अंग
756
राग सूही
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਚਾ ਸਾਹੁ ਸਚੇ ਵਣਜਾਰੇ ਓਥੈ ਕੂੜੇ ਨ ਟਿਕੰਨਿ ॥
ਓਨਾ ਸਚੁ ਨ ਭਾਵਈ ਦੁਖ ਹੀ ਮਾਹਿ ਪਚੰਨਿ ॥੧੮॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲਾ ਜਗੁ ਫਿਰੈ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਪਇਐ ਕਿਰਤਿ ਕਮਾਵਣਾ ਕੋਇ ਨ ਮੇਟਣਹਾਰ ॥੧੯॥
ਸੰਤਾ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਤਾ ਸਚਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹੀ ਸਚੁ ਮਨਿ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰੁ ॥੨੦॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਹੈ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਵਡ ਰੋਗੁ ਹੈ ਵਿਚਹੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇ ॥੨੧॥
ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਾ ਪਾਇ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਉਪੀ ਆਗੈ ਧਰੀ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥੨੨॥
ਖਿੰਚੋਤਾਣਿ ਵਿਗੁਚੀਐ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਛਡਿ ਤੂ ਤਾ ਸਚਿ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੨੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੇ ਸਿ ਭਾਇਰਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਲਗੰਨਿ ॥
ਸਚਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਦਰਿ ਸਚੈ ਦਿਸੰਨਿ ॥੨੪॥
ਸੇ ਭਾਈ ਸੇ ਸਜਣਾ ਜੋ ਸਚਾ ਸੇਵੰਨਿ ॥
ਅਵਗਣ ਵਿਕਣਿ ਪਲੑਰਨਿ ਗੁਣ ਕੀ ਸਾਝ ਕਰੰਨਿੑ ॥੨੫॥
ਗੁਣ ਕੀ ਸਾਝ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਕਰੇਨਿ ॥
ਸਚੁ ਵਣੰਜਹਿ ਗੁਰ ਸਬਦ ਸਿਉ ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਲਏਨਿ ॥੨੬॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਪਾਪ ਕਰਿ ਕਰਿ ਸੰਚੀਐ ਚਲੈ ਨ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਸੀ ਸਭ ਮੁਠੀ ਜਮਕਾਲਿ ॥੨੭॥
ਮਨ ਕਾ ਤੋਸਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਹਿਰਦੈ ਰਖਹੁ ਸਮੑਾਲਿ ॥
ਏਹੁ ਖਰਚੁ ਅਖੁਟੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਬਹੈ ਨਾਲਿ ॥੨੮॥
ਏ ਮਨ ਮੂਲਹੁ ਭੁਲਿਆ ਜਾਸਹਿ ਪਤਿ ਗਵਾਇ ॥
ਇਹੁ ਜਗਤੁ ਮੋਹਿ ਦੂਜੈ ਵਿਆਪਿਆ ਗੁਰਮਤੀ ਸਚੁ ਧਿਆਇ ॥੨੯॥
ਹਰਿ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨ ਪਵੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਲਿਖਣੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਪੈ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੩੦॥
ਸੋ ਸਹੁ ਮੇਰਾ ਰੰਗੁਲਾ ਰੰਗੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਕਾਮਣਿ ਰੰਗੁ ਤਾ ਚੜੈ ਜਾ ਪਿਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੩੧॥
ਚਿਰੀ ਵਿਛੁੰਨੇ ਭੀ ਮਿਲਨਿ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੰਨਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਖਾਨਿ ਖਰਚਨਿ ਨ ਨਿਖੁਟਈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਹਜਿ ਰਵੰਨਿ ॥੩੨॥
ਨਾ ਓਇ ਜਨਮਹਿ ਨਾ ਮਰਹਿ ਨਾ ਓਇ ਦੁਖ ਸਹੰਨਿ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਕੇਲ ਕਰੰਨਿ ॥੩੩॥
ਸਜਣ ਮਿਲੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਮਿਲੇ ਰਹੰਨਿ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਵਿਰਲੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਲਹੰਨਿ ॥੩੪॥੧॥੩॥
ਓਨਾ ਸਚੁ ਨ ਭਾਵਈ ਦੁਖ ਹੀ ਮਾਹਿ ਪਚੰਨਿ ॥੧੮॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲਾ ਜਗੁ ਫਿਰੈ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਪਇਐ ਕਿਰਤਿ ਕਮਾਵਣਾ ਕੋਇ ਨ ਮੇਟਣਹਾਰ ॥੧੯॥
ਸੰਤਾ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਤਾ ਸਚਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹੀ ਸਚੁ ਮਨਿ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰੁ ॥੨੦॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਹੈ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਵਡ ਰੋਗੁ ਹੈ ਵਿਚਹੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇ ॥੨੧॥
ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਾ ਪਾਇ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਉਪੀ ਆਗੈ ਧਰੀ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥੨੨॥
ਖਿੰਚੋਤਾਣਿ ਵਿਗੁਚੀਐ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਛਡਿ ਤੂ ਤਾ ਸਚਿ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੨੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੇ ਸਿ ਭਾਇਰਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਲਗੰਨਿ ॥
ਸਚਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਦਰਿ ਸਚੈ ਦਿਸੰਨਿ ॥੨੪॥
ਸੇ ਭਾਈ ਸੇ ਸਜਣਾ ਜੋ ਸਚਾ ਸੇਵੰਨਿ ॥
ਅਵਗਣ ਵਿਕਣਿ ਪਲੑਰਨਿ ਗੁਣ ਕੀ ਸਾਝ ਕਰੰਨਿੑ ॥੨੫॥
ਗੁਣ ਕੀ ਸਾਝ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਕਰੇਨਿ ॥
ਸਚੁ ਵਣੰਜਹਿ ਗੁਰ ਸਬਦ ਸਿਉ ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਲਏਨਿ ॥੨੬॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਪਾਪ ਕਰਿ ਕਰਿ ਸੰਚੀਐ ਚਲੈ ਨ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਸੀ ਸਭ ਮੁਠੀ ਜਮਕਾਲਿ ॥੨੭॥
ਮਨ ਕਾ ਤੋਸਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਹਿਰਦੈ ਰਖਹੁ ਸਮੑਾਲਿ ॥
ਏਹੁ ਖਰਚੁ ਅਖੁਟੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਬਹੈ ਨਾਲਿ ॥੨੮॥
ਏ ਮਨ ਮੂਲਹੁ ਭੁਲਿਆ ਜਾਸਹਿ ਪਤਿ ਗਵਾਇ ॥
ਇਹੁ ਜਗਤੁ ਮੋਹਿ ਦੂਜੈ ਵਿਆਪਿਆ ਗੁਰਮਤੀ ਸਚੁ ਧਿਆਇ ॥੨੯॥
ਹਰਿ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨ ਪਵੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਲਿਖਣੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਪੈ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੩੦॥
ਸੋ ਸਹੁ ਮੇਰਾ ਰੰਗੁਲਾ ਰੰਗੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਕਾਮਣਿ ਰੰਗੁ ਤਾ ਚੜੈ ਜਾ ਪਿਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੩੧॥
ਚਿਰੀ ਵਿਛੁੰਨੇ ਭੀ ਮਿਲਨਿ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੰਨਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਖਾਨਿ ਖਰਚਨਿ ਨ ਨਿਖੁਟਈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਹਜਿ ਰਵੰਨਿ ॥੩੨॥
ਨਾ ਓਇ ਜਨਮਹਿ ਨਾ ਮਰਹਿ ਨਾ ਓਇ ਦੁਖ ਸਹੰਨਿ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਕੇਲ ਕਰੰਨਿ ॥੩੩॥
ਸਜਣ ਮਿਲੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਮਿਲੇ ਰਹੰਨਿ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਵਿਰਲੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਲਹੰਨਿ ॥੩੪॥੧॥੩॥
सचा साहु सचे वणजारे ओथै कूड़े न टिकंनि ॥
ओना सचु न भावई दुख ही माहि पचंनि ॥१८॥
हउमै मैला जगु फिरै मरि जंमै वारो वार ॥
पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहार ॥१९॥
संता संगति मिलि रहै ता सचि लगै पिआरु ॥
सचु सलाही सचु मनि दरि सचै सचिआरु ॥२०॥
गुर पूरे पूरी मति है अहिनिसि नामु धिआइ ॥
हउमै मेरा वड रोगु है विचहु ठाकि रहाइ ॥२१॥
गुरु सालाही आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥
तनु मनु सउपी आगै धरी विचहु आपु गवाइ ॥२२॥
खिंचोताणि विगुचीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥
हउमै मेरा छडि तू ता सचि रहै समाइ ॥२३॥
सतिगुर नो मिले सि भाइरा सचै सबदि लगंनि ॥
सचि मिले से न विछुड़हि दरि सचै दिसंनि ॥२४॥
से भाई से सजणा जो सचा सेवंनि ॥
अवगण विकणि पल॑रनि गुण की साझ करंनि॑ ॥२५॥
गुण की साझ सुखु ऊपजै सची भगति करेनि ॥
सचु वणंजहि गुर सबद सिउ लाहा नामु लएनि ॥२६॥
सुइना रुपा पाप करि करि संचीऐ चलै न चलदिआ नालि ॥
विणु नावै नालि न चलसी सभ मुठी जमकालि ॥२७॥
मन का तोसा हरि नामु है हिरदै रखहु सम॑ालि ॥
एहु खरचु अखुटु है गुरमुखि निबहै नालि ॥२८॥
ए मन मूलहु भुलिआ जासहि पति गवाइ ॥
इहु जगतु मोहि दूजै विआपिआ गुरमती सचु धिआइ ॥२९॥
हरि की कीमति न पवै हरि जसु लिखणु न जाइ ॥
गुर कै सबदि मनु तनु रपै हरि सिउ रहै समाइ ॥३०॥
सो सहु मेरा रंगुला रंगे सहजि सुभाइ ॥
कामणि रंगु ता चड़ै जा पिर कै अंकि समाइ ॥३१॥
चिरी विछुंने भी मिलनि जो सतिगुरु सेवंनि ॥
अंतरि नव निधि नामु है खानि खरचनि न निखुटई हरि गुण सहजि रवंनि ॥३२॥
ना ओइ जनमहि ना मरहि ना ओइ दुख सहंनि ॥
गुरि राखे से उबरे हरि सिउ केल करंनि ॥३३॥
सजण मिले न विछुड़हि जि अनदिनु मिले रहंनि ॥
इसु जग महि विरले जाणीअहि नानक सचु लहंनि ॥३४॥१॥३॥
ओना सचु न भावई दुख ही माहि पचंनि ॥१८॥
हउमै मैला जगु फिरै मरि जंमै वारो वार ॥
पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहार ॥१९॥
संता संगति मिलि रहै ता सचि लगै पिआरु ॥
सचु सलाही सचु मनि दरि सचै सचिआरु ॥२०॥
गुर पूरे पूरी मति है अहिनिसि नामु धिआइ ॥
हउमै मेरा वड रोगु है विचहु ठाकि रहाइ ॥२१॥
गुरु सालाही आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥
तनु मनु सउपी आगै धरी विचहु आपु गवाइ ॥२२॥
खिंचोताणि विगुचीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥
हउमै मेरा छडि तू ता सचि रहै समाइ ॥२३॥
सतिगुर नो मिले सि भाइरा सचै सबदि लगंनि ॥
सचि मिले से न विछुड़हि दरि सचै दिसंनि ॥२४॥
से भाई से सजणा जो सचा सेवंनि ॥
अवगण विकणि पल॑रनि गुण की साझ करंनि॑ ॥२५॥
गुण की साझ सुखु ऊपजै सची भगति करेनि ॥
सचु वणंजहि गुर सबद सिउ लाहा नामु लएनि ॥२६॥
सुइना रुपा पाप करि करि संचीऐ चलै न चलदिआ नालि ॥
विणु नावै नालि न चलसी सभ मुठी जमकालि ॥२७॥
मन का तोसा हरि नामु है हिरदै रखहु सम॑ालि ॥
एहु खरचु अखुटु है गुरमुखि निबहै नालि ॥२८॥
ए मन मूलहु भुलिआ जासहि पति गवाइ ॥
इहु जगतु मोहि दूजै विआपिआ गुरमती सचु धिआइ ॥२९॥
हरि की कीमति न पवै हरि जसु लिखणु न जाइ ॥
गुर कै सबदि मनु तनु रपै हरि सिउ रहै समाइ ॥३०॥
सो सहु मेरा रंगुला रंगे सहजि सुभाइ ॥
कामणि रंगु ता चड़ै जा पिर कै अंकि समाइ ॥३१॥
चिरी विछुंने भी मिलनि जो सतिगुरु सेवंनि ॥
अंतरि नव निधि नामु है खानि खरचनि न निखुटई हरि गुण सहजि रवंनि ॥३२॥
ना ओइ जनमहि ना मरहि ना ओइ दुख सहंनि ॥
गुरि राखे से उबरे हरि सिउ केल करंनि ॥३३॥
सजण मिले न विछुड़हि जि अनदिनु मिले रहंनि ॥
इसु जग महि विरले जाणीअहि नानक सचु लहंनि ॥३४॥१॥३॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (हरी-नाम की पूँजी का मालिक) शाह-प्रभू सदा कायम रहने वाला है।उसके नाम का व्यापार करने वाले भी अटॅल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं।पर उस शाह के दरबार में झूठी दुनिया के बनजारे नहीं टिक सकते। उन्हें सदा-स्थिर प्रभू का नाम पसंद नहीं आता।और वे सदा दुख में ही ख्वार होते रहते हैं। 18। हे भाई ! अहंकार (की मैल) से मैला हुआ ये जगत भटक रहाप है।बार बार जनम-मरन के चक्कर में रहता है। पिछले जन्मों के किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार वैसे ही और कर्म किए जाता है।(कर्मों के बनी इस फाही को) कोई मिटा नहीं सकता। 19। हे भाई ! अगर मनुष्य साध-संगति में टिका रहे।तो इसका प्यार सदा-स्थिर प्रभू में बन जाता है। हे भाई ! तू (साध-संगति में टिक के) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह किया कर।सदा-स्थिर प्रभू को अपने मन में बसा ले।(इस तरह) सदा-स्थिर प्रभू के दर पे सुर्खरू होगा। 20। हे भाई ! पूरे गुरू की मति किसी (भी तरह की) कमी के बग़ैर है।(जो मनुष्य गुरू की पूरी मति ले के) दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता है। वह मनुष्य अहंकार और ममता के बड़े रोग को अपने अंदर से रोक देता है। 21। हे भाई ! (यदि प्रभू मेहर करे तो) मैं अपने गुरू की वडिआई करूँ।झुक झुक के मैं गुरू के चरणों में लगूँ। अपने अंदर से अहंकार को दूर करके अपना मन अपना तन गुरू के हवाले करि दूँ।गुरू के आगे रख दूँ। 22। हे भाई ! डाँवा-डोल हालत में रहने से दूखी ही हुआ जाता है।एक परमात्मा के साथ ही सुरति जोड़े रख। अपने अंदर से अहंकार दूर कर।ममता दूर कर।(जब मनुष्य अहंकार-ममता दूर करता है) तब सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन हुआ रहता है। 23। हे भाई ! वे मनुष्य (मेरे) भाई हैं।जो गुरू की शरण में आ पड़े हैं।और सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में चिक्त जोड़ते हैं। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो जाते हैं।वह (फिर प्रभू से) नहीं विछुड़ते।वह सदा-स्थिर प्रभू के दर पे (टिके हुए) दिखते हैं। 24। हे भाई ! वह मनुष्य मेरे भाई हैं मित्र हैं।जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हैं। (गुणों के बदले) अवगुण बिक जाने से (दूर हो जाने से) वह मनुष्य (आत्मिक जीवन में) प्रफुल्लित होते हैं।वह मनुष्य परमात्मा के गुणों से सांझ पाते हैं। 25। हे भाई ! गुरू से (आत्मिक) सांझ की बरकति से (उनके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है।वह परमात्मा की अटल रहने वाली भक्ति करते रहते हैं। वह मनुष्य गुरू के शबद से सदा-स्थिर प्रभू के नाम का व्यापार करते हैं और हरी-नाम (का) लाभ कमाते हैं। 26। हे भाई ! (कई किस्म के) पाप कर कर के सोना-चाँदी (आदि धन) इकट्ठा करते हैं।पर (जगत से) चलने के वक्त (वह धन मनुष्य के) साथ नहीं जाता। परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी चीज मनुष्य के साथ नहीं जाएगी।नाम से विहीन सारी दुनिया आत्मिक मौत के हाथों से लूटी जाती है (अपना आत्मिक जीवन लुटा बैठती है)। 27। हे भाई ! मनुष्य के मन के लिए परमात्मा का नाम ही (जीवन यात्रा का) खर्च है।इस यात्रा-खर्च को अपने हृदय में संभाल के रखो। ये खर्च कभी समाप्त होने वाला नहीं।जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है।उसके साथ ये सदा के लिए साथ बनाता है। 28। जगत के मूल परमात्मा से टूटे हुए ऐ मन ! (अगर तू इसी तरह टूटा रहा तो) अपनी इज्जत गवा के (यहाँ से) जाएगा। ये जगत तो माया के मोह में फसा हुआ है (तू इससे मोह छोड़ दे।और) गुरू की मति पर चल के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरा कर। 29। हे भाई ! परमात्मा किसी मूल्य से नहीं मिल सकता।परमात्मा की महिमा बयान नहीं की जा सकती। जिस मनुष्य का मन और तन गुरू के शबद में रंगा जाता है।वह सदा परमात्मा में लीन रहता है। 30। हे भाई ! मेरा वह पति-प्रभू आनंद स्वरूप है (जो मनुष्य उसके चरणों में आ जुड़ता है) उसको वह आत्मिक अडोलता में।प्रेम रंग में रंग देता है। जब कोई जीव-स्त्री उस पति-प्रभू के चरणों में लीन हो जाती है।तब उस (की जिंद) को प्रेम-रंग चढ़ जाता है। 31। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं।वह (प्रभू से) चिरों से विछुड़े हुए भी (प्रभू को) आ मिलते हैं। परमात्मा का नाम (जो।मानो धरती के सारे) नौ खजाने (हैं।उनको) अपने अंदर ही मिल जाते हैं।उस नाम-खजाने को वे खुद इस्तेमाल करते हैं।औरों को बाँटते हैं।वह फिर भी खत्म नहीं होता।आत्मिक अडोलता में टिक के वह मनुष्य परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं। 32। हे भाई ! (गुरू की शरण आ पड़े) वे मनुष्य ना तो पैदा होते हैं ना मरते हैं।ना ही वे (जनम-मरण के चक्कर में) दुख सहते हैं। जिनकी रक्षा गुरू ने कर दी है।वह (जन्म-मरन के चक्करों से) बच गए।वह सदा प्रभू के चरणों में जुड़ के आत्मिक आनंद पाते हैं। 33। हे भाई ! जो भले मनुष्य हर वक्त प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हैं।वह प्रभू-चरणों में मिल के दोबारा कभी नहीं विछुड़ते।पर। हे नानक ! इस जगत में ऐसे विरले बंदे ही उघड़ते हैं।जो सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का मिलाप प्राप्त करते हैं। 34। 1। 3।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਹਰਿ ਜੀ ਸੂਖਮੁ ਅਗਮੁ ਹੈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਮਿਲਿਆ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਭ੍ਰਮੁ ਕਟੀਐ ਅਚਿੰਤੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੰਨਿ ॥
ਹਰਿ ਜੀ ਸੂਖਮੁ ਅਗਮੁ ਹੈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਮਿਲਿਆ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਭ੍ਰਮੁ ਕਟੀਐ ਅਚਿੰਤੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੰਨਿ ॥
सूही महला ३ ॥
हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥
गुर कै सबदि भ्रमु कटीऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥१॥
गुरमुखि हरि हरि नामु जपंनि ॥
हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥
गुर कै सबदि भ्रमु कटीऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥१॥
गुरमुखि हरि हरि नामु जपंनि ॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला ३ ॥ हे भाई ! परमात्मा अदृश्य है अपहुँच है।(फिर) उसको किस तरीके से मिला जा सकता है। हे भाई ! जब गुरू के शबद की बरकति से (मनुष्य के अंदर से उसके मन की) भटकना कट जाती है।तब परमात्मा सहज स्वभाव ही (खुद ही मनुष्य के) मन में आ बसता है। 1। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 756 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 756” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 757 →, पीछे का: ← अंग 755।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।