लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग सूही

राग · M1-M5 + भगत

राग सूही

शाम के बाद का राग, स्नेह का स्वर।

सूही राग शाम के बाद का है। अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर बैठा हुआ, स्नेह-भरा सुर। "सूही-दी-लावां", जो गुरु राम दास जी की रचना है, इसी राग में बँधी है, और सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है।

ग्रंथ में यह राग सात-सौ-इक्कीस के क़रीब से शुरू होता है। नाम का सम्बन्ध "सुहाग" या "सुहागिन" से जुड़ा बताया जाता है, और स्वर का मिज़ाज इसी अर्थ की पुष्टि करता है।

"हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥" सूही M4, लावां
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (39)
  1. भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥अंग 728
  2. अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥अंग 728
  3. उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥अंग 729
  4. जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला ॥अंग 729
  5. जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥अंग 729
  6. भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥अंग 730
  7. जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ ॥अंग 730
  8. जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चड़ाईऐ ॥अंग 730
  9. कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥अंग 730
  10. सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥अंग 750
  11. माणस जनमु दुलंभु गुरमुखि पाइआ ॥अंग 751
  12. जिउ आरणि लोहा पाइ भंनि घड़ाईऐ ॥अंग 752
  13. मनहु न नामु विसारि अहिनिसि धिआईऐ ॥अंग 752
  14. गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥अंग 763
  15. हम घरि साजन आए ॥अंग 764
  16. आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥अंग 764
  17. जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥अंग 765
  18. मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥अंग 766
  19. सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥अंग 786
  20. वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥अंग 788
  21. उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥अंग 788
  22. नानक इहु तनु जालि जिनि जलिऐ नामु विसारिआ ॥अंग 789
  23. नानक मन के कंम फिटिआ गणत न आवही ॥अंग 789
  24. नानक बदरा माल का भीतरि धरिआ आणि ॥अंग 789
  25. नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥अंग 789
  26. दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥अंग 789
  27. राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥अंग 789
  28. चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥अंग 790
  29. बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥अंग 790
  30. सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं संम्रथु दातारु ॥अंग 790
  31. इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥अंग 790
  32. सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥अंग 790
  33. हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥अंग 790
  34. जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥अंग 790
  35. सउ ओलाम॑े दिनै के राती मिलनि॑ सहंस ॥अंग 790
  36. दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥अंग 791
  37. सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥अंग 791
  38. काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥अंग 791
  39. पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥अंग 791
महला 2 (11)
  1. जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥अंग 787
  2. राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥अंग 787
  3. बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥अंग 787
  4. मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥अंग 787
  5. जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥अंग 788
  6. तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥अंग 788
  7. नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥अंग 791
  8. पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥अंग 791
  9. मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥अंग 791
  10. किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥अंग 791
  11. जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥अंग 792
महला 3 (46)
  1. नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥अंग 753
  2. काइआ कामणि अति सुआलि॑उ पिरु वसै जिसु नाले ॥अंग 754
  3. दुनीआ न सालाहि जो मरि वंञसी ॥अंग 755
  4. हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥अंग 756
  5. सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥अंग 767
  6. सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥अंग 768
  7. सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥अंग 769
  8. जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥अंग 769
  9. हरि हरे हरि गुण गावहु हरि गुरमुखे पाए राम ॥अंग 770
  10. जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥अंग 771
  11. सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे राम ॥अंग 772
  12. सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥अंग 785
  13. सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम॑ालि ॥अंग 785
  14. आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥अंग 785
  15. सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥अंग 785
  16. लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥अंग 785
  17. हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥अंग 786
  18. सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥अंग 786
  19. सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥अंग 786
  20. आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥अंग 786
  21. सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥अंग 786
  22. इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥अंग 786
  23. सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥अंग 786
  24. मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥अंग 787
  25. मोहु कूड़ु कुटंबु है मनमुखु मुगधु रता ॥अंग 787
  26. सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंनि॑ ॥अंग 787
  27. भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंनि॑ ॥अंग 787
  28. कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥अंग 787
  29. तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥अंग 787
  30. करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥अंग 787
  31. सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥अंग 788
  32. कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥अंग 788
  33. काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥अंग 788
  34. धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥अंग 788
  35. भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥अंग 788
  36. हरि सालाही सदा सदा तनु मनु सउपि सरीरु ॥अंग 789
  37. सचा अमरु चलाइओनु करि सचु फुरमाणु ॥अंग 789
  38. आपे हुकमु चलाइदा जगु धंधै लाइआ ॥अंग 789
  39. काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥अंग 789
  40. माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥अंग 790
  41. दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥अंग 790
  42. ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥अंग 790
  43. जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥अंग 791
  44. आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥अंग 791
  45. हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥अंग 791
  46. हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥अंग 792
महला 4 (23)
  1. मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥अंग 731
  2. हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥अंग 731
  3. हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥अंग 731
  4. हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥अंग 732
  5. गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥अंग 732
  6. हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥अंग 732
  7. जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥अंग 733
  8. नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥अंग 733
  9. तिन॑ी अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥अंग 733
  10. जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥अंग 733
  11. जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥अंग 734
  12. तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥अंग 735
  13. तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥अंग 735
  14. जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥अंग 735
  15. कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥अंग 736
  16. कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥1॥अंग 757
  17. अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥अंग 758
  18. हउमै रोगु गइआ भउ भागा सहजे सहजि मिलाइआ ॥अंग 773
  19. धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥अंग 773
  20. गुरमुखि हरि गुण गाए ॥अंग 774
  21. आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥अंग 775
  22. गुरु संत जनो पिआरा मै मिलिआ मेरी त्रिसना बुझि गईआसे ॥अंग 776
  23. मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥अंग 776
महला 5 (71)
  1. बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥अंग 736
  2. कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥अंग 736
  3. धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥अंग 737
  4. ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥अंग 737
  5. उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥अंग 737
  6. किआ गुण तेरे सारि सम॑ाली मोहि निरगुन के दातारे ॥अंग 738
  7. सेवा थोरी मागनु बहुता ॥अंग 738
  8. बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥अंग 738
  9. घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥अंग 739
  10. लालनु राविआ कवन गती री ॥अंग 739
  11. तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥अंग 739
  12. सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥अंग 739
  13. जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥अंग 739
  14. रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥अंग 740
  15. घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥अंग 740
  16. कवन काज माइआ वडिआई ॥अंग 740
  17. सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥अंग 740
  18. गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥अंग 740
  19. लोभि मोहि मगन अपराधी ॥अंग 740
  20. पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥अंग 741
  21. जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥अंग 741
  22. गुरु परमेसरु करणैहारु ॥अंग 741
  23. गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥अंग 741
  24. दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥अंग 742
  25. मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥अंग 742
  26. गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥अंग 742
  27. बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥अंग 742
  28. अनिक बींग दास के परहरिआ ॥अंग 742
  29. दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥अंग 743
  30. प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥अंग 743
  31. गुर पूरे जब भए दइआल ॥अंग 743
  32. से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥अंग 743
  33. बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥अंग 743
  34. साधसंगि तरै भै सागरु ॥अंग 744
  35. घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥अंग 744
  36. संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥अंग 744
  37. जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 744
  38. गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥अंग 744
  39. तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥अंग 744
  40. दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥अंग 745
  41. भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥अंग 745
  42. हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥अंग 745
  43. जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥अंग 745
  44. प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥अंग 746
  45. रासि मंडलु कीनो आखारा ॥अंग 746
  46. तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥अंग 746
  47. सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥अंग 746
  48. तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥अंग 747
  49. विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥अंग 747
  50. करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥अंग 747
  51. जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥अंग 748
  52. महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥अंग 748
  53. जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥अंग 748
  54. पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥अंग 749
  55. तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥अंग 749
  56. जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥अंग 749
  57. सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥अंग 750
  58. उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥अंग 759
  59. मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥अंग 760
  60. जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥अंग 761
  61. सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥अंग 761
  62. सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥अंग 777
  63. गोबिंद गुण गावण लागे ॥अंग 778
  64. तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥अंग 779
  65. साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥अंग 780
  66. करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥अंग 780
  67. हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥अंग 781
  68. भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥अंग 782
  69. अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥अंग 783
  70. संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कंमु करावणि आइआ राम ॥अंग 783
  71. मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥अंग 784
भगत कबीर जी (5)
  1. अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥अंग 792
  2. ना जानउ किआ करसी पीउ ॥1॥अंग 792
  3. अमलु सिरानो लेखा देना ॥अंग 792
  4. थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ ॥अंग 793
  5. एकु कोटु पंच सिकदारा पंचे मागहि हाला ॥अंग 793
भगत रविदास जी (3)
  1. सह की सार सुहागनि जानै ॥अंग 793
  2. जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥अंग 793
  3. ऊचे मंदर साल रसोई ॥अंग 794
शेख़ फ़रीद जी (2)
  1. तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥अंग 794
  2. सूही ललित ॥अंग 794

संबंधित पृष्ठ