Lulla Family

अंग 793

अंग
793
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूही कबीर जीउ ललित ॥
थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ ॥
जरा हाक दी सभ मति थाकी एक न थाकसि माइआ ॥1॥
बावरे तै गिआन बीचारु न पाइआ ॥
बिरथा जनमु गवाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
तब लगु प्रानी तिसै सरेवहु जब लगु घट महि सासा ॥
जे घटु जाइ त भाउ न जासी हरि के चरन निवासा ॥2॥
जिस कउ सबदु बसावै अंतरि चूकै तिसहि पिआसा ॥
हुकमै बूझै चउपड़ि खेलै मनु जिणि ढाले पासा ॥3॥
जो जन जानि भजहि अबिगत कउ तिन का कछू न नासा ॥
कहु कबीर ते जन कबहु न हारहि ढालि जु जानहि पासा ॥4॥4॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: सूही कबीर जीउ ललित ॥ (आपकी) आँखें कमजोर हैं चुकी हैं।कान भी (अब) सुनने से रह गए हैं।सुंदर शरीर (भी) रह गया है; बुढ़ापे ने आ के आवाज मारी है और (आपकी) सारी अक्ल भी (ठीक) काम नहीं करती।पर (आपकी) माया की कसक (अभी तक) नहीं खत्म हुई। 1। तूने (परमात्मा के साथ) जान-पहिचान (करने) की समझ प्राप्त नहीं की हे बावरे मनुष्य ! तूने सारी उम्र व्यर्थ गवा ली है। 1।रहाउ। हे बंदे ! जब तक शरीर में प्राण चल रहे हैं।तब तक उस प्रभू को ही सिमरते रहो। (उससे इतना प्यार बनाओ कि) अगर शरीर नाश (भी) हो जाए।तो भी (उससे) प्यार ना घटे।और प्रभू के चरणों में मन टिका रहे। 2। (प्रभू स्वयं) जिस मनुष्य के मन में अपनी सिफत सालाह की बाणी बसाता है।उसकी (माया की) प्यास मिट जाती है। वह मनुष्य प्रभू की रजा को समझ लेता है (रजा में राजी रहने का) चौपड़ वह खेलता है।और मन को जीत के पासा फेंकता है (भाव।मन को जीतना- ये उसके लिए चौपड़ की खेल में पासा फेंकना है)। 3। जो मनुष्य प्रभू के साथ सांझ बना के उस अदृश्य को सिमरते हैं।उनका जीवन व्यर्थ नहीं जाता । हे कबीर ! कह,जो मनुष्य (सिमरन-रूपी) पासा फेंकना जानते हैं।वे जिंदगी की बाजी कभी हार के नहीं जाते। 4। 4।
सूही ललित कबीर जीउ ॥
एकु कोटु पंच सिकदारा पंचे मागहि हाला ॥
जिमी नाही मै किसी की बोई ऐसा देनु दुखाला ॥1॥
हरि के लोगा मो कउ नीति डसै पटवारी ॥
ऊपरि भुजा करि मै गुर पहि पुकारिआ तिनि हउ लीआ उबारी ॥1॥ रहाउ ॥
नउ डाडी दस मुंसफ धावहि रईअति बसन न देही ॥
डोरी पूरी मापहि नाही बहु बिसटाला लेही ॥2॥
बहतरि घर इकु पुरखु समाइआ उनि दीआ नामु लिखाई ॥
धरम राइ का दफतरु सोधिआ बाकी रिजम न काई ॥3॥
संता कउ मति कोई निंदहु संत रामु है एकोु ॥
कहु कबीर मै सो गुरु पाइआ जा का नाउ बिबेकोु ॥4॥5॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: सूही ललित कबीर जीउ ॥ (मनुष्य का ये शरीर।जैसे) एक किला है।(इसमें) पाँच (कामादिक) चौधरी (बसते हैं)।पाँचो ही (इस मनुष्य से) मामला मांगते हैं (भाव।ये पाँचों विकार इसे दुखी करते फिरते हैं)। (पर अपने सतिगुरू की कृपा से) मैं (इन पाँचों में से)।किसी का भी मुज़ारिया नहीं बना (भाव।मैं किसी के भी दबाव में नहीं आया)।इस वास्ते किसी का मामला भरना मेरे लिए मुश्किल है (भाव।इनमें से कोई भी विकार मुझे कुमार्ग पर नहीं डाल सका)। 1। हे संतजनो ! मुझे मामले का हिसाब बनाने वाले का हर वक्त सहम रहता है (अर्थात मुझे हर वक्त डर रहता है कि कामादिक विकारों का कहीं जोर पड़ कर मेरे अंदर भी कुकर्मों का लेखा ना बनने लग जाए)। सो मैंने अपनी बाँह ऊँची करके (अपने) गुरू के आगे पुकार की और उसने मुझे (इनसे) बचा लिया। 1।रहाउ। (मनुष्य-शरीर के) नौ (श्रोत-) ज़रीब-कश (जमीन की पैमायश करने वाले) और दस (इन्द्रियां) न्याय करने वाली (मनुष्य के जीवन पर ऐसे) टूट के पड़ते हैं कि (मनुष्य के अंदर भले गुणों की) प्रजा को बसने नहीं देते। (ये ज़रीबकश) जरीब पूरी नहीं नापते।ज्यादा रिश्वतें लेते हैं (भाव।मनुष्य को हद से ज्यादा विकारों में फसाते हैं।हद से ज्यादा काम आदि में फसा देते हैं)। 2। (मैंने अपने गुरू के आगे पुकार की तो) उसने मुझे (उस परमात्मा का) नाम बतौर राहदारी लिख दिया।जो बहक्तर घरों वाले शरीर के अंदर ही मौजूद है। (सतिगुरू की इस मेहर के सदका जब) धर्मराज के दफतर की जाँच हुई तो मेरे जिम्मे रक्ती भर भी देनदारी नहीं निकली (भाव।गुरू की कृपा से मेरे अंदर से कुकर्मों का लेखा बिल्कुल ही खत्म हो गया)। 3।(सो। हे भाई ! ये बरकति संतजनों के संगति की है) आप कोई भी संत की कभी निंदा ना करना।संत और परमात्मा एक रूप हैं। हे कबीर ! कह, मुझे भी वही गुरू-संत ही मिला है जो पूर्ण ज्ञानवान है। 4। 5।
रागु सूही बाणी स्री रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सह की सार सुहागनि जानै ॥
तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै ॥
तनु मनु देइ न अंतरु राखै ॥
अवरा देखि न सुनै अभाखै ॥1॥
सो कत जानै पीर पराई ॥
जा कै अंतरि दरदु न पाई ॥1॥ रहाउ ॥
दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी ॥
जिनि नाह निरंतरि भगति न कीनी ॥
पुर सलात का पंथु दुहेला ॥
संगि न साथी गवनु इकेला ॥2॥
दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ ॥
बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ ॥
कहि रविदास सरनि प्रभ तेरी ॥
जिउ जानहु तिउ करु गति मेरी ॥3॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही बाणी स्री रविदास जीउ की सतिगुर प्रसादि ॥ पति-प्रभू (के मिलाप) की कद्र पति से प्यार करने वाली ही जानती है। वह अहंकार छोड़ के (प्रभू-चरनों में जुड़ के उस मिलाप का) सुख-आनंद भोगती है। अपना तन-मन प्रभू पति के हवाले कर देती है।प्रभू-पति से (कोई) दूरी नहीं रखती। ना किसी और का आसरा देखती है।और ना ही किसी की बुरी प्रेरणा सुनती है। 1। वह औरों (गुरमुख सुहागनों) के दिल की (इस) पीड़ा को कैसे समझ सकती है जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू से विछोड़े का शूल नहीं उठा। 1।रहाउ। वह छुटड़ दुखी रहती है।ससुराल-पेके (लोक-परलोक) दोनों जगहों से वंचित रहती है; पर जिस जीव-स्त्री ने पति-प्रभू की बंदगी एक-रस नहीं की। जीवन का ये रास्ता (जो) पुरसलात (के समान है।उसके लिए) बड़ा मुश्किल हो जाता है। (यहाँ दुखों में) कोई संगी-साथी नहीं बनता।(जीवन-सफर का) सारा रास्ता ही अकेले (लांघना पड़ता) है। 2। हे प्रभू ! मैं दुखी मैं दर्दवंद आपके दर पर आया हूँ। मुझे आपके दर्शनों की बहुत तमन्ना है (पर आपके दर से) कोई उक्तर नहीं मिलता। रविदास कहता है, हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हॅूँ। जैसे भी बने।वैसे मेरी हालत सवार दे। 3।
सूही ॥
जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥
करना कूचु रहनु थिरु नाही ॥
संगु चलत है हम भी चलना ॥
दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना ॥1॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: सूही ॥ (मनुष्य की जिंदगी में) जो जो दिन आते हैं।वह दिन (असल में साथ-साथ) गुजरते जाते हैं (भाव।उम्र में से कम होते जाते हैं)। (यहाँ से हरेक ने) कूच कर जाना है (किसी की भी यहाँ) सदा ही रिहायश नहीं। हमारा साथ चलता जा रहा है।हमने भी (यहाँ से) चले जाना है; ये दूर की यात्रा है और मौत सिर पर खड़ी है (पता नहीं कौन से वक्त आ जाए)। 1।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही कबीर जीउ ललित ॥ (आपकी) आँखें कमजोर हैं चुकी हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।