Lulla Family

अंग 729

अंग
729
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूही महला 1 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥
धोतिआ जूठि न उतरै जे सउ धोवा तिसु ॥1॥
सजण सेई नालि मै चलदिआ नालि चलंनि॑ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ तिथै खड़े दिसंनि ॥1॥ रहाउ ॥
कोठे मंडप माड़ीआ पासहु चितवीआहा ॥
ढठीआ कंमि न आवन॑ी विचहु सखणीआहा ॥2॥
बगा बगे कपड़े तीरथ मंझि वसंनि॑ ॥
घुटि घुटि जीआ खावणे बगे ना कहीअनि॑ ॥3॥
सिंमल रुखु सरीरु मै मैजन देखि भुलंनि॑ ॥
से फल कंमि न आवन॑ी ते गुण मै तनि हंनि॑ ॥4॥
अंधुलै भारु उठाइआ डूगर वाट बहुतु ॥
अखी लोड़ी ना लहा हउ चड़ि लंघा कितु ॥5॥
चाकरीआ चंगिआईआ अवर सिआणप कितु ॥
नानक नामु समालि तूं बधा छुटहि जितु ॥6॥1॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ मैंने कांसे (का) साफ और चमकीला (बर्तन) घिसाया (तब उसमें से) थोड़ी-थोड़ी काली स्याही (लग गई)। अगर मैं सौ बार भी उस कांसे के बर्तन को धोऊँ (साफ करूँ) तो भी (बाहर से) धोने से उसके (अंदर की) जूठ (कालिख़) दूर नहीं होती। 1। मेरे असल मित्र वही हैं जो (हमेशा) मेरे साथ रहें।और (यहाँ से) चलने के वक्त भी मेरे साथ ही चलें। (आगे) जहाँ (किए कर्मों का) हिसाब माँगा जाता है वहाँ बेबाकी से (बेझिझक हो के) हिसाब दे सकें (भाव।हिसाब देने में कामयाब हो सकें)। 1।रहाउ। जो घर-मन्दिर-महल चारों तरफ़ से चित्रे हुए हों (सजे धजे हों)।पर अंदर से ख़ाली हों। (वे गिर जाते हैं और) गिरे हुए किसी काम नहीं आते। 2। बगलों के पंख सफेद होते हैं।बसते भी वे तीर्थों पर ही हैं। पर जीवों को (गले से) घोट-घोट के खाने वाले (अंदर से) साफ-सुथरे नहीं कहे जाते। 3। (जैसे) सिंबल का वृक्ष (है।वैसे) मेरा ये शरीर है।(सिंबल के फलों को) देख के तोते भुलेखा खा जाते हैं। (सिंबल के) वे फल (तोतों के) काम नहीं आते।वैसे ही गुण मेरे शरीर में हैं। 4। मुझ अंधे ने (सिर पर विकारों का) भार उठाया हुआ है।(आगे मेरा जीवन-राह) बहुत ही पहाड़ी रास्ता है। आँखों से तलाश के मैं राह-ठिकाना नहीं तलाश सकता (क्योंकि आँखें हैं ही नहीं।इस हालत में) किस तरीके से (पहाड़ी पर) चढ़ कर मैं पार लांघूँ। 5। हे नानक ! (पहाड़ी रास्ते जैसे बिखड़े जीवन-राह में पार लंघने के लिए) दुनिया के लोगों की खुशामदें।लोक-दिखावे और चालाकियाँ किसी काम नहीं आ सकतीं। परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) संभाल के रख।(माया के मोह में) बँधा हुआ आप इस नाम (-सिमरन) के द्वारा ही (मोह के बँधनों से) खलासी पा सकेगा। 9। 1। 3।
सूही महला 1 ॥
जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला ॥
ना सरवरु ना ऊछलै ऐसा पंथु सुहेला ॥1॥
तेरा एको नामु मंजीठड़ा रता मेरा चोला सद रंग ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
साजन चले पिआरिआ किउ मेला होई ॥
जे गुण होवहि गंठड़ीऐ मेलेगा सोई ॥2॥
मिलिआ होइ न वीछुड़ै जे मिलिआ होई ॥
आवा गउणु निवारिआ है साचा सोई ॥3॥
हउमै मारि निवारिआ सीता है चोला ॥
गुर बचनी फलु पाइआ सह के अंम्रित बोला ॥4॥
नानकु कहै सहेलीहो सहु खरा पिआरा ॥
हम सह केरीआ दासीआ साचा खसमु हमारा ॥5॥2॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ (हे जीवन-सफ़र के राही !) प्रभू-सिमरन का सुंदर सा बेड़ा तैयार कर।जिस (बेड़े) में आप (इस संसार-समुंद्र में से) जल्दी पार लांघ जाएगा। (सिमरन की बरकति से) आपका जीवन-रास्ता इतना आसान हैं जाएगा कि (आपके रास्ते में) ना ये (संसार-) सरोवर आएगा और ना ही (इसका मोह) उछाले मारेगा। 1। हे मित्र ! (-प्रभू !) आपका नाम ही सुंदर मजीठ है जिसके पक्के रंग से मेरे (आत्मिक जीवन का) चोला रंगा गया है। 1।रहाउ। हे सज्जन ! जीवन-सफ़र के प्यारे पथिक ! (क्या आपको पता है कि) प्रभू के साथ मिलाप कैसे होता है। (देख !) अगर पल्ले गुण हों तो वह खुद ही (अपने साथ) मिला लेता है। 2। जो जीव प्रभू-चरणों में जुड़ जाए अगर वह सचमुच दिल से जुड़ा हुआ है तो फिर कभी वह (इस) मिलाप से नहीं विछुड़ता। उसके जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है।उसको हर जगह वह सदा-स्थिर प्रभू ही दिखाई देता है। 3। जिस जीव ने अहंकार मार के स्वै भाव दूर किया है और (इस तरह) अपना आप सँवार लिया है। सतिगुरू के बचनों पर चल के फल के तौर पर उसे पति-प्रभू की सिफत सालाह के बोल प्राप्त होते हैं जो आत्मिक जीवन देने के समर्थ हैं। 4। नानक कहता है, हे सत्संगी सहेलियो ! (सिमरन की बरकति से) पति-प्रभू बहुत प्यारा लगने लगता है। (फिर ऐसा यकीन बना रहता है कि) हम पति की दासियाँ हैं।और वह पति-प्रभू हमेशा हमारे सिर पर कायम है। 5। 2। 4।
सूही महला 1 ॥
जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥
सूखी करै पसाउ दूख विसारसी ॥
सहसा मूले नाहि सरपर तारसी ॥1॥
तिन॑ा मिलिआ गुरु आइ जिन कउ लीखिआ ॥
अंम्रितु हरि का नाउ देवै दीखिआ ॥
चालहि सतिगुर भाइ भवहि न भीखिआ ॥2॥
जा कउ महलु हजूरि दूजे निवै किसु ॥
दरि दरवाणी नाहि मूले पुछ तिसु ॥
छुटै ता कै बोलि साहिब नदरि जिसु ॥3॥
घले आणे आपि जिसु नाही दूजा मतै कोइ ॥
ढाहि उसारे साजि जाणै सभ सोइ ॥
नाउ नानक बखसीस नदरी करमु होइ ॥4॥3॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ (प्रभू) जिन (जीवों) के (हृदय-रूपी) बर्तन में प्रेम (की भिक्षा देता है)।(उस प्रेम की बरकति से प्रभू) उनका जीवन सुंदर बना देता है। उन पर सुख की कृपा करता है।उनके दुख भुला देता है। इस बात में रक्ती भर भी शक नहीं कि ऐसे जीवों को प्रभू जरूर (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1। जिन लोगों को (धुर से लिखा बख्शिश का) लेख मिल जाता है।उन्हें गुरू आ के मिल जाता है। गुरू उन्हें परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम शिक्षा के तौर पर देता है। वह लोग (जीवन-यात्रा में) गुरू के बताए हुए अनुसार चलते हैं।और (दूसरी तरफ) भटकते नहीं फिरते। 2। (गुरू के बताए राह पर चलके) जिस आदमी को परमात्मा की हजूरी में जगह मिल जाती है वह किसी और के आगे तरले नहीं करता फिरता; परमात्मा के दरवाजे पर (पहुँचे हुए यम आदिक) दरबानों द्वारा कोई रक्ती भर भी पूछ-ताछ नहीं की जाती। क्योंकि जिस गुरू पर मालिक प्रभू की मेहर की नजर है उस गुरू के बचन में (चल के) वह सख्श (विकारों से) मुक्त हो जाता है। 3। जिस मालिक प्रभू को कोई और दूसरा कोई मतें नहीं दे सकता (समझा नहीं सकता।सलाह नहीं दे सकता) वह खुद ही जीवों को जगत में भेजता है और खुद ही वापस बुला लेता है। प्रभू स्वयं ही जगत-रचना को गिराता-बनाता है।वह सब कुछ खुद ही पैदा करना जानता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर मेहर की नजर करने वाले प्रभू की निगाह हो जाती है उसे बतौर बख्शिश उसका नाम मिलता है। 4। 3। 5।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 1 घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ मैंने कांसे (का) साफ और चमकीला (बर्तन) घिसाया (तब उसमें से) थोड़ी-थोड़ी काली स्याही (लग गई)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।