तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अंबरावै ॥
सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥
करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥
हिरदै नामु सम॑ारि सवेरा ॥2॥
जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥
सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥
कहि रविदास निदानि दिवाने ॥
चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥3॥2॥
ऊचे मंदर साल रसोई ॥
एक घरी फुनि रहनु न होई ॥1॥
इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥1॥ रहाउ ॥
भाई बंध कुटंब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥2॥
घर की नारि उरहि तन लागी ॥
उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥3॥
कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥
हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥4॥3॥
रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥
तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥
बावलि होई सो सहु लोरउ ॥
तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥
मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥1॥
तै साहिब की मै सार न जानी ॥
जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥1॥ रहाउ ॥
काली कोइल तू कित गुन काली ॥
अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥
पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥
जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥2॥
विधण खूही मुंध इकेली ॥
ना को साथी ना को बेली ॥
करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥
जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥3॥
वाट हमारी खरी उडीणी ॥
खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥
उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥
सेख फरीदा पंथु सम॑ारि सवेरा ॥4॥1॥
बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला ॥
भरि सरवरु जब ऊछलै तब तरणु दुहेला ॥1॥
हथु न लाइ कसुंभड़ै जलि जासी ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
इक आपीन॑ै पतली सह केरे बोला ॥
दुधा थणी न आवई फिरि होइ न मेला ॥2॥
कहै फरीदु सहेलीहो सहु अलाएसी ॥
हंसु चलसी डुंमणा अहि तनु ढेरी थीसी ॥3॥2॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे अंजान ! होश कर ! आप क्यों सो रहा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।