अंग
758
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਉ ਧਰਤੀ ਸੋਭ ਕਰੇ ਜਲੁ ਬਰਸੈ ਤਿਉ ਸਿਖੁ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਬਿਗਸਾਈ ॥੧੬॥
ਸੇਵਕ ਕਾ ਹੋਇ ਸੇਵਕੁ ਵਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਬਿਨਉ ਬੁਲਾਈ ॥੧੭॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਹਰਿ ਪਹਿ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਗੁਰ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥੧੮॥
ਤੂ ਆਪੇ ਗੁਰੁ ਚੇਲਾ ਹੈ ਆਪੇ ਗੁਰ ਵਿਚੁ ਦੇ ਤੁਝਹਿ ਧਿਆਈ ॥੧੯॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸੇਵਹਿ ਸੋ ਤੂਹੈ ਹੋਵਹਿ ਤੁਧੁ ਸੇਵਕ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੨੦॥
ਭੰਡਾਰ ਭਰੇ ਭਗਤੀ ਹਰਿ ਤੇਰੇ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਦੇਵਾਈ ॥੨੧॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਦੇਹਿ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ਹੋਰ ਨਿਹਫਲ ਸਭ ਚਤੁਰਾਈ ॥੨੨॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਸੋਇਆ ਮਨੁ ਜਾਗਾਈ ॥੨੩॥
ਇਕੁ ਦਾਨੁ ਮੰਗੈ ਨਾਨਕੁ ਵੇਚਾਰਾ ਹਰਿ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੁ ਕਰਾਈ ॥੨੪॥
ਜੇ ਗੁਰੁ ਝਿੜਕੇ ਤ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ਜੇ ਬਖਸੇ ਤ ਗੁਰ ਵਡਿਆਈ ॥੨੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲਹਿ ਸੋ ਥਾਇ ਪਾਏ ਮਨਮੁਖਿ ਕਿਛੁ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥੨੬॥
ਪਾਲਾ ਕਕਰੁ ਵਰਫ ਵਰਸੈ ਗੁਰਸਿਖੁ ਗੁਰ ਦੇਖਣ ਜਾਈ ॥੨੭॥
ਸਭੁ ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਦੇਖਉ ਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਵਿਚਿ ਅਖੀ ਗੁਰ ਪੈਰ ਧਰਾਈ ॥੨੮॥
ਅਨੇਕ ਉਪਾਵ ਕਰੀ ਗੁਰ ਕਾਰਣਿ ਗੁਰ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥਾਇ ਪਾਈ ॥੨੯॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਗੁਰ ਚਰਣ ਅਰਾਧੀ ਦਇਆ ਕਰਹੁ ਮੇਰੇ ਸਾਈ ॥੩੦॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਈ ॥੩੧॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਹੈ ਜਤ ਕਤ ਤਤ ਗੋਸਾਈ ॥੩੨॥੧॥
ਸੇਵਕ ਕਾ ਹੋਇ ਸੇਵਕੁ ਵਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਬਿਨਉ ਬੁਲਾਈ ॥੧੭॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਹਰਿ ਪਹਿ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਗੁਰ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥੧੮॥
ਤੂ ਆਪੇ ਗੁਰੁ ਚੇਲਾ ਹੈ ਆਪੇ ਗੁਰ ਵਿਚੁ ਦੇ ਤੁਝਹਿ ਧਿਆਈ ॥੧੯॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸੇਵਹਿ ਸੋ ਤੂਹੈ ਹੋਵਹਿ ਤੁਧੁ ਸੇਵਕ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੨੦॥
ਭੰਡਾਰ ਭਰੇ ਭਗਤੀ ਹਰਿ ਤੇਰੇ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਦੇਵਾਈ ॥੨੧॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਦੇਹਿ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ਹੋਰ ਨਿਹਫਲ ਸਭ ਚਤੁਰਾਈ ॥੨੨॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਸੋਇਆ ਮਨੁ ਜਾਗਾਈ ॥੨੩॥
ਇਕੁ ਦਾਨੁ ਮੰਗੈ ਨਾਨਕੁ ਵੇਚਾਰਾ ਹਰਿ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੁ ਕਰਾਈ ॥੨੪॥
ਜੇ ਗੁਰੁ ਝਿੜਕੇ ਤ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ਜੇ ਬਖਸੇ ਤ ਗੁਰ ਵਡਿਆਈ ॥੨੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲਹਿ ਸੋ ਥਾਇ ਪਾਏ ਮਨਮੁਖਿ ਕਿਛੁ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥੨੬॥
ਪਾਲਾ ਕਕਰੁ ਵਰਫ ਵਰਸੈ ਗੁਰਸਿਖੁ ਗੁਰ ਦੇਖਣ ਜਾਈ ॥੨੭॥
ਸਭੁ ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਦੇਖਉ ਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਵਿਚਿ ਅਖੀ ਗੁਰ ਪੈਰ ਧਰਾਈ ॥੨੮॥
ਅਨੇਕ ਉਪਾਵ ਕਰੀ ਗੁਰ ਕਾਰਣਿ ਗੁਰ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥਾਇ ਪਾਈ ॥੨੯॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਗੁਰ ਚਰਣ ਅਰਾਧੀ ਦਇਆ ਕਰਹੁ ਮੇਰੇ ਸਾਈ ॥੩੦॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਈ ॥੩੧॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਹੈ ਜਤ ਕਤ ਤਤ ਗੋਸਾਈ ॥੩੨॥੧॥
जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥१६॥
सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥
नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥
तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥
जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥
भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥
जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥
सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥
इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥
जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥
गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥
पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥
सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥
अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥
रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥
नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥
नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥
सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥
नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥
तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥
जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥
भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥
जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥
सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥
इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥
जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥
गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥
पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥
सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥
अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥
रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥
नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥
नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥
हिन्दी अर्थ: जैसे जब बारिश होती है तब धरती सुंदर लगने लगती है।वैसे ही सिख को मिल के प्रसन्न होता है। 16। हे भाई ! मैं गुरू के सेवक का सेवक बन के उसके काम करने को तैयार हूँ मैं उसको विनतियाँ कर कर के (खुशी से) बुलाऊँगा। 17। नानक की परमात्मा के पास विनती है (- हे प्रभू ! मुझे गुरू मिला) गुरू को मिल के मुझे बड़ा आनंद प्राप्त होता है। 18। हे प्रभू ! तू स्वयं ही गुरू है।तू खुद ही सिख है।मैं गुरू के द्वारा तुझे ही ध्याता हूँ। 19। हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरी सेवा-भक्ति करते हैं।वे तेरा ही रूप बन जाते हैं।तू अपने सेवकों की इज्जत (सदा) रखता आया है। 20। हे हरी ! तेरे पास तेरी भक्ति के खजाने भरे पड़े हैं।जिस पर तेरी रजा होती है उसको तू (गुरू के द्वारा ये खजाना) दिलवाता है। 21। हे प्रभू ! (तेरी भक्ति का खजाना प्राप्त करने के लिए) हरेक समझदारी-चतुराई बेकार है।वही मनुष्य (इस खजाने को) हासिल करता है जिसको तू खुद देता है। 22। हे प्रभू ! (तेरी मेहर से) मैं अपने गुरू को बार-बार याद करके (माया के मोह की नींद में) सोए हुए अपने मन को जगाता रहता हूँ। 23। हे प्रभू ! (तेरे दर से तेरा) गरीब (दास) नानक एक दान माँगता है, (मेहर कर) मुझे अपने दासों का दास बनाए रख। 24। अगर गुरू (मुझे मेरी किसी भूल के कारण) फटकार दे।तो उसकी वह झिड़क मुझे प्यारी लगती है।अगर गुरू मेरे पर मेहर की निगाह करता है।तो ये गुरू का उपकार है (मुझ में कोई कोई गुण नहीं)। 25। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य जो वचन बोलते हैं।गुरू उन्हें परवान करता है।अपने मन के पीछे चलने वालों का बोला हुआ कबूल नहीं होता। 26। पाला पड़े।कक्कर पड़े।बर्फ पड़े।फिर भी गुरू का सिख गुरू के दर्शन करने जाता है। 27। मैं भी दिन-रात हर वक्त अपने गुरू के दर्शन करता रहता हूँ।गुरू के चरणों को अपनी आँखों में बसाए रखता हूँ। 28। अगर मैं गुरू (को प्रसन्न करने) के लिए अनेकों ही यत्न करता रहूँ वही प्रयत्न कबूल होता है।जो गुरू को पसंद आता है। 29। हे मेरे पति-प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं दिन-रात हर वक्त गुरू के चरणों का ध्यान धरता रहूँ। 30। नानक की जिंद गुरू के हवाले है।नानक का शरीर गुरू के चरणों में है।गुरू को मिल के मैं तृप्त हो जाता हूँ।अघा जाता हूँ (माया की भूख नहीं रह जाती)। 31। (गुरू की कृपा से ये समझ आती है कि) नानक का प्रभू सब सृष्टि का पति हर जगह व्यापक हो रहा है। 32। 1।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੧੦
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਅੰਦਰਿ ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਲਾਇਆ ਪ੍ਰੀਤਮ ਆਪਣੈ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਹੋਇ ਨਿਹਾਲੁ ਜਾ ਗੁਰੁ ਦੇਖਾ ਸਾਮੑਣੇ ॥੧॥
ਮੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਹੁ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਆ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਅਗਮ ਅਥਾਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਵੇਖਿ ਵਿਗਸੀਆ ਹਰਿ ਨਾਮੇ ਲਗਾ ਪਿਆਰੁ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਮੇਲਿਅਨੁ ਪਾਇਆ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਬਿਰਹੀ ਨਾਮ ਕਾ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤ ਤਨੁ ਮਨੁ ਦੇਉ ॥
ਜੇ ਪੂਰਬਿ ਹੋਵੈ ਲਿਖਿਆ ਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਹਜਿ ਪੀਏਉ ॥੩॥
ਸੁਤਿਆ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਉਠਦਿਆ ਭੀ ਗੁਰੁ ਆਲਾਉ ॥
ਕੋਈ ਐਸਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੇ ਮਿਲੈ ਹਉ ਤਾ ਕੇ ਧੋਵਾ ਪਾਉ ॥੪॥
ਕੋਈ ਐਸਾ ਸਜਣੁ ਲੋੜਿ ਲਹੁ ਮੈ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਦੇਇ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਮਿਲਿਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੫॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਅੰਦਰਿ ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਲਾਇਆ ਪ੍ਰੀਤਮ ਆਪਣੈ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਹੋਇ ਨਿਹਾਲੁ ਜਾ ਗੁਰੁ ਦੇਖਾ ਸਾਮੑਣੇ ॥੧॥
ਮੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਹੁ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਆ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਅਗਮ ਅਥਾਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਵੇਖਿ ਵਿਗਸੀਆ ਹਰਿ ਨਾਮੇ ਲਗਾ ਪਿਆਰੁ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਮੇਲਿਅਨੁ ਪਾਇਆ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਬਿਰਹੀ ਨਾਮ ਕਾ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤ ਤਨੁ ਮਨੁ ਦੇਉ ॥
ਜੇ ਪੂਰਬਿ ਹੋਵੈ ਲਿਖਿਆ ਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਹਜਿ ਪੀਏਉ ॥੩॥
ਸੁਤਿਆ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਉਠਦਿਆ ਭੀ ਗੁਰੁ ਆਲਾਉ ॥
ਕੋਈ ਐਸਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੇ ਮਿਲੈ ਹਉ ਤਾ ਕੇ ਧੋਵਾ ਪਾਉ ॥੪॥
ਕੋਈ ਐਸਾ ਸਜਣੁ ਲੋੜਿ ਲਹੁ ਮੈ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਦੇਇ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਮਿਲਿਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੫॥
रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥
तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम॑णे ॥१॥
मै हरि हरि नामु विसाहु ॥
गुर पूरे ते पाइआ अंम्रितु अगम अथाहु ॥१॥ रहाउ ॥
हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥
किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥२॥
सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥
जे पूरबि होवै लिखिआ ता अंम्रितु सहजि पीएउ ॥३॥
सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥
कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥४॥
कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥५॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥
तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम॑णे ॥१॥
मै हरि हरि नामु विसाहु ॥
गुर पूरे ते पाइआ अंम्रितु अगम अथाहु ॥१॥ रहाउ ॥
हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥
किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥२॥
सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥
जे पूरबि होवै लिखिआ ता अंम्रितु सहजि पीएउ ॥३॥
सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥
कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥४॥
कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥५॥
हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (गुरू ने) अपने प्यारे प्रभू का सदा कामय रहने वाला प्यार मेरे दिल में पैदा कर दिया है। (तभी तो) जब मैं गुरू को अपने सामने देखता हूँ।तो मेरा तन मेरा मन खिल उठता है। 1। हे भाई ! मैंने उस परमात्मा का वह नाम सरमाया पूरे गुरू से प्राप्त कर लिया है जो आत्मिक जीवन देने वाला है। जो (गुरू के बिना) अपहुँच है।जो बड़े गहरे दिल वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू को देख के मेरी जिंद खिल उठती है।(गुरू की कृपा) परमात्मा के नाम में मेरा प्यार बन गया है। (जिन्हें गुरू ने) मेहर करके (परमात्मा के चरणों से) जोड़ दिया है।उन्होंने (दुनिया के मोह से) खलासी का रास्ता पा लिया। 2। हे भाई ! गुरू परमात्मा के नाम का प्रेमी है।अगर मुझे गुरू मिल जाए तो मैं अपना तन अपना मन उसके आगे भेटा रख दूँ। अगर पूर्बले समय में (गुरू के मिलाप के लेख मेरे माथे पर) लिखें हों।तब ही (गुरू से ले के) मैं आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आत्मिक अडोलता में पी सकता हूँ। 3। हे भाई ! सोए हुए भी गुरू की सिफत सालाह करनी चाहिए।उठते समय पर भी मैं गुरू का नाम उचारूँ – अगर ऐसी मति देने वाले गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई सज्जन मुझे मिल जाए।तो मैं उसके पैर धोऊँ। 4। हे भाई ! मुझे कोई ऐसा सज्जन ढूँढ दो।जो मुझे प्रीतम-गुरू से मिला दे। गुरू के मिलने से ही परमात्मा (का मिलाप) हासिल होता है।(जिसको गुरू मिल जाता है।उसको) परमात्मा आत्मिक अडोलता में प्यार-रंग में मिल जाता है। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 758 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Gurgaon-Delhi border पर शाम 8 बजे की रुकी हुई traffic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 31 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 758” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 759 →, पीछे का: ← अंग 757।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।