हरि गुण पड़ीऐ हरि गुण गुणीऐ ॥
हरि हरि नाम कथा नित सुणीऐ ॥
मिलि सतसंगति हरि गुण गाए जगु भउजलु दुतरु तरीऐ जीउ ॥1॥
आउ सखी हरि मेलु करेहा ॥
मेरे प्रीतम का मै देइ सनेहा ॥
मेरा मित्रु सखा सो प्रीतमु भाई मै दसे हरि नरहरीऐ जीउ ॥2॥
मेरी बेदन हरि गुरु पूरा जाणै ॥
हउ रहि न सका बिनु नाम वखाणे ॥
मै अउखधु मंत्रु दीजै गुर पूरे मै हरि हरि नामि उधरीऐ जीउ ॥3॥
हम चात्रिक दीन सतिगुर सरणाई ॥
हरि हरि नामु बूंद मुखि पाई ॥
हरि जलनिधि हम जल के मीने जन नानक जल बिनु मरीऐ जीउ ॥4॥3॥
हरि जन संत मिलहु मेरे भाई ॥
मेरा हरि प्रभु दसहु मै भुख लगाई ॥
मेरी सरधा पूरि जगजीवन दाते मिलि हरि दरसनि मनु भीजै जीउ ॥1॥
मिलि सतसंगि बोली हरि बाणी ॥
हरि हरि कथा मेरै मनि भाणी ॥
हरि हरि अंम्रितु हरि मनि भावै मिलि सतिगुर अंम्रितु पीजै जीउ ॥2॥
वडभागी हरि संगति पावहि ॥
भागहीन भ्रमि चोटा खावहि ॥
बिनु भागा सतसंगु न लभै बिनु संगति मैलु भरीजै जीउ ॥3॥
मै आइ मिलहु जगजीवन पिआरे ॥
हरि हरि नामु दइआ मनि धारे ॥
गुरमति नामु मीठा मनि भाइआ जन नानक नामि मनु भीजै जीउ ॥4॥4॥
हरि गुर गिआनु हरि रसु हरि पाइआ ॥
मनु हरि रंगि राता हरि रसु पीआइआ ॥
हरि हरि नामु मुखि हरि हरि बोली मनु हरि रसि टुलि टुलि पउदा जीउ ॥1॥
आवहु संत मै गलि मेलाईऐ ॥
मेरे प्रीतम की मै कथा सुणाईऐ ॥
हरि के संत मिलहु मनु देवा जो गुरबाणी मुखि चउदा जीउ ॥2॥
वडभागी हरि संतु मिलाइआ ॥
गुरि पूरै हरि रसु मुखि पाइआ ॥
भागहीन सतिगुरु नही पाइआ मनमुखु गरभ जूनी निति पउदा जीउ ॥3॥
आपि दइआलि दइआ प्रभि धारी ॥
मलु हउमै बिखिआ सभ निवारी ॥
नानक हट पटण विचि कांइआ हरि लैंदे गुरमुखि सउदा जीउ ॥4॥5॥
हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई ॥
मिलि संगति मनि नामु वसाई ॥
हरि प्रभ अगम अगोचर सुआमी मिलि सतिगुर हरि रसु कीचै जीउ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माझ महला 4 ॥ (हे सत्संगी मित्र, आएँ मिल के हम) परमात्मा के गुणों वाली बाणी पढ़ें और विचारें।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।