राग माझ
पंजाब की अपनी धुन, दोपहर की।
माझ राग ग्रंथ साहिब के बाहर कम मिलता है, और जहाँ मिलता है वहाँ भी ज़्यादातर सिख-स्रोतों से ही। मूल हिंदुस्तानी शास्त्रीय राग-संग्रह में इसकी प्रमुख जगह नहीं रही।

नाम का सम्बन्ध पंजाब के बीच के क्षेत्र, “माझा”, से है। दोपहर के मध्य का स्वर, उस समय का जब काम भारी हो रहा होता है और घर अभी दूर। ग्रंथ में यह राग चौरानवें से चौबीस-चौदह तक का विस्तार रखता है।
“मेरा मन लोचै गुरु दरसन ताईं ।” माझ M4