रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · अंगद का पाँव, और वह सभा जो उसे हिला न सकी
अंगद का पाँव, और वह सभा जो उसे हिला न सकी
रावण की भरी सभा में बालि का बेटा एक शर्त रखकर अपना चरण ज़मीन पर रोप देता है, और इन्द्रजीत से लेकर स्वयं लङ्कापति तक कोई उसे उठा नहीं पाता।
यह पन्ना एक बोलते हुए आदमी के बीच से शुरू होता है। पिछला प्रसंग वहाँ छूटा था जहाँ लङ्कापति अपनी गिनती गिना रहा था, और उस गिनती का सबसे ऊँचा दावा यह था कि उसने अपने ही हाथों अपने सिर काटकर अग्नि में होम दिये हैं। यहाँ वह उसी दावे की पूँछ पकड़कर आगे बढ़ता है, और बात एक हँसी पर आकर रुकती है। न कोई नया दृश्य बँधता है, न कोई पर्दा गिरता है। जो आदमी बोल रहा था वह अभी बोल ही रहा है, और उसके सामने एक जवान वानर खड़ा है जिसे इस सभा ने अभी तक बंदर से अधिक कुछ नहीं माना।
दोहा उनतीस से पैंतीस तक की यह सारी कथा एक ही कमरे में घटती है और इसमें एक भी अस्त्र नहीं चलता। जो चलता है वह बोली है, और बोली के बाद एक पाँव। बीचोंबीच वह दृश्य है जिसे इस देश का हर सुननेवाला जानता है, कि अंगद ने रावण की सभा में अपना चरण रोप दिया और वह चरण किसी से हिला नहीं। पर जिस चीज़ से यह दृश्य असल में बनता है वह पाँव नहीं है। वह वह क्रम है जिसमें लोग उठते हैं, झपटते हैं, हारते हैं और सिर नीचा करके अपनी-अपनी जगह जा बैठते हैं। पहले एक नाम, फिर एक संख्या, और सबसे अन्त में वह आदमी जिसकी यह सभा है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दूत का जाना दोनों में है, पर यहाँ जो कहा जाता है, जिस क्रम में कहा जाता है और जिन शब्दों में कहा जाता है, वह इसी अवधी पाठ का है। इस पन्ने पर एक भी घटना, एक भी नाम और एक भी गिनती कहीं और से नहीं लायी गयी।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- अंगद बालि के पुत्र और वानरों के युवराज, जो इस सभा में अकेले खड़े हैं और जिनका सबसे तीखा हथियार इस पन्ने पर उनकी अपनी छोटाई है।
- रावण लङ्कापति, जो अपने ही मुँह से अपने गुण गिनाता है, और अन्त में अपने ही सिंहासन से उतरकर एक पाँव उठाने आता है।
- राम जो इस पूरे प्रसंग में सभा के भीतर कहीं नहीं हैं, और फिर भी यहाँ का हर वाक्य उन्हीं की ओर से उठता है।
- हनुमान पवनपुत्र, जो आकाश में उछलकर आते हुए मुकुटों को हाथ से पकड़ लेते हैं और लाकर प्रभु के पास रख देते हैं।
- इन्द्रजीत लङ्का के बलवानों में वह पहला नाम, जिसे टीका मेघनाद बताती है, और जो सबसे पहले उठता है और सबसे पहले बैठ जाता है।
- लङ्का के सभासद वे दरबारी जो इस पन्ने पर एक बार आसन से गिरते हैं, एक बार भागते हैं, और अन्त में सिर नवाकर चुप बैठ जाते हैं।
ललाट पर लिखा हुआ अक्षर, और एक हँसी
सिरों के कटने और अग्नि में जाने की बात अभी हवा में है, और रावण उसी बात को एक क़दम और आगे ले जाता है। वह बताता है कि उन कटे हुए सिरों के जलने के समय उसने क्या देखा था। यह ब्योरा उसने पहले नहीं दिया था, और इसे वह सबसे बड़े प्रमाण की तरह रखता है, क्योंकि इसमें विधाता का लिखा हुआ अक्षर है और उसके ऊपर उसकी अपनी हँसी है।
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥
चौपाई १
नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥
जिस समय कपाल जल रहे थे, उसी समय उसने अपने ललाटों पर विधाता के लिखे हुए अंक देख लिये। और उन अंकों में जो लिखा था वह यह था कि उसकी मृत्यु मनुष्य के हाथ से होगी। पढ़कर वह डरा नहीं। वह हँसा, यह जानकर कि विधाता की वाणी झूठी है। इस चौपाई में जो सबसे ठंडी चीज़ है वह हँसी नहीं है, वह यह है कि वह अपनी मृत्यु का लेख पढ़ चुका है और उसे याद रखे हुए है। जो आदमी सबसे अधिक निश्चिन्त दीख रहा है, वही अकेला है जिसे अपना अन्त शब्दों में मिल चुका है।
आगे वह उस हँसी को समझाता भी है। उस बात को याद करके भी उसके मन में कोई त्रास नहीं है, क्योंकि उसके हिसाब से बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि के भ्रम में वह लेख लिख दिया था। यह उत्तर देखने लायक़ है। वह लेख को झूठा नहीं कहता, वह लिखनेवाले को बूढ़ा कहता है। दुनिया की सबसे पुरानी तरकीब यही है, कि जो बात काटी न जा सके उसे कहनेवाले की उम्र पर डाल दिया जाय।
और उसी साँस में वह दूत की ओर मुड़ जाता है। उसकी शिकायत यह है कि लाज और मर्यादा छोड़कर अंगद उसके सामने बार-बार किसी दूसरे वीर का बल बखान रहे हैं। ध्यान दीजिये कि यह आदमी अभी-अभी कई दोहों तक अपना ही बल बखान कर चुका है। जिस काम को वह अपने लिये गौरव मानता है, वही काम दूसरे के लिये निर्लज्जता हो जाता है। यहीं वह दरवाज़ा खुलता है जिससे अंगद का अगला वाक्य भीतर आता है, और वह वाक्य सीधा नहीं आता, टेढ़ा आता है।
सार: रावण बताता है कि सिरों के जलते समय उसने अपने ललाटों पर विधाता का लेख पढ़ लिया था, कि उसकी मृत्यु मनुष्य के हाथ से लिखी है, और वह उसे झूठा जानकर हँस दिया था। फिर वह कहता है कि याद करके भी उसे डर नहीं, क्योंकि बूढ़े ब्रह्मा ने भ्रम में लिख दिया होगा। और तुरन्त वह अंगद को उलाहना देता है कि लाज छोड़कर वे उसके आगे दूसरे का बल गाते हैं।
लज्जा की एक तारीफ़
अंगद का उत्तर इस पूरे काण्ड की सबसे चतुर पंक्तियों में से है, और उसकी चतुराई यह है कि उसमें एक भी गाली नहीं है। वे उलाहने को सिर-आँखों पर लेते हैं और उसी को लौटा देते हैं। सभा में जो अभी-अभी घण्टों अपने मुँह से अपने गुण गिन चुका है, उसी से कहा जाता है कि लज्जा में उसका जोड़ संसार में कोई नहीं।
कह अंगद सलज्ज जग माहीं । रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥
चौपाई २
लाजवंत तव सहज सुभाऊ । निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥
जगत् में लज्जावान् उसके समान कोई नहीं है। लज्जाशीलता तो उसका सहज स्वभाव ही है। वह अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहता। चारों चरण एक ही दिशा में जाते हैं और चारों में कहीं कोई कड़वा शब्द नहीं है। अंगद ने न उसे झूठा कहा, न घमण्डी। उन्होंने बस यह कह दिया कि वह कभी अपनी तारीफ़ नहीं करता, और पूरी सभा को स्वयं याद आ गया कि पिछली पूरी शाम उसने क्या किया है।
फिर वे एक और परत खोलते हैं। सिर काटने और पर्वत उठाने की कथा उसके चित्त पर चढ़ी हुई थी, इसीलिये उसने उसे बीसों बार कह डाला। और जिन भुजाओं के बल से उसने सहस्रबाहु, बलि और बालि को जीता, उस बल को तो उसने हृदय में ही छिपाकर रख लिया, बाहर कभी कहा ही नहीं। व्यंग्य वही है और उसी सुर में चल रहा है, पर इस बार उसके भीतर तीन नाम रख दिये गये हैं।
तीन नामों का इस तरह आना कोई साधारण बात नहीं है। जिस आदमी ने अपनी हर जीत गिनायी, उसकी गिनती में ये तीन प्रसंग नहीं आये थे। अंगद उन्हें गिनाते नहीं, वे उनके न कहे जाने की तारीफ़ करते हैं, और इस तरह तीनों नाम सभा के कान में पड़ जाते हैं। बालि का नाम इनमें आख़िरी है, और वह नाम कहनेवाले का अपना पिता है। इस पूरे पन्ने पर वह नाम बार-बार लौटेगा, और हर बार किसी और के मुँह से।
व्यंग्य यहाँ आकर छूट जाता है और सीधी बात शुरू होती है। अब बस कीजिये। क्या सिर काटने से कोई शूरवीर हो जाता है। जो इन्द्रजाल रचता है उसे वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है। यह उत्तर ठीक उसी दावे पर पड़ता है जिस पर पिछला प्रसंग समाप्त हुआ था। अंगद यह नहीं कहते कि वह घटना हुई ही नहीं। वे उसे मानकर उसका दर्जा बदल देते हैं, और उसे तमाशा कहकर वीरता की सूची से बाहर कर देते हैं।
इन्द्रजाल का उदाहरण चुनने में एक और बात है। बाज़ार में खेल दिखानेवाला भी अपने को काटता हुआ दिखाता है, और भीड़ ताली बजाती है, और किसी को यह नहीं लगता कि उसने कोई वीरता देखी। दोनों में क्रिया एक है और अर्थ अलग है। अंगद यही अलगाव सभा के सामने रख देते हैं, और इसके बाद वह दोहा आता है जिसमें दो और उदाहरण हैं, और दोनों में कोई खेल नहीं है।
जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।
दोहा २९
ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद॥ २९॥
पतंगे मोह के वश आग में जल मरते हैं, गदहों के झुंड बोझ लादकर चलते हैं, पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते। समझकर देख लीजिये। दो उदाहरण हैं और दोनों अलग जाति के हैं। एक में मरना है, दूसरे में सहना है। और दोनों बाहर से देखने में वही चीज़ लगते हैं जिसे आदमी वीरता कहता है, प्राण की परवाह न करना और भार से न घबराना।
अंगद जो कसौटी रख रहे हैं वह बड़ी सादी है। काम कितना कठिन है, इससे वीरता तय नहीं होती। किसलिये किया जा रहा है, इससे तय होती है। पतंगा मोह से जलता है, गदहा विवशता से ढोता है, और इन्द्रजाल दिखानेवाला दिखाने के लिये अपने को काटता है। तीनों में एक ही चीज़ नहीं है, और वह है प्रयोजन। यह बात कहकर वे मज़ाक़ छोड़ देते हैं और अपने आने का कारण बताने पर आ जाते हैं।
सार: अंगद उलटकर रावण की लज्जा की तारीफ़ करते हैं, कि उसके समान लज्जावान् जगत् में कोई नहीं और वह अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहता। फिर कहते हैं कि सिर और कैलास की कथा चित्त पर चढ़ी थी इसलिये बीसों बार कही गयी, और सहस्रबाहु, बलि तथा बालि वाला बल हृदय में छिपा रखा गया। सिर काटने को वे इन्द्रजाल बताते हैं, और दोहे में पतंगे और गदहे का उदाहरण देकर कहते हैं कि कठिनाई से वीरता नहीं बनती।
जो दूत सन्धि कराने नहीं आया
अब तक की सारी बातचीत एक-दूसरे की नाप-तौल थी। यहाँ से अंगद वह बात कहते हैं जिसके लिये वे भेजे गये हैं, और उसे कहने से पहले वे बतबढ़ाव को नाम लेकर बन्द करते हैं। जो आगे आता है वह किसी सन्धि की भूमिका नहीं है, वह एक सूचना है।
अब जनि बतबढ़ाव खल करही । सुनु मम बचन मान परिहरही॥
चौपाई ३
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ । अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥
अब यह बतबढ़ाव छोड़िये, मेरा वचन सुनिये और अभिमान त्याग दीजिये। हे दशमुख, मैं बसीठ बनकर नहीं आया हूँ, श्रीरघुवीर ने ऐसा ही विचारकर मुझे भेजा है। दूत आमतौर पर इसीलिये भेजा जाता है कि युद्ध रुक जाय। यह दूत यह कहने आया है कि वह उस काम पर नहीं आया। और साथ ही यह भी दर्ज़ कर देता है कि यह उसका अपना तेवर नहीं है, भेजनेवाले ने सोच-समझकर उसे इसी रूप में भेजा है।
इसके तुरन्त बाद तुलसी वह वाक्य रखते हैं जो इस पूरी सभा में अंगद की लगाम है। कृपालु बार-बार यह कहते हैं कि सियार के मारने से सिंह को यश नहीं मिलता। और अंगद बताते हैं कि प्रभु के उन्हीं वचनों को मन में समझकर उन्होंने यहाँ का सारा कठोर वचन सह लिया है। यानी जितनी देर वे चुप रहे, वह कमज़ोरी नहीं थी, वह एक याद थी। और वह याद सभा को बता दी गयी है, जो अपने-आप में एक चेतावनी है।
फिर वे यह भी कह देते हैं कि उस याद के बिना क्या होता। नहीं तो वे उसके मुँह तोड़कर सीता को बलपूर्वक लिये जाते। और उसी साँस में वह वाक्य आता है जो इस सभा में किसी ने अब तक नहीं कहा था, कि उसका बल तो उसी दिन जान लिया गया था जिस दिन उसने सूने में पराई स्त्री को हर लिया। सारी सभा में यह एकमात्र वाक्य है जो किसी दावे का खण्डन नहीं करता, वह केवल एक तारीख़ याद दिलाता है।
तैं निसिचरपति गर्ब बहूता । मैं रघुपति सेवक कर दूता॥
चौपाई ४
जौं न राम अपमानहि डरऊँ । तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥
वह राक्षसों का राजा है और बहुत बड़ा अभिमानी है, और अंगद कहते हैं कि वे तो श्रीरघुनाथ के सेवक के दूत हैं। इस एक पंक्ति में जो सीढ़ी बनी है उसे धीरे से देखिये। सबसे ऊपर राम हैं। उनके सेवक सुग्रीव हैं। और बोलनेवाला उन सेवक का दूत है। यानी वह अपने को तीन पायदान नीचे रखकर बोल रहा है, और यही इस सभा में उसका सबसे भारी वार सिद्ध होता है, क्योंकि सामने जो बैठा है उसकी सारी शक्ति अपने को सबसे ऊपर रखने में लगी हुई है।
और उसी चौपाई का दूसरा आधा एक शर्त की तरह आता है। यदि वे राम के अपमान से न डरते, तो उसके देखते-देखते ऐसा कौतुक कर देते कि, और यह वाक्य दोहे में जाकर पूरा होता है। उसे ज़मीन पर पटककर, उसकी सेना का संहार करके, उसका गाँव चौपट करके, उसकी युवती स्त्रियों समेत जानकी को उठा ले जाते। यह पूरा दृश्य इस पन्ने पर केवल इसलिये आता है कि बताया जा सके कि यह नहीं किया जायगा।
और फिर वे स्वयं इसका कारण गिनाते हैं, कि ऐसा कर भी लेते तो उसमें कोई बड़ाई नहीं थी, क्योंकि मरे हुए को मारने में कोई पुरुषार्थ नहीं होता। इसके बाद वह सूची आती है जिसमें चौदह ऐसे प्राणी गिनाये गये हैं जो जीते जी मुरदे के समान हैं। वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा, नित्य का रोगी, निरन्तर क्रोध में रहनेवाला, विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोसनेवाला, दूसरों की निन्दा करनेवाला, और पाप की खान।
इस सूची में गिनने लायक़ बात यह है कि इसमें दुर्बलता और दुष्टता साथ-साथ रखी गयी हैं। बुढ़ापा और रोग भी हैं, लोभ और काम भी हैं, और वेद तथा संतों का विरोध भी है। अंगद यह नहीं कहते कि सामने बैठा आदमी इनमें से कौन है। वे सूची पढ़कर छोड़ देते हैं और आगे कहते हैं कि ऐसा विचार करके ही वे उसे नहीं मार रहे, और अब वह उनके भीतर क्रोध न जगाये। सभा को गिनती अपने-आप करनी है।
यहाँ पहली बार रावण का शरीर प्रतिक्रिया करता है। वह दाँतों से अपना होठ काटता है और हाथ मलता हुआ बोलता है। जो आदमी अब तक हँस रहा था और गिनती गिना रहा था, उसे अब हाथ मलने पड़ रहे हैं। उसकी बात भी बदल जाती है। वह कहता है कि यह वानर मरना चाहता है, इसीलिये छोटे मुँह बड़ी बात कर रहा है, और जिसके बल पर यह बक रहा है उसमें बल, प्रताप, बुद्धि और तेज कुछ भी नहीं है।
और इकतीसवें दोहे में वह उस बात पर उतर आता है जो किसी भी सभा में सबसे नीचे की बात होती है, किसी और के दुख को गिनाना। उसका कहना है कि गुणहीन और मानहीन जानकर ही पिता ने उसे वनवास दिया, और उसे एक तो वही दुख है, ऊपर से युवती स्त्री का विरह है, और फिर रात-दिन उसका अपना डर बना रहता है। और दोहे का दूसरा आधा इससे भी नीचे उतरता है, कि जिनके बल का इसे गर्व है ऐसे मनुष्यों को तो राक्षस दिन-रात खाया करते हैं, इसलिये ज़िद छोड़कर समझ ले।
सार: अंगद साफ़ कहते हैं कि वे सन्धि कराने नहीं आये, रघुवीर ने यही सोचकर भेजा है। वे बताते हैं कि सियार मारने से सिंह को यश नहीं मिलता, इसी वचन के कारण उन्होंने कठोर बातें सहीं। फिर वे अपने को रघुनाथ के सेवक का दूत कहते हैं और वह सब गिनाते हैं जो वे कर सकते थे पर नहीं करेंगे, क्योंकि मरे हुए को मारने में पुरुषार्थ नहीं। चौदह जीते-जागते मुरदों की सूची सुनकर रावण होठ काटता है और राम की निन्दा पर उतर आता है।
एक निन्दा, और गिरते हुए मुकुट
इस पूरे पन्ने पर अब तक जितना कुछ अंगद के बारे में कहा गया, सब सहा गया। उन्हें बंदर कहा गया, मूर्ख कहा गया, मरने का इच्छुक कहा गया, और वे खड़े रहे। अब जो कहा गया वह उनके बारे में नहीं था, और यहीं सब कुछ बदल जाता है।
जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥
चौपाई ५
हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥
जब उसने श्रीराम की निन्दा की, तब कपिश्रेष्ठ अत्यन्त क्रोधित हुए, क्योंकि जो अपने कानों से हरि और हर की निन्दा सुनता है, उसे गोवध के समान पाप लगता है। ध्यान दीजिये कि तुलसी यहाँ क्रोध का कारण मन में नहीं रखते। वे उसे एक नियम की तरह लिखते हैं और उसके बाद उस नियम पर चलते हुए एक आदमी को दिखाते हैं। यानी यह क्रोध स्वभाव का नहीं है, आचरण का है।
और वह नियम एक साथ दो नाम लेता है, हरि और हर। सभा में निन्दा एक की हुई थी। पंक्ति दोनों को एक कोष्ठ में रख देती है, और इस काण्ड में यह जोड़ बार-बार लौटता है। जो बात यहाँ सबसे मारक है वह यह कि पाप सुननेवाले को लगता है। कहनेवाले का हिसाब अलग है। इसीलिये अंगद को कुछ करना ही है, केवल नाराज़ होकर बैठ जाना यहाँ उपाय नहीं है।
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥
चौपाई ६
डोलत धरनि सभासद खसे । चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥
वानरों का वह महान् गजराज ज़ोर से कटकटाया और उसने तमककर अपने दोनों भुजदण्ड पृथ्वी पर दे मारे। धरती डोलने लगी, बैठे हुए सभासद् गिर पड़े, और भय रूपी पवन से ग्रसे हुए भाग चले। यहाँ जो सबसे ध्यान देने की बात है वह यह कि अंगद किसी को छूते नहीं। वे फ़र्श पर मारते हैं। सभा अपने-आप गिरती है, और अपने-आप भागती है।
यह चुनाव अकेला नहीं है। दूत का धर्म यही है कि वह हाथ न उठाये, और इस पूरे प्रसंग में अंगद वह धर्म एक बार भी नहीं तोड़ते। जो कुछ वे करते हैं, वह ज़मीन पर करते हैं। पहले दोनों भुजाएँ ज़मीन पर, और थोड़ी देर बाद एक चरण ज़मीन पर। दोनों बार असर आदमियों पर पड़ता है और चोट किसी को नहीं लगती।
गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥
चौपाई ७
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे । कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥
रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा, और उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ उसने उठाकर अपने सिरों पर फिर से सजा लिये, और कुछ अंगद ने उठाकर प्रभु के पास फेंक दिये। दो क्रियाएँ आमने-सामने रखी गयी हैं और दोनों एक ही चौपाई में हैं। एक आदमी अपना गिरा हुआ मुकुट उठाकर वापस सिर पर रख रहा है। दूसरा वही चीज़ उठाकर समुद्र पार फेंक रहा है।
इसी काण्ड में ठीक पिछली रात एक बाण ने इसी आदमी का छत्र, मुकुट और उसकी पत्नी के कर्णफूल काटकर गिराये थे, और तब किसी ने नहीं जाना था कि वह क्या था। अब वही सिर फिर खाली हुआ है, और इस बार सबके सामने। पहली बार वह रहस्य था, इस बार वह घटना है, और घटना का गवाह पूरा दरबार है।
मुकुटों का आगे का सफ़र तुलसी अलग से लिखते हैं, और वहाँ हँसी है। उन्हें आते देखकर उधर के वानर भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि दिन में ही उल्कापात होने लगा, या रावण ने क्रोध करके चार वज्र चला दिये हैं जो बड़े वेग से चले आ रहे हैं। समुद्र के इस पार का भय समुद्र के उस पार पहुँचकर एक ग़लतफ़हमी में बदल जाता है।
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू । लूक न असनि केतु नहिं राहू॥
चौपाई ८
ए किरीट दसकंधर केरे । आवत बालितनय के प्रेरे॥
प्रभु ने हँसकर कहा कि मन में डरो नहीं, ये न उल्का हैं, न वज्र, न केतु और न राहु। ये तो दशकन्धर के मुकुट हैं, जो बालिपुत्र के फेंके हुए आ रहे हैं। एक ही वस्तु दो डेरों में दो चीज़ें है। लङ्का में वह राजा का सिरमौर थी, सुवेल पर वह एक कौतुक है। और पहचाननेवाला वही है जिसने पिछली रात दक्षिण दिशा का उजाला देखकर मौसम की बात छेड़ी थी।
आगे तुलसी दो पंक्तियों में वह काम पूरा करते हैं। पवनपुत्र ने उछलकर उन्हें हाथ से पकड़ लिया और लाकर प्रभु के पास रख दिया, और रीछ-वानर तमाशा देखते रहे, क्योंकि उनका प्रकाश सूर्य के समान था। जिस चीज़ से एक सभा गिरी थी, वह अब दूसरी सेना के बीच में एक चमकती हुई चीज़ की तरह पड़ी है। और उसी दोहे का दूसरा आधा हमें फिर उसी सभा में ले जाता है, जहाँ क्रोध में भरा रावण सबसे कह रहा है कि बंदर को पकड़ लो और पकड़कर मार डालो, और अंगद यह सुनकर मुसकरा रहे हैं।
सार: राम की निन्दा सुनते ही अंगद क्रोधित होते हैं, क्योंकि हरि और हर की निन्दा कानों से सुनना गोवध के समान पाप है। वे दोनों भुजदण्ड पृथ्वी पर मारते हैं, धरती डोलती है और सभासद् गिरकर भाग खड़े होते हैं। रावण सँभलकर उठता है, उसके मुकुट गिर पड़ते हैं, कुछ वह फिर सिर पर रखता है और कुछ अंगद प्रभु की ओर फेंक देते हैं। उधर वानर उन्हें उल्का या वज्र समझकर भागते हैं, राम हँसकर बताते हैं कि ये रावण के मुकुट हैं, और हनुमान उन्हें उछलकर पकड़ लेते हैं।
गूलर का फल
पकड़ने का आदेश देकर रावण रुकता नहीं। वह उससे बड़ा आदेश देता है, और उस आदेश में पहली बार उसकी असली योजना खुलती है। सब योद्धा तुरन्त दौड़ें, जहाँ कहीं रीछ और वानर मिलें वहीं खा डालें, पृथ्वी को वानरों से रहित कर दें, और दोनों तपस्वी भाइयों को जीता पकड़ लें। ध्यान दीजिये कि वह मारने को नहीं कहता, जीता पकड़ने को कहता है, और यही बात सबसे ठंडी है।
युवराज का उत्तर अब पहले जैसा नहीं रहता। इस बार उसमें व्यंग्य नहीं है। वे कहते हैं कि गाल बजाते हुए उसे लाज नहीं आती, कि वह निर्लज्ज और कुलघाती गला काटकर मर जाय, और कि इतना बल देखकर भी उसकी छाती नहीं फटती। यह वही आदमी है जिसने अभी-अभी चौदह मुरदों की सूची पढ़ते हुए भी किसी का नाम नहीं लिया था। निन्दा सुनने के बाद वह रियायत ख़त्म हो चुकी है।
आगे की पंक्तियाँ और सीधी हैं। स्त्री का चोर, कुमार्ग पर चलनेवाला, पाप की राशि, मन्दबुद्धि, कामी। और फिर वह शब्द आता है जो इस पूरे काण्ड की कुंजी है, कि वह सन्निपात में बक रहा है और काल के वश हो चुका है। यह शब्द इसी काण्ड में पहले भी एक बार कहा जा चुका है, और तब वह उसकी अपनी पत्नी ने अपने मन में कहा था। अब वही बात एक शत्रु के मुँह से भरी सभा में कही जा रही है, और दोनों बार निशाना एक ही है।
इसके बाद अंगद एक भविष्यवाणी करते हैं जो आगे के काण्ड का नक़्शा है। इसका फल उसे तब मिलेगा जब वानरों और भालुओं के चपेटे पड़ेंगे। और राम को मनुष्य कहते हुए उसकी जीभें गिर क्यों नहीं पड़तीं। फिर वे स्वयं उत्तर दे देते हैं कि गिरेंगी, इसमें सन्देह नहीं, और अकेली नहीं गिरेंगी, सिरों के साथ रणभूमि में गिरेंगी।
उसी सिलसिले में वह सोरठा आता है जिसमें बालि का नाम फिर लौटता है, कि जिसने एक ही बाण से बालि को मार डाला वह मनुष्य कैसे हुआ, और बीस आँखें होने पर भी वह अन्धा है, उसके जन्म को धिक्कार है। यह अकेली जगह है जहाँ अंगद अपने पिता की मृत्यु को प्रमाण की तरह रखते हैं। जिस घटना ने उनका घर उजाड़ा था, वही इस सभा में उनके स्वामी के पक्ष का सबसे कड़ा सबूत है, और वे उसे बिना काँपे रख देते हैं।
आगे वे अपनी विवशता भी कह देते हैं। वे उसके दाँत तोड़ने में समर्थ हैं, पर रघुनाथ ने आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि दसों मुँह तोड़ डालें और लङ्का को पकड़कर समुद्र में डुबा दें। यह तीसरी बार है जब इस पन्ने पर वही ढाँचा लौटता है, पहले वे बताते हैं कि क्या कर सकते हैं, फिर बताते हैं कि क्यों नहीं करेंगे। और हर बार कारण एक ही है, किसी और की आज्ञा।
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥
चौपाई ९
मैं बानर फल खात न बारा । आयसु दीन्ह न राम उदारा॥
उसकी लङ्का गूलर के फल के समान है, और सब उसके भीतर निडर होकर बसे हुए हैं जैसे फल के भीतर कीड़े। और कहनेवाला बंदर है, उसे यह फल खाते क्या देर लगती। पर उदार राम ने वैसी आज्ञा नहीं दी। गूलर का फल इस उपमा के लिये इसीलिये चुना गया है कि उसे सब जानते हैं। ऊपर से वह भरा-पूरा और सुन्दर दीखता है, और भीतर एक पूरी दुनिया रहती है जिसने कभी बाहर नहीं देखा।
उपमा का असली डंक इसी में है। भीतर के कीड़े को यह नहीं पता कि वह फल के भीतर है। उसके लिये वही फल पूरा संसार है, और उसी में उसकी निर्भयता है। सोने की लङ्का, उसका दरबार, उसके योद्धा और उसका राजा, सब उस निर्भयता के भीतर बैठे हैं। और बाहर एक हाथ है जिसे रोककर रखा गया है।
इस पर रावण मुसकराता है, और उसका उत्तर तर्क नहीं है, तुलना है। वह कहता है कि इतना झूठ बोलना कहाँ से सीखा, बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा, तपस्वियों से मिलकर यह लबार हो गया है। तीसरी बार उस पिता का नाम इस सभा में आता है, और तीनों बार वह किसी और के मुँह से आया है। पहले अंगद ने व्यंग्य में लिया, फिर सोरठे में प्रमाण की तरह, और अब उनका शत्रु उसे बेटे के विरुद्ध खड़ा कर रहा है।
सार: रावण आदेश देता है कि योद्धा दौड़कर रीछ-वानरों को खा जायँ और दोनों तपस्वी भाइयों को जीता पकड़ लें। अंगद अब खुलकर कहते हैं कि वह निर्लज्ज, कुलघाती, स्त्री का चोर और काल के वश हुआ है, और यह भी कि उसकी जीभें सिरों के साथ रणभूमि में गिरेंगी। सोरठे में वे पूछते हैं कि जिसने एक बाण से बालि को मारा वह मनुष्य कैसे हुआ। फिर वे लङ्का को गूलर का फल बताते हैं और कहते हैं कि आज्ञा न होने से ही वह बची है। रावण मुसकराकर कहता है कि बालि ने कभी ऐसा गाल नहीं मारा।
सभा के बीच एक चरण
पिता की तुलना सुनकर अंगद जो करते हैं, वह इस पन्ने का मोड़ है। वे उस तुलना का उत्तर नहीं देते। वे एक प्रतिज्ञा करते हैं, और प्रतिज्ञा के साथ एक पाँव रखते हैं।
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा । जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥
चौपाई १०
समुझि राम प्रताप कपि कोपा । सभा माझ पन करि पद रोपा॥
बीस भुजाओंवाले, सचमुच मैं लबार ही हूँ यदि आपकी दसों जीभें मैंने उखाड़ न लीं। और इसके बाद वह पंक्ति आती है जिस पर पूरा दृश्य टिका है। श्रीराम के प्रताप को याद करके वानर क्रोधित हुआ और सभा के बीच प्रण करके उसने पैर रोप दिया। यहाँ शब्दों का क्रम बहुत काम का है। पहले याद, फिर क्रोध, फिर प्रण, और तब पाँव।
यह अन्तर छोटा नहीं है। पूरे पन्ने पर अंगद को अपने बारे में जो कुछ कहा गया उससे कोई हरकत नहीं हुई। जो दो बार हुई, दोनों बार किसी और की याद से हुई। पहली बार निन्दा सुनकर भुजाएँ ज़मीन पर पड़ीं, दूसरी बार प्रताप याद करके चरण ज़मीन पर जमा। बीच के सारे अपमान उनके ऊपर से बह गये।
जौं मम चरन सकसि सठ टारी । फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥
चौपाई ११
सुनहु सुभट सब कह दससीसा । पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥
यदि यह चरण हटाया जा सके तो राम लौट जायँगे और सीता हार दी जायँगी। यह शर्त ध्यान से पढ़ने लायक़ है, क्योंकि इसमें दाँव पर अंगद का जीवन नहीं है। दाँव पर पूरा अभियान है। जो सेना बाहर खड़ी है और जिस काम के लिये चलकर आयी है, वह सब एक पाँव के नीचे रख दिया गया है, और वह भी एक ऐसे आदमी के द्वारा जिसे यह अधिकार किसी ने नहीं दिया था।
और सामने से जो उत्तर आता है, वही उसकी असली जीत है। रावण सब वीरों से कहता है कि पैर पकड़कर इस बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो। वह मारने को नहीं कहता, उठाने को कहता है। यानी शर्त मान ली गयी। जिस क्षण एक राजा अपनी सभा को यह कहता है, उसी क्षण उस सभा में और कोई प्रश्न नहीं बचता, केवल यह बचता है कि वह पाँव उठेगा या नहीं।
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥
चौपाई १२
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई । पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥
इन्द्रजीत आदि अनेकों बलवान् जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से और बहुत-से उपाय करके झपटते हैं, पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके बैठ जाते हैं। क्रम यहीं से शुरू होता है और वही इस दृश्य की जान है। सबसे पहला नाम लङ्का का सबसे बड़ा नाम है, और वह उसी पंक्ति में आदिक के साथ बँधकर आता है, यानी उसके पीछे और भी हैं। पहला प्रयास हर्ष से होता है, यह भी तुलसी लिख देते हैं।
एक और चीज़ पर रुकिये। बहुत-से उपाय किये जाते हैं। यानी यह केवल ताक़त की बात नहीं रह गयी, इसमें तरकीबें भी लगायी जा रही हैं। और हारने के बाद जो होता है वह हर बार एक ही है, सिर नीचा और अपनी जगह वापस। किसी को सभा से निकाला नहीं जाता, कोई दण्ड नहीं मिलता। वे बस लौटकर बैठ जाते हैं, और यह लौटकर बैठना इस दृश्य की सबसे शान्त क्रूरता है।
फिर वे उठकर दुबारा झपटते हैं, और वह भी टलता नहीं। यहाँ तुलसी कथा से बाहर निकलकर सुननेवाले को सम्बोधित करते हैं, और उपमा देते हैं कि जैसे विषयों में डूबा हुआ कुयोगी मोहरूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकता, वैसे ही यह चरण इनसे नहीं टलता। इस उपमा में पासे पलट जाते हैं। अभी तक जो सभा ज़ोर लगा रही थी, उपमा में वह जड़ पकड़ी हुई हो जाती है, और जो पाँव ज़मीन पर है वह वह चीज़ बन जाता है जिसे कोई अपने बल से नहीं हटा सकता।
कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।
दोहा ३४ (क)
झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥ ३४ (क)॥
भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ ३४ (ख)॥
अब गिनती आती है। करोड़ों ऐसे योद्धा उठे जो बल में मेघनाद के समान थे। वे बार-बार झपटते हैं, वानर का चरण नहीं उठता, और वे सिर नवाकर बैठ जाते हैं। पहले एक नाम था, अब एक संख्या है, और संख्या उस नाम को माप की तरह इस्तेमाल करती है। लङ्का का सबसे बड़ा योद्धा अब एक इकाई भर है जिससे करोड़ों को नापा जा रहा है, और करोड़ों का नतीजा वही है जो एक का था।
और इसी दोहे का दूसरा आधा वह उपमा देता है जो पूरे दृश्य को ठहरा देती है, कि जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत का मन नीति नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर का चरण पृथ्वी नहीं छोड़ता। और वहीं वह वाक्य भी है जो इस पूरे उद्यम का हिसाब कर देता है, कि यह देखकर शत्रु का मद जाता रहा। पाँव अभी तक उठा नहीं है, पर घमण्ड उतर चुका है।
सार: अंगद प्रण करते हैं कि रावण की दसों जीभें उखाड़ लेंगे, और राम का प्रताप याद करके सभा के बीच चरण रोप देते हैं। शर्त यह कि चरण हट जाय तो राम लौट जायँ और सीता हारी हुई मानी जाय। रावण अपने वीरों को पैर पकड़कर पछाड़ने का आदेश देता है। इन्द्रजीत आदि बलवान् उठते हैं, बहुत उपाय करके झपटते हैं और सिर नीचा करके बैठ जाते हैं। फिर मेघनाद के समान करोड़ों योद्धा उठते हैं और वही होता है, और यह देखकर शत्रु का मद जाता रहता है।
और तब लङ्कापति स्वयं उठा
अब सभा में कोई नहीं बचा। क्रम पूरा हो चुका है। पहले नाम गया, फिर संख्या गयी, और दोनों उसी तरह लौटे जिस तरह गये थे। जो एक आदमी अब तक नहीं उठा था, वह वही है जिसकी यह सभा है और जिसकी आज्ञा से यह सब हो रहा था। और वह भी अपनी मरज़ी से नहीं उठता।
कपि बल देखि सकल हियँ हारे । उठा आपु कपि कें परचारे॥
चौपाई १३
वानर का बल देखकर सब हृदय में हार गये, और तब वह स्वयं उठा, वानर के ललकारने पर। परचारे, यानी पुकारकर बुलाया जाना। पूरे काण्ड में यह पहला अवसर है जब लङ्कापति अपने सिंहासन से उतरकर अपने हाथों कोई काम करने आता है, और वह काम एक बंदर का पाँव उठाना है। दस सिर, बीस भुजाएँ, और उसकी अपनी सभा के फ़र्श पर एक चरण।
इसके बाद जो होता है वह दो टुकड़ों में होता है, और पहला टुकड़ा झुकना है। वह चरण पकड़ने के लिये नीचे हाथ बढ़ाता है, और उसी समय बालिकुमार उससे कहते हैं कि उनका चरण पकड़ने से उसका बचाव नहीं होगा। इस वाक्य में लड़ाई नहीं है। इसमें यह सूचना है कि जिस काम के लिये हाथ बढ़ाया गया है, वह काम गिनती में ही नहीं आता।
गहसि न राम चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥
चौपाई १४
और फिर वह पंक्ति आती है जिसके लिये यह पूरा दृश्य रचा गया है। जाकर राम के चरण क्यों नहीं पकड़ते। यह सुनकर वह मन में बहुत सकुचाकर लौट गया। अंगद यह नहीं कहते कि यह पाँव उठ नहीं सकता। वे यह कहते हैं कि हाथ ग़लत चरण पर है। और यह बात ठीक उसी क्षण कही जाती है जब वह पहले ही झुक चुका है। झुकना हो चुका, पता केवल बदलना है।
इसी से वह लौट जाता है और इसी से वह हार जाता है। जिस सभा में वह बंदर को पछाड़ने का आदेश दे चुका था, उसी सभा के बीच में उसे बिना कुछ किये सीधा होकर वापस जाना पड़ता है। तुलसी उसकी हालत एक उपमा में रख देते हैं। वह तेजहीन हो गया, उसकी सारी शोभा चली गयी, जैसे दोपहर में चन्द्रमा दिखायी देता है। चन्द्रमा गया नहीं है, वह आकाश में है, बस उसका दीखना बेकार हो गया है।
वह सिर नीचा करके सिंहासन पर जा बैठता है, मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो। और यहीं तुलसी कारण भी लिख देते हैं, कि राम जगत् भर के आत्मा और प्राणों के स्वामी हैं, उनसे विमुख रहनेवाला विश्राम कैसे पा सकता है। यह वाक्य सिंहासन पर बैठे हुए आदमी के ऊपर रखा गया है, और सिंहासन इस पूरे पन्ने पर विश्राम की जगह नहीं रह जाता।
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥
चौपाई १५
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई । तासु दूत पन कहु किमि टरई॥
हे उमा, जिनके भौंहों के इशारे से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाश को प्राप्त होता है, जो तिनके को वज्र और वज्र को तिनका बना देते हैं, उनके दूत का प्रण भला कैसे टल सकता है। यह पंक्ति पूरे दृश्य का हिसाब है। पाँव अंगद के बल से नहीं जमा था। जो बात करोड़ों योद्धा नहीं हिला पाये, वह बल नहीं था, वह एक प्रण था, और प्रण उसका था जो दूत बनकर आया है।
और उपमा जो चुनी गयी है वह ठीक इसी सभा के काम की है। तिनका और वज्र। जो सबसे हल्का है उसे भारी कर देना और जो सबसे भारी है उसे हल्का कर देना। इस सभा में सबसे हल्की चीज़ एक वानर का पाँव थी और सबसे भारी चीज़ करोड़ों योद्धाओं का बल। दोनों की तौल इस पन्ने पर उलट गयी, और तुलसी बता देते हैं कि तौल किसके हाथ में है।
सार: सब हारकर बैठ जाते हैं और अंगद की ललकार पर रावण स्वयं उठता है। वह चरण पकड़ने झुकता है और सुनता है कि चरण पकड़ने से उसका बचाव नहीं होगा, और फिर यह कि जाकर राम के चरण क्यों नहीं पकड़ता। वह मन में सकुचाकर लौट जाता है, तेजहीन होकर, जैसे दोपहर का चन्द्रमा, और सिर नीचा करके सिंहासन पर बैठ जाता है। तुलसी कहते हैं कि जो तिनके को वज्र और वज्र को तिनका कर देते हैं, उनके दूत का प्रण टल नहीं सकता।
और फिर वह उठकर चल दिया
पाँव उठा लेने के बाद अंगद जो करते हैं, उसकी उम्मीद कोई नहीं करेगा। वे विजय की घोषणा नहीं करते। वे फिर से समझाने बैठ जाते हैं। अनेकों प्रकार से नीति कही जाती है, और वह नीति उसी आदमी को सुनायी जाती है जो अभी-अभी सारी सभा के सामने नीचा देखकर बैठा है।
और वह नहीं मानता। तुलसी कारण भी साथ ही लिख देते हैं, कि उसका काल निकट आ गया था। इस पन्ने पर यह दूसरी बार है जब काल का नाम उसके साथ जोड़ा गया है। पहली बार अंगद ने क्रोध में कहा था, अब कथा कहनेवाला शान्ति से कह रहा है। बीच में एक पूरा दृश्य पड़ा है जिसमें करोड़ों योद्धा हारकर बैठ गये, और उस दृश्य के बाद यह वाक्य किसी गाली की तरह नहीं, एक निदान की तरह पढ़ा जाता है।
शत्रु का गर्व चूरकर अंगद उसे प्रभु का सुयश सुनाते हैं। यह क्रम भी बताने लायक़ है। पहले गर्व टूटा, फिर सुयश सुनाया गया। पूरी सभा में इससे पहले उन्होंने राम की महिमा एक बार भी सीधे नहीं गायी थी। उन्होंने केवल अपने को छोटा बताया था और अपनी आज्ञा गिनायी थी। महिमा का समय तब आया जब सुननेवाले के पास सुनने के सिवा कुछ नहीं बचा।
और चलते-चलते वे एक वाक्य छोड़ जाते हैं, कि रणभूमि में खेला-खेलाकर मारे बिना वे अभी क्या बड़ाई करें। यानी जो काम बाक़ी है उसे वे बड़ाई में नहीं बदलेंगे। और ठीक उसी जगह तुलसी एक ब्योरा चुपचाप रख देते हैं, कि अंगद उससे पहले ही उसके एक पुत्र को मार चुके थे, और वह समाचार सुनकर रावण दुखी हो गया। मूल यहाँ उस पुत्र का नाम नहीं लेता।
यह ब्योरा जिस जगह रखा गया है वह उसकी असली चोट है। सारी सभा पाँव के तमाशे में लगी थी, और इसी बीच एक और ख़बर उस घर तक पहुँच चुकी थी। जो राजा अपनी सभा में यह सिद्ध नहीं कर पाया कि वह एक पाँव उठा सकता है, वही अब यह सुनता है कि उसके घर में एक जगह ख़ाली हो चुकी है। और उसके बाद तुलसी एक पंक्ति में सारी लङ्का की हालत लिख देते हैं, कि अंगद का प्रण देखकर सब राक्षस भय से अत्यन्त व्याकुल हो गये।
रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।
दोहा ३५ (क)
पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥ ३५ (क)॥
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।
मंदोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ॥ ३५ (ख)॥
शत्रु के बल का मर्दन करके, हर्षित होकर, बल की राशि बालिपुत्र ने आकर श्रीराम के चरणकमल पकड़ लिये। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों में जल भरा हुआ है। पूरा पन्ना एक ऐसे चरण की कथा रहा है जिसे कोई हाथ से नहीं हिला सका, और वह इस पर आकर समाप्त होता है कि वही आदमी दो चरण अपने हाथों से पकड़ लेता है। एक जगह हाथ चरण तक पहुँचे थे और लौट गये थे। यहाँ हाथ पहुँचते हैं और टिक जाते हैं।
और आँसू पर एक पल रुकना चाहिये, क्योंकि इस पूरे प्रसंग में यह अकेली नमी है। जो युवक अकेला शत्रु की सभा में गया, वहाँ अपने पिता का नाम तीन बार सुना, अपनी मृत्यु की धमकी सुनी, अपने स्वामी की निन्दा सुनी और एक बार भी नहीं डिगा, वह लौटकर चरणों में पहुँचते ही रो पड़ता है। जहाँ रोया जा सकता है, उसी जगह का नाम घर है।
और इसी दोहे का दूसरा आधा उधर की साँझ पर पर्दा गिरा देता है। साँझ हुई जानकर दशग्रीव विलखता हुआ अपने महल की ओर चला जाता है, और मन्दोदरी उसे समझाकर फिर कहती है। यानी वही स्त्री, वही कमरा और वही बात, दूसरी बार। अगला प्रसंग वहीं से उठेगा।
सार: पाँव हटाने के बाद अंगद फिर नीति समझाते हैं, पर रावण नहीं मानता क्योंकि उसका काल निकट है। गर्व चूरकर वे उसे प्रभु का सुयश सुनाते हैं और यह कहकर चल देते हैं कि रणभूमि में मारे बिना अभी क्या बड़ाई। तभी यह भी खुलता है कि वे पहले ही उसके एक पुत्र को मार चुके थे, जिसका नाम मूल यहाँ नहीं लेता, और वह समाचार सुनकर रावण दुखी होता है। लौटकर अंगद राम के चरणकमल पकड़ लेते हैं, शरीर पुलकित और नेत्रों में जल।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने की सबसे बड़ी चाल वह शर्त है, और उसका गणित देखने लायक़ है। अंगद ने दाँव पर अपनी जान नहीं रखी, पूरा अभियान रख दिया। यदि कोई एक योद्धा वह चरण हटा देता तो सेना लौट जाती। ऊपर से यह लापरवाही दीखती है। पर उस शर्त ने वही किया जो युद्ध से पहले सबसे ज़रूरी था, उसने सामनेवाले को अपनी ही सभा के बीच में अपनी ताक़त गिनकर दिखाने पर मजबूर कर दिया, और गिनती सबके सामने पूरी हो गयी। जो सेना अगले दिन लड़नेवाली है, उसने अपनी हार का पहला नमूना अपने ही दरबार में देख लिया।
और वह क्रम, जिसमें लोग हारते हैं, स्वयं एक दलील है। पहले लङ्का का सबसे बड़ा नाम, फिर उसी नाम से नापे गये करोड़ों, फिर वह सभा जो हृदय में हार गयी, और अन्त में वह आदमी जिसके नाम पर यह सब चल रहा था। हर पायदान पर वही होता है, झपटना, न हिलना, सिर नवाकर बैठ जाना। सीढ़ी नीचे से ऊपर चढ़ती है और चोटी पर पहुँचकर भी वही उत्तर देती है। इसके बाद कहने को कुछ नहीं बचता, और इसीलिये अंगद को कुछ करना नहीं पड़ता।
आख़िर में दो वाक्य बचते हैं और दोनों चरण पकड़ने के बारे में हैं। एक वह जो झुके हुए आदमी से कहा गया कि इस चरण को पकड़ने से बचाव नहीं होगा। दूसरा वह जो उसी साँस में कहा गया कि जाकर राम के चरण पकड़ लीजिये। दोनों में क्रिया एक ही है और दोनों में पता अलग है। इस पन्ने पर जो कुछ हुआ, उसका सारा भेद इतना ही है कि एक चरण को हराने के लिये पकड़ा जा रहा था और दूसरा चरण बचने के लिये पकड़ा जाना था, और लङ्का में यह अन्तर समझनेवाला उस दिन कोई नहीं था।
लङ्काकाण्ड का यह हिस्सा पढ़ते हुए बार-बार यह लगता है कि तुलसी युद्ध को टाल नहीं रहे, उसे तौल रहे हैं। पूरे प्रसंग में एक भी अस्त्र नहीं चलता। जो चलता है वह बोली है, और बोली के बाद एक पाँव, और पाँव के बाद एक सवाल जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है। दोनों पक्ष अगले दिन जिस चीज़ पर उतरेंगे, उसका पूरा फ़ैसला यहाँ एक कमरे के भीतर हो चुका है, और उस फ़ैसले में किसी का ख़ून नहीं बहा।
और जो देर तक साथ रहता है वह वह नौजवान है जो अकेला भीतर गया था। उसने वहाँ अपने पिता का नाम तीन बार सुना, एक बार व्यंग्य में, एक बार अपने ही मुँह से प्रमाण की तरह, और एक बार अपने विरुद्ध। उसने अपने स्वामी की निन्दा सुनी और अपनी मृत्यु की घोषणा सुनी। उसने वह सब कर दिखाया जिसके लिये भेजा गया था, और लौटकर उसने कोई ख़बर नहीं सुनायी। वह सीधे चरणों पर झुक गया और उसकी आँखें भर आयीं, और यही इस पन्ने का सबसे चुपचाप कहा गया वाक्य है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा २९ से ३५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।