अंग 755

अंग
755
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੧੦
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦੁਨੀਆ ਨ ਸਾਲਾਹਿ ਜੋ ਮਰਿ ਵੰਞਸੀ ॥
ਲੋਕਾ ਨ ਸਾਲਾਹਿ ਜੋ ਮਰਿ ਖਾਕੁ ਥੀਈ ॥੧॥
ਵਾਹੁ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਵਾਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸਲਾਹੀਐ ਸਚਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਨੀਆ ਕੇਰੀ ਦੋਸਤੀ ਮਨਮੁਖ ਦਝਿ ਮਰੰਨਿ ॥
ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਵੇਲਾ ਨ ਲਾਹੰਨਿ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਨਮੁ ਸਕਾਰਥਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਲਗੰਨਿ ॥
ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਆ ਸਹਜੇ ਸੁਖਿ ਰਹੰਨਿ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਰਚੰਨਿ ॥
ਤਿਸਨਾ ਭੁਖ ਨ ਉਤਰੈ ਅਨਦਿਨੁ ਜਲਤ ਫਿਰੰਨਿ ॥੪॥
ਦੁਸਟਾ ਨਾਲਿ ਦੋਸਤੀ ਨਾਲਿ ਸੰਤਾ ਵੈਰੁ ਕਰੰਨਿ ॥
ਆਪਿ ਡੁਬੇ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਸਗਲੇ ਕੁਲ ਡੋਬੰਨਿ ॥੫॥
ਨਿੰਦਾ ਭਲੀ ਕਿਸੈ ਕੀ ਨਾਹੀ ਮਨਮੁਖ ਮੁਗਧ ਕਰੰਨਿ ॥
ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਤਿਨ ਨਿੰਦਕਾ ਨਰਕੇ ਘੋਰਿ ਪਵੰਨਿ ॥੬॥
ਏ ਮਨ ਜੈਸਾ ਸੇਵਹਿ ਤੈਸਾ ਹੋਵਹਿ ਤੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਆਪਿ ਬੀਜਿ ਆਪੇ ਹੀ ਖਾਵਣਾ ਕਹਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥੭॥
ਮਹਾ ਪੁਰਖਾ ਕਾ ਬੋਲਣਾ ਹੋਵੈ ਕਿਤੈ ਪਰਥਾਇ ॥
ਓਇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਭਰੇ ਭਰਪੂਰ ਹਹਿ ਓਨਾ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ॥੮॥
ਗੁਣਕਾਰੀ ਗੁਣ ਸੰਘਰੈ ਅਵਰਾ ਉਪਦੇਸੇਨਿ ॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿ ਓਨਾ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਲਏਨਿ ॥੯॥
ਦੇਸੀ ਰਿਜਕੁ ਸੰਬਾਹਿ ਜਿਨਿ ਉਪਾਈ ਮੇਦਨੀ ॥
ਏਕੋ ਹੈ ਦਾਤਾਰੁ ਸਚਾ ਆਪਿ ਧਣੀ ॥੧੦॥
ਸੋ ਸਚੁ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਦਾ ਸਮਾਲਿ ॥੧੧॥
ਮਨੁ ਮੈਲਾ ਸਚੁ ਨਿਰਮਲਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਮਿਲਿਆ ਜਾਇ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲੇ ਤਾ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇ ॥੧੨॥
ਸੋ ਸਹੁ ਸਚਾ ਵੀਸਰੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਨਾ ਵੀਸਰੈ ਗੁਰਮਤੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥੧੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਤਾ ਮਿਲਿ ਰਹਾ ਸਾਚੁ ਰਖਾ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਮਿਲਿਆ ਹੋਇ ਨ ਵੀਛੁੜੈ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੧੪॥
ਪਿਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਨਾਰਿ ॥੧੫॥
ਮਨਮੁਖ ਮਨੁ ਨ ਭਿਜਈ ਅਤਿ ਮੈਲੇ ਚਿਤਿ ਕਠੋਰ ॥
ਸਪੈ ਦੁਧੁ ਪੀਆਈਐ ਅੰਦਰਿ ਵਿਸੁ ਨਿਕੋਰ ॥੧੬॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਆਪੇ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੈਲੁ ਉਤਰੈ ਤਾ ਸਚੁ ਬਣਿਆ ਸੀਗਾਰੁ ॥੧੭॥
रागु सूही महला ३ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुनीआ न सालाहि जो मरि वंञसी ॥
लोका न सालाहि जो मरि खाकु थीई ॥१॥
वाहु मेरे साहिबा वाहु ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ सचा वेपरवाहु ॥१॥ रहाउ ॥
दुनीआ केरी दोसती मनमुख दझि मरंनि ॥
जम पुरि बधे मारीअहि वेला न लाहंनि ॥२॥
गुरमुखि जनमु सकारथा सचै सबदि लगंनि ॥
आतम रामु प्रगासिआ सहजे सुखि रहंनि ॥३॥
गुर का सबदु विसारिआ दूजै भाइ रचंनि ॥
तिसना भुख न उतरै अनदिनु जलत फिरंनि ॥४॥
दुसटा नालि दोसती नालि संता वैरु करंनि ॥
आपि डुबे कुटंब सिउ सगले कुल डोबंनि ॥५॥
निंदा भली किसै की नाही मनमुख मुगध करंनि ॥
मुह काले तिन निंदका नरके घोरि पवंनि ॥६॥
ए मन जैसा सेवहि तैसा होवहि तेहे करम कमाइ ॥
आपि बीजि आपे ही खावणा कहणा किछू न जाइ ॥७॥
महा पुरखा का बोलणा होवै कितै परथाइ ॥
ओइ अंम्रित भरे भरपूर हहि ओना तिलु न तमाइ ॥८॥
गुणकारी गुण संघरै अवरा उपदेसेनि ॥
से वडभागी जि ओना मिलि रहे अनदिनु नामु लएनि ॥९॥
देसी रिजकु संबाहि जिनि उपाई मेदनी ॥
एको है दातारु सचा आपि धणी ॥१०॥
सो सचु तेरै नालि है गुरमुखि नदरि निहालि ॥
आपे बखसे मेलि लए सो प्रभु सदा समालि ॥११॥
मनु मैला सचु निरमला किउ करि मिलिआ जाइ ॥
प्रभु मेले ता मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥१२॥
सो सहु सचा वीसरै ध्रिगु जीवणु संसारि ॥
नदरि करे ना वीसरै गुरमती वीचारि ॥१३॥
सतिगुरु मेले ता मिलि रहा साचु रखा उर धारि ॥
मिलिआ होइ न वीछुड़ै गुर कै हेति पिआरि ॥१४॥
पिरु सालाही आपणा गुर कै सबदि वीचारि ॥
मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सोभावंती नारि ॥१५॥
मनमुख मनु न भिजई अति मैले चिति कठोर ॥
सपै दुधु पीआईऐ अंदरि विसु निकोर ॥१६॥
आपि करे किसु आखीऐ आपे बखसणहारु ॥
गुर सबदी मैलु उतरै ता सचु बणिआ सीगारु ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला ३ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! दुनिया की खुशामदें ना करता फिर।दुनिया तो नाश हो जाएगी। लोगों की महिमा भी ना गाता फिर।ख़लकत भी मर के मिट्टी हो जाएगी। 1। हे मेरे मालिक ! तू धन्य है ! तू ही सराहनीय है ! हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा उस परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए जो सदा कायम रहने वाला है। और जिस को किसी की मुथाजी नहीं। 1।रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य दुनिया की मित्रता में ही जल मरते हैं (आत्मि्क जीवन को जला के राख कर लेते हैं। अंत में) जमराज के दर पर चोटें खाते हैं।तब उन्हें (हाथों से फिसल चुका मानस जन्म का) समय नहीं मिलता। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं।उनका जीवन सफल हो जाता है।क्योंकि वे सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में जुड़े रहते हैं। उनके अंदर सर्व-व्यापक परमात्मा का प्रकाश हो जाता है।वे आत्मिक अडोलता में आनंद में मगन रहते हैं। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की बाणी को भुला देते हैं।वे माया के मोह में मस्त रहते हैं। उनके अंदर से माया की प्यास-भूख दूर नहीं होती।वे हर वक्त (तृष्णा की आग में) जलते फिरते हैं। 4। ऐसे मनुष्य बुरे लोगों से मित्रता बनाए रखते हैं।और संतों से वैर कमाते हैं। वे खुद अपने परिवार समेत (संसार समुंद्र में) डूब जाते हैं।अपनी कुलों को भी (अपने ही अन्य रिश्तेदारों को भी) साथ में ही डुबा लेते हैं। 5। हे भाई ! किसी की भी निंदा करनी अच्छी बात नहीं।अपने मन के पीछे चलने वाले मूर्ख मनुष्य ही निंदा किया करते हैं। (लोक-परलोक में) वही बदनामी कमाते हैं और भयानक नर्क में पड़ते हैं। 6। हे (मेरे) मन ! तू जैसे की सेवा-भक्ति करेगा।वैसे ही कर्म कमा के वैसा ही बन जाएगा। (प्रभू की रजा में ये नियम है कि जीव ने इस कर्म भूमि शरीर में) आप बीज के आप ही (उसका) फल खाना होता है।इस (सत्य) की उलंघ्ना नहीं की जा सकती। 7। (उच्च आत्मिक अवस्था वाले) महापुरुषों के वचन किसी प्रसंग के अनुसार होते हैं।वे महापुरुख आत्मिक जीवन देने वाले नाम-रस से भरपूर रहते हैं। उन्हें किसी सेवा आदि का लालच नहीं होता (पर जो मनुष्य उनकी सेवा करता है।उसे उनसे आत्मिक जीवन मिल जाता है)। 8। वह महापुरुख औरों को भी (नाम जपने का) उपदेश करते हैं।गुण ग्रहण करने वाला मनुष्य (उनसे) गुण ग्रहण कर लेता है।सो। जो मनुष्य उन महापुरुषों की संगति में रहते हैं।वे बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं।वे भी हर वक्त नाम जपने लग जाते हैं। 9। हे भाई ! जिस परमात्मा ने ये सृष्टि पैदा की है वह स्वयं ही सब जीवों को रिज़क पहुँचाता है। वही स्वयं सब दातें देने वाला है।वह मालिक सदा कायम रहने वाला (भी) है। 10। हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा तेरे अंग-संग बसता है।गुरू की शरण पड़ कर तू उसको अपनी आँखें से देख ले। (जिस मनुष्य पर वह) स्वयं ही बख्शिश करता है उसको अपने आप ही (अपने चरनों में) जोड़ लेता है।हे भाई ! उस प्रभू को सदा अपने दिल में बसाए रख। 11। हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा (सदा) पवित्र है।(जब तक मनुष्य का) मन (विकारों से) मैला रहे।उस परमात्मा के साथ मिलाप नहीं हो सकता। जीव तब ही उस प्रभू के चरणों से मिल सकता है।जब प्रभू खुद गुरू के शबद से उसके अंदर का अहंकार जला के उसको अपने साथ मिलाता है। 12। हे भाई ! अगर वह सदा कायम रहने वाला पति-प्रभू भूल जाए।तो जगत में जीना धिक्कारयोग्य है। जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं मेहर की निगाह करता है।उसे प्रभू नहीं भूलता।वह मनुष्य गुरू की मति की बरकति से हरी-नाम में सुरति जोड़ता है। 13। हे भाई ! (हम जीवों का कोई अपना जोर नहीं चल सकता) अगर गुरू (मुझे प्रभू से) मिला दे।तो ही मैं मिला रह सकता हूँ।और उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को मैं अपने हृदय में टिका के रख सकता हूँ। हे भाई ! गुरू के प्यार की बरकति से जो मनुष्य प्रभू-चरणों में मिल जाए वह फिर कभी वहाँ से नहीं विछुड़ता। 14। हे भाई ! गुरू के शबद में सुरति जोड़ के तू भी अपने पति-प्रभू की सिफत सालाह किया कर। प्रीतम प्रभू को मिल के जिस जीव स्त्री ने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया।उसने (लोक-परलोक में) शोभा कमा ली। 15। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों का मन परमात्मा के नाम में नहीं भीगता (हरी नाम के साथ प्यार नहीं डालता)।वह मनुष्य अपने मन में मैले और कठोर रहते हैं। अगर साँप को दूध भी पिलाया जाय।तो भी उसके अंदर निरोल जहिर ही टिका रहता है। 16। हे भाई ! (सब जीवों में व्यापक हो के सब कुछ) प्रभू स्वयं ही कर रहा है।किसको (अच्छा या बुरा) कहा जा सकता है। (गलत रास्ते पर पड़े हुए जीवों पर भी) वह स्वयं ही बख्शिश करने वाला है।जब गुरू के शबद की बरकति से (किसी मनुष्य के मन की) मैल उतर जाती है।तो उसकी आत्मा को सदा कायम रहने वाली स्वतंत्रता मिल जाती है। 17।

संदर्भ: यह अंग 755 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 755” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 756 →, पीछे का: ← अंग 754

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।