अंग 764

अंग
764
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਾਬੁਲਿ ਦਿਤੜੀ ਦੂਰਿ ਨਾ ਆਵੈ ਘਰਿ ਪੇਈਐ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਰਹਸੀ ਵੇਖਿ ਹਦੂਰਿ ਪਿਰਿ ਰਾਵੀ ਘਰਿ ਸੋਹੀਐ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥
ਸਾਚੇ ਪਿਰ ਲੋੜੀ ਪ੍ਰੀਤਮ ਜੋੜੀ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਪਰਧਾਨੇ ॥
ਸੰਜੋਗੀ ਮੇਲਾ ਥਾਨਿ ਸੁਹੇਲਾ ਗੁਣਵੰਤੀ ਗੁਰ ਗਿਆਨੇ ॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸਦਾ ਸਚੁ ਪਲੈ ਸਚੁ ਬੋਲੈ ਪਿਰ ਭਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਵਿਛੁੜਿ ਨਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ਗੁਰਮਤਿ ਅੰਕਿ ਸਮਾਏ ॥੪॥੧॥
बाबुलि दितड़ी दूरि ना आवै घरि पेईऐ बलि राम जीउ ॥
रहसी वेखि हदूरि पिरि रावी घरि सोहीऐ बलि राम जीउ ॥
साचे पिर लोड़ी प्रीतम जोड़ी मति पूरी परधाने ॥
संजोगी मेला थानि सुहेला गुणवंती गुर गिआने ॥
सतु संतोखु सदा सचु पलै सचु बोलै पिर भाए ॥
नानक विछुड़ि ना दुखु पाए गुरमति अंकि समाए ॥४॥१॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू ने (मेहर करके जीव-स्त्री माया के प्रभाव से इतनी) दूर पहुँचा दी कि वह दोबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं आती।प्रभू-पति के प्रत्यक्ष दीदार करके वह प्रसन्न-चिक्त होती है। प्रभू-पति ने (जब) उससे प्यार किया।तो उसके चरणों में जुड़ के वह अपना आत्मिक जीवन सँवारती है। सदा-स्थिर प्रीतम प्रभू को उस जीव-स्त्री की जरूरत पड़ी (भाव।जीव-स्त्री उसके लेखे में आ गई) उसने उसको अपने साथ मिला लिया। (इस मिलाप की बरकति से) उसकी मति त्रुटि-हीन हो गई।वह जानी पहचानी हस्ती बन गई। सौभाग्य से उसका मिलाप हो गया।प्रभू-चरणों में उसका जीवन सुखी हो गया।वह गुणवती हो गई।गुरू के दिए ज्ञान वाली हो गई। सत्य-संतोष और सदा-स्थिर याद उसके हृदय में टिक जाती है।वह सदा-स्थिर प्रभू को सदा सिमरती है।वह प्रभू-पति को प्यारी लगने लग जाती है। हे नानक ! जीव-स्त्री (प्रभू-चरणों से) विछुड़ के दुख नहीं पाती।गुरू की शिक्षा की बरकति से वह प्रभू की गोद में लीन हो जाती है। 4। 1।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ਛੰਤੁ ਘਰੁ ੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹਮ ਘਰਿ ਸਾਜਨ ਆਏ ॥
ਸਾਚੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਏ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਏ ਪੰਚ ਮਿਲੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਾਈ ਵਸਤੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਈ ਜਿਸੁ ਸੇਤੀ ਮਨੁ ਲਾਇਆ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਮੇਲੁ ਭਇਆ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਘਰ ਮੰਦਰ ਸੋਹਾਏ ॥
ਪੰਚ ਸਬਦ ਧੁਨਿ ਅਨਹਦ ਵਾਜੇ ਹਮ ਘਰਿ ਸਾਜਨ ਆਏ ॥੧॥
ਆਵਹੁ ਮੀਤ ਪਿਆਰੇ ॥ ਮੰਗਲ ਗਾਵਹੁ ਨਾਰੇ ॥
ਸਚੁ ਮੰਗਲੁ ਗਾਵਹੁ ਤਾ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਹੁ ਸੋਹਿਲੜਾ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ॥
ਅਪਨੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ਥਾਨਿ ਸੁਹਾਇਆ ਕਾਰਜ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਗਿਆਨ ਮਹਾ ਰਸੁ ਨੇਤ੍ਰੀ ਅੰਜਨੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਰੂਪੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਸਖੀ ਮਿਲਹੁ ਰਸਿ ਮੰਗਲੁ ਗਾਵਹੁ ਹਮ ਘਰਿ ਸਾਜਨੁ ਆਇਆ ॥੨॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭਿੰਨਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਰਤੰਨਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਰਤਨੁ ਪਦਾਰਥੁ ਮੇਰੈ ਪਰਮ ਤਤੁ ਵੀਚਾਰੋ ॥
ਜੰਤ ਭੇਖ ਤੂ ਸਫਲਿਓ ਦਾਤਾ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਦੇਵਣਹਾਰੋ ॥
ਤੂ ਜਾਨੁ ਗਿਆਨੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਆਪੇ ਕਾਰਣੁ ਕੀਨਾ ॥
ਸੁਨਹੁ ਸਖੀ ਮਨੁ ਮੋਹਨਿ ਮੋਹਿਆ ਤਨੁ ਮਨੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭੀਨਾ ॥੩॥
ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਸਾਚਾ ਖੇਲੁ ਤੁਮੑਾਰਾ ॥
ਸਚੁ ਖੇਲੁ ਤੁਮੑਾਰਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਕਉਣੁ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਸਿਆਣੇ ਕੇਤੇ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕਵਣੁ ਕਹਾਏ ॥
ਕਾਲੁ ਬਿਕਾਲੁ ਭਏ ਦੇਵਾਨੇ ਮਨੁ ਰਾਖਿਆ ਗੁਰਿ ਠਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਅਵਗਣ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ਗੁਣ ਸੰਗਮਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਏ ॥੪॥੧॥੨॥
रागु सूही महला १ छंतु घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम घरि साजन आए ॥
साचै मेलि मिलाए ॥
सहजि मिलाए हरि मनि भाए पंच मिले सुखु पाइआ ॥
साई वसतु परापति होई जिसु सेती मनु लाइआ ॥
अनदिनु मेलु भइआ मनु मानिआ घर मंदर सोहाए ॥
पंच सबद धुनि अनहद वाजे हम घरि साजन आए ॥१॥
आवहु मीत पिआरे ॥ मंगल गावहु नारे ॥
सचु मंगलु गावहु ता प्रभ भावहु सोहिलड़ा जुग चारे ॥
अपनै घरि आइआ थानि सुहाइआ कारज सबदि सवारे ॥
गिआन महा रसु नेत्री अंजनु त्रिभवण रूपु दिखाइआ ॥
सखी मिलहु रसि मंगलु गावहु हम घरि साजनु आइआ ॥२॥
मनु तनु अंम्रिति भिंना ॥
अंतरि प्रेमु रतंना ॥
अंतरि रतनु पदारथु मेरै परम ततु वीचारो ॥
जंत भेख तू सफलिओ दाता सिरि सिरि देवणहारो ॥
तू जानु गिआनी अंतरजामी आपे कारणु कीना ॥
सुनहु सखी मनु मोहनि मोहिआ तनु मनु अंम्रिति भीना ॥३॥
आतम रामु संसारा ॥
साचा खेलु तुम॑ारा ॥
सचु खेलु तुम॑ारा अगम अपारा तुधु बिनु कउणु बुझाए ॥
सिध साधिक सिआणे केते तुझ बिनु कवणु कहाए ॥
कालु बिकालु भए देवाने मनु राखिआ गुरि ठाए ॥
नानक अवगण सबदि जलाए गुण संगमि प्रभु पाए ॥४॥१॥२॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला १ छंतु घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मेरे हृदय-घर में मित्र प्रभू जी आ प्रकट हुए हैं। सदा-स्थिर प्रभू ने मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया है। प्रभू जी ने मुझे आत्मिक अडोलता में टिका दिया है।अब प्रभू जी मेरे मन को प्यारे लग रहे हैं।मेरी पाँचों ज्ञानेन्द्रियां (अपने अपने विषयों की ओर भागने की जगह प्रभू के प्रेम में) इकट्ठी हो के बैठ गई हैं। मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है।जिस नाम-वस्तु की मेरे अंदर चाहत पैदा हो रही थी।वह अब मुझे मिल गई है। अब हर वक्त प्रभू के नाम से मेरा मिलाप बना रहता है।मेरा मन (उसके नाम से) पतीज गया है।मेरा हृदय और ज्ञानेन्द्रियां सोहावने हो गए हैं। मेरे हृदय-घर में सज्जन प्रभू जी आ प्रकट हुए हैं (अब मेरे अंदर ऐसा आनंद आ बना है।जैसे) पाँच किस्मों के साज लगातार मिश्रित सुर में (मेरे) अंदर बज रहे हैं। 1। हे मेरी ज्ञानेन्द्रियो ! हे मेरी सहेलियो ! आओ। परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाओ जो मन में हिलोरे पैदा करते हैं। वह गीत गाओ जो अटल आत्मिक आनंद पैदा करते हैं।सिफत सालाह के वह गीत गाओ जो चारों युगों में आत्मिक हुलारे दिए रखता है।तब ही तुम प्रभू को अच्छी लगोगी। (हे सहेलियो ! मेरे हृदय को अपना घर बना के सज्जन प्रभू) अपने घर में आया है।मेरे हृदय-घर में बैठा शोभायमान है।गुरू के शबद ने मेरे जीवन-मनोरथ सवार दिए हैं। ऊँचे से ऊँचा आत्मिक आनंद देने वाले सतिगुरू के बख्शे ज्ञान का अंजन मुझे आँखों में डालने के लिए मिला है (उसकी बरकति से गुरू ने) मुझे तीन भवनों में व्यापक प्रभू के दर्शन करा दिए हैं। हे सहेलियो ! प्रभू के चरणों में जुड़ो और आनंद से सिफत सालाह के वह गीत गाओ जो आत्मिक हिल्लौरे पैदा करते हैं।मेरे हृदय-घर में सज्जन-प्रभू आ प्रकट हुए हैं। 2। हे सहेलियो ! मेरा मन और शरीर आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से भीग गया है। मेरे हृदय में प्रेम-रत्न पैदा हो गया है। मेरे हृदय में परमात्मा के गुणो की विचार (का एक ऐसा) सुंदर रत्न पैदा हो गया है (जिसकी बरकति से मैं उसके दर पर यूं अरदास करती हूँ – हे प्रभू ! सारे जीव तेरे दर के भिखारी हैं) तू भिखारी जीवों का कामयाब दाता है।तू हरेक जीव के सिर पर (रखवाला और) दातार है। तू समझदार है।ज्ञानवान है।हरेक के दिल की जानने वाला है।तूने खुद ही ये (सारा) जगत रचा है (और खुद ही हरेक की जरूरतें पूरी करनी जानता ह।और पूरी करता है)। हे सहेलियो ! (मेरा हाल सुनो) मोहन-प्रभू ने मेरा मन अपने प्रेम के वश में कर लिया है।मेरा मन मेरा तन उसके नाम-अमृत जल से भीग गया है। 3। हे प्रभू ! तू संसार की जिंद-जान है। ये संसार तेरी सचमुच की रची हुई खेल है (भाव।है तो ये संसार एक खेल ही।है तो नाशवंत।पर मन का भ्रम नहीं।सच-मुच मौजूद है)। हे अपहुँच और बेअंत प्रभू ! ये संसार तेरी सचमुच की रची हुई एक खेल है (लीला है) (ये अस्लियत) तेरे बिना और कोई नहीं समझ सकता। (इस संसार में) अनेकों ही पहुँचे हुए जोगी अनेकों ही साधना करने वाले और अनेकों ही समझदार होते आए हैं (तेरी ही मेहर से इस मंजिल मंजिल तक पहुँचते हैं) तेरे बिना और कोई तेरा सिमरन करा ही नहीं सकता। (तेरी ही मेहर से) गुरू ने जिसका मन तेरे चरणों में जोड़ा।उसके जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो गए। हे नानक ! (प्रभू की मेहर के सदका) जिस मनुष्य ने गुरू के शबद में जुड़ के (अपने अंदर से) औगुण जला लिए।उसने गुणों के मिलाप से प्रभू को पा लिया। 4। 1। 2।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੩
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਵਹੁ ਸਜਣਾ ਹਉ ਦੇਖਾ ਦਰਸਨੁ ਤੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਘਰਿ ਆਪਨੜੈ ਖੜੀ ਤਕਾ ਮੈ ਮਨਿ ਚਾਉ ਘਨੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਮਨਿ ਚਾਉ ਘਨੇਰਾ ਸੁਣਿ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰਾ ਮੈ ਤੇਰਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਭਈ ਨਿਹਕੇਵਲ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖੁ ਨਾਸਾ ॥
रागु सूही महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥
घरि आपनड़ै खड़ी तका मै मनि चाउ घनेरा राम ॥
मनि चाउ घनेरा सुणि प्रभ मेरा मै तेरा भरवासा ॥
दरसनु देखि भई निहकेवल जनम मरण दुखु नासा ॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला १ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे सज्जन प्रभू ! आ।मैं तेरे दर्शन कर सकूँ। (हे सज्जन !) मैं अपने हृदय में पूरी सावधानी से तेरा इन्तजार कर रही हूँ।मेरे मन में बड़ा चाव है (कि मुझे तेरे दर्शन हों)। हे मेरे प्रभू ! (मेरी विनती) सुन।मेरे मन में (तेरे दर्शनों के लिए) बड़ा ही उत्साह है।मुझे आसरा भी तेरा ही है। (हे प्रभू !) जिस जीव-स्त्री ने तेरे दर्शन कर लिए।वह पवित्र आत्मा हो गई।उसके जनम-मरण के दुख दूर हो गए।

संदर्भ: यह अंग 764 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 764” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 765 →, पीछे का: ← अंग 763

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।