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रामचरितमानसलङ्काकाण्डप्रसंग 5
अंगद का पाँव, और वह सभा जो उसे हिला न सकी
रावण की भरी सभा में बालि का बेटा एक शर्त रखता है। वह अपना चरण ज़मीन पर रोप देता है। इन्द्रजीत से लेकर स्वयं रावण तक कोई उसे उठा नहीं पाता।
कथा यहाँ एक बोलते हुए आदमी के बीच से उठती है। पिछला प्रसंग वहाँ छूटा था जहाँ रावण अपनी गिनती गिना रहा था। उसका ऊँचा दावा यह था कि उसने अपने ही हाथों अपने सिर काटकर अग्नि में होम दिये हैं। यहाँ वह उसी दावे को आगे बढ़ाता है, और बात एक हँसी पर आकर रुकती है। न कोई नया दृश्य बँधता है, न पर्दा गिरता है। जो बोल रहा था वह अभी बोल ही रहा है। उसके सामने एक जवान वानर खड़ा है जिसे इस सभा ने अभी तक बंदर से अधिक कुछ नहीं माना।
इस प्रसंग की सारी कथा एक ही कमरे में घटती है, और इसमें एक भी अस्त्र नहीं चलता। बोली चलती है, और बोली के बाद एक पाँव। बीचोंबीच वह प्रसिद्ध दृश्य है कि अंगद ने रावण की सभा में अपना चरण रोप दिया और वह किसी से हिला नहीं। पर यह दृश्य उस क्रम से बनता है जिसमें लोग उठते हैं, झपटते हैं, हारते हैं और सिर नीचा करके बैठ जाते हैं: पहले एक नाम, फिर एक संख्या। और अन्त में वह आदमी जिसकी यह सभा है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दूत का जाना दोनों में है, पर यहाँ जो कहा जाता है और जिस क्रम में, वह मानस का अपना है।
दरबार में एक अकेला दूत
- अंगद बालि के पुत्र और वानरों के युवराज, जो इस सभा में अकेले खड़े हैं और जिनका तीखा हथियार उस दरबार में उनकी अपनी छोटाई है।
- रावण लङ्का का राजा, जो अपने ही मुँह से अपने गुण गिनाता है, और अन्त में अपने सिंहासन से उतरकर एक पाँव उठाने आता है।
- राम जो इस पूरे प्रसंग में सभा के भीतर कहीं नहीं हैं, और फिर भी यहाँ का हर वाक्य उन्हीं की ओर से उठता है।
- हनुमान जो आकाश में उछलकर आते हुए मुकुटों को हाथ से पकड़ लेते हैं और लाकर राम के पास रख देते हैं।
- इन्द्रजीत लङ्का के बलवानों में पहला नाम, जिसे टीका मेघनाद बताती है, और जो सबसे पहले उठता है और सबसे पहले बैठ जाता है।
- लङ्का के सभासद वे दरबारी जो एक बार आसन से गिरते हैं, एक बार भागते हैं, और अन्त में सिर नवाकर चुप बैठ जाते हैं।
ललाट पर लिखा हुआ अक्षर, और एक हँसी
सिरों के कटने और अग्नि में जाने की बात अभी हवा में है। रावण उसे एक क़दम आगे ले जाता है: उन सिरों के जलते समय उसने क्या देखा था। यह ब्योरा वह बड़े प्रमाण की तरह रखता है, क्योंकि इसमें विधाता का लिखा अक्षर है, और उसके ऊपर उसकी अपनी हँसी।
रावण कहता है, “जब कपाल जल रहे थे, तब मैंने अपने ललाटों पर विधाता के लिखे अंक देखे। उनमें मनुष्य के हाथ से अपनी मृत्यु लिखी पढ़कर, विधाता की वाणी झूठी जानकर, मैं हँसा।” ठंडी चीज़ हँसी नहीं, यह है कि जो निश्चिन्त दीख रहा है, वही अकेला है जिसे अपना अन्त शब्दों में मिल चुका है।
आगे वह हँसी को समझाता भी है: “उस बात को याद करके भी मेरे मन में त्रास नहीं, क्योंकि बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि के भ्रम में वह लिख दिया।” वह लेख को झूठा नहीं कहता, लिखनेवाले को बूढ़ा कहता है। पुरानी तरकीब यही है, कि जो बात काटी न जा सके उसे कहनेवाले की उम्र पर डाल दिया जाय।
और उसी साँस में वह दूत की ओर मुड़ता है: “मूर्ख, आप लाज और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीर का बल बखानते हैं।” यह आदमी अभी देर तक अपना ही बल बखान चुका है। जो काम उसके लिये गौरव है, वही दूसरे के लिये निर्लज्जता हो जाता है।
लज्जा की एक तारीफ़
अंगद के उत्तर में एक भी गाली नहीं है। वे उलाहने को सिर-आँखों पर लेकर लौटा देते हैं। जो अभी देर तक अपने मुँह से अपने गुण गिन चुका है, उसी से कहा जाता है कि लज्जा में उसका जोड़ संसार में कोई नहीं।
अंगद कहते हैं, “रावण, जगत् में आपके समान लज्जावान् कोई नहीं। लज्जा तो आपका सहज स्वभाव है। आप अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहते।” तीनों वाक्य एक ही दिशा में जाते हैं, और किसी में कड़वा शब्द नहीं। अंगद ने न उसे झूठा कहा, न घमण्डी। बस यह कहा कि वह अपनी तारीफ़ कभी नहीं करता। पूरी सभा को स्वयं याद आ गया कि वह अभी तक क्या कर रहा था।
फिर वे एक और परत खोलते हैं: “सिर काटने और कैलास उठाने की कथा आपके चित्त पर चढ़ी थी, इसीलिये आपने उसे बीसों बार कहा। और भुजाओं के जिस बल से आपने सहस्रबाहु, बलि और बालि को जीता, उसे तो आपने हृदय में ही छिपा रखा।” व्यंग्य वही है, पर इस बार उसके भीतर तीन नाम रख दिये गये हैं।
जिसने अपनी हर जीत गिनायी, उसकी गिनती में ये तीन प्रसंग नहीं आये थे। अंगद उन्हें गिनाते नहीं, उनके न कहे जाने की तारीफ़ करते हैं, और तीनों नाम सभा के कान में पड़ जाते हैं। आख़िरी नाम बालि का है, कहनेवाले के अपने पिता का।
यहाँ व्यंग्य छूटता है और सीधी बात शुरू होती है: “मन्दबुद्धि, सुनिये, अब बस कीजिये। सिर काटने से क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इन्द्रजाल रचनेवाले को वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है।” यह उत्तर ठीक उसी दावे पर पड़ता है जिस पर पिछला प्रसंग समाप्त हुआ था। अंगद घटना को नकारते नहीं। उसे मानकर उसका दर्जा बदल देते हैं, और तमाशा कहकर वीरता की सूची से बाहर कर देते हैं।
बाज़ार में खेल दिखानेवाला भी अपने को काटता हुआ दिखाता है, भीड़ ताली बजाती है, और किसी को नहीं लगता कि उसने वीरता देखी। क्रिया एक है, अर्थ अलग।
“पतंगे मोह के वश आग में जल मरते हैं, गदहों के झुंड बोझ लादकर चलते हैं, पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते। मन्दबुद्धि, समझकर देखिये।” एक उदाहरण में मरना है, दूसरे में सहना, और दोनों बाहर से वही दीखते हैं जिसे आदमी वीरता कहता है: प्राण की परवाह न करना और भार से न घबराना।
अंगद की कसौटी सादी है। काम कितना कठिन है, इससे वीरता तय नहीं होती। किसलिये किया जा रहा है, इससे होती है। पतंगा मोह से जलता है, गदहा विवशता से ढोता है, इन्द्रजाल दिखानेवाला दिखाने के लिये अपने को काटता है। यह कहकर वे मज़ाक़ छोड़ते हैं और अपने आने का कारण बताते हैं।
जो दूत सन्धि कराने नहीं आया
अब तक की बातचीत एक-दूसरे की नाप-तौल थी। यहाँ से अंगद वह बात कहते हैं जिसके लिये वे भेजे गये हैं, और पहले बतबढ़ाव को नाम लेकर बन्द करते हैं। जो आगे आता है वह सन्धि की भूमिका नहीं, एक सूचना है।
“अब बतबढ़ाव न कीजिये। मेरा वचन सुनिये और अभिमान त्याग दीजिये। रावण, मैं सन्धि करानेवाले दूत की तरह नहीं आया हूँ। राम ने ऐसा ही विचारकर मुझे भेजा है।” दूत आमतौर पर इसीलिये भेजा जाता है कि युद्ध रुक जाय। यह दूत कहने आया है कि वह उस काम पर नहीं आया, और यह तेवर भेजनेवाले का सोचा हुआ है।
फिर अंगद वह बात बताते हैं जो इस सभा में उनकी लगाम है: “राम बार-बार कहते हैं कि सियार के मारने से सिंह को यश नहीं मिलता। उनके वचन मन में समझकर ही मैंने आपके कठोर वचन सहे हैं।” जितनी देर वे चुप रहे, वह कमज़ोरी नहीं, एक याद थी, और वह याद सभा को बता दी गयी, जो अपने-आप में एक चेतावनी है।
फिर वे यह भी कह देते हैं कि उस याद के बिना क्या होता: “नहीं तो आपका मुँह तोड़कर मैं सीता को बलपूर्वक ले जाता। आपका बल तो मैंने उसी दिन जान लिया था जिस दिन आप सूने में परायी स्त्री को हर लाये।” यह वाक्य किसी दावे का खण्डन नहीं करता, केवल एक दिन याद दिलाता है।
“आप राक्षसों के राजा और बड़े अभिमानी हैं। मैं तो राम के सेवक का दूत हूँ।” सबसे ऊपर राम, उनके सेवक सुग्रीव, और बोलनेवाला उन सेवक का दूत। वह अपने को तीन पायदान नीचे रखकर बोल रहा है, और यही उसका भारी वार है, क्योंकि सामनेवाले की सारी शक्ति अपने को सबसे ऊपर रखने में लगी है।
फिर एक शर्त आती है: “यदि मैं राम के अपमान से न डरता, तो आपके देखते-देखते ऐसा कौतुक करता। मैं आपको ज़मीन पर पटककर, आपकी सेना का संहार करके, आपका गाँव चौपट करके, आपकी युवती स्त्रियों समेत सीता को ले जाता।” यह पूरा दृश्य केवल यह बताने के लिये आता है कि यह नहीं किया जायगा।
और कारण भी अंगद स्वयं गिनाते हैं: “ऐसा कर भी लूँ, तो उसमें कोई बड़ाई नहीं। मरे हुए को मारने में कोई पुरुषार्थ नहीं।” फिर वह सूची आती है जिसमें चौदह प्राणी जीते जी मुरदे के समान गिनाये गये हैं: वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा। नित्य का रोगी, निरन्तर क्रोधी, विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोसनेवाला, दूसरों की निन्दा करनेवाला, और पाप की खान।
सूची में दुर्बलता और दुष्टता साथ-साथ हैं: बुढ़ापा और रोग भी, लोभ और काम भी, वेद और संतों का विरोध भी। अंगद यह नहीं कहते कि सामने बैठा आदमी इनमें कौन है। वे कहते हैं, “ऐसा विचारकर ही मैं आपको नहीं मारता। अब मुझमें क्रोध न जगाइये।” गिनती सभा को अपने-आप करनी है।
यहाँ पहली बार रावण का शरीर प्रतिक्रिया करता है। वह दाँतों से होठ काटता है और हाथ मलता हुआ बोलता है: “अरे नीच बंदर, अब आप मरना ही चाहते हैं, इसीलिये छोटे मुँह बड़ी बात कहते हैं। जिसके बल पर आप कड़वे वचन बक रहे हैं, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि और तेज कुछ भी नहीं।” जो अब तक हँस रहा था और गिनती गिना रहा था, उसे अब हाथ मलने पड़ रहे हैं।
और फिर वह किसी और के दुख को गिनाने पर उतर आता है: “उसे गुणहीन और मानहीन जानकर ही पिता ने वनवास दिया। उसे एक तो वह दुख है, ऊपर से युवती स्त्री का विरह, और फिर रात-दिन मेरा डर।” अगली बात इससे भी नीचे उतरती है: “जिनके बल का आपको गर्व है, ऐसे अनेक मनुष्यों को राक्षस रात-दिन खाया करते हैं। मूढ़, ज़िद छोड़कर समझिये।”
एक निन्दा, और गिरते हुए मुकुट
इस सभा में अब तक अंगद के बारे में जितना कहा गया, सब सहा गया। उन्हें बंदर कहा गया, मूर्ख कहा गया, मरने का इच्छुक कहा गया, और वे खड़े रहे। अब जो कहा गया वह उनके बारे में नहीं था, और यहीं सब कुछ बदल जाता है।
जब रावण ने राम की निन्दा की, तब अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि जो अपने कानों से हरि और हर, यानी विष्णु और शिव, की निन्दा सुनता है, उसे गोवध के समान पाप लगता है। कथा क्रोध का कारण नियम की तरह कहती है, और फिर उस नियम पर चलते एक आदमी को दिखाती है। यह क्रोध स्वभाव का नहीं, आचरण का है।
नियम दो नाम एक साथ लेता है, जबकि सभा में निन्दा एक की हुई थी। इस काण्ड में यह जोड़ बार-बार लौटता है। और पाप सुननेवाले को लगता है। इसीलिये अंगद को कुछ करना ही है। नाराज़ होकर बैठ जाना यहाँ उपाय नहीं।
अंगद ज़ोर से कटकटाये और तमककर अपने दोनों भुजदण्ड पृथ्वी पर दे मारे। धरती डोलने लगी, बैठे हुए सभासद् गिर पड़े, और भयरूपी पवन से ग्रस्त होकर भाग चले। अंगद किसी को छूते नहीं। वे फ़र्श पर मारते हैं। सभा अपने-आप गिरती है, और अपने-आप भागती है।
दूत का धर्म है कि वह हाथ न उठाये, और अंगद वह धर्म एक बार भी नहीं तोड़ते। जो करते हैं, ज़मीन पर करते हैं, पहले दोनों भुजाएँ, बाद में एक चरण, और दोनों बार असर आदमियों पर पड़ता है, चोट किसी को नहीं लगती।
रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा, और उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ उसने उठाकर अपने सिरों पर फिर सजा लिये, और कुछ अंगद ने उठाकर राम के पास फेंक दिये। एक आदमी गिरा मुकुट उठाकर वापस सिर पर रख रहा है। दूसरा वही चीज़ उठाकर समुद्र पार फेंक रहा है।
पिछली रात एक बाण ने इसी आदमी का छत्र, मुकुट और उसकी पत्नी के कर्णफूल गिराये थे। तब किसी ने नहीं जाना था कि वह क्या था। अब वही सिर फिर ख़ाली हुआ है, सबके सामने। पहली बार रहस्य, इस बार घटना, जिसका गवाह पूरा दरबार है।
मुकुटों के आगे के सफ़र में हँसी है। उन्हें आते देखकर उधर के वानर भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि दिन में ही उल्कापात होने लगा, या रावण ने क्रोध करके चार वज्र चला दिये हैं जो बड़े वेग से चले आ रहे हैं। समुद्र के इस पार का भय उस पार पहुँचकर एक ग़लतफ़हमी बन जाता है।
राम ने हँसकर कहा, “मन में डरिये नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र, न केतु, न राहु। ये तो रावण के मुकुट हैं, जो बालिपुत्र के फेंके हुए आ रहे हैं।” लङ्का में जो राजा का सिरमौर था, सुवेल पर वह एक कौतुक है।
हनुमान ने उछलकर उन्हें हाथ से पकड़ लिया और लाकर राम के पास रख दिया। रीछ-वानर तमाशा देखते रहे, क्योंकि उनका प्रकाश सूर्य के समान था। फिर कथा उसी सभा में लौटती है। वहाँ क्रोध में भरा रावण सबसे कह रहा है कि बंदर को पकड़कर मार डाला जाय। अंगद यह सुनकर मुसकरा रहे हैं।
गूलर का फल
पकड़ने का आदेश देकर रावण रुकता नहीं। वह उससे बड़ा आदेश देता है, और उसमें पहली बार उसकी असली योजना खुलती है: “इसे मारकर सब योद्धा तुरन्त दौड़ें। जहाँ कहीं रीछ और वानर मिलें, वहीं खा डालें। पृथ्वी को बंदरों से रहित कर दें, और दोनों तपस्वी भाइयों को जीते-जी पकड़ लें।” वह भाइयों को मारने को नहीं, जीता पकड़ने को कहता है।
अंगद का उत्तर अब पहले जैसा नहीं रहता। इसमें व्यंग्य नहीं है: “आपको गाल बजाते लाज नहीं आती? निर्लज्ज, कुलनाशक, गला काटकर मर जाइये! मेरा बल देखकर भी आपकी छाती नहीं फटती?” यह वही आदमी है जिसने अभी चौदह मुरदों की सूची पढ़ते हुए किसी का नाम नहीं लिया था। निन्दा सुनने के बाद वह रियायत ख़त्म हो चुकी है।
आगे की बातें और सीधी हैं: “स्त्री के चोर, कुमार्ग पर चलनेवाले, पाप की राशि, मन्दबुद्धि, कामी! आप सन्निपात में बक रहे हैं। आप काल के वश हो चुके हैं।” यह बात इसी काण्ड में पहले भी आ चुकी है, जब रावण की पत्नी ने अपने मन में जाना था कि काल के वश होने से अभिमान उपजा है। अब वही बात एक शत्रु भरी सभा में कह रहा है, और दोनों बार निशाना एक ही है।
फिर अंगद एक भविष्यवाणी करते हैं जो आगे के काण्ड का नक़्शा है: “इसका फल आपको तब मिलेगा जब वानरों और भालुओं के चपेटे पड़ेंगे। राम को मनुष्य कहते हुए आपकी जीभें गिर क्यों नहीं पड़तीं? गिरेंगी, इसमें सन्देह नहीं, और अकेली नहीं, सिरों के साथ रणभूमि में गिरेंगी।”
उसी सिलसिले में बालि का नाम फिर लौटता है: “रावण, जिसने एक ही बाण से बालि को मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? बीस आँखें होने पर भी आप अन्धे हैं। आपके जन्म को धिक्कार है।” यह अकेली जगह है जहाँ अंगद अपने पिता की मृत्यु को प्रमाण की तरह रखते हैं। जिस घटना ने उनका घर उजाड़ा था, वही इस सभा में उनके स्वामी के पक्ष का कड़ा सबूत है, और वे उसे बिना काँपे रख देते हैं।
आगे वे अपनी विवशता कहते हैं: “मैं आपके दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ, पर राम ने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि आपके दसों मुँह तोड़ डालूँ और लङ्का को पकड़कर समुद्र में डुबा दूँ।” तीसरी बार वही ढाँचा: पहले क्या कर सकते हैं, फिर क्यों नहीं करेंगे, और कारण हर बार किसी और की आज्ञा।
“आपकी लङ्का गूलर के फल के समान है, और आप सब कीड़ों की तरह उसके भीतर निडर होकर बसे हैं। मैं बंदर हूँ, मुझे यह फल खाते क्या देर लगती? पर उदार राम ने वैसी आज्ञा नहीं दी।” गूलर का फल सब जानते हैं: ऊपर से भरा-पूरा और सुन्दर, और भीतर एक पूरी दुनिया जिसने कभी बाहर नहीं देखा।
उपमा का डंक यही है कि भीतर के कीड़े को पता नहीं कि वह फल के भीतर है। उसी में उसकी निर्भयता है। सोने की लङ्का, उसका दरबार, उसके योद्धा और उसका राजा, सब उस निर्भयता के भीतर बैठे हैं, और बाहर एक हाथ है जिसे रोककर रखा गया है।
इस पर रावण मुसकराता है, और उसका उत्तर तर्क नहीं, तुलना है: “मूर्ख, इतना झूठ बोलना कहाँ सीखा? बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। तपस्वियों से मिलकर आप लबार हो गये हैं।” उस पिता का नाम इस सभा में फिर आता है। पहले अंगद ने उसे व्यंग्य में लिया, फिर प्रमाण की तरह, और अब उनका शत्रु उसे बेटे के विरुद्ध खड़ा कर रहा है।
सभा के बीच एक चरण
पिता की तुलना सुनकर अंगद जो करते हैं, वहीं से कथा मुड़ती है। वे तुलना का उत्तर नहीं देते। वे एक प्रतिज्ञा करते हैं, और प्रतिज्ञा के साथ एक पाँव रखते हैं।
अंगद कहते हैं, “रावण, यदि मैंने आपकी दसों जीभें न उखाड़ लीं, तो सचमुच मैं लबार ही हूँ।” और फिर वह क्षण आता है जिस पर पूरा दृश्य टिका है। राम के प्रताप को याद करके अंगद क्रोधित हुए और सभा के बीच प्रण करके उन्होंने पैर रोप दिया। क्रम काम का है: पहले याद, फिर क्रोध, फिर प्रण, और तब पाँव।
दरबार में अंगद को अपने बारे में जो कहा गया, उससे कोई हरकत नहीं हुई। जो दो हरकतें हुईं, दोनों किसी और की याद से: निन्दा सुनकर भुजाएँ ज़मीन पर पड़ीं, प्रताप याद करके चरण ज़मीन पर जमा।
“यदि आप मेरा चरण हटा सकें, तो राम लौट जायँगे, और मैं सीता को हार गया।” इस शर्त में दाँव पर अंगद का जीवन नहीं, पूरा अभियान है। जो सेना बाहर खड़ी है और जिस काम के लिये आयी है, वह सब एक पाँव के नीचे रख दिया गया है। और वह भी उस आदमी के द्वारा जिसे यह अधिकार किसी ने नहीं दिया था।
रावण सब वीरों से कहता है, “वीरो, सुनिये, पैर पकड़कर इस बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दीजिये।” वह मारने को नहीं, उठाने को कहता है। यानी शर्त मान ली गयी। उसी क्षण सभा में केवल एक प्रश्न बचता है, कि वह पाँव उठेगा या नहीं।
इन्द्रजीत आदि अनेक बलवान् जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से और बहुत-से उपाय करके झपटते हैं, पर पैर टलता नहीं, और वे सिर नीचा करके अपनी जगह जा बैठते हैं। पहला नाम लङ्का का बड़ा नाम है, और उसके पीछे और भी हैं। और पहला प्रयास हर्ष से होता है।
बहुत-से उपाय किये जाते हैं, ताक़त के साथ तरकीबें भी। और हारने के बाद हर बार एक ही होता है: सिर नीचा और अपनी जगह वापस। न किसी को निकाला जाता है, न दण्ड मिलता है। वे बस लौटकर बैठ जाते हैं, और यही इस दृश्य की शान्त क्रूरता है।
फिर वे उठकर दुबारा झपटते हैं, और चरण टलता नहीं। यहाँ काकभुशुण्डि गरुड़ को सम्बोधित करके उपमा देते हैं: जैसे विषयों में डूबा कुयोगी मोहरूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकता, वैसे ही यह चरण इनसे नहीं टलता। उपमा में पासे पलट जाते हैं। जो सभा ज़ोर लगा रही थी, वह उपमा में जड़ पकड़े हुए मोह बन जाती है। ज़मीन पर रखा पाँव वह चीज़ बन जाता है जिसे कोई अपने बल से नहीं हटा सकता।
अब गिनती आती है। करोड़ों ऐसे योद्धा हर्षित होकर उठे जो बल में मेघनाद के समान थे। वे बार-बार झपटते हैं, अंगद का चरण नहीं उठता, और वे सिर नवाकर बैठ जाते हैं। पहले एक नाम था, अब एक संख्या, जो उसी नाम को माप बना लेती है, और करोड़ों का नतीजा वही है जो एक का था।
फिर वह उपमा आती है जो पूरे दृश्य को ठहरा देती है। जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत का मन नीति नहीं छोड़ता, वैसे ही अंगद का चरण पृथ्वी नहीं छोड़ता। और यहीं हिसाब भी हो जाता है: यह देखकर शत्रु का मद जाता रहा। पाँव अभी उठा नहीं, पर घमण्ड उतर चुका है।
और तब रावण स्वयं उठा
अब सभा में कोई नहीं बचा। जो अब तक नहीं उठा था, वह वही है जिसकी यह सभा है और जिसकी आज्ञा से यह सब हो रहा था। और वह भी अपनी मरज़ी से नहीं उठता।
अंगद का बल देखकर सब हृदय में हार गये, और तब अंगद के ललकारने पर रावण स्वयं उठा। इस काण्ड में पहली बार रावण अपने सिंहासन से उतरकर अपने हाथों कोई काम करने आता है। वह काम एक बंदर का पाँव उठाना है: दस सिर, बीस भुजाएँ, और उसकी अपनी सभा के फ़र्श पर एक चरण।
आगे जो होता है वह दो टुकड़ों में होता है, और पहला टुकड़ा झुकना है। वह चरण पकड़ने के लिये नीचे हाथ बढ़ाता है, और उसी समय अंगद कहते हैं, “मेरा चरण पकड़ने से आपका बचाव नहीं होगा।” इसमें लड़ाई नहीं, सूचना है। जिस काम के लिये हाथ बढ़ा है, वह गिनती में ही नहीं आता।
और फिर वह बात आती है जिसके लिये यह पूरा दृश्य है: “जाकर राम के चरण क्यों नहीं पकड़ते?” यह सुनकर रावण मन में बहुत सकुचाकर लौट गया। अंगद यह नहीं कहते कि यह पाँव उठ नहीं सकता। वे कहते हैं कि हाथ ग़लत चरण पर है। और यह ठीक उस क्षण कहा जाता है जब वह झुक चुका है। झुकना हो चुका। बस पता बदलना है।
इसी से वह लौट जाता है और हार जाता है। जिस सभा में वह बंदर को पछाड़ने का आदेश दे चुका था, उसी के बीच उसे बिना कुछ किये सीधा होकर लौटना पड़ता है। वह तेजहीन हो गया, उसकी सारी शोभा चली गयी, जैसे दोपहर में चन्द्रमा दिखायी देता है। गया नहीं, आकाश में है, बस उसका दीखना बेकार हो गया है।
वह सिर नीचा करके सिंहासन पर जा बैठता है, मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो। और कथा कारण भी कह देती है: राम जगत् भर की आत्मा और प्राणों के स्वामी हैं। उनसे विमुख रहनेवाला विश्राम कैसे पा सकता है? यह वाक्य सिंहासन पर बैठे आदमी के ऊपर रखा गया है, और सिंहासन उस दिन विश्राम की जगह नहीं रह जाता।
शिव पार्वती से कहते हैं, “राम की भौंहों के इशारे से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाश को प्राप्त होता है। वे तिनके को वज्र और वज्र को तिनका बना देते हैं। उनके दूत का प्रण भला कैसे टल सकता है?” यह बात पूरे दृश्य का हिसाब है। पाँव अंगद के बल से नहीं जमा था। जो बात करोड़ों योद्धा नहीं हिला पाये, वह बल नहीं, एक प्रण था, और प्रण उसका था जो दूत बनकर आया है।
तिनके और वज्र की उपमा इसी सभा के काम की है। इस सभा में हल्की चीज़ एक वानर का पाँव थी और भारी चीज़ करोड़ों योद्धाओं का बल। उस फ़र्श पर दोनों की तौल उलट गयी।
और फिर वह उठकर चल दिया
पाँव की बात पूरी होने के बाद अंगद विजय की घोषणा नहीं करते। वे फिर से समझाने बैठ जाते हैं। अनेक प्रकार से नीति कही जाती है, और वह उसी आदमी को सुनायी जाती है जो अभी सारी सभा के सामने नीचा देखकर बैठा है।
और वह नहीं मानता, क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। काल का नाम दूसरी बार उसके साथ जुड़ा है। पहली बार अंगद ने क्रोध में कहा था, अब कथा शान्ति से कह रही है, और यह वाक्य गाली नहीं, निदान है।
शत्रु का गर्व चूर करके अंगद उसे राम का सुयश सुनाते हैं। पूरी सभा में इससे पहले उन्होंने राम की महिमा एक बार भी सीधे नहीं गायी थी। केवल अपने को छोटा बताया था और अपनी आज्ञा गिनायी थी। महिमा का समय तब आया जब सुननेवाले के पास सुनने के सिवा कुछ नहीं बचा।
और चलते-चलते वे एक वाक्य छोड़ जाते हैं: “रणभूमि में आपको खेला-खेलाकर न मारूँ, तब तक अभी क्या बड़ाई करूँ।” जो काम बाक़ी है, उसे वे बड़ाई में नहीं बदलते। और उसी जगह एक ब्योरा चुपचाप रखा गया है: अंगद सभा में आने से पहले ही रावण के एक पुत्र को मार चुके थे। वह समाचार सुनकर रावण दुखी हो गया। कथा यहाँ उस पुत्र का नाम नहीं लेती।
सारी सभा पाँव के तमाशे में लगी थी। इसी बीच एक और ख़बर उस घर तक पहुँच चुकी थी। जो राजा अपनी सभा में एक पाँव नहीं उठा पाया, वह अब सुनता है कि उसके घर में एक जगह ख़ाली हो चुकी है। और एक वाक्य में सारी लङ्का की हालत: अंगद का प्रण देखकर सब राक्षस भय से अत्यन्त व्याकुल हो गये।
शत्रु के बल का मर्दन करके, हर्षित होकर, बल की राशि बालिपुत्र अंगद ने आकर राम के चरण पकड़ लिये। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों में जल भरा है। जिस चरण को कोई हाथ से नहीं हिला सका, उसकी कथा इस पर समाप्त होती है कि वही आदमी दो चरण अपने हाथों से पकड़ लेता है। सभा में हाथ चरण तक पहुँचे थे और लौट गये थे। यहाँ पहुँचते हैं और टिक जाते हैं।
और इस पूरे प्रसंग में यह आँसू अकेली नमी है। यह युवक अकेला शत्रु की सभा में गया। वहाँ उसने अपने पिता का नाम बार-बार सुना, अपनी मृत्यु की धमकी सुनी, अपने स्वामी की निन्दा सुनी और एक बार भी नहीं डिगा। वही लौटकर चरणों में पहुँचते ही रो पड़ता है। जहाँ रोया जा सकता है, उसी जगह का नाम घर है।
फिर कथा उधर की साँझ पर पर्दा गिरा देती है। साँझ हुई जानकर रावण विलखता हुआ अपने महल की ओर चला जाता है, और मन्दोदरी उसे समझाकर फिर कहती हैं। वही स्त्री, वही कमरा, वही बात, फिर एक बार। अगला प्रसंग वहीं से उठेगा।
ग़लत चरण पर हाथ
बड़ी चाल वह शर्त है। अंगद ने दाँव पर अपनी जान नहीं, पूरा अभियान रख दिया। ऊपर से यह लापरवाही दीखती है। पर उस शर्त ने सामनेवाले को अपनी ही सभा के बीच अपनी ताक़त गिनकर दिखाने पर मजबूर कर दिया। जो सेना अगले दिन लड़नेवाली है, उसने अपनी हार का पहला नमूना अपने ही दरबार में देख लिया।
और जिस क्रम में लोग हारते हैं, वह स्वयं एक दलील है: लङ्का का बड़ा नाम, उसी से नापे गये करोड़ों, हृदय में हारी हुई सभा। और अन्त में वह आदमी जिसके नाम पर यह सब चल रहा था। हर पायदान पर वही उत्तर, झपटना, न हिलना, सिर नवाकर बैठ जाना।
आख़िर में दो वाक्य बचते हैं। दोनों चरण पकड़ने के बारे में हैं: झुके हुए आदमी से कहा गया कि इस चरण को पकड़ने से बचाव नहीं होगा। और साथ ही कहा गया कि जाकर राम के चरण पकड़िये। क्रिया एक, पता अलग। एक चरण हराने के लिये पकड़ा जा रहा था, दूसरा बचने के लिये पकड़ा जाना था, और लङ्का में उस दिन यह अन्तर समझनेवाला कोई नहीं था।
यहाँ कथा युद्ध को टाल नहीं रही, तौल रही है। बोली चलती है, फिर एक पाँव, और पाँव के बाद एक सवाल जिसका उत्तर किसी के पास नहीं। अगले दिन की लड़ाई का फ़ैसला यहाँ एक कमरे के भीतर हो चुका है, और उसमें किसी का ख़ून नहीं बहा।
और जो देर तक साथ रहता है, वह नौजवान है जो अकेला भीतर गया था। उसने वहाँ अपने पिता का नाम कई बार सुना, अपने व्यंग्य में, अपने ही मुँह से प्रमाण की तरह, और एक बार अपने विरुद्ध। उसने अपने स्वामी की निन्दा सुनी और अपनी मृत्यु की घोषणा सुनी। उसने वह सब कर दिखाया जिसके लिये भेजा गया था, और लौटकर कोई ख़बर नहीं सुनायी। वह सीधे चरणों पर झुक गया और उसकी आँखें भर आयीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा 29 से 35, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।