राग माझ
पंजाब की अपनी धुन, दोपहर की।
माझ राग ग्रंथ साहिब के बाहर कम मिलता है, और जहाँ मिलता है वहाँ भी ज़्यादातर सिख-स्रोतों से ही। मूल हिंदुस्तानी शास्त्रीय राग-संग्रह में इसकी प्रमुख जगह नहीं रही।

नाम का सम्बन्ध पंजाब के बीच के क्षेत्र, "माझा", से है। दोपहर के मध्य का स्वर, उस समय का जब काम भारी हो रहा होता है और घर अभी दूर। ग्रंथ में यह राग चौरानवें से चौबीस-चौदह तक का विस्तार रखता है।
"मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई ॥" माझ M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (74)
- सबदि रंगाए हुकमि सबाए ॥अंग 109
- गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ ॥अंग 137
- पहिलै पिआरि लगा थण दुधि ॥अंग 137
- दस बालतणि बीस रवणि तीसा का सुंदरु कहावै ॥अंग 138
- तूं करता पुरखु अगंमु है आपि स्रिसटि उपाती ॥अंग 138
- अखी देखै जिहवा बोलै कंनी सुरति समाइ ॥अंग 138
- तुधु आपे जगतु उपाइ कै तुधु आपे धंधै लाइआ ॥अंग 138
- सदा सदा तूं एकु है तुधु दूजा खेलु रचाइआ ॥अंग 139
- सुइने कै परबति गुफा करी कै पाणी पइआलि ॥अंग 139
- वसत्र पखालि पखाले काइआ आपे संजमि होवै ॥अंग 139
- काइआ हंसि संजोगु मेलि मिलाइआ ॥अंग 139
- कूड़ु बोलि मुरदारु खाइ ॥अंग 139
- इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ॥अंग 140
- जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥अंग 140
- जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥अंग 140
- माहा रुती सभ तूं घड़ी मूरत वीचारा ॥अंग 140
- मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥अंग 140
- हकु पराइआ नानका उसु सूअर उसु गाइ ॥अंग 141
- पंजि निवाजा वखत पंजि पंजा पंजे नाउ ॥अंग 141
- इकि रतन पदारथ वणजदे इकि कचै दे वापारा ॥अंग 141
- मुसलमाणु कहावणु मुसकलु जा होइ ता मुसलमाणु कहावै ॥अंग 141
- राजे रयति सिकदार कोइ न रहसीओ ॥अंग 141
- नदीआ होवहि धेणवा सुंम होवहि दुधु घीउ ॥अंग 141
- भार अठारह मेवा होवै गरुड़ा होइ सुआउ ॥अंग 142
- जे देहै दुखु लाईऐ पाप गरह दुइ राहु ॥अंग 142
- अगी पाला कपड़ु होवै खाणा होवै वाउ ॥अंग 142
- बदफैली गैबाना खसमु न जाणई ॥अंग 142
- सो जीविआ जिसु मनि वसिआ सोइ ॥अंग 142
- किआ खाधै किआ पैधै होइ ॥अंग 142
- जाती दै किआ हथि सचु परखीऐ ॥अंग 142
- जा पका ता कटिआ रही सु पलरि वाड़ि ॥अंग 142
- वेखु जि मिठा कटिआ कटि कुटि बधा पाइ ॥अंग 142
- इकना मरणु न चिति आस घणेरिआ ॥अंग 143
- मछी तारू किआ करे पंखी किआ आकासु ॥अंग 143
- कैहा कंचनु तुटै सारु ॥अंग 143
- आपे कुदरति साजि कै आपे करे बीचारु ॥अंग 143
- हम जेर जिमी दुनीआ पीरा मसाइका राइआ ॥अंग 143
- न देव दानवा नरा ॥ न सिध साधिका धरा ॥अंग 143
- न दादे दिहंद आदमी ॥ न सपत जेर जिमी ॥अंग 144
- न सूर ससि मंडलो ॥ न सपत दीप नह जलो ॥ अंन पउण थिरु न कुई ॥अंग 144
- न रिजकु दसत आ कसे ॥अंग 144
- परंदए न गिराह जर ॥अंग 144
- नानक लिलारि लिखिआ सोइ ॥अंग 144
- सचा तेरा हुकमु गुरमुखि जाणिआ ॥अंग 144
- सीहा बाजा चरगा कुहीआ एना खवाले घाह ॥अंग 144
- इकि मासहारी इकि त्रिणु खाहि ॥अंग 144
- पूरे गुर की कार करमि कमाईऐ ॥अंग 144
- तुधु भावै ता वावहि गावहि तुधु भावै जलि नावहि ॥अंग 144
- जा तूं वडा सभि वडिआंईआ चंगै चंगा होई ॥अंग 145
- सतिगुरु सेवि निसंगु भरमु चुकाईऐ ॥अंग 145
- कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उडरिआ ॥अंग 145
- भगता तै सैसारीआ जोड़ु कदे न आइआ ॥अंग 145
- सबाही सालाह जिनी धिआइआ इक मनि ॥अंग 145
- जा तूं ता किआ होरि मै सचु सुणाईऐ ॥अंग 146
- सचा भोजनु भाउ सतिगुरि दसिआ ॥अंग 146
- पहिरा अगनि हिवै घरु बाधा भोजनु सारु कराई ॥अंग 147
- विणु सचे सभु कूड़ु कूड़ु कमाईऐ ॥अंग 147
- नानक गुरु संतोखु रुखु धरमु फुलु फल गिआनु ॥अंग 147
- सुइने का बिरखु पत परवाला फुल जवेहर लाल ॥अंग 147
- जीवदिआ मरु मारि न पछोताईऐ ॥अंग 147
- तुमी तुमा विसु अकु धतूरा निमु फलु ॥अंग 147
- मति पंखेरू किरतु साथि कब उतम कब नीच ॥अंग 147
- केते कहहि वखाण कहि कहि जावणा ॥अंग 148
- नारी पुरख पिआरु प्रेमि सीगारीआ ॥अंग 148
- मारू मीहि न त्रिपतिआ अगी लहै न भुख ॥अंग 148
- खसमै कै दरबारि ढाढी वसिआ ॥अंग 148
- खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि ॥अंग 149
- नानक बोलणु झखणा दुख छडि मंगीअहि सुख ॥अंग 149
- चारे कुंडा देखि अंदरु भालिआ ॥अंग 149
- सतिगुरु होइ दइआलु त सरधा पूरीऐ ॥अंग 149
- सिरु खोहाइ पीअहि मलवाणी जूठा मंगि मंगि खाही ॥अंग 149
- तुधु सचे सुबहानु सदा कलाणिआ ॥अंग 150
- आपि बुझाए सोई बूझै ॥अंग 150
- हउ ढाढी वेकारु कारै लाइआ ॥अंग 150
महला 2 (12)
- देंदे थावहु दिता चंगा मनमुखि ऐसा जाणीऐ ॥अंग 138
- अखी बाझहु वेखणा विणु कंना सुनणा ॥अंग 139
- दिसै सुणीऐ जाणीऐ साउ न पाइआ जाइ ॥अंग 139
- सेई पूरे साह जिनी पूरा पाइआ ॥अंग 146
- अठी पहरी अठ खंड नावा खंडु सरीरु ॥अंग 146
- पउणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥अंग 146
- आखणु आखि न रजिआ सुनणि न रजे कंन ॥अंग 147
- मंत्री होइ अठूहिआ नागी लगै जाइ ॥ आपण हथी आपणै दे कूचा आपे लाइ ॥अंग 148
- नानक परखे आप कउ ता पारखु जाणु ॥अंग 148
- निहफलं तसि जनमसि जावतु ब्रहम न बिंदते ॥अंग 148
- अगी पाला कि करे सूरज केही राति ॥अंग 150
- दीखिआ आखि बुझाइआ सिफती सचि समेउ ॥अंग 150
महला 3 (35)
- करमु होवै सतिगुरू मिलाए ॥अंग 109
- मेरा प्रभु निरमलु अगम अपारा ॥अंग 110
- इको आपि फिरै परछंना ॥अंग 111
- सबदि मरै सु मुआ जापै ॥अंग 111
- अंदरि हीरा लालु बणाइआ ॥अंग 112
- सभ घट आपे भोगणहारा ॥अंग 113
- गुरमुखि विरलै किनै चखि डीठी ॥अंग 113
- आपे रंगे सहजि सुभाए ॥अंग 114
- सतिगुरु सेविऐ वडी वडिआई ॥अंग 114
- आपु वंञाए ता सभ किछु पाए ॥अंग 115
- बिनु नावै सभ भरमि भुलाणी ॥अंग 116
- ऐथै साचे सु आगै साचे ॥अंग 116
- उतपति परलउ सबदे होवै ॥अंग 117
- सतिगुर साची सिख सुणाई ॥अंग 117
- अंम्रित नामु मंनि वसाए ॥अंग 118
- अंम्रितु वरसै सहजि सुभाए ॥अंग 119
- से सचि लागे जो तुधु भाए ॥अंग 119
- वरन रूप वरतहि सभ तेरे ॥अंग 120
- निरमल जोति सभ माहि समाणी ॥अंग 121
- गोविंदु ऊजलु ऊजल हंसा ॥अंग 121
- सचा सेवी सचु सालाही ॥अंग 122
- तेरे भगत सोहहि साचै दरबारे ॥अंग 122
- आतम राम परगासु गुर ते होवै ॥अंग 123
- इसु गुफा महि अखुट भंडारा ॥अंग 124
- गुरमुखि मिलै मिलाए आपे ॥अंग 124
- एका जोति जोति है सरीरा ॥अंग 125
- मेरा प्रभु भरपूरि रहिआ सभ थाई ॥अंग 126
- हरि आपे मेले सेव कराए ॥अंग 126
- ऊतम जनमु सुथानि है वासा ॥अंग 127
- मनमुख पड़हि पंडित कहावहि ॥अंग 128
- निरगुणु सरगुणु आपे सोई ॥अंग 128
- माइआ मोहु जगतु सबाइआ ॥अंग 129
- कलि कीरति परगटु चानणु संसारि ॥अंग 145
- भै विचि जंमै भै मरै भी भउ मन महि होइ ॥अंग 149
- भै विणु जीवै बहुतु बहुतु खुसीआ खुसी कमाइ ॥अंग 149
महला 4 (10)
- हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइआ ॥अंग 94
- मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ॥अंग 94
- हरि गुण पड़ीऐ हरि गुण गुणीऐ ॥अंग 95
- हरि जन संत मिलहु मेरे भाई ॥अंग 95
- हरि गुर गिआनु हरि रसु हरि पाइआ ॥अंग 95
- हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई ॥अंग 95
- आवहु भैणे तुसी मिलहु पिआरीआ ॥अंग 96
- आदि पुरखु अपरंपरु आपे ॥अंग 129
- जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥अंग 140
- परहरि काम क्रोधु झूठु निंदा तजि माइआ अहंकारु चुकावै ॥अंग 141
महला 5 (50)
- मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई ॥अंग 96
- सा रुति सुहावी जितु तुधु समाली ॥अंग 97
- अनहदु वाजै सहजि सुहेला ॥अंग 97
- जितु घरि पिरि सोहागु बणाइआ ॥अंग 97
- खोजत खोजत दरसन चाहे ॥अंग 98
- पारब्रहम अपरंपर देवा ॥अंग 98
- कहिआ करणा दिता लैणा ॥अंग 98
- दुखु तदे जा विसरि जावै ॥अंग 98
- लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥अंग 99
- धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥अंग 99
- सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥अंग 99
- विसरु नाही एवड दाते ॥अंग 100
- सिफति सालाहणु तेरा हुकमु रजाई ॥अंग 100
- तूं जलनिधि हम मीन तुमारे ॥अंग 100
- अंम्रित नामु सदा निरमलीआ ॥अंग 100
- निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥अंग 101
- प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥अंग 101
- ओति पोति सेवक संगि राता ॥अंग 101
- सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥अंग 102
- तिसु बलिहारी जिनि रसना भणिआ ॥अंग 102
- तूं पेडु साख तेरी फूली ॥अंग 102
- गुर परसादि किनै विरलै जाणी ॥अंग 103
- सुणि सुणि होवै परम गति मेरी ॥अंग 103
- तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥अंग 103
- जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥अंग 103
- सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥अंग 104
- हुकमी वरसण लागे मेहा ॥अंग 104
- आउ साजन संत मीत पिआरे ॥अंग 104
- भए क्रिपाल गोविंद गुसाई ॥अंग 105
- जिथै नामु जपीऐ प्रभ पिआरे ॥अंग 105
- चरण ठाकुर के रिदै समाणे ॥अंग 105
- मीहु पइआ परमेसरि पाइआ ॥अंग 105
- मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥अंग 106
- पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥अंग 106
- सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥अंग 106
- कीनी दइआ गोपाल गुसाई ॥अंग 107
- सो सचु मंदरु जितु सचु धिआईऐ ॥अंग 107
- रैणि सुहावड़ी दिनसु सुहेला ॥अंग 107
- ऐथै तूंहै आगै आपे ॥अंग 107
- मनु तनु रता राम पिआरे ॥अंग 108
- सिमरत नामु रिदै सुखु पाइआ ॥अंग 108
- सोई करणा जि आपि कराए ॥अंग 108
- झूठा मंगणु जे कोई मागै ॥अंग 109
- अंतरि अलखु न जाई लखिआ ॥अंग 130
- कउणु सु मुकता कउणु सु जुगता ॥अंग 131
- प्रभु अबिनासी ता किआ काड़ा ॥अंग 131
- नित नित दयु समालीऐ ॥अंग 132
- हरि जपि जपे मनु धीरे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 132
- किरति करम के वीछुड़े करि किरपा मेलहु राम ॥अंग 133
- सेवी सतिगुरु आपणा हरि सिमरी दिन सभि रैण ॥अंग 136