अंग 767

अंग
767
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪਿ ਸਾਜੇ ਥਾਪਿ ਵੇਖੈ ਤਿਸੈ ਭਾਣਾ ਭਾਇਆ ॥
ਸਾਜਨ ਰਾਂਗਿ ਰੰਗੀਲੜੇ ਰੰਗੁ ਲਾਲੁ ਬਣਾਇਆ ॥੫॥
ਅੰਧਾ ਆਗੂ ਜੇ ਥੀਐ ਕਿਉ ਪਾਧਰੁ ਜਾਣੈ ॥
ਆਪਿ ਮੁਸੈ ਮਤਿ ਹੋਛੀਐ ਕਿਉ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਕਿਉ ਰਾਹਿ ਜਾਵੈ ਮਹਲੁ ਪਾਵੈ ਅੰਧ ਕੀ ਮਤਿ ਅੰਧਲੀ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਮ ਹਰਿ ਕੇ ਕਛੁ ਨ ਸੂਝੈ ਅੰਧੁ ਬੂਡੌ ਧੰਧਲੀ ॥
ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਚਾਨਣੁ ਚਾਉ ਉਪਜੈ ਸਬਦੁ ਗੁਰ ਕਾ ਮਨਿ ਵਸੈ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਗੁਰ ਪਹਿ ਕਰਿ ਬਿਨੰਤੀ ਰਾਹੁ ਪਾਧਰੁ ਗੁਰੁ ਦਸੈ ॥੬॥
ਮਨੁ ਪਰਦੇਸੀ ਜੇ ਥੀਐ ਸਭੁ ਦੇਸੁ ਪਰਾਇਆ ॥
ਕਿਸੁ ਪਹਿ ਖੋਲੑਉ ਗੰਠੜੀ ਦੂਖੀ ਭਰਿ ਆਇਆ ॥
ਦੂਖੀ ਭਰਿ ਆਇਆ ਜਗਤੁ ਸਬਾਇਆ ਕਉਣੁ ਜਾਣੈ ਬਿਧਿ ਮੇਰੀਆ ॥
ਆਵਣੇ ਜਾਵਣੇ ਖਰੇ ਡਰਾਵਣੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਫੇਰੀਆ ॥
ਨਾਮ ਵਿਹੂਣੇ ਊਣੇ ਝੂਣੇ ਨਾ ਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਮਨੁ ਪਰਦੇਸੀ ਜੇ ਥੀਐ ਸਭੁ ਦੇਸੁ ਪਰਾਇਆ ॥੭॥
ਗੁਰ ਮਹਲੀ ਘਰਿ ਆਪਣੈ ਸੋ ਭਰਪੁਰਿ ਲੀਣਾ ॥
ਸੇਵਕੁ ਸੇਵਾ ਤਾਂ ਕਰੇ ਸਚ ਸਬਦਿ ਪਤੀਣਾ ॥
ਸਬਦੇ ਪਤੀਜੈ ਅੰਕੁ ਭੀਜੈ ਸੁ ਮਹਲੁ ਮਹਲਾ ਅੰਤਰੇ ॥
ਆਪਿ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੋਈ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ਅੰਤਿ ਨਿਰੰਤਰੇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮੇਲਾ ਤਾਂ ਸੁਹੇਲਾ ਬਾਜੰਤ ਅਨਹਦ ਬੀਣਾ ॥
ਗੁਰ ਮਹਲੀ ਘਰਿ ਆਪਣੈ ਸੋ ਭਰਿਪੁਰਿ ਲੀਣਾ ॥੮॥
ਕੀਤਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਸੋਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨ ਪਵੈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਕੋਈ ॥
ਕੀਮਤਿ ਸੋ ਪਾਵੈ ਆਪਿ ਜਾਣਾਵੈ ਆਪਿ ਅਭੁਲੁ ਨ ਭੁਲਏ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਕਰਹਿ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਮੁਲਏ ॥
ਹੀਣਉ ਨੀਚੁ ਕਰਉ ਬੇਨੰਤੀ ਸਾਚੁ ਨ ਛੋਡਉ ਭਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਦੇਖਿਆ ਦੇਵੈ ਮਤਿ ਸਾਈ ॥੯॥੨॥੫॥
आपि साजे थापि वेखै तिसै भाणा भाइआ ॥
साजन रांगि रंगीलड़े रंगु लालु बणाइआ ॥५॥
अंधा आगू जे थीऐ किउ पाधरु जाणै ॥
आपि मुसै मति होछीऐ किउ राहु पछाणै ॥
किउ राहि जावै महलु पावै अंध की मति अंधली ॥
विणु नाम हरि के कछु न सूझै अंधु बूडौ धंधली ॥
दिनु राति चानणु चाउ उपजै सबदु गुर का मनि वसै ॥
कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती राहु पाधरु गुरु दसै ॥६॥
मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥
किसु पहि खोल॑उ गंठड़ी दूखी भरि आइआ ॥
दूखी भरि आइआ जगतु सबाइआ कउणु जाणै बिधि मेरीआ ॥
आवणे जावणे खरे डरावणे तोटि न आवै फेरीआ ॥
नाम विहूणे ऊणे झूणे ना गुरि सबदु सुणाइआ ॥
मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥७॥
गुर महली घरि आपणै सो भरपुरि लीणा ॥
सेवकु सेवा तां करे सच सबदि पतीणा ॥
सबदे पतीजै अंकु भीजै सु महलु महला अंतरे ॥
आपि करता करे सोई प्रभु आपि अंति निरंतरे ॥
गुर सबदि मेला तां सुहेला बाजंत अनहद बीणा ॥
गुर महली घरि आपणै सो भरिपुरि लीणा ॥८॥
कीता किआ सालाहीऐ करि वेखै सोई ॥
ता की कीमति न पवै जे लोचै कोई ॥
कीमति सो पावै आपि जाणावै आपि अभुलु न भुलए ॥
जै जै कारु करहि तुधु भावहि गुर कै सबदि अमुलए ॥
हीणउ नीचु करउ बेनंती साचु न छोडउ भाई ॥
नानक जिनि करि देखिआ देवै मति साई ॥९॥२॥५॥

हिन्दी अर्थ: उन लोगों को उसी प्रभू की रजा मीठी लगती है जो खुद (जगत को) पैदा करता है और पैदा करके संभाल करता है। सज्जन-प्रभू के रंग में रंगे हुए उन लोगों ने अपने अंदर प्रभू-प्रेम का लाल रंग बना रखा है। 5। अगर किसी मनुष्य का नायक (आगू) वह मनुष्य बन जाए जो खुद ही माया के मोह में अंधा हुआ पड़ा हो।तो वह जीवन-सफर का सीधा रास्ता नहीं समझ सकता। क्योंकि वह नायक स्वयं ही होछी अक्ल के कारण (कामादिक विकारों के हाथों) लुटा जा रहा है (उसकी रहनुमाई में चलने वाला भी) कैसे सही रास्ता पा सकता है। माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य की अपनी ही बुद्धि भ्रष्ट (अंधी-बहरी) हुई होती है।वह खुद ही सही रास्ते पर नहीं चल सकता।और परमात्मा के दर को नहीं पा सकता; परमात्मा के नाम से वंचित होने के कारण उसको (सही जीवन के बारे में) कुछ नहीं सूझता।माया के मोह में अँधा हुआ मनुष्य माया की दौड़-भाग में डूबा रहता है। पर जिस मनुष्य के मन में गुरू का शबद बसता है।उसके हृदय में दिन-रात नाम का प्रकाश हुआ रहता है।उसके अंदर (सेवा-सिमरन का) उत्साह पैदा हुआ रहता है। वह अपने दोनों हाथ जोड़ के गुरू के पास विनती करता रहता है क्योंकि गुरू उसको जीवन का सही रास्ता बताता है। 6। अगर मनुष्य का मन प्रभू-चरणों से विछुड़ा रहे तो उसको सारा जगत बेगाना लगता है (भाव।उसके अंदर भेद भाव बना रहता है)। (प्रभू-चरणों से विछुड़ के) सारा जगत ही (भाव।हरेक जीव) दुखों से (नाको-नाक) भरा रहता है (उनमें मुझे कोई ऐसा नहीं दिखाई देता जो नाम से वंचित रह के सुखी दिखता हो।और) जिसके आगे मैं अपने दुखों की गठड़ी खोल सकूँ (हरेक को आपो धापी पड़ी रहती है)। (प्रभू-चरणों से विछुड़ा हुआ) सारा ही जगत (हरेक जीव) दुखों से भरा रहता है (हरेक के अंदर इतना स्वार्थ होता है कि कोई किसी का दर्दी नहीं बनता)।मेरी दुखद दशा को जानने (समझने) की भी कोई परवाह नहीं करता। (नाम से टूटे हुए जीवों के सिर पर) बहुत भयानक जनम-मरन (के चक्कर) बने रहते हैं।उनके जनम-मरण की जगत-फेरियाँ खत्म होने को नहीं आती। जिन (भाग्यहीन लोगों) को गुरू ने परमात्मा की सिफत सालाह का शबद नहीं सुनाया।जो नाम से वंचित रहे हैं वे दुखी जीवन ही बिताते गए (क्योंकि) यदि मनुष्य का मन प्रभू-चरणों से विछुड़ा रहे तो उसे सारा जगत बेगाना प्रतीत होता है (असके अंदर भेद भाव मेर तेर बनी रहती है)। 7। ऊँचे ठिकाने के मालिक प्रभू जिस मनुष्य के अपने हृदय-घर में आ बसता है वह मनुष्य उस सर्व-व्यापक प्रभू (की याद) में मस्त रहता है। वह मनुष्य प्रभू का सेवक बन जाता है। प्रभू की सेवा-भक्ति करता है सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में (उसका मन) मगन रहता है। वह मनुष्य सतिगुरू के शबद में पतीज जाता है।उसका हृदय नाम-रस से भीगा रहता है।उसको हरेक शरीर के अंदर प्रभू का निवास दिखता है। (उसे विश्वास बना रहता है कि) प्रभू स्वयं ही सब कुछ कर रहा है।खुद ही हरेक के अंदर एक-रस व्यापक है। गुरू के शबद की बरकति से जब उस मनुष्य का परमात्मा से मिलाप हो जाता है तो उसका जीवन आसान हो जाता है (उसके अंदर मानो) एक-रस बाँसुरी सी बजती रहती है। ऊँचे ठिकाने का मालिक प्रभू जिस मनुष्य के अपने हृदय-घर में प्रकट हो जाता है वह मनुष्य उस सर्व-व्यापक प्रभू (की याद) में जुड़ा रहता है। 8। परमात्मा के पैदा किए हुए जीवों की प्रशंसा (सिफतें) करने का क्या लाभ।(सिफत सालाह तो उस परमात्मा की करनी चाहिए) जो जगत पैदा करके खुद ही संभाल भी करता है। (पर उस प्रभू का मूल्य नहीं आँका जा सकता।उस जैसा कोई और कहा भी नहीं जा सकता)।अगर कोई मनुष्य ये चाहे (कि परमात्मा के गुण बयान करके उसका मूल्य पा सकेगा तो ये नहीं हो सकता) उस प्रभू का मूल्य नहीं पड़ सकता। जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं सूझ बख्शता है।वह प्रभू की कद्र समझ लेता है (और बताता है कि) प्रभू अभुल है कभी भूल नहीं करता। (वह सख्श इस प्रकार विनती करता है,) हे प्रभू ! जो लोग तुझे प्यारे लगते हैं वे गुरू के अमोलक शबद में जुड़ के तेरी सिफत सालाह करते हैं। हे नानक ! (कह,) हे भाई ! मैं तुच्छ हूँ।मैं नीच हूँ।पर मैं (प्रभू के दर पर ही) विनती करता हूँ।मैं उस सदा-स्थिर प्रभू (के पल्ले) को नहीं छोड़ता। (मेरी कोई बिसात नहीं कि मैं सिफत सालाह करने का दम भर सकूँ)।जो प्रभू पैदा करके प्रतिपालना करता है वही (सिफत सालाह करने की) बुद्धि भी बख्शता है। 9। 2। 5।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸੁਖ ਸੋਹਿਲੜਾ ਹਰਿ ਧਿਆਵਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਫਲੁ ਪਾਵਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਫਲੁ ਪਾਵਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਅਪਣੇ ਵਿਟਹੁ ਜਿਨਿ ਕਾਰਜ ਸਭਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਹਰਿ ਜਾਪਹੁ ਸੁਖ ਫਲ ਹਰਿ ਜਨ ਪਾਵਹੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਸੁਣਹੁ ਜਨ ਭਾਈ ਸੁਖ ਸੋਹਿਲੜਾ ਹਰਿ ਧਿਆਵਹੁ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਭੀਨੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਹਜੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨ ਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਤਿਨ ਜਨਮ ਮਰਣ ਭਉ ਭਾਗਾ ॥
रागु सूही छंत महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥
गुरमुखि हरि फलु पावहु ॥
गुरमुखि फलु पावहु हरि नामु धिआवहु जनम जनम के दूख निवारे ॥
बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि कारज सभि सवारे ॥
हरि प्रभु क्रिपा करे हरि जापहु सुख फल हरि जन पावहु ॥
नानकु कहै सुणहु जन भाई सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥१॥
सुणि हरि गुण भीने सहजि सुभाए ॥
गुरमति सहजे नामु धिआए ॥
जिन कउ धुरि लिखिआ तिन गुरु मिलिआ तिन जनम मरण भउ भागा ॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही छंत महला ३ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई जनो ! आत्मिक आनंद देने वाले प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाया करो। गुरू की शरण पड़ कर (सिफत सालाह के गीत गाने से) परमात्मा के दर से (इसका) फल प्राप्त करोगे। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरा करो।(इसका) फल हासिल करोगे।परमात्मा का नाम अनेकों जन्मों के दुख दूर कर देता है। जिस गुरू ने तुम्हारे (लोक-परलोक के) सारे काम सवार दिए हैं।उस अपने गुरू से सदके जाओ। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपा करो।हरी प्रभू कृपा करेगा।(उसके दर से) आत्मिक आनंद का फल प्राप्त कर लोगे। नानक कहता है,हे भाई जनो ! आत्मिक आनंद देने वाले प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाते रहा करो। 1। हे भाई ! परमात्मा की सिफत सालाह सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है। हे भाई ! तू भी गुरू की मति पर चल के प्रभू का नाम सिमर के आत्मिक अडोलता में टिक। हे भाई ! जिन मनुष्यों के माथे पर धुर-दरगाह से लिखे लेख उघड़ते हैं उनको गुरू मिलता है (और नाम की बरकति से) उनका जनम-मरण (के चक्करों) का डर दूर हो जाता है।

संदर्भ: यह अंग 767 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 767” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 768 →, पीछे का: ← अंग 766

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।