रागु सूही महला 1 चउपदे घरु 1
भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥
दूधु करम फुनि सुरति समाइणु होइ निरास जमावहु ॥1॥
जपहु त एको नामा ॥
अवरि निराफल कामा ॥1॥ रहाउ ॥
इहु मनु ईटी हाथि करहु फुनि नेत्रउ नीद न आवै ॥
रसना नामु जपहु तब मथीऐ इन बिधि अंम्रितु पावहु ॥2॥
मनु संपटु जितु सत सरि नावणु भावन पाती त्रिपति करे ॥
पूजा प्राण सेवकु जे सेवे इन॑ बिधि साहिबु रवतु रहै ॥3॥
कहदे कहहि कहे कहि जावहि तुम सरि अवरु न कोई ॥
भगति हीणु नानकु जनु जंपै हउ सालाही सचा सोई ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥
अंम्रितु छोडि काहे बिखु खाइ ॥1॥
ऐसा गिआनु जपहु मन मेरे ॥
होवहु चाकर साचे केरे ॥1॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु सभु कोई रवै ॥
बांधनि बांधिआ सभु जगु भवै ॥2॥
सेवा करे सु चाकरु होइ ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ सोइ ॥3॥
हम नही चंगे बुरा नही कोइ ॥
प्रणवति नानकु तारे सोइ ॥4॥1॥2॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह अद्वैत ईश्वर (ऑकारस्वरूप) केवल एक है, नाम उसका सत्य है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।