तूं जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा तूं आपे सरब समाणा ॥1॥ रहाउ ॥
मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा ॥
घट ही भीतरि सो सहु तोली इन बिधि चितु रहावा ॥2॥
आपे कंडा तोलु तराजी आपे तोलणहारा ॥
आपे देखै आपे बूझै आपे है वणजारा ॥3॥
अंधुला नीच जाति परदेसी खिनु आवै तिलु जावै ॥
ता की संगति नानकु रहदा किउ करि मूड़ा पावै ॥4॥2॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥
सभि इछा मनि तनि पूरीआ सभु चूका डरु जम के ॥1॥
मेरे मन गुण गावहु राम नाम हरि के ॥
गुरि तुठै मनु परबोधिआ हरि पीआ रसु गटके ॥1॥ रहाउ ॥
सतसंगति ऊतम सतिगुर केरी गुन गावै हरि प्रभ के ॥
हरि किरपा धारि मेलहु सतसंगति हम धोवह पग जन के ॥2॥
राम नामु सभु है राम नामा रसु गुरमति रसु रसके ॥
हरि अंम्रितु हरि जलु पाइआ सभ लाथी तिस तिस के ॥3॥
हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु हम वेचिओ सिरु गुर के ॥
जन नानक नामु परिओ गुर चेला गुर राखहु लाज जन के ॥4॥1॥
हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥
भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥1॥
मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥
मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥1॥ रहाउ ॥
नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥
धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥2॥
हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥
दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥3॥
तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥
जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥4॥2॥
हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥
गुरि तुठै हरि रंगु चाड़िआ फिरि बहुड़ि न होवी भंङु ॥1॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे सुंदर प्रभू जी ! मैं आपके गुणों का अंत नहीं जान सकता (मुझे ये समझ नहीं आ सकती कि आपके में कितनी सिफतें हैं)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।