राग सूही
शाम के बाद का राग, स्नेह का स्वर।
सूही राग शाम के बाद का है। अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर बैठा हुआ, स्नेह-भरा सुर। "सूही-दी-लावां", जो गुरु राम दास जी की रचना है, इसी राग में बँधी है, और सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है।
ग्रंथ में यह राग सात-सौ-इक्कीस के क़रीब से शुरू होता है। नाम का सम्बन्ध "सुहाग" या "सुहागिन" से जुड़ा बताया जाता है, और स्वर का मिज़ाज इसी अर्थ की पुष्टि करता है।
"हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥" सूही M4, लावां
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (39)
- भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥अंग 728
- अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥अंग 728
- उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥अंग 729
- जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला ॥अंग 729
- जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥अंग 729
- भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥अंग 730
- जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ ॥अंग 730
- जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चड़ाईऐ ॥अंग 730
- कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥अंग 730
- सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥अंग 750
- माणस जनमु दुलंभु गुरमुखि पाइआ ॥अंग 751
- जिउ आरणि लोहा पाइ भंनि घड़ाईऐ ॥अंग 752
- मनहु न नामु विसारि अहिनिसि धिआईऐ ॥अंग 752
- गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥अंग 763
- हम घरि साजन आए ॥अंग 764
- आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥अंग 764
- जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥अंग 765
- मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥अंग 766
- सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥अंग 786
- वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥अंग 788
- उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥अंग 788
- नानक इहु तनु जालि जिनि जलिऐ नामु विसारिआ ॥अंग 789
- नानक मन के कंम फिटिआ गणत न आवही ॥अंग 789
- नानक बदरा माल का भीतरि धरिआ आणि ॥अंग 789
- नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥अंग 789
- दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥अंग 789
- राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥अंग 789
- चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥अंग 790
- बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥अंग 790
- सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं संम्रथु दातारु ॥अंग 790
- इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥अंग 790
- सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥अंग 790
- हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥अंग 790
- जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥अंग 790
- सउ ओलाम॑े दिनै के राती मिलनि॑ सहंस ॥अंग 790
- दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥अंग 791
- सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥अंग 791
- काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥अंग 791
- पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥अंग 791
महला 2 (11)
- जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥अंग 787
- राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥अंग 787
- बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥अंग 787
- मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥अंग 787
- जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥अंग 788
- तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥अंग 788
- नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥अंग 791
- पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥अंग 791
- मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥अंग 791
- किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥अंग 791
- जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥अंग 792
महला 3 (46)
- नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥अंग 753
- काइआ कामणि अति सुआलि॑उ पिरु वसै जिसु नाले ॥अंग 754
- दुनीआ न सालाहि जो मरि वंञसी ॥अंग 755
- हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥अंग 756
- सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥अंग 767
- सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥अंग 768
- सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥अंग 769
- जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥अंग 769
- हरि हरे हरि गुण गावहु हरि गुरमुखे पाए राम ॥अंग 770
- जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥अंग 771
- सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे राम ॥अंग 772
- सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥अंग 785
- सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम॑ालि ॥अंग 785
- आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥अंग 785
- सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥अंग 785
- लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥अंग 785
- हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥अंग 786
- सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥अंग 786
- सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥अंग 786
- आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥अंग 786
- सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥अंग 786
- इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥अंग 786
- सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥अंग 786
- मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥अंग 787
- मोहु कूड़ु कुटंबु है मनमुखु मुगधु रता ॥अंग 787
- सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंनि॑ ॥अंग 787
- भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंनि॑ ॥अंग 787
- कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥अंग 787
- तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥अंग 787
- करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥अंग 787
- सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥अंग 788
- कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥अंग 788
- काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥अंग 788
- धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥अंग 788
- भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥अंग 788
- हरि सालाही सदा सदा तनु मनु सउपि सरीरु ॥अंग 789
- सचा अमरु चलाइओनु करि सचु फुरमाणु ॥अंग 789
- आपे हुकमु चलाइदा जगु धंधै लाइआ ॥अंग 789
- काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥अंग 789
- माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥अंग 790
- दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥अंग 790
- ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥अंग 790
- जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥अंग 791
- आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥अंग 791
- हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥अंग 791
- हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥अंग 792
महला 4 (23)
- मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥अंग 731
- हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥अंग 731
- हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥अंग 731
- हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥अंग 732
- गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥अंग 732
- हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥अंग 732
- जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥अंग 733
- नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥अंग 733
- तिन॑ी अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥अंग 733
- जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥अंग 733
- जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥अंग 734
- तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥अंग 735
- तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥अंग 735
- जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥अंग 735
- कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥अंग 736
- कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥1॥अंग 757
- अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥अंग 758
- हउमै रोगु गइआ भउ भागा सहजे सहजि मिलाइआ ॥अंग 773
- धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥अंग 773
- गुरमुखि हरि गुण गाए ॥अंग 774
- आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥अंग 775
- गुरु संत जनो पिआरा मै मिलिआ मेरी त्रिसना बुझि गईआसे ॥अंग 776
- मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥अंग 776
महला 5 (71)
- बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥अंग 736
- कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥अंग 736
- धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥अंग 737
- ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥अंग 737
- उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥अंग 737
- किआ गुण तेरे सारि सम॑ाली मोहि निरगुन के दातारे ॥अंग 738
- सेवा थोरी मागनु बहुता ॥अंग 738
- बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥अंग 738
- घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥अंग 739
- लालनु राविआ कवन गती री ॥अंग 739
- तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥अंग 739
- सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥अंग 739
- जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥अंग 739
- रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥अंग 740
- घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥अंग 740
- कवन काज माइआ वडिआई ॥अंग 740
- सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥अंग 740
- गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥अंग 740
- लोभि मोहि मगन अपराधी ॥अंग 740
- पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥अंग 741
- जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥अंग 741
- गुरु परमेसरु करणैहारु ॥अंग 741
- गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥अंग 741
- दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥अंग 742
- मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥अंग 742
- गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥अंग 742
- बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥अंग 742
- अनिक बींग दास के परहरिआ ॥अंग 742
- दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥अंग 743
- प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥अंग 743
- गुर पूरे जब भए दइआल ॥अंग 743
- से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥अंग 743
- बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥अंग 743
- साधसंगि तरै भै सागरु ॥अंग 744
- घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥अंग 744
- संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥अंग 744
- जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 744
- गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥अंग 744
- तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥अंग 744
- दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥अंग 745
- भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥अंग 745
- हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥अंग 745
- जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥अंग 745
- प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥अंग 746
- रासि मंडलु कीनो आखारा ॥अंग 746
- तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥अंग 746
- सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥अंग 746
- तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥अंग 747
- विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥अंग 747
- करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥अंग 747
- जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥अंग 748
- महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥अंग 748
- जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥अंग 748
- पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥अंग 749
- तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥अंग 749
- जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥अंग 749
- सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥अंग 750
- उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥अंग 759
- मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥अंग 760
- जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥अंग 761
- सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥अंग 761
- सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥अंग 777
- गोबिंद गुण गावण लागे ॥अंग 778
- तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥अंग 779
- साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥अंग 780
- करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥अंग 780
- हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥अंग 781
- भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥अंग 782
- अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥अंग 783
- संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कंमु करावणि आइआ राम ॥अंग 783
- मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥अंग 784
भगत कबीर जी (5)
भगत रविदास जी (3)
- सह की सार सुहागनि जानै ॥अंग 793
- जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥अंग 793
- ऊचे मंदर साल रसोई ॥अंग 794
शेख़ फ़रीद जी (2)
- तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥अंग 794
- सूही ललित ॥अंग 794
संबंधित पृष्ठ
- लावां (M4, विवाह-गीत): अंग 773-774
- आदि ग्रंथ index