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अंग 732

अंग
732
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरे मन हरि राम नामि करि रंङु ॥
गुरि तुठै हरि उपदेसिआ हरि भेटिआ राउ निसंङु ॥1॥ रहाउ ॥
मुंध इआणी मनमुखी फिरि आवण जाणा अंङु ॥
हरि प्रभु चिति न आइओ मनि दूजा भाउ सहलंङु ॥2॥
हम मैलु भरे दुहचारीआ हरि राखहु अंगी अंङु ॥
गुरि अंम्रित सरि नवलाइआ सभि लाथे किलविख पंङु ॥3॥
हरि दीना दीन दइआल प्रभु सतसंगति मेलहु संङु ॥
मिलि संगति हरि रंगु पाइआ जन नानक मनि तनि रंङु ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम में प्यार जोड़। अगर (किसी मनुष्य पर) गुरू मेहरवान हो के उसको हरी-नाम का उपदेश दे।तो उस मनुष्य को प्रभू-पातशाह जरूर मिल जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! जो अंजान जीव-स्त्री (गुरू का आसरा छोड़ के) अपने ही मन के पीछे चलती है।उसके जनम-मरण के चक्करों का आसरा बना रहता है। उस (जीव-स्त्री) के स्मर्ण में हरी प्रभू नहीं बसता।उसके मन में माया का मोह ही साथी रहता है। 2। हे हरी ! हम जीव ! (विकारों की) मैल से भरे रहते हैं।हम दुराचारी हैं।हे अंग पालने वाले प्रभू ! हमारी रक्षा कर।हमारी सहायता कर। हे भाई ! गुरू ने (जिस मनुष्य को) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल सरोवर में स्नान करा दिया।(उसके अंदर से) सारे पाप उतर जाते है।पापों के कीचड़ धुल जाता है। 3। हे अति कंगालों पर दया करने वाले हरी-प्रभू ! मुझे साध-संगति के साथ मिला। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के परमात्मा के नाम का प्रेम प्राप्त कर लिया।उसके मन में उसके हृदय में वह प्रेम (सदा टिका रहता है)। 4। 3।
सूही महला 4 ॥
हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥
अनदिनु करम करहि बहुतेरे सुपनै सुखु न होई ॥1॥
गिआनी गुर बिनु भगति न होई ॥
कोरै रंगु कदे न चड़ै जे लोचै सभु कोई ॥1॥ रहाउ ॥
जपु तप संजम वरत करे पूजा मनमुख रोगु न जाई ॥
अंतरि रोगु महा अभिमाना दूजै भाइ खुआई ॥2॥
बाहरि भेख बहुतु चतुराई मनूआ दह दिसि धावै ॥
हउमै बिआपिआ सबदु न चीन॑ै फिरि फिरि जूनी आवै ॥3॥
नानक नदरि करे सो बूझै सो जनु नामु धिआए ॥
गुर परसादी एको बूझै एकसु माहि समाए ॥4॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण में नहीं आते वैसे) ज़ुबानी-ज़ुबानी राम-राम उचारते रहते हैं।सदा धोखा-फरेब (भी) करते रहते हैं।उनका दिल पवित्र नहीं हो सकता। वह मनुष्य (तीर्थ स्नान आदि निहित) अनेकों धार्मिक कर्म हर वक्त करते रहते हैं।पर उन्हें कभी सपने में भी आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 1। हे ज्ञानवान ! गुरू की शरण पड़े बिना भगती नहीं हो सकती (मन पर प्रभू की भगती का रंग नहीं चढ़ सकता। जैसे) चाहे हरेक मनुष्य तरले करता फिरे।कभी कोरे कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता। 1।रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (मंत्रों का) जाप (धूनियों का) तपाना (आदिक) कष्ट देने वाले साधन करता है।ब्रत रखता है।पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का (आत्मिक) रोग दूर नहीं होता। उसके मन में अहंकार का बड़ा रोग टिका रहता है।वह माया के मोह में फंस के गलत राह पर पड़ा रहता है। 2। हे भाई ! (गुरू से टूटा हुआ मनुष्य) लोगों को दिखाने के लिए धार्मिक भेस बनाता है।बहुत सारी चुस्ती-चालाकी दिखाता है।पर उसका कोझा मन दसों दिशाओं में दौड़ता फिरता है। अहंकार-घमंड में फसा हुआ वह मनुष्य गुरू के शबद से सांझ नहीं डालता।वह बार-बार जूनियों के चक्कर में पड़ा रहता है। 3। हे नानक ! (कह,हे भाई !) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है।वह (आत्मिक जीवन के रास्ते को) समझ लेता है।वह मनुष्य (सदा) परमात्मा का नाम सिमरता है। गुरू की कृपा से वह एक परमात्मा के साथ ही सांझ बनाए रखता है।वह एक परमात्मा में ही लीन रहता है। 4। 4।
सूही महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥
हरि हरि नामु पदारथु पाई ॥1॥
मेरै मनि हरि हरि सांति वसाई ॥
तिसना अगनि बुझी खिन अंतरि गुरि मिलिऐ सभ भुख गवाई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गुण गावा जीवा मेरी माई ॥
सतिगुरि दइआलि गुण नामु द्रिड़ाई ॥2॥
हउ हरि प्रभु पिआरा ढूढि ढूढाई ॥
सतसंगति मिलि हरि रसु पाई ॥3॥
धुरि मसतकि लेख लिखे हरि पाई ॥
गुरु नानकु तुठा मेलै हरि भाई ॥4॥1॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! गुरू की मति ले के मैंने अपने शरीर-नगर की अच्छी तरह खोज की है। और (शरीर में से ही) परमात्मा का कीमती नाम मैंने पा लिया है। 1। हे भाई ! (गुरू ने मुझे हरी-नाम की दाति दे के) मेरे मन में ठंड डाल दी है। (मेरे अंदर से) एक छिन में (माया की) तृष्णा की आग बुझ गई है।गुरू के मिलने से मेरी सारी (माया की) भूख दूर हो गई है। 1।रहाउ। हे मेरी माँ ! (अब ज्यों-ज्यों) मैं परमात्मा के गुण गाता हूँ।मुझे आत्मिक जीवन मिल रहा है। दया के घर सतिगुरू ने मेरे हृदय में प्रभू के गुण पक्के कर दिए हैं।परमात्मा का नाम पक्का कर दिया है। 2। हे भाई ! अब मैं प्यारे हरी-प्रभू की तलाश करता हूँ।(सत्संगियों से) तलाश करवाता हूँ। साध-संगति में मिल के मैं परमात्मा के नाम का स्वाद लेता हूँ। 3। हे भाई ! धुर दरगाह से (जिस मनुष्य के) माथे पर प्रभू-मिलाप का लिखा लेख उघड़ता है। उस पर गुरू नानक प्रसन्न होता है और।उसको परमात्मा मिला देता है। 4। 1। 5।
सूही महला 4 ॥
हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥
गुरमुखि हरि हरि नामि समाए ॥1॥
हरि रंगि राता मनु रंग माणे ॥
सदा अनंदि रहै दिन राती पूरे गुर कै सबदि समाणे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि रंग कउ लोचै सभु कोई ॥
गुरमुखि रंगु चलूला होई ॥2॥
मनमुखि मुगधु नरु कोरा होइ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर करता है।उसके मन में (अपने चरणों का) प्यार पैदा करता है। वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम में सदा लीन रहता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रहता है।उसका मन आनंद लेता रहता है। वह मनुष्य दिन-रात हर वक्त आनंद में मगन रहता है।वह पूरे गुरू की बाणी में लीन रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! (वैसे तो) हरेक मनुष्य प्रभू (चरणों) के प्यार की खातिर तरले लेता है। पर गुरू की शरण पड़ के ही (मन पर प्रेम का) गाढ़ा रंग चढ़ता है। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य प्यार से वंचित हृदय वाला ही रहता है।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम में प्यार जोड़।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।