नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सिफत सालाह करने वाला मनुष्य सच्चा गुरू शबद विचार के (आत्मिक) मौत (का डर) दूर कर लेता है। गुरू शबद की बरकति से सुधरा हुआ ढाढी अकॅथ प्रभू के गुण गाता है। (इस तरह) हे नानक ! प्रभू के गुणों की पूँजी एकत्र करके प्यारे प्रभू के साथ मिल जाता है। 23।
सलोकु मः 1 ॥ खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि ॥ धोते मूलि न उतरहि जे सउ धोवण पाहि ॥ नानक बखसे बखसीअहि नाहि त पाही पाहि ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ पापों के कारण (जो जीव) पैदा होते हैं, (यहां भी) पाप करते हैं और (आगे भी इनके किए पापों के संस्कारों करके) पापों में ही प्रवृर्ति होते हैं। ये पाप धोने से बिल्कुल नहीं उतरते, चाहे सौ धोने धोएं (चाहे सौ बार धोने का यत्न करें)। हे नानक ! यदि प्रभू मेहर करे (तो ये पाप) बख्शे जाते हैं, नहीं तो जूतियां ही पड़ती हैं।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! (ये जो) दुख छोड़ के सुख मांगते हैं, ऐसा बोलना सिर खपाई ही है। सुख और दुख दोनों प्रभू के दर से कपड़े मिले हुए हैं, जो मनुष्य जन्म ले कर यहाँ पहनते हैं (भाव, दुख और सुख के चक्र हरेक पर आते ही रहते हैं); सो जिसके सामने एतराज गिला करने से (अंत को) हार ही माननी पड़ती है वहाँ चुप रहना ही ठीक है (भाव रजा में चलना सबसे अच्छा है)। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य चारों तरफ देख के (भाव, बाहर की चारों तरफ की भटकना छोड़ के) अपना अंदर का ढूँढता है (उसे दिख जाता है कि) सच्चे अलख अकाल पुरख ने (जगत) पैदा करके स्वयं ही उसकी संभाल की है (भाव, संभाल कर रहा है)। गलत रास्ते पर भटक रहे मनुष्य को गुरू ने रास्ता दिखाया है (राह गुरू दिखाता है), सच्चे सत्गुरू को शाबाश है (जिसकी बरकति से) सच्चे प्रभू को सिमरते हैं। (जिस मनुष्य के अंदर सत्गुरू ने ज्ञान का) दीपक जगा दिया है उसे अपने अंदर से ही (नाम) रत्न मिल गया है। (गुरू की शरण आ के) सच्चे शबद के द्वारा प्रभू की सिफति सालाह करके (मनुष्य) सुखी हो जाते हैं, खसम वाले हो जाते हैं। (पर) जिन्होंने प्रभू का भय नहीं रखा, उन्हें (और) डर सताते हैं। वे अहंकार में गलते हैं। प्रभू के नाम से भूला हुआ जगत बेताला हुआ फिरता है। 24।
सलोकु मः 3 ॥ भै विचि जंमै भै मरै भी भउ मन महि होइ ॥ नानक भै विचि जे मरै सहिला आइआ सोइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जगत सहम में पैदा होता है, सहम में मरता है। सदा ही सहम इसमें टिका रहता है। (पर) हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के डर में स्वैभाव मारता है उसका पैदा होना मुबारक है (जगत की ममता मनुष्य के अंदर सहम पैदा करती है। जब ये अपनत्व व ममता खत्म हो जाए तो किसी चीज के छीने जाने का डर सहम नहीं रहता)। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ परमात्मा का डर हृदय में बसाए बिना मनुष्य लंबी उम्र भी जीता रहे और बड़ी मौजें करता रहे, तो भी, हे नानक ! अगर प्रभू का डर हृदय में बसाए बिना ही मरता है, तो मुंह पे कालिख़ कमा के ही जाता है। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस मनुष्य के ऊपर सत्गुरू कृपा करे (उसके अंदर परमात्मा पर) पक्का भरोसा बंध जाता है, वह (किसी दुख-कलेश के आने पे) कभी गिला शिकवा नहीं करता (क्योंकि) वह (किसी आए दुख को) दुख नहीं समझता, सदा प्रभू के मेल का आनंद लेता है। (दुख कलेश तो कहीं रहा) उसे यम का डर भी नहीं रहता (इस तरह) उसके शरीर को सदा सुख रहता है। जिस पे गुरू दयावान हो जाए उसे (मानो) जगत में नौ खजाने मिल गए हैं। (क्योंकि) वह तो (खजानों के मालिक) सच्चे प्रभू में जुड़ा रहता है। 25।
सलोकु मः 1 ॥ सिरु खोहाइ पीअहि मलवाणी जूठा मंगि मंगि खाही ॥ फोलि फदीहति मुहि लैनि भड़ासा पाणी देखि सगाही ॥ भेडा वागी सिरु खोहाइनि भरीअनि हथ सुआही ॥ माऊ पीऊ किरतु गवाइनि टबर रोवनि धाही ॥ ओना पिंडु न पतलि किरिआ न दीवा मुए किथाऊ पाही ॥ अठसठि तीरथ देनि न ढोई ब्रहमण अंनु न खाही ॥ सदा कुचील रहहि दिनु राती मथै टिके नाही ॥ झुंडी पाइ बहनि निति मरणै दड़ि दीबाणि न जाही ॥ लकी कासे हथी फुंमण अगो पिछी जाही ॥ ना ओइ जोगी ना ओइ जंगम ना ओइ काजी मुंला ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (ये सरेवड़े जीव हिंसा के वहिम में) सिर (के बाल) उखड़वा के (कि कहीं जुआं ना पड़ जाएं) मैला पानी पीते हैंऔर झूठी रोटी मांग मांग के खाते हैं। (अपने) पाखाने को फोल के मुंह में (गंदी) हवाड़ लेते हैं ओर पानी देख के (इससे) झिझकते हैं (भाव, पानी का इस्तेमाल नहीं करते)। भेड़ों की तरह सिर (के बाल) उखड़वाते हैं, (बाल उखाड़ने वालों के) हाथ राख से भरे जाते हैं। माता-पिता के किए काम (भाव, मेहनत से कमाई करके परिवार पालने का काम) छोड़ बैठते हैं (इसलिए) इनका परिवार धाहें मार के रोता है। (ये लोक तो ऐसे ही गवाया, आगे जा के इनके परलोक का हाल सुनिए) ना तो हिन्दू मत के अनुसार (मरणोपरांत) पिण्ड पक्तल क्रिया दीआ आदि की रस्म करते हैं। मरे हुए पता नहीं कहां जा पड़ते हैं (भाव परलोक सवारने की कोई कोशश नहीं है) (हिन्दुओं के) अढ़सठ तीर्थ इन्हें कोई सहारा नहीं देते (भाव, हिन्दुओं की तरह किसी तीर्थ पर भी नहीं जाते) ब्राहमण (इनका) अंन्न नहीं खाते (भाव, ब्राहमण की भी सेवा नहीं करते)। सदा दिन रात बड़े गंदे रहते हैं। माथे पे तिलक नहीं लगाते (भाव, नहा धो के शरीर को साफ सुथरा भी नहीं करते)। सदा गर्दन गिरा के बैठे रहते हैं जैसे किसी के मरने का सोग कर रहे हैं। (भाव, इनके अंदर कोई आत्मिक हुलारा भी नहीं।) किसी सत्संग आदि में भी कभी नहीं जाते हैं। लोगों के साथ प्याले बांधे हुए हैं, हाथों में चउरियां पकड़ी हुई हैं, और (जीव हिंसा के डर से) एक कतार में चलते हैं। ना इनकी जोगियों वाली रहुरीति, ना जंगमों वाली, ना काज़ी मौलवियों वाली।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सिफत सालाह करने वाला मनुष्य सच्चा गुरू शबद विचार के (आत्मिक) मौत (का डर) दूर कर लेता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।