अंग
754
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਸਤਿ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥
ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਸਚੈ ਨਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥
ਏਕੋ ਸਚਾ ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਵਿਰਲਾ ਕੋ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਤਾ ਬਖਸੇ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਸਵਾਰੇ ॥੭॥
ਸਭੋ ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਚੁ ਵਰਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਈ ਜਾਣੈ ॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣਾ ਹੁਕਮੋ ਵਰਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭਾਏ ਜੋ ਇਛੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸ ਦਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੋਵੈ ਜਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥੮॥੧॥
ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਸਚੈ ਨਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥
ਏਕੋ ਸਚਾ ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਵਿਰਲਾ ਕੋ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਤਾ ਬਖਸੇ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਸਵਾਰੇ ॥੭॥
ਸਭੋ ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਚੁ ਵਰਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਈ ਜਾਣੈ ॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣਾ ਹੁਕਮੋ ਵਰਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭਾਏ ਜੋ ਇਛੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸ ਦਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੋਵੈ ਜਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥੮॥੧॥
हरि का नामु सति करि जाणै गुर कै भाइ पिआरे ॥
सची वडिआई गुर ते पाई सचै नाइ पिआरे ॥
एको सचा सभ महि वरतै विरला को वीचारे ॥
आपे मेलि लए ता बखसे सची भगति सवारे ॥७॥
सभो सचु सचु सचु वरतै गुरमुखि कोई जाणै ॥
जंमण मरणा हुकमो वरतै गुरमुखि आपु पछाणै ॥
नामु धिआए ता सतिगुरु भाए जो इछै सो फलु पाए ॥
नानक तिस दा सभु किछु होवै जि विचहु आपु गवाए ॥८॥१॥
सची वडिआई गुर ते पाई सचै नाइ पिआरे ॥
एको सचा सभ महि वरतै विरला को वीचारे ॥
आपे मेलि लए ता बखसे सची भगति सवारे ॥७॥
सभो सचु सचु सचु वरतै गुरमुखि कोई जाणै ॥
जंमण मरणा हुकमो वरतै गुरमुखि आपु पछाणै ॥
नामु धिआए ता सतिगुरु भाए जो इछै सो फलु पाए ॥
नानक तिस दा सभु किछु होवै जि विचहु आपु गवाए ॥८॥१॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य प्यारे गुरू के प्रेम में टिका रहता है।वह ये बात समझ लेता है कि परमात्मा का नाम ही सच्चा साथी है। वह मनुष्य परमात्मा की सदा-स्थिर रहने वाली सिफत सालाह गुरू से प्राप्त कर लेता है।वह सदा-स्थिर प्रभू के नाम में प्यार करने लग जाता है। कोई विरला मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) ये विचार करता है कि सारी सृष्टि में सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा ही बसता है। (ऐसे मनुष्य को) जब प्रभू स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ता है।तो उस पर बख्शिश करता है।सदा-स्थिर रहने वाली अपनी भक्ति दे के उसका जीवन सोहाना बना देता है। 7। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य गुरू की शरण पड़ के समझता है कि हर जगह सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही काम कर रहा है। जगत में पैदा होना मरना भी उसी के हुकम में चल रहा है।गुरू की शरण पड़ने वाला वह मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। जब वह मनुष्य परमात्मा के नाम का सिमरन शुरू करता है तो वह गुरू को प्यारा लगने लग जाता है।फिर वह जो भी मुराद माँगता है वही हासिल कर लेता है। हे नानक ! (कह,) जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर लेता है।उसके आत्मिक जीवन का सारा सरमाया बचा रहता है। 8। 1।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਕਾਇਆ ਕਾਮਣਿ ਅਤਿ ਸੁਆਲਿੑਉ ਪਿਰੁ ਵਸੈ ਜਿਸੁ ਨਾਲੇ ॥
ਪਿਰ ਸਚੇ ਤੇ ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਸਮੑਾਲੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਲੇ ॥੧॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਉਪਜੀ ਸਾਚਿ ਸਮਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਵਸੈ ਖੰਡ ਮੰਡਲ ਪਾਤਾਲਾ ॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਜਗਜੀਵਨ ਦਾਤਾ ਵਸੈ ਸਭਨਾ ਕਰੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਕਾਇਆ ਕਾਮਣਿ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਲਾ ॥੨॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਆਪੇ ਵਸੈ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖਿਆ ਜਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਮੁਗਧੁ ਬੂਝੈ ਨਾਹੀ ਬਾਹਰਿ ਭਾਲਣਿ ਜਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਸਤਿਗੁਰਿ ਅਲਖੁ ਦਿਤਾ ਲਖਾਈ ॥੩॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਇਸੁ ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਨਉਖੰਡ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਹਾਟ ਪਟਣ ਬਾਜਾਰਾ ॥
ਇਸੁ ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥੪॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਤੋਲਿ ਤੁਲਾਵੈ ਆਪੇ ਤੋਲਣਹਾਰਾ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਤਨੁ ਜਵਾਹਰ ਮਾਣਕੁ ਤਿਸ ਕਾ ਮੋਲੁ ਅਫਾਰਾ ॥
ਮੋਲਿ ਕਿਤ ਹੀ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਨਾਹੀ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰਾ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਕਾਇਆ ਖੋਜੈ ਹੋਰ ਸਭ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਦੇਇ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ਹੋਰ ਕਿਆ ਕੋ ਕਰੇ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਭਉ ਭਾਉ ਵਸੈ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਈ ॥੬॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸਾ ਸਭ ਓਪਤਿ ਜਿਤੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਸਚੈ ਆਪਣਾ ਖੇਲੁ ਰਚਾਇਆ ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਆਪਿ ਦਿਖਾਇਆ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥੭॥
ਸਾ ਕਾਇਆ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ਸਚੈ ਆਪਿ ਸਵਾਰੀ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਦਰਿ ਢੋਈ ਨਾਹੀ ਤਾ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਵਡਿਆਈ ਪਾਏ ਜਿਸ ਨੋ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੮॥੨॥
ਕਾਇਆ ਕਾਮਣਿ ਅਤਿ ਸੁਆਲਿੑਉ ਪਿਰੁ ਵਸੈ ਜਿਸੁ ਨਾਲੇ ॥
ਪਿਰ ਸਚੇ ਤੇ ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਸਮੑਾਲੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਲੇ ॥੧॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਉਪਜੀ ਸਾਚਿ ਸਮਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਵਸੈ ਖੰਡ ਮੰਡਲ ਪਾਤਾਲਾ ॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਜਗਜੀਵਨ ਦਾਤਾ ਵਸੈ ਸਭਨਾ ਕਰੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਕਾਇਆ ਕਾਮਣਿ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਲਾ ॥੨॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਆਪੇ ਵਸੈ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖਿਆ ਜਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਮੁਗਧੁ ਬੂਝੈ ਨਾਹੀ ਬਾਹਰਿ ਭਾਲਣਿ ਜਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਸਤਿਗੁਰਿ ਅਲਖੁ ਦਿਤਾ ਲਖਾਈ ॥੩॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਇਸੁ ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਨਉਖੰਡ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਹਾਟ ਪਟਣ ਬਾਜਾਰਾ ॥
ਇਸੁ ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥੪॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਤੋਲਿ ਤੁਲਾਵੈ ਆਪੇ ਤੋਲਣਹਾਰਾ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਤਨੁ ਜਵਾਹਰ ਮਾਣਕੁ ਤਿਸ ਕਾ ਮੋਲੁ ਅਫਾਰਾ ॥
ਮੋਲਿ ਕਿਤ ਹੀ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਨਾਹੀ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰਾ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਕਾਇਆ ਖੋਜੈ ਹੋਰ ਸਭ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਦੇਇ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ਹੋਰ ਕਿਆ ਕੋ ਕਰੇ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਭਉ ਭਾਉ ਵਸੈ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਈ ॥੬॥
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸਾ ਸਭ ਓਪਤਿ ਜਿਤੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਸਚੈ ਆਪਣਾ ਖੇਲੁ ਰਚਾਇਆ ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਆਪਿ ਦਿਖਾਇਆ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥੭॥
ਸਾ ਕਾਇਆ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ਸਚੈ ਆਪਿ ਸਵਾਰੀ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਦਰਿ ਢੋਈ ਨਾਹੀ ਤਾ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਵਡਿਆਈ ਪਾਏ ਜਿਸ ਨੋ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੮॥੨॥
सूही महला ३ ॥
काइआ कामणि अति सुआलि॑उ पिरु वसै जिसु नाले ॥
पिर सचे ते सदा सुहागणि गुर का सबदु सम॑ाले ॥
हरि की भगति सदा रंगि राता हउमै विचहु जाले ॥१॥
वाहु वाहु पूरे गुर की बाणी ॥
पूरे गुर ते उपजी साचि समाणी ॥१॥ रहाउ ॥
काइआ अंदरि सभु किछु वसै खंड मंडल पाताला ॥
काइआ अंदरि जगजीवन दाता वसै सभना करे प्रतिपाला ॥
काइआ कामणि सदा सुहेली गुरमुखि नामु सम॑ाला ॥२॥
काइआ अंदरि आपे वसै अलखु न लखिआ जाई ॥
मनमुखु मुगधु बूझै नाही बाहरि भालणि जाई ॥
सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए सतिगुरि अलखु दिता लखाई ॥३॥
काइआ अंदरि रतन पदारथ भगति भरे भंडारा ॥
इसु काइआ अंदरि नउखंड प्रिथमी हाट पटण बाजारा ॥
इसु काइआ अंदरि नामु नउ निधि पाईऐ गुर कै सबदि वीचारा ॥४॥
काइआ अंदरि तोलि तुलावै आपे तोलणहारा ॥
इहु मनु रतनु जवाहर माणकु तिस का मोलु अफारा ॥
मोलि कित ही नामु पाईऐ नाही नामु पाईऐ गुर बीचारा ॥५॥
गुरमुखि होवै सु काइआ खोजै होर सभ भरमि भुलाई ॥
जिस नो देइ सोई जनु पावै होर किआ को करे चतुराई ॥
काइआ अंदरि भउ भाउ वसै गुर परसादी पाई ॥६॥
काइआ अंदरि ब्रहमा बिसनु महेसा सभ ओपति जितु संसारा ॥
सचै आपणा खेलु रचाइआ आवा गउणु पासारा ॥
पूरै सतिगुरि आपि दिखाइआ सचि नामि निसतारा ॥७॥
सा काइआ जो सतिगुरु सेवै सचै आपि सवारी ॥
विणु नावै दरि ढोई नाही ता जमु करे खुआरी ॥
नानक सचु वडिआई पाए जिस नो हरि किरपा धारी ॥८॥२॥
काइआ कामणि अति सुआलि॑उ पिरु वसै जिसु नाले ॥
पिर सचे ते सदा सुहागणि गुर का सबदु सम॑ाले ॥
हरि की भगति सदा रंगि राता हउमै विचहु जाले ॥१॥
वाहु वाहु पूरे गुर की बाणी ॥
पूरे गुर ते उपजी साचि समाणी ॥१॥ रहाउ ॥
काइआ अंदरि सभु किछु वसै खंड मंडल पाताला ॥
काइआ अंदरि जगजीवन दाता वसै सभना करे प्रतिपाला ॥
काइआ कामणि सदा सुहेली गुरमुखि नामु सम॑ाला ॥२॥
काइआ अंदरि आपे वसै अलखु न लखिआ जाई ॥
मनमुखु मुगधु बूझै नाही बाहरि भालणि जाई ॥
सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए सतिगुरि अलखु दिता लखाई ॥३॥
काइआ अंदरि रतन पदारथ भगति भरे भंडारा ॥
इसु काइआ अंदरि नउखंड प्रिथमी हाट पटण बाजारा ॥
इसु काइआ अंदरि नामु नउ निधि पाईऐ गुर कै सबदि वीचारा ॥४॥
काइआ अंदरि तोलि तुलावै आपे तोलणहारा ॥
इहु मनु रतनु जवाहर माणकु तिस का मोलु अफारा ॥
मोलि कित ही नामु पाईऐ नाही नामु पाईऐ गुर बीचारा ॥५॥
गुरमुखि होवै सु काइआ खोजै होर सभ भरमि भुलाई ॥
जिस नो देइ सोई जनु पावै होर किआ को करे चतुराई ॥
काइआ अंदरि भउ भाउ वसै गुर परसादी पाई ॥६॥
काइआ अंदरि ब्रहमा बिसनु महेसा सभ ओपति जितु संसारा ॥
सचै आपणा खेलु रचाइआ आवा गउणु पासारा ॥
पूरै सतिगुरि आपि दिखाइआ सचि नामि निसतारा ॥७॥
सा काइआ जो सतिगुरु सेवै सचै आपि सवारी ॥
विणु नावै दरि ढोई नाही ता जमु करे खुआरी ॥
नानक सचु वडिआई पाए जिस नो हरि किरपा धारी ॥८॥२॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला ३ ॥ हे भाई ! (गुरू की बाणी की बरकति से) जिस काया में प्रभू-पति आ बसता है।वह काया-स्त्री बहुत सुंदर बन जाती है। जो जीव-स्त्री गुरू के शबद को अपने हृदय में बसाती है।सदा-स्थिर प्रभू-पति के मिलाप के कारण वह सदा के लिए सोहाग भाग वाली बन जाती है। हे भाई ! (बाणी की बरकति से जो मनुष्य) अपने अंदर से अहंकार को जला लेता है।वह सदा के लिए परमात्मा की भक्ति के रंग में रंगा जाता है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू की बाणी धन्य धन्य है। ये बाणी पूरे गुरू के हृदय में से पैदा होती है।और (जो मनुष्य इसको अपने हृदय में बसाता है उसको) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन कर देती है। 1।रहाउ। हे भाई ! खण्डों-मण्डलों-पातालों (सारे जगत) का हरेक सुख उस शरीर के अंदर आ बसता है। जिस शरीर में जगत का जीवन वह दातार-प्रभू प्रकट हो जाता है जो सारे जीवों की पालना करता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाता है उसकी काया-स्त्री सदा सुखी रहती है। 2। हे भाई ! इस शरीर में प्रभू आप ही बसता है।पर वह अदृश्य है (साधारण तौर पर) देखा नहीं जा सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य (ये भेद) नहीं समझता।(उस प्रभू को) बाहर (जंगल आदि में) तलाशने के लिए चल पड़ता है। जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है।वह सदा आत्मिक आनंद पाता है (क्योंकि जो भी मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ा) गुरू ने (उसको) अदृश्य परमात्मा (उसके अंदर बसता) दिखा दिया। 3। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति (जैसे) रत्न-पदार्थ है (इन रत्न-पदार्थों के) खजाने इस मनुष्य शरीर में भरे पड़े हैं। इस शरीर के अंदर ही (जैसे) सारी धरती के हाट-बाजार और शहर (बस रहे हैं।गुरू की बाणी की बरकति से मनुष्य अंदर ही नाम-धन का व्यापार करता है)। गुरू के शबद के माध्यम से विचार कर के इस शरीर में से ही परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है।जो (जैसे धरती के) नौ ही खजाने हैं। 4। हे भाई ! जिस मानव शरीर में नाम-रत्न की परख करने वाला प्रभू स्वयं ही बसता है।वह स्वयं परख करके नाम-रत्न की परख की जाच सिखाता है। (जिस मनुष्य को जाच देता है।उसका) ये मन (जैसे) रतन-जवाहर-मोती (जैसा कीमती बन जाता है कि) उसका मूल्य नहीं पड़ सकता। (उस मनुष्य को समझ पड़ जाती है कि परमात्मा का) नाम किसी (दुनियावी) कीमत से नहीं मिल सकता।सतिगुरू की बाणी की विचार की बरकति से परमात्मा का नाम मिलता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह (परमात्मा के नाम की प्राप्ति के वास्ते) अपने शरीर को ही खोजता है।बाकी की दुनिया भटकना में पड़ कर गलत राह पर पड़ी रहती है। परमात्मा खुद जिस मनुष्य को (अपने नाम की दाति) देता है।वही मनुष्य प्राप्त करता है।कोई भी मनुष्य (गुरू की शरण के बिना) और कोई समझदारी नहीं कर सकता (जिससे नाम प्राप्त कर सके)। गुरू की कृपा से ही नाम प्राप्त होता है।जिसे प्राप्त होता है उसके शरीर में परमात्मा का डर-अदब और प्यार आ बसता है। 6। हे भाई ! इस शरीर में वह परमात्मा बस रहा है।जिससे ब्रहमा-विष्णु-शिव और सारी सृष्टि की उत्पक्ति हुई है। सदा-स्थिर प्रभू ने (ये जगत) अपना एक तमाश रचा हुआ है ये पैदा होने व मरने का एक पसारा पसार दिया है। जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने (ये अस्लियत) दिखा दी।सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के उस मनुष्य का पार उतारा हो गया। 7। हे भाई ! वही शरीर सफल है जो गुरू की शरण पड़ता है।उस शरीर को सदा-स्थिर रहने वाले करतार ने स्वयं सुंदर बना दिया। परमात्मा के नाम के बिना परमात्मा के दर पर खड़ा होना भी नसीब नहीं होता।तब (ऐसे मनुष्य को) जमराज दुखी करता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं कृपा करता है।उसको अपना सदा-स्थिर नाम बख्शता है (यही उसके वास्ते सबसे बड़ी) इज्जत है। 8। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 754 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 754” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 755 →, पीछे का: ← अंग 753।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।