अंग
769
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਨੈ ਪਛਾਣਿਆ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥੩॥
ਭਗਤਾ ਕੈ ਘਰਿ ਕਾਰਜੁ ਸਾਚਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਦਾ ਵਖਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਭਗਤਿ ਖਜਾਨਾ ਆਪੇ ਦੀਆ ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਸਮਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਸਮਾਣੇ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਣੇ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਦਾ ਅਖੁਟੁ ਕਦੇ ਨ ਨਿਖੁਟੈ ਹਰਿ ਦੀਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਊਚੇ ਸਦ ਹੀ ਊਚੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਏ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਸੋਭਾ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧॥੨॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥੩॥
ਭਗਤਾ ਕੈ ਘਰਿ ਕਾਰਜੁ ਸਾਚਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਦਾ ਵਖਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਭਗਤਿ ਖਜਾਨਾ ਆਪੇ ਦੀਆ ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਸਮਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਸਮਾਣੇ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਣੇ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਦਾ ਅਖੁਟੁ ਕਦੇ ਨ ਨਿਖੁਟੈ ਹਰਿ ਦੀਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਊਚੇ ਸਦ ਹੀ ਊਚੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਏ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਸੋਭਾ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧॥੨॥
कोटि मधे किनै पछाणिआ हरि नामा सचु सोई ॥
नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥३॥
भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥
भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥
कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥
सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥
हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥
नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥४॥१॥२॥
नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥३॥
भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥
भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥
कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥
सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥
हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥
नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥४॥१॥२॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! करोड़ों में से किसी विरले मनुष्य ने ये बात समझी है कि परमात्मा का नाम ही सदा कायम रहने वाला है। नाम में जुड़ने से ही (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है।और।माया के मोह में मनुष्य इज्जत गवा लेता है। 3। परमात्मा के गुण सदा गाते रहने के कारण भक्तों के हृदय में ये आहर सदा बना रहता है। भक्ति का खजाना परमात्मा ने खुद ही अपने भक्तों को दिया हुआ है।(इसकी बरकति से वे) दुखद मौत के डर को समाप्त करके (परमात्मा में) लीन रहते हैं। दुखदाई मौत के डर को खत्म करके भक्त परमात्मा में लीन रहते हैं।परमात्मा के मन को प्यारे लगते हैं।(परमात्मा के पास से भक्त) सदा कायम रहने वाला नाम-खजाना प्राप्त कर लेते हैं। ये खजाना ना खत्म होने वाला है।कभी खत्म नहीं होता।परमात्मा ने उनको आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिके हुओं को ये खजाना दे दिया। (इस खजाने के सदका) भक्त सदा ही ऊँचे आत्मिक मण्डल में टिके रहते हैं।गुरू के शबद की बरकति से उनका जीवन सोहाना बन जाता हे नानक ! परमात्मा खुद ही मेहर कर के उनको चरणों से जोड़े रखता है।हरेक युग में वे शोभा कमाते हैं। 4। 1। 2।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਸਚੁ ਸੋਹਿਲਾ ਜਿਥੈ ਸਚੇ ਕਾ ਹੋਇ ਵੀਚਾਰੋ ਰਾਮ ॥
ਹਉਮੈ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੇ ਸਾਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰੇ ਦੁਤਰੁ ਤਾਰੇ ਫਿਰਿ ਭਵਜਲੁ ਤਰਣੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਜਿਨਿ ਸਚੁ ਵਿਖਾਲਿਆ ਸੋਈ ॥
ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ਸਚੁ ਵੇਖੈ ਸਭੁ ਸੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੀ ਨਾਈ ਸਚੁ ਨਿਸਤਾਰਾ ਹੋਈ ॥੧॥
ਸਾਚੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਾਚੁ ਬੁਝਾਇਆ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ਰਾਮ ॥
ਸਚਾ ਭੋਜਨੁ ਭਾਉ ਸਚਾ ਹੈ ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਰਾਮ ॥
ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਮਰੈ ਨ ਕੋਈ ਗਰਭਿ ਨ ਜੂਨੀ ਵਾਸਾ ॥
ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ਸਚਿ ਸਮਾਈ ਸਚਿ ਨਾਇ ਪਰਗਾਸਾ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਜਾਤਾ ਸੇ ਸਚੇ ਹੋਏ ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੁ ਧਿਆਇਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਜਿਨ ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਨਾ ਵੀਛੁੜਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਨਿ ॥੨॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਤਿਤੁ ਘਰਿ ਸੋਹਿਲਾ ਹੋਈ ਰਾਮ ॥
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਸਾਚੇ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਵਿਚਿ ਸਾਚਾ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ਰਾਮ ॥
ਸਭੁ ਸਚੁ ਵਰਤੈ ਸਚੋ ਬੋਲੈ ਜੋ ਸਚੁ ਕਰੈ ਸੁ ਹੋਈ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸਚੁ ਪਸਰਿਆ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ॥
ਸਚੇ ਉਪਜੈ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ਮਰਿ ਜਨਮੈ ਦੂਜਾ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਕਰਾਵੈ ਸੋਈ ॥੩॥
ਸਚੇ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਦਰਵਾਰੇ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਖਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਘਟ ਅੰਤਰੇ ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਸਾਚੋ ਆਪਿ ਪਛਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਤਾ ਸਚੁ ਜਾਣਹਿ ਸਾਚੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਸਚੀ ਹੈ ਸੋਭਾ ਸਾਚੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਭਗਤ ਇਕ ਰੰਗੀ ਦੂਜਾ ਰੰਗੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸ ਕਉ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਸੁ ਸਚੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਈ ॥੪॥੨॥੩॥
ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਸਚੁ ਸੋਹਿਲਾ ਜਿਥੈ ਸਚੇ ਕਾ ਹੋਇ ਵੀਚਾਰੋ ਰਾਮ ॥
ਹਉਮੈ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੇ ਸਾਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰੇ ਦੁਤਰੁ ਤਾਰੇ ਫਿਰਿ ਭਵਜਲੁ ਤਰਣੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਜਿਨਿ ਸਚੁ ਵਿਖਾਲਿਆ ਸੋਈ ॥
ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ਸਚੁ ਵੇਖੈ ਸਭੁ ਸੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੀ ਨਾਈ ਸਚੁ ਨਿਸਤਾਰਾ ਹੋਈ ॥੧॥
ਸਾਚੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਾਚੁ ਬੁਝਾਇਆ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ਰਾਮ ॥
ਸਚਾ ਭੋਜਨੁ ਭਾਉ ਸਚਾ ਹੈ ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਰਾਮ ॥
ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਮਰੈ ਨ ਕੋਈ ਗਰਭਿ ਨ ਜੂਨੀ ਵਾਸਾ ॥
ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ਸਚਿ ਸਮਾਈ ਸਚਿ ਨਾਇ ਪਰਗਾਸਾ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਜਾਤਾ ਸੇ ਸਚੇ ਹੋਏ ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੁ ਧਿਆਇਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਜਿਨ ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਨਾ ਵੀਛੁੜਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਨਿ ॥੨॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਤਿਤੁ ਘਰਿ ਸੋਹਿਲਾ ਹੋਈ ਰਾਮ ॥
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਸਾਚੇ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਵਿਚਿ ਸਾਚਾ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ਰਾਮ ॥
ਸਭੁ ਸਚੁ ਵਰਤੈ ਸਚੋ ਬੋਲੈ ਜੋ ਸਚੁ ਕਰੈ ਸੁ ਹੋਈ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸਚੁ ਪਸਰਿਆ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ॥
ਸਚੇ ਉਪਜੈ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ਮਰਿ ਜਨਮੈ ਦੂਜਾ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਕਰਾਵੈ ਸੋਈ ॥੩॥
ਸਚੇ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਦਰਵਾਰੇ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਖਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਘਟ ਅੰਤਰੇ ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਸਾਚੋ ਆਪਿ ਪਛਾਣੇ ਰਾਮ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਤਾ ਸਚੁ ਜਾਣਹਿ ਸਾਚੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਸਚੀ ਹੈ ਸੋਭਾ ਸਾਚੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਭਗਤ ਇਕ ਰੰਗੀ ਦੂਜਾ ਰੰਗੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸ ਕਉ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਸੁ ਸਚੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਈ ॥੪॥੨॥੩॥
सूही महला ३ ॥
सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥
हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥
सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥
सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥
साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥
नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥१॥
साचै सतिगुरि साचु बुझाइआ पति राखै सचु सोई राम ॥
सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥
साचै नामि सुखु होई मरै न कोई गरभि न जूनी वासा ॥
जोती जोति मिलाई सचि समाई सचि नाइ परगासा ॥
जिनी सचु जाता से सचे होए अनदिनु सचु धिआइनि ॥
नानक सचु नामु जिन हिरदै वसिआ ना वीछुड़ि दुखु पाइनि ॥२॥
सची बाणी सचे गुण गावहि तितु घरि सोहिला होई राम ॥
निरमल गुण साचे तनु मनु साचा विचि साचा पुरखु प्रभु सोई राम ॥
सभु सचु वरतै सचो बोलै जो सचु करै सु होई ॥
जह देखा तह सचु पसरिआ अवरु न दूजा कोई ॥
सचे उपजै सचि समावै मरि जनमै दूजा होई ॥
नानक सभु किछु आपे करता आपि करावै सोई ॥३॥
सचे भगत सोहहि दरवारे सचो सचु वखाणे राम ॥
घट अंतरे साची बाणी साचो आपि पछाणे राम ॥
आपु पछाणहि ता सचु जाणहि साचे सोझी होई ॥
सचा सबदु सची है सोभा साचे ही सुखु होई ॥
साचि रते भगत इक रंगी दूजा रंगु न कोई ॥
नानक जिस कउ मसतकि लिखिआ तिसु सचु परापति होई ॥४॥२॥३॥
सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥
हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥
सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥
सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥
साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥
नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥१॥
साचै सतिगुरि साचु बुझाइआ पति राखै सचु सोई राम ॥
सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥
साचै नामि सुखु होई मरै न कोई गरभि न जूनी वासा ॥
जोती जोति मिलाई सचि समाई सचि नाइ परगासा ॥
जिनी सचु जाता से सचे होए अनदिनु सचु धिआइनि ॥
नानक सचु नामु जिन हिरदै वसिआ ना वीछुड़ि दुखु पाइनि ॥२॥
सची बाणी सचे गुण गावहि तितु घरि सोहिला होई राम ॥
निरमल गुण साचे तनु मनु साचा विचि साचा पुरखु प्रभु सोई राम ॥
सभु सचु वरतै सचो बोलै जो सचु करै सु होई ॥
जह देखा तह सचु पसरिआ अवरु न दूजा कोई ॥
सचे उपजै सचि समावै मरि जनमै दूजा होई ॥
नानक सभु किछु आपे करता आपि करावै सोई ॥३॥
सचे भगत सोहहि दरवारे सचो सचु वखाणे राम ॥
घट अंतरे साची बाणी साचो आपि पछाणे राम ॥
आपु पछाणहि ता सचु जाणहि साचे सोझी होई ॥
सचा सबदु सची है सोभा साचे ही सुखु होई ॥
साचि रते भगत इक रंगी दूजा रंगु न कोई ॥
नानक जिस कउ मसतकि लिखिआ तिसु सचु परापति होई ॥४॥२॥३॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला ३ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय-गृह में सच्चे शबद के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह का गीत होता रहता है।सदा स्थिर प्रभू के गुणों की विचार होती रहती है। उसके अंदर से अहंकार आदि जैसे सारे पाप कट जाते हैं।वह मनुष्य सदा-कायम रहने वाले परमात्मा को अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू को हृदय में बसाए रखता है।मुश्किल से तैरे जाने वाले संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है।संसार-समुंद्र से पार लांघने की उसे बार-बार आवश्यक्ता नहीं रहती। हे भाई ! जिस गुरू ने उसको सदा-स्थिर प्रभू के दर्शन करवा दिए हैं।वह खुद भी सदा-स्थिर प्रभू का रूप है।उसकी बाणी प्रभू की सिफत सालाह से भरपूर है। (गुरू की कृपा से) वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता रहता है।उसमें ही लीन रहता है।और उसको हर जगह बसा हुआ देखता है। हे नानक ! जो परमात्मा खुद सदा-स्थिर है।जिसकी महिमा सदा-स्थिर है वह उस मनुष्य का सदा के लिए पार-उतारा कर देता है। 1। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू के रूप गुरू ने जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू का ज्ञान दिया उसकी लाज सदा-स्थिर प्रभू स्वयं रखता है। प्रभू-चरणों से अटल प्यार उस मनुष्य की आत्मिक खुराक बन जाता है।सदा-स्थिर हरी-नाम से उसको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। जिस भी मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू के नाम में आत्मिक आनंद मिलता है।वह कभी आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता।वह जनम-मरण के चक्करों जूनियों में नहीं पड़ता। (गुरू ने जिस मनुष्य की) सुरति परमात्मा की ज्योति में मिला दी।वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो जाता है।सदा-स्थिर हरी-नाम की बरकति से (उसके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा हो जाता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली वे उसी का रूप बन गए।वे हर वक्त उस सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरते रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू का नाम बस जाता है।वे फिर परमात्मा के चरणों से विछुड़ के दुख नहीं पाते। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य अपने हृदय में) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाते हैं (उनकी) उस हृदय-गृह में आनंद मीठी सुरीली अवस्था बनी रहती है। सदा-स्थिर प्रभू के पवित्र गुणों की बरकति से उनका मन उनका तन (विकारों की ओर से) अडोल हो जाता है।उनके अंदर सदा-स्थिर प्रभू-पुरुख प्रत्यक्ष प्रकट हो जाता है। (उन्हें यकीन बन जाता है कि) हर जगह सदा-स्थिर प्रभू काम कर रहा है।वह ही बोल रहा है।जो कुछ वह करता है वही होता है। जिधर भी उन्होंने निगाह की।उधर ही उनको सदा-स्थिर प्रभू का पसारा दिखा।प्रभू के बिना उनको (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू से नया आत्मिक जीवन प्राप्त करता है।वह सदा-स्थिर प्रभू में ही लीन रहता है।पर माया के साथ प्यार करने वाला जनम-मरण में पड़ा रहता है। हे नानक ! करतार खुद ही सब कुछ कर रहा है।खुद ही जीवों से करवा रहा है। 3। हे भाई ! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के भक्त उस सदा स्थिर प्रभू का नाम ही हर वक्त उचार के उसकी हजूरी में शोभा पाते हैं। उनके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी सदा बसती है।वे सदा-स्थिर प्रभू को अपने अंदर बसता देखते हैं। जब भक्तजन अपने आत्मिक जीवन की पड़ताल (आत्मचिंतन) करते हैं।तब वे सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डालते हैं।उन्हें उस सदा-स्थिर प्रभू की जान-पहचान हो जाती है। उनके अंदर प्रभू की सिफत सालाह वाला गुरू-शबद बसता रहता है।(इस कारण लोक-परलोक में) उन्हें सदा के लिए शोभा मिल जाती है।प्रभू में जुड़े रहने के कारण उन्हें आत्मिक आनंद मिला रहता है। सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के प्रेम रंग) में रंगे हुए भक्तजन एक ही प्रभू-प्रेम के रंग में रंगे रहते हैं।कोई और (माया के मोह आदि का) रंग उन पर नहीं चढ़ता। हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू-मिलाप के लेख) लिखे होते हैं।उसको सदा कायम रहने वाले परमात्मा का मिलाप प्राप्त हो जाता है। 4। 2। 3।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਧਨ ਜੇ ਭਵੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੋਹਾਗੁ ਨ ਹੋਈ ਰਾਮ ॥
ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਧਨ ਜੇ ਭਵੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੋਹਾਗੁ ਨ ਹੋਈ ਰਾਮ ॥
सूही महला ३ ॥
जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥
जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला ३ ॥ हे भाई ! (युग चाहे कोई भी हो) गुरू (की शरण पड़े) बिना पति प्रभू का मिलाप नहीं होता।जीव-स्त्री चाहे चारों युगों में भटकती फिरे।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 769 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 769” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 770 →, पीछे का: ← अंग 768।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।