गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥
तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥16॥
दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥
बेद पाठ मति पापा खाइ ॥
उगवै सूरु न जापै चंदु ॥
जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥
बेद पाठ संसार की कार ॥
पड़ि॑ पड़ि॑ पंडित करहि बीचार ॥
बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥1॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥
रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥
नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥2॥
जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥
हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥
सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥
मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥
मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥17॥
काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥
एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥1॥
नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥
जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥2॥
आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥
अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥
प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥
सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥
जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥18॥
पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥
जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥1॥
पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥
नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥2॥
मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥
अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥3॥
हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥
दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥
नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥
गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥
सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥19॥
किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू के नाम को प्यार करके वह प्रभू का घर।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।