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अंग 731

अंग
731
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरे लाल जीउ तेरा अंतु न जाणा ॥
तूं जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा तूं आपे सरब समाणा ॥1॥ रहाउ ॥
मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा ॥
घट ही भीतरि सो सहु तोली इन बिधि चितु रहावा ॥2॥
आपे कंडा तोलु तराजी आपे तोलणहारा ॥
आपे देखै आपे बूझै आपे है वणजारा ॥3॥
अंधुला नीच जाति परदेसी खिनु आवै तिलु जावै ॥
ता की संगति नानकु रहदा किउ करि मूड़ा पावै ॥4॥2॥9॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे सुंदर प्रभू जी ! मैं आपके गुणों का अंत नहीं जान सकता (मुझे ये समझ नहीं आ सकती कि आपके में कितनी सिफतें हैं)। आप पानी में भरपूर है।आप धरती के अंदर व्यापक है।आप आकाश में हर जगह मौजूद है।आप खुद ही सब जीवों में सब जगहों में समाया हुआ है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! अगर मेरा मन तराजू बन जाए।यदि मेरा चित्त तोलने वाला बाँट बन जाए।अगर मैं आपकी सेवा कर सकूँ।आपका सिमरन कर सकूँ (अगर ये सेवा-सिमरन मेरे वास्ते) सर्राफ़ बन जाए (तो भी।आपके गुणों का मैं अंत नहीं पा सकूँगा। पर हाँ) इन तरीकों से मैं अपने चित्त को आपके चरणों में टिका के रख सकूँगा।(हे भाई !) मैं अपने हृदय में ही उस पति-प्रभू को बैठा जाच सकूँगा। 2। (हे भाई ! प्रभू हरेक जगह व्यापक है।अपनी उपमा भी वह स्वयं ही जानता है और उस महानता की पैमायश कर सकता है।वह) खुद ही तराजू है।खुद ही तराजू का बाँट है।खुद ही तराजू की सूई है।और खुद ही (अपने गुणों को) तोलने वाला है। वह खुद ही सब जीवों की संभाल करता है।खुद ही सबके दिलों की समझता है।खुद ही जीव-रूप हो के जगत में (नाम) का व्यापार कर रहा है। 3। जो (मन माया के मोह में) अंधा हुआ पड़ा है जो (जन्मों-जन्मांतरों के विकारों की मैल से) नीच जाति का बना हुआ है।जो सदा भटकता रहता है। थोड़ा सा भी कहीं एक जगह पर टिक नहीं सकता (हे नानक आपकी) संगति सदा उस मन से है(आप) परमात्मा के गुणों की कद्र नहीं पा सकता। 4। 2। 9।
रागु सूही महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥
सभि इछा मनि तनि पूरीआ सभु चूका डरु जम के ॥1॥
मेरे मन गुण गावहु राम नाम हरि के ॥
गुरि तुठै मनु परबोधिआ हरि पीआ रसु गटके ॥1॥ रहाउ ॥
सतसंगति ऊतम सतिगुर केरी गुन गावै हरि प्रभ के ॥
हरि किरपा धारि मेलहु सतसंगति हम धोवह पग जन के ॥2॥
राम नामु सभु है राम नामा रसु गुरमति रसु रसके ॥
हरि अंम्रितु हरि जलु पाइआ सभ लाथी तिस तिस के ॥3॥
हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु हम वेचिओ सिरु गुर के ॥
जन नानक नामु परिओ गुर चेला गुर राखहु लाज जन के ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 4 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ जिस मनुष्य ने गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा का नाम सिमरा है। उसके मन में तन में (उपजी) सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं (उसके दिल में से) जम का सारा डर उतर जाता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम के गुण गाया कर। अगर (किसी मनुष्य पर) गुरू दयावान हो जाए।तो (उसका) मन (माया के मोह की नींद में से) जाग पड़ता है।वह मनुष्य परमात्मा के नाम का रस स्वाद से पीता है। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की साध-संगति बड़ी श्रेष्ठ जगह है (साध-संगति में मनुष्य) हरी-प्रभू के गुण गाता है। हे हरी ! मेहर कर।मुझे साधसंगति मिला (वहाँ) मैं आपके संतजनों के पैर धोऊँगा। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम हरेक को सुख देने वाला है।(पर) गुरू की मति पर चल कर ही हरी-नाम के रस का स्वाद लिया जा सकता है। जिस मनुष्य ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल प्राप्त कर लिया।उसकी (माया की) सारी प्यास बुझ गई। 3। हे भाई ! गुरू ही मेरी जाति है।गुरू ही मेरी इज्जत है।मैंने अपना सिर गुरू के पास बेच दिया है। हे दास नानक ! (कह) हे गुरू ! मेरा नाम ‘गुरू का सिख’ पड़ गया है।अब आप अपने इस सेवक की इज्जत रख ले।(और।हरी-नाम की दाति बख्शे रख)। 4। 1।
सूही महला 4 ॥
हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥
भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥1॥
मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥
मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥1॥ रहाउ ॥
नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥
धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥2॥
हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥
दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥3॥
तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥
जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है।हरी उक्तम पुरुख को जपा है।उसके सारे दरिद्र।दलों के दल नाश हो गए हैं। गुरू के शबद में जुड़ के उस मनुष्य के जनम-मरण का डर भी खत्म कर लिया।सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की सेवा-भक्ति करके वह आनंद में लीन हो गया। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का अति प्यारा नाम सिमरा कर। हे भाई ! मैंने अपना सिर महँगे मूल्य पर बेच दिया है (मैंने सिर के बदले में कीमती हरी-नाम ले लिया है)। 1।रहाउ। हे भाई ! दुनिया के राजे-महाराजे (माया के) रंग-रस भोगते रहते हैं।उन सबको आत्मिक मौत पकड़ कर आगे लगा लेती है। जब उन्हें किए कर्मों का फल मिलता है।जब उनके सिर पर परमात्मा का डंडा बजता है।तब पछताते हैं। 2। हे हरी ! हे पालनहार सर्व-व्यापक ! हम आपके (पैदा किए हुए) निमाणे से जीव हैं।हम आपकी शरण आए हैं।आप खुद (अपने) सेवकों की रक्षा कर। हे प्रभू ! मैं आपका दास हूँ।दास की तमन्ना पूरी कर।इस दास को संत जनों की संगति बख्श (ता कि ये दास) आत्मिक आनंद प्राप्त कर सके। 3। हे प्रभू ! हे सबसे बड़े मालिक ! आप सारी ताकतों का मालिक पुरुख है।मुझे एक छिन के वास्ते ही अपने नाम का दान दे। हे दास नानक ! (कह) जिसको प्रभू का नाम प्राप्त होता है।वह आनंद लेता है।मैं सदा हरी-नाम से सदके हूँ। 4। 2।
सूही महला 4 ॥
हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥
गुरि तुठै हरि रंगु चाड़िआ फिरि बहुड़ि न होवी भंङु ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! हरी-नाम का सिमरन (मनुष्य के मन में) हरी का प्यार पैदा करता है।और।ये हरी के साथ प्यार मजीठ के रंग जैसा प्यार होता है। अगर (किसी मनुष्य पर) गुरू प्रसन्न हो के उसको हरी-ना का रंग चढ़ा दे तो दोबारा उस रंग (प्यार) का कभी नाश नहीं होता। 1।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे सुंदर प्रभू जी ! मैं आपके गुणों का अंत नहीं जान सकता (मुझे ये समझ नहीं आ सकती कि आपके में कितनी सिफतें हैं)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।