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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 16
जो जला वह प्रतिबिंब था
लङ्कापति मारा जा चुका है और सीता पालकी पर बिठा दी गयी हैं। तभी श्रीराम कहते हैं कि पालकी रहने दीजिये, वे पैदल आयें, ताकि वानर उन्हें माता की तरह देख सकें। यहीं से कथा उस आग तक पहुँचती है जिसमें सीता नहीं, उनका प्रतिबिंब और दुनिया का लगाया हुआ कलंक जलता है।
यह प्रसंग बीच बात से शुरू होता है, और जो बोल रही हैं वे अपने बचाव की बात नहीं कर रहीं। सीता हनुमान से कहती हैं, “तात, अब कोई ऐसा उपाय कीजिये कि इन आँखों से उन कोमल श्याम अङ्गों को देख लूँ।” सुनकर हनुमान राम के पास जाते हैं और सीता का कुशल-समाचार सुनाते हैं। लङ्का गिर चुकी है, रावण अपने ही पाप से जा चुका है, युद्ध का कोई काम बाक़ी नहीं। जिनके लिये यह सब हुआ, उनकी पहली माँग दर्शन की है।
यह पूरा प्रसंग उसी एक माँग के चारों ओर बुना हुआ है, देखने के चारों ओर। रीछ-वानर देखने आते हैं और रोक दिये जाते हैं। राम रोक हटा देते हैं, और कारण मर्यादा का नहीं, देखने का बताते हैं। लक्ष्मण को आदेश शब्द से नहीं, मुख देखकर मिलता है। आग जलती है तो देवता, सिद्ध और मुनि आकाश में खड़े सब कुछ देखते हैं और कुछ नहीं समझ पाते। ब्रह्मा की आँखें देखते-देखते तृप्त नहीं होतीं। दशरथ को ज्ञान एक दृष्टि से मिलता है। इन्द्र का अभिमान किसी तर्क से नहीं, राम के चरण देख लेने से जाता है। और अन्त में दिशा उलट जाती है: सारी सभा जिन्हें देखती रही, उनसे इन्द्र कहते हैं, “अब मेरी ओर देखिये।”
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और इस प्रसंग में वह फ़र्क़ छिपाया नहीं जा सकता। यहाँ आग सीता को परखने के लिये नहीं जलायी जाती। आग वे स्वयं माँगती हैं, और कथा उसका भेद पहले ही बता देती है। वाल्मीकि के युद्धकाण्ड में चिता में स्वयं सीता प्रवेश करती हैं, अपनी शुद्धि सिद्ध करने के लिये (सर्ग 116), और अग्निदेव उन्हीं को राम को लौटाते हैं (सर्ग 118)। वहाँ कोई प्रतिबिंब नहीं जलता, क्योंकि वाल्मीकि के अरण्यकाण्ड में कोई प्रतिबिंब रखा ही नहीं गया था।
अग्नि के चारों ओर खड़े लोग
- सीता जो यहाँ पहले दर्शन माँगती हैं, फिर आग माँगती हैं, और दोनों बार माँगने वाली वही हैं। कोई उनसे कुछ माँगता नहीं।
- राम जो इस पूरे प्रसंग में एक भी कठोर आदेश नहीं देते, और जिनका बड़ा आदेश यह है कि पालकी रहने दी जाय।
- हनुमान जो सन्देश लेकर आते हैं और उसी सन्देश के साथ वापस भेजे जाते हैं।
- विभीषण लङ्का के नये राजा, जिन्हें इस प्रसंग में पहला काम राक्षसियों को समझाने का मिलता है।
- युवराज मानस इन्हें नाम से नहीं, इसी पद से बुलाता है। पोद्दार की टीका इन्हें अङ्गद बताती है।
- लक्ष्मण जिन्हें धर्म का नेगी बनाया जाता है, जिनकी आँखें भर आती हैं, और जो एक शब्द कहे बिना लकड़ी ले आते हैं।
- अग्नि जिनसे सीता कुछ माँगती नहीं, केवल याद दिलाती हैं कि वे सबके मन की गति जानते हैं।
- देवगण जिन्हें कथा उनके बोलने से पहले ही सदा का स्वार्थी कह देती है, और जो बोलते-बोलते स्वयं यही मान लेते हैं।
- ब्रह्मा जो वरदान देने वाले हैं, और यहाँ वरदान माँगते हैं।
- दशरथ जो पुत्र को देखने आते हैं, ज्ञान पाते हैं, और मोक्ष लिये बिना हर्षित होकर लौट जाते हैं।
- इन्द्र जो रावण के घमंड की शिकायत करते हैं और उसी साँस में अपना घमंड मान लेते हैं।
- पार्वती जिन्हें सम्बोधित करके यह सारी कथा कही जा रही है, और जिनका नाम ठीक उस जगह उभरता है जहाँ कठिन बात कहनी थी।
पालकी, जो लौटा दी गयी
सन्देश सुनते ही राम ने दो लोगों को बुलवाया और उन्हें हनुमान के साथ भेजा: “हनुमान के साथ जाइये, और सीता को आदर के साथ ले आइये।” शब्द है सादर। आदर की शर्त काम के साथ ही जोड़ दी गयी है, बाद में जोड़ी गयी सफ़ाई की तरह नहीं। यह शब्द इस प्रसंग में लौटकर आता है।
मानस यहाँ युवराज कहता है, नाम नहीं लेता। पोद्दार की टीका उसे अङ्गद बताती है। जाने वालों में दो उस नगर के हैं जिसमें अभी-अभी युद्ध हुआ है, और एक बाहर से आयी सेना का। जो स्त्री महीनों अकेली रही, उसे लेने वह जाता है जिसने उसे सबसे पहले खोजा था। वह जो उस नगर का नया स्वामी है, और वह जो दूसरी सेना का युवराज है।
वे तुरन्त वहाँ पहुँचते हैं जहाँ सीता हैं। और एक बात पर रुकना पड़ता है: सब राक्षसियाँ नम्रता के साथ उनकी सेवा कर रही थीं। ये वही स्त्रियाँ हैं जो पहरे पर थीं। कथा उनके मन बदलने का कोई दृश्य, कोई पश्चात्ताप, कोई क्षमा-याचना नहीं लिखती। वह बदलाव को एक ही विशेषण, विनीत, में पूरा मानकर आगे बढ़ जाती है। विभीषण उन्हें जल्दी से समझा देते हैं, वे कई प्रकार से स्नान कराती हैं, बहुत से गहने पहनाती हैं, और फिर एक सुन्दर पालकी सजाकर लायी जाती है।
सीता राम का स्मरण करके हर्ष के साथ उस पर चढ़ती हैं। चारों ओर हाथों में छड़ी लिये रक्षक चलते हैं, और सबके मन में परम उल्लास है। फिर रीछ और वानर सब देखने आते हैं, और रक्षक क्रोध करके उन्हें रोकने दौड़ते हैं। रक्षक खलनायक नहीं हैं। उनके मन में उल्लास बताया जा चुका है। वे वही कर रहे हैं जो किसी रानी की सवारी के साथ चलने वाले सदा करते आये हैं। मर्यादा उनके पक्ष में है।
और ठीक उसी जगह राम बोलते हैं। जो कहते हैं, वह मर्यादा को उलट देता है, और जिस ढंग से कहते हैं, वह भी देखने लायक़ है।
राम हँसकर कहते हैं, “सखा, मेरा कहना मानिये। सीता को पैदल ले आइये, जिससे वानर उन्हें माता की तरह देखें।” वे आदेश नहीं देते, अनुरोध का पुट रखते हैं। जिस बात के लिये किसी को मनाना पड़े, उसके विरुद्ध रिवाज़ खड़ा होता है। पालकी उन्हीं के आदेश से मँगायी गयी थी, और अब उन्हीं के कहने से हटायी जा रही है। कारण उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा नहीं, यह है कि वानर उन्हें देख सकें। और यह सब वे हँसकर कहते हैं।
पर्दा हटाना भारी काम है, और उसे हँसकर किया जाता है। जिस शब्द से यह सम्भव होता है, वह माता है। रानी को सिपाही देखें तो अशिष्टता है, माता को पुत्र देखें तो दर्शन है। और ये वही रीछ-वानर हैं जिन्होंने समुद्र पर पुल बाँधा, जो इस युद्ध में मरे, और जिन्होंने आज तक उन्हें देखा नहीं था जिनके लिये लड़ रहे थे।
राम के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो जाते हैं, और आकाश से देवता बहुत से फूल बरसाते हैं। और तभी कथा एक क़दम बाहर निकलकर एक भेद बता देती है।
भेद यह है कि सीता पहले ही आग में रखी जा चुकी थीं, और अब भीतर का साक्षी उन्हें प्रकट करना चाहता है। यह वाक्य कथा के भीतर किसी पात्र का नहीं, कथा कहने वाले का है, और वह उस घटना से पहले रखा गया है जिसका भेद खोलता है। कब और कहाँ रखी गयी थीं, यह यहाँ नहीं लिखा। केवल इतना कि पहले रखी जा चुकी थीं। जो आगे आग में जाता हुआ दिखेगा और जो आग से लौटेगा, दोनों का हिसाब इसी एक वाक्य में पहले से चुका दिया गया है।
और तब वह बात आती है जिसे पढ़ना कठिन है, क्योंकि उसमें जो हुआ उसका कारण उससे पहले ही रख दिया गया है।
उसी कारण से राम लीला में कुछ कड़े वचन कहते हैं। कारण पीछे की उस बात में है जहाँ प्रकट करने की इच्छा कही गयी थी। कठोर वचन यहाँ साधन हैं। कथा उन वचनों में से एक भी नहीं लिखती, केवल इतना कहती है कि कुछ कठोर वचन कहे गये। जो कथा लम्बी-लम्बी स्तुतियाँ पूरी उतार देती है, वह यहाँ एक शब्द उद्धृत नहीं करती। और उसी समय बोलने वाले को करुणा का भण्डार कहा जाता है। नाम और काम एक ही वाक्य में आमने-सामने हैं।
और एक बात चुपचाप है। सुनकर प्रतिक्रिया किसकी दर्ज होती है? सीता की नहीं, लक्ष्मण की नहीं, सेना की नहीं। फिर बात राक्षसियों पर जाती है: सुनते ही सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं। जो कल तक पहरेदार थीं, वे आज उस स्त्री के लिये दुःखी होने वाली पहली जमात हैं। कथा यह नहीं कहती कि उनका हृदय बदल गया। बस इतना लिखती है कि दुःख उन्हें हुआ।
धर्म का नेगी
उत्तर देने से पहले सीता वचनों को सिर पर धारण करती हैं: न खण्डन, न सफ़ाई, न प्रश्न। और बोलने से ठीक पहले कथा उनकी गवाही दर्ज करती है, मन, वचन और कर्म से पवित्र। यह प्रमाणपत्र वक्तव्य से पहले आता है, बाद में नहीं, इसलिये जो अब कहा जायगा वह किसी को कुछ सिद्ध करने के लिये नहीं कहा जा रहा। सीता कहती हैं, “लक्ष्मण, आप धर्म के नेगी बनिये, और शीघ्र अग्नि प्रकट कीजिये।”
नेगी पर ठहरना चाहिये। नेग वह हिस्सा है जो किसी संस्कार में किसी को रीति से मिलता है, और नेगी वह है जिसका उस पर हक़ है। सीता लक्ष्मण से न दया माँग रही हैं, न सहायता। वे उन्हें एक कर्म में उनका बनता हुआ हिस्सा दे रही हैं। यानी जो होने जा रहा है, उसे वे पहले ही संस्कार मान चुकी हैं, विपत्ति नहीं। और आदेश का दूसरा आधा है, शीघ्र। जो सिर पर वचन रखकर उठा है, वह जल्दी करता है।
लक्ष्मण उस वाणी को सुनते हैं जिसे कथा चार चीज़ों में सनी हुई बताती है: विरह, विवेक, धर्म और नीति, और विरह पहले है। सुनकर लक्ष्मण के नेत्रों में जल भर आता है, और वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रह जाते हैं। फिर वह बात: वे राम से कुछ कह नहीं सकते। आँसू सीता के लिये हैं, और चुप्पी राम की ओर है।
आज्ञा शब्द बनकर नहीं आती। लक्ष्मण राम का रुख देखते हैं और दौड़ पड़ते हैं। कुछ देर पहले रक्षक भी दौड़े थे, देखने से रोकने के लिये। वही क्रिया यहाँ एक चितवन को आज्ञा मानकर दौड़ने की है।
फिर आग प्रकट होती है और बहुत सी लकड़ी आती है। फिर बात उस आग को देखने वाली आँख पर चली जाती है: आग को प्रबल देखकर सीता के हृदय में हर्ष होता है, भय कुछ नहीं। कथा हर्ष पहले लिखती है और भय का निषेध बाद में। निषेध पहले आता तो लगता कि भय पर क़ाबू पाया गया। हर्ष पहले होने से भय की बात केवल एक पुष्टि रह जाती है।
यह प्रतिज्ञा शर्त के साँचे में ढली है, यदि और तो। सीता कहती हैं, “यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में राम को छोड़कर दूसरी गति नहीं है, तो अग्निदेव मेरे लिये चन्दन के समान हो जायँ। वे सबके मन की गति जानते हैं।” वे यह नहीं कहतीं, “मुझे बचा लीजिये,” न यह, “मुझे प्रमाणित कर दीजिये।” वे अग्नि को उस विशेषण से पुकारती हैं जो पहले ही सब तय कर देता है: जो सबकी गति जानते हैं। साक्षी को कुछ बताया नहीं जाता, उसे केवल उसका काम करने दिया जाता है।
भीतर के साक्षी की बात कुछ ही देर पहले आ चुकी है। अब बाहर का साक्षी वह है जो सबके मन की गति जानता है, और दोनों को कुछ सुनाने की ज़रूरत नहीं। जो माँगा गया है, वह चन्दन है, शीतल और सुगन्धित, जो पूजा में शरीर पर लगाया जाता है। अग्नि से यह नहीं कहा गया कि जलना बन्द करें। यह कहा गया कि सीता के लिये चन्दन हो जायँ।
आग में जला क्या
फिर कथा की चाल लम्बी हो जाती है, और वही इस क्षण को उठाती है।
प्रवेश किस भाव से होता है, यह पहले ही तय है: राम का स्मरण करके, चन्दन के समान हो चुकी अग्नि में। फिर कथा दो बातें दर्ज करती है: जिन चरणों की वन्दना शिव करते हैं, वे ही ये हैं, और उनमें सीता की प्रीति अत्यन्त निर्मल है। जो जाँच का दृश्य दिखता है, कथा उसे जाँच से पहले ही निपटा देती है।
अगली बात पर यह पूरा प्रसंग टिका है। प्रचण्ड अग्नि में दो चीज़ें जलीं: पहली, प्रतिबिंब, जिसे टीका छायामूर्ति कहती है। दूसरी, लौकिक कलंक, यानी वह लांछन जो लोक ने लगाया था। छायामूर्ति सीता नहीं थीं, और कलंक कभी उनका था ही नहीं। वह दुनिया की बात थी जो उनके नाम के साथ चिपक गयी थी। जो जला, उसमें एक छाया थी और एक अफ़वाह। जिस नाम की उस वाक्य में अपेक्षा होती, वह उसमें है ही नहीं।
और कथा तुरन्त बाद कहती है: राम के इस चरित्र को किसी ने नहीं जाना, और देवता, सिद्ध और मुनि आकाश में खड़े देख रहे हैं। उनके पास ऊँचाई है, दूरी है, फ़ुर्सत है, फिर भी कथा कहती है कि जाना किसी ने नहीं। देखना और जान लेना यहाँ एक चीज़ नहीं है।
फिर अग्नि शरीर धारण करके उन सत्य श्री का, यानी सीता का, जो वेदों में और जगत् में प्रसिद्ध हैं, हाथ पकड़ते हैं। वे उन्हें राम को वैसे ही लाकर सौंप देते हैं जैसे क्षीरसागर ने विष्णु को लक्ष्मी सौंपी थी। वे राम के वाम भाग में सुशोभित होती हैं, मानो नये खिले नीले कमल के पास सोने के कमल की कली हो। सौंपने वाला वही है जिसे कुछ ही देर पहले साक्षी कहा गया था। गवाह यहाँ केवल गवाही नहीं देता, हाथ पकड़कर ले आता है।

उसके बाद आकाश फिर काम पर लग जाता है। देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, गगन में डंके बजते हैं, किन्नर गाते हैं, और विमानों पर चढ़ी सुरबधुएँ नाचती हैं। फिर बात ज़मीन पर उतरती है: सीता सहित राम की अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित होते हैं और जय बोलते हैं। जिन्हें कुछ देर पहले छड़ी लिये रक्षक हाँक रहे थे, वही अब उस दृश्य के दर्शक हैं जिसे आकाश भर के देवता समझ नहीं पाये।
वे देवता, जिनकी परख पहले हो चुकी है
अब भीड़ बदलती है, और कथा उसके बदलने का ढंग बहुत सूखे स्वर में लिखती है।
पहले मातलि जाते हैं, राम की आज्ञा पाकर, चरणों में सिर नवाकर। टीका बताती है कि वे इन्द्र के सारथि हैं और रथ लौटा ले जाते हैं। जो उधार का साधन था, वह चुपचाप लौट जाता है। उसके तुरन्त बाद जो आते हैं, उनके लिये कथा थोड़े में और बड़ा काम करती है: देवता आये, और वे सदा के स्वार्थी हैं। यह उनके मुँह खोलने से पहले लिखा गया है। और फिर एक मानो आता है: वे ऐसे वचन कहते हैं मानो बड़े परमार्थी हों।
उनकी स्तुति का पहला वाक्य ही अपना पता दे देता है। देवता कहते हैं, “आपने देवताओं पर दया की।” पहले उसी उपकार का ज़िक्र आता है जो उन्हीं पर हुआ। फिर वे रावण को गिनाते हैं, विश्व के द्रोह में लगा हुआ, दुष्ट, कामी, कुमार्गगामी। वे एक वाक्य कहते हैं जो पूरी लङ्का-कथा का निचोड़ है: वह अपने ही पाप से गया। इसके बाद वे दर्शन की भाषा में राम को ब्रह्म, अविनाशी, एकरस, अज, अजेय और करुणामय कहते हैं। फिर अवतारों की सूची आती है: मीन, कमठ, वराह, नरहरि, वामन और परशुराम।
सूची के बाद की बात उसका कारण बता देती है: जब-जब देवताओं ने दुःख पाया, तब-तब अनेक शरीर धारण करके आपने उसे नष्ट किया। अवतारों का इतिहास भी उन्हीं के अपने दुःख के हिसाब से लिखा जा रहा है। कथा ने जो एक वाक्य में कहा था, उसे सिद्ध करने के लिये उसे कुछ अलग से नहीं कहना पड़ा। गवाही स्तुति ही दे रही है।
देवताओं की अगली बात दो हिस्सों में बँटी है, और दोनों को जोड़ने वाला शब्द अन्त में आता है। पहला हिस्सा रावण का दोषपत्र दोहराता है: मलिन, देवताओं का नित्य शत्रु, काम, लोभ और मद में रत, अत्यन्त क्रोधी। दूसरा हिस्सा वह है जिसे वे पचा नहीं पा रहे: अधमों के शिरोमणि ने आपका पद पा लिया। और अपनी हालत के लिये उनका शब्द हर्ष नहीं, कृतज्ञता नहीं, विस्मय है। जिस हिसाब से वे दुनिया चलती हुई मानते थे, उसमें सबसे नीचे वाले का सबसे ऊपर पहुँच जाना कहीं नहीं लिखा था।
और तब, बिना किसी के पूछे, वे वह कह देते हैं जिसे कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
देवता कहते हैं, “हम देवता परम अधिकारी होकर भी स्वार्थ में रत रहे और आपकी भक्ति भुला बैठे। हम निरन्तर भव के प्रवाह में पड़े हैं। अब हम आपकी शरण में आये हैं, हमारी रक्षा कीजिये।” जिस विशेषण से कथा ने उन्हें दाख़िल किया था, वही अब उनके अपने मुँह में है। जो अमर कहलाते हैं, वही अपने को बहाव में बताते हैं, और जो मरने वाले हैं, वे नीचे खड़े दर्शन कर रहे हैं।
विनती करके देवता और सिद्ध जहाँ के तहाँ हाथ जोड़े खड़े रह जाते हैं। किसी को कुछ मिला हो, ऐसा कथा नहीं कहती। इतना ही कि वे खड़े रहे, और फिर अत्यन्त प्रेम से पुलकित शरीर होकर ब्रह्मा स्तुति करने लगे।
ब्रह्मा की आँखें नहीं अघातीं
ब्रह्मा की स्तुति लम्बी है, और उसकी चाल देवताओं वाली स्तुति से अलग है। वह राम की जय से शुरू होती है, धनुष-बाण धारण किये, भव रूपी हाथी के लिये सिंह। फिर एक उपमा आती है जिस पर रुकना पड़ता है: रावण को महानाग कहा गया है, और राम को वह गरुड़, जिसने क्रोध करके उसे पकड़ लिया।
और ठीक बाद ब्रह्मा कहते हैं कि वे सदा क्रोधरहित हैं और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आगे-पीछे क्रोध की उपमा और क्रोध का निषेध। यह चूक नहीं। ब्रह्मा ने क्रोध को उपमा के खाते में डाला है, उस व्यक्ति के खाते में नहीं जिसके लिये उपमा दी गयी। गरुड़ साँप को खाता है क्योंकि गरुड़ का स्वभाव यही है। इसमें किसी पर ग़ुस्सा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
आगे कहा जाता है कि अवतार लेने पर भी वे अज, व्यापक, एक और अनादि हैं। फिर ब्रह्मा पूरे युद्ध में से एक ही काम का नाम लेते हैं। दूषण को मारने वाले कहकर ब्रह्मा जो घटना गिनाते हैं, वह रावण का वध नहीं, यह है कि दीन विभीषण को राजा बना दिया गया। वाक्य की ध्वनि में दूषण और विभीषण आमने-सामने बैठे हैं, एक जो मारा गया और एक जो बिठाया गया।
फिर भुजदण्डों का प्रचण्ड प्रताप और दुष्टों के नाश की कुशलता गिनायी जाती है। उसके बाद वह नमस्कार आता है जो इस प्रसंग में पहली बार दो को एक साथ लेता है। ब्रह्मा कहते हैं, “बिना कारण दीनों पर दया करने वाले, मैं सीता सहित आपको नमस्कार करता हूँ।” यह नमस्कार अग्नि के बाद आ रहा है, पहले नहीं। जो वाम भाग में सुशोभित हुईं, उन्हें साथ लिये बिना अब कोई प्रणाम नहीं होता।
इसके आगे ब्रह्मा वह कहते हैं जिसके लिये उन्हें अपनी ही भाषा तोड़नी पड़ती है: वे दोषरहित, अखण्ड हैं, इन्द्रियों के विषय नहीं। सदा सब रूप होते हुए भी वह सब कभी हुए ही नहीं। और फिर एक पहरा: ऐसा वेद कहते हैं, यह दन्तकथा नहीं है। कथा सुनाने वाले ग्रन्थ के भीतर एक पात्र कह रहा है कि यह कहानी नहीं है। उपमा सूरज की है, धूप और सूरज, जो अलग भी हैं और अलग नहीं भी।
ब्रह्मा कहते हैं, “ये सब वानर कृतकृत्य हैं, क्योंकि वे आदर के साथ आपका मुख देख रहे हैं।” शब्द सादर फिर आया है। पहली बार वह तब आया था जब राम ने कहा था कि सीता को आदर के साथ लाइये। अब वह वानरों के देखने के ढंग पर लगा है। दोनों बार वह काम पर नहीं, काम करने के ढंग पर लगा है, और दोनों बार उसी से काम का दर्जा बदल जाता है।
और आगे की बात सृष्टिकर्ता के मुँह से सुनना अजीब लगता है। ब्रह्मा कहते हैं, “हमारे जीवन और देव-शरीर को धिक्कार है, कि हम आपकी भक्ति के बिना संसार में भूले पड़े हैं।” कुछ ही देर पहले देवता अपने को भव-प्रवाह में बता चुके हैं। यहाँ उनके रचयिता उसी पर धिक्कार लगा रहे हैं। और जिनसे तुलना करके यह धिक्कार निकल रहा है, वे वही रीछ-वानर हैं जिन्हें इसी प्रसंग की शुरुआत में छड़ी लिये रक्षक हाँक रहे थे।
आगे जो माँगा जाता है, वह माँगने वाले के पेशे के उलट है। ब्रह्मा प्रार्थना करते हैं, “मेरी उस बुद्धि को हर लीजिये जो भेद करती है।” भेद बनाना ही सृष्टिकर्ता का काम है। उस बुद्धि का लक्षण भी बताया गया है: उससे उलटा कर्म होता है, और जो दुःख है उसी को सुख मानकर आदमी ख़ुश घूमता रहता है। अन्त में वरदान देने वाले वरदान माँगते हैं, और वरदान कोई सिद्धि नहीं, राम के चरणों में सदा कल्याणकारी प्रेम है।
कथा अब स्तुति की बात नहीं कहती। वह आँखों पर जाकर रुकती है: शोभा के समुद्र को देखते-देखते नेत्र तृप्त ही नहीं होते। कथा ब्रह्मा को यहाँ चार मुखों वाले कहती है, और चार मुखों की आँखें भी अघाती नहीं। यहाँ देखने में कोई कमी नहीं, केवल कभी न भरने वाली भूख है।
एक नज़र में दिया हुआ ज्ञान
उसी अवसर पर दशरथ वहाँ आते हैं, और कथा पहले उनकी आँखें दर्ज करती है: पुत्र को देखते ही उनके नेत्रों में जल छा जाता है। फिर छोटे भाई सहित राम उनकी वन्दना करते हैं, और तब पिता आशीर्वाद देते हैं। वन्दना पहले, आशीर्वाद बाद में। जिनकी स्तुति अभी-अभी ब्रह्मा कर चुके हैं, वे झुकने में पहल करते हैं।
राम कहते हैं, “तात, यह सब आपके पुण्यों का प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराज को जीत लिया।” जीत का पूरा श्रेय उसे दे दिया जाता है जो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं। रावण को अजेय कहकर उस दान को और बड़ा कर दिया जाता है। फिर वही चित्र दोबारा आता है जिससे यह हिस्सा शुरू हुआ था: पुत्र के वचन सुनकर प्रीति बहुत बढ़ जाती है। नेत्रों में जल आ जाता है, रोमावली खड़ी हो जाती है।
फिर पहले के प्रेम का अनुमान करके, पिता की ओर देखकर, राम ने उन्हें दृढ़ ज्ञान दे दिया। केवल देखकर। कोई उपदेश नहीं, कोई वाक्य नहीं। कुछ ही देर पहले लक्ष्मण को भी आज्ञा इसी रास्ते से मिली थी, रुख देखकर। दो बार इस प्रसंग में बड़ी चीज़ बिना बोले दी गयी है, और दोनों बार माध्यम आँख है।
आगे शिव पार्वती से कहते हैं, “पार्वती, इसी से उन्होंने मोक्ष नहीं पाया, क्योंकि दशरथ ने अपना मन भेद-भक्ति में लगाया था।” पूरा रामचरितमानस शिव का पार्वती से कहा हुआ है। पार्वती का नाम यहाँ उभरता है, जहाँ बात कठिन है। जो कहा जा रहा है, वह किसी को कहा हुआ है, यूँ ही निकला हुआ नहीं।
कथा यह नहीं कहती कि सगुण के उपासक मोक्ष पा नहीं सकते। वह कहती है कि वे लेते ही नहीं। इनकार उनकी ओर से है, कमी किसी और की नहीं। और बदले में जो मिलता है, उसका नाम है: राम अपनी भक्ति देते हैं। मोक्ष एक हालत है, भक्ति एक रिश्ता है, और सगुण का उपासक दूसरी चीज़ माँगता है, क्योंकि पहली में जिससे प्रेम है वही नहीं बचता।
और इसके बाद दशरथ जो करते हैं, वह इस सिद्धान्त की साफ़ जाँच है। वे बार-बार राम को प्रणाम करके, हर्षित होकर, देवलोक को चले जाते हैं। कथा में कहीं शोक नहीं है। जो चीज़ शास्त्र के हिसाब से बड़ी मानी जाती है, वह उन्हें नहीं मिली, और वे हर्षित होकर जा रहे हैं। कथा इसे हानि की तरह नहीं लिखती।
और तब देवराज ने अपनी बात कही
फिर कथा तीनों को एक साथ बिठाकर दिखाती है: लक्ष्मण और सीता सहित परम कुशल राम। और उस शोभा को देखकर इन्द्र मन में हर्षित होकर स्तुति करने लगते हैं। यह इस प्रसंग की तीसरी स्तुति है, और तीनों की शुरुआत एक ही क्रिया से हुई है, देखने से।
इन्द्र की स्तुति छोटी चाल की है। शुरू में वह वही करती है जो स्तुतियाँ करती हैं: धनुष-बाण धारण किये राम की जय। खर और दूषण के शत्रु, राक्षसों की सेना का मर्दन करने वाले। आपने इस दुष्ट को मारा, जिससे सब देवता सनाथ हो गये। पृथ्वी का भार हरने वाले, रावण के शत्रु, जिन्होंने राक्षसों को बेहाल कर दिया।
फिर स्तुति फिसलकर आत्मकथा बन जाती है। रावण को अपने बल का बहुत घमंड था। उसने देवताओं और गन्धर्वों को अपने वश में कर लिया था, और मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग, सबके पीछे हठ करके पड़ गया था। जिन्हें उसने वश में किया, उनकी सूची जिस नाम से शुरू होती है, उसी नाम वाले यह सूची पढ़ रहे हैं। इन्द्र अपनी ही हार गिनाकर शिकायत कर रहे हैं। फिर: दूसरों से द्रोह में लगा हुआ, अत्यन्त दुष्ट, उस पापी ने वैसा ही फल पाया। और उसके बाद एक विनती: “अब सुनिये।”
इस क्षण को ईमानदार उसकी जगह बनाती है। अभी-अभी इन्द्र ने रावण का दोष गिनाया था, बल का गर्व। और अब इन्द्र कहते हैं, “मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है।” जो वाक्य वे अपने बारे में कह रहे हैं, वह ठीक उसी क़िस्म का है जिसके लिये रावण मारा गया। आरोप और इक़बाल थोड़े ही फ़ासले पर हैं, और बीच में कुछ नहीं कहा गया।
उस अभिमान का इलाज भी वहीं है। कोई तर्क नहीं हारा, कोई हार नहीं हुई, कोई शाप नहीं लगा। इन्द्र कहते हैं, “अब आपके चरण देखकर वह अभिमान जाता रहा, जो दुःखों के ढेर का देने वाला था।” देखने की क्रिया अब तक हर्ष, दर्शन, आज्ञा और ज्ञान देती रही थी। यहाँ वह कुछ छीन लेती है, और जो छीना जाता है, उसे खोकर ही आदमी बचता है।
कुछ ही देर पहले शिव कह चुके हैं कि सगुण के उपासक मोक्ष लेते नहीं, उन्हें अपनी भक्ति दी जाती है। इन्द्र ने वह नहीं सुना, फिर भी वे ठीक वही चुनते हैं। इन्द्र कहते हैं, “कोई निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करे, जिसे श्रुति अव्यक्त कहती है। मुझे तो कोसल के राजा राम का यह सगुण स्वरूप ही भाता है।” सिद्धान्त पहले कहा गया, और उसका उदाहरण बाद में अपने आप आकर खड़ा हो गया।
और जो वे माँगते हैं, वह उसी सिद्धान्त का दूसरा छोर है: “सीता और छोटे भाई सहित मेरे हृदय में अपना घर बनाइये, मुझे अपना दास जानिये, और भक्ति दीजिये।” तीनों को एक साथ माँगा गया है, जैसे अभी तीनों एक साथ बैठे दिखाये गये थे। अन्तिम शब्द भक्ति है, ठीक वही चीज़ जो सगुण के उपासकों के लिये रखी गयी थी।
फिर इन्द्र “भक्ति दीजिये” कहकर राम को नमस्कार करते हैं, और इस ऊँची स्तुति में एक शब्द सब नीचे ले आता है: मनुष्य-शरीरधारी। तीन स्तुतियाँ अविनाशी, अज, अव्यक्त और निर्गुण कहते-कहते अन्त में जिस शरीर का नाम लेती हैं, वह मनुष्य का है।
और यहाँ दिशा उलट जाती है। अब तक सब उन्हें देखते रहे हैं: सीता ने आरम्भ में ही इन्हीं आँखों से देखने का उपाय माँगा था, वानरों ने रोके जाकर भी देखा। देवताओं ने आकाश से देखा, ब्रह्मा की आँखें अघायीं नहीं, इन्द्र का अभिमान देखकर गया। अब अन्त में इन्द्र कहते हैं, “अब कृपा करके मेरी ओर देखिये, और आज्ञा दीजिये, मैं क्या करूँ?” जो माँगा जाता है, वह वरदान नहीं, आज्ञा है।
कथा इस प्रश्न का उत्तर नहीं देती। इतना ही कहती है कि ये प्रिय वचन सुनकर राम बोले, और वहीं रुक जाती है। जो कहा गया, वह अगले प्रसंग में है। जो प्रसंग एक स्त्री की देखने की माँग से खुला था, वह एक देवता की देखे जाने की माँग पर, और एक अधूरे वाक्य पर बन्द होता है।
देखना, और जान लेना
कथा ने कहाँ शब्द ख़र्च नहीं किये, यह पहले खटकता है: कठोर वचन एक भी उद्धृत नहीं, राक्षसियों का हृदय-परिवर्तन एक विशेषण में, अग्नि में प्रवेश दो वाक्यों में। और फिर तीन स्तुतियाँ आधे से ज़्यादा प्रसंग घेर लेती हैं। जहाँ घटना है, वहाँ कथा जल्दी में है। जहाँ घटना नहीं, वहाँ ठहर जाती है।
तीनों स्तुतियों में स्तुति करने वाला अन्त तक आते-आते अपने बारे में एक ऐसी बात मान लेता है जो उसके पद के ख़िलाफ़ जाती है। देवता कहते हैं कि वे भवसागर में पड़े हैं। ब्रह्मा भेद करने वाली बुद्धि के हर लिये जाने की प्रार्थना करते हैं और अपने देव-शरीर को धिक्कारते हैं। इन्द्र कहते हैं कि उन्हें अभिमान था। किसी से यह क़बूल कराया नहीं गया। तीनों देख चुकने के बाद अपने आप कहते हैं।
कथा बार-बार आँख पर लौटती है, और हर बार एक ही सबक़ नहीं देती। कभी देखना रोका जाता है और राम उसे खोल देते हैं। कभी वह आज्ञा बनता है, लक्ष्मण के लिये। कभी ज्ञान, दशरथ के लिये। कभी न भरने वाली भूख, ब्रह्मा के लिये। कभी घमंड ले जाता है, इन्द्र का। और आकाश में खड़े उन सबके लिये वह कुछ नहीं देता, जिन्होंने सब देखा और कुछ नहीं जाना।
जिनके बारे में यह पूरा प्रसंग है, वे इसमें कुल तीन बार बोलती हैं: दर्शन का उपाय माँगती हैं, लक्ष्मण को धर्म का नेगी बनाकर आग माँगती हैं। और अग्नि से कहती हैं कि वे उनके लिये चन्दन हो जायँ। तीनों बार जो माँगा गया, वह अपने लिये कोई रियायत नहीं। इसके बाद उनका एक भी वचन नहीं है। जो बोलते हैं, वे देवता, ब्रह्मा, दशरथ और इन्द्र हैं, और वे सब अपने बारे में बोलते हैं।
और इसीलिये प्रसंग का बड़ा वाक्य वही रह जाता है जो पहले ही, किसी पात्र के मुँह में डाले बिना, कह दिया गया था। सीता पहले ही अग्नि में रखी जा चुकी थीं। और भीतर का साक्षी उन्हें प्रकट करना चाहता है। सुनने वाले को यह भेद घटना से पहले मिल जाता है। आकाश भर के देवताओं, सिद्धों और मुनियों को, जो वहाँ मौजूद थे, बाद में भी नहीं मिला।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 108 से 113, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।