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अंग 794

अंग
794
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
किआ तू सोइआ जागु इआना ॥
तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अंबरावै ॥
सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥
करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥
हिरदै नामु सम॑ारि सवेरा ॥2॥
जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥
सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥
कहि रविदास निदानि दिवाने ॥
चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥3॥2॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे अंजान ! होश कर ! आप क्यों सो रहा है। आप जगत में इस जीवन को सदा कायम रहने वाला समझ बैठा है। 1।रहाउ। (आप हर वक्त रिजक की ही फिक्र में रहता है।देख) जिस प्रभू ने जिंद दी है।वह रिजक भी पहुँचाता है। सारे शरीरों में बैठा हुआ वह स्वयं रिजक के आहर पैदा कर रहा है। मैं (इतना बड़ा हॅूँ) मेरी (इतनी मल्कियत है) – छोड़ ये बातें।प्रभू की बंदगी कर। अब वक्त रहते उसका नाम अपने दिल में संभाल। 2। उम्र बीतने पर आ रही है।पर तूने अपना राह सही नहीं बनाया; शाम पड़ रही है।हर तरफ अंधकार ही अंधकार छाने वाला है। रविदास कहता है, हे कमले मनुष्य ! आप प्रभू को याद नहीं करता। दुनिया (जिससे आप मन जोड़े बैठा है) अंत में नाश हैं जाने वाली है। 3। 2।
सूही ॥
ऊचे मंदर साल रसोई ॥
एक घरी फुनि रहनु न होई ॥1॥
इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥1॥ रहाउ ॥
भाई बंध कुटंब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥2॥
घर की नारि उरहि तन लागी ॥
उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥3॥
कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥
हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥4॥3॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: सूही ॥ (अगर) ऊँचे-ऊँचे पक्के घर व रसोईखाने हों (तो भी क्या हुआ।) मौत आने से (इनमें) एक घड़ी भी (ज्यादा) रहने को नहीं मिलता। 1। (पक्के घर आदि तो कहाँ रहे) ये शरीर (भी) घास के छप्पर की तरह ही है। घास जल जाती है।और मिट्टी में मिल जाती है (यही हाल शरीर का होता है)। 1।रहाउ। (जब मनुष्य मर जाता है तब) रिश्तेदार।परिवार।सज्जन। साथी – ये सभी कहने लग जाते हैं कि इसे अब जल्दी बाहर निकालो। 2। अपनी पत्नी (भी) जो सदा (मनुष्य) के साथ लगी रहती थी। ये कह के परे हट जाती है ये तो अब मर गया है।मर गया। 3। रविदास कहता है, सारा जगत ही (शरीर को।जायदाद को।संबन्धियों को अपना समझ के) ठगा जा रहा है। पर मैं एक परमात्मा का नाम सिमर के (इस ठगी से) बचा हूँ। 4। 3।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥
तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥
बावलि होई सो सहु लोरउ ॥
तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥
मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥1॥
तै साहिब की मै सार न जानी ॥
जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥1॥ रहाउ ॥
काली कोइल तू कित गुन काली ॥
अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥
पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥
जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥2॥
विधण खूही मुंध इकेली ॥
ना को साथी ना को बेली ॥
करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥
जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥3॥
वाट हमारी खरी उडीणी ॥
खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥
उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥
सेख फरीदा पंथु सम॑ारि सवेरा ॥4॥1॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥ बड़ी दुखी हो के।बड़ी तड़फ के अब मैं हाथ मल रही हूँ। पागल हो के अब मैं उस पति को तलाशती फिरती हूँ। हे पति प्रभू ! आपका कोई दोष (मेरी इस बुरी हालत के लिए) नहीं। मेरे में ही अवगुण थे।तभी तूने अपने मन में मेरे साथ रोष किया। 1। हे मेरे मालिक ! मैंने आपकी कद्र नहीं जानी। जवानी का समय गवा के अब बाद में मैं झुर रही हूँ। 1।रहाउ। (अब मैं कोयल को पूछती फिरती हूँ-) हे काली कोयल ! (भला।मैं तो अपने कर्मों की मारी दुखी जली सड़ी हुई हूँ) आप भी क्यों काली (हो गई) है। (कोयल भी यही उक्तर देती है) मुझे मेरे प्रीतम के विछोड़े ने जला डाला है। (ठीक है) पति से विछुड़ के कहीं कोई सुख पा सकी है।(पर। जीव-स्त्री के वश की भी बात नहीं) जब प्रभू खुद मेहरवान होता है तो खुद ही मिला लेता है। 2। (इस जगत रूप) डरावने कूएं में मैं जीव-स्त्री अकेली (गिर गई थी। यहाँ) कोई मेरा साथी नहीं (मेरे दुखों में) कोई मेरा मददगार नहीं। अब जब प्रभू ने मेहर करके मुझे सत्संग में मिलाया है। (सत्संग में आ के) जब मैं देखती हूँ तो मुझे मेरा रॅब बेली दिख रहा है। 3। हे भाई ! हमारा यह जीवन-पथ बहुत भयावह है। खंडे से भी तीखा है। बड़ी तेज धार वाला है; इसके ऊपर से हमें गुजरना है।इस वास्ते। हे फरीद ! सुबह-सुबह रास्ता संभाल। 4। 1।
सूही ललित ॥
बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला ॥
भरि सरवरु जब ऊछलै तब तरणु दुहेला ॥1॥
हथु न लाइ कसुंभड़ै जलि जासी ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
इक आपीन॑ै पतली सह केरे बोला ॥
दुधा थणी न आवई फिरि होइ न मेला ॥2॥
कहै फरीदु सहेलीहो सहु अलाएसी ॥
हंसु चलसी डुंमणा अहि तनु ढेरी थीसी ॥3॥2॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: सूही ललित ॥ (जिस मनुष्य ने माया से ही मन लगाए रखा) वह (बेड़ा) तैयार करने की उम्र में नाम-रूप बेड़ा तैयार ना कर सका।और। जब सरोवर (लबालब) भर के (बाहर) उछलने लग पड़ता है तब इसमें तैरना मुश्किल हो जाता है (भाव।जब मनुष्य विकारों की अति कर देता है तो इनके चस्के में से निकलना दुश्वार हो जाता है)। 1। हे सज्जन ! दगाबाज माया के साथ ही अपने मन को ना जोड़े रख।ये माया चार दिन की खेल है। 1। जो जीव-सि्त्रयाँ (माया से मोह डालने के कारण) अपने आप में कमजोर आत्मिक जीवन वाली हैं जाती हैं।उनको (प्रभू-) पति के दर से निरादरी के बोल नसीब होते हैं; उनपे पति के मिलाप की अवस्था नहीं आती और मानस जन्म का समय हाथ से छूट जाने पर (जब नाम-सिमरन का बेड़ा तैयार हो सकता था) प्रभू से मेल नहीं हो सकता। 2। फरीद कहता है, हे सहेलियो ! जब पति-प्रभू का बुलावा (इस जगत में से चलने के लिए) आएगा। तो (माया में ही ग्रसी रहने वाली जीव-स्त्री का) आत्मा-हंस दुबिधा में (दुचिती में यहाँ से) जाएगा (भाव।माया से विछुड़ने का चित्त नहीं करेगा)। 3। 2।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे अंजान ! होश कर ! आप क्यों सो रहा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।