राग सूही
शाम के बाद का राग, स्नेह का स्वर।
सूही राग शाम के बाद का है। अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर बैठा हुआ, स्नेह-भरा सुर। “सूही-दी-लावां”, जो गुरु राम दास जी की रचना है, इसी राग में बँधी है, और सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है।
ग्रंथ में यह राग सात-सौ-इक्कीस के क़रीब से शुरू होता है। नाम का सम्बन्ध “सुहाग” या “सुहागिन” से जुड़ा बताया जाता है, और स्वर का मिज़ाज इसी अर्थ की पुष्टि करता है।
“हरि पहिलड़ी लाव परविरती कर्म दृड़ाइआ बलि राम जीउ ।” सूही M4, लावां
इस राग के सब अंग
संबंधित पृष्ठ
- लावां (M4, विवाह-गीत): अंग 773-774
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