अंग
763
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੫ ਗੁਣਵੰਤੀ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਗੁਰਸਿਖੜਾ ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ਜੀਉ ॥
ਆਖਾ ਬਿਰਥਾ ਜੀਅ ਕੀ ਗੁਰੁ ਸਜਣੁ ਦੇਹਿ ਮਿਲਾਇ ਜੀਉ ॥
ਸੋਈ ਦਸਿ ਉਪਦੇਸੜਾ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਅਨਤ ਨ ਕਾਹੂ ਜਾਇ ਜੀਉ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਤੈ ਕੂੰ ਡੇਵਸਾ ਮੈ ਮਾਰਗੁ ਦੇਹੁ ਬਤਾਇ ਜੀਉ ॥
ਹਉ ਆਇਆ ਦੂਰਹੁ ਚਲਿ ਕੈ ਮੈ ਤਕੀ ਤਉ ਸਰਣਾਇ ਜੀਉ ॥
ਮੈ ਆਸਾ ਰਖੀ ਚਿਤਿ ਮਹਿ ਮੇਰਾ ਸਭੋ ਦੁਖੁ ਗਵਾਇ ਜੀਉ ॥
ਇਤੁ ਮਾਰਗਿ ਚਲੇ ਭਾਈਅੜੇ ਗੁਰੁ ਕਹੈ ਸੁ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ਜੀਉ ॥
ਤਿਆਗੇਂ ਮਨ ਕੀ ਮਤੜੀ ਵਿਸਾਰੇਂ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਜੀਉ ॥
ਇਉ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਦਰਸਾਵੜਾ ਨਹ ਲਗੈ ਤਤੀ ਵਾਉ ਜੀਉ ॥
ਹਉ ਆਪਹੁ ਬੋਲਿ ਨ ਜਾਣਦਾ ਮੈ ਕਹਿਆ ਸਭੁ ਹੁਕਮਾਉ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਖਜਾਨਾ ਬਖਸਿਆ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕਿ ਕੀਆ ਪਸਾਉ ਜੀਉ ॥
ਮੈ ਬਹੁੜਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖੜੀ ਹਉ ਰਜਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਇ ਜੀਉ ॥
ਜੋ ਗੁਰ ਦੀਸੈ ਸਿਖੜਾ ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ਜੀਉ ॥੩॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਗੁਰਸਿਖੜਾ ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ਜੀਉ ॥
ਆਖਾ ਬਿਰਥਾ ਜੀਅ ਕੀ ਗੁਰੁ ਸਜਣੁ ਦੇਹਿ ਮਿਲਾਇ ਜੀਉ ॥
ਸੋਈ ਦਸਿ ਉਪਦੇਸੜਾ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਅਨਤ ਨ ਕਾਹੂ ਜਾਇ ਜੀਉ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਤੈ ਕੂੰ ਡੇਵਸਾ ਮੈ ਮਾਰਗੁ ਦੇਹੁ ਬਤਾਇ ਜੀਉ ॥
ਹਉ ਆਇਆ ਦੂਰਹੁ ਚਲਿ ਕੈ ਮੈ ਤਕੀ ਤਉ ਸਰਣਾਇ ਜੀਉ ॥
ਮੈ ਆਸਾ ਰਖੀ ਚਿਤਿ ਮਹਿ ਮੇਰਾ ਸਭੋ ਦੁਖੁ ਗਵਾਇ ਜੀਉ ॥
ਇਤੁ ਮਾਰਗਿ ਚਲੇ ਭਾਈਅੜੇ ਗੁਰੁ ਕਹੈ ਸੁ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ਜੀਉ ॥
ਤਿਆਗੇਂ ਮਨ ਕੀ ਮਤੜੀ ਵਿਸਾਰੇਂ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਜੀਉ ॥
ਇਉ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਦਰਸਾਵੜਾ ਨਹ ਲਗੈ ਤਤੀ ਵਾਉ ਜੀਉ ॥
ਹਉ ਆਪਹੁ ਬੋਲਿ ਨ ਜਾਣਦਾ ਮੈ ਕਹਿਆ ਸਭੁ ਹੁਕਮਾਉ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਖਜਾਨਾ ਬਖਸਿਆ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕਿ ਕੀਆ ਪਸਾਉ ਜੀਉ ॥
ਮੈ ਬਹੁੜਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖੜੀ ਹਉ ਰਜਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਇ ਜੀਉ ॥
ਜੋ ਗੁਰ ਦੀਸੈ ਸਿਖੜਾ ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ਜੀਉ ॥੩॥
सूही महला ५ गुणवंती ॥
जो दीसै गुरसिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥
आखा बिरथा जीअ की गुरु सजणु देहि मिलाइ जीउ ॥
सोई दसि उपदेसड़ा मेरा मनु अनत न काहू जाइ जीउ ॥
इहु मनु तै कूं डेवसा मै मारगु देहु बताइ जीउ ॥
हउ आइआ दूरहु चलि कै मै तकी तउ सरणाइ जीउ ॥
मै आसा रखी चिति महि मेरा सभो दुखु गवाइ जीउ ॥
इतु मारगि चले भाईअड़े गुरु कहै सु कार कमाइ जीउ ॥
तिआगें मन की मतड़ी विसारें दूजा भाउ जीउ ॥
इउ पावहि हरि दरसावड़ा नह लगै तती वाउ जीउ ॥
हउ आपहु बोलि न जाणदा मै कहिआ सभु हुकमाउ जीउ ॥
हरि भगति खजाना बखसिआ गुरि नानकि कीआ पसाउ जीउ ॥
मै बहुड़ि न त्रिसना भुखड़ी हउ रजा त्रिपति अघाइ जीउ ॥
जो गुर दीसै सिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥३॥
जो दीसै गुरसिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥
आखा बिरथा जीअ की गुरु सजणु देहि मिलाइ जीउ ॥
सोई दसि उपदेसड़ा मेरा मनु अनत न काहू जाइ जीउ ॥
इहु मनु तै कूं डेवसा मै मारगु देहु बताइ जीउ ॥
हउ आइआ दूरहु चलि कै मै तकी तउ सरणाइ जीउ ॥
मै आसा रखी चिति महि मेरा सभो दुखु गवाइ जीउ ॥
इतु मारगि चले भाईअड़े गुरु कहै सु कार कमाइ जीउ ॥
तिआगें मन की मतड़ी विसारें दूजा भाउ जीउ ॥
इउ पावहि हरि दरसावड़ा नह लगै तती वाउ जीउ ॥
हउ आपहु बोलि न जाणदा मै कहिआ सभु हुकमाउ जीउ ॥
हरि भगति खजाना बखसिआ गुरि नानकि कीआ पसाउ जीउ ॥
मै बहुड़ि न त्रिसना भुखड़ी हउ रजा त्रिपति अघाइ जीउ ॥
जो गुर दीसै सिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला ५ गुणवंती ॥ मुझे जो भी कोई गुरू का प्यारा सिख मिल जाता है।मैं झुक-झुक के (भाव।विनम्रता-अधीनगी से) उसके पैरों पे लगता हूँ। और उसे अपने दिल की पीड़ा (तमन्ना) बताता हूँ (और विनती करता हूँ- हे गुरसिख !) मुझे सज्जन गुरू मिला दे। मुझे कोई ऐसा सुंदर उपदेश दे (जिसकी बरकति से) मेरा मन किसी और की तरफ ना जाए। मैं अपना ये मन तेरे हवाले कर दूँगा।मुझे रास्ता बता (जिस रास्ते पर चल के प्रभू के दर्शन कर सकूँ)। मैं (चौरासी लाख के) दूर की राहों से चल के आया हूँ।अब मैंने तेरा ही सहारा देखा है। मैंने अपने चिक्त में यही आस रखी हुई है कि तू मेरा सारा दुख दूर कर देगा। (आगे से उक्तर मिलता है,) इस रास्ते पर जो गुर-भाई चलते हैं (वे गुरू के बताए हुए कर्म करते हैं) तू भी वही काम कर जो गुरू बताता है। अगर तू अपने मन की कोझी मति छोड़ दे।अगर तू प्रभू के बिना अन्य (माया आदि) का प्यार भुला दे। तो इस तरह तू प्रभू के सुंदर दर्शन कर लेगा।तुझे कोई दुख-कलेश नहीं व्यापेगा। मैंने जो कुछ तुझे बताया है गुरू का हुकम ही बताया है।मैं अपनी अक्ल का आसरा ले के ये रास्ता नहीं बता रहा। जिस (सौभाग्यशाली व्यक्ति) पर नानक ने कृपा की है।परमात्मा ने उसको अपनी भक्ति का खजाना बख्श दिया है। (गुरू नानक की मेहर के सदके मैं पूरी तरह से तृप्त हो गया हूँ।मुझे अब माया की कोई भूख नहीं सताती।) मुझे जो भी कोई गुरू का प्यारा सिख मिल जाता है।मैं विनम्रता-अधीनगी सहित उसके पैर लगता हूँ। 3।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨਿ ਮੈ ਮਤ ਪੇਈਅੜੈ ਘਰਿ ਪਾਹੁਣੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਮੈਲੀ ਅਵਗਣਿ ਚਿਤਿ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗੁਣ ਨ ਸਮਾਵਨੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਗੁਣ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣੀ ਜੋਬਨੁ ਬਾਦਿ ਗਵਾਇਆ ॥
ਵਰੁ ਘਰੁ ਦਰੁ ਦਰਸਨੁ ਨਹੀ ਜਾਤਾ ਪਿਰ ਕਾ ਸਹਜੁ ਨ ਭਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਛਿ ਨ ਮਾਰਗਿ ਚਾਲੀ ਸੂਤੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਬਾਲਤਣਿ ਰਾਡੇਪਾ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਧਨ ਕੁਮਲਾਣੀ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਮੈ ਵਰੁ ਦੇਹਿ ਮੈ ਹਰਿ ਵਰੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸ ਕੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਬਾਣੀ ਜਿਸ ਕੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਕੰਤੁ ਰਵੈ ਸੋਹਾਗਣਿ ਅਵਗਣਵੰਤੀ ਦੂਰੇ ॥
ਜੈਸੀ ਆਸਾ ਤੈਸੀ ਮਨਸਾ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸੁ ਸਰਬ ਸੁਹਾਗਣਿ ਰਾਂਡ ਨ ਮੈਲੈ ਵੇਸੇ ॥
ਨਾਨਕ ਮੈ ਵਰੁ ਸਾਚਾ ਭਾਵੈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਤੈਸੇ ॥੨॥
ਬਾਬਾ ਲਗਨੁ ਗਣਾਇ ਹੰ ਭੀ ਵੰਞਾ ਸਾਹੁਰੈ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਸਾਹਾ ਹੁਕਮੁ ਰਜਾਇ ਸੋ ਨ ਟਲੈ ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰੈ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਕਰਤੈ ਕਰਿ ਪਾਇਆ ਮੇਟਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਈ ॥
ਜਾਞੀ ਨਾਉ ਨਰਹ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਤਿਹੁ ਲੋਈ ॥
ਮਾਇ ਨਿਰਾਸੀ ਰੋਇ ਵਿਛੁੰਨੀ ਬਾਲੀ ਬਾਲੈ ਹੇਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਸੁਖ ਮਹਲੀ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਪ੍ਰਭੁ ਚੇਤੇ ॥੩॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨਿ ਮੈ ਮਤ ਪੇਈਅੜੈ ਘਰਿ ਪਾਹੁਣੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਮੈਲੀ ਅਵਗਣਿ ਚਿਤਿ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗੁਣ ਨ ਸਮਾਵਨੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਗੁਣ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣੀ ਜੋਬਨੁ ਬਾਦਿ ਗਵਾਇਆ ॥
ਵਰੁ ਘਰੁ ਦਰੁ ਦਰਸਨੁ ਨਹੀ ਜਾਤਾ ਪਿਰ ਕਾ ਸਹਜੁ ਨ ਭਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਛਿ ਨ ਮਾਰਗਿ ਚਾਲੀ ਸੂਤੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਬਾਲਤਣਿ ਰਾਡੇਪਾ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਧਨ ਕੁਮਲਾਣੀ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਮੈ ਵਰੁ ਦੇਹਿ ਮੈ ਹਰਿ ਵਰੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸ ਕੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਬਾਣੀ ਜਿਸ ਕੀ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਕੰਤੁ ਰਵੈ ਸੋਹਾਗਣਿ ਅਵਗਣਵੰਤੀ ਦੂਰੇ ॥
ਜੈਸੀ ਆਸਾ ਤੈਸੀ ਮਨਸਾ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸੁ ਸਰਬ ਸੁਹਾਗਣਿ ਰਾਂਡ ਨ ਮੈਲੈ ਵੇਸੇ ॥
ਨਾਨਕ ਮੈ ਵਰੁ ਸਾਚਾ ਭਾਵੈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਤੈਸੇ ॥੨॥
ਬਾਬਾ ਲਗਨੁ ਗਣਾਇ ਹੰ ਭੀ ਵੰਞਾ ਸਾਹੁਰੈ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਸਾਹਾ ਹੁਕਮੁ ਰਜਾਇ ਸੋ ਨ ਟਲੈ ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰੈ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਕਰਤੈ ਕਰਿ ਪਾਇਆ ਮੇਟਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਈ ॥
ਜਾਞੀ ਨਾਉ ਨਰਹ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਤਿਹੁ ਲੋਈ ॥
ਮਾਇ ਨਿਰਾਸੀ ਰੋਇ ਵਿਛੁੰਨੀ ਬਾਲੀ ਬਾਲੈ ਹੇਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਸੁਖ ਮਹਲੀ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਪ੍ਰਭੁ ਚੇਤੇ ॥੩॥
रागु सूही छंत महला १ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥
मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥
गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥
वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥
सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥
नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥
बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥
रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥
त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥
जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥
हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥
नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥२॥
बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥
साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥
किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥
जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥
माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥
नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥३॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥
मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥
गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥
वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥
सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥
नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥
बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥
रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥
त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥
जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥
हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥
नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥२॥
बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥
साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥
किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥
जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥
माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥
नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥३॥
हिन्दी अर्थ: रागु सूही छंत महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्रभू जी ! मैं तुझसे सदके हूँ (तूने कैसी आश्चर्यजनक लीला रचाई है !) जीव स्त्री (तेरी रची माया के प्रभाव तहत) जवानी के वक्त वह ऐसे मस्त है जैसे शराब पी के मदहोश है।(ये भी नहीं समझती कि) इस पेके घर में (इस जगत में) वह एक मेहमान ही है। विकारों की कमाई के कारण चिक्त से वह मैली रहती है (गुरू की शरण नहीं आती।और) गुरू (की शरण पड़े) बिना (हृदय में) गुण टिक नहीं सकते। (माया की) भटकना में पड़ कर जीव-स्त्री ने (प्रभू के) गुणों की कीमत ना समझी।गलत रास्ते पर पड़ी रही।और जवानी का समय व्यर्थ गवा लिया। ना उसने पति-प्रभू के साथ सांझ डाली।ना उसके दर ना उसके घर और ना ही उसके दर्शनों की कद्र पहचानी।(भटकना में ही रह कर) जीव-स्त्री को प्रभू-पति का सुभाव भी पसंद नहीं आया। माया के मोह में सोई हुई जीव-स्त्री की जिंदगी की सारी रात बीत गई।सतिगुरू की शिक्षा ले के ठीक रास्ते पर कभी ना चली। हे नानक ! ऐसी जीव-स्त्री तो बाली उम्र में ही विधवा हो गई।और प्रभू-पति के मिलाप के बिना उसका हृदय-कमल कुम्हलाया ही रहा। 1। हे प्यारे सतिगुरू ! मुझे पति-प्रभू मिला।(मेहर कर) मुझे वह पति-प्रभू प्यारा लगे।मैं उससे सदके जाऊँ। जो सदा ही हर जगह व्यापक है।तीनों ही भवनों में जिसका हुकम चल रहा है। तीनों भवनों का मालिक प्रभू भाग्यशाली जीव-स्त्री से प्यार करता है।पर जिसने अवगुण ही अवगुण सहेड़ लिए वह उसके चरणों से विछुड़ी रहती है। वह मालिक हरेक के हृदय में व्यापक है (वह हरेक के दिल की जानता है) जैसी आस ले के कोई उसके दर पर आती है वैसी ही इच्छा वह पूरी कर देता है। जो जीव-स्त्री प्रभू-पति की बनी रहती है वह सदा सोहाग-भाग वाली है।वह कभी विधवा नहीं होती।उसका वेश कभी मैला नहीं होता (उसका हृदय कभी विकारों से मैला नहीं होता)। हे नानक ! (अरदास कर और कह, हे सतिगुरू ! तेरी मेहर हो तो) वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू-पति मुझे (हमेशा) प्यारा लगता रहे जो प्रीतम हरेक युग में एक समान रहने वाला है। 2। हे सतिगुरू ! (वह) महूरत निकलवा (वह अवसर पैदा कर।जिसकी बरकति से) मैं भी पति-प्रभू के चरणों में जुड़ सकूँ। (हे गुरू ! तेरी कृपा से) रजा का मालिक जो हुकम करता है वह मेल का अवसर बन जाता है।उसको कोई टाल नहीं सकता (उसमें कोई विघ्न नहीं डाल सकता)। जीवों के किए कर्मों के अनुसार करतार ने (उनके मिलन व विछोड़े का) जो भी हुकम दिया है उसकी कोई उलंघ्ना नहीं कर सकता। (गुरू विचोले की कृपा से) वह परमात्मा जो तीनों लोकों में व्यापक है और (फिर भी अपने पैदा किए) बंदों से स्वतंत्र है (जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ने के लिए) दूल्हा बन के आता है। (जैसे बेटी को विदा करती माँ दोबारा मिलने की उम्मीदें त्याग के रो के विछुड़ती है।वैसे ही) माया जीव-स्त्री के प्रभू-पति के साथ प्रेम के कारण जीव-स्त्री को अपने काबू में रख सकने की उम्मीदें छोड़ के (मानो) रो के विछुड़ती है। हे नानक ! जीव-स्त्री गुरू के चरणों की बरकति से प्रभू-पति को हृदय में बसाती है।और सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद के द्वारा प्रभू की हजूरी में आनंद पाती है। 3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 763 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 763” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 764 →, पीछे का: ← अंग 762।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।