Lulla Family

कुम्भकर्ण-वध

रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · कुम्भकर्ण-वध

कुम्भकर्ण-वध

जागे हुए भाई का युद्ध और उसका अन्त, और उस अन्त में एक ऐसी बात जो लङ्काकाण्ड में बहुत कम लोगों के हिस्से आती है।

पिछला प्रसंग एक अँकवार पर ख़त्म हुआ था। कुम्भकर्ण नींद से उठाया जा चुका था, भैंसे और मदिरा उसके आगे रखी जा चुकी थी, और उसने अपने बड़े भाई से वह बात कह दी थी जो उस घर में कोई और नहीं कहता था: कि विरोध किससे मोल लिया गया है, कि नारद से सुना हुआ ज्ञान अब कहने का समय निकल चुका है, और कि अब केवल एक बार गले मिल लेना बाक़ी है। रावण ने वह सब सुना और उसका कुछ नहीं किया। यह पन्ना उसके ठीक एक क़दम आगे से शुरू होता है।

दोहा पैंसठ से इकहत्तर तक तुलसी वही लिखते हैं जो उस बात के बाद बचता है। यानी लड़ाई। और लड़ाई के ब्योरे में वे कहीं कंजूसी नहीं करते: पहाड़ उखड़ते हैं, करोड़ों की गिनती में वानर उठाये और मसले जाते हैं, बिना सिर के धड़ दौड़ते हुए ललकारते हैं। पर इस सारे शोर के बीच तुलसी तीन बार रुकते हैं और कथा से बाहर बैठे हुए एक श्रोता की ओर मुड़ जाते हैं। पहली बार उमा की ओर, दूसरी बार भवानी की ओर, और तीसरी बार, आख़िरी दोहे में, गिरिजा की ओर। वे तीनों मोड़ ही इस पन्ने का असली ढाँचा हैं, और उन्हें पढ़े बिना यहाँ का ख़ून सिर्फ़ ख़ून रह जाता है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और दोनों जगह यह प्रसंग एक जैसा नहीं चलता। गरुड़ और साँपों वाला वह दृष्टान्त जो शिव उमा से कहते हैं, कीर्ति का वह वचन कि इसे गा-गाकर लोग भवसागर पार कर जायँगे, और अन्त में मारे गये राक्षस को निज धाम मिल जाना, ये तुलसी के अपने हैं। इस पन्ने पर जो नाम है, जो गिनती है और जो क्रम है, वह सब इसी अवधी पाठ से और इसी की टीका से लिया गया है, और कहीं से नहीं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • कुम्भकर्ण रावण का भाई, जो इस पन्ने की पहली पंक्ति से आख़िरी पंक्ति तक लड़ता है और अन्त में वह पाता है जो इस काण्ड में बहुत कम लोगों के हिस्से आता है।
  • विभीषण जो भाई की बात सुनकर लौटते हैं और राम को केवल इतना बताते हैं कि क्या आ रहा है, कैसा है, और कितना बड़ा है।
  • हनुमान जो इस युद्ध का पहला घूँसा मारते हैं और पहला घूँसा खाते भी हैं, और होश आते ही पहला काम अपने राजा को ढूँढ़ने का करते हैं।
  • सुग्रीव वानरराज, जिन्हें काँख में दबाकर ले जाया जाता है और जो मुर्दा बनकर निकलते हैं, फिर दाँतों से हिसाब चुकाते हैं।
  • राम जो आधे पन्ने तक धनुष नहीं उठाते, और जब उठाते हैं तो पहले अपनी सेना को अपने पीछे कर लेते हैं।
  • शिव और उमा कथा के भीतर बैठे हुए वक्ता और श्रोता, जिनकी ओर तुलसी इस पन्ने पर तीन बार मुड़ते हैं और हर बार लड़ाई का अर्थ बदल देते हैं।
  • नारद जो वध के बाद आकाश से आते हैं, एक गान गाते हैं, एक वाक्य कहते हैं और चले जाते हैं।

जो ख़बर विभीषण लेकर आये

विभीषण अपने भाई से मिलकर लौट रहे हैं। जिस आदमी से वे अभी गले मिले हैं, वही थोड़ी देर में उस सेना पर टूटेगा जिसमें वे खड़े हैं, और दोनों बातें उन्हें एक साथ मालूम हैं। तुलसी इस घड़ी पर एक शब्द भी ख़र्च नहीं करते। वे बस चलना और पहुँचना लिखते हैं, और जिसके पास पहुँचते हैं उसे नाम से नहीं, एक विशेषण से पुकारते हैं, जो इस पूरे पन्ने का सबसे शान्त वाक्यांश है।

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥

चौपाई १

त्रैलोक बिभूषन। तीनों लोकों का गहना। जिस समय लङ्का के परकोटे के भीतर से एक पहाड़ चलकर आ रहा है, तुलसी शिविर में बैठे हुए आदमी को इस नाम से बुलाते हैं। यह सजावट नहीं है, यह पैमाना है। आगे जो कुछ आयेगा उसे इसी पैमाने पर रखकर तौला जाना है।

पहुँचकर विभीषण जो कहते हैं वह बहुत छोटा है। हे नाथ, पर्वत के आकार का शरीर लिये हुए, रण में अडिग रहने वाला कुम्भकर्ण आ रहा है। बस इतना। न भाई की बातों का ब्योरा, न उस अँकवार का ज़िक्र, न कोई सलाह। वे वही बताते हैं जो एक सेनापति को चाहिये: क्या आ रहा है और किस बनावट का है। जिस आदमी ने अभी-अभी अपने घर से आख़िरी नाता तोड़ा है, उसकी आवाज़ में तुलसी कोई काँप नहीं भरते।

और इतना सुनते ही वानरों के कान खड़े हो जाते हैं। वे किलकिलाकर दौड़ते हैं, जो हर्ष की ध्वनि है, डर की नहीं। पेड़ और पहाड़ उखाड़कर उठा लेते हैं और दाँत कटकटाते हुए उसके ऊपर डालने लगते हैं। ध्यान दीजिये कि तुलसी ने अभी तक कुम्भकर्ण को कुछ करते नहीं दिखाया। सारी हरकत इस ओर से है। वह केवल चला आ रहा है, और उसी पर यह सब गिर रहा है।

फिर वह पंक्ति आती है जो इस लड़ाई का पूरा हिसाब एक ही चित्र में दे देती है। रीछ और वानर एक-एक बार में करोड़ों पहाड़ों की चोटियों से उस पर प्रहार करते हैं। इससे न उसका मन मुड़ा, और न शरीर टाले टला। जैसे अर्क यानी मदार के फलों की मार से हाथी पर कुछ असर नहीं होता। मदार का फल हल्का होता है, भीतर से पोला, और हाथी की खाल तक उसके गिरने की ख़बर नहीं पहुँचती। करोड़ों पहाड़ इस पन्ने पर उतने ही भारी हैं।

सार: विभीषण भाई से मिलकर राम के पास लौटते हैं और केवल इतना कहते हैं कि पर्वत जैसे शरीर वाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है। वानर सेना पेड़ और पहाड़ लेकर उस पर टूट पड़ती है और करोड़ों शिखरों की मार से उसका न मन हिलता है न देह।

एक घूँसा, और एक काँख

जब पहाड़ बेकार जाते हैं तब हनुमान आगे आते हैं, और वे पहाड़ नहीं उठाते। वे मुट्ठी बाँधते हैं। पूरे पन्ने पर यह पहली चोट है जो कुम्भकर्ण को लगती है, और तुलसी उसका असर छिपाते नहीं।

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। पर्यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥

चौपाई २

वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और व्याकुल होकर सिर पीटने लगा। यह छवि इस काण्ड में बिरली है। अब तक जो कुछ उस पर पड़ा था उसने उसे छुआ भी नहीं था, और एक घूँसे ने उसे ज़मीन पर बैठा दिया। पर तुलसी यहाँ ठहरते नहीं। उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में वह उठता है और जवाब देता है, और हनुमान चक्कर खाकर तुरन्त भूमि पर गिर जाते हैं। दोनों वाक्य एक ही साँस में हैं, और उन्हें एक ही साँस में पढ़ा जाना है।

इसके बाद का हिसाब बहुत तेज़ी से चुकता है। नल और नील पृथ्वी पर पछाड़ दिये जाते हैं। बाक़ी योद्धा जहाँ-तहाँ पटक-पटककर डाल दिये जाते हैं। और फिर वह वाक्य आता है जिसकी इस सेना से कोई उम्मीद नहीं थी: वानरसेना भाग चली, सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता। जिस सेना ने कुछ प्रसंग पहले लङ्का के परकोटे पर चढ़ाई की थी, वह यहाँ कुछ ही पंक्तियों में पीठ दिखा देती है।

और तब दोहा आता है, जो इस प्रसंग का पहला दोहा है और जिसमें कुम्भकर्ण किसी को मारता नहीं, उठा ले जाता है।

अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।
काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥ ६५॥

दोहा ६५

अंगद आदि वानरों को, सुग्रीव समेत, मूर्च्छित करके वह वानरराज को काँख में दबाकर चल दिया। काँख में। हाथ में नहीं, कंधे पर नहीं, काँख में, जैसे कोई गठरी लेकर बाज़ार से लौट रहा हो। लङ्काकाण्ड में सुग्रीव का इससे छोटा चित्र और कोई नहीं है, और तुलसी इसे बिना किसी टिप्पणी के छोड़ देते हैं।

दोहे की आख़िरी चार मात्राएँ उस आदमी का नाप हैं जो यह कर रहा है: अमित बल सींव। अपरिमित बल की सीमा। जहाँ ताक़त की गिनती ख़त्म होती है, वहाँ जो निशान लगा है, वह यह है। तुलसी उसे यह ख़िताब उस क्षण देते हैं जब वह मैदान से एक राजा को उठाकर ले जा रहा है और कोई उसके पीछे नहीं आता।

सार: हनुमान के घूँसे से कुम्भकर्ण गिरता है, फिर उठकर हनुमान को गिरा देता है। नल, नील और बाक़ी योद्धा पछाड़ दिये जाते हैं, वानरसेना भाग खड़ी होती है, और वह अंगद आदि को मूर्च्छित करके सुग्रीव को काँख में दबाये हुए लौटने लगता है।

उमा, यह लड़ाई नहीं है

अब तुलसी लड़ाई रोक देते हैं। बीच मैदान में, जब वानरराज किसी की काँख में दबा हुआ है और सेना भागी हुई है, कथा का कैमरा पीछे हट जाता है और हमें याद दिलाया जाता है कि यह सब किसी को सुनाया जा रहा है, और सुनाने वाले शिव हैं।

उमा करत रघुपति नरलीला। खेल गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥
भृकुटि भंग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥

चौपाई ३

हे उमा, श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ साँपों के समूह में मिलकर खेलता हो। दृष्टान्त का मज़ा उसकी बारीकी में है। गरुड़ साँपों से लड़ता नहीं, खेलता है, और खेलने के लिये उसे साँपों के बीच उतरना पड़ता है, उनके ही स्तर पर, उनकी ही ज़मीन पर। बाहर से देखने वाले को लगेगा कि मुक़ाबला चल रहा है। भीतर से बात इतनी ही है कि जिसका भोजन साँप हैं, वह उनके बीच घूम रहा है।

और फिर वह सवाल, जो सवाल के रूप में इसलिये पूछा गया है कि उसका उत्तर देने की ज़रूरत न रहे। जो भौंह के इशारे-भर से काल को खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है। भृकुटि भंग। भौंह का एक टेढ़ा होना। इतने में काल निगला जा चुका। उसके बाद पहाड़, बाण, करोड़ों वानर, कटती हुई भुजाएँ, ये सब उस आदमी के लिये क्या हैं जिसने काल को भौंह से खाया है।

पर शिव इस बात को यहीं नहीं छोड़ते। अगली ही पंक्ति में वे बताते हैं कि यह लीला हो क्यों रही है। भगवान इसके द्वारा जगत को पवित्र करने वाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागर से तर जायँगे। यह एक असाधारण बात है। इस पन्ने पर जो कुछ हो रहा है, वह इसलिये हो रहा है कि उसे बाद में गाया जा सके, और गाने वाले उसी गाने से पार उतर जायँ। युद्ध का प्रयोजन विजय नहीं, गीत है।

इसी वजह से इस पन्ने को पढ़ते हुए हिसाब-किताब ढूँढ़ना बेकार है। कौन किसको कहाँ लगा, किसने कितने मारे, किसका पलड़ा कब भारी था। तुलसी वह बही नहीं लिख रहे। वे एक ऐसी चीज़ गढ़ रहे हैं जो गाये जाने पर काम करती है, और उसके लिये उन्हें कुछ चित्र चाहिये, हिसाब नहीं।

सार: बीच युद्ध में शिव उमा से कहते हैं कि राम नरलीला कर रहे हैं, जैसे गरुड़ साँपों के बीच खेलता हो, और जो भौंह के इशारे से काल को खा जाता है उसे यह लड़ाई क्या शोभा देगी। यह सब इसलिये हो रहा है कि इससे ऐसी कीर्ति फैले जिसे गाकर लोग भवसागर पार कर जायँ।

सुग्रीव के दाँत

मूर्च्छा टूटती है और हनुमान जागते हैं। जागकर वे न शत्रु को ढूँढ़ते हैं न अपने साथियों को। वे सुग्रीव को खोजने लगते हैं। यह छोटा-सा ब्योरा तुलसी की आदत बताता है: इस कथा में सेवक का पहला विचार हमेशा किसी और के बारे में होता है।

उधर काँख में दबे हुए सुग्रीव की मूर्च्छा भी उतर चुकी है, और उन्हें अपनी हालत समझने में देर नहीं लगती। उनके पास न हथियार है, न ज़मीन, न कोई साथ। जो एक चीज़ बची है वह यह है कि ले जाने वाले को मालूम नहीं कि वे होश में आ चुके हैं। सुग्रीव उसी एक चीज़ का इस्तेमाल करते हैं।

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥

चौपाई ४

वे नीचे खिसक गये, और कुम्भकर्ण ने उन्हें मरा हुआ समझा। फिर उन्होंने दाँतों से उसके नाक और कान काट लिये। दाँतों से। इस पूरे पन्ने पर इससे नज़दीक की चोट और कोई नहीं है, और यह उस आदमी ने की है जिसके हाथ में कुछ नहीं था। उसके बाद वे गरजकर आकाश की ओर चले, और गरजने से ही कुम्भकर्ण को पता चला कि हुआ क्या है। चुपचाप निकल जाना उनके बस में था। वे निकले, फिर भी गरजे।

उस गरज की क़ीमत भी तुरन्त चुकती है। उसने सुग्रीव का पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर पछाड़ दिया। पर सुग्रीव बड़ी फुर्ती से उठे और उसे फिर मारा, और तब वे प्रभु के पास आये, जय-जयकार करते हुए। जो आदमी थोड़ी देर पहले गठरी की तरह उठा लिया गया था, वह अपने पैरों पर लौटता है और लौटते ही अपनी जय नहीं बोलता, किसी और की बोलता है।

और कुम्भकर्ण पर इसका असर तुलसी एक ही शब्द में लिखते हैं, और वह शब्द दर्द का नहीं है। नाक-कान कटे, यह मन में जानकर उसे बड़ी ग्लानि हुई, और वह क्रोध करके लौटा। ग्लानि। चोट ने उसे दुखाया नहीं, शर्मिन्दा किया। एक तो वह स्वभाव से ही भयंकर था, और अब बिना नाक-कान के और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरों की सेना में त्रास उपजा।

जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥ ६६॥

दोहा ६६

और यह देखिये कि डरी हुई सेना करती क्या है। वह जय-जयकार करती है और हूह की आवाज़ के साथ दौड़ पड़ती है, और सब एक ही साथ, एक ही बार में, उस पर पहाड़ों और पेड़ों के समूह छोड़ती है। एक ही बार में, क्योंकि दूसरी बार का भरोसा किसी को नहीं है।

सार: सुग्रीव मुर्दा बनकर काँख से खिसक जाते हैं, दाँतों से कुम्भकर्ण के नाक-कान काटते हैं और गरजकर निकल भागते हैं। पकड़े जाकर पछाड़े जाते हैं, फिर उठकर मारते हैं और राम के पास लौट आते हैं। कुम्भकर्ण को चोट से नहीं, ग्लानि से क्रोध आता है और वह लौट पड़ता है।

टिड्डियाँ और एक गुफा

इसके बाद का हिस्सा इस काण्ड के सबसे कठिन हिस्सों में है, और उसे नरम करके पढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। रण के उत्साह में भरकर वह सामने ऐसे चला मानो क्रुद्ध होकर काल ही आ रहा हो। और फिर तुलसी वह उपमा देते हैं जिसके बाद यह लड़ाई लड़ाई नहीं रह जाती।

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥

चौपाई ५

करोड़-करोड़ वानरों को पकड़-पकड़कर वह खाने लगा, मानो पर्वत की गुफा में टिड्डियाँ समा रही हों। टिड्डी का दल आकाश ढक लेता है और फिर भी किसी गुफा को भर नहीं पाता। उपमा में जो बात है वह मात्रा की नहीं, अनुपात की है। जो सेना सामने से देखने पर अनगिनत है, वह उस मुँह के सामने उतनी ही है जितनी एक पहाड़ की गुफा के सामने टिड्डियाँ।

अगली चौपाई और भी ठंडे स्वर में गिनती करती है। करोड़ों को पकड़कर उसने अपने शरीर से मसल डाला, करोड़ों को हाथों से मलकर पृथ्वी की धूल में मिला दिया। और फिर एक ब्योरा, जिसे तुलसी बिना किसी ज़ोर के रख देते हैं: पेट में गये हुए रीछ और वानरों के ठट्ट उसके मुख, नाक और कानों की राह से निकल-निकलकर भाग रहे हैं। जिन रास्तों से वे निकल रहे हैं, उनमें से दो सुग्रीव ने अभी-अभी बनाये हैं, और यह बात कहीं कही नहीं जाती, बस एक चौपाई के फ़ासले पर रख दी जाती है।

फिर वह पंक्ति जो उसके भीतर का हाल बताती है। रण के मद में मत्त वह राक्षस इस तरह गर्वित हुआ मानो विधाता ने उसे सारा विश्व निगलने के लिये सौंप दिया हो। यह भूख का चित्र नहीं है, हक़ का चित्र है। उसे लग रहा है कि जो सामने है वह उसे दिया गया है।

रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा॥
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे । सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥

चौपाई ६

और अब घबराहट का वह वर्णन, जो शायद पूरे काण्ड में सबसे सही है। योद्धा मुड़ गये, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखों से उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारने पर सुनते नहीं। तुलसी यह नहीं कहते कि वे कायर हो गये। वे कहते हैं कि उनकी आँख और कान काम करना बन्द कर चुके हैं। डर यहाँ कोई भाव नहीं है, इन्द्रियों का बैठ जाना है।

कुम्भकर्ण ने वानरसेना को तितर-बितर कर दिया, और यह सुनकर राक्षसों की सेना भी दौड़ पड़ी। अब तक वह अकेला लड़ रहा था, किला छोड़कर बिना सेना के निकला था। जीत की ख़बर सुनते ही पीछे से बाक़ी लङ्का भी आ जुड़ती है। राम ने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रु की नाना प्रकार की सेना आ पहुँची है।

सार: कुम्भकर्ण काल की तरह बढ़ता है, करोड़ों वानरों को खाता, मसलता और धूल में मिलाता है, और भीतर गये हुए जीव उसके मुख, नाक और कानों से निकलकर भागते हैं। सेना की आँख और कान काम करना छोड़ देते हैं, राक्षसी सेना भी आ जुड़ती है, और राम यह सब देख लेते हैं।

राम का धनुष उठता है

यहाँ राम पहली बार बोलते हैं, और उनका पहला वाक्य आदेश नहीं, बँटवारा है।

सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥ ६७॥

दोहा ६७

सेना तीन लोगों के हवाले की जाती है: सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण। और अपने लिये राम जो काम रखते हैं उसे वे मारने का काम नहीं कहते। मैं इस दुष्ट के बल और सेना को देखता हूँ। देखता हूँ। जिस आदमी के बारे में शिव अभी उमा से कह चुके हैं कि वह भौंह से काल को खा जाता है, वह मैदान में उतरते हुए इतना ही कहता है कि ज़रा देखूँ। और जो नाम तुलसी उसी साँस में उनके लिये चुनते हैं वह राजिवनैन है, कमल जैसी आँखों वाला। युद्ध में उतरते हुए आदमी की आँखें कमल कही जा रही हैं।

फिर तैयारी का एक चित्र, जिसमें हर चीज़ अपनी जगह पर है। हाथ में शार्ङ्ग धनुष, कमर में तरकस, और शत्रुसेना को दलने के लिये चलना। और पहला काम जो वे करते हैं वह बाण चलाना नहीं है। पहले उन्होंने धनुष का टंकोर किया, केवल प्रत्यंचा खींचकर छोड़ी, और उसी आवाज़ को सुनकर शत्रुदल बहरा हो गया। जिस सेना के कान अभी-अभी काम करना छोड़ चुके थे, अब दूसरी ओर के कान जाते हैं।

सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा । कालसर्प जनु चले सपच्छा॥
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥

चौपाई ७

सत्यसंध ने एक लाख बाण छोड़े, और वे ऐसे चले मानो पंखों वाले कालसर्प चले हों। साँप पहले से ही तेज़ है और अपने पेट के बल चलता है। उसे पंख लगा दीजिये, और फिर उस साँप को काल का साँप कह दीजिये। तीन चीज़ें एक के ऊपर एक चढ़ा दी गयी हैं, और यह सब एक बाण का वर्णन है, जिसमें से एक लाख एक साथ छूटे हैं।

उसके बाद का ब्योरा कटता हुआ और साफ़ है। चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं, बहुत से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं, घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं। और फिर वह पंक्ति जो इस सेना का सम्मान बचा लेती है: अच्छे योद्धा फिर सँभलकर उठते हैं और लड़ते हैं। तुलसी राक्षसों को कायर नहीं बनाते। बाण लगते ही वे मेघ की तरह गरजते हैं, और बिना सिर के प्रचण्ड धड़ दौड़ते हुए पकड़ो और मारो की ध्वनि करते हैं।

छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।

दोहा ६८ की पहली पंक्ति

और उसी दोहे की दूसरी पंक्ति वह काम करती है जो इस पूरे युद्ध-वर्णन में और कहीं नहीं होता। क्षण-भर में भयानक राक्षस काट दिये गये, और फिर वे सब बाण लौटकर रघुवीर के तरकस में घुस गये। बाण गिनती में छोड़े गये थे, एक लाख, और सब के सब वापस आ जाते हैं। मैदान में कुछ छूटा नहीं रहता। जिसने देखा उसने सेना मिटती देखी, और जो हथियार से मिटी उसका हथियार अपनी जगह लौट गया।

सार: राम सेना को सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण के हवाले करके स्वयं आगे बढ़ते हैं। धनुष के टंकोर से शत्रुसेना बहरी हो जाती है, एक लाख बाण पंखवाले कालसर्पों की तरह चलते हैं, क्षण-भर में राक्षसी सेना कट जाती है, और सारे बाण लौटकर तरकस में समा जाते हैं।

जो कटता है और गिरता नहीं

कुम्भकर्ण ने मन में विचार कर यह देखा कि क्षण-भर में राक्षसी सेना का संहार हो चुका है। ध्यान दीजिये कि तुलसी उसे सोचते हुए दिखाते हैं। इस पन्ने पर वह अब तक केवल करता रहा था। पहली बार वह रुकता है, गिनता है, और तब क्रोध करता है, और उसका क्रोध सिंहनाद बनकर निकलता है।

फिर वही तरीक़ा जो उसे आता है। वह क्रोध में पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं वहीं डाल देता है। इस ब्योरे को छोड़ देना नहीं चाहिये: वह पहाड़ ऐसे ही नहीं फेंक रहा, वह देखकर फेंक रहा है, जहाँ भीड़ सबसे घनी है। और आते हुए बड़े-बड़े पर्वतों को प्रभु बाणों से काटकर धूल के समान कर डालते हैं। जिस चीज़ से करोड़ों मारे जा रहे थे, वह हवा में ही चूर्ण हो जाती है।

अब राम उस पर बाण चलाते हैं, और यहाँ तुलसी एक ऐसी उपमा रखते हैं जो घाव को घाव की तरह नहीं दिखाती। बाण उसके शरीर में घुसकर पार निकल जाते हैं, जैसे बिजलियाँ बादल में समा जाती हैं। बिजली बादल को चीरती नहीं, उसमें समा जाती है, और बादल ज्यों का त्यों रहता है। शरीर इतना बड़ा है कि उसमें से निकलता हुआ बाण भी उसे घटाता नहीं।

फिर रंग आता है। उसके काले शरीर से रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है मानो काजल के पर्वत से गेरू के पनाले बह रहे हों। काजल का पहाड़, और उस पर लाल मिट्टी की धारें। तुलसी इसे शोभा कहते हैं, और यह कहने में कोई हिचक नहीं दिखाते। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़ पड़े, और ज्यों ही वे निकट आये, वह हँसा।

महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥ ६९॥

दोहा ६९

वह हँसी क्या थी, यह दोहा बता देता है। बड़ा घोर शब्द करके वह गरजा, करोड़-करोड़ वानरों को पकड़कर गजराज की तरह पृथ्वी पर पटकने लगा, और साथ-साथ रावण की दुहाई देता रहा। दससीस की सपथ। जो आदमी थोड़ी देर पहले उसी रावण से कह रहा था कि उसने बुरा किया, कि वह काल के वश हो चुका है, वह अब उसी का नाम लेकर लड़ रहा है और उसी के नाम पर मार रहा है। तुलसी इन दोनों बातों को जोड़ते नहीं, बस दोनों लिखते हैं।

और इसी में इस चरित्र की पूरी बात है। उसने भाई से सच कह दिया था, बिना इस उम्मीद के कि सुना जायेगा। उसे मालूम था कि यह पक्ष ग़लत है, किसने किससे बैर लिया है और उसका अन्त क्या होगा। जानने के बाद वह उसी पक्ष के लिये निकला और उसी का नाम लेकर मरा। इस पन्ने पर कहीं भी वह अपनी उस बात से पलटता नहीं, और कहीं भी उस पलटे बिना लड़ना छोड़ता भी नहीं।

सार: कुम्भकर्ण राक्षसी सेना का नाश देखकर सिंहनाद करता है और पर्वत फेंकता है, जो बाणों से चूर हो जाते हैं। राम के बाण उसके शरीर में बिजली की तरह समाते हैं, काले शरीर पर रक्त गेरू की धार-सा बहता है, और वह करोड़ों वानरों को पटकता हुआ रावण की दुहाई देता है।

दुकाल

इसके बाद सेना का धीरज पूरी तरह टूट जाता है, और तुलसी उसे एक ऐसी उपमा से लिखते हैं जिसमें कोई वीरता नहीं है। रीछ-वानरों के झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़िये को देखकर भेड़ों के झुंड। और यहाँ, दूसरी बार, कथा बाहर निकलती है और शिव भवानी को सम्बोधित करते हैं। वे यह नहीं कहते कि सेना भागी। वे कहते हैं कि वे व्याकुल होकर आर्त वाणी से पुकारते हुए भागे। भागते हुए भी उनके मुँह में कुछ था।

यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अब चहई॥
कृपा बारिधर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥

चौपाई ८

यह राक्षस दुकाल के समान है, जो अब वानरकुल रूपी देश पर पड़ना चाहता है। दुकाल यानी दुर्भिक्ष, अकाल। यह शब्द चुनने में तुलसी ने लड़ाई का व्याकरण ही बदल दिया। अकाल से कोई लड़ता नहीं, अकाल झेला जाता है, और वह सैनिकों को नहीं, पूरे देश को खाता है। इसीलिये अगली साँस में वे अपने को सेना नहीं, कुल कहते हैं, और अपनी जगह को देश।

और इसीलिये उनकी पुकार में कोई रणनीति नहीं है। हे कृपा रूपी जल धारण करने वाले मेघ राम, हे खर के शत्रु, हे शरणागत का दुख हरने वाले, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। पाहि पाहि। जिनके पास अकाल के लिये एक ही जवाब होता है, वे बादल को पुकारते हैं, और यहाँ बादल का नाम कृपा बारिधर है। अकाल के सामने खड़े लोगों ने मेघ को बुलाया है, और वही उपमा उनकी प्रार्थना का पूरा तर्क है।

करुणा भरे वचन सुनते ही भगवान धनुष-बाण सुधारकर चले। और अब वह ब्योरा, जो इस पन्ने पर राम के बारे में सबसे बहुत कुछ कहता है: महाबलशाली राम ने सेना को अपने पीछे कर लिया और अकेले क्रोधपूर्वक आगे बढ़े। सेना आगे नहीं, पीछे। जिन्होंने अभी पुकारा था, उन्हें पहले हटाया जाता है, फिर लड़ाई होती है।

फिर धनुष खींचकर उन्होंने सौ बाण एक साथ सन्धान किये। बाण छूटे और उसके शरीर में समा गये। और बाणों के लगते ही वह क्रोध से भरकर दौड़ा, और उसके दौड़ने से पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी। इतने बाण भीतर लिये हुए वह रुकता नहीं, उलटा दौड़ता है, और उसकी दौड़ से ज़मीन काँपती है।

सार: वानर भेड़ों की तरह भागते हैं और भागते हुए पुकारते हैं कि यह राक्षस अकाल की तरह उनके देश पर पड़ने वाला है, और कृपा के मेघ राम से रक्षा माँगते हैं। राम सेना को अपने पीछे करके अकेले आगे बढ़ते हैं, सौ बाण एक साथ छोड़ते हैं, और वह बाण खाकर और तेज़ दौड़ता है।

दो भुजाएँ, एक सिर, दो टुकड़े

अन्त अब बहुत तेज़ी से आता है, और तुलसी उसे एक-एक अंग करके लिखते हैं, जैसे कोई गिनती पूरी कर रहा हो।

लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी । रघुकुलतिलक भुजा सोइ काटी॥
धावा बाम बाहु गिरि धारी । प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥

चौपाई ९

उसने एक पर्वत उखाड़ा, और रघुकुलतिलक ने वही भुजा काट दी। वह बायें हाथ में पहाड़ लेकर दौड़ा, और प्रभु ने वह भुजा भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दी। दोनों बार क्रम एक ही है: पहले पहाड़ उठता है, फिर हाथ गिरता है। हथियार उसका शरीर है, और शरीर ही काटा जा रहा है।

भुजाओं के कट जाने पर वह कैसा दिखा, इसके लिये तुलसी जो उपमा लाते हैं वह इस पन्ने की सबसे बड़ी उपमा है। बिना पंख के मन्दराचल पहाड़ जैसा। पुराने समय में पहाड़ों के पंख हुआ करते थे और वे उड़ा करते थे, फिर वे काट दिये गये और पहाड़ जहाँ थे वहीं जम गये। मन्दराचल वही पर्वत है जिससे समुद्र मथा गया था। यानी जो कटा है वह आदमी का हाथ नहीं, एक पहाड़ के उड़ने की ताक़त है, और जो बचा है वह अब भी पहाड़ है।

और उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में वह देखता है। उग्र दृष्टि से उसने प्रभु को देखा, मानो तीनों लोकों को निगल जाना चाहता हो। हाथ नहीं हैं, हथियार नहीं है, और देखने में अभी भी तीनों लोक समा रहे हैं।

करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥ ७०॥

दोहा ७०

वह ज़ोर से चिग्घाड़ करके मुँह फैलाये हुए दौड़ा, और आकाश में सिद्ध और देवता डरकर हा हा पुकारने लगे। इस पन्ने पर यह पहली बार है कि डर आकाश तक पहुँचा है। अब तक भागने वाले मैदान में थे। अब जो देख रहे हैं, वे भी घबरा रहे हैं, और वे ऐसे लोग हैं जिनका काम सिर्फ़ देखना है।

करुणानिधान ने देवताओं को भयभीत जाना। यह वाक्य ध्यान से पढ़िये: बाण इसलिये नहीं चला कि शत्रु सामने था, बाण इसलिये चला कि देखने वाले डर गये थे। तब उन्होंने धनुष को कान तक तानकर राक्षस के मुख को बाणों के समूह से भर दिया। और तो भी वह महाबली पृथ्वी पर न गिरा।

मुँह में बाण भरे हुए वह फिर भी सामने दौड़ा, मानो काल का तरकस ही सजीव होकर चला आ रहा हो। तरकस की उपमा को पलटकर देखिये: बाण अब उसके भीतर हैं, तो वही चलता-फिरता तरकस है, और तरकस काल का है, तो जो उसे भर रहा है वही काल है।

सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा । धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥

चौपाई १०

वह सिर रावण के आगे जा गिरा, और उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि छूट जाने पर साँप। सर्प की मणि उसका बल भी है और उसका प्रकाश भी, और उसके बिना वह अन्धा और साधारण रह जाता है। जिस भाई को उसने सोते से जगाकर भेजा था, उसका सिर उसके सामने रखा हुआ है, और तुलसी उसकी हालत नाप के लिये यही उपमा चुनते हैं।

पर धड़ अभी दौड़ रहा है, और उसके दौड़ने से पृथ्वी धँसती जाती है। तब प्रभु ने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये। और वे दोनों टुकड़े पृथ्वी पर ऐसे गिरे जैसे आकाश से दो पहाड़ गिरे हों, और अपने नीचे वानर, भालू और निशाचर, तीनों को दबाते हुए गिरे। मरते हुए भी वह अपने और पराये में फ़र्क़ नहीं करता, और तुलसी इसे बिना किसी टिप्पणी के लिख जाते हैं।

और फिर वह एक पंक्ति, जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है। उसका तेज प्रभु के मुख में समा गया। यह देखकर देवता और मुनि सबने आश्चर्य माना। आश्चर्य उन्होंने मरने पर नहीं माना, समा जाने पर माना। जो अभी-अभी काटा गया है, वह अभी-अभी भीतर ले लिया गया है, और देखने वालों को यही समझ नहीं आता।

सार: राम एक-एक कर उसकी दोनों भुजाएँ काटते हैं, फिर मुँह को बाणों से भर देते हैं, और तब भी वह गिरता नहीं। अन्ततः सिर धड़ से अलग होता है और रावण के सामने जा गिरता है, दौड़ते हुए धड़ के दो टुकड़े किये जाते हैं, और उसका तेज प्रभु के मुख में समा जाता है।

देवता, नारद, और एक छबि

इसके बाद वह सब होता है जो ऐसे मौक़ों पर होता है, और तुलसी उसे जल्दी-जल्दी निपटा देते हैं। देवता नगाड़े बजाते हैं, हर्षित होते हैं, स्तुति करते हैं और बहुत से फूल बरसाते हैं। फिर विनती करके सब चले जाते हैं। मैदान ख़ाली हो जाता है, और तभी देवर्षि नारद आते हैं।

नारद जो करते हैं वह इस पन्ने पर बिलकुल नया है। वे आकाश के ऊपर से हरि के सुन्दर वीररस भरे गुणों का गान करते हैं, और वह गान प्रभु के मन को बहुत भाया। याद कीजिये कि शिव ने उमा से कहा था कि यह सब इसलिये हो रहा है कि ऐसी कीर्ति फैले जिसे गा-गाकर लोग तर जायँ। कीर्ति का पहला गान इसी पन्ने पर, वध के तुरन्त बाद, गा दिया जाता है, और गाने वाला आकाश में खड़ा है। जो बात वादे की तरह कही गयी थी, वह इसी पन्ने के भीतर घटित हो जाती है।

और कहकर वे रुकते नहीं। मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावण को शीघ्र मारिये। यह पूरे प्रसंग का सबसे छोटा वाक्य है और सबसे तेज़ भी। एक भाई अभी गिरा है, उसका तेज अभी समाया है, फूल अभी गिरना बन्द नहीं हुए, और आगे का काम बता दिया जाता है।

फिर तुलसी छन्द पर उतर आते हैं, और छन्द के उतरते ही रफ़्तार बदल जाती है। अतुलनीय बलवाले कोसलपति रघुनाथजी रणभूमि में सुशोभित हैं। मुख पर पसीने की बूँदें हैं, कमल जैसी आँखें कुछ लाल हो आयी हैं, शरीर पर रक्त के कण हैं। जिस आदमी के बारे में अभी-अभी कहा गया था कि वह भौंह से काल को खा जाता है, उसके माथे पर पसीना लिखा जा रहा है। नरलीला का मतलब यही है, और तुलसी उसे कहीं छोड़ते नहीं।

भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।
कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥

छन्द की अन्तिम दो पंक्तियाँ

दोनों हाथों से धनुष और बाण फिराते हुए, और चारों दिशाओं में रीछ-वानर सजे हुए। यह उस सेना की आख़िरी तस्वीर है जो थोड़ी देर पहले भेड़ों की तरह भाग रही थी। और फिर तुलसीदास अपना नाम अपनी ही पंक्ति में रखकर हार मान लेते हैं: वे कहते हैं कि इस छबि को शेषजी भी नहीं कह सकते, जिनके बहुत से मुख हैं। हज़ार मुँह वाला नहीं कह सका, यह कहकर कवि एक मुँह वाला अपना काम पूरा करता है।

और अब वह दोहा, जिसके लिये यह पूरा पन्ना लिखा गया है, और जिसे पढ़े बिना यहाँ का सब कुछ सिर्फ़ मार-काट रह जाता है।

निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥ ७१॥

दोहा ७१

सार: देवता स्तुति करके चले जाते हैं, नारद आकाश से वीररस का गान गाकर रावण-वध की ओर इशारा करके लौट जाते हैं, और छन्द में पसीने, लाल आँखों और रक्त के कणों समेत राम की वह छबि बनती है जिसे तुलसी के अनुसार शेष भी नहीं कह सकते।

और अन्त में, अपनी ओर

दोहा इकहत्तर दो हिस्सों में है और दोनों हिस्से अलग-अलग लोगों से बात करते हैं। पहला हिस्सा कहता है कि वह नीच राक्षस, मल का आकर यानी पाप की खान था, और उसे राम ने अपना धाम दे दिया। पूरे लङ्काकाण्ड में यह घोषणा बहुत कम बार होती है, और यहाँ यह उस आदमी के बारे में है जो अन्त तक दूसरी तरफ़ से लड़ा, जिसने करोड़ों को खाया, और जो मरते समय अपने भाई का नाम पुकार रहा था। तुलसी उसके कर्मों में से एक भी कम नहीं करते। वे मलाकर शब्द रखते हैं और उसी वाक्य में निज धाम भी रख देते हैं।

दूसरा हिस्सा गिरिजा से कहा गया है और असल में हमसे कहा गया है। वे मनुष्य मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीराम को नहीं भजते। तर्क सीधा है और उसे छिपाया भी नहीं गया। अगर वह इसे पा सकता है, तो हिसाब किसी के भी पक्ष में बैठ सकता है, और जो यह देखकर भी नहीं भजता, उसकी बुद्धि पर बात करनी बनती है। यह उपदेश नहीं है, यह गवाही के बाद की जिरह है।

और अब पीछे मुड़कर तीनों मोड़ों को एक साथ देखिये। पहली बार शिव ने उमा से कहा था कि यह नरलीला है और इससे कीर्ति फैलेगी। दूसरी बार उन्होंने भवानी से कहा था कि भागते हुए वानर आर्त वाणी से पुकार रहे थे। तीसरी बार वे गिरिजा से कहते हैं कि मारे गये को धाम मिल गया। तीनों जगह एक ही आदमी बोल रहा है और तीनों जगह वह हमें बताता है कि जो हम देख रहे हैं वह वह नहीं है जो हो रहा है।

इस प्रसंग का सबसे कठिन सवाल यह नहीं है कि कुम्भकर्ण को धाम क्यों मिला। सबसे कठिन सवाल यह है कि उसने जो किया, वह जानते हुए क्यों किया। पिछले पन्ने पर वह अपने भाई से कह चुका था कि विरोध किससे लिया गया है और अब समय नहीं बचा। उस बात के बाद उसके पास कोई भ्रम नहीं था। फिर भी वह किला छोड़कर, अकेला, बिना सेना के निकला, और उसी पक्ष के लिये लड़ा जिसे वह ग़लत कह चुका था, और उसी का नाम लेते हुए मरा। यह पन्ना इस बात की व्याख्या नहीं करता। यह बस दोनों चीज़ें साथ-साथ रख देता है और आगे बढ़ जाता है।

सार: दोहा इकहत्तर पाप की खान कहकर भी उसे निज धाम देता है, और उसी साँस में गिरिजा के बहाने पाठक से कहता है कि जो यह देखकर भी नहीं भजता वह मन्दबुद्धि है। शिव के तीनों सम्बोधन मिलकर बताते हैं कि इस युद्ध में जो दिख रहा था वह हो नहीं रहा था।

इस पन्ने पर जो कुछ भयानक है, वह पूरी तरह भयानक है और तुलसी उसे हल्का नहीं करते। करोड़ों की गिनती में वानर खाये जाते हैं, मसले जाते हैं और धूल में मिलाये जाते हैं। एक राजा गठरी की तरह काँख में दबाकर ले जाया जाता है। बिना सिर के धड़ मैदान में दौड़ते और ललकारते हैं। यह सब पन्ने पर है और इसे कम करके पढ़ने का कोई रास्ता नहीं बनाया गया है। पर यह प्रसंग इनमें से किसी चीज़ पर ख़त्म नहीं होता। यह एक ऐसे वाक्य पर ख़त्म होता है जिसमें मारने वाला मरे हुए को अपने घर में जगह देता है।

और शायद इसीलिये यह पन्ना उस भाई की याद पर टिका रहता है जो यहाँ बोलता एक बार भी नहीं। जो कुछ उसने कहना था वह पिछले प्रसंग में कह चुका था, बिना इस आशा के कि कोई सुनेगा, और यहाँ वह केवल करता है। लङ्काकाण्ड में ऐसे बहुत हैं जो ग़लत पक्ष में हैं और उन्हें मालूम नहीं। यह वह है जिसे मालूम था। अन्त में उसे जो मिला, तुलसी उसे तर्क की तरह नहीं, ख़बर की तरह देते हैं, और ख़बर देने के बाद सीधे हमारी ओर मुड़ जाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा ६५ से ७१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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