प्रवेश करने वाली की प्रीति अत्यन्त निर्मल है। जो जाँच का दृश्य दिखता है, कविता उसे जाँचने से पहले ही निपटा देती है।

तीसरी पंक्ति वह है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है। प्रचण्ड अग्नि में दो चीज़ें जलीं। पहली, प्रतिबिंब, जिसे टीका छायामूर्ति कहती है। दूसरी, लौकिक कलंक, यानी वह लांछन जो लोक ने लगाया था। इन दोनों की एक बात साझी है। छायामूर्ति सीताजी नहीं थीं, और कलंक कभी उनका था ही नहीं, वह दुनिया की बात थी जो उनके नाम के साथ चिपक गयी थी। जो जला उसमें एक छाया थी और एक अफ़वाह। जिस नाम की उस पंक्ति में सबसे अधिक अपेक्षा होती, वह उसमें है ही नहीं।

और छन्द इसके तुरन्त बाद वह पंक्ति रखता है जो इस पन्ने की सबसे तीखी है। प्रभु के इस चरित्र को किसी ने नहीं जाना, और देवता, सिद्ध और मुनि आकाश में खड़े देख रहे हैं। आसमान से बेहतर जगह देखने के लिये कोई नहीं है। उनके पास वह सब है जो आँख को चाहिये, ऊँचाई, दूरी, फ़ुर्सत, और वे तीनों जातियाँ हैं जिनसे जानने की सबसे ज़्यादा उम्मीद की जाती है। फिर भी जानने की क्रिया के आगे तुलसी काहुँ न लगा देते हैं। देखना और जान लेना, इस पन्ने पर, एक चीज़ नहीं है।

इसके बाद जो छन्द आता है वह इस संग्रह में अपनी जगह से हटकर बैठा है और इसलिये यहाँ उसे केवल कहा जा रहा है। उसमें अग्नि शरीर धारण करके उस सत्य श्री का हाथ पकड़ते हैं जो वेदों में और जगत् में प्रसिद्ध हैं, और उन्हें श्रीरामजी को वैसे ही लाकर सौंप देते हैं जैसे क्षीरसागर ने इन्दिरा को सौंपा था। वे श्रीरामजी के वाम भाग में सुशोभित होती हैं, और उपमा यह दी गयी है कि मानो नये खिले नीले कमल के पास सोने के कमल की कली हो। ध्यान दीजिये कि सौंपने वाला वही है जिसे कुछ पंक्तियाँ पहले साक्षी कहा गया था। गवाह इस प्रसंग में केवल गवाही नहीं देता, वह हाथ पकड़कर ले आता है।

और उसके बाद के दोहे में आकाश फिर काम पर लग जाता है। देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, गगन में डंके बजते हैं, किन्नर गाते हैं, और विमानों पर चढ़ी सुरबधुएँ नाचती हैं। फिर दोहे का दूसरा हिस्सा ज़मीन पर उतर आता है: जानकीजी सहित प्रभु की अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित होते हैं और जय बोलते हैं। वही जीव, जिन्हें कुछ चौपाई पहले छड़ी लिये रक्षक हाँक रहे थे, अब उस दृश्य के दर्शक हैं जिसे आकाश भर के देवता समझ नहीं पाये।

सार: सीताजी चन्दन के समान हुई अग्नि में प्रवेश करती हैं और प्रचण्ड अग्नि में प्रतिबिंब तथा लौकिक कलंक जल जाते हैं; प्रभु का यह चरित्र कोई नहीं जान पाता, देवता, सिद्ध और मुनि आकाश में खड़े केवल देखते रह जाते हैं। फिर अग्नि शरीर धारण करके सत्य श्री को लाकर श्रीरामजी को सौंपते हैं, वे उनके वाम भाग में सुशोभित होती हैं, और आकाश तथा पृथ्वी दोनों जय-जयकार करती हैं।

वे देवता, जिनकी परख पहले हो चुकी है

अब भीड़ बदलती है, और तुलसी उसके बदलने का ढंग बहुत सूखे स्वर में लिखते हैं।

तब रघुपति अनुसासन पाई । मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥
आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥

चौपाई ७

पहले मातलि जाते हैं, चरणों में सिर नवाकर। टीका बताती है कि वे इन्द्र के सारथि हैं और रथ लौटा ले जाते हैं। जो उधार का साधन था वह चुपचाप लौट जाता है और उसके लौटने का पूरा वर्णन आधी पंक्ति है। उसके तुरन्त बाद जो आते हैं उनके लिये तुलसी ने आधी पंक्ति में उससे बड़ा काम कर दिया है। देवता आये, और वे सदा के स्वार्थी हैं। यह उनके मुँह खोलने से पहले लिखा गया है। और दूसरी आधी पंक्ति में जनु है, मानो। वे ऐसे वचन कहते हैं मानो बड़े परमार्थी हों।

अब जो स्तुति वे करते हैं उसे इस चेतावनी के साथ पढ़िये। पहला वाक्य ही अपना पता दे देता है: आपने देवताओं पर दया की। सबसे पहले जिस बात का ज़िक्र आता है वह वह उपकार है जो उन्हीं पर हुआ। फिर वे रावण की गिनती कराते हैं, विश्व के द्रोह में लगा हुआ, दुष्ट, कामी, कुमार्गगामी, और एक वाक्य ऐसा कहते हैं जो पूरी लङ्का-कथा का निचोड़ है: वह अपने ही पाप से गया। इसके बाद वे दर्शन पर उतर आते हैं, समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, सदा एकरस, सहज उदासीन, अकल, अगुन, अज, अनघ, अनामय, अजित, अमोघशक्ति और करुणामय। और फिर अवतारों की सूची आती है, मीन, कमठ, सूकर, नरहरि, वामन और परशुराम।

सूची के बाद जो पंक्ति आती है वह सूची का कारण बता देती है: जब-जब देवताओं ने दुःख पाया, तब-तब अनेक शरीर धारण करके आपने उसे नष्ट किया। यानी अवतारों का इतिहास भी उन्हीं के अपने दुःख के हिसाब से लिखा जा रहा है। दो चौपाइयों में स्तुति ने विश्वरक्षा से चलकर अपना खाता खोल लिया है। तुलसी की उस आधी पंक्ति को याद कीजिये और देखिये कि उसे सिद्ध करने के लिये उन्हें कुछ भी अलग से नहीं कहना पड़ा। गवाही स्तुति ही दे रही है।

यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही॥
अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरें मन बिसमय आवा॥

चौपाई ८

यह चौपाई दो हिस्सों में बँटी है और दोनों को जोड़ने वाला शब्द अन्त में आता है। पहला हिस्सा रावण का दोषपत्र दोहराता है, मलिन, सदा का सुरद्रोही, काम, लोभ और मद में रत, अत्यन्त क्रोधी। दूसरा हिस्सा वह है जिसे वे पचा नहीं पा रहे: अधमों के शिरोमणि ने आपका पद पा लिया। और जिस शब्द से वे अपनी हालत बताते हैं वह बिसमय है। हर्ष नहीं, कृतज्ञता नहीं, विस्मय। उनका गणित टूट गया है। जिस हिसाब से वे दुनिया चलती हुई मानते थे उसमें सबसे नीचे वाले का सबसे ऊपर पहुँच जाना कहीं नहीं लिखा था।

और तब, बिना किसी के पूछे, वे वह कह देते हैं जिसे कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

हम देवता परम अधिकारी । स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥
भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥

चौपाई ९

पहले शब्दों पर जाइये: हम देवता, परम अधिकारी। यह दावा है, और दावा करते ही वे उसे ख़ुद तोड़ देते हैं। स्वार्थ में रत, भक्ति भुलाये हुए। जिस विशेषण से तुलसी ने उन्हें दाख़िल किया था, वही विशेषण अब उनके अपने मुँह में है। कवि की चुटकी अब आरोप नहीं रही, इक़बालिया बयान हो गयी है। और आगे वे जो कहते हैं वह उससे भी बड़ा है: हम निरन्तर भव के प्रवाह में पड़े हैं। जो अमर कहलाते हैं, वही अपने को बहाव में बताते हैं, और जो मरने वाले हैं वे नीचे खड़े दर्शन कर रहे हैं। इस पन्ने पर आगे यही बात एक और मुँह से, और ज़्यादा कड़वे ढंग से निकलेगी।

विनती करके देवता और सिद्ध जहाँ के तहाँ हाथ जोड़े खड़े रह जाते हैं। किसी को कुछ मिला हो, ऐसा दोहा नहीं कहता। वह इतना ही कहता है कि वे खड़े रहे, और फिर अत्यन्त प्रेम से पुलकित शरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे।

सार: मातलि रथ लेकर लौट जाते हैं और देवता आते हैं, जिन्हें तुलसी बोलने से पहले ही सदा का स्वार्थी कह देते हैं। उनकी स्तुति अपने ही उपकार से शुरू होती है, अवतारों की सूची भी अपने ही दुःख के हिसाब से गिनाती है, और अन्त में वे स्वयं मान लेते हैं कि वे स्वार्थ में रत रहकर भक्ति भुला बैठे और भवसागर में पड़े हैं। उन्हें विस्मय इस बात का है कि अधमों का शिरोमणि वह पद पा गया जो उन्हें नहीं मिला।

ब्रह्मा की आँखें नहीं अघातीं

ब्रह्माजी की स्तुति लम्बी है और उसका छन्द देवताओं वाली चौपाइयों से अलग चलता है। वह जय से शुरू होती है: सदा सुखधाम, हरि, धनुष-बाण धारण किये रघुनायक; भव रूपी हाथी को चीरने वाले सिंह; गुणों के सागर, नागर, नाथ, विभु। फिर एक उपमा आती है जिसे पढ़कर रुकना पड़ता है। रावण को महानाग कहा गया है और श्रीराम को वह खगनाथ, जिसने क्रोध करके उसे पकड़ लिया।

और उसके ठीक बाद वाली पंक्ति कहती है कि वे सदा क्रोधरहित हैं और नित्य बोधमय हैं। दो साँसों में क्रोध की उपमा और क्रोध का निषेध। यह चूक नहीं है। ब्रह्माजी ने क्रोध को उपमा के खाते में डाला है, उस व्यक्ति के खाते में नहीं जिसके लिये उपमा दी गयी। गरुड़ साँप को खाता है क्योंकि गरुड़ का स्वभाव यही है, इसमें किसी पर ग़ुस्सा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। दूसरी पंक्ति पहली को पढ़ने का ढंग सिखा देती है।

आगे अवतार को उदार और अपार गुणों वाला, पृथ्वी का भार उतारने वाला और ज्ञान का घन कहा जाता है, और फिर तुरन्त यह जोड़ा जाता है कि अवतार लेने पर भी वे अज हैं, व्यापक हैं, एक हैं और अनादि हैं। इसी के साथ जो पंक्ति आती है वह इस पूरे युद्ध में से एक ही काम चुनकर उसका नाम लेती है। रघुवंश के आभूषण और दूषण को मारने वाले कहकर ब्रह्माजी जो घटना गिनाते हैं वह रावण का वध नहीं है। वह यह है कि विभीषण दीन थे और उन्हें राजा बना दिया गया। सबसे बड़ी लड़ाई जीतने के बाद सृष्टिकर्ता जिस एक काम का नाम लेता है वह किसी को मारना नहीं, किसी को खड़ा करना है। और पंक्ति की ध्वनि में दूषण और विभीषण आमने-सामने बैठा दिये गये हैं, एक जो मारा गया और एक जो बिठाया गया।

फिर गुण और ज्ञान का भण्डार, मानरहित, अजन्मा, व्यापक, विरज; भुजदण्डों का प्रचण्ड प्रताप और बल; दुष्टसमूह के नाश में महाकुशल। और इसके बाद वह नमस्कार आता है जो इस पन्ने पर पहली बार दो को एक साथ लेता है: बिना कारण दीनों पर दया और हित करने वाले, छबि के धाम, आपको रमा सहित नमस्कार। यह नमस्कार अग्नि के बाद आ रहा है, पहले नहीं। जो वाम भाग में सुशोभित हुईं, उन्हें साथ लिये बिना अब कोई प्रणाम नहीं होता।

इसके आगे ब्रह्माजी वह कहते हैं जिसे कहने के लिये उन्हें अपनी ही भाषा तोड़नी पड़ती है। अनवद्य, अखण्ड, इन्द्रियों के विषय नहीं; सदा सब रूप होते हुए भी वह सब कभी हुए ही नहीं। और फिर एक पहरा: ऐसा वेद कहते हैं, यह दन्तकथा नहीं है। कथा सुनाने वाले ग्रन्थ के भीतर एक पात्र यह कह रहा है कि यह जो मैं कह रहा हूँ वह कहानी नहीं है। उपमा सूरज की है, धूप और सूरज, जो अलग भी हैं और अलग नहीं भी। और तब वह चौपाई आती है जिससे इस पन्ने का सबसे दूर तक जाने वाला तार जुड़ता है।

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥
धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥ ९ ॥

छन्द ९

ये सब वानर कृतकृत्य हैं, क्योंकि वे आदर के साथ आपका मुख देख रहे हैं। शब्द सादर फिर आया है। इस पन्ने पर वह पहली बार तब आया था जब श्रीराम ने कहा था कि जानकीजी को आदर के साथ लाइये। अब वही शब्द वानरों के देखने के ढंग पर लगा है। दोनों बार वह किसी काम पर नहीं, काम करने के ढंग पर लगा है, और दोनों बार उसी से काम का दर्जा बदल जाता है।

और दूसरा अर्धांश वह है जिसे सृष्टिकर्ता के मुँह से सुनना अजीब लगता है। हमारे जीवन और देव-शरीर को धिक्कार है, क्योंकि हम आपकी भक्ति के बिना संसार में भूले पड़े हैं। कुछ चौपाई पहले देवता अपने को भव-प्रवाह में बता चुके हैं; यहाँ उनके रचयिता उसी बात पर धिक्कार लगा रहे हैं। और जिनसे तुलना करके यह धिक्कार निकल रहा है वे वही रीछ-वानर हैं जिन्हें इसी पन्ने की शुरुआत में छड़ी लिये रक्षक हाँक रहे थे। जिन्हें देखने से रोका जा रहा था, उन्हीं को देखते हुए देखकर ब्रह्माजी अपने शरीर को कोस रहे हैं।

आगे जो माँगा जाता है वह माँगने वाले के पेशे के ठीक उलट है। दीनदयाल से यह प्रार्थना है कि मेरी उस बुद्धि को हर लीजिये जो भेद करती है। भेद करना ही तो सृष्टि का काम है, और यह प्रार्थना उसी के मुँह से निकल रही है जिसका पूरा काम भेद बनाना है। और लक्षण भी बता दिया गया है कि वह बुद्धि करती क्या है: उससे उलटा कर्म होता है और जो दुःख है उसी को सुख मानकर आदमी ख़ुश घूमता रहता है। अन्त में वह वाक्य आता है जिसमें एक और उलटफेर है। राजाओं के नायक से वरदान माँगा जाता है, और माँगने वाला वह है जिसका अपना पद ही वरदान देने का है। और जो वरदान माँगा गया वह कोई सिद्धि नहीं है, चरणकमलों में सदा कल्याणकारी प्रेम है।

बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥ १११॥

दोहा १११

दोहा स्तुति की बात नहीं कहता। वह यह नहीं बताता कि ब्रह्माजी ने क्या-क्या कहा, कितना ऊँचा कहा, कितना ठीक कहा। वह आँखों पर जाकर रुकता है। शोभा के समुद्र को देखते-देखते नेत्र तृप्त ही नहीं होते। जिन्हें यहाँ चतुरानन कहा गया है उनके पास चार मुख हैं, और चार मुखों की आँखें भी अघाती नहीं। इस पन्ने पर देखने की जितनी घटनाएँ हैं, उनमें यह सबसे मीठी है, क्योंकि इसमें कोई कमी नहीं, केवल कभी न भरने वाली भूख है।

सार: ब्रह्माजी की स्तुति रावण को महानाग और श्रीराम को गरुड़ कहकर भी उन्हें गतक्रोध बताती है, और पूरे युद्ध में से जिस एक काम का नाम लेती है वह दीन विभीषण को राजा बनाना है। वे वानरों को कृतकृत्य कहकर अपने देव-शरीर को धिक्कारते हैं, भेद करने वाली बुद्धि हर लेने की प्रार्थना करते हैं, और वरदान में केवल चरणकमलों का प्रेम माँगते हैं; दोहा उनकी न अघाने वाली आँखों पर बन्द होता है।

एक नज़र में दिया हुआ ज्ञान

उसी अवसर पर दशरथजी वहाँ आते हैं, और कवि सबसे पहले जो दर्ज करता है वह उनकी आँखें हैं। पुत्र को देखते ही उनके नेत्रों में जल छा जाता है। फिर छोटे भाई सहित प्रभु उनकी वन्दना करते हैं और तब पिता आशीर्वाद देते हैं। क्रम पर ध्यान दीजिये: वन्दना पहले, आशीर्वाद बाद में। जिनकी स्तुति अभी-अभी ब्रह्माजी कर चुके हैं, वे झुकने में पहल करते हैं।

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥
सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी । नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥

चौपाई १०

जीत का पूरा श्रेय एक ऐसे आदमी को दे दिया जाता है जो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं। और श्रेय देने का ढंग भी देखिये: रावण को अजय कहा गया है, वह जो जीता न जा सके। जिसे अजेय कहकर गिनाया जाय, उस पर पायी गयी जीत का दान और बड़ा हो जाता है। उसके बाद वही चित्र दोबारा आता है जिससे यह हिस्सा शुरू हुआ था। पुत्र के वचन सुनकर प्रीति बहुत बढ़ जाती है, नेत्रों में जल आ जाता है, रोमावली खड़ी हो जाती है।

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥
ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥

चौपाई ११

अब इस चौपाई के पहले अर्धांश को धीरे पढ़िये। पहले के प्रेम का अनुमान करके, पिता की ओर देखकर, उन्हें दृढ़ ज्ञान दे दिया गया। चितइ, यानी देखकर। कोई उपदेश नहीं है, कोई वाक्य नहीं है। इसी पन्ने पर कुछ देर पहले लक्ष्मणजी को भी आज्ञा इसी रास्ते से मिली थी, रुख देखकर। दो बार इस प्रसंग में सबसे बड़ी चीज़ बिना बोले दी गयी है, और दोनों बार माध्यम आँख है। जो पन्ना देखने की इतनी घटनाएँ गिनता है, उसमें दिया भी देखने से ही जाता है।

और फिर वह दूसरा अर्धांश है जिसके लिये कवि को सुनने वाला अलग से खड़ा करना पड़ता है। हे उमा, इसी से उन्होंने मोक्ष नहीं पाया, क्योंकि दशरथजी ने अपना मन भेद-भक्ति में लगाया था। पूरा रामचरितमानस शिवजी का पार्वतीजी से कहा हुआ है, और यह नाम वहीं उभरता है जहाँ बात कठिन है। तुलसी इसे कथा के बहाव में नहीं बहने देते। वे एक श्रोता बीच में लाकर खड़ा कर देते हैं, ताकि जो कहा जा रहा है वह किसी को कहा हुआ लगे, यूँ ही निकला हुआ नहीं।

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं । तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥
बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥

चौपाई १२

क्रिया पर ग़ौर कीजिये। यह नहीं लिखा कि वे मोक्ष पा नहीं सकते। लिखा है कि वे लेते ही नहीं। इनकार उनकी ओर से है, कमी किसी और की नहीं। और बदले में जो मिलता है उसका नाम भी तुलसी सँभालकर रखते हैं: अपनी भक्ति। मोक्ष एक हालत है, भक्ति एक रिश्ता है, और सगुण का उपासक दूसरी चीज़ माँगता है क्योंकि पहली में जिससे प्रेम है वही नहीं बचता।

और इसके बाद दशरथजी क्या करते हैं, यह इस पूरे सिद्धान्त की सबसे साफ़ जाँच है। वे बार-बार प्रभु को प्रणाम करके, हर्षित होकर, देवलोक को चले जाते हैं। कविता में कहीं शोक नहीं है। जो चीज़ शास्त्र के हिसाब से सबसे बड़ी है वह उन्हें नहीं मिली, और वे हँसते हुए जा रहे हैं। तुलसी इसे हानि की तरह लिखते ही नहीं।

सार: दशरथजी आते हैं, श्रीराम छोटे भाई सहित वन्दना करते हैं और जीत का सारा श्रेय पिता के पुण्य को दे देते हैं; फिर एक दृष्टि मात्र से उन्हें दृढ़ ज्ञान दे दिया जाता है। उमा को सम्बोधित करके कहा जाता है कि भेद-भक्ति में मन लगाने के कारण उन्होंने मोक्ष नहीं पाया, और यह भी कि सगुण के उपासक मोक्ष लेते ही नहीं, उन्हें श्रीराम अपनी भक्ति देते हैं; दशरथजी हर्षित होकर देवलोक जाते हैं।

और तब देवराज ने अपनी बात कही

अगला दोहा तीनों को एक साथ बिठाकर दिखाता है, छोटे भाई और जानकीजी सहित परम कुशल कोसलाधीश, और उस शोभा को देखकर देवराज मन में हर्षित होकर स्तुति करने लगते हैं। यह पन्ने की तीसरी स्तुति है और तीनों की शुरुआत एक ही क्रिया से हुई है, देखने से।

इन्द्र की स्तुति का छन्द छोटी चाल का है और शुरू में वह वही करता है जो स्तुतियाँ करती हैं। शोभा के धाम, शरणागत को विश्राम देने वाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किये, प्रबल प्रताप वाले भुजदण्डों वाले, जय हो। फिर दूषण के शत्रु और खर के शत्रु, राक्षसों की सेना का मर्दन करने वाले; आपने इस दुष्ट को मारा, जिससे सब देवता सनाथ हो गये। फिर पृथ्वी का भार हरने वाले, अपार और उदार महिमा वाले; रावण के शत्रु, कृपालु, जिन्होंने राक्षसों को बेहाल कर दिया।

और फिर वह जगह आती है जहाँ स्तुति फिसलकर आत्मकथा बन जाती है। लङ्कापति को अपने बल का बहुत घमंड था, उसने देवताओं और गन्धर्वों को अपने वश में कर लिया था, और मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग, सबके पीछे हठ करके पड़ गया था। जिन्हें उसने वश में किया उनकी सूची जिस नाम से शुरू होती है, उसी नाम वाले यह सूची पढ़ रहे हैं। देवराज अपनी ही हार गिनाकर शिकायत कर रहे हैं। फिर दूसरों से द्रोह में लगा हुआ, अत्यन्त दुष्ट, और उस पापी ने वैसा ही फल पाया। और उसके बाद एक विनती, अब सुनिये, हे दीनदयाल, हे कमल के समान विशाल नेत्रों वाले।

मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान॥
अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज॥ ६॥

छन्द ३

यह पन्ने का सबसे ईमानदार क्षण है और उसे ईमानदार बनाने वाली बात उसकी जगह है। अभी दो साँस पहले इन्द्र ने रावण का सबसे बड़ा दोष गिनाया था, बल का गर्व। और अब वे कहते हैं कि मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है। जो वाक्य वे अपने बारे में उद्धृत कर रहे हैं वह ठीक उसी क़िस्म का है जिसके लिये लङ्कापति मारा गया। कविता ने आरोप और इक़बाल को चार पंक्तियों के फ़ासले पर रख दिया है और बीच में कुछ नहीं कहा।

और उस अभिमान का इलाज क्या हुआ, यह भी उसी चौपाई में है। कोई तर्क नहीं हारा, कोई हार नहीं हुई, कोई शाप नहीं लगा। अब प्रभु के चरणकमल देखकर वह अभिमान जाता रहा, वह अभिमान जो दुःखों के ढेर का देने वाला था। इस पन्ने पर देखने की क्रिया अब तक हर्ष देती रही थी, दर्शन देती रही थी, आज्ञा देती रही थी, ज्ञान देती रही थी। यहाँ वह कुछ छीन लेती है, और जो छीना जाता है उसे खोकर ही आदमी बचता है।

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥
मोहि भाव कोसल भूप । श्रीराम सगुन सरूप॥ ७॥

छन्द ४

यह चुनाव इस पन्ने के लिये मामूली नहीं है। कुछ दोहे पहले यही बात उस मुँह से निकल चुकी है जिसकी बात आख़िरी होती है: सगुण के उपासक मोक्ष लेते नहीं, उन्हें अपनी भक्ति दी जाती है। देवराज ने वह प्रसंग नहीं सुना, वे उस समय वहाँ नहीं थे। फिर भी वे ठीक वही चुनते हैं। कोई निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करे, जिसे श्रुति अव्यक्त कहती है; मुझे तो कोसलराज का यह सगुण स्वरूप ही भाता है। सिद्धान्त पहले कहा गया और उसका उदाहरण बाद में आकर अपने आप खड़ा हो गया।

और जो वे माँगते हैं वह भी उसी सिद्धान्त की दूसरी छोर है। जानकीजी और छोटे भाई सहित मेरे हृदय में अपना घर बनाइये, मुझे अपना दास जानिये, और भक्ति दीजिये। तीनों को एक साथ माँगा गया है, जैसे अभी-अभी दोहे में तीनों एक साथ बैठे दिखाये गये थे। और जो अन्तिम शब्द माँगा गया वह भक्ति है, ठीक वही चीज़ जिसे कुछ पंक्तियाँ पहले सगुण के उपासकों के लिये बचाकर रखा गया था। इन्द्र की अर्ज़ी उनके लिखने से पहले ही मंज़ूर हो चुकी थी।

इसके बाद का छन्द उसी टुकड़े से शुरू होता है जिस पर पिछली चौपाई बन्द हुई थी, भक्ति दीजिये, हे रमानिवास। फिर शरणागत के त्रास को हरने वाले और उसे सुख देने वाले, सुख के धाम, अनेक कामदेवों की छबि वाले रघुनायक को नमस्कार; देवसमूह को आनन्द देने वाले, द्वन्द्वों के नाश करने वाले, अतुलित बल वाले, ब्रह्मा और शंकर आदि से सेव्य, करुणा से कोमल श्रीराम को नमस्कार। इतनी ऊँचाई पर चढ़ी हुई इस स्तुति में एक शब्द ऐसा बैठा है जो सब नीचे ले आता है: मनुजतनु। तीन स्तुतियाँ अविनाशी, अज, अव्यक्त और अगुन कहते-कहते अन्त में जिस शरीर का नाम लेती हैं, वह मनुष्य का है।

अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।
काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल॥ ११३॥

दोहा ११३

और यहाँ दिशा उलट जाती है। पूरे पन्ने पर सब उन्हें देखते रहे हैं। सीताजी ने पहली पंक्ति में इन्हीं आँखों से देखने का उपाय माँगा था, वानरों ने रोके जाकर भी देखा, देवताओं ने आकाश से देखा, ब्रह्माजी की आँखें देखकर अघायीं नहीं, इन्द्र का अभिमान देखकर गया। अब अन्तिम दोहे में देवराज कहते हैं कि अब कृपा करके मेरी ओर देखिये। और उसके साथ जो माँगा जाता है वह वरदान नहीं है, आज्ञा है: बताइये, मैं क्या करूँ।

दोहा इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता। वह इतना ही कहता है कि ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु बोले, और वहीं रुक जाता है। जो कहा गया वह अगले प्रसंग की चीज़ है। यह पन्ना, जो एक स्त्री की देखने की माँग से खुला था, एक देवता की देखे जाने की माँग पर, और एक अधूरे वाक्य पर बन्द होता है।

सार: इन्द्र की स्तुति रावण के घमंड की गिनती करते-करते अपनी हार की सूची बन जाती है, और फिर वे स्वयं मान लेते हैं कि उन्हें भी वैसा ही अभिमान था, जो चरणकमलों के दर्शन से जाता रहा। वे निर्गुण के स्थान पर सगुण कोसलराज को चुनते हैं, जानकीजी और लक्ष्मणजी सहित अपने हृदय में निवास तथा भक्ति माँगते हैं, और अन्तिम दोहे में यह कहकर कि अब मेरी ओर देखिये, आज्ञा माँगते हैं; उत्तर अगले प्रसंग में है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को पूरा पढ़कर सबसे पहले यह खटकता है कि तुलसी ने किन जगहों पर शब्द ख़र्च नहीं किये। कठोर वचन, जिनसे यह सारा दृश्य शुरू होता है, एक भी उद्धृत नहीं हैं। राक्षसियों का हृदय-परिवर्तन एक विशेषण में निपटा है। अग्नि में प्रवेश का ब्योरा दो पंक्तियों का है। और उसके बाद तीन स्तुतियाँ हैं जो मिलकर इस पन्ने का आधे से ज़्यादा हिस्सा घेर लेती हैं। जहाँ घटना है वहाँ कविता जल्दी में है, और जहाँ कोई घटना नहीं हो रही, वहाँ वह ठहरकर बैठ जाती है। यह चुनाव अपने आप में एक बयान है।

दूसरी बात उन तीन स्तुतियों की आपसी बनावट की है। तीनों में स्तुति करने वाला अन्त तक आते-आते अपने बारे में एक बात मान लेता है, और तीनों बार वह बात उसके पद के ख़िलाफ़ जाती है। देवता, जो परम अधिकारी हैं, कहते हैं कि वे भवसागर में पड़े हैं। ब्रह्माजी, जो रचते हैं, कहते हैं कि उनकी भेद करने वाली बुद्धि हर ली जाय, और अपने देव-शरीर को धिक्कारते हैं। इन्द्र, जो देवराज हैं, कहते हैं कि उन्हें अभिमान था कि उनके समान कोई नहीं। किसी से यह क़बूल कराया नहीं गया। तीनों अपने आप कहते हैं, और तीनों कहने से पहले देख चुके होते हैं।

और तीसरी बात उस पंक्ति की है जिससे इस पन्ने का नाम आया। प्रचण्ड अग्नि में जो जला, वह प्रतिबिंब और लौकिक कलंक था। छाया और चर्चा। एक जो कभी वह थी ही नहीं जो दिखती थी, और एक जो कभी उनकी थी ही नहीं। जिसे लोक ने जाँच समझा वह असल में सफ़ाई थी, और सफ़ाई भी उनकी नहीं, लोक की। इसीलिये उस छन्द की अगली ही पंक्ति कहती है कि प्रभु के इस चरित्र को किसी ने नहीं जाना, जबकि देवता, सिद्ध और मुनि आकाश में खड़े देख रहे थे। पूरी भीड़ मौजूद थी, पूरा दृश्य सामने था, और समझ किसी को नहीं आया।

यह पन्ना जिस चीज़ पर बार-बार लौटता है वह आँख है, और वह हर बार एक ही सबक़ नहीं देता। कभी देखना रोका जाता है और श्रीराम उसे खोल देते हैं। कभी देखना आज्ञा बन जाता है, जैसे लक्ष्मणजी के लिये। कभी वह ज्ञान बन जाता है, जैसे दशरथजी के लिये। कभी वह भूख बन जाता है जो भरती नहीं, जैसे ब्रह्माजी के लिये। कभी वह घमंड ले जाता है, जैसे इन्द्र के लिये। और कभी वह कुछ भी नहीं देता, जैसे आकाश में खड़े उन सब के लिये जिन्होंने सब देखा और कुछ नहीं जाना। फ़र्क़ आँख में नहीं है, आँख के पीछे जो खड़ा है उसमें है।

सार: तुलसी घटनाओं पर कम और स्तुतियों पर ज़्यादा रुकते हैं; तीनों स्तुति करने वाले अन्त में अपने ही पद के विरुद्ध एक स्वीकार कर बैठते हैं, और तीनों ऐसा देख लेने के बाद करते हैं। जो अग्नि में जला वह प्रतिबिंब और लौकिक कलंक था, और उसी छन्द में लिखा है कि आकाश में खड़े देवता, सिद्ध और मुनि सब देखकर भी कुछ नहीं जान पाये।

एक आख़िरी बात, जो इस पन्ने पर लिखी तो है पर आसानी से निकल जाती है। जिस स्त्री के बारे में यह पूरा प्रसंग है, वे इसमें कुल तीन बार बोलती हैं। पहली बार दर्शन का उपाय माँगती हैं। दूसरी बार लक्ष्मणजी को धर्म का नेगी बनाकर आग माँगती हैं। तीसरी बार अग्नि से कहती हैं कि जो सबकी गति जानते हैं वे उनके लिये चन्दन हो जायँ। तीनों बार वे माँगने वाली हैं, और तीनों बार जो माँगा गया वह अपने लिये कोई रियायत नहीं है। इसके बाद इस पन्ने पर उनका एक भी वचन नहीं है। जो बोलते हैं वे देवता, ब्रह्मा, दशरथ और इन्द्र हैं, और वे सब उनके बारे में नहीं, अपने बारे में बोलते हैं।

और इसीलिये पन्ने का सबसे बड़ा वाक्य वही आधी पंक्ति रह जाती है जिसे कवि ने सबसे पहले, सबसे चुपचाप, किसी पात्र के मुँह में डाले बिना कह दिया था: सीता पहले ही अग्नि में रखी जा चुकी थीं, और भीतर का साक्षी उन्हें प्रकट करना चाहता है। जो पढ़ने वाला है उसे यह भेद घटना से पहले मिल जाता है। जो देखने वाले वहाँ मौजूद थे, आकाश भर के देवता और सिद्ध और मुनि, उन्हें बाद में भी नहीं मिला।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा १०८ से ११३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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