अंग
765
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਗਲੀ ਜੋਤਿ ਜਾਤਾ ਤੂ ਸੋਈ ਮਿਲਿਆ ਭਾਇ ਸੁਭਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਜਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ਸਾਚਿ ਮਿਲੇ ਘਰਿ ਆਏ ॥੧॥
ਘਰਿ ਆਇਅੜੇ ਸਾਜਨਾ ਤਾ ਧਨ ਖਰੀ ਸਰਸੀ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਮੋਹਿਅੜੀ ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਠਾਕੁਰ ਦੇਖਿ ਰਹੰਸੀ ਰਾਮ ॥
ਗੁਣ ਸੰਗਿ ਰਹੰਸੀ ਖਰੀ ਸਰਸੀ ਜਾ ਰਾਵੀ ਰੰਗਿ ਰਾਤੈ ॥
ਅਵਗਣ ਮਾਰਿ ਗੁਣੀ ਘਰੁ ਛਾਇਆ ਪੂਰੈ ਪੁਰਖਿ ਬਿਧਾਤੈ ॥
ਤਸਕਰ ਮਾਰਿ ਵਸੀ ਪੰਚਾਇਣਿ ਅਦਲੁ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਵਰੁ ਪਾਇਅੜਾ ਬਾਲੜੀਏ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਪੂਰੀ ਰਾਮ ॥
ਪਿਰਿ ਰਾਵਿਅੜੀ ਸਬਦਿ ਰਲੀ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਨਹ ਦੂਰੀ ਰਾਮ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਦੂਰਿ ਨ ਹੋਈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੋਈ ਤਿਸ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸਬਾਈ ॥
ਆਪੇ ਰਸੀਆ ਆਪੇ ਰਾਵੇ ਜਿਉ ਤਿਸ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਅਮਰ ਅਡੋਲੁ ਅਮੋਲੁ ਅਪਾਰਾ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਜੋਗ ਸਜੋਗੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਲਿਵ ਲਾਈਐ ॥੩॥
ਪਿਰੁ ਉਚੜੀਐ ਮਾੜੜੀਐ ਤਿਹੁ ਲੋਆ ਸਿਰਤਾਜਾ ਰਾਮ ॥
ਹਉ ਬਿਸਮ ਭਈ ਦੇਖਿ ਗੁਣਾ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਅਗਾਜਾ ਰਾਮ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨੀਸਾਣੋ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਖੋਟੇ ਨਹੀ ਠਾਹਰ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਪਰਵਾਣੋ ॥
ਪਤਿ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਪੂਰਾ ਪਰਵਾਨਾ ਨਾ ਆਵੈ ਨਾ ਜਾਸੀ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਪ੍ਰਭ ਜੈਸੇ ਅਵਿਨਾਸੀ ॥੪॥੧॥੩॥
ਨਾਨਕ ਸਾਜਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ਸਾਚਿ ਮਿਲੇ ਘਰਿ ਆਏ ॥੧॥
ਘਰਿ ਆਇਅੜੇ ਸਾਜਨਾ ਤਾ ਧਨ ਖਰੀ ਸਰਸੀ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਮੋਹਿਅੜੀ ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਠਾਕੁਰ ਦੇਖਿ ਰਹੰਸੀ ਰਾਮ ॥
ਗੁਣ ਸੰਗਿ ਰਹੰਸੀ ਖਰੀ ਸਰਸੀ ਜਾ ਰਾਵੀ ਰੰਗਿ ਰਾਤੈ ॥
ਅਵਗਣ ਮਾਰਿ ਗੁਣੀ ਘਰੁ ਛਾਇਆ ਪੂਰੈ ਪੁਰਖਿ ਬਿਧਾਤੈ ॥
ਤਸਕਰ ਮਾਰਿ ਵਸੀ ਪੰਚਾਇਣਿ ਅਦਲੁ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਵਰੁ ਪਾਇਅੜਾ ਬਾਲੜੀਏ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਪੂਰੀ ਰਾਮ ॥
ਪਿਰਿ ਰਾਵਿਅੜੀ ਸਬਦਿ ਰਲੀ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਨਹ ਦੂਰੀ ਰਾਮ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਦੂਰਿ ਨ ਹੋਈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੋਈ ਤਿਸ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸਬਾਈ ॥
ਆਪੇ ਰਸੀਆ ਆਪੇ ਰਾਵੇ ਜਿਉ ਤਿਸ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਅਮਰ ਅਡੋਲੁ ਅਮੋਲੁ ਅਪਾਰਾ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਜੋਗ ਸਜੋਗੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਲਿਵ ਲਾਈਐ ॥੩॥
ਪਿਰੁ ਉਚੜੀਐ ਮਾੜੜੀਐ ਤਿਹੁ ਲੋਆ ਸਿਰਤਾਜਾ ਰਾਮ ॥
ਹਉ ਬਿਸਮ ਭਈ ਦੇਖਿ ਗੁਣਾ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਅਗਾਜਾ ਰਾਮ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨੀਸਾਣੋ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਖੋਟੇ ਨਹੀ ਠਾਹਰ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਪਰਵਾਣੋ ॥
ਪਤਿ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਪੂਰਾ ਪਰਵਾਨਾ ਨਾ ਆਵੈ ਨਾ ਜਾਸੀ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਪ੍ਰਭ ਜੈਸੇ ਅਵਿਨਾਸੀ ॥੪॥੧॥੩॥
सगली जोति जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥
नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥
घरि आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥
हरि मोहिअड़ी साच सबदि ठाकुर देखि रहंसी राम ॥
गुण संगि रहंसी खरी सरसी जा रावी रंगि रातै ॥
अवगण मारि गुणी घरु छाइआ पूरै पुरखि बिधातै ॥
तसकर मारि वसी पंचाइणि अदलु करे वीचारे ॥
नानक राम नामि निसतारा गुरमति मिलहि पिआरे ॥२॥
वरु पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥
पिरि राविअड़ी सबदि रली रवि रहिआ नह दूरी राम ॥
प्रभु दूरि न होई घटि घटि सोई तिस की नारि सबाई ॥
आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥
अमर अडोलु अमोलु अपारा गुरि पूरै सचु पाईऐ ॥
नानक आपे जोग सजोगी नदरि करे लिव लाईऐ ॥३॥
पिरु उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥
हउ बिसम भई देखि गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥
सबदु वीचारी करणी सारी राम नामु नीसाणो ॥
नाम बिना खोटे नही ठाहर नामु रतनु परवाणो ॥
पति मति पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥
नानक गुरमुखि आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥४॥१॥३॥
नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥
घरि आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥
हरि मोहिअड़ी साच सबदि ठाकुर देखि रहंसी राम ॥
गुण संगि रहंसी खरी सरसी जा रावी रंगि रातै ॥
अवगण मारि गुणी घरु छाइआ पूरै पुरखि बिधातै ॥
तसकर मारि वसी पंचाइणि अदलु करे वीचारे ॥
नानक राम नामि निसतारा गुरमति मिलहि पिआरे ॥२॥
वरु पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥
पिरि राविअड़ी सबदि रली रवि रहिआ नह दूरी राम ॥
प्रभु दूरि न होई घटि घटि सोई तिस की नारि सबाई ॥
आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥
अमर अडोलु अमोलु अपारा गुरि पूरै सचु पाईऐ ॥
नानक आपे जोग सजोगी नदरि करे लिव लाईऐ ॥३॥
पिरु उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥
हउ बिसम भई देखि गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥
सबदु वीचारी करणी सारी राम नामु नीसाणो ॥
नाम बिना खोटे नही ठाहर नामु रतनु परवाणो ॥
पति मति पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥
नानक गुरमुखि आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥४॥१॥३॥
हिन्दी अर्थ: उसने सारे जीवों में तुझे ही बसता पहचान लिया।उसके प्रेम (के आर्कषण) के द्वारा तू उसे मिल गया। हे नानक ! सज्जन प्रभू से सदके होना चाहिए।जो जीव-स्त्री उसके सदा-स्थिर नाम में जुड़ती है।उसके हृदय में वह आ प्रगट होता है। 1। जब सज्जन प्रभू जी जीव-स्त्री के हृदय-गृह में प्रकट होते हैं।तो जीव-स्त्री बहुत प्रसन्न-चिक्त हो जाती है। जब सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद ने उसको आकर्षित किया।तब ठाकुर जी के दर्शन करके वह अडोल-चिक्त हो गई। जब प्रेम-रंग में रंगे हुए परमात्मा ने जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ा तो वह प्रभू के गुणों (की याद) में अडोल-आत्मा हो गई और बहुत प्रसन्न-चिक्त हो गई। पूरन-पुरख ने। सृजनहार ने (उसके अंदर से) अवगुण दूर करके उसके हृदय को गुणों से भरपूर कर दिया कामादिक चोरों को मार के वह जीव-स्त्री उस परमात्मा (के चरणों) में टिक गई जो सदा पूरी विचार से न्याय करता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में जुड़ने से संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है।गुरू की शिक्षा पर चलने से प्यारे प्रभू जी मिल पड़ते हैं। 2। जिस जीव-स्त्री ने पति-प्रभू को पा लिया।उसकी हरेक आस उसकी हरेक इच्छा पूरी हो जाती है (भाव।उसका मन दुनिया की आशाओं आदि की ओर नहीं दौड़ता भागता)। जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति ने अपने चरणों में जोड़ लिया।जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से प्रभू में लीन हो गई।उसे प्रभू हर जगह व्यापक दिखाई देता है।उसको अपने से दूर नहीं प्रतीत होता। उसे ये निश्चय हो जाता है कि प्रभू कहीं दूर नहीं हरेक शरीर में वही मौजूद है।सारी जीव-सि्त्रयां उसी की ही हैं। वह स्वयं ही आनंद का श्रोत है।जैसे उसकी रजा होती है वह स्वयं ही अपने मिलाप का आनंद देता है। वह परमात्मा मौत-रहित है।माया में डोलता नहीं उसका मूल्य नहीं पड़ सकता (भाव।कोई पदार्थ भी उसके बराबर का नहीं) वह सदा-स्थिर रहने वाला है।वह बेअंत है।पूरे गुरू के द्वारा ही उसकी प्राप्ति होती है। हे नानक ! प्रभू खुद ही जीवों के अपने साथ मेल के संयोग बनाता है।जब वह मेहर की नजर करता है।तब जीव उसमें सुरति जोड़ता है। 3। प्रभू-पति एक सोहाने-ऊँचे महल में बसता है (जहाँ माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता) वह तीनों लोकों का नाथ है। उसके गुण देख के मैं हैरान हो रही हूँ।चारों तरफ (सारे संसार में) उसकी जीवन-रौंअ एक-रस रुमक रही है। जो मनुष्य प्रभू के सिफत सालाह के शबद को विचारता है (भाव।अपने मन में बसाता है) जिसने ये श्रेष्ठ कर्तव्य बना लिया है। जिसके पास परमात्मा के नाम (रूपी) राहदारी है (उसको प्रभू की हजूरी में जगह मिल जाती है।पर) नाम-हीन खोटे मनुष्य को (उसकी दरगाह में) जगह नहीं मिलती। (प्रभू के दर पर) प्रभू का नाम-रत्न ही कबूल होता है। जिस मनुष्य के पास (प्रभू-नाम का) अ-रुक परवाना है।उसको (प्रभू-दर पर) पूरी इज्जत मिलती है उसकी अक्ल त्रुटि-हीन हो जाती है।वह जनम-मरन के चक्कर से बच जाता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य अपने जीवन को पड़तालता है।वह अविनाशी प्रभू का रूप हो जाता है। 4। 1। 3।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੪ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਜਗੁ ਧੰਧੜੈ ਲਾਇਆ ॥
ਦਾਨਿ ਤੇਰੈ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਤਨਿ ਚੰਦੁ ਦੀਪਾਇਆ ॥
ਚੰਦੋ ਦੀਪਾਇਆ ਦਾਨਿ ਹਰਿ ਕੈ ਦੁਖੁ ਅੰਧੇਰਾ ਉਠਿ ਗਇਆ ॥
ਗੁਣ ਜੰਞ ਲਾੜੇ ਨਾਲਿ ਸੋਹੈ ਪਰਖਿ ਮੋਹਣੀਐ ਲਇਆ ॥
ਵੀਵਾਹੁ ਹੋਆ ਸੋਭ ਸੇਤੀ ਪੰਚ ਸਬਦੀ ਆਇਆ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਜਗੁ ਧੰਧੜੈ ਲਾਇਆ ॥੧॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਾਜਨਾ ਮੀਤਾ ਅਵਰੀਤਾ ॥
ਇਹੁ ਤਨੁ ਜਿਨ ਸਿਉ ਗਾਡਿਆ ਮਨੁ ਲੀਅੜਾ ਦੀਤਾ ॥
ਲੀਆ ਤ ਦੀਆ ਮਾਨੁ ਜਿਨੑ ਸਿਉ ਸੇ ਸਜਨ ਕਿਉ ਵੀਸਰਹਿ ॥
ਜਿਨੑ ਦਿਸਿ ਆਇਆ ਹੋਹਿ ਰਲੀਆ ਜੀਅ ਸੇਤੀ ਗਹਿ ਰਹਹਿ ॥
ਸਗਲ ਗੁਣ ਅਵਗਣੁ ਨ ਕੋਈ ਹੋਹਿ ਨੀਤਾ ਨੀਤਾ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਾਜਨਾ ਮੀਤਾ ਅਵਰੀਤਾ ॥੨॥
ਗੁਣਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ਵਾਸੁਲਾ ਕਢਿ ਵਾਸੁ ਲਈਜੈ ॥
ਜੇ ਗੁਣ ਹੋਵਨਿੑ ਸਾਜਨਾ ਮਿਲਿ ਸਾਝ ਕਰੀਜੈ ॥
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੪ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਜਗੁ ਧੰਧੜੈ ਲਾਇਆ ॥
ਦਾਨਿ ਤੇਰੈ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਤਨਿ ਚੰਦੁ ਦੀਪਾਇਆ ॥
ਚੰਦੋ ਦੀਪਾਇਆ ਦਾਨਿ ਹਰਿ ਕੈ ਦੁਖੁ ਅੰਧੇਰਾ ਉਠਿ ਗਇਆ ॥
ਗੁਣ ਜੰਞ ਲਾੜੇ ਨਾਲਿ ਸੋਹੈ ਪਰਖਿ ਮੋਹਣੀਐ ਲਇਆ ॥
ਵੀਵਾਹੁ ਹੋਆ ਸੋਭ ਸੇਤੀ ਪੰਚ ਸਬਦੀ ਆਇਆ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਜਗੁ ਧੰਧੜੈ ਲਾਇਆ ॥੧॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਾਜਨਾ ਮੀਤਾ ਅਵਰੀਤਾ ॥
ਇਹੁ ਤਨੁ ਜਿਨ ਸਿਉ ਗਾਡਿਆ ਮਨੁ ਲੀਅੜਾ ਦੀਤਾ ॥
ਲੀਆ ਤ ਦੀਆ ਮਾਨੁ ਜਿਨੑ ਸਿਉ ਸੇ ਸਜਨ ਕਿਉ ਵੀਸਰਹਿ ॥
ਜਿਨੑ ਦਿਸਿ ਆਇਆ ਹੋਹਿ ਰਲੀਆ ਜੀਅ ਸੇਤੀ ਗਹਿ ਰਹਹਿ ॥
ਸਗਲ ਗੁਣ ਅਵਗਣੁ ਨ ਕੋਈ ਹੋਹਿ ਨੀਤਾ ਨੀਤਾ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਾਜਨਾ ਮੀਤਾ ਅਵਰੀਤਾ ॥੨॥
ਗੁਣਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ਵਾਸੁਲਾ ਕਢਿ ਵਾਸੁ ਲਈਜੈ ॥
ਜੇ ਗੁਣ ਹੋਵਨਿੑ ਸਾਜਨਾ ਮਿਲਿ ਸਾਝ ਕਰੀਜੈ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥
दानि तेरै घटि चानणा तनि चंदु दीपाइआ ॥
चंदो दीपाइआ दानि हरि कै दुखु अंधेरा उठि गइआ ॥
गुण जंञ लाड़े नालि सोहै परखि मोहणीऐ लइआ ॥
वीवाहु होआ सोभ सेती पंच सबदी आइआ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥१॥
हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥
इहु तनु जिन सिउ गाडिआ मनु लीअड़ा दीता ॥
लीआ त दीआ मानु जिन॑ सिउ से सजन किउ वीसरहि ॥
जिन॑ दिसि आइआ होहि रलीआ जीअ सेती गहि रहहि ॥
सगल गुण अवगणु न कोई होहि नीता नीता ॥
हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥२॥
गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥
जे गुण होवनि॑ साजना मिलि साझ करीजै ॥
रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥
दानि तेरै घटि चानणा तनि चंदु दीपाइआ ॥
चंदो दीपाइआ दानि हरि कै दुखु अंधेरा उठि गइआ ॥
गुण जंञ लाड़े नालि सोहै परखि मोहणीऐ लइआ ॥
वीवाहु होआ सोभ सेती पंच सबदी आइआ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥१॥
हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥
इहु तनु जिन सिउ गाडिआ मनु लीअड़ा दीता ॥
लीआ त दीआ मानु जिन॑ सिउ से सजन किउ वीसरहि ॥
जिन॑ दिसि आइआ होहि रलीआ जीअ सेती गहि रहहि ॥
सगल गुण अवगणु न कोई होहि नीता नीता ॥
हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥२॥
गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥
जे गुण होवनि॑ साजना मिलि साझ करीजै ॥
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥ जिस प्रभू ने ये जगत पैदा किया है उसी ने ही इसकी संभाल की हुई है।उसी ने ही इसको माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है।(पर। हे प्रभू !) तेरी बख्शिश से (किसी सौभाग्य भरे) हृदय में तेरी ज्योति का प्रकाश होता है।(किसी सौभाग्यशाली) शरीर में चाँद चमकता है (तेरे नाम की शीतलता हिल्लौरे देती है)। प्रभू की बख्शिश से जिस हृदय में (प्रभू नाम की) शीतलता चमक मारती है उस हृदय में से (अज्ञानता का) अंधकार और दुख-कलेश दूर हो जाता है। जैसे बारात दूल्हे के साथ ही फबती है।वैसे ही जीव-स्त्री के गुण (भी) तभी अच्छे लगते हैं जब प्रभू-पति हृदय में बसता हो। जिस जीव-स्त्री ने अपने जीवन को प्रभू की सिफत सालाह से सुंदर बना लिया है।उस ने इसकी कद्र समझ के प्रभू को अपने हृदय में बसा लिया है।उसका प्रभू-पति से मिलाप हो जाता है।(लोक-परलोक में) उसे शोभा भी मिलती है।एक-रस आत्मिक आनंद का दाता प्रभू उसके हृदय में प्रकट हो जाता है। जिस प्रभू ने ये जगत पैदा किया है वही इसकी संभाल करता है।उसने इसको माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है। 1। मैं उन सज्जनों-मित्रों से सदके जाता हॅूँ जिन पर माया का पर्दा नहीं पड़ा जिनकी संगति करके मैंने उनके साथ दिली सांझ डाली है। जिन गुरमुखों के साथ दिली सांझ पड़ सके वे सज्जन कभी भी भूलने नहीं चाहिए।उनका दर्शन करने से आत्मिक खुशियाँ पैदा होती हैं। वह सज्जन (अपने सत्संगियों को अपनी) जान की तरह रखते हैं (जिंद से भी ज्यादा प्यारा समझते हैं)। उनमें सारे ही गुण होते हें। अवगुण उनके नजदीक नहीं फटकते। मैं सदके हूँ उन सज्जन-मित्रों के जिन पर माया अपना असर ना कर सकी। 2। (अगर किसी मनुष्य के पास सुगंधि देने वाली वस्तुओं से भरा डिब्बा हो।उस डब्बे का लाभ उसे तब ही है जब वह उस डब्बे को खोल के उससे सुगंधि ले।गुरमुखों की संगति गुणों का डब्बा है) यदि किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए।तो वह डब्बा खोल के (डब्बे के भीतर की) सुगंधि लेनी चाहिए। (हे भाई !) अगर तू चाहता है कि तेरे अंदर (भी) गुण पैदा हों।तो गुरमुखों को मिल के उनके साथ गुणों की सांझ करनी चाहिए।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 765 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 765” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 766 →, पीछे का: ← अंग 764।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।