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कुम्भकर्ण-वध

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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 9

जागे हुए भाई का युद्ध और उसका अन्त, और उस अन्त में एक ऐसी बात जो लङ्काकाण्ड में बहुत कम लोगों के हिस्से आती है।

पिछला प्रसंग एक अँकवार पर ख़त्म हुआ था। कुम्भकर्ण नींद से उठाया जा चुका था, भैंसे और मदिरा उसके आगे रखी जा चुकी थी। उसने अपने बड़े भाई से वह बात कह दी थी जो उस घर में कोई और नहीं कहता था। विरोध किससे मोल लिया गया है, नारद से सुना हुआ ज्ञान कहने का समय अब निकल चुका है, और अब केवल एक बार गले मिल लेना बाक़ी है। रावण ने वह सब सुना और कुछ नहीं किया। कथा यहाँ से आगे चलती है।

इस प्रसंग की कथा लड़ाई की है। लड़ाई का ब्योरा पूरा है: पहाड़ उखड़ते हैं, करोड़ों की गिनती में वानर उठाये और मसले जाते हैं, बिना सिर के धड़ दौड़ते हुए ललकारते हैं। इस शोर के बीच कथा तीन बार रुकती है। तीनों बार शिव, जो यह कथा सुना रहे हैं, पार्वती को सम्बोधित करते हैं: पहली बार बीच लड़ाई में, दूसरी बार सेना के भागते समय। और तीसरी बार अन्त में। ये तीन मोड़ ही इस प्रसंग का ढाँचा हैं।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और दोनों जगह यह प्रसंग एक जैसा नहीं चलता। गरुड़ और साँपों वाला वह दृष्टान्त जो शिव पार्वती से कहते हैं, कीर्ति का वह वचन कि इसे गा-गाकर लोग भवसागर पार कर जायँगे। और अन्त में मारे गये राक्षस को निज धाम मिल जाना। ये मानस के अपने हैं।

कुम्भकर्ण और उससे भिड़ने वाले

  • कुम्भकर्ण रावण का भाई, जो इस पूरे प्रसंग में लगातार लड़ता है और अन्त में राम का अपना धाम पाता है।
  • विभीषण जो भाई की बात सुनकर लौटते हैं और राम को केवल इतना बताते हैं कि क्या आ रहा है, कैसा है, और कितना बड़ा है।
  • हनुमान जो इस युद्ध का पहला घूँसा मारते भी हैं और खाते भी हैं, और होश आते ही पहले अपने राजा को ढूँढ़ते हैं।
  • सुग्रीव वानरराज, जिन्हें काँख में दबाकर ले जाया जाता है, जो मुर्दा बनकर निकलते हैं और फिर दाँतों से हिसाब चुकाते हैं।
  • राम जो आधी लड़ाई बीतने तक धनुष नहीं उठाते, और जब उठाते हैं तो पहले अपनी सेना को अपने पीछे कर लेते हैं।
  • शिव और पार्वती कथा सुनाने वाले और सुनने वाली। इस लड़ाई के बीच शिव तीन बार पार्वती को सम्बोधित करते हैं, और हर बार लड़ाई का अर्थ बदल जाता है।
  • नारद जो वध के बाद आकाश से आते हैं, एक गान गाते हैं, एक वाक्य कहते हैं और चले जाते हैं।

जो ख़बर विभीषण लेकर आये

विभीषण अपने भाई से मिलकर लौट रहे हैं। जिससे वे अभी गले मिले हैं, वही थोड़ी देर में उस सेना पर टूटेगा जिसमें वे खड़े हैं, और दोनों बातें उन्हें एक साथ मालूम हैं। कथा इस घड़ी पर कुछ नहीं कहती। वह बस उनका चलना और पहुँचना कहती है, और जिनके पास वे पहुँचते हैं उन्हें नाम से नहीं, एक विशेषण से पुकारती है।

वह विशेषण है तीनों लोकों का गहना। लङ्का के परकोटे के भीतर से एक पहाड़ चलकर आ रहा है, और शिविर में बैठे राम को कथा इसी नाम से बुलाती है। आगे जो कुछ आयेगा, वह इसी पैमाने पर तौला जायेगा।

पहुँचकर विभीषण बहुत थोड़ा कहते हैं: “हे नाथ, पर्वत के आकार का शरीर लिये हुए, रण में अडिग रहने वाला कुम्भकर्ण आ रहा है।” बस इतना। न भाई की बातों का ब्योरा, न उस अँकवार का ज़िक्र, न कोई सलाह। वे वही बताते हैं जो एक सेनापति को चाहिये: क्या आ रहा है और किस बनावट का है।

इतना सुनते ही वानर किलकिलाकर दौड़ते हैं, जो हर्ष की ध्वनि है, डर की नहीं। वे पेड़ और पहाड़ उखाड़कर उठा लेते हैं और दाँत कटकटाते हुए उसके ऊपर डालने लगते हैं। कुम्भकर्ण ने अभी तक कुछ नहीं किया है। सारी हरकत इसी ओर से है। वह केवल चला आ रहा है, और यह सब उसी पर गिर रहा है।

फिर कथा इस लड़ाई का पूरा हिसाब एक चित्र में दे देती है। रीछ और वानर एक-एक बार में करोड़ों पहाड़ों की चोटियों से उस पर प्रहार करते हैं। पर न उसका मन मुड़ता है, न शरीर टाले टलता है, जैसे मदार के फलों की मार से हाथी पर कुछ असर नहीं होता। मदार का फल हल्का होता है, भीतर से पोला। करोड़ों पहाड़ उस शरीर के लिये उतने ही भारी हैं।

एक घूँसा, और एक काँख

जब पहाड़ बेकार जाते हैं, तब हनुमान आगे आते हैं, और वे पहाड़ नहीं उठाते, मुट्ठी बाँधते हैं। यह पहली चोट है जो कुम्भकर्ण को लगती है।

वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और व्याकुल होकर सिर पीटने लगा। अब तक जो कुछ उस पर पड़ा था, उसने उसे छुआ भी नहीं था, और एक घूँसे ने उसे ज़मीन पर बैठा दिया। पर अगले ही पल वह उठकर जवाब देता है, और हनुमान चक्कर खाकर तुरन्त भूमि पर गिर जाते हैं। दोनों बातें एक ही साँस में कही गयी हैं।

इसके बाद का हिसाब तेज़ी से चुकता है। नल और नील पृथ्वी पर पछाड़ दिये जाते हैं, बाक़ी योद्धा जहाँ-तहाँ पटक-पटककर डाल दिये जाते हैं। फिर वानरसेना भाग चलती है। सब अत्यन्त भयभीत हैं, कोई सामने नहीं आता। जिस सेना ने कुछ प्रसंग पहले लङ्का के परकोटे पर चढ़ाई की थी, वह यहाँ कुछ ही पलों में पीठ दिखा देती है।

फिर वह क्षण आता है जिसमें कुम्भकर्ण किसी को मारता नहीं, उठा ले जाता है।

अंगद आदि वानरों को, सुग्रीव समेत, मूर्च्छित करके वह वानरराज को काँख में दबाकर चल देता है। हाथ में नहीं, कंधे पर नहीं, काँख में, जैसे कोई गठरी लेकर बाज़ार से लौट रहा हो।

कथा उसे एक नाम भी देती है: अपरिमित बल की सीमा। यह नाम उसे उस क्षण मिलता है जब वह मैदान से एक राजा को उठाकर ले जा रहा है और कोई उसके पीछे नहीं आता।

पार्वती, यह लड़ाई नहीं है

यहीं, बीच मैदान में, जब वानरराज किसी की काँख में दबे हैं और सेना भागी हुई है, कथा लड़ाई रोक देती है। वह याद दिलाती है कि यह सब किसी को सुनाया जा रहा है, और सुनाने वाले शिव हैं।

शिव कहते हैं, “पार्वती, राम वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ साँपों के समूह में मिलकर खेलता हो।” गरुड़ साँपों से लड़ता नहीं, खेलता है, और खेलने के लिये उसे साँपों के बीच, उनकी ही ज़मीन पर उतरना पड़ता है। बाहर से देखने वाले को लगेगा कि मुक़ाबला चल रहा है। भीतर बात इतनी ही है कि जिसका भोजन साँप हैं, वह उनके बीच घूम रहा है।

फिर एक प्रश्न, जिसका उत्तर देने की ज़रूरत नहीं: “जो भौंह के इशारे भर से काल को खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है?” भौंह का एक बार टेढ़ा होना, और काल निगला जा चुका। उसके आगे पहाड़, बाण, करोड़ों वानर और कटती हुई भुजाएँ क्या हैं।

फिर शिव बताते हैं कि यह लीला हो क्यों रही है। राम इसके द्वारा जगत को पवित्र करने वाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागर से तर जायँगे। यानी मैदान में जो हो रहा है, वह इसलिये हो रहा है कि उसे बाद में गाया जा सके, और गाने वाले उसी गाने से पार उतर जायँ। युद्ध का प्रयोजन विजय नहीं, गीत है।

सुग्रीव के दाँत

मूर्च्छा टूटती है और हनुमान जागते हैं। जागकर वे न शत्रु को ढूँढ़ते हैं, न अपने साथियों को। वे सुग्रीव को खोजने लगते हैं।

उधर काँख में दबे सुग्रीव की मूर्च्छा भी उतर चुकी है, और उन्हें अपनी हालत समझने में देर नहीं लगती। उनके पास न हथियार है, न ज़मीन, न कोई साथ। एक ही चीज़ बची है: ले जाने वाले को मालूम नहीं कि वे होश में आ चुके हैं। सुग्रीव उसी का इस्तेमाल करते हैं।

वे नीचे खिसक गये, और कुम्भकर्ण ने उन्हें मरा हुआ समझा। फिर उन्होंने दाँतों से उसके नाक और कान काट लिये। जिसके हाथ में कुछ नहीं था, उसने यह चोट दाँतों से की। उसके बाद वे गरजकर आकाश की ओर चले, और गरजने से ही कुम्भकर्ण को पता चला कि हुआ क्या है। चुपचाप निकल जाना उनके बस में था। वे निकले, फिर भी गरजे।

उस गरज की क़ीमत तुरन्त चुकती है। कुम्भकर्ण ने सुग्रीव का पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर पछाड़ दिया। पर सुग्रीव बड़ी फुर्ती से उठे, उसे फिर मारा, और जय-जयकार करते हुए राम के पास आये। जो थोड़ी देर पहले गठरी की तरह उठा लिया गया था, वह अपने पैरों पर लौटता है, और लौटते ही अपनी नहीं, राम की जय बोलता है।

कुम्भकर्ण पर इसका असर दर्द नहीं है। नाक-कान कटे, यह मन में जानकर उसे बड़ी ग्लानि हुई, और वह क्रोध करके लौटा। चोट ने उसे दुखाया नहीं, शर्मिन्दा किया। एक तो वह स्वभाव से ही भयंकर था, अब बिना नाक-कान के और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरों की सेना में त्रास उपजा।

डरी हुई सेना राम की जय-जयकार करती है और हूह की आवाज़ के साथ दौड़ पड़ती है। सब एक ही बार में उस पर पहाड़ों और पेड़ों के समूह छोड़ देते हैं। एक ही बार में, क्योंकि दूसरी बार का भरोसा किसी को नहीं है।

टिड्डियाँ और एक गुफा

आगे का हिस्सा कठिन है, और उसे नरम करके पढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। रण के उत्साह में भरकर वह सामने ऐसे चला मानो क्रुद्ध होकर काल ही आ रहा हो। फिर एक उपमा आती है जिसके बाद यह लड़ाई लड़ाई नहीं रह जाती।

करोड़-करोड़ वानरों को पकड़-पकड़कर वह खाने लगा, मानो पर्वत की गुफा में टिड्डियाँ समा रही हों। टिड्डियों का दल आकाश ढक लेता है और फिर भी किसी गुफा को भर नहीं पाता। उपमा मात्रा की नहीं, अनुपात की है। जो सेना सामने से अनगिनत दिखती है, वह उस मुँह के आगे उतनी ही है जितनी पहाड़ की गुफा के आगे टिड्डियाँ।

फिर कथा ठंडे स्वर में गिनती करती है। करोड़ों को पकड़कर उसने अपने शरीर से मसल डाला, करोड़ों को हाथों से मलकर पृथ्वी की धूल में मिला दिया। और पेट में गये हुए रीछ और वानरों के ठट्ट उसके मुख, नाक और कानों की राह से निकल-निकलकर भाग रहे हैं। इन रास्तों में से दो, नाक और कान, सुग्रीव ने अभी-अभी बनाये हैं। कथा यह कहती नहीं, बस दोनों बातें थोड़े फ़ासले पर रख देती है।

फिर कथा उसके भीतर का हाल बताती है। रण के मद में मत्त वह राक्षस ऐसा गर्वित हुआ मानो विधाता ने सारा विश्व उसे निगलने के लिये सौंप दिया हो। यह भूख का चित्र नहीं, हक़ का चित्र है। उसे लग रहा है कि जो सामने है, वह उसे दिया गया है।

फिर घबराहट का वर्णन। योद्धा मुड़ गये, लौटाये भी नहीं लौटते। आँखों से उन्हें सूझता नहीं, और पुकारने पर सुनते नहीं। कथा यह नहीं कहती कि वे कायर हो गये। वह कहती है कि उनकी आँख और कान काम करना छोड़ चुके हैं। डर यहाँ कोई भाव नहीं, इन्द्रियों का बैठ जाना है।

कुम्भकर्ण ने वानरसेना को तितर-बितर कर दिया, और यह सुनकर राक्षसों की सेना भी दौड़ पड़ी। अब तक वह अकेला लड़ रहा था, किला छोड़कर बिना सेना के निकला था। जीत की ख़बर सुनते ही पीछे से बाक़ी लङ्का भी आ जुड़ती है। राम ने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रु की नाना प्रकार की सेना आ पहुँची है।

राम का धनुष उठता है

यहाँ राम पहली बार बोलते हैं, और उनका पहला वाक्य आदेश नहीं, बँटवारा है।

सेना तीन लोगों के हवाले की जाती है: सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण। अपने लिये राम जो काम रखते हैं, उसे वे मारना नहीं कहते। राम कहते हैं, “मैं इस दुष्ट के बल और सेना को देखता हूँ।” देखता हूँ। जिनके बारे में शिव अभी पार्वती से कह चुके हैं कि वे भौंह से काल को खा जाते हैं, वे मैदान में उतरते हुए इतना ही कहते हैं।

फिर तैयारी का एक चित्र: हाथ में शार्ङ्ग धनुष, कमर में तरकस, और शत्रुसेना को दलने के लिये चलना। पर पहला काम बाण चलाना नहीं है। पहले उन्होंने धनुष का टंकोर किया, केवल प्रत्यंचा खींचकर छोड़ी, और उसी आवाज़ को सुनकर शत्रुदल बहरा हो गया। जिस सेना के कान अभी-अभी काम करना छोड़ चुके थे, अब दूसरी ओर के कान जाते हैं।

राम ने एक लाख बाण छोड़े, और वे ऐसे चले मानो पंखों वाले कालसर्प चले हों। साँप वैसे ही तेज़ होता है। यहाँ उसके पंख भी हैं, और वह काल का साँप भी है। तीन चीज़ें एक के ऊपर एक चढ़ी हैं, और यह एक बाण का वर्णन है, जिसके जैसे एक लाख एक साथ छूटे हैं।

उसके बाद का ब्योरा कटता हुआ और साफ़ है। चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं, बहुत से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं, घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं। अच्छे योद्धा फिर सँभलकर उठते हैं और लड़ते हैं। कथा राक्षसों को भी कायर नहीं बनाती। बाण लगते ही वे मेघ की तरह गरजते हैं, और बिना सिर के प्रचण्ड धड़ दौड़ते हुए पकड़ो और मारो की ध्वनि करते हैं।

फिर क्षण भर में भयानक राक्षस काट दिये जाते हैं। फिर वे सब बाण लौटकर राम के तरकस में घुस जाते हैं। बाण गिनती में छोड़े गये थे, एक लाख, और सब के सब वापस आ जाते हैं। मैदान में कुछ छूटा नहीं रहता। जिसने देखा उसने सेना मिटती देखी, और जिस हथियार से वह मिटी, वह अपनी जगह लौट गया।

जो कटता है और गिरता नहीं

कुम्भकर्ण ने मन में विचार कर देखा कि क्षण भर में राक्षसी सेना का संहार हो चुका है। मैदान में वह अब तक केवल करता रहा था। पहली बार वह रुकता है, गिनता है, और तब क्रोध करता है, और उसका क्रोध सिंहनाद बनकर निकलता है।

फिर वही तरीक़ा जो उसे आता है। वह क्रोध में पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहीं डालता है: देखकर, जहाँ भीड़ सबसे घनी है। आते हुए बड़े-बड़े पर्वतों को राम बाणों से काटकर धूल के समान कर डालते हैं। जिस चीज़ से करोड़ों मारे जा रहे थे, वह हवा में ही चूर्ण हो जाती है।

अब राम उस पर बाण चलाते हैं। बाण उसके शरीर में घुसकर पार निकल जाते हैं, जैसे बिजलियाँ बादल में समा जाती हैं। बिजली बादल को चीरती नहीं, उसमें समा जाती है, और बादल ज्यों का त्यों रहता है। शरीर इतना बड़ा है कि उसमें से पार निकलता हुआ बाण भी उसे घटाता नहीं।

फिर रंग आता है। उसके काले शरीर से बहता रुधिर ऐसा लगता है मानो काजल के पर्वत से गेरू के पनाले बह रहे हों। काजल का पहाड़, और उस पर लाल मिट्टी की धारें। कथा इसे शोभा कहती है। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़ पड़े, और ज्यों ही वे निकट आये, वह हँसा।

वह हँसी क्या थी, यह तुरन्त दिख जाता है। बड़ा घोर शब्द करके वह गरजा, करोड़-करोड़ वानरों को पकड़कर गजराज की तरह पृथ्वी पर पटकने लगा, और साथ-साथ रावण की दुहाई देता रहा। थोड़ी देर पहले वह उसी रावण से कह रहा था कि उसने बुरा किया, कि वह काल के वश हो चुका है। अब वह उसी का नाम लेकर लड़ रहा है और उसी के नाम पर मार रहा है। कथा इन दोनों बातों को जोड़ती नहीं, बस दोनों रख देती है।

इसी में इस चरित्र की पूरी बात है। उसने भाई से सच कह दिया था, बिना इस उम्मीद के कि सुना जायेगा। उसे मालूम था कि यह पक्ष ग़लत है, किसने किससे बैर लिया है और उसका अन्त क्या होगा। जानने के बाद भी वह उसी पक्ष के लिये निकला और उसी का नाम लेकर मरा। अपनी उस बात से वह कहीं पलटता नहीं, और लड़ना भी कहीं नहीं छोड़ता।

अकाल

इसके बाद सेना का धीरज पूरी तरह टूट जाता है। रीछ-वानरों के झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़िये को देखकर भेड़ों के झुंड। और यहाँ दूसरी बार शिव पार्वती को सम्बोधित करते हैं। वे यह नहीं कहते कि सेना भागी। वे कहते हैं कि वानर-भालू व्याकुल होकर आर्त वाणी से पुकारते हुए भागे। भागते हुए भी उनके मुँह में कुछ था।

वे पुकारते हैं, “यह राक्षस अकाल के समान है, जो अब वानरकुल रूपी देश पर पड़ना चाहता है।” इस एक उपमा से लड़ाई का व्याकरण बदल जाता है। अकाल से कोई लड़ता नहीं, अकाल झेला जाता है, और वह सैनिकों को नहीं, पूरे देश को खाता है। इसीलिये वे अपने को सेना नहीं, कुल कहते हैं, और अपनी जगह को देश।

इसीलिये उनकी पुकार में कोई रणनीति नहीं है: “हे कृपा का जल धारण करने वाले मेघ राम, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।” अकाल का एक ही जवाब है, बादल, और यहाँ वह बादल कृपा का बादल है। अकाल के सामने खड़े लोगों ने मेघ को बुलाया है, और वही उपमा उनकी प्रार्थना का पूरा तर्क है।

करुणा भरे वचन सुनते ही राम धनुष-बाण सुधारकर चले। और फिर वह ब्योरा जो राम के बारे में बहुत कुछ कहता है: उन्होंने सेना को अपने पीछे कर लिया और अकेले क्रोधपूर्वक आगे बढ़े। जिन्होंने अभी पुकारा था, उन्हें पहले हटाया जाता है, फिर लड़ाई होती है।

फिर धनुष खींचकर उन्होंने सौ बाण एक साथ सन्धान किये। बाण छूटे और उसके शरीर में समा गये। बाणों के लगते ही वह क्रोध से भरकर दौड़ा, और उसके दौड़ने से पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी। इतने बाण भीतर लिये हुए भी वह रुकता नहीं, उलटा दौड़ता है।

दो भुजाएँ, एक सिर, दो टुकड़े

अन्त अब तेज़ी से आता है, एक-एक अंग करके, जैसे कोई गिनती पूरी हो रही हो।

उसने एक पर्वत उखाड़ा, और राम ने वही भुजा काट दी। वह बायें हाथ में पहाड़ लेकर दौड़ा, और राम ने वह भुजा भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दी। दोनों बार क्रम एक ही है: पहले पहाड़ उठता है, फिर हाथ गिरता है। हथियार उसका शरीर है, और शरीर ही काटा जा रहा है।

भुजाएँ कट जाने पर वह बिना पंख के मन्दराचल पहाड़ जैसा दिखा। पुराने समय में पहाड़ों के पंख हुआ करते थे और वे उड़ा करते थे। फिर पंख काट दिये गये और पहाड़ जहाँ थे वहीं जम गये। मन्दराचल वही पर्वत है जिससे समुद्र मथा गया था। जो कटा है वह एक पहाड़ के उड़ने की ताक़त है, और जो बचा है, वह अब भी पहाड़ है।

उसी क्षण उसने उग्र दृष्टि से राम को देखा, मानो तीनों लोकों को निगल जाना चाहता हो। हाथ नहीं हैं, हथियार नहीं है, और उसकी दृष्टि में अब भी तीनों लोक समा रहे हैं।

वह ज़ोर से चिग्घाड़ करके मुँह फैलाये हुए दौड़ा, और आकाश में सिद्ध और देवता डरकर हा हा पुकारने लगे। अब तक भागने वाले मैदान में थे। अब डर आकाश तक पहुँचा है, उन तक जिनका काम सिर्फ़ देखना है।

कथा यहाँ राम को करुणा का भंडार कहती है, क्योंकि उन्होंने जाना कि देवता भयभीत हैं। बाण इसलिये चला कि देखने वाले डर गये थे। तब उन्होंने धनुष को कान तक तानकर राक्षस के मुख को बाणों के समूह से भर दिया, और तो भी वह महाबली पृथ्वी पर न गिरा।

मुँह में बाण भरे हुए वह फिर भी सामने दौड़ा, मानो काल का तरकस ही सजीव होकर चला आ रहा हो। बाण अब उसके भीतर हैं, तो वही चलता-फिरता तरकस है, और तरकस काल का है।

तब राम ने क्रोध करके तीखा बाण लिया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। वह सिर रावण के आगे जा गिरा, और उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि छूट जाने पर साँप। साँप की मणि उसका बल भी है और प्रकाश भी, और उसके बिना वह अन्धा और साधारण रह जाता है। जिस भाई को उसने सोते से जगाकर भेजा था, उसका सिर उसके सामने पड़ा है।

पर धड़ अभी दौड़ रहा है, और उसके दौड़ने से पृथ्वी धँसती जाती है। तब राम ने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये। वे दोनों टुकड़े ऐसे गिरे जैसे आकाश से दो पहाड़ गिरे हों, और अपने नीचे वानर, भालू और निशाचर, तीनों को दबाते हुए गिरे। मरते हुए भी वह अपने और पराये में फ़र्क़ नहीं करता।

और फिर वह बात जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है: उसका तेज राम के मुख में समा गया। यह देखकर देवता और मुनि सबने आश्चर्य माना। आश्चर्य उन्होंने मरने पर नहीं, समा जाने पर माना। जो अभी-अभी काटा गया, वह अभी-अभी भीतर ले लिया गया।

देवता, नारद, और एक छबि

इसके बाद वह सब होता है जो ऐसे मौक़ों पर होता है, और जल्दी-जल्दी। देवता नगाड़े बजाते हैं, हर्षित होते हैं, स्तुति करते हैं और बहुत से फूल बरसाते हैं। फिर विनती करके सब चले जाते हैं। मैदान ख़ाली हो जाता है, और तभी देवर्षि नारद आते हैं।

नारद आकाश के ऊपर से राम के वीररस भरे गुणों का गान करते हैं, और वह गान राम के मन को बहुत भाया। शिव ने पार्वती से कहा था कि यह सब इसलिये हो रहा है कि ऐसी कीर्ति फैले जिसे गा-गाकर लोग तर जायँ। कीर्ति का पहला गान यहीं, वध के तुरन्त बाद, गा दिया जाता है, और गाने वाला आकाश में खड़ा है। जो बात वादे की तरह कही गयी थी, वह इसी प्रसंग के भीतर घटित हो जाती है।

गाकर नारद रुकते नहीं। वे यह कहकर चले जाते हैं, “अब दुष्ट रावण को शीघ्र मारिये।” एक भाई अभी गिरा है, उसका तेज अभी समाया है, फूल अभी गिर रहे हैं, और आगे का काम बता दिया जाता है।

फिर रफ़्तार बदल जाती है। राम रणभूमि में खड़े हैं: मुख पर पसीने की बूँदें हैं, आँखें कुछ लाल हो आयी हैं, शरीर पर रक्त के कण हैं। जिनके बारे में अभी कहा गया था कि वे भौंह से काल को खा जाते हैं, उनके माथे पर पसीना है। नरलीला का मतलब यही है।

वे दोनों हाथों से धनुष और बाण फिरा रहे हैं, और चारों दिशाओं में रीछ-वानर सजे हैं। थोड़ी देर पहले यही सेना भेड़ों की तरह भाग रही थी। फिर तुलसीदास अपना नाम लेकर कहते हैं कि इस छबि को शेष भी नहीं कह सकते, जिनके बहुत से मुख हैं।

फिर वह बात आती है जिस पर यह सारी लड़ाई जाकर टिकती है।

जिसे मालूम था

इस अन्त के दो हिस्से हैं। पहला यह कि वह नीच राक्षस पाप की खान था, और उसे राम ने अपना धाम दे दिया। यह उसके बारे में है जो अन्त तक दूसरी तरफ़ से लड़ा, जिसने करोड़ों को खाया, और जो मरते समय अपने भाई का नाम पुकार रहा था। कथा उसके कर्मों में से एक भी कम नहीं करती। पाप की खान भी उसी वाक्य में है, और निज धाम भी।

दूसरा हिस्सा शिव पार्वती से कहते हैं: वे मनुष्य मन्दबुद्धि हैं जो राम को नहीं भजते। तर्क सीधा है। अगर वह यह पा सकता है, तो जो यह देखकर भी नहीं भजता, उसकी बुद्धि पर बात करनी बनती है। यह उपदेश नहीं, गवाही के बाद की जिरह है।

तीनों मोड़ एक साथ रखें तो बात साफ़ हो जाती है। पहली बार शिव ने पार्वती से कहा था कि यह नरलीला है और इससे कीर्ति फैलेगी। दूसरी बार उन्होंने कहा कि भागते हुए वानर आर्त वाणी से पुकार रहे थे। तीसरी बार वे कहते हैं कि मारे गये को धाम मिल गया। तीनों जगह एक ही वक्ता है, और तीनों जगह वे बताते हैं कि जो दिख रहा है, वह वह नहीं है जो हो रहा है।

इस प्रसंग का कठिन सवाल यह नहीं है कि कुम्भकर्ण को धाम क्यों मिला। कठिन सवाल यह है कि उसने जो किया, वह जानते हुए क्यों किया। पिछले प्रसंग में वह भाई से कह चुका था कि विरोध किससे लिया गया है और अब समय नहीं बचा। फिर भी वह किला छोड़कर, अकेला, बिना सेना के निकला, उसी पक्ष के लिये लड़ा जिसे वह ग़लत कह चुका था, और उसी का नाम लेते हुए मरा। कथा इसकी व्याख्या नहीं करती। वह दोनों बातें साथ-साथ रखकर आगे बढ़ जाती है।

इस युद्ध में जो भयानक है, वह पूरा भयानक है, और कथा उसे हल्का नहीं करती। करोड़ों वानर खाये, मसले और धूल में मिलाये जाते हैं। एक राजा गठरी की तरह काँख में दबाकर ले जाया जाता है। बिना सिर के धड़ मैदान में दौड़ते और ललकारते हैं। पर प्रसंग इनमें से किसी पर ख़त्म नहीं होता। वह एक ऐसे वाक्य पर ख़त्म होता है जिसमें मारने वाला मरे हुए को अपने घर में जगह देता है।

यह कथा उस भाई की याद पर टिकी रहती है जो यहाँ एक बार भी नहीं बोलता। जो उसे कहना था, वह पिछले प्रसंग में कह चुका था, बिना इस आशा के कि कोई सुनेगा। यहाँ वह केवल करता है। लङ्काकाण्ड में ऐसे बहुत हैं जो ग़लत पक्ष में हैं और उन्हें मालूम नहीं। यह वह है जिसे मालूम था। अन्त में उसे जो मिला, कथा उसे तर्क की तरह नहीं, ख़बर की तरह देती है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 65 से 71, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।