अंग
762
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ਅਨੇਕ ਮਰਿ ਮਰਿ ਜਨਮਤੇ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਸਭੁ ਵਾਦਿ ਜੋਨੀ ਭਰਮਤੇ ॥੫॥
ਜਿਨੑ ਕਉ ਭਏ ਦਇਆਲ ਤਿਨੑ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ਭਇਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਤਿਨੑੀ ਜਨੀ ਜਪਿ ਲਇਆ ॥੬॥
ਖੋਜਹਿ ਕੋਟਿ ਅਸੰਖ ਬਹੁਤੁ ਅਨੰਤ ਕੇ ॥
ਜਿਸੁ ਬੁਝਾਏ ਆਪਿ ਨੇੜਾ ਤਿਸੁ ਹੇ ॥੭॥
ਵਿਸਰੁ ਨਾਹੀ ਦਾਤਾਰ ਆਪਣਾ ਨਾਮੁ ਦੇਹੁ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਨਾਨਕ ਚਾਉ ਏਹੁ ॥੮॥੨॥੫॥੧੬॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਸਭੁ ਵਾਦਿ ਜੋਨੀ ਭਰਮਤੇ ॥੫॥
ਜਿਨੑ ਕਉ ਭਏ ਦਇਆਲ ਤਿਨੑ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ਭਇਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਤਿਨੑੀ ਜਨੀ ਜਪਿ ਲਇਆ ॥੬॥
ਖੋਜਹਿ ਕੋਟਿ ਅਸੰਖ ਬਹੁਤੁ ਅਨੰਤ ਕੇ ॥
ਜਿਸੁ ਬੁਝਾਏ ਆਪਿ ਨੇੜਾ ਤਿਸੁ ਹੇ ॥੭॥
ਵਿਸਰੁ ਨਾਹੀ ਦਾਤਾਰ ਆਪਣਾ ਨਾਮੁ ਦੇਹੁ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਨਾਨਕ ਚਾਉ ਏਹੁ ॥੮॥੨॥੫॥੧੬॥
आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥
बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥
जिन॑ कउ भए दइआल तिन॑ साधू संगु भइआ ॥
अंम्रितु हरि का नामु तिन॑ी जनी जपि लइआ ॥६॥
खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥
जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥
विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥
गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥
बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥
जिन॑ कउ भए दइआल तिन॑ साधू संगु भइआ ॥
अंम्रितु हरि का नामु तिन॑ी जनी जपि लइआ ॥६॥
खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥
जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥
विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥
गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥
हिन्दी अर्थ: (परमात्मा के नाम से टूट के) अनेकों प्राणी (बार-बार) पैदा होते मरते हैं।आत्मिक मौत सहेड़-सहेड़ के बार-बार जन्म लेते रहते हैं। (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना उनका सारा ही उद्यम व्यर्थ रहता है।वे अनेकों जूनियों में भटकते रहते हैं। 5। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है उन्हें गुरू की संगति प्राप्त होती है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जपते रहते हैं। 6। हे भाई ! करोड़ों।अनगिनत।बेअंत।अनेकों ही प्राणी (परमात्मा की) तलाश करते हैं। पर परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य को सूझ बख्शता है।उस मनुष्य को प्रभू की समीपता मिल जाती है। 7। मुझे अपना नाम बख्श।मैं तुझे कभी ना भुलाऊँ। हे नानक ! (प्रभू चरणों में अरदास कर और कह,) हे दातार ! मेरे अंदर ये तमन्ना है कि मैं दिन-रात तेरे गुण गाता रहूँ। 8। 2। 5।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ਕੁਚਜੀ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੰਞੁ ਕੁਚਜੀ ਅੰਮਾਵਣਿ ਡੋਸੜੇ ਹਉ ਕਿਉ ਸਹੁ ਰਾਵਣਿ ਜਾਉ ਜੀਉ ॥
ਇਕ ਦੂ ਇਕਿ ਚੜੰਦੀਆ ਕਉਣੁ ਜਾਣੈ ਮੇਰਾ ਨਾਉ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨੑੀ ਸਖੀ ਸਹੁ ਰਾਵਿਆ ਸੇ ਅੰਬੀ ਛਾਵੜੀਏਹਿ ਜੀਉ ॥
ਸੇ ਗੁਣ ਮੰਞੁ ਨ ਆਵਨੀ ਹਉ ਕੈ ਜੀ ਦੋਸ ਧਰੇਉ ਜੀਉ ॥
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਵਿਥਰਾ ਹਉ ਕਿਆ ਕਿਆ ਘਿਨਾ ਤੇਰਾ ਨਾਉ ਜੀਉ ॥
ਇਕਤੁ ਟੋਲਿ ਨ ਅੰਬੜਾ ਹਉ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੈ ਤੇਰੈ ਜਾਉ ਜੀਉ ॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਰੰਗੁਲਾ ਮੋਤੀ ਤੈ ਮਾਣਿਕੁ ਜੀਉ ॥
ਸੇ ਵਸਤੂ ਸਹਿ ਦਿਤੀਆ ਮੈ ਤਿਨੑ ਸਿਉ ਲਾਇਆ ਚਿਤੁ ਜੀਉ ॥
ਮੰਦਰ ਮਿਟੀ ਸੰਦੜੇ ਪਥਰ ਕੀਤੇ ਰਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਹਉ ਏਨੀ ਟੋਲੀ ਭੁਲੀਅਸੁ ਤਿਸੁ ਕੰਤ ਨ ਬੈਠੀ ਪਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਅੰਬਰਿ ਕੂੰਜਾ ਕੁਰਲੀਆ ਬਗ ਬਹਿਠੇ ਆਇ ਜੀਉ ॥
ਸਾ ਧਨ ਚਲੀ ਸਾਹੁਰੈ ਕਿਆ ਮੁਹੁ ਦੇਸੀ ਅਗੈ ਜਾਇ ਜੀਉ ॥
ਸੁਤੀ ਸੁਤੀ ਝਾਲੁ ਥੀਆ ਭੁਲੀ ਵਾਟੜੀਆਸੁ ਜੀਉ ॥
ਤੈ ਸਹ ਨਾਲਹੁ ਮੁਤੀਅਸੁ ਦੁਖਾ ਕੂੰ ਧਰੀਆਸੁ ਜੀਉ ॥
ਤੁਧੁ ਗੁਣ ਮੈ ਸਭਿ ਅਵਗਣਾ ਇਕ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਸਭਿ ਰਾਤੀ ਸੋਹਾਗਣੀ ਮੈ ਡੋਹਾਗਣਿ ਕਾਈ ਰਾਤਿ ਜੀਉ ॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੰਞੁ ਕੁਚਜੀ ਅੰਮਾਵਣਿ ਡੋਸੜੇ ਹਉ ਕਿਉ ਸਹੁ ਰਾਵਣਿ ਜਾਉ ਜੀਉ ॥
ਇਕ ਦੂ ਇਕਿ ਚੜੰਦੀਆ ਕਉਣੁ ਜਾਣੈ ਮੇਰਾ ਨਾਉ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨੑੀ ਸਖੀ ਸਹੁ ਰਾਵਿਆ ਸੇ ਅੰਬੀ ਛਾਵੜੀਏਹਿ ਜੀਉ ॥
ਸੇ ਗੁਣ ਮੰਞੁ ਨ ਆਵਨੀ ਹਉ ਕੈ ਜੀ ਦੋਸ ਧਰੇਉ ਜੀਉ ॥
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਵਿਥਰਾ ਹਉ ਕਿਆ ਕਿਆ ਘਿਨਾ ਤੇਰਾ ਨਾਉ ਜੀਉ ॥
ਇਕਤੁ ਟੋਲਿ ਨ ਅੰਬੜਾ ਹਉ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੈ ਤੇਰੈ ਜਾਉ ਜੀਉ ॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਰੰਗੁਲਾ ਮੋਤੀ ਤੈ ਮਾਣਿਕੁ ਜੀਉ ॥
ਸੇ ਵਸਤੂ ਸਹਿ ਦਿਤੀਆ ਮੈ ਤਿਨੑ ਸਿਉ ਲਾਇਆ ਚਿਤੁ ਜੀਉ ॥
ਮੰਦਰ ਮਿਟੀ ਸੰਦੜੇ ਪਥਰ ਕੀਤੇ ਰਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਹਉ ਏਨੀ ਟੋਲੀ ਭੁਲੀਅਸੁ ਤਿਸੁ ਕੰਤ ਨ ਬੈਠੀ ਪਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਅੰਬਰਿ ਕੂੰਜਾ ਕੁਰਲੀਆ ਬਗ ਬਹਿਠੇ ਆਇ ਜੀਉ ॥
ਸਾ ਧਨ ਚਲੀ ਸਾਹੁਰੈ ਕਿਆ ਮੁਹੁ ਦੇਸੀ ਅਗੈ ਜਾਇ ਜੀਉ ॥
ਸੁਤੀ ਸੁਤੀ ਝਾਲੁ ਥੀਆ ਭੁਲੀ ਵਾਟੜੀਆਸੁ ਜੀਉ ॥
ਤੈ ਸਹ ਨਾਲਹੁ ਮੁਤੀਅਸੁ ਦੁਖਾ ਕੂੰ ਧਰੀਆਸੁ ਜੀਉ ॥
ਤੁਧੁ ਗੁਣ ਮੈ ਸਭਿ ਅਵਗਣਾ ਇਕ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਸਭਿ ਰਾਤੀ ਸੋਹਾਗਣੀ ਮੈ ਡੋਹਾਗਣਿ ਕਾਈ ਰਾਤਿ ਜੀਉ ॥੧॥
रागु सूही महला १ कुचजी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंञु कुचजी अंमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥
इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥
जिन॑ी सखी सहु राविआ से अंबी छावड़ीएहि जीउ ॥
से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥
किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥
इकतु टोलि न अंबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥
सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥
से वसतू सहि दितीआ मै तिन॑ सिउ लाइआ चितु जीउ ॥
मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥
हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥
अंबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥
सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥
सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥
तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥
तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥
सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंञु कुचजी अंमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥
इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥
जिन॑ी सखी सहु राविआ से अंबी छावड़ीएहि जीउ ॥
से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥
किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥
इकतु टोलि न अंबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥
सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥
से वसतू सहि दितीआ मै तिन॑ सिउ लाइआ चितु जीउ ॥
मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥
हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥
अंबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥
सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥
सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥
तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥
तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥
सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला १ कुचजी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ (हे सहेली !) मैंने सही जीवन की जाच नहीं सीखी।मेरे अंदर इतने ऐब हैं कि अंदर समा ही नहीं सकते (इस हालत में) मैं प्रभू-पति को प्रसन्न करने के लिए कैसे जा सकती हूँ। (उसके दर पर तो) एक से बढ़ कर एक हैं।मेरा तो वहाँ कोई नाम भी नहीं जानता। जिन सहेलियों ने प्रभू-पति को प्रसन्न कर लिया है।वह मानो (चौमासे में) आमों की (ठंडी) छाया में बैठी हुई हैं। मेरे अंदर तो वह गुण ही नहीं हैं (जिन पर प्रभू-पति रीझता है) मैं (अपने इस दुर्भाग्य का) दोष और किस पर दे सकती हूँ। हे प्रभू पति ! (तू बेअंत गुणों का मालिक है) मैं तेरे कौन-कौन से गुण विस्तार से कहूँ।और मैं तेरा कौन-कौन सा नाम लूँ।(तेरे अनेकों गुणों को देख-देख के तेरा अनेकों ही नाम जीव ले रहे हैं)। तेरे बख्शे हुए किसी एक सुंदर पदार्थ के द्वारा भी (तेरी दातों के लेखे तक) नहीं पहुँच सकती (बस !) मैं तुझ पर से कुर्बान ही कुर्बान जाती हूँ। (हे सहेली ! देख मेरे दुर्भाग्य) सोना।चाँदी।मोती और हीरा आदि सुंदर व कीमती पदार्थ- ये चीजें प्रभू-पति ने मुझे दीं। (और) मैं (उसको भुला के।उसकी दी हुई) इन चीजों से प्यार डाल बैठी। मिट्टी-पत्थर आदि के बनाए हुए सुंदर घर -यही मैंने अपने राशि-पूँजी बना लिए। मैं इन सुंदर पदार्थों में ही (फस के) गलती खा गई।(इन पदार्थों के देने वाले) उस पति-प्रभू के पास ना बैठी। माया के मोह में फस के जिस जीव-स्त्री के शुभ गुण उससे दूर-परे चले जाएं।और उसके अंदर निरे पाखण्ड ही इकट्ठे हो जाएं। वह जब इस हाल में परलोक जाए तो जा के परलोक में (प्रभू की हजूरी में) क्या मुँह दिखाएगी। हे प्रभू ! माया के मोह की नींद में गाफिल पड़े रहने से मुझे बुढ़ापा आ गया है। जीवन के सही रास्ते से मैं विछुड़ी हुई हूँ।मैंने निरे दुख ही दुख सहेड़े हुए हैं। हे प्रभू ! तू बेअंत गुणों वाला है।मेरे अंदर सारे अवगुण ही अवगुण हैं। फिर भी नानक की विनती (तेरे ही दर पर) है कि भाग्यशाली जीव-सि्त्रयाँ तो सदा ही तेरे नाम-रंग में रंगी हुई हैं।मुझ अभागन को भी कोई एक रात बख्श (मेरे पर भी कभी मेहर की निगाह कर)। 1।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ਸੁਚਜੀ ॥
ਜਾ ਤੂ ਤਾ ਮੈ ਸਭੁ ਕੋ ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰੀ ਰਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਤੁਧੁ ਅੰਤਰਿ ਹਉ ਸੁਖਿ ਵਸਾ ਤੂੰ ਅੰਤਰਿ ਸਾਬਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਤਖਤਿ ਵਡਾਈਆ ਭਾਣੈ ਭੀਖ ਉਦਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਥਲ ਸਿਰਿ ਸਰੁ ਵਹੈ ਕਮਲੁ ਫੁਲੈ ਆਕਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਭਵਜਲੁ ਲੰਘੀਐ ਭਾਣੈ ਮੰਝਿ ਭਰੀਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਸੋ ਸਹੁ ਰੰਗੁਲਾ ਸਿਫਤਿ ਰਤਾ ਗੁਣਤਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਸਹੁ ਭੀਹਾਵਲਾ ਹਉ ਆਵਣਿ ਜਾਣਿ ਮੁਈਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਤੂ ਸਹੁ ਅਗਮੁ ਅਤੋਲਵਾ ਹਉ ਕਹਿ ਕਹਿ ਢਹਿ ਪਈਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਕਿਆ ਮਾਗਉ ਕਿਆ ਕਹਿ ਸੁਣੀ ਮੈ ਦਰਸਨ ਭੂਖ ਪਿਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਹੁ ਪਾਇਆ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਜੀਉ ॥੨॥
ਜਾ ਤੂ ਤਾ ਮੈ ਸਭੁ ਕੋ ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰੀ ਰਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਤੁਧੁ ਅੰਤਰਿ ਹਉ ਸੁਖਿ ਵਸਾ ਤੂੰ ਅੰਤਰਿ ਸਾਬਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਤਖਤਿ ਵਡਾਈਆ ਭਾਣੈ ਭੀਖ ਉਦਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਥਲ ਸਿਰਿ ਸਰੁ ਵਹੈ ਕਮਲੁ ਫੁਲੈ ਆਕਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਭਵਜਲੁ ਲੰਘੀਐ ਭਾਣੈ ਮੰਝਿ ਭਰੀਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਸੋ ਸਹੁ ਰੰਗੁਲਾ ਸਿਫਤਿ ਰਤਾ ਗੁਣਤਾਸਿ ਜੀਉ ॥
ਭਾਣੈ ਸਹੁ ਭੀਹਾਵਲਾ ਹਉ ਆਵਣਿ ਜਾਣਿ ਮੁਈਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਤੂ ਸਹੁ ਅਗਮੁ ਅਤੋਲਵਾ ਹਉ ਕਹਿ ਕਹਿ ਢਹਿ ਪਈਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਕਿਆ ਮਾਗਉ ਕਿਆ ਕਹਿ ਸੁਣੀ ਮੈ ਦਰਸਨ ਭੂਖ ਪਿਆਸਿ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਹੁ ਪਾਇਆ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਜੀਉ ॥੨॥
सूही महला १ सुचजी ॥
जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥
तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥
भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥
भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥
भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥
भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥
भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥
तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥
किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥
गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥२॥
जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥
तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥
भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥
भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥
भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥
भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥
भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥
तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥
किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥
गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला १ सुचजी ॥ हे प्रभू ! जब तू (मेरी ओर होता है) तब हरेक जीव मुझे (आदर देता है)।तू ही मेरा मालिक है।तू ही मेरा सरमाया है। जब मैं तुझे अपने हृदय में बसा लेती हूँ तब मैं सुखी बसती हूँ जब तू मेरे दिल में प्रगट हो जाता है तब मुझे (हर जगह) शोभा मिलती है। प्रभू की रजा में ही कोई तख़्त पर बैठा है और (उसे) आदर-मान मिल रहा है।उसकी रजा में ही कोई विरक्त हो के (दर-ब-दर) भिक्षा माँगता फिरता है। प्रभू की रजा में ही कहीं सूखी धरती पर सरोवर चल पड़ता है और कमल फूल आकाश में खिल उठता है (भाव।किसी अहंकारी प्रेम-हीन हृदय में प्रेम का प्रवाह चल पड़ता है)। प्रभू की रजा में ही संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है; उसकी रजा के अनुसार ही विकारों से भर के बीच में डूब जाते हैं। उसकी रजा में ही किसी जीव-स्त्री को वह प्रभू-पति प्यारा लगता है।रजा के अनुसार ही कोई जीव उस गुणों के खजाने प्रभू की सिफतों में मस्त रहता है। ये भी उसकी रजा में ही है कि कभी वह पति मुझ जीव-स्त्री को डरावना लगता है।और मैं जनम-मरन के चक्कर में पड़ कर आत्मिक मौत मरती हूँ। हे प्रभू-पति ! तू अपहुँच है।तू बेअंत गुणों का मालिक है।मैं अरदास कर कर के तेरे ही दर पर गिर पड़ी हूँ (मैंने तेरा ही आसरा-परना लिया है)। मैं तेरे दर से और क्या माँगू।तुझे और क्या कहूँ जो तू सुने।मुझे तेरे दीदार की भूख है।मैं तेरे दर्शनों की प्यासी हूँ। तू सदा-स्थिर रहने वाला पति गुरू के शबद के माध्यम से मिलता है।मेरी नानक की तेरे आगे आरजू है कि मुझे भी गुरू की शरण डाल के मिल। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 762 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 762” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 763 →, पीछे का: ← अंग 761।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।