रामचरितमानस · लङ्काकाण्ड · सेतु-बन्ध
सेतु-बन्ध
समुद्र के किनारे पत्थर उठाये जा रहे हैं, और ठीक उसी साँस में यह तय हो रहा है कि कौन किसका भक्त है।
पाँचवाँ सोपान वहाँ पूरा हुआ था जहाँ समुद्र अपनी बात कह चुका था। छठा सोपान वहीं से उठता है, और उठते ही वह एक ऐसा काम शुरू कर देता है जिसे रामचरितमानस में और कहीं दोहराया नहीं जाता। यहाँ न कोई धनुष चढ़ता है, न कोई सिर गिरता है। यहाँ पत्थर उठाये जाते हैं। दोहा एक से पाँच तक की यह कथा जितनी लड़ाई की तैयारी है, उससे कहीं अधिक एक निर्माण का ब्यौरा है: कौन पहाड़ लाता है, कौन उन्हें जोड़ता है, किस जगह सेना का डेरा पड़ता है, और उस पार बैठे हुए एक आदमी तक खबर कैसे पहुँचती है।
पर तुलसीदास इस पन्ने पर केवल पुल नहीं बँधवाते। जिस समय समुद्र में शिलाएँ गिर रही हैं, ठीक उसी समय वे कथा के भीतर एक दूसरा प्रश्न खड़ा कर देते हैं, और वह प्रश्न पुल से भी बड़ा है: राम और शङ्कर में कौन किसका भक्त है। सोपान अपने पहले ही श्लोक में राम को उस देवता का सेव्य कहकर खुलता है जिन्होंने कामदेव को भस्म किया था, और अगले ही श्लोक में उन्हीं शङ्कर के आगे सिर झुका देता है। फिर, जब पुल बन रहा होता है, राम अपने हाथों उसी किनारे पर शिवलिङ्ग की स्थापना करते हैं और कह देते हैं कि उन्हें शिव के समान प्रिय दूसरा कोई नहीं। दोनों बातें एक साथ चलती हैं, और यही इस प्रसंग का असली ढाँचा है।
और यह याद रखने की बात है कि यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में सेतु है, दोनों में नल और नील हैं, पर जो बातचीत यहाँ किनारे पर होती है वह तुलसी की अपनी है, और उसका सुर भी उन्हीं का है। इस पूरे काण्ड को कहनेवाले न राम हैं और न सीधे-सीधे तुलसी। बीच में एक पंक्ति ऐसी आती है जहाँ कहनेवाला पार्वती को सम्बोधित कर देता है, और तब पता चलता है कि यह सारा हाल शङ्करजी अपनी पत्नी को सुना रहे हैं। जिस देवता की स्थापना कथा के भीतर हो रही है, कथा उन्हीं के मुँह से निकल रही है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम दशरथ के पुत्र, जो इस पन्ने पर सेनापति की तरह आज्ञा देते हैं और उसी किनारे पर एक यजमान की तरह शिवलिङ्ग की स्थापना भी करते हैं।
- जाम्बवान् रीछों के बूढ़े नायक, जो पहले हाथ जोड़कर कहते हैं कि सबसे बड़ा सेतु तो नाम ही है, और फिर पत्थर ढोने का काम बाँट देते हैं।
- हनुमान पवनपुत्र, जो समुद्र को छोटा सिद्ध करने के लिये एक ऐसी युक्ति गढ़ते हैं कि सारी सेना का मन बैठने से बच जाता है।
- नल और नील दो चतुर भाई, जिनके हाथ में आकर पहाड़ गेंद बन जाते हैं और जिनके बाँधे हुए पुल पर सेना उतरती है।
- सुग्रीव वानरों के राजा, जो आज्ञा पाते ही मुनियों को बुलाने के लिये दूत दौड़ा देते हैं।
- शङ्कर कैलास के स्वामी, जो इस काण्ड के कहनेवाले भी हैं और इसी किनारे पर रामेश्वर के नाम से स्थापित भी होते हैं।
- रावण लङ्का का राजा, जिस तक इस पन्ने पर केवल एक खबर पहुँचती है, और वह खबर उसे दसों मुँह से बोलने पर विवश कर देती है।
छठे सोपान का द्वार
पन्ना गणेशजी को नमस्कार से खुलता है, और उसके बाद वह पंक्ति आती है जो हर सोपान के माथे पर रहती है: जानकीवल्लभ की जय हो, श्रीरामचरितमानस का छठा सोपान। इसके तुरन्त बाद तीन श्लोक हैं, और तीनों संस्कृत में हैं। तुलसी की यह पुरानी रीति है। कथा अवधी में कही जाती है, पर हर काण्ड का दरवाज़ा संस्कृत में खुलता है, और उस दरवाज़े पर लिखा रहता है कि भीतर किसकी कथा है।
पहला श्लोक राम की वन्दना है, और उसमें गिनाये गये विशेषण ध्यान से देखने लायक हैं। जो कामदेव के शत्रु शिवजी के सेव्य हैं, जो जन्म और मृत्यु के भय को हर लेते हैं, जो कालरूपी मतवाले हाथी के लिये सिंह के समान हैं, जो योगियों के स्वामी हैं, जो ज्ञान के द्वारा जाने जाते हैं, जो गुणों की निधि हैं, अजेय हैं, निर्गुण हैं, निर्विकार हैं, माया से परे हैं, देवताओं के स्वामी हैं, दुष्टों के वध में तत्पर हैं, ब्राह्मणवृन्द के एकमात्र रक्षक हैं, जलभरे मेघ के समान सुन्दर श्याम हैं, कमल के से नेत्रवाले हैं, और जो इस समय पृथ्वी के एक राजा के रूप में खड़े हैं, उन परमदेव की वन्दना की जाती है।
इस पूरी सूची में पहला ही विशेषण सबसे भारी है। काम के शत्रु के सेव्य। काम का शत्रु कौन है, यह किसी को बताना नहीं पड़ता। छठे सोपान की पहली साँस में ही राम को उस देवता का आराध्य कह दिया गया है जो यह पूरा काण्ड सुना रहे हैं। और सूची के दोनों सिरे देखिये: निर्गुण भी कहा गया है और पृथ्वी के स्वामी के रूप में भी, यानी बिना किसी गुण के भी और एक राजा के वेष में भी। जो बात आगे पत्थरों के तैरने पर तय होगी, वह इसी पहले श्लोक में रख दी गयी है।
दूसरा श्लोक उन्हीं शङ्कर की ओर मुड़ जाता है, और वन्दना करनेवाला वही है जो अभी-अभी राम की वन्दना कर चुका है।
शङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्॥ २॥
श्लोक २
शङ्ख और चन्द्रमा की सी कान्तिवाले, अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले, बाघम्बर पहननेवाले, काल के समान भयानक सर्पों का भूषण धारण करनेवाले, गङ्गा और चन्द्रमा के प्रेमी, काशी के स्वामी, कलियुग के पापसमूह का नाश करनेवाले, कल्याण के कल्पवृक्ष, गुणों के निधान, कामदेव को भस्म करनेवाले, पार्वती के पति, वन्दनीय शङ्करजी को मैं नमस्कार करता हूँ। दोनों श्लोक आमने-सामने रख दीजिये। पहले में राम को काम के शत्रु का सेव्य कहा गया है; दूसरे में उसी काम को भस्म करनेवाले के आगे सिर झुकाया गया है। इस प्रसंग की धुरी बिना किसी व्याख्या के दिख जाती है।
तीसरा श्लोक सबसे छोटा है और सबसे सीधा। उसमें कोई वर्णन नहीं है, केवल एक माँग है।
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे॥ ३॥
श्लोक ३
जो सत्पुरुषों को वह कैवल्य तक दे डालते हैं जो अत्यन्त दुर्लभ है, और जो दुष्टों को दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी शम्भु मेरे कल्याण का विस्तार करें। ध्यान दीजिये कि इसी एक श्लोक में दोनों काम एक ही हाथ में हैं, देना भी और दण्ड देना भी। आगे जिस काण्ड की कथा चलनी है, उसमें भी यही दो काम साथ-साथ चलेंगे।
श्लोकों के बाद जो दोहा आता है वह अवधी में है, और वह कथा नहीं कहता। वह सीधे मन को पुकारता है।
लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
आरम्भ का दोहा
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥
लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं, और काल स्वयं जिनका धनुष है, मन उन रामजी का भजन क्यों नहीं करता। यह उपमा जितनी सुन्दर है उतनी ही डरावनी भी है। समय की जितनी नापें मनुष्य ने गढ़ी हैं, पलक झपकने जितनी छोटी से लेकर कल्प जितनी बड़ी तक, वे सब यहाँ तरकश में रखी हुई हैं, और चलानेवाला वही है जो इस समय समुद्र के किनारे खड़ा होकर पुल बँधवाने जा रहा है। जिस लङ्का पर चढ़ाई होनेवाली है, उस पर चढ़ाई करनेवाले का असली अस्त्र यही है, और वह अस्त्र किसी शस्त्रागार में नहीं रखा रहता।
सार: छठा सोपान तीन संस्कृत श्लोकों से खुलता है। पहला राम की वन्दना है और उन्हें काम के शत्रु का सेव्य कहता है, दूसरा उन्हीं शङ्कर को नमस्कार करता है, तीसरा शम्भु से कल्याण माँगता है। इसके बाद का दोहा मन से पूछता है कि जिनके बाण समय की सब नापें हैं और जिनका धनुष काल है, उनका भजन क्यों नहीं होता।
अब बिलंबु केहि काम
अब कथा किनारे पर लौटती है। समुद्र अपनी बात कह चुका है और राम सुन चुके हैं। इसके बाद जो होता है उसमें एक भी शब्द फ़ालतू नहीं है। न कोई क्रोध बचता है, न कोई शिकायत, न पिछली बात का कोई ज़िक्र। मन्त्री बुलाये जाते हैं और आज्ञा दी जाती है।
सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।
सोरठा
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु॥
समुद्र के वचन सुनकर प्रभु ने सचिवों को बुलाकर ऐसा कहा: अब विलम्ब किसलिये हो रहा है, सेतु तैयार कीजिये जिससे सेना उतरे। इस सोरठे का सबसे अच्छा शब्द उतरै है। पार जाना नहीं कहा गया, उतरना कहा गया है, जैसे सीढ़ी पहले से बनी हो और केवल पाँव रखना बाक़ी हो। जो अभी बना ही नहीं है, उसके विषय में बात इस तरह हो रही है मानो वह बन चुका हो।
आज्ञा के तुरन्त बाद जो उत्तर मिलता है वह मन्त्रियों से नहीं, रीछों के बूढ़े नायक से आता है। जाम्बवान् हाथ जोड़कर कहते हैं: हे सूर्यकुल के ध्वजस्वरूप, सुनिये। सबसे बड़ा सेतु तो आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर मनुष्य संसाररूपी समुद्र से पार हो जाते हैं। पुल का पहला ज़िक्र हुआ नहीं कि पहला उत्तर यह आ गया कि असली पुल कोई और है।
और कहनेवाले पर ध्यान दीजिये। यही जाम्बवान् थोड़ी देर बाद पत्थर ढोने का काम बाँटेंगे, नाम लेकर कारीगर बुलायेंगे, और पूरी सेना को दौड़ा देंगे। जिन्हें नाम पर इतना भरोसा है, वही सबसे पहले हाथ में काम लेते हैं। इस प्रसंग को पढ़ते हुए इस जोड़ को बार-बार देखिये: भरोसा ऊपर टिका हुआ है और हाथ नीचे काम पर लगे हुए हैं, और तुलसी इन दोनों के बीच कहीं कोई झगड़ा नहीं मानते।
जाम्बवान् की बात यहीं नहीं रुकती। नाम को सेतु कह चुकने के बाद वे सामने पड़े हुए पानी को नापते हैं और उसे छोटा बता देते हैं: फिर इस लघु जलधि को पार करने में कितनी देर लगेगी। यह सुनते ही पवनकुमार आगे आते हैं, और वे जो कहते हैं वह तर्क नहीं है, बड़ाई है, और ऐसी बड़ाई है जिसके भीतर एक हँसी छिपी हुई है।
यह लघु जलधि तरत कति बारा । अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा॥
चौपाई १
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी । सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥
प्रभु का प्रताप भारी बड़वानल के समान है, और उसने पहले ही समुद्र का सारा जल सोख लिया था। बड़वानल वह आग मानी जाती है जो समुद्र के भीतर रहती है और पानी को पीती रहती है। हनुमान् की बात का पहला हिस्सा यही है कि यह समुद्र कभी का सूख चुका था। पर तब प्रश्न यह उठता है कि फिर इसमें इतना पानी आया कहाँ से, और उसी प्रश्न का उत्तर उस अर्धाली में है जिसने इस चौपाई को याद रखने लायक बनाया है।
तव रिपु नारि रुदन जल धारा । भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा॥
चौपाई २
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी । हरषे कपि रघुपति तन हेरी॥
आपके शत्रुओं की स्त्रियों के आँसुओं की धारा से यह फिर भर गया, और उसी से यह खारा भी हो गया। पवनसुत की यह अत्युक्ति सुनकर वानर रघुनाथजी की ओर देखकर हर्षित हो गये। पूरी युक्ति अब खड़ी हो जाती है: समुद्र पहले सूखा, फिर विधवाओं के आँसुओं से भरा, और खारापन भी उन्हीं का है। तीन बातें एक साथ कह दी गयीं। समुद्र बड़ा नहीं है, राम का प्रताप बड़ा है, और जो लङ्का में बैठा है उसकी हार पहले ही तय हो चुकी है, क्योंकि उसके पक्ष की स्त्रियाँ इतना रो चुकी हैं कि समुद्र भर गया।
और सुननेवालों की प्रतिक्रिया देखिये। वे ताली नहीं बजाते, वे शोर नहीं मचाते। वे राम की ओर देखते हैं और हर्षित होते हैं। जिस सेना को अभी समुद्र पार करना है और जिसके सामने एक भी नाव नहीं है, उसका मनोबल इस एक युक्ति से बँध जाता है, और वह मनोबल कहनेवाले की ओर नहीं जाता, उस ओर जाता है जिस ओर सब देख रहे हैं।
सार: समुद्र के वचन सुनकर राम सचिवों को बुलाकर कहते हैं कि अब विलम्ब किसलिये, सेतु बनाइये जिससे सेना उतरे। जाम्बवान् हाथ जोड़कर कहते हैं कि सबसे बड़ा सेतु तो नाम ही है, और फिर इस छोटे समुद्र की बात उठाते हैं। हनुमान् कहते हैं कि प्रभु के प्रताप ने पहले इसे सुखा दिया था और यह शत्रुओं की स्त्रियों के आँसुओं से फिर भरा और खारा हुआ। यह सुनकर वानर राम की ओर देखकर हर्षित होते हैं।
नल, नील, और एक खेल
जाम्बवान् इसके बाद वही करते हैं जो एक पुराने और अनुभवी नायक को करना चाहिये। वे बात बन्द करके नाम पुकारते हैं। दो भाई बुलाये जाते हैं, नल और नील, और उन्हें सारी कथा सुनायी जाती है। तुलसी यह नहीं बताते कि उस कथा में क्या-क्या था। वे सीधे उस वाक्य पर आ जाते हैं जो जाम्बवान् उन दोनों से कहते हैं, और वह इस पूरे पन्ने की सबसे व्यावहारिक और सबसे विचित्र आज्ञा है।
जामवंत बोले दोउ भाई । नल नीलहि सब कथा सुनाई॥
चौपाई ३
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥
मन में रामजी के प्रताप को स्मरण करके सेतु बनाइये, परिश्रम कुछ भी नहीं होगा। यह वाक्य पढ़ने में सरल है और मानने में कठिन। काम पुल बाँधने का है, और तैयारी की सूची में औज़ार नहीं हैं, नाप नहीं है, रस्सी नहीं है। सूची में एक ही चीज़ है, स्मरण। और उसका नतीजा भी साथ ही बता दिया गया है, प्रयास कछु नाहीं। यहाँ यह नहीं कहा गया कि परिश्रम कम लगेगा। कहा यह गया है कि लगेगा ही नहीं।
इसके बाद वानरों का पूरा समूह बुलाया जाता है, और जाम्बवान् उनसे आज्ञा की भाषा में बात नहीं करते। वे विनती कहते हैं। सब लोग मेरी एक विनती सुनिये, अपने हृदय में रामजी के चरणकमल धारण कर लीजिये, और सब भालू तथा वानर मिलकर एक खेल कीजिये। इस वाक्य का सबसे बड़ा शब्द कौतुक है। जिस काम के लिये यह सारी सेना खड़ी की गयी है, जिसके बिना लङ्का तक पहुँचा नहीं जा सकता, उसे नाम दिया जा रहा है खेल का। और शर्त वही एक है जो अभी नल और नील को दी गयी थी: पहले हृदय में चरण, फिर हाथ में पत्थर।
फिर वह आज्ञा, जिसमें सेना का सारा शोर एक साथ छूट जाता है। दौड़िये, विकट वानरों के समूह, और वृक्षों तथा पर्वतों के झुण्ड उखाड़ लाइये। यह सुनते ही वानर और भालू हूह करते हुए चल पड़े, और चलते समय उनके मुँह पर जो नारा था वह रघुवीर के उसी प्रतापसमूह की जय का था जिसकी बात अभी हनुमान् कर चुके थे। ध्यान दीजिये कि नारे में न किसी सेनापति का नाम है, न किसी हथियार का। जिस प्रताप ने समुद्र सुखाया था, उसी का नाम लेकर पहाड़ उखाड़ने जाया जा रहा है।
और अब दोहा, जिसमें यह पूरा दृश्य एक ही साँस में आ जाता है।
अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।
दोहा १
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥ १॥
बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत और वृक्ष खेल की तरह ही उखाड़कर उठा लेते हैं, ला-लाकर नल और नील को देते हैं, और वे उन्हें गढ़कर सेतु बनाते हैं। इस दोहे में काम का बँटवारा पूरा दिख जाता है, और वह बँटवारा किसी भी बड़े निर्माण जैसा है। एक दल ढोता है, दो कारीगर जोड़ते हैं, और बीच में कोई अपनी बारी का इन्तज़ार नहीं करता। लीलहिं शब्द फिर वही बात कह रहा है जो ऊपर कौतुक कह चुका था। जो दूसरों के लिये असम्भव है वह इनके लिये खेल है, और वह इसलिये खेल है कि करने से पहले स्मरण कर लिया गया है।
सार: जाम्बवान् नल और नील को बुलाकर कहते हैं कि मन में राम का प्रताप स्मरण करके सेतु बनाइये, परिश्रम कुछ भी नहीं होगा। फिर वे पूरी सेना से विनती करते हैं कि हृदय में राम के चरण धारण करके एक खेल कीजिये, और पर्वत तथा वृक्ष उखाड़ लाइये। वानर और भालू जय बोलते हुए दौड़ पड़ते हैं और खेल की तरह पहाड़ उठाकर नल-नील को देते हैं, जो उन्हें गढ़कर पुल बनाते हैं।
गेंद की तरह पहाड़, और एक सङ्कल्प
अब तुलसी एक उपमा रखते हैं जो इस पूरे प्रसंग की सबसे हल्की और सबसे दिलचस्प चीज़ है।
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥
चौपाई ४
देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥
वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की तरह ले लेते हैं। सेतु की अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपासिन्धु हँसकर वचन बोले। कंदुक इव, गेंद की तरह। जिस चीज़ का वज़न पहाड़ का है, उसे हाथ में लेते समय उतना ही ध्यान लग रहा है जितना खेल में लगता है, न उससे कम न उससे अधिक। और दूसरी बात, जो पहली बार पढ़ने में निकल जाती है: रचना सुन्दर कही गयी है। पुल मज़बूत भी होगा, यह आगे बताया जायगा, पर तुलसी ने पहले उसका सौन्दर्य देखा है, और उसे देखकर राम हँसे हैं।
उस हँसी के बाद जो वाक्य आता है, उससे इस प्रसंग का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। राम कहते हैं कि यह भूमि परम रमणीय और उत्तम है, इसकी महिमा असीम है और वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शम्भु की स्थापना करूँगा, मेरे हृदय में यह महान् सङ्कल्प है। ठीक इसी जगह पन्ना मुड़ जाता है। अभी तक जो चल रहा था वह अभियान था। अब जो शुरू होता है वह पूजा है, और दोनों एक ही किनारे पर, एक ही दिन, एक ही आदमी के हाथों हो रहे हैं।
और सङ्कल्प के लिये रखा गया शब्द देखिये, कलपना, यानी मन में बहुत पहले से बैठी हुई इच्छा। यह कोई क्षण भर की बात नहीं है जो पुल देखकर सूझ गयी हो। जिस काम के लिये सेना यहाँ तक आयी है, उसके भीतर यह दूसरा काम पहले से रखा हुआ था, और अब उसकी बारी आ गयी है।
कौन किसका भक्त है
आज्ञा मिलते ही सुग्रीव दूत दौड़ाते हैं, और जो होता है वह किसी भी विधिपूर्वक हुई स्थापना जैसा है, बिना किसी जल्दबाज़ी के, बिना किसी छूट के।
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए॥
चौपाई ५
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
वचन सुनते ही वानरराज ने बहुत से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुला लाये। शिवलिङ्ग की स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन हुआ। और उसी पूजा के बीच से वह वाक्य निकलता है जिसके कारण यह चौपाई पूरे मानस में अलग खड़ी हो जाती है: शिव के समान प्रिय मुझे दूसरा कोई नहीं। कहनेवाले वे हैं जिनके नाम पर यह सारा अभियान चल रहा है। और जिनके विषय में कहा जा रहा है, वे ही इस समय यह पूरी कथा पार्वती को सुना रहे हैं। सुनानेवाले ने अपनी प्रशंसा को न घटाया है, न बढ़ाया है, बस जहाँ की तहाँ रख दिया है।
यह वाक्य अकेला नहीं आता। उसके साथ ही उसका उलटा पक्ष भी रख दिया जाता है, और उसमें कोई नरमी नहीं है।
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥
चौपाई ६
संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥
जो शिव से द्रोह रखता है और अपने को मेरा भक्त कहलाता है, वह स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। जो शङ्कर से विमुख होकर मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी है, मूर्ख है और थोड़ी बुद्धिवाला है। ध्यान दीजिये कि शर्त भक्ति पर नहीं लगायी गयी, भक्त के बर्ताव पर लगायी गयी है। जिसे राम चाहिये और शिव नहीं चाहिये, उसकी चाह ही अधूरी मान ली गयी है, और अधूरी चाह का फल स्वप्न तक में नहीं मिलता।
और फिर वह दोहा, जो तराजू के दोनों पलड़े बराबर कर देता है।
संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
दोहा २
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥ २॥
जिन्हें शङ्करजी प्रिय हैं पर जो मेरे द्रोही हैं, और जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास बनना चाहते हैं, वे कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं। दोहे की ताक़त उसकी बनावट में है। पहली पंक्ति में दोनों वाक्य आमने-सामने रखे गये हैं और वे एक-दूसरे की दर्पण-छवि हैं। दूसरी पंक्ति में दोनों के लिये एक ही दण्ड है, एक ही जगह, और उतने ही समय के लिये। यहाँ कोई पक्ष नहीं लिया गया, और यही इस दोहे की सबसे बड़ी बात है।
अब पीछे मुड़कर सोपान का पहला श्लोक याद कीजिये, जिसमें राम को काम के शत्रु का सेव्य कहा गया था, और दूसरा श्लोक, जिसमें उन्हीं शत्रु के आगे सिर झुकाया गया था। जो बात वहाँ संस्कृत में और वन्दना के रूप में थी, वही यहाँ अवधी में और आचरण के नियम के रूप में आ गयी है। और इस बार वह किसी कवि के मुँह से नहीं, कथा के भीतर खड़े हुए राम के मुँह से निकल रही है, उस समय जब पीछे समुद्र में शिलाएँ गिर रही हैं।
सार: सुग्रीव के भेजे दूत मुनियों को बुला लाते हैं, शिवलिङ्ग की स्थापना होती है और विधिपूर्वक पूजन होता है। राम कहते हैं कि शिव के समान प्रिय उन्हें कोई नहीं, और जो शिव से द्रोह रखकर उनका भक्त कहलाता है वह स्वप्न में भी उन्हें नहीं पाता। दोहे में दोनों पक्ष बराबर कर दिये जाते हैं: शिव के द्रोही और राम के द्रोही, दोनों कल्पभर घोर नरक में रहते हैं।
जो इस सेतु को देखेगा
स्थापना के तुरन्त बाद राम वह करते हैं जो तीर्थ बनाते समय होता है। वे फल बता देते हैं। जो मनुष्य इन रामेश्वर का दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जायँगे, और जो गङ्गाजल लाकर इन पर चढ़ावेगा वह सायुज्य मुक्ति पावेगा। पहले वाक्य में दर्शन भर की शर्त है। दूसरे में एक पूरी यात्रा जुड़ी हुई है, क्योंकि गङ्गा यहाँ से बहुत दूर है, और जल वहाँ से यहाँ तक लाना ही उस बड़े फल की क़ीमत है।
और इसके बाद दो शर्तें और आती हैं, जिनमें एक भीतर की है और दूसरी बाहर की।
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥
चौपाई ७
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर इनकी सेवा करेंगे, उन्हें शङ्करजी मेरी भक्ति देंगे, और जो मेरे बनाये सेतु का दर्शन करेगा वह बिना परिश्रम के संसाररूपी समुद्र से तर जायगा। पहली अर्धाली में वह चक्र पूरा हो जाता है जो अभी तक आधा था। राम कह चुके हैं कि शिव से द्रोह रखनेवाला उन्हें नहीं पाता। अब वे कहते हैं कि शिव की सेवा करनेवाले को भक्ति शिव देंगे, और वह भक्ति उनकी अपनी होगी। एक देवता दूसरे का भक्त बना रहा है, और दूसरा पहले का। किसी तीसरे को बीच में खड़े होने की जगह ही नहीं बची।
दूसरी अर्धाली में वह बात लौट आती है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। जाम्बवान् ने कहा था कि नाम ही वह सेतु है जिस पर चढ़कर लोग भवसागर से पार होते हैं। अब राम उसी भाषा में अपने पत्थर के पुल के विषय में कहते हैं: जो इसका दर्शन करेगा वह बिना परिश्रम के भवसागर तर जायगा। दर्शन भर से। चढ़ने की भी आवश्यकता नहीं। जो पुल अभी सेना उतारने के लिये बन रहा है, उसे इसी एक वाक्य में एक दूसरा काम भी सौंप दिया गया, और वह काम युद्ध के बाद भी बचा रहेगा।
राम के ये वचन सबके मन को अच्छे लगे, और श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमों को लौट गये। और ठीक यहीं, बिना किसी तैयारी के, कहनेवाला अपनी ओर से एक पंक्ति जोड़ देता है: हे गिरिजा, रघुनाथजी की यह रीति है कि वे शरणागत पर सदा प्रीति करते हैं। इस एक सम्बोधन से पता चलता है कि यह सारा हाल किसके मुँह से चल रहा है। जिनकी स्थापना अभी-अभी समुद्र के किनारे हुई है, वे ही इस समय अपनी पत्नी को यह सुना रहे हैं। और सुनाते समय उन्होंने अपने विषय में कहे गये वाक्यों पर एक शब्द भी नहीं जोड़ा। जो जोड़ा, वह राम के स्वभाव के विषय में है।
सार: राम रामेश्वर के दर्शन और गङ्गाजल चढ़ाने का फल बताते हैं, फिर कहते हैं कि छल छोड़कर निष्काम भाव से इनकी सेवा करनेवाले को शङ्कर उनकी भक्ति देंगे, और उनके बनाये सेतु का दर्शन करनेवाला बिना परिश्रम के भवसागर तर जायगा। मुनि अपने आश्रमों को लौट जाते हैं, और कहनेवाले शङ्कर पार्वती से कहते हैं कि रघुनाथजी शरणागत पर सदा प्रीति करते हैं।
पत्थर जो तैर गये
अब पुल बनकर तैयार है, और तुलसी उसका श्रेय बाँटने बैठते हैं। पहले वे वही करते हैं जो कोई भी करता। वे कारीगरों का नाम लेते हैं।
बाँधा सेतु नील नल नागर । राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥
चौपाई ८
चतुर नल और नील ने सेतु बाँधा, और रामजी की कृपा से उनका यश उजागर हो गया। यश उन्हीं का है और तुलसी उसे छीनते नहीं। पर वे उसके आगे एक शर्त लगा देते हैं, राम कृपाँ। इसके तुरन्त बाद वे उस बात की ओर मुड़ते हैं जिसके कारण यह प्रसंग सदियों से याद रखा जाता है। जो पत्थर स्वयं डूबते हैं और दूसरों को डुबा देते हैं, वे ही जहाज़ के समान हो गये। पत्थर का स्वभाव बदला नहीं है, उसका काम बदल गया है। जो डुबाता था वही पार ले जाने लगा, और डुबाने तथा पार ले जाने के बीच में कुछ भी नया नहीं जोड़ा गया।
और यहाँ वह अर्धाली आती है जिसमें तुलसी तीनों सम्भव उत्तरों को बारी-बारी से काट देते हैं।
महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी॥
चौपाई ९
यह न समुद्र की महिमा कही गयी, न पत्थरों का गुण है, न वानरों की कोई करामात। तीन नाम लिये गये और तीनों इनकार के साथ लिये गये। समुद्र नहीं, क्योंकि पानी वही है जो किसी और पत्थर को उसी दिन डुबा देगा। पत्थर नहीं, क्योंकि वे वही पत्थर हैं जिन्हें अभी-अभी डूबनेवाला कहा गया। वानर नहीं, यद्यपि पहाड़ उन्हीं ने ढोये और पुल उन्हीं के हाथों बना। जिस श्रम को पूरे पन्ने पर इतने प्यार से दिखाया गया, उसी श्रम को अन्त में श्रेय की सूची से हटा दिया गया, और हटानेवाले वही हैं जिन्होंने उसे दिखाया था।
बचा हुआ उत्तर दोहे में है, और वह एक ही पंक्ति में दे दिया जाता है।
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
दोहा ३
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥ ३॥
रघुवीर के प्रताप से पत्थर समुद्र पर तैर गये। ऐसे रामजी को छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामी को जाकर भजते हैं, वे मन्दबुद्धि हैं। दोहे की दोनों पंक्तियाँ अलग-अलग दिशा में जाती दिखती हैं, पर वे एक ही बात हैं। पहली एक घटना है, दूसरी उसका सीधा नतीजा। जब आँखों के सामने पत्थर तैर चुके हों, तब भी किसी और के पास जाना बुद्धि की कमी ही कहा जा सकता है। और यहीं जाम्बवान् की वह पहली बात पूरी तरह खुल जाती है। उन्होंने कहा था कि नाम ही सेतु है। पुल बना, पत्थरों का ही बना, और तैरा वह भी उसी बल पर।
सार: नल और नील सेतु बाँध देते हैं और राम की कृपा से उनका यश फैल जाता है। जो पत्थर स्वयं डूबते और दूसरों को डुबाते थे, वे जहाज़ के समान हो जाते हैं। तुलसी साफ़ कहते हैं कि यह न समुद्र की महिमा है, न पत्थरों का गुण, न वानरों की करामात। दोहे में उत्तर है: रघुवीर के प्रताप से पत्थर तैरे, और ऐसे राम को छोड़कर दूसरे को भजनेवाला मन्दबुद्धि है।
समुद्र के ऊपर एक भीड़
नल और नील ने बाँधकर उसे बहुत मज़बूत बना दिया, और देखने पर वह कृपानिधान के मन को भा गया। सेना चल पड़ी, और उसका वर्णन नहीं हो सकता। योद्धा वानरों के समुदाय गरज रहे हैं। यहाँ से पन्ना फिर चलने लगता है, और चलते-चलते उसमें एक ऐसा दृश्य आ जाता है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।
कृपालु रघुनाथजी सेतुबन्ध के किनारे चढ़कर समुद्र का विस्तार देखने लगे। और उन्हें देखने के लिये सब जलचरों के समूह ऊपर निकल आये। मगर, घड़ियाल, तरह-तरह की मछलियाँ और सर्प, जिनके शरीर सौ-सौ योजन के थे। तुलसी यहीं नहीं रुकते। ऐसे भी जन्तु थे जो उन्हें भी खा जायँ, और किसी-किसी के डर से वे भी डर रहे थे। समुद्र की गहराई में जो खानेवालों और खाये जानेवालों का क्रम चलता है, वह पूरा का पूरा एक साथ पानी के ऊपर आ गया है, और आते ही उसने अपना क्रम भुला दिया है।
वे प्रभु को देख रहे हैं और हटाने से भी नहीं हटते। सबके मन हर्षित हैं, सब सुखी हो गये। उनकी आड़ के कारण पानी दिखायी ही नहीं देता, और वे सब भगवान् का रूप देखकर मग्न हो गये। इस चित्र की सबसे सुन्दर बात यही है कि पानी छिप गया। जिस समुद्र को पार करना इस पूरी कथा की सबसे बड़ी अड़चन थी, उसकी सतह अब दिखती ही नहीं, क्योंकि उस पर देखनेवालों की भीड़ बिछ गयी है।
प्रभु की आज्ञा पाकर सेना चली, और वानरसेना की विपुलता कौन कह सकता है। फिर वह दोहा, जिसमें उस भीड़ का बिलकुल व्यावहारिक नतीजा दर्ज है।
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
दोहा ४
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥ ४॥
सेतुबन्ध पर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्ग से उड़ने लगे और कितने ही जलचरों पर चढ़-चढ़कर पार जाने लगे। इस दोहे को धीरे पढ़िये। जो पुल इतने यत्न से बाँधा गया, उस पर जगह कम पड़ गयी। और जो जीव अभी-अभी दर्शन करने ऊपर आये थे, वे अब सवारी बन गये। किसी ने उनसे कहा नहीं, किसी ने उन्हें पकड़ा नहीं। जो देखने आये थे वही काम आ गये, और यह इस पन्ने की सबसे चुपचाप कही गयी बात है।
ऐसा कौतुक देखकर दोनों भाई हँसते हुए चले, और रघुवीर सेना सहित पार उतर गये। वानरों और उनके सेनापतियों की भीड़ कही नहीं जा सकती। यह हँसी इस पन्ने पर दूसरी बार आयी है। पहली बार पुल की सुन्दर रचना देखकर, और दूसरी बार यह देखकर कि उनकी बनवायी हुई व्यवस्था को उनकी ही सेना ने चलते-चलते बदल दिया है।
सार: पुल मज़बूत बनकर तैयार होता है और सेना गरजती हुई चल पड़ती है। राम सेतु के किनारे चढ़कर समुद्र का विस्तार देखते हैं और उन्हें देखने के लिये सब जलचर ऊपर आ जाते हैं, इतने कि पानी दिखना बन्द हो जाता है। पुल पर भीड़ हो जाने से कुछ वानर आकाश से उड़ते हैं और कुछ जलचरों की पीठ पर चढ़कर पार जाते हैं। दोनों भाई यह कौतुक देखकर हँसते हुए सेना सहित पार उतर जाते हैं।
पार का डेरा, और लङ्का तक पहुँची खबर
समुद्र के पार प्रभु ने डेरा डाला और सब वानरों को आज्ञा दी कि जाकर सुन्दर फल और मूल खाइये। सुनते ही रीछ और वानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े। इस एक आज्ञा में एक पूरे सेनापति का काम रखा हुआ है। अनजान ज़मीन पर पहला डेरा, सामने शत्रु का नगर, और आज्ञा यह कि खाइये।
और तब वह होता है जो केवल इसी कथा में हो सकता है। रामजी के हित के लिये सब वृक्ष ऋतु और कुऋतु का भेद, यानी समय की सारी गति छोड़कर फल उठे। पेड़ों ने मौसम मानना बन्द कर दिया। सेना मीठे फल खा रही है, वृक्षों को हिला रही है, और उसी हाथ से पर्वतों के शिखर लङ्का की ओर फेंक रही है। भोजन और युद्ध के बीच कोई रेखा नहीं खींची गयी। एक ही क्रिया में दोनों चल रहे हैं, और शायद सेना को इसका ध्यान भी नहीं है।
फिर वह हिस्सा, जिसमें तुलसी की कठोरता और उनका विनोद एक साथ दिखते हैं। घूमते-फिरते जहाँ कहीं कोई निशाचर मिल जाता है, सब उसे घेर लेते हैं और खूब नाच नचाते हैं, दाँतों से उसके नाक और कान काट लेते हैं, और फिर प्रभु का सुयश कहलाकर उसे जाने देते हैं। मारते नहीं। छोड़ देते हैं। और छोड़ने से पहले उसी के मुँह से वही नाम कहलवाते हैं जिसके बल पर अभी पत्थर तैरे थे।
छोड़ने का नतीजा वही निकलता है जो निकलना था, और सम्भव है कि यही चाहा भी गया हो। जिनके नाक और कान काट लिये गये, उन्होंने जाकर रावण से सब समाचार कह दिया। और समुद्र के बाँधे जाने की बात कानों में पड़ते ही वह घबराकर दसों मुँह से बोल उठा।
बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।
दोहा ५
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥ ५॥
इस दोहे में कथा नहीं है, केवल नाम हैं। वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, बारीस, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीस। दस नाम, और उनके बीच में अपनी ओर का एक ही शब्द, सत्य। क्या सचमुच बाँध लिया गया। जिसके दस मुँह हैं वह घबराहट में एक ही चीज़ के दस नाम गिन रहा है, और हर नाम के साथ वह उसी बात को दोहरा रहा है जिसे वह मानना नहीं चाहता। रावण का डर इससे साफ़ कहीं नहीं लिखा गया, और लिखने के लिये तुलसी ने उसके लिये एक भी विशेषण ख़र्च नहीं किया। उन्होंने बस समुद्र के नाम गिनवा दिये।
सार: पार उतरकर सेना डेरा डालती है, राम की आज्ञा से फल-मूल खाती है, और सब वृक्ष ऋतु का नियम छोड़कर फल देने लगते हैं। वानर पर्वतशिखर लङ्का की ओर फेंकते हैं और जो निशाचर हाथ आता है उसके नाक-कान काटकर, राम का यश कहलाकर छोड़ देते हैं। वही जाकर रावण को खबर देते हैं, और समुद्र के बँध जाने की बात सुनते ही रावण दसों मुँह से समुद्र के दस नाम गिनता हुआ बोल उठता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो चीज़ें साथ-साथ बनती हैं, और दोनों का सामान एक ही जगह से आता है। एक पुल है, जो पहाड़ों और पत्थरों से बनता है। दूसरा एक सम्बन्ध है, जो वन्दना, स्थापना और दो-चार कड़े वाक्यों से बनता है। तुलसी ने इन्हें अलग-अलग जगह नहीं रखा। जिस समय वानर पहाड़ ढो रहे हैं, उसी समय यह तय हो रहा है कि राम का भक्त होने की शर्त क्या है। और जिस समय शिवलिङ्ग की पूजा हो रही है, उसी समय समुद्र में शिलाएँ गिर रही हैं। काम और पूजा को जोड़नेवाली कोई कड़ी अलग से नहीं दी गयी, क्योंकि तुलसी के यहाँ वे दो चीज़ें हैं ही नहीं।
दूसरी बात श्रेय की है, और वह इस प्रसंग की सबसे बारीक बात है। तुलसी मेहनत को छिपाते नहीं। वानर दौड़ते हैं, गरजते हैं, पहाड़ उखाड़ते हैं। नल और नील पत्थरों को गेंद की तरह लेते हैं और रचना इतनी सुन्दर बनाते हैं कि देखकर हँसी आ जाती है। यह सब पूरे ब्यौरे के साथ लिखा गया है, और इतने चाव से लिखा गया है कि पढ़ते हुए हाथ थकने लगते हैं। और फिर, ठीक उसके बाद, एक अर्धाली आकर तीनों का नाम इनकार के साथ ले लेती है। इसमें किसी का अपमान नहीं है। इसमें केवल यह कहा गया है कि कर्ता होना और कारण होना दो अलग चीज़ें हैं, और पन्ना दोनों को उनकी अपनी जगह पर बिठा देता है।
और तीसरी बात, जो सबसे आसानी से छूट जाती है। इस पूरे पन्ने पर एक भी शत्रु नहीं मारा जाता। जो निशाचर पकड़े जाते हैं वे भी छोड़ दिये जाते हैं, और छोड़ते समय उनसे राम का यश कहलवाया जाता है। छठे सोपान का पहला पन्ना, जिसके बाद रामचरितमानस का सबसे बड़ा युद्ध शुरू होने वाला है, असल में एक निर्माण का, एक पूजा का और एक भोजन का पन्ना है। लड़ाई अगले प्रसंग से पहले नहीं आती, और यह क्रम तुलसी ने जान-बूझकर रखा है।
जाम्बवान् की वह पंक्ति, जो इस पन्ने के लगभग आरम्भ में आती है और जिसे सुनकर कोई रुकता नहीं, अन्त तक आते-आते पूरी हो जाती है। उन्होंने कहा था कि सबसे बड़ा सेतु आपका नाम है और उस पर चढ़कर लोग भवसागर से पार होते हैं। इसके बाद पूरा पन्ना पत्थरों का ब्यौरा देता रहा, और अन्त में उन्हीं पत्थरों के विषय में यह लिखा गया कि तैरना उनका गुण नहीं था। बीच में राम ने अपने बनाये सेतु के विषय में ठीक वही वाक्य कहा जो जाम्बवान् ने नाम के विषय में कहा था, कि जो इसका दर्शन करेगा वह बिना परिश्रम के तर जायगा। एक ही बात तीन जगह, तीन रूपों में, और तीनों बार किसी दूसरे के मुँह से।
और उस पार बैठे हुए आदमी ने इस पूरी बात में से केवल एक टुकड़ा सुना, कि समुद्र बँध गया। उसे न कारीगरों का नाम बताया गया, न उस स्थापना का हाल, न वे वाक्य जो उसी किनारे पर भक्ति की शर्त के रूप में कहे गये थे। जो कहने गये थे उनके नाक और कान कटे हुए थे, और उनके पास कहने को एक ही बात थी। खबर पहुँची, पर अधूरी पहुँची, और अगला प्रसंग इसी अधूरी खबर के बाद खुलता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, दोहा १ से ५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।