अंग 766

अंग
766
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਝ ਕਰੀਜੈ ਗੁਣਹ ਕੇਰੀ ਛੋਡਿ ਅਵਗਣ ਚਲੀਐ ॥
ਪਹਿਰੇ ਪਟੰਬਰ ਕਰਿ ਅਡੰਬਰ ਆਪਣਾ ਪਿੜੁ ਮਲੀਐ ॥
ਜਿਥੈ ਜਾਇ ਬਹੀਐ ਭਲਾ ਕਹੀਐ ਝੋਲਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥
ਗੁਣਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ਵਾਸੁਲਾ ਕਢਿ ਵਾਸੁ ਲਈਜੈ ॥੩॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਹੋਰੁ ਕਰੇ ਨ ਕੋਈ ॥
ਆਖਣ ਤਾ ਕਉ ਜਾਈਐ ਜੇ ਭੂਲੜਾ ਹੋਈ ॥
ਜੇ ਹੋਇ ਭੂਲਾ ਜਾਇ ਕਹੀਐ ਆਪਿ ਕਰਤਾ ਕਿਉ ਭੁਲੈ ॥
ਸੁਣੇ ਦੇਖੇ ਬਾਝੁ ਕਹਿਐ ਦਾਨੁ ਅਣਮੰਗਿਆ ਦਿਵੈ ॥
ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਦਾਤਾ ਜਗਿ ਬਿਧਾਤਾ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਹੋਰੁ ਕਰੇ ਨ ਕੋਈ ॥੪॥੧॥੪॥
साझ करीजै गुणह केरी छोडि अवगण चलीऐ ॥
पहिरे पटंबर करि अडंबर आपणा पिड़ु मलीऐ ॥
जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ झोलि अंम्रितु पीजै ॥
गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥३॥
आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥
आखण ता कउ जाईऐ जे भूलड़ा होई ॥
जे होइ भूला जाइ कहीऐ आपि करता किउ भुलै ॥
सुणे देखे बाझु कहिऐ दानु अणमंगिआ दिवै ॥
दानु देइ दाता जगि बिधाता नानका सचु सोई ॥
आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥४॥१॥४॥

हिन्दी अर्थ: (गुरमुखों से) गुणों की सांझ करनी चाहिए।इस तरह (अंदर से) अवगुण त्याग के जीवन-यात्रा पर चला जा सकता है। सबसे प्रेम भरा बर्ताव करके भलाई के सुंदर उद्यम करके विकारों से मुकाबला और जीवन-युद्ध को जीता जा सकता है। (गुरमुखों की संगति की बरकति से फिर) जहाँ भी जा के बैठें भलाई की बात ही की जा सकती है।और बुरी ओर से हट के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है। (हे भाई !) अगर किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए तो वह डब्बा खोल के (डब्बे की) सुगंधि लेनी चाहिए। (जगत में अनेकों ही जीव गुण कमा रहे हैं।अनेकों ही अवगुण कमा रहे हैं।ये परमात्मा की अपनी ही रची हुई खेल है) परमात्मा स्वयं ही (ये सब कुछ) कर रहा है।उसके बिना और कोई नहीं कर सकता। ( तभी तो) किसी और के पास (इसके संबंध में) कोई गिला-शिकवा आदि नहीं किया जा सकता।(फिर जो कुछ वह प्रभू करता है ठीक करता है) वह टूटा हुआ नहीं हैं।इस वास्ते (किसी कमी के बारे में) उसे कुछ कहने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती। अगर वह टूटा हुआ (व भटका हुआ) हो तो जा के कुछ कहें भी।पर स्वयं करतार कोई भूल नहीं कर सकता। वह सब जीवों की अरदासें सुनता है वह सब जीवों के किए कर्मों को देखता है।माँगे बिना ही सबको दान देता है। हे नानक ! वह सृजनहार ही सदा-स्थिर रहने वाला है। वह सब कुछ स्वयं ही करता है।कोई और (उससे आकी हो के) कुछ नहीं कर सकता।किसी और के पास जा के कोई गिला नहीं किया जा सकता। 4। 1। 4।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਗੁਣ ਰਵੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਸਾਚ ਕੀ ਸਾਚਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਆਵੈ ਸਾਚ ਭਾਵੈ ਸਾਚ ਕੀ ਮਤਿ ਕਿਉ ਟਲੈ ॥
ਇਸਨਾਨੁ ਦਾਨੁ ਸੁਗਿਆਨੁ ਮਜਨੁ ਆਪਿ ਅਛਲਿਓ ਕਿਉ ਛਲੈ ॥
ਪਰਪੰਚ ਮੋਹ ਬਿਕਾਰ ਥਾਕੇ ਕੂੜੁ ਕਪਟੁ ਨ ਦੋਈ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਗੁਣ ਰਵੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ॥੧॥
ਸਾਹਿਬੁ ਸੋ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਨਿ ਕਾਰਣੁ ਕੀਆ ॥
ਮੈਲੁ ਲਾਗੀ ਮਨਿ ਮੈਲਿਐ ਕਿਨੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ॥
ਮਥਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ਇਹੁ ਮਨੁ ਦੀਆ ਗੁਰ ਪਹਿ ਮੋਲੁ ਕਰਾਇਆ ॥
ਆਪਨੜਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸਹਜਿ ਪਛਾਤਾ ਜਾ ਮਨੁ ਸਾਚੈ ਲਾਇਆ ॥
ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਜੇ ਤਿਸੁ ਭਾਵਾ ਕਿਉ ਮਿਲੈ ਹੋਇ ਪਰਾਇਆ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਸੋ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥੨॥
ਆਇ ਗਇਆ ਕੀ ਨ ਆਇਓ ਕਿਉ ਆਵੈ ਜਾਤਾ ॥
ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਰਾਤਾ ॥
ਸਾਹਿਬ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਸਚ ਕੀ ਬਾਤਾ ਜਿਨਿ ਬਿੰਬ ਕਾ ਕੋਟੁ ਉਸਾਰਿਆ ॥
ਪੰਚ ਭੂ ਨਾਇਕੋ ਆਪਿ ਸਿਰੰਦਾ ਜਿਨਿ ਸਚ ਕਾ ਪਿੰਡੁ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਹਮ ਅਵਗਣਿਆਰੇ ਤੂ ਸੁਣਿ ਪਿਆਰੇ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਨਾ ਥੀਐ ਸਾਚੀ ਮਤਿ ਹੋਈ ॥੩॥
ਅੰਜਨੁ ਤੈਸਾ ਅੰਜੀਐ ਜੈਸਾ ਪਿਰ ਭਾਵੈ ॥
ਸਮਝੈ ਸੂਝੈ ਜਾਣੀਐ ਜੇ ਆਪਿ ਜਾਣਾਵੈ ॥
ਆਪਿ ਜਾਣਾਵੈ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵੈ ਆਪੇ ਮਨੂਆ ਲੇਵਏ ॥
ਕਰਮ ਸੁਕਰਮ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਕਉਣ ਅਭੇਵਏ ॥
ਤੰਤੁ ਮੰਤੁ ਪਾਖੰਡੁ ਨ ਜਾਣਾ ਰਾਮੁ ਰਿਦੈ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਅੰਜਨੁ ਨਾਮੁ ਤਿਸੈ ਤੇ ਸੂਝੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਜਾਨਿਆ ॥੪॥
ਸਾਜਨ ਹੋਵਨਿ ਆਪਣੇ ਕਿਉ ਪਰ ਘਰ ਜਾਹੀ ॥
ਸਾਜਨ ਰਾਤੇ ਸਚ ਕੇ ਸੰਗੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਾਜਨ ਕਰਹਿ ਰਲੀਆ ਕਰਮ ਧਰਮ ਸਬਾਇਆ ॥ ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਪੁੰਨ ਪੂਜਾ ਨਾਮੁ ਸਾਚਾ ਭਾਇਆ ॥
सूही महला १ ॥
मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥
गुर की पउड़ी साच की साचा सुखु होई ॥
सुखि सहजि आवै साच भावै साच की मति किउ टलै ॥
इसनानु दानु सुगिआनु मजनु आपि अछलिओ किउ छलै ॥
परपंच मोह बिकार थाके कूड़ु कपटु न दोई ॥
मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥१॥
साहिबु सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥
मैलु लागी मनि मैलिऐ किनै अंम्रितु पीआ ॥
मथि अंम्रितु पीआ इहु मनु दीआ गुर पहि मोलु कराइआ ॥
आपनड़ा प्रभु सहजि पछाता जा मनु साचै लाइआ ॥
तिसु नालि गुण गावा जे तिसु भावा किउ मिलै होइ पराइआ ॥
साहिबु सो सालाहीऐ जिनि जगतु उपाइआ ॥२॥
आइ गइआ की न आइओ किउ आवै जाता ॥
प्रीतम सिउ मनु मानिआ हरि सेती राता ॥
साहिब रंगि राता सच की बाता जिनि बिंब का कोटु उसारिआ ॥
पंच भू नाइको आपि सिरंदा जिनि सच का पिंडु सवारिआ ॥
हम अवगणिआरे तू सुणि पिआरे तुधु भावै सचु सोई ॥
आवण जाणा ना थीऐ साची मति होई ॥३॥
अंजनु तैसा अंजीऐ जैसा पिर भावै ॥
समझै सूझै जाणीऐ जे आपि जाणावै ॥
आपि जाणावै मारगि पावै आपे मनूआ लेवए ॥
करम सुकरम कराए आपे कीमति कउण अभेवए ॥
तंतु मंतु पाखंडु न जाणा रामु रिदै मनु मानिआ ॥
अंजनु नामु तिसै ते सूझै गुर सबदी सचु जानिआ ॥४॥
साजन होवनि आपणे किउ पर घर जाही ॥
साजन राते सच के संगे मन माही ॥
मन माहि साजन करहि रलीआ करम धरम सबाइआ ॥ अठसठि तीरथ पुंन पूजा नामु साचा भाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला १ ॥ (परमात्मा के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों परमात्मा के) गुण चेते करता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह परमात्मा ही प्यारा लगता जाता है। परमात्मा के गुण गाने।मानो।एक सीढ़ी है जो गुरू ने दी है और इस सीढ़ी के माध्यम से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है।(इस सीढ़ी पर चढ़ने की बरकति से मेरे अंदर) सदा-स्थिर रहने वाला आनंद बन रहा है। जो मनुष्य (इस सीढ़ी की बरकति से) आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में पहुँचता है वह सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लगता है।सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाने वाली उसकी मति अटल हो जाती है।परमात्मा अटल है। (अगर गुण गाने वाली मति नहीं बनी तो) कोई स्नान।कोई दान।कोई ज्ञान की चोंच-चर्चा।और कोई तीर्थ स्नान परमात्मा को खूश नहीं कर सकते। (गुण गाने वाले मनुष्य के मन में से) धोखे-फरेब।मोह के चमत्कार।विकार आदि सब समाप्त हो जाते हैं।उसके अंदर ना झूठ रह जाता है।ना ठॅगी रहती है।ना ही मेर-तेर रहती है। (प्रभू के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों प्रभू के) गुण गाता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह प्रभू ही प्यारा लगता जा रहा है। 1। उस मालिक प्रभू की सिफत-सालाह करनी चाहिए जिसने जगत पैदा किया है। (सिफत-सालाह किए बिना मनुष्य के मन में विकारों की) मैल लगी रहती है।और अगर मन (विकारों से) मैला टिका रहे तो कोई भी नाम-अमृत पी नहीं सकता। (पर इस नाम-अमृत की प्राप्ति के लिए भी मूल्य चुकाना पड़ता है) मैंने गुरू से मूल्य डलवाया (तो उसने बताया कि) जिसने अपना ये मन (गुरू के) हवाले किया उसने बार-बार सिमर के नाम-अमृत पी लिया। (गुरू के बताए हुए राह पर चल कर) जब किसी मनुष्य ने अपना मन (मैल से हटा के) सदा-स्थिर प्रभू में जोड़ा तो उसने आत्मिक अडोलता में टिक के अपने प्रीतम प्रभू से गहरी सांझ डाल ली। (पर) मैं तब ही प्रभू-चरणों से जुड़ के प्रभू के गुण गा सकता हूँ अगर प्रभू की रजा ही हो (यदि मैं उसे अच्छा लगने लगूँ)। प्रभू के साथ ऊपर-ऊपर रहने पर प्रभू के साथ मिलाप नहीं हो सकता।(सो।हे भाई !) उस मालिक प्रभू की (सदा) सिफत सालाह करनी चाहिए जिसने (ये) जगत पैदा किया है। 2। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा आ बसे।उसे किसी और पदार्थ की लालसा नहीं रह जाती।उसका जनम-मरण समाप्त हो जाता है। उसका मन प्रीतम-प्रभू में रीझ जाता है।प्रभू के प्रेम से रंगा जाता है।उसका मन उस मालिक के रंग में रंगा जाता है। वह उस सदा-स्थिर मालिक की सिफत सालाह की बातें करता रहता है जिसने पानी की बूँद से शरीर किले का निर्माण किया है। जो पाँच तत्वों का मालिक है।जो स्वयं ही (शरीर जगत को) पैदा करने वाला है।जिसने अपने रहने के लिए मनुष्य का शरीर सजाया है। हे प्यारे प्रभू ! तू (मेरी विनती) सुन।हम जीव अवगुणों से भरे हुए हैं (तू स्वयं ही अपनी सिफत सालाह की दाति दे के हमें पवित्र करने वाला है) जो जीव (तेरी मेहर से) तुझे पसेंद आ जाता है वह तेरा ही रूप हो जाता है। उसके जनम-मरन के चक्कर समाप्त हो जाते हैं।उसकी बुद्धि अभुल हो जाती है (वह सद्बुद्धि वाला हो जाता है)। 3। स्त्री को ऐसा सुर्मा पहनना चाहिए जैसा उसके पति को अच्छा लगे (जीव-स्त्री को प्रभू-पति के मिलाप के लिए ऐसे उद्यम करने चाहिए जो प्रभू-पति को पसंद आए)। (पर जीव के भी वश में क्या है। ) जब परमात्मा खुद समझ बख्शे।तब ही जीव (सही रास्ता) समझ सकता है।तब ही जीव को सूझ आ सकती है।तब ही कुछ जाना जा सकता है। परमात्मा खुद ही समझ देता है।खुद ही सही रास्ते पर डालता है खुद ही जीव के मन को अपनी ओर प्रेरित करता है। साधारण काम और अच्छे काम परमात्मा खुद ही जीव से करवाता है।पर उस प्रभू का भेद नहीं पाया जा सकता।कोई उसकी कीमत नहीं जान सकता। (परमात्मा का प्यार प्राप्त करने के लिए) मैं कोई जादू-टोना कोई मंत्र आदि पाखण्ड करना नहीं जानती।मैंने तो केवल उस प्रभू को अपने हृदय में बसाया है।मेरा मन उसकी याद में भीग गया है। प्रभू-पति को प्रसन्न करने के लिए उसका नाम ही सुर्मा है।इस सुर्मे की सूझ भी उसके पास से ही मिलती है।(जिस जीव को ये सूझ पड़ जाती है वह) गुरू के शबद में जुड़ के उस सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 4। सज्जन प्रभू जी (जिन सौभाग्यशाली बँदों के) अपने बन जाते हैं।वह लोग फिर पराए घरों में नहीं जाते (भाव।प्रभू का सिमरन छोड़ के और तथाकथित धर्म-कर्म नहीं करते फिरते)। वे आदमी अंतरात्मे सदा-स्थिर सज्जन-प्रभू के साथ रंगे रहते हैं।वे अपने मन में सज्जन-प्रभू जी के मिलाप का आनंद ही लेते हैं। यही उनके वास्ते सारे धार्मिक कर्म हैं। उनको सदा-स्थिर प्रभू का नाम प्यारा लगता है, यही उनके वास्ते अढ़सठ तीर्थों का स्नान है।यही उनके वास्ते पुंन-दान है और यही उनकी देव-पूजा है।

संदर्भ: यह अंग 766 है, राग सूही का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 766” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सूही राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 767 →, पीछे का: ← अंग 765

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।